Friday, July 9, 2010

वर्षा अंक




हिमाचल मित्र का वर्षा अंक देर से ही सही (हर बार की तरह), आ गया है. करीब पैंतालीस लेखकों की रचनाओं और जे पी सिंघल, विजय शर्मा के चित्र और रमेश कुंतल मेघ के रेखाचित्रों से सजे 108 पृष्‍ठों के इस अंक की विषय सूची यहां दी जा रही है. अगर व‍िषय सूची देखकरआपको इसे पढ़ने का मन करे तो हमें अपना पता यहां ईमेल करें - himachalmittra@gmail.com हम आपको अंक भेज देंगे.

आमुख कथा – शिक्षा का अधिकार - उज्जवल भविष्य की उम्मीद : शिरीश खरे॥

बातचीत - बांसुरी वादक राजेंद्र सिंह गुरंग॥

लोक संस्कृति - हिमाचली लोक साहित्य में मुक्तक गीत : कृष्ण चंद्र महादेविया॥ हिमाचली कोकिला - वर्षा कटोच॥ लाहौल स्पिति में विवाह समारोह के दौरान खान-पान : उरज्ञान छैरिंग मैलगपा॥

अनुगूंज – छत्‍तीसगढ़ की संस्‍कृति : शरद कोकास ॥

मेरी प्रिय कहानी – सतखसमी : सुंदर लोहिया॥ टिप्पणी : निरंजन देव॥ बातचीत : मुरारी शर्मा॥ कल्पना की उड़ान ने खिंचवाई रेखाएं : रत्नचंद रत्नेश॥ रमेश कुंतल मेघ के रेखांकन॥ कविताएं : जसवंत सिंह विरदी॥ कुलदीप शर्मा॥ भास्कर चौधरी॥ हंसराज भारती॥ सिद्धेश्वर सिंह॥ कहानी : बद्री सिंह भाटिया॥ परिचर्चा - साहित्यकार, साहित्य और समाज : एस.आर.हरनोट॥ सुरेश सेन निशांत॥ मुरारी शर्मा॥

विचार मंथन 1- कुछ भी (क्यों) नहीं देखा – केशव की कहानी: सुधीर भड़कमकर॥ केशव॥ निरंजन शर्मा॥ मधुकर भारती॥ विचार मंथन 2- पत्रिका की साज सज्जा: रेखा॥ हरि मृदुल॥ मनोज शर्मा॥

पहाड़ी कलम- पहाड़ी अनुवाद के साथ हिंदी कविता - स्थित प्रज्ञ : यश मालवीय॥ केशो ज्ञानी की कुंडलियां॥ पवनेंद्र पवन दे छंद॥ रेखा ढडवाल दे गीत॥ गल सुणा : अनूप सेठी॥ चाचू भतीजू: गप्पी डरैबर॥ वातायन खुले रखने होंगे (पहाड़ी भाषा पर चर्चा) : डॉ. गौतम व्यथित॥ डॉ. प्रत्यूष गुलेरी॥ कुछ समरूप बोलियां : केशवचंद्र॥

करियर कैफे- सुदर्शन वात्यायन॥

भूगोल से आगे- एक अनूठा विचार मंदिर : राजीव त्रिगर्ती॥ नूरपुर का नगीना : बी कृष्णा॥ पझोता आंदोलन : आचार्य ओमप्रकाश राही॥ छात्र समीक्षकों के बीच: मोहन साहिल॥

यात्रा- हिमाचल दर्शन : शैलेश सिंह॥

आस्वाद और परख- मनोज शर्मा की कविताओं पर तरसेम गुजराल॥ कैलाश आहलूवालिया की कहानियों पर महमूद अयूबी और डॉ. परेश॥ वेद राही के डोगरी हिंदी उपन्यास पर अग्निशेखर॥ केशव के अंग्रेजी उपन्यास पर ईषिता आर. गिरीश॥ रमेश उपाध्याय के निबंध पर डॉ. वत्सला शुक्ल॥

कला परिक्रमा में जे पी सिंघल और विजय शर्मा की चित्र प्रदर्शनी, रमा वैद्यनाथन के नृत्‍य, दयाल प्रसाद निर्देशित नाटक, मोहित चौहान की एलबम, सेतु और संबोधन पत्रि‍काओं पर टिप्‍पणियां ॥ गतिविधि॥ वैवाहिकी॥

परिवर्तन की पदचाप : आर. बी. राणा॥

Thursday, July 1, 2010

भूख

मेरी पिराबलम बोले तो मालूम क्या है? अक्खा दिन मेरे कू कागज खाना पड़ता है। काए कू ? बोले तो सड़क पर घास नहीं उगता है न। इसी के वास्‍ते। अब तुम यह पूछेगा कि कागज जास्ती खाती है कि पिलास्टिक, तो बताना जरा मुसकिल गिरेगा। वो इस वास्‍ते कि जभी भूख लगी हो तभी जो भी मिल जाए, खाना ई च पड़ता है। तू बोल, दिल पे हाथ रख के बोल, भूख लगने पर खाता है कि खाने का टेम हो गएला है, इसके वास्ते खाता है। दूसरा बात भी है रे। भूख लगने पर तेरे पास चॉइस है क्या? यह खाएंगा वो नहीं खाएंगा? कि खाना ई च नईं है? बहोत लोक है हमारे महान मुलुक में, जिनको एक टैम भी खाना नसीब नहीं होता। पर जाने दे। मैं तो गाई माई है। हज्‍जार साल से सब लोक मेरी पूजा करते। मैं ई कागज और पिलास्टिक खाती है तो दूसरे के बारे में क्या बोलेगी।

Friday, June 25, 2010

बारिश का स्‍वागत


एक और कोशिश

गोवर्धन अंगुली पर धारा, पांचाली का चीर बढ़ा आता
मात पिता, गुरू, बंधु, सखा आशीष, ज्ञान, प्रेम मिल जाता
बुद्ध, मार्क्‍स, गांधी का साया सिर पर, जीवन राह दिखाता
क्‍यों सखी साजन, न सखी यह अति सुंदर तम-हर छाता

Thursday, June 24, 2010

बारिश का स्‍वागत

चित्र साभार


मुंबई में अंबर बरस रहा है मजे से. निचले इलाकों में पानी भी भर रहा है, आटो टेक्‍सी वाले भी एक डेढ दिन रूठे रहे. पर सारी जनता मस्‍त है. सामान्‍य स्‍थिति होती तो अब तक चिल्‍ल पौं मच गई होती. पिछले साल की कम बारिश और उसके बाद पानी की कम आपूर्ति से सब सहम गए हैं. आखिर पानी की कुछ तो वकत पड़ी. इसी ख्‍याल से यहां छाते और बारिश की बात की थी. अमीर खुसरो को याद करते हुए. गजल गो द्विजेंद्र द्विज ने उस बात को अपने अंदाज में रखा. अब देखिए बर्फ के प्रदेश लाहुल स्पिति से संजीदा युवा कवि अजेय ने यही ख्‍याल अपने अंदाज में रखा है.

सर धर लो तन भीग न पाता
कड़ी धूप में छांह दे जाता
छड़ी बने डर पास न आता
क्‍यों सखी साजन, न सखी छाता

Sunday, June 20, 2010

बारिश का स्‍वागत

भाई द्विजेंद्र द्विज ने छाते की महिमा जरा दूसरे ढंग से गाई है. जरा देखिए तो -

छरहरा छड़ डर पास न आता
ओढ़ो तो तन भीग न पाता
धूप में छाया भी दे जाता
क्यों सखी साजन? न सखी छाता

Thursday, June 17, 2010

बारिश का स्‍वागत




सिर पर धर लो तन भीग न पाता

हो जब धूप कड़ी तब छाया दे जाता

छरहरी छड़ी बने डर पास न आता

क्‍यों सखी साजन न सखी छाता


रेखांकन सुमनिका का और पंक्तियां अमीर खुसरो की याद में


Wednesday, June 2, 2010

कवि होना उतना ही कठिन है जितना एक अच्छा इन्सान होना




कवि मोहन साहिल की शिमला से करीब चालीस किलोमीटर दूर ठियोग कस्‍बे में चाय की दुकान है. पिछले दिनों कुल्‍लू में एक सेमिनार हुआ जिसमें एस आर हरनोट, अजेय, सुरेश सेन निशांत, मोहन साहिल, ईषिता गिरीश आदि की रचनाओं पर डिग्री कालेज के छात्र-छात्राओं ने परचे पढ़े. इस प्रोग्राम में छात्र ही समीक्षक थे. हिमाचल मित्र के लिए मोहन साहिल ने इसकी रिपोर्ट लिखी. इस रिपोर्ट में कवि और कविता के बारे में मोहन के विचार भी थे. लगा कि इन बातों को यहां भी रखा जाना चाहिए. यह एक ठेठ पहाड़ी कस्‍बे में छोटी सी चाय की दुकान चलाने वाले कवि के विचार हैं. कवि का पेशा बताने का मकसद यह कि आलकल ज्‍यादातर कवि बाबू किस्‍म की छोटी बड़ी नौकरियों में हैं. हिमाचल के दो और कवि अजेय और सुरेश सेन निशांत भी इधर सबका ध्‍यान खींच रहे हैं. वे भी सरकारी नौकरी में हैं. ऐसे में मोहन के विचारों को पढ़ना दिलचस्‍प है.

कवि भी एक साधारण इन्सान है जो रोजमर्रा की उन सभी बातों का सामना करता है जो बाकी सभी लोग करते हैं। मगर कवि होना उतना ही कठिन है जितना एक अच्छा इन्सान होना। कवि का एक अपना संसार है जिसमें वह अपना न्यायाधीश स्वयं है। कवि अपनी गलतियों की सजा स्वयं को देता है। दोबारा गलती न करने की कसम खाता है। कवि के मन-मस्तिष्क में एक युद्ध सदा चलता रहता है। इस युद्ध में वह कई बार घायल होता है मगर स्वयं को मरने नहीं देता। क्योंकि वह उपचार भी जानता है। बाहरी तौर पर लगता है कि एक कवि अभावों, उदासी तथा बेचैनी का शिकार है मगर यह स्थिति एक मधुमक्खी के छत्ते की तरह है जिसके भीतर लगातार शहद बन रहा है। यह शहद कविताओं के रूप में लगातार टपकता रहता है और कवि मन अपने आसपास के हर अच्छे-बुरे अनुभवों का पराग एकत्र करता रहता है। अच्छी कविता की रचना के लिए स्वयं को अच्छा बनाए रखना बड़ी चुनौती है और इसके लिए वह सब खोना पड़ सकता है जो आम व्यक्ति पाना चाहता है। दुनिया के बहाव के साथ चल पाना और सब कुछ होते रहने देना कवि को मन्जूर नहीं। कवि की पीड़ा, उसका आन्तरिक संघर्ष, समाज तथा धरती के हर जीव, निर्जीव के लिए उसकी संवेदनाएं ही उसकी पूंजी है। यह पूंजी खो न जाए यही कवि का सबसे बड़ा भय है। यह भय आज के दौर में और भी ज्यादा है क्योंकि इसी पूंजी को बचाना मुश्किल हो रहा है। अगर यह पूंजी है तो कविता स्वयं आती है। कवि एक नट की तरह है जिसका हर कदम रस्सी पर सही पड़ना चाहिए। अगर वह ऊंचाई से एक बार गिरता है तो उसके भीतर की सब कोमलताएं मर सकती हैं। कवि क्या काम करता है कहां रहता है यह सब बेमानी है। असली संसार उसके भीतर है जिसे कोई नहीं छू सकता, न नष्ट कर सकता है। इस संसार को कवि स्वयं ही चाहे तो उजाड़ ले।

Monday, March 22, 2010

किंतु परंतु लेकिन फिर भी आओ साथी सपना देखें



पृथ्‍वी थियेटर में कल शाम (21 मार्च 6 बजे का शो) एक नाटक देखा, आओ साथी सपना देखें. दो साल पहले पृथ्‍वी फैस्‍टीवल में जब यह पहली बार खेला गया था, तो देखना था पर छूट गया. कल मौका मिला. वह भी बच्‍चों के साथ. दस, चौदह और सत्रह साल के तीन बच्‍चे हमारे साथ थे. मजे की बात है के तीनों बच्‍चों को नाटक अव्‍छा लगा. सुमनिका को भी पसंद आया. मुझे हमेशा की तरह किंतु परंतु का सामना करना पड़ा.

नाटक दिल्‍ली के चांदनी चौक के बैजू खान और गौरेया की प्रेम कहानी है. बैजू के पिता मियां खान बैंड मास्‍टर हैं. गैरेया के पिता चिरौंजी लाल गुप्‍ता की परचून की दुकान है. बहुमुखी नामक सूत्रधार कहानी सुनाता है. सारा नाटक गीत-संगीत मय है.

पहले इस जोड़े का प्रेम घर की छत पर बनी दीवारों को फांद कर पनपता है. मियां खान और गुप्‍ता को लोग एक दूसरे का दुश्‍मन समझते हैं जबकि वे दोस्‍त हैं. उनका निष्‍कर्ष है कि बच्‍चों से जो काम कराना हो, उसके लिए मना करो. अगर वे खुद को एक दूसरे का दुश्‍मन न दिखाते तो समधी न बन पाते. लड़की को अपनी सोलह साल की उमर के सिवा और कुछ नहीं सूझता. बैजू यूं तो बैंड में झुनझुना बजाता है, पर उसमें कलाकर बनने की ललक है. जीवन के सुख दुख दिखाने के लिए बैजू को संघर्ष करते दि‍खाया गया है. वह दो असफल कलाकारों के हत्‍थे चढ़ जाता है और हार और तजुर्बा लेकर लौटता है. पहले ये दोनों इसे सबक सि‍खाते हैं और बाद में यह इन दोनों को अपना गुलाम बना लेता है. पहले जहां वह पहलवान से पिट कर भागता है, लौट कर पहलवान को पीट कर महबूबा को हासिल कर लेता है.


दर्शकों ने बहुत तालियां बजाईं. नाच गाने पर, चटपटे, कुरकुरे, खस्‍ता, सटीक-सटाक संवादों पर, नृत्‍य पर और मजाक मजाक में नृत्‍य की और अभिनय की टांग तोड़ने पर. निर्देशक ने तालियां बटोरने के लिए ये सब करतब किए थे. हल्‍के फुल्‍के खेल के लिए स्‍टैंडिंग ओवेशन. इतनी जोर से और इतनी देर तक कि अंत में अभिनेताओं के नाम भी सुनाई नहीं पड़े.


किंतु परंतु

साथी को सपना देखने के लिए बुलाया जा रहा है और सपना वही पुराना घिसा-पिटा प्रेमी प्रेमिका का मिलना, बिछुड़ना और अंत में फिर मिलना. यह जिंदगी में भी होता है पर बहुत अलग तरह से होता है. इस नाटक में जीवन का स्‍पर्श सिर्फ कुछ जगह दि‍खता है, जब दो असफल कलाकारों को अपहरण का सीन करने के‍ लिए बुलाया जाता है. बाकी तो सब गुडी गुडी, नकली नकली, पर झिलमिलाता हुआ.

लेखक ने भाषा पर इतनी मेहनत की है पर दि‍शाहीन. कथ्‍य नजर ही नहीं आता. हिंदू मस्लिम विवाद से भी वो साफ बच गया है. इतनी भर टिप्‍पणी है कि अगर रिश्‍ता टूट गया तो लोग बखेड़ा खड़ा कर देंगे. हालांकि बीच-बीच में टिप्‍पणियां बड़ी प्रासंगिक और चुभती हुई हैं. भाषा में रवानी है, फूहड़ता नहीं है, द्विअर्थी नहीं है (जिसके शिकार नाटक वाले अक्‍सर हो जाते हैं), संवाद सटीक और चुस्‍त हैं. पर अफसोस! भाषा के ये जुगनू नाटक में कोई रोशनी पैदा नहीं करते. नाटक कुल मिलाकर हंसी खुशी भरा ड्रामा बन कर रह जाता है.

चूंकि नाटक गीत-संगीतमय है, इसलिए नृत्‍य उसका हिस्‍सा है. ऐसा लगता है कि नृत्‍य निर्देशक ने बड़ी मेहनत की है. किंतु आजकल के फिल्‍मी डांस का असर पूरी दृश्‍यावली को अपने प्रभाव में ले लेता है. यूं गाने कथा को आगे बढ़ाने वाले हैं, संगीत नाटक की तरह का ही है, ढोलक, तबला, डफ, पेटी और क्‍लेरनट के साथ. पर बीट और नाच पर टीवी का असर दिखता है, जहां नृत्‍य झटकेदार होता है, जहां ठुमके में लचक कम और झटका ज्‍यादा होता है. इससे नाटक अपनी पहचान खोता है. ऊपर से अभिनेताओं की देह जिम-पकी है, पसीना-पगी और धूप-जली नहीं है. उनके मैनरिज्‍म भी टीवी –फिल्‍मों वाले हैं. वैसे यह समस्‍या सिर्फ इसी ग्रुप की नहीं है. सबके यही हाल हैं. यहां पर ऐसा लगता है कि अब नाटक का स्‍वतंत्र अस्तित्‍व नहीं है, टीवी फिल्‍म है इसलिए नाटक भी है.

इन सब के बीच चिरौंजी लाल गुप्‍ता का चेहरा मोहरा, कपड़ा लत्‍ता और अभिनय प्रामाणिक है. सूत्रधार का साथी गजब का अभिनेता है. उसमें लोच है, ऊर्जा है, ठहराव है और पकड़ भी है. वह बैंड मास्‍टर के क्‍लेरनट के सुर को मूर्त करता है. यह संकल्‍पना और इसका अभिनटन दोनों की बहुत अच्‍छे हैं, अनोखे भी.

असल में ऐसा लगता है कि अगर इस नाटक का शीर्षक कुछ और होता तो किंतु परंतु का सवाल खड़ा नहीं होता. शायद नाटक देखने ही न जाता. ह‍म सपना देखने गए और मिला नाच-गाना. तो लगता है कि क्‍या अब हमारे रचनाकारों ने भी बड़े सपने देखने बंद कर दिए हैं ? रचनाकारों ही ने क्‍यों दर्शकों ने भी इस स्थिति को स्‍वीकार कर लिया है. वरना लगभग हाउसफुल और तालियों की छतफोड़ गड़गड़़ाहट क्‍यों होती ?

चित्र मुंबई थियेटर गाइड से साथार

Wednesday, February 24, 2010

कुनबा






बाल कटाकर शीशा देखूं

आंखों में आ पिता झांकते

बाल बढ़ा लेता हूं जब

दाढ़ी में नाना मुस्काते हैं

कमीज हो या कुर्ता पहना

पीठ से भैया जाते लगते हैं


नाक पर गुस्सा आवे

लौंग का चटख लश्कारा अम्मा का

चटनी का चटखारा दादी का

पोपले मुंह का हासा नानी का


घिस घिस कर पति पत्नी भी सिल बत्ता हो जाते हैं


वह रोती मैं हंसता हूं

मैं उसके हिस्से में सोता

वह मेरे हिस्से में जगती है


बेटी तो बरसों से तेरी चप्पल खोंस ले जाती है

बेटे की कमीज में देख मुझे

ऐ जी क्यों आज नैन मटकाती है.

यह कविता हाल में अमर उजाला में छपी है.


Friday, February 5, 2010

हिमालय में हैंड ग्लाइडिंग, नहीं पहाड़ में हिचकोले खाती जिंदगानी हरदम


हरबीर का खींचा हुआ भागसू नाथ मंदिर परिसर का यह चित्र साभार. चित्र में वल्‍लभ डोभाल कुछ पढ़ रहे हैं.

6

भागसूनाग


बहुत दूर दिखता है जल प्रपात

बहुत क्षीणकाय हो गया है जल प्रपात

बहुत ज्यादा लोगों से घिरा है जल प्रपात


फुहार इसकी आकाश में ही सूख-सूख जाती

झरती चांदी में स्नान की आदिम पुकार धरी की धरी रह जाती


भागसू के कुंड ने भी तरणताल का चोला पहन लिया है

मंदिर कसमसा रहा है

चंदा उगाही जोरों पर है

नए भवन में बिराजेंगे देवताओं के पत्थर


वल्लभ डोभाल अब तुम कहां रहते हो

नोयडा या धर्मशाला

जरा गिनो तो

छिले हुए पहाड़ की पसलियां ज्यादा हैं या

लुर-लुर फिरती टैक्सियां और ऑटो

पेड़ ज्यादा कटे या लेंटर पड़े ज्यादा

प्लास्टिक ज्यादा जमा हुआ या और भी कम हुआ पानी


बल्लभ डोभाल तुम कहोगे क्या हिसाब लगाने बैठ गए

फल फूल रहा है कारोबार

रोक कोई सकता नहीं


सुनो जी वल्लभ

मैं तो ढूंढ रहा हूं

अलग-थलग पड़ी हो

मिल जाए चट्टान कोई

बस थकान अपनी मिटा लूं

ज्यादा देर अब यहां रुका नहीं जाएगा॥

˜

इन छहों कविताओं में कुछ जगहों के नाम आए हैं -

हिमालय की पीर पंजाल शृंखला में साढ़े तेरह हजार फुट की उंचाई पर रोहतांग दर्रा लाहुल स्पीति को मनाली से जोड़ता है। ब्यास नदी का उद्गम यहीं से होता है। राल्हा पैदल यात्रा का एक पड़ाव है। सोलंग में स्कीइंग हाती है, वशिष्ठ में गर्म पानी के कुँड हैं, नग्गर में प्रसिद्ध रूसी चित्रकार निकोलिस रोरिक ने अपनी दुनिया बसाई है। मलाणा गांव प्रचीनतम लेकिन अब तक चला आ रहा लोकतंत्र लगभग दस हजार फुट उंचाई पर बसा है। जमलू यहां का देवता है और यहां पहुंचने का एक रास्ता चंद्रखणी दर्रा है। मणिकर्ण कभी उद्दाम रही लेकिन अब बिजली के लिए बांधों में बांधी जा रही पार्वती नदी के तट पर गर्म पानी के चश्मों का तीर्थ है। पतली कूल सैनी अशेष और स्नोवा बार्नो का इलाका है। समशी, भूंतर, औट, बजौरा कुल्लू और मंडी के बीच की जगहें हैं। ऐलोरा के कैलाश मंदिर की तरह शैल को काटकर बनाया गया मंदिर-समूह कांगड़ा घाटी में मसरूर में है। धर्मशाला में मेक्लोडगंज दलाई लामा के कारण लोकप्रिय हो गया है। और भागसूनाग में उत्तरोतर सूखता जाता एक जल प्रपात है। यहां कथाकार वल्लभ डोभाल भी डेरा डाले रहते हैं।


ये कविताएं समावर्तन के जनवरी अंक में भी पढ़ी जा सकती हैं.


Tuesday, February 2, 2010

हिमालय में हैंड ग्लाइडिंग, नहीं पहाड़ में हिचकोले खाती जिंदगानी हरदम


5

दलाईलामा का मैक्‍लोडगंज


घाटी में पुरातत्ववेता

ईसा से पहले के

बौद्ध स्तूप के अवशेष पाता है


ईसा के बहुत बाद भगाया गया

बौद्धों का राजा

एक चोटी पर शरण पाता है


यहां बहुत सारे बौद्ध हैं शरणार्थी

बाकी सारे अबौद्ध हैं निवासी और अनिवासी


जो यहां आते हैं सिर्फ सैलानी होते हैं

जो यहां रहते हैं वे दुकानें लगाते हैं ॥


Friday, January 29, 2010

हिमालय में हैंड ग्लाइडिंग, नहीं पहाड़ में हिचकोले खाती जिंदगानी हरदम



4

पहाड़ियां और झाड़ियां

(कांगड़ा के मसरूर में प्रचीन शैल-खनित मंदिर का इलाका)


हम ऐसी जगह पर उतर आए

जहां चोटियों पर चढ़कर

घाटियों में उतर कर

जाना होता था बस्तियों में


जहां सरकार को सड़क बनाना तो आसान था

लोगों को पानी की सीर ढूंढना मुश्किल

किसान बीज बोते थे और आसमान ताकते थे

सारी हरियाली कोमलता और मौज मस्ती

कांगड़ा चित्रकला में छूट गई थी

यहां काल से पहले का एक मंदिर था टूटा हुआ

यूं दिवाले शिवाले हर कोने में थे

दिल दिमाग पर जड़े तालों की तरह


एक कवि चाहता था हल जोतने के बाद

फुर्सत मिले तो ताली खोजे

पर हर बार ठरकियों की सभा में

तालियों में गर्क होता था


पहाड़ी सैरगाह की नाक के नीचे

बाहर बस्तियां

भीतर उजाड़ ज्यादा था ॥