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Sunday, October 4, 2015

जुगाली उर्फ गऊ चिंतन

जीते जी मरण




मेरा भेजा फिर गएला है मेरे बाप। मेरे कू किधर का नईं छोड़ा ए लोग। मयैं बौह्त अकेली रह गई रे। मेरी पुच्‍छल पकड़ के सुर्ग जाने की बात करते, पन मयैं किधर जाऊं ? दिल्‍ली के पछुआड़े के एक गांव में मेरे ऊपर ऐसा जुर्म कर डाला! मेरा नाम ले के एक भला माणुस मार डाला। कौन दरिंदा किया एह्?  है कोई बोलने वाला? है कोई मुंह खोलने वाला?  कि खाली पीली मजमा ई देखने का है? मैं तो बोलती तुम सब जन हत्‍यारे है। बोलती है मयै, सब लोग। जो हत्‍या कर के भाग गए, वो भी और जो देख के चुप बैठे, वो भी। कनून की रखवाली करने वाले भी और कनून को तोड़ने वाले भी। अपना बनाया कनून तो तोड़ा ई, इन्‍सानियत के कनून का भी तुम लोग धज्‍जी उड़ा दिया। मेरा मुंह काला कर दिया रे तुम लोग। चले जाओ सब लोग इदर से। मेरे कू अकेला छोड़ दो। मेरे कू रोने दो रे। काए को मयै गऊ माता बन के पैदा हुई रे। काय कू।      

Saturday, August 18, 2012

कचरा मसीन

Cow by sidharth1 सिद्धार्थ की गाय

मेरी पिराबलम बोले तो मालूम क्या है? मैं हर टैम फील करती है कि आदमी लोक की बस्‍ती में रहती है तो आदमी लोक का हेल्‍प करने का. आदमी लोक के वास्‍ते कुछ करने का. मैं एक बात बोलती है, ध्‍यान से सुन. एक रोज मैं मेरो को बोली. रोज पेपर खाती है, आज पेपरशन करेगी. पेट का अंतड़ी का रस्‍सी के माफक गांठ बंधने लगा पर मैं पेपरशन का शपथ लिया तो लिया. शाम के टैम कू अपना पड़ोसी लंगड़ा कुत्रा लोफरगिरी करके वापस आया तो पूछा, काय मौशी, कसी तू? मैं बोली, मैं आज पेपरशन करती है. धरती माता के वास्‍ते, परावरण के वास्‍ते. वो पूछा, पेपरशन बोले तो ? अरे अनशन समझता न तू? अन्‍न धान्‍य नहीं खाने का. वैसे ई पेपरशन मंझे पेपर नई खाने का. परावरण के वास्‍ते पेपर बचाने का. कूतरा हसने लगा. काय मौशी जंतर मंतर पर जाएगी, के रामलीला मैदान में बैठेगी. तेरा भी खोपड़ी उल्‍टा घूम गएला है. आज पेपरशन करती है कल को पाल्‍टी बना के लैक्‍शन लड़ेंगी क्‍या. अपनी औकात में रहने का बुड्ढी. तू तेरा काम कर, जास्‍ती भेजा लगाने का नई. तू जितना जासती पेपर खा सकती है, खा जाने का. ओ पेपरशन आदमी लोक के वास्‍ते है मंझे उनको बोलते पेपर कम बापरो पेड़ कम काटो. जानवर लोक को पेपर जासती वापरना मांगता. तू जितना जास्‍ती खा सकती है, खा डाल, पेपर-शेपर, प्‍लास्टिक-फ्लास्टिक, जितना जास्‍ती खा सकती है खा डाल. और पचा डाल. कुछ तो कचरा कम होएंगा. आदमी लोका का पाप कम होता दिखेंगा. कुतरे का बात से मेरा आंख खुल गया. कभी कभी अक्‍खा जिंदगी हम लोक कोई काम करते रहते है, पर एंड में जा के मालूम गिरता है हमने गलत जिंदगी बिता दिया. फिर सुरू से सुरू करने का टैम नई मिलता रे. मेरे को टैम से समझ में आया, मेरा काम कचरा साफ करने का है. उसके बाद से मैं कचरा मसीन बन गई ली.

Friday, August 13, 2010

मेरे को ले के चल

एक मिनट सुन रे बाबा! तुम लोग हल्‍ला बहुत मचाता है. जब से तेरे हाथ में चूहा आ गएला है, अपना अगाड़ी पिछाड़ी भूल के शेर बन रहेला है. कागज का शेर. अब्‍बी चुप बैठ और मेरी बात सुन. मेरे को भी सही करने का है. बोले, तुम लोग कोई लिस्‍ट निकाला है. उस पर मैं भी सही करेगी. जो अक्‍खा औरत जात को छिनाल बोलता है और जो उस बात को छापता है. और फिर उसको रद्दी की टोकरी में डालने का नाटक करता है. मेरे को ही खाना पड़ेगा न वो रद्दी. नहीं क्‍या? तू ही बोल. इसके वास्‍ते मेरे को ऐसा मैंटेल्‍टी के खिलाफ सही करने का है. अगले पैर से सही करेगी मै. पन मेरा प्राब्‍लम मालुम क्‍या है? उन लोग ने भी एक लिस्‍ट निकाला है. बोलता है, हम लोग गलती किया, हमको माफी देया. हम लोग थूका. अभी चाट लिया. तुम्‍हारा आत्‍मा को सांति मिल गया. अभी घर जाओ. हम खुर्ची छोड़ेंगा नईं. अरे देवा रे! ओ लाग भी मेरा सही लेता है. मेरा पिछला पैर से सही मारा उस के ऊपर. क्‍या करता.

पन मैं क्‍या बोलती है, मेरे को तुम सब लोक ने मिल के तड़ी पार किएला है. मालुम नई मै कब से खड़ी है. कचरे के अंदर खड़ी है. मेरा पूछ पकड़ के तुम लोग वैतरणी पार करता है. पढ़ता लि‍खता है. खाता पीता है. फिर मेरे को छिनाल बोलता है. फिर पालिटिस करता है. मेरी आत्‍मा के ऊपर बुलडोजर घुमा दिया रे तुम लोग. जालिम लोग.

अब मेरा बात ध्‍यान से सुन. मेरे को ले के चल. पीठ के ऊपर ज्ञान को रखने का नहीं. उसको माथा से छुवा बेवकूफ. ज्ञान के ऊपर बैठने का नई. ज्ञान ढोके में भरने का. ढोका मंझे दमाग. फिर मेरे को वर्धा ले के जा. मैं उधर अपनी राय देगी. बोलेगी, तू अभी गांधी बाबा के पास जा के राम राम बोल और चरखा कात. बहुत हो गया तेरा नाटक.

सुन, फिर मेरे को मेरे इच लोग के बीच ले के जा. सच्‍ची बोलती रे. तेरे को बहोत आशीर्वाद देगी मैं. तू इतना पोथी लिखता है. मगजमारी करता है. पोथी को वाचनालय में बेच देता है. कौन पढ़ता है तेरा ज्ञान का बात. दिल पर हाथ रख के बोल. इसी वास्‍ते बोलती, मेरे को नगर नगर, गांव गांव गल्‍ली गल्‍ली ले के चल. मैं हिंदी बोलती. तेरी माई बोलती मैं.

गोवर्धन दास

Wednesday, August 4, 2010

तुम कौन सा लोक में है रे

मेरी पिराबलम बोले तो मालूम क्या है? कागज बहोत खाया तो मतलब उसमें बी अखबार ई च बहोत होता है। अखबार तो नाम ही है कि A to Z खबर ही खबर रहेंगा। उसकू अंदर में भी अच्छा खबर तो मिलता नहीं है। सब बुरा ही च बुरा खबर रहता है। एक बार मालूम है, इस दुनिया का सारा अखबार को न एक आदमी मंगल ग्रह पर ले के गया। तो मालूम है मंगल वाले ने जभी पढ़ा न वो अखबार को, तो वो लोग डर गए सब के सब। बोले तो, खबर है सरकार की मक्‍कारी का। जिसको ये लोग लिखते है लाचारी। बम फटने का। विस्फोटक मिलने का। एक्सीडेंट का। जान से मार देने का। बहू को जला देने का। लड़की लोग का इज्जत लूटने का। वो क्‍या बोलता है आनर किलिंग का। चोरी चपाड़ी तो छोड़ ई च दो। बाढ़ और सूखे का खबर तो होना ही होना। मतलब कुदरत का लाफा तो मंगल ग्रह पर भी लगता है। बोले तो भूकंप आता है, सुनामी आता है, बाढ़ आता है। पर आदमी का भेजा से निकला क्राइम। बाप रे बाप! मंगल वाले का हवा ई च निकल गया। वो बोला अरे बाप!! ये पृथ्वी लोक में आदमी रहते हैं कि राकशस रहते हैं। वो डर गया रे!! और पृथ्वी पर आ के घर बनाने का आइडिया ही उन लोग ने छोड़ दिया। बोले हम इदर ई च ठीक है। लाल रंग के हैं तो क्या हुआ। यह हरा और नीला रंग का पृथ्वी तो बम का माफिक है रे बाप!!!

Tuesday, July 13, 2010

नालेज वालेज

मेरी पिराबलम बोले तो मालूम क्या है? मैंने इतना कागज खा ले लिया है न कि मेरे को नॉलेज बहोत हो गएला है। जो कागज मैं खाती है न, वो कोरा नई होता है। कोरा कागज तो पैसा दे के मिलता है। जो कागज छपेला होता है वो ई च रद्दी में बिकता है। उसमें नॉलेज की बात रहता है पन रद्दी में जाता है। मेरे को जादातर वो ई कागज मिलता है खाने को। और छपेला कागज दिमाग में जमा होता है रे। बोले तो कागज तो पेट में जाता है, गू बनने को। पन उसका छपेला अक्षर का दिमाग में दही बन जाता है। जब ये दही जादा हो जाता है न तो मेरा मुसीबत!! बाप रे बाप!!! तबी मेरे को कुछ लेक्चर देना ही मांगता। नहीं बोलेगी तो बिमार पड़ जाएगी। अभी सड़क पर बिमार गाई पड़ी रहेगी तो अच्छा लगेगा क्या? सारा ट्रैफिक रुक जाएंगा। लोग मजाक बनाएंगा। इस वास्‍ते, शहर की इज्जत के वास्ते मैं बिमार नहीं पड़ती। खड़ी रहती है अक्खा टाइम।

Thursday, July 1, 2010

भूख

मेरी पिराबलम बोले तो मालूम क्या है? अक्खा दिन मेरे कू कागज खाना पड़ता है। काए कू ? बोले तो सड़क पर घास नहीं उगता है न। इसी के वास्‍ते। अब तुम यह पूछेगा कि कागज जास्ती खाती है कि पिलास्टिक, तो बताना जरा मुसकिल गिरेगा। वो इस वास्‍ते कि जभी भूख लगी हो तभी जो भी मिल जाए, खाना ई च पड़ता है। तू बोल, दिल पे हाथ रख के बोल, भूख लगने पर खाता है कि खाने का टेम हो गएला है, इसके वास्ते खाता है। दूसरा बात भी है रे। भूख लगने पर तेरे पास चॉइस है क्या? यह खाएंगा वो नहीं खाएंगा? कि खाना ई च नईं है? बहोत लोक है हमारे महान मुलुक में, जिनको एक टैम भी खाना नसीब नहीं होता। पर जाने दे। मैं तो गाई माई है। हज्‍जार साल से सब लोक मेरी पूजा करते। मैं ई कागज और पिलास्टिक खाती है तो दूसरे के बारे में क्या बोलेगी।