| मंच पर नाटक का पूर्वाभ्यास चल रहा है |
| दृश्यबंध से सजा मंच |
| प्रकाश व्यवस्था |
कुछ और चित्र-
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| भीतरी दीबारें |
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| सभागार में प्रवेश |
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| बांस के दरवाजे |
| जतिंदर बरार अपने दफ्तर में |
| जतिंदर बरार और सुरेंद्र मोहन मेहरा के साथ |
| मंच पर नाटक का पूर्वाभ्यास चल रहा है |
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| जतिंदर बरार अपने दफ्तर में |
| जतिंदर बरार और सुरेंद्र मोहन मेहरा के साथ |
एनसीपीए में 11 और 12 अगस्त को
प्रख्यात भरतनाट्यम नृत्यांगना माल्विका सरुक्कई
की पेशकश की एक अंतर्यात्रा
हम लोग 11 अगस्त का एनसीपी गए थे, प्रख्यात भरतनाट्यम नृत्यांगना माल्विका सरुक्कई का नृत्य देखने। समय से करीब दो घंटा पहले पहुंच गए। सोच रहे थे कि समय कहां बिताएं। इतवार की वजह से मरीन ड्राइव खचाखच भरा हुआ था। इतने लोग समुद्र का नजारा देखने आए थे कि हम दोनों की हिम्मत उस भीड़ में घुसने की नहीं हुई। हमने एनसीपीए का ही रुख किया। लोहे के विशाल फाटक यूं तो बंद दिख रहे थे लेकिन एक गेट थोड़ा सा खुला था और भीतर एक प्रहरी विराजमान था। उसने हमें अंदर जाने दिया। कहा “अभी रिसेप्शन में लोग आए नहीं हैं। आप डांस देखने ही आए हैं ना?”

ताल की वजह से किस तरह यह गणित पर आधारित है, जिसे उन्होंने काव्यात्मक गणित या पोएटिक मैथ्स का नाम दिया। उन्होंने यह भी बताया कि मृदंगम् या वायलिन या गायन या नटुवंगम को साधारण ढंग से भी बजाया जा सकता है। लेकिन जब हम कोई प्रस्तुति तैयार करते हैं तो उसके तथ्य के आधार पर, उसकी संवेदनाओं को ध्यान में रखते हुए, सभी वाद्य यंत्रों और गायन में कथ्य के अनुरूप लोच या नुआंस पैदा करते हैं। किसी एक रचना को पक्का करने के लिए महीनों रियाज करनी पड़ती है। एक और महत्वपूर्ण बिंदु उन्होंने साझा किया कि जब किसी रचना को वे पेश करती हैं, जैसे अंडाल के ही पद को उन्होंने प्रस्तुत किया, तो वह माल्विका नहीं रह जातीं। वह अंडाल ही हो जाती हैं। बल्कि एक अवस्था ऐसी आती है कि नर्तक या अंडाल या पात्र भी नहीं रह जाता। वहां सिर्फ नृत्य बचता है। किसी ने प्रश्न किया के एनसीपीए के मंच पर आपको कैसा लगा। उन्होंने कहा कि वहां की ऊर्जा एकदम भिन्न है। उसके अलावा मैं नृत्य के दौरान उस स्टेज पर रही नहीं। मैं तो वृंदावन में थी, यमुना के किनारे थी, कृष्ण के साथ थी। इस स्तर तक तदाकार होना नृत्य प्रस्तुति को एक अलग स्तर पर ले जाता है। शायद इसी वजह से दर्शक भी काफी हद तक उस भाव भूमि का स्पर्श कर लेता है।
जैसे सोशल मीडिया नए जमाने की चौपाल है वैसे ही फिल्मी गीत नए जमाने का लोक संगीत है। पर यह तकनीक और ग्लैमर के प्लेटफार्म पर खड़ा है। मुंबई के षणमुखानंद ऑडिटोरियम में विशाल और रेखा भारद्वाज के लाइव शो की आपबीती पेश है।
मुंबई में कला संस्कृति के अलग-अलग ठिकाने हैं। पृथ्वी थियेटर, एनसीपीए, जहांगीर आर्ट गैलरी, म्यूजियम वगैरह तो कई बार जाना हुआ है। हर जगह का माहौल अलग है। बीच में बीकेसी के नीता मुकेश अंबानी केंद्र में गए। एक बार दादर में सावरकर ऑडिटोरियम में भी गए।
इस बार 14 जुलाई को गांधी मार्केट में षणमुखानंद हॉल में गए। मुंबई शहर के पुराने विशाल सभागारों में से एक, साइन माटुंगा के बीच गांधी मार्केट के इलाके में। मुंबई के शुरुआती दिनों में यानी आकाशवाणी की नौकरी के दौरान किंग सर्किल स्टेशन से लोकल ट्रेन लेते, शाम को वहीं उतरते। एंटॉप हिल में सात साल रहना हुआ। षणमुखानंद हॉल के बगल से सरकारी कॉलोनी में घुसते। कितने बरस बीत गए, कभी इस विशाल सभागार में जाने का सबब नहीं बना। उस्तादों की महफिलें यहां हुआ करती थीं। आकाशवाणी के हमारे सहकर्मी हंपीहोली कहते, भीमसेन जोशी मेरा भाई है (उनकी शक्ल भी मिलती थी), उसकी संगीत सभा का संचालन मैं ही करता हूं। हंपीहोली साहब के घर पर धारवाड़ के पेड़े तो कई बार खाए पर उनके भाई की संगीत सभा नहीं सुन पाए।
हम लोग विशाल और रेखा भारद्वाज का शो 'ओ साथी रे' देखने गए थे। बरसात के मौसम में हम तो समय से पहुंच गए लेकिन मुख्य कलाकार देर से पहुंचे। जब हम अंदर बैठे तो मंच खुला हुआ था। साज़ रखे थे, साज़िंदे आ जा रहे थे। वे तब तक आते जाते रहे जब तक उद्घोषक ने आकर माफी मांगते हुए विशाल और रेखा को मंच पर आमंत्रित नहीं कर लिया।
अब नई कबायद शुरू हुई साजोंं के सुर मिलाने की। संगीत सभाओं में आमतौर पर तबले और तानपूरे को ही मुख्य साज या गायक के सुर से मिलाया जाता है पर यहां नजारा अलग था। तबले के अलावा एक ड्रमर, गिटार के अलावा बेस गिटार, मेंडोलियन, सैक्सोफोन और क्लेरिनेट, सिंथेसाइजर और दो सहायक गायक। इनके सुर खुले कान से नहीं मिल रहे थे। विशाल भारद्वाज दूर कहीं छुप कर बैठे साउंड इंजीनियर से बातें करते हुए सुर मिला रहे थे। यह सब हमें दिखाई भी पड़ रहा था और सुनाई भी पड़ रहा था। विशाल भारद्वाज बीच बीच में तकनीकी खराबी के कारण हुई देरी के लिए माफी भी मांग ले रहे थे और बातचीत में चुटकियां भी ले ले रहे थे। सभागारों में महाकाय स्पीकर होते हैं। उनसे पता नहीं कितने डीबी की आवाज निकलती है।
हालांकि कार्यक्रम की शुरुआत गजलों और गीतों से ही हुई। थोड़े प्रयोगशील शब्द, उतनी ही प्रयोगशील धुनें जिनके लिए विशाल भारद्वाज जाने जाते हैं। विशाल अपनी तरह के सिनेकर, संगीतकार और गीतकार हैं। एक जमाने में गुलजार साहब के सहायक रहे हैं। गुलजार अपने गीतों में अपनी तरह के प्रयोगधर्मी कवि हैं, कोमल, कमनीय, लता लंतरानियों सरीखे, लेकिन नवीन भी। विशाल भी लगता है इसी परंपरा के लेखक हैं। वे एक तरह के शैलीबद्ध गीतकार नहीं हैं। नूतनता का एहसास देने वाले रोमानी गीतकार हैं। रेखा भारद्वाज उनके साथ गाती हैं। गायन में उनका अपना व्यक्तित्व है। उन्होंने सूफी कलाम या गायन की राह पकड़ी है। यह पारंपरिक सूफी गायन नहीं है। इसे नवसूफी गायन या सूफीवत् गायन कहना ज्यादा उचित होगा। विशाल के शब्द और धुनें इस नवसूफीवाद को मोहक बनाती हैं। शायद समकालीन, प्रासंगिक या कहना चाहिए नवीन भी। इस तरह के सॉफ्ट गायन के भी कद्रदान हैं। महफिल में जमा लोगों की प्रतिक्रियाओं से पता चल रहा था कि विशाल कितने लोकप्रिय हैं, टिकट के दाम चाहे जितने भी हों। बल्कि लोकिप्रियता के आधार पर भी तो टिकट के दाम तय होते होंगे।
कार्यक्रम में एक मध्यांतर भी हुआ। कैंटीन भूतल पर है। वहां जन सैलाब था। काउंटर तक पहुंचना मुश्किल। हमारे बच्चे पहले निकल आए थे। वे बड़ा पाव खरीदने में कामयाब रहे। चाय नहीं मिल पाई। यह जनता की कैंटीन जैसी जगह है जहां एक गलियारे में काउंटर लगाकर चीजें बेची जाती हैं। हजारों की भीड़ एक साथ टूट पड़ती है। यहां एनसीपी या पृथ्वी या अंबानी सेंटर जैसी उच्च भ्रू नफासत नहीं है। अलबत्ता बटाटा बड़ा ₹70 में एक प्लेट और चाय ₹30 में मिल जाती है।
मध्यांतर से पहले का हिस्सा थोड़ा सादा, शुरू में पटरी से उतरता हुआ सा लग रहा था, पर धीरे-धीरे अपनी रौ में आ गया। एक्सपेरिमेंटल गायन के नाम पर इसे सफल ही कहा जाएगा। विशाल ने मुक्तिबोध की रोमानी सी कविता भी गा कर सुनाई। इसे उन्होंने कन्हैया कुमार के नाम किया, जो विशाल के मुताबिक सभागार में मौजूद थे।
इन धमाकेदार गीतों के बजते वक्त अचानक मैंने महसूस किया कि मेरी कुर्सी हिल रही है। मेरे जाने मैं तो स्थिर था, जड़ी-भूत जैसा, कुर्सी के हत्थों को कस कर पकड़े हुए। पर दिमाग ध्वनि और प्रकाश के उन घन प्रहारों के बीच विचलित था। क्या मेरे पड़ोसी हिल रहे थे या पीछे वाले थिरक रहे थे या कहीं मैं ही तो सम्मोहित नहीं हो गया था? कुछ समझ नहीं आ रहा था। ध्वनियां और रोशनी अंदर तक धंस रही थी। मैंने महसूस किया मेरी अंतड़ियां खिंच रही हैं। मेरा पेट एकदम गुच्छा हो गया है। आवाजों का वह क्रिसेंडो चरम पर था। तब भी विशाल भारद्वाज होश में थे। उन्हें पता था वे क्या कर रहे हैं। असल में वे अपने चहेतों के लिए गला फाड़ परफॉर्म कर रहे थे। फिर उन्होंने इस ढैं-ट-ढैं के बीच ही अपने साज़िन्दों का परिचय दिया।
मैंने धीरे से खुद को उठाया और उस लाइन में लग गया जो सभागार से बाहर जाने की तैयारी कर रही थी। हम घर आ गए पर मेरी अंतड़ियों की ऐंठन अगले दिन शाम को जाकर ही खत्म हुई।
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आज 16 जून की सुबह संगीतमय रही। मुंबई की खाली सड़कों का आनंद लेते हुए सवा सात बजे हम पृथ्वी थिएटर पहुंच गए। संगीत प्रेमी वहां पहले से ही पधारे हुए थे। यहां अच्छी सीट पाने के लिए लोग आध पौन घंटा पहले ही आकर कतार में लग जाते हैं। आज भी करीब तीस लोग हमसे पहले वहां मौजूद थे। अवसर था महीने के तीसरे रविवार की सुबह पंचम निषाद संस्था के शास्त्रीय संगीत का कार्यक्रम उदयस्वर ऐट पृथ्वी। आज सहाना बैनर्जी का सितार वादन था। पृथ्वी थियेटर हाउस फुल नहीं था फिर भी ठीक-ठाक संगीत प्रेमी इतनी सुबह पहुंच गए थे। सहाना बैनर्जी ने सुबह के तीन राग प्रस्तुत करने थे, राग ललित, गुर्जरी तोड़ी और राग भैरवी। महफिल को सजाने संवारने के लिए सहाना जी ने राग ललित बड़े इत्मीनान से पेश किया। अपनी वादन कला से दर्शकों को शुरू से ही सम्मोहित किए रखा।
पृथ्वी थिएटर में माइक्रोफोन और एमप्लीफायर का प्रयोग नहीं होता है। साज से निकलने वाली ध्वनि तरंगें अपने मूल रूप में सारे सभागार में फैलती हैं। हम लोग जानबूझकर मंच के करीब बैठे ताकि सुनने के साथ-साथ संगीतकारों के हाव-भाव को भी नजदीक से देख सकें। मंच पर तीन ही लोग थे- रामपुर सेनिया घराने की सितार वादक सहाना बैनर्जी, तबले पर ओजस अधिया और संभवत: सहाना की एक शिष्या तानपूरे पर। सितार को गायकी अंग में सुनकर मन भीग जाता है। मैंने अभी तक शाहिद परवेज़ के ही सितार में यह गूंज और लचक सुनी थी। सुमनिका कहती हैं सितार में तो यह होता ही है। यह मीड़ या स्वर की लोच बाज़दफा इतनी लंबी और लहरदार होती है कि स्वरलहरी बलखाती दूर जाती या डूबती जाती प्रतीत होती है। जैसे रंग भरी कोई बंकिम रेखा धीमे धीमे ओझल होती जाती हो। आपके प्राण उससे बंधे बंधे खिंचे चले जाते हैं। आप उसके पीछे-पीछे उतराने लगते हैं।
राग ललित के बाद सहाना जी ने गुर्जरी तोड़ी बजाई। समय की बंदिश के चलते इसे इतना विस्तार नहीं मिला। फिर भी मेरे जैसे साधारण श्रोता को ललित की स्वर लहरी और गुर्जरी की स्वर लहरी में फर्क महसूस हुआ। उसके बाद थोड़ा समय बचा था जिसमें भैरवी में एक धुन उन्होंने बजाई। और उसके बाद इसी राग में एक पुरानी बंदिश भी बजाई। भैरवी की दोनों ही बंदिशें अत्यंत मनमोहिनी थीं। एक साथ सभी श्रोता इस बात की गवाही भी अपनी तालियों के जरिए दे रहे थे।
आज की संगीत सभा में सितार के साथ तबले की संगत का बहुत ही आनंद आया। ओजस अथिया सितार वादक के साथ-साथ चल रहे थे। सितार की ध्वनि जब धीमी पड़ जाती, जैसे मानो वह खुद से ही बात कर रही हो, तब तबला भी मुलायम, महीन और मंद हो जाता। जब सितार के तार उल्लसित झंकृत होते, तब तबला भी अपनी कलात्मक ओजस्विता से सभागार को गुंजायमान कर देता। दोनों की संगत बेजोड़ थी। संगीत सभाओं में तानपूरा की भूमिका अपरिहार्य होती है। तानपूरा बजाने या स्वर छेड़ने वाले की भूमिका मुझे बहुत कठिन प्रतीत होती है। मुख्य वादक सहाना जी जैसे ही मिजराव से तारों को छेड़तीं, उनकी दूसरे हाथ की अंगुलियां तारों से खेलने लग जातीं। वह कभी अपने भाव में डूब जातीं, कभी तबले की संगत पर 'क्या बात है' कह उठतीं। बीच-बीच में अपने सितार के कान भी उमेठती रहतीं ताकि सभी तारें सुर में रहें। तबला वादक भी सितार और सितार वादक की भाव-भंगिमा के साथ अपने साज़ के साथ और अपनी देह भाषा के साथ सहज अभिव्यक्ति कर रहे थे। ऐसे आंदोलित माहौल में जहां दो साज़िंदे अपनी-अपनी भाव-भूमि में और अपने-अपने साज़ के साथ आनंद रास में मगन हों, वहां तानपूरे पर सुर छेड़ने वाली साध्वी से कम प्रतीत नहीं हो रही थीं। शायद संगीत सभाओं का यह अनुशासन होता है कि तानपूरा छेड़ने वालों की मुख मुद्रा एकदम शांत और निस्पृह रहती है। यह तो हो नहीं सकता कि वे संगीत का माहौल बनाने में जो अनिवार्य योगदान दे रहे होते हैं, उनके मन में कोई भाव न घुमड़ रहे हों। लेकिन वे उसे अभिव्यक्त नहीं होने देते। उंगलियां भी तानपूरे पर एक लय से फिरती रहती हैं। संगीत की इस पृष्ठभूमि का महत्वपूर्ण योगदान है। क्योंकि यदि तानपूरा न हो तो संगीत सभा में भराव नहीं आ पाएगा।
हम लोग सभागार में आगे यह सोचकर बैठे थे कि कलाकारों के संगीत के साथ-साथ उनकी भाव-भंगिमाओं का भी आनंद लेंगे। लेकिन संगीत का प्रभाव कुछ ऐसा था कि आप स्वर के साथ चलते हुए कहीं खो जाएं और आंखें बंद हो जाएं। तब बंद आंखों में संगीत का एक अलग ही तरह का संसार खुलता है। फिर थोड़ी देर में जब मन कहीं खोने लगता, तो आंखें खुलतीं और रोशनी के बीच सितारे अपने साज़ों के साथ डूबते और खेलते हुए नजर आते। आंखें मुंदने और खुलने का यह क्रम बार-बार चलता रहा।
मनोज वाजपेयी हमारे समय के एक सशक्त अभिनेता हैं। उन्हें हाल ही में भोंसले फिल्म के लिए सर्वज्ञेष्ठ अभिनेता चुना गया है। इस फिल्म में उनका अभिनय ही नहीं, पूरी फिल्म ही सोचने के लिए भरपूर सामग्री देती है।
दो तीन सिटिंग में सोनी लिव पर ‘भोंसले' फिल्म देखी। इंटरनेट पर ओटीटी का फायदा यह है
कि आप अपनी सुविधा से फिल्म आदि देख सकते हैं। भोंसले बड़ी कठिन फिल्म है। मनोज वाजपेई
की ही फिल्म है यानी मनोज कॉन्स्टेबल भोंसले की मुख्य भूमिका में हैं और शायद सह निर्माता
भी हैं।
कॉन्स्टेबल भोंसले के सेवानिवृत्त होने
की शाम से फिल्म शुरू होती है,
गणपति उत्सव तक चलती है। मराठी मानुस की राजनीति से बजबजाती हुई
फिल्म। हिंदी बनाम मराठी समाज की शरारती राजनीति पर भोंसले फिल्म मारक नैतिक प्रहार
करती है।
भोंसले बहुत ही चुप्पा, अकेला, एकांतवासी, अपने में खोया हुआ, अपनी नौकरी की एक्सटेंशन चाहने वाला गंभीर व्यक्ति है।
भोंसले की चॉल (जो हमारे समाज की तरह जर्जर,
जाले लगी और चौहद्दी में बंद है) में रहने वाली
हिंदी भाषी पड़ोसन लड़की बीमारी में उसकी मदद करती है। अपने घर से हजारों मील दूर अपने
पैरों पर नर्स बनकर खड़ी यह लड़की उसी चॉल के एक वाचाल और महत्वाकांक्षी युवक,
जो मराठी मानुस के नाम पर राजनीति करने की चालें चलता रहता है,
की शिकार हो जाती है। भोंसले इस लड़की के साथ हुए जुर्म का बदला लेने
के लिए अपराधी को पीट-पीटकर मार देता है, खुद भी हृदयाघात से मर जाता है। फिल्म की ये घटनाएं विचलित करती हैं। फिल्म
चॉल के इर्द-गिर्द ही घटित होती है।
तकरीबन सभी दृश्य रात के हैं या अंधेरे
के हैं या रात में रोशनियों के बीच हैं। अगर कहीं दिन या सुबह है भी तो वह भी धूसर
और उदास है। भोंसले की खोली बेहद अंधेरी, जर्जर और उदास है। सारी चॉल ही खस्ताहाल है। सुबह
का एक दृश्य अंत में आता है जब क्रोध से भरा भोंसले सार्वजनिक बाथरूम में अपराधी युवक
को ढूंढ़ने निकलता है।
फिल्म बड़े गहरे धूसर रंगों में फैली है।
कैमरा बहुत ही रूखे यथार्थ को पकड़ता है - दरवाजे, सीढ़ियां,
खिड़की, कौवा, कुत्ता...
कुत्ते का मुड़ा हुआ पैर... भोसले का किचन...।
संगीत और ध्वनियां भी आद्यंत खलबली मचाए
रहती हैं, कर्कश होने की हद तक।
अजीब विडंबना है कि मनुष्यता और नैतिकता
और सच्चाई का पक्षधर भोंसले बीमार है, रिटायर हो चुका है, चौथी अवस्था
के ब्रेन ट्यूमर से ग्रस्त है, ज्यादा जीवन उसके पास नहीं है।
उसके बरक्स राजनीति को अपना पेशा बनाने को उतावला हुआ पड़ा उसी चॉल का एक निवासी टैक्सी
चालक है जिसे सच-झूठ, सही-गलत से कोई मतलब नहीं। ऐसे महत्वाकांक्षी नौजवान से बूढ़ा और बीमार कॉन्स्टेबल
लोहा लेता है। नर्स लड़की में मानवीयता, सरलता और मदद की रोशनी
है पर वह सुरक्षित नहीं है। कठोर और कुत्सित यथार्थ के बीच जीवन की कांपती सी लौ यहां
दिखती है। एक हारी हुई सी परिस्थिति हमारे सामने है कि समाज में फूट डालने का पेशा
अपनाने को लालायित व्यक्ति राजनीतिज्ञों के निकट, ताकतवर,
नौजवान और बड़बोला है। दूसरी तरफ न्याय, समानता,
मनुष्यता, कोमल भावनाओं का पक्ष लेने वाले वृद्ध,
नादान, कमजोर, चुप्पे,
भयभीत और बीमार लोग हैं।
फिल्म के अंतिम दृश्यों में जब भोंसले बदला
ले चुका है और मर चुका है,
गणपति विसर्जन के बाद के दृश्य इस सारे आख्यान को अखिल भुवन में गुंजायमान
कर देते हैं। देवी देवताओं की खंडित प्रतिमाएं रेत में धंसी पड़ी हैं। एक देवता की
मूर्ति पानी में ऊबचूब हो रही है। चटख रंग वाली टूटी हुई मुखाकृति की केवल पलक हवा
के झोंके से हिल रही है। सारे विध्वंस के बीच मानव जीवन का हल्का सा स्फुरण वहां हो
रहा है।
उस तुमुल कोलाहल में भी भोंसले के सांस
की आवाज गूंजती रहती है। भोंसले के भीतर पता नहीं कितना क्रोध और असंतोष जमा हुआ है
कि उसका जबड़ा हमेशा भिंचा रहता है। उसके मुंह से कभी कभी ही कोई बोल फूटता है। वह
प्रायः उदासीन और निरपेक्ष बना रहता है लेकिन तन मन से घायल नर्स को ढांढ़स बंधाते समय
भोंसले के भीतर की सारी ममता करुणा बह निकलती है।
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| सुमनिका द्वारा करीब पचीस साल पहले चारकोल से बनाया गया स्केच |