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Sunday, January 25, 2026

रेगिस्तान में पानी



खबर मिली कि नाटशाला के सिरजनहार सरदार जतिन्दर बरार नहीं रहे। 
नाटशाला पर अपनी पुरानी पोस्ट फिर से साझा कर रहा हूं।
मुझे सन 2011 में अमृतसर में उनके बनाए थियेटर पंजाब नाटशाला देखने का मौका मिला था.  
उस समय उत्‍तर भारत में शिमला में गेयटी थियेटर और चंडीगढ़ में टेगोर थियेटर के अलावा 
और कोई नाम ध्‍यान में नहीं आता था. अब तो उस तरफ नाट्य गतिविधियां होने लगी हैं।

अमृतसर की पंजाब नाटशाला अपनी तरह का नवीन नाट्यगृह है. 
खासियत यह है कि यह एक अकेले व्‍यक्ति का उद्यम है.  

हिंदी भाषी क्षेत्रों में नाटक खेलने की परंपरा एक लगभग सूखी हुई नदी की तरह है. रामलीला को छोड़ दीजिए तो नाटक कुछ ही शहरों में होते हैं. प्रायः न नाटक होते हैं, न ही लोगों में नाटक देखने की रुचि का ही विकास हुआ है. जो नाट्यकर्म होता भी है उसमें अधिकतर कलानुरागी (एमेच्‍योर) किस्‍म का होता है. नाटक नहीं हैं तो नाट्यगृह भी नहीं हैं. सरकार ने किसी जमाने में राज्‍यों की राजधानियों में कविगुरू रवींद्र के नाम पर प्रेक्षागृह बनवाए थे. लेकिन बाकी शहरों में सन्‍नाटा है. जैसे साहित्यिक किताबों की दुकानों का अकाल है. ऐसे माहौल में जब कोई अकेला व्‍यक्ति पहल करता है तो उम्‍मीद जगती है कि धीरे धीरे कला आस्‍वाद की परंपरा बनेगी. 


मंच पर नाटक का पूर्वाभ्‍यास चल रहा है
ऐसा ही एक अकेला बंदा गुरुओं की तीर्थ नगरी अमृतसर में है जिसने वहां नाटक का एक तीर्थ निर्मित कर दिया है. जतिंदर बरार ने 1998 में पंजाब नाटशाला की नींव रखी और धीरे धीरे इसे एक शानदार नाट्यगृह में बदल डाला है. पेशे से इंजीनियर श्री बरार कई साल विदेश में रहे. देश का प्रेम और नाटक का शौक उन्‍हें वापस हिंदुस्‍तान खींच लाया. अमृतसर शहर के पुतलीघर इलाके में लगी अपनी फैक्‍ट्री को शहर से बाहर ले गए और वहां एक प्रेक्षागृह बना दिया. 


बरार की इंजीनियरी आंख ने इस सभागार को तकनीकी रूप से अत्‍याधुनिक प्रेक्षागृह बना दिया है. इसका मंच घूमने वाला (रिवाल्विंग) है. हमारे देश में घूमने वाले मंच  कम ही हैं. इस तरह के मंच में दृश्‍यबंध बदलने में आसानी होती है. पार्श्‍व में दृश्‍यबंध तैयार रखा जाता है. जैसे ही एक दृश्‍य खत्‍म होता है और अंधेरा होता है तो बिजली चालित मंच घूम जाता है. पिछला हिस्‍सा आगे अगला पीछे चला जाता है. मंच आलोकित होने पर दर्शक के सामने नया दृश्‍य संसार साकार हो जाता है. आम तौर पर नाटक में अभिनेता अगल बगल से प्रवेश करते हैं, लेकिन पंजाब नाटशाला के मंच पर जरूरत पड़ने पर पात्र मंच फाड़ कर यानी नीचे से भी प्रकट हो सकता है. नाटशाला में इस सुवि‍धा को एक नया आयाम कहा जा सकता है. एक हाइड्रालिक लिफ्ट लगाई जा रही है जिसके जरिए दृश्‍यबंध उठाकर मंच तक पहुंचाया जा सकेगा. जिन नाटकों में बड़े और ज्‍यादा सेटों की जरूरत हो, उनके लिए यह लिफ्ट फायदेमेद रहेगी. दृश्‍य परिवर्तन में समय कम लगेगा और नाटकीय प्रभाव भी पड़ेगा. बरार साहब को नाटक के दौरान और भी कई तरह के चामत्‍कारिक किस्‍म के यथार्थवादी प्रभाव पैदा करने का शोक है. ऐसी व्‍यवस्‍था की गई है कि अगर नाटक में बरसात का दृश्‍य हो तो छींटे दर्शकों पर भी पड़ जाते हैं. रसोई में पंजीरी बन रही हो तो खुशबू दर्शकों को भी आ जाती है. श्री बरार इन प्रभावों का जिक्र बड़े चाव से करते हैं. उनके लिखे नाटकों में इस तरह के दृश्‍य रहते हैं. नाटक में आम तौर पर दर्शक की सुनने और देखने की इंद्रियों का प्रयोग होता है. बरार साहब अपने दर्शक को सूंघने और छूने का सुख भी देना चाहते हैं. इस तरह वे दर्शक को यथार्थ का सांगोपांग किस्‍म का अनुभव देना चाहते हैं. उन्‍होंने एक नए नाट्य प्रभाव का जिक्र भी किया जिसमें नदी या तालाब यानी पानी के होने का वास्‍तविक प्रभाव पेदा किया जा सकेगा. इतना ही नहीं सैलोरामा पर पानी में झिलमिलाती रौशनियों का प्रभाव भी आ सकता है. यथार्थवादी और ऐतिहासिक नाटकों के लिए इस तरह की सुविधाओं की जरूरत पड़ती है.  


दृश्‍यबंध से सजा मंच
पिछले दस बारह सालों में उन्‍होंने इस प्रेक्षागृह को एक नाट्य संकुल का रूप दे दिया है. बड़े बड़े ग्रीन रूम बनाए गए हैं. वस्‍त्राभूषण का एक भंडारगृह है. बाहर से आने वाली मंडलियों के लिए अतिथिशाला है. प्रेक्षागृह भी अब वातानुकूलित हो गया है. पंजाब नाटशाला को जतिंदर बरार ने घर की तरह स्‍नेह और चाव से खड़ा किया है. लगभग हर वस्‍तु में उनकी छाप नजर आती है. इंजीनियर होने के नाते उन्‍होंने तकनीक के नए नए प्रयोग किये हैं, प्रेक्षागार के अंदर भी और बाहर भी. बरार सा‍हब नाटशाला को एक सामाजिक जिम्‍मेदारी की तरह लेते हैं. उनके खुद के लिखे नाटक सामाजिक समस्‍या प्रधान नाटक हैं. नाटक के दर्शकों में अभिरुचि जगाने के अलावा परिसर की सफाई और सजावट पर भी उनका ध्‍यान रहता है. यहां तक कि मध्‍यांतर में परोसे जाने वाले चाय नाश्‍ते की नफासत में भी उनकी छाप दिख जाती है. नाटशाला की एक और खासियत है कि हरेक प्रदर्शन के बाद राष्‍ट्रगान गाया जाता है. समय की पाबंदी यहां की एक और खासियत है. समय की यह पाबंदी तब भी बरकरार रही जब पंजाब के मुख्‍यमंत्री कैप्‍टन अमरेंद्र सिंह नाटक देखने आए. मुख्‍यमंत्री नाटक और परिसर से इतने प्रभावित हुए कि सारे राज्‍य को नाटक पर लगने वाले मनोरंजन कर से छूट मिल गई. 


प्रकाश व्‍यवस्‍था
एक बार को ऐसा लगता है कि बरार साहब का झुकाव ऐंद्रिक यथार्थपरकता की तरफ ज्‍यादा है. लेकिन इसका अपना महत्‍व है. दर्शक को आकर्षित करने में ये तरकीबें काम आती हैं. इस तरह की ऐंद्रिक यथार्थपरकता से दर्शक के नाट्य अनुभव में भी गहनता आती है. जिस तरह हास्‍य नाटक दर्शकों को खींचते हैं. तकरीबन सभी रंगमंडलियां उसमें मिर्च मसाला भी डालती ही हैं. पंजाब नाटशाला में भी हास्‍य नाटक होते हैं. टेलिविजन के लाफ्टर चैलेंज वाले राजीव ठाकुर और भारती सिंह इसी नाटशाला से निकले हैं. अगले दौर में हम एम्‍मीद कर सकते हैं कि पंजाब नाटशाला से कुछ और नए अभिनेता, निर्देशक और नाटककार निकलेंगे.

अब यहां दूसरे शहरों की रंगमंडलियां भी नाटक करने आती हैं. कई पाकिस्‍तानी नाटकों का मंचन भी हुआ है. नाटशाला ने अपना एक दर्शक वर्ग बना लिया है. स्‍कूली बच्‍चों के लिए भी नाटक के प्रदर्शन किए जाते हैं. हमारे समाज को जतिंदर बरार जैसे कई धुनी लोगों की जरूरत है.

पंजाब नाटशाला की और अधिक जानकारी यहां है.

कुछ और चित्र- 


भीतरी दीबारें 
सभागार में प्रवेश
बांस के दरवाजे









 
 

 

जतिंदर बरार अपने दफ्तर में

जतिंदर बरार और सुरेंद्र मोहन मेहरा के साथ









Thursday, August 15, 2024

काव्यात्मक नृत्य


एनसीपीए में 11 और 12 अगस्त को 

प्रख्यात भरतनाट्यम नृत्यांगना माल्विका सरुक्कई 

की पेशकश की एक अंतर्यात्रा 


हम लोग 11 अगस्त का एनसीपी गए थे, प्रख्यात भरतनाट्यम नृत्यांगना माल्विका सरुक्कई का नृत्य देखने। समय से करीब दो घंटा पहले पहुंच गए। सोच रहे थे कि समय कहां बिताएं। इतवार की वजह से मरीन ड्राइव खचाखच भरा हुआ था। इतने लोग समुद्र का नजारा देखने आए थे कि हम दोनों की हिम्मत उस भीड़ में घुसने की नहीं हुई। हमने एनसीपीए का ही रुख किया। लोहे के विशाल फाटक यूं तो बंद दिख रहे थे लेकिन एक गेट थोड़ा सा खुला था और भीतर एक प्रहरी विराजमान था। उसने हमें अंदर जाने दिया। कहा “अभी रिसेप्शन में लोग आए नहीं हैं। आप डांस देखने ही आए हैं ना?”


हमने कहा “हां!
“कोई बात नहीं। आप इस तरफ टहल लीजिए। जब एंट्री शुरू हो जाएगी तो आ जाइएगा।”

हम एनसीपी के लॉन में चले गए। एक बेंच पर बैठ गए। हमारे पीछे एनसीपी का बड़ा सभागार था। दाएं हाथ को भावा ऑडिटोरियम की एक दीवार थी। गहरे रंग के शीशे में से कुछ संगीतकार बैठे दिख रहे थे। उनके हाथ में वायलिन जैसे कुछ साज़ थे। शायद वे अभ्यास कर रहे थे। हमारे सामने एक्सपेरिमेंटल थियेटर की इमारत थी। उसके पीछे मरीन ड्राइव की अट्टालिकाएं दिख रही थीं। हमने एनसीपीए के प्रहरी को मन ही मन कई बार धन्यवाद दिया। उसने हमें यहां बैठने की आज्ञा दी। कुछ महीने पहले न्यूजीलैंड गए थे। वहां की आर्ट गैलरियों, संग्रहालयों और वहां के वास्तु शिल्प से हम बहुत प्रभावित हुए थे। कल एनसीपीए को इस तरह फुर्सत में देखने पर हमें इस बड़े इदारे पर गर्व हुआ। बहुत साफ, सुंदर लॉन। कार्यक्रम तो सभी जानते हैं यहां बहुत अच्छे होते हैं। समुद्र के करीब होने के कारण हवा भी तन मन को खुश कर दे रही थी। करीब एक घंटा हमने वहां बिताया। उसके बाद एक और घंटा हमारे पास था।

अब थियेटर का प्रवेश द्वार खुल चुका था। हमने टाटा थियेटर में प्रवेश कर लिया और भूतल पर ही एक सोफे पर जा बैठे। तभी वहां स्कूल के बच्चे पंक्तिबद्ध आए। उनकी अध्यापिकाओं ने उन्हें पंक्तियों में बिठा दिया फिर उन्होंने छह-छह बच्चियों को आदेश दिया कि आप लोग बाथरूम हो आओ और पानी पी लो। हम उनकी इस व्यवस्था से बड़े प्रभावित हुए। फिर यह सोचकर वहां से उठ गए कि वे लोग हमारी वजह से संकोच न करें। सीढ़ियां चढ़कर ऊपर आए तब तक जलपान का काउंटर खुल गया था। हमने एक-एक कॉफी ली। काश! कॉफी कम मीठी होती। मानो लोगों के व्यवहार की मिठास कॉफी में भी घुल गई थी।

जब हम सभागार में बैठ गए तो हमने देखा तीन अलग-अलग स्कूलों के छात्र-छात्राएं वहां मौजूद थे। यह कितनी सुंदर और दूर दृष्टि की बात है कि छात्रों को शास्त्रीय नृत्य दिखाया जाए। यह प्रसन्न करने वाला विचार है।

माल्विका सरुक्कई पद्मश्री और संगीत नाटक अकादमी से पुरस्कृत हमारे देश की एक श्रेष्ठ नृत्यांगना हैं। 65 वर्ष की उम्र में भी उनकी देह और देह भाषा अचंभित करती है। उन्होंने चार अलग-अलग कथाएं प्रस्तुत कीं। वे मुझे बहुत समझ तो नहीं आईं लेकिन अपने साथ बहा ले गईं। उनके संगीत के साथी भी गजब के हैं। मैं तो जब भी नृत्य देखता हूं तो गायन करने वालों से बेहद प्रभावित हो जाता हूं। भावुक भी हो जाता हूं। जब उसमें वायलिन, बांसुरी, मृदंगम् और नटुवंगम् (छोटा मंजीरा) का मेल होता है जो सम्पूर्ण ध्वनि संसार अलग ही स्तर पर पहुंच जाता है। गायन की निरंतर लय, उतार चढ़ाव और उस पर ताल का साथ, उसके साथ नर्तन के मेल से अलग ही समा बंधता है।

माल्विका ने चार अलग-अलग नृत्य प्रस्तुत किए। पहले सूर्य स्तुति थी। फिर श्रीमद् भागवत का कालिया मर्दन प्रसंग और बाद में संत अंडाल की दो प्रार्थनाएं पेश कीं। मुझे नृत्य की भाषा समझ में नहीं आती है। हालांकि हर एक रचना से पहले सारांश बताया जा रहा था कि क्या पेश होने वाला है। नृत्य का जानकार उसे और अधिक गहराई और बारीकी से समझ पाता होगा। लेकिन मेरे जैसा साधारण दर्शक भी उनकी नृत्य कला में पूरी तरह खोता रहा। सारांश अंग्रेजी में सुनते समय पहले मेरा ध्यान सिल्क साड़ियों और फैब इंडिया की अभिजात सादगी में विराजमान कला प्रेमियों की तरफ गया, फिर स्कूली छात्र-छात्राओं का ख्याल आया। अगर ये घोषणाएं यहां हिंदी और मराठी में भी की जाएं तो भव्यता का शक्ति प्रपात जरा मंद पड़ जाए और बातें समझ भी आएं।

शास्त्रीय नृत्य कला में शायद बहुत तरह-तरह का संश्लेषण रहता है। गायन और वाद्यों की लय, ताल, नर्तक की भंगिमाएं, मुद्राएं, सुनाई जा रही कथाएं, जीवंत किए जा रहे चरित्र, उनके संवाद - यह सब कुछ कलाकारों द्वारा इस प्रकार आत्मसात कर लिया जाता है कि वह सब उनका एक तरह से रिफ्लेक्स एक्शन ही लगता है। यह लगता ही नहीं कि वह अलग से कोई क्रिया करने या कोई भंगिमा दिखाने का प्रयत्न कर रहे हैं। यह एक सामूहिक कला है। इसमें मृदंगम्, बांसुरी, वॉइलिन और गायन सभी का बराबर योगदान है। माल्विका ने बाद में बताया भी कि हमने बहुत कठिन अभ्यास इसका किया है। वह दिखता भी है। तभी तो दृश्य और श्रव्य की यह विलक्षण और जीवंत प्रस्तुति संभव हो पायी। इसमें कोई टुकड़ा अलग नहीं है। हर एक कलाकार की एक भूमिका है। और वह समूह में ही संभव है। उसे प्रमुखता से पेश करने वाली नर्तकी है। लेकिन उनका आर्केस्ट्रा भी उसी का अविभाज्य अंग है। जो प्रसंग और कथा और चरित्र पेश किया जा रहा है नृत्यांगना उसी से तदाकार हो जाती है। वह प्रार्थना या स्तुति या पुकार दूर इतिहास में किसी अन्य व्यक्ति की है। वह भी अपने समय में अपने प्रिय से या अपने आराध्य से उतना ही अभिवाज्य रहा होगा। उन शब्दों को शताब्दियों बाद जीवंत कर दिया जाना, वह भी किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा, किसी दूसरे समय में, अद्भुत है। वर्तमान का एक नृत्य दल है। उसके साथ आठवीं और दसवीं शताब्दी का एक पद या कविता, जो अब तक जीवित चली आती है, इस दल के माध्यम से पुनः नव्या होकर साकार हो उठती है। एक लंबा समय एक सूत्र में बंध जाता है। इसे जोड़ने वाले शब्द और उनमें बसी हुई भावनाएं और संवेदनाएं, आवेग और संवेग, पात्र और चरित्र, बीच में हुए तमाम परिवर्तनों से बेपरवाह, अपने नवीन स्वच्छ रूप में अवतरित होते हैं। दर्शक समय की इन दूरियों को लांघ जाता है। सब कुछ एक विलक्षण अनुभव की तरह उसके जीवन का हिस्सा बन जाता है।

अगले दिन यानी 12 अगस्त को हमें एक और अवसर मिल गया, जहां माल्विका सरुक्कई अपनी नृत्य कला के बारे में बात करने वाली थीं। मुंबई के छत्रपति शिवाजी वस्तु संग्रहालय की एक म्यूजियम सोसायटी है। वे लोग कभी-कभी कुछ कार्यक्रम करते हैं। उनका न्योता सुमनिका को मिल जाता है, जिसका लाभ मैं भी उठा लेता हूं। यह कार्यक्रम म्यूजियम सोसायटी ने एनसीपीए के साथ मिलकर किया। करीब डेढ़ घंटे तक माल्विका ने अपनी नृत्य यात्रा के बारे में बात की। नृत्य की बारीकियों को समझाने की कोशिश की; उनके संगतकार किस प्रकार नृत्य को या किसी प्रस्तुति को सांगोपांग
बनाने में सहायक होते हैं। उदाहरण देकर उन्होंने अपनी बात को बड़े प्रामाणिक ढंग से प्रस्तुत किया।

भरतनाट्यम् या कोई भी शास्त्रीय नृत्य हो, हम नर्तक की देहभाषा और भंगिमाओं से व्यामोहित हुए रहते हैं। उन्होंने बताया कि इसे सीखना कितना कठिन है, इसकी प्रक्रिया कितनी जटिल है। नृत्य में सहज होने में कम से कम बीस साल लगते हैं। उसके बाद उसे हृदयंगम करने और नर्तक के रूप में खुद को खोजने की प्रक्रिया शुरु होती है।

ताल की वजह से किस तरह यह गणित पर आधारित है, जिसे उन्होंने काव्यात्मक गणित या पोएटिक मैथ्स का नाम दिया। उन्होंने यह भी बताया कि मृदंगम् या वायलिन या गायन या नटुवंगम को साधारण ढंग से भी बजाया जा सकता है। लेकिन जब हम कोई प्रस्तुति तैयार करते हैं तो उसके तथ्य के आधार पर, उसकी संवेदनाओं को ध्यान में रखते हुए, सभी वाद्य यंत्रों और गायन में कथ्य के अनुरूप लोच या नुआंस पैदा करते हैं। किसी एक रचना को पक्का करने के लिए महीनों रियाज करनी पड़ती है। एक और महत्वपूर्ण बिंदु उन्होंने साझा किया कि जब किसी रचना को वे पेश करती हैं, जैसे अंडाल के ही पद को उन्होंने प्रस्तुत किया, तो वह माल्विका नहीं रह जातीं। वह अंडाल ही हो जाती हैं। बल्कि एक अवस्था ऐसी आती है कि नर्तक या अंडाल या पात्र भी नहीं रह जाता। वहां सिर्फ नृत्य बचता है। किसी ने प्रश्न किया के एनसीपीए के मंच पर आपको कैसा लगा। उन्होंने कहा कि वहां की ऊर्जा एकदम भिन्न है। उसके अलावा मैं नृत्य के दौरान उस स्टेज पर रही नहीं। मैं तो वृंदावन में थी, यमुना के किनारे थी, कृष्ण के साथ थी। इस स्तर तक तदाकार होना नृत्य प्रस्तुति को एक अलग स्तर पर ले जाता है। शायद इसी वजह से दर्शक भी काफी हद तक उस भाव भूमि का स्पर्श कर लेता है।  

Wednesday, July 24, 2024

लोकप्रियता की धमक


जैसे सोशल मीडिया नए जमाने की चौपाल है वैसे ही  फिल्मी गीत नए जमाने का लोक संगीत है। पर यह तकनीक और ग्लैमर के प्लेटफार्म पर खड़ा है। मुंबई के षणमुखानंद ऑडिटोरियम में विशाल और रेखा भारद्वाज के लाइव शो की आपबीती पेश है।      


मुंबई में कला संस्कृति के अलग-अलग ठिकाने हैं। पृथ्वी थियेटर, एनसीपीए, जहांगीर आर्ट गैलरी, म्यूजियम वगैरह तो कई बार जाना हुआ है। हर जगह का माहौल अलग है। बीच में बीकेसी के नीता मुकेश अंबानी केंद्र में गए। एक बार दादर में सावरकर ऑडिटोरियम में भी गए। 


इस बार 14 जुलाई को गांधी मार्केट में षणमुखानंद हॉल में गए। मुंबई शहर के पुराने विशाल सभागारों में से एक, साइन माटुंगा के बीच गांधी मार्केट के इलाके में। मुंबई के शुरुआती दिनों में यानी आकाशवाणी की नौकरी के दौरान किंग सर्किल स्टेशन से लोकल ट्रेन लेते, शाम को वहीं उतरते। एंटॉप हिल में सात साल रहना हुआ। षणमुखानंद हॉल के बगल से सरकारी कॉलोनी में घुसते। कितने बरस बीत गए, कभी इस विशाल सभागार में जाने का सबब नहीं बना। उस्तादों की महफिलें यहां हुआ करती थीं। आकाशवाणी के हमारे सहकर्मी हंपीहोली कहते, भीमसेन जोशी मेरा भाई है (उनकी शक्ल भी मिलती थी), उसकी संगीत सभा का संचालन मैं ही करता हूं। हंपीहोली साहब के घर पर धारवाड़ के पेड़े तो कई बार खाए पर उनके भाई की संगीत सभा नहीं सुन पाए। 


हमें पता ही नहीं कि यह पुराना सभागार जो 1952 में शुरू हुआ था, 1990 में आग से क्षतिग्रस्त हो गया था। इसे नए सिरे से खड़ा किया गया। तिमंजिला सभागार में करीब 3000 दर्शक बैठ पाते हैं। यह सभागार राष्ट्र की अखंडता को समर्पित है। उन नामचीन कलाकारों की स्थाई प्रदर्शनी यहां के गलियारों में लगी है जो यहां अपनी सभाएं कर चुके हैं। इनमें शास्त्रीय संगीत के उस्ताद भी हैं और फिल्मी गायक भी। साथ ही सभा शहीद सैनिकों का भी सम्मान करती रही है। अनेक शहीदों की मूर्तियां स्थाई रूप से यहां स्थापित की गई हैं। 

हम लोग विशाल और रेखा भारद्वाज का शो 'ओ साथी रे' देखने गए थे। बरसात के मौसम में हम तो समय से पहुंच गए लेकिन मुख्य कलाकार देर से पहुंचे। जब हम अंदर बैठे तो मंच खुला हुआ था। साज़ रखे थे, साज़िंदे आ जा रहे थे। वे तब तक आते जाते रहे जब तक उद्घोषक ने आकर माफी मांगते हुए विशाल और रेखा को मंच पर आमंत्रित नहीं कर लिया।

 

अब नई कबायद शुरू हुई साजोंं के सुर मिलाने की। संगीत सभाओं में आमतौर पर तबले और तानपूरे को ही मुख्य साज या गायक के सुर से मिलाया जाता है पर यहां नजारा अलग था। तबले के अलावा एक ड्रमर, गिटार के अलावा बेस गिटार, मेंडोलियन, सैक्सोफोन और क्लेरिनेट, सिंथेसाइजर और दो सहायक गायक।  इनके सुर खुले कान से नहीं मिल रहे थे। विशाल भारद्वाज दूर कहीं छुप कर बैठे साउंड इंजीनियर से बातें करते हुए सुर मिला रहे थे। यह सब हमें दिखाई भी पड़ रहा था और सुनाई भी पड़ रहा था। विशाल भारद्वाज बीच बीच में तकनीकी खराबी के कारण हुई देरी के लिए माफी भी मांग ले रहे थे और बातचीत में चुटकियां भी ले ले रहे थे। सभागारों में महाकाय स्पीकर होते हैं। उनसे पता नहीं कितने डीबी की आवाज निकलती है। 


यह पता चला कि आवाज को एमप्लीफाई करने की तकनीक बेहद जटिल है। जो दो मनुष्य वहां गीत गाने वाले थे और जो सहायक उनके गीतो में संगत करने वाले थे, वह पुराने जमाने का सीधा-सादा, भोला-भाला संगीत कार्यक्रम नहीं है। गाने बजाने वाले अदना से इंसान हैं। उसे कई तरह से कई गुना फैलाने का ध्वनि और बिजली और यंत्रों का अजीब सा खेल है। यह सारा खेल लार्जर दैन लाइफ होने वाला था। हजारों वाट की भारी भरकम आवाज दीवारों में बंद तीन हजार लोगों के दिलों पर धमाके करने वाली थी। शायद लोग इन्हीं आवाजों का नशा करने वहां जाते हैं। हम शायद किसी पुरानी पिछड़ी हुई दुनिया के बौड़म थे जो गीत सुनने यहां आए थे। 


हालांकि कार्यक्रम की शुरुआत गजलों और गीतों से ही हुई। थोड़े प्रयोगशील शब्द, उतनी ही प्रयोगशील धुनें जिनके लिए विशाल भारद्वाज जाने जाते हैं। विशाल अपनी तरह के सिनेकर, संगीतकार और गीतकार हैं। एक जमाने में गुलजार साहब के सहायक रहे हैं। गुलजार अपने गीतों में अपनी तरह के प्रयोगधर्मी कवि हैं, कोमल, कमनीय, लता लंतरानियों सरीखे, लेकिन नवीन भी। विशाल भी लगता है इसी परंपरा के लेखक हैं। वे एक तरह के शैलीबद्ध गीतकार नहीं हैं। नूतनता का एहसास देने वाले रोमानी गीतकार हैं।  रेखा भारद्वाज उनके साथ गाती हैं।  गायन में उनका अपना व्यक्तित्व है। उन्होंने सूफी कलाम या गायन की राह  पकड़ी है। यह पारंपरिक सूफी गायन नहीं है। इसे नवसूफी गायन या सूफीवत् गायन कहना ज्यादा उचित होगा। विशाल के शब्द और धुनें इस नवसूफीवाद को मोहक बनाती हैं। शायद समकालीन, प्रासंगिक या कहना चाहिए नवीन भी। इस तरह के सॉफ्ट गायन के भी कद्रदान हैं। महफिल में जमा लोगों की प्रतिक्रियाओं से पता चल रहा था कि विशाल कितने लोकप्रिय हैं, टिकट के दाम चाहे जितने भी हों। बल्कि लोकिप्रियता के आधार पर भी तो टिकट के दाम तय होते होंगे। 


कार्यक्रम में एक मध्यांतर भी हुआ। कैंटीन भूतल पर है। वहां जन सैलाब था। काउंटर तक पहुंचना मुश्किल। हमारे बच्चे पहले निकल आए थे। वे बड़ा पाव खरीदने में कामयाब रहे। चाय नहीं मिल पाई। यह जनता की कैंटीन जैसी जगह है जहां एक गलियारे में काउंटर लगाकर चीजें बेची जाती हैं। हजारों की भीड़ एक साथ टूट पड़ती है। यहां एनसीपी या पृथ्वी या अंबानी सेंटर जैसी उच्च भ्रू नफासत नहीं है। अलबत्ता बटाटा बड़ा ₹70 में एक प्लेट और चाय ₹30 में मिल जाती है।


मध्यांतर से पहले का हिस्सा थोड़ा सादा, शुरू में पटरी से उतरता हुआ सा लग रहा था, पर धीरे-धीरे अपनी रौ में आ गया। एक्सपेरिमेंटल गायन के नाम पर इसे सफल ही कहा जाएगा। विशाल ने मुक्तिबोध की रोमानी सी कविता भी गा कर सुनाई। इसे उन्होंने कन्हैया कुमार के नाम किया, जो विशाल के मुताबिक सभागार में मौजूद थे। 


मध्यांतर के बाद साज़ों की जगह बदली हुई थी। रेखा भारद्वाज साड़ी की जगह काले या गाढ़े रंग का पैरों तक लंबा और घेरदार ड्रेस पहने हुए थीं। वह सूफियों का चोगा नहीं था। सूफीवत् था। वह गाने की एक सतर गातीं और घूमने लग जातीं। सूफी तो निरंतर घूमते जाते हैं। लेकिन रेखा जी को घूमने का अभ्यास है। रुकने पर उन्हें चक्कर नहीं आता। दस चक्कर लगाकर भी गीत के अंतरे को उठा लेती हैं। क्या यह नव सूफी गायन था नफासत भरा? उनके अंदर भी कुछ सूफीपन निश्चित ही आता होगा। बाहर तो उसका एक इलस्ट्रेशन दिखता है। रेखा जी की आवाज दिलकश है। विशाल भी गाने में सहज हैं, परफॉर्मेंस में भी। इतने शोर शराबे में भी कोमल पदावली वाला गायक होश कायम रख लेता है। इस कार्यक्रम से पता चला कि यह शो बिजनेस भी उनके व्यक्तित्व का एक हिस्सा है। इस व्यक्तित्व को साकार करने के लिए विशाल मध्यांतर के बाद कुर्ते पजामे की बजाय जैकेट और जींस में पधारे थे। यह उनका नया ही अवतार था। प्रदर्शनों की भाषा में कहा जाए तो इस हिस्से में एनर्जी का स्तर अलग ही था। पहले रेखा तेज रोशनी से परेशान थीं। अब रोशनी तेज सूरज की तरह मंच पर प्रहार कर रही थी और वे लोग उसे पर थिरक रहे थे। इस हिस्से में उन दोनों ने अपनी फिल्मों के लोकप्रिय गीत गाए। जनता मानो इन्हीं गीतों का इंतजार कर रही थी। दोनों गायको ने भी ये लोकप्रिय गीत इस हिस्से के लिए चुनकर रखे थे। पहले मानो वे में रिहर्सल कर रहे थे। ‘बीड़ी जलई ले’, 'दिल तो बच्चा है' ‘नमक इश्क का’ और 'नैणा ठग लेंगे' जैसे गीत मानो मंच से कूद कर सीधे दर्शक को बींध रहे थे। बहुत तेज आवाज, बेहद तीखे साज़, अति गंभीर धमाके। और इस के साथ रोशनियों के जलने बुझने मटकने अटकने का महा खेला। पूरा सभागार जैसे दहल रहा था। ये गीत गुलजार के लिखे हुए हैं। यह सोचना दिलचस्प होगा कि वे इस तरह की प्रस्तुति को साक्षात देख रहे होते तो उनकी क्या प्रतिक्रिया होती।


इन धमाकेदार गीतों के बजते वक्त अचानक मैंने महसूस किया कि मेरी कुर्सी हिल रही है। मेरे जाने मैं तो स्थिर था, जड़ी-भूत जैसा, कुर्सी के हत्थों को कस कर पकड़े हुए। पर दिमाग ध्वनि और प्रकाश के उन घन प्रहारों के बीच विचलित था। क्या मेरे पड़ोसी हिल रहे थे या पीछे वाले थिरक रहे थे या कहीं मैं ही तो सम्मोहित नहीं हो गया था? कुछ समझ नहीं आ रहा था। ध्वनियां और रोशनी अंदर तक धंस रही थी। मैंने महसूस किया मेरी अंतड़ियां खिंच रही हैं। मेरा पेट एकदम गुच्छा हो गया है। आवाजों का वह क्रिसेंडो चरम पर था। तब भी विशाल भारद्वाज होश में थे। उन्हें पता था वे क्या कर रहे हैं। असल में वे अपने चहेतों के लिए गला फाड़ परफॉर्म कर रहे थे। फिर उन्होंने इस ढैं-ट-ढैं के बीच ही अपने साज़िन्दों का परिचय दिया।  


मैंने धीरे से खुद को उठाया और उस लाइन में लग गया जो सभागार से बाहर जाने की तैयारी कर रही थी। हम घर आ गए पर मेरी अंतड़ियों की ऐंठन अगले दिन शाम को जाकर ही खत्म हुई।

Sunday, June 16, 2024

पृथ्वी में संगीत



सितारतय सुबह  


आज 16 जून की सुबह संगीतमय रही। मुंबई की खाली सड़कों का आनंद लेते हुए सवा सात बजे हम पृथ्वी थिएटर पहुंच गए। संगीत प्रेमी वहां पहले से ही पधारे हुए थे। यहां अच्छी सीट पाने के लिए लोग आध पौन घंटा पहले ही आकर कतार में लग जाते हैं। आज भी करीब तीस लोग हमसे पहले वहां मौजूद थे। अवसर था महीने के तीसरे रविवार की सुबह पंचम निषाद संस्था के शास्त्रीय संगीत का कार्यक्रम उदयस्वर ऐट पृथ्वी। आज सहाना बैनर्जी का सितार वादन था। पृथ्वी थियेटर हाउस फुल नहीं था फिर भी ठीक-ठाक संगीत प्रेमी इतनी सुबह पहुंच गए थे। सहाना बैनर्जी ने सुबह के तीन राग प्रस्तुत करने थे, राग ललित, गुर्जरी तोड़ी और राग भैरवी। महफिल को सजाने संवारने के लिए सहाना जी ने राग ललित बड़े इत्मीनान से पेश किया। अपनी वादन कला से दर्शकों को शुरू से ही सम्मोहित किए रखा। 

पृथ्वी थिएटर में माइक्रोफोन और एमप्लीफायर का प्रयोग नहीं होता है। साज से निकलने वाली ध्वनि तरंगें अपने मूल रूप में सारे सभागार में फैलती हैं। हम लोग जानबूझकर मंच के करीब बैठे ताकि सुनने के साथ-साथ संगीतकारों के हाव-भाव को भी नजदीक से देख सकें। मंच पर तीन ही लोग थे- रामपुर सेनिया घराने की सितार वादक सहाना बैनर्जी, तबले पर ओजस अधिया और संभवत: सहाना की एक शिष्या तानपूरे पर। सितार को गायकी अंग में सुनकर मन भीग जाता है। मैंने अभी तक शाहिद परवेज़ के ही सितार में यह गूंज और लचक सुनी थी। सुमनिका कहती हैं सितार में तो यह होता ही है। यह मीड़ या स्वर की लोच बाज़दफा इतनी लंबी और लहरदार होती है कि स्वरलहरी बलखाती दूर जाती या डूबती जाती प्रतीत होती है। जैसे रंग भरी कोई बंकिम रेखा धीमे धीमे ओझल होती जाती हो। आपके प्राण उससे बंधे बंधे खिंचे चले जाते हैं। आप उसके पीछे-पीछे उतराने लगते हैं।

राग ललित के बाद सहाना जी ने गुर्जरी तोड़ी बजाई। समय की बंदिश के चलते इसे इतना विस्तार नहीं मिला। फिर भी मेरे जैसे साधारण श्रोता को ललित की स्वर लहरी और गुर्जरी की स्वर लहरी में फर्क महसूस हुआ। उसके बाद थोड़ा समय बचा था जिसमें भैरवी में एक धुन उन्होंने बजाई। और उसके बाद इसी राग में एक पुरानी बंदिश भी बजाई। भैरवी की दोनों ही बंदिशें अत्यंत मनमोहिनी थीं।  एक साथ सभी श्रोता इस बात की गवाही भी अपनी तालियों के जरिए दे रहे थे। 

आज की संगीत सभा में सितार के साथ तबले की संगत का बहुत ही आनंद आया। ओजस अथिया सितार वादक के साथ-साथ चल रहे थे। सितार की ध्वनि जब धीमी पड़ जाती, जैसे मानो वह खुद से ही बात कर रही हो, तब तबला भी मुलायम, महीन और मंद हो जाता। जब सितार के तार उल्लसित झंकृत होते, तब तबला भी अपनी कलात्मक ओजस्विता से सभागार को गुंजायमान कर देता। दोनों की संगत बेजोड़ थी। संगीत सभाओं में तानपूरा की भूमिका अपरिहार्य होती है। तानपूरा बजाने या स्वर छेड़ने वाले की भूमिका मुझे बहुत कठिन प्रतीत होती है। मुख्य वादक सहाना जी जैसे ही मिजराव से तारों को छेड़तीं, उनकी दूसरे हाथ की अंगुलियां तारों से खेलने लग जातीं। वह कभी अपने भाव में डूब जातीं, कभी तबले की संगत पर 'क्या बात है' कह उठतीं। बीच-बीच में अपने सितार के कान भी उमेठती रहतीं ताकि सभी तारें सुर में रहें। तबला वादक भी सितार और सितार वादक की भाव-भंगिमा के साथ अपने साज़ के साथ और अपनी देह भाषा के साथ सहज अभिव्यक्ति कर रहे थे। ऐसे आंदोलित माहौल में जहां दो साज़िंदे अपनी-अपनी भाव-भूमि में और अपने-अपने साज़ के साथ आनंद रास में मगन हों, वहां तानपूरे पर सुर छेड़ने वाली साध्वी से कम प्रतीत नहीं हो रही थीं। शायद संगीत सभाओं का यह अनुशासन होता है कि तानपूरा छेड़ने वालों की मुख मुद्रा एकदम शांत और निस्पृह रहती है। यह तो हो नहीं सकता कि वे संगीत का माहौल बनाने में जो अनिवार्य योगदान दे रहे होते हैं, उनके मन में कोई भाव न घुमड़ रहे हों। लेकिन वे उसे अभिव्यक्त नहीं होने देते। उंगलियां भी तानपूरे पर एक लय से फिरती रहती हैं। संगीत की इस पृष्ठभूमि का महत्वपूर्ण योगदान है। क्योंकि यदि तानपूरा न हो तो संगीत सभा में भराव नहीं आ पाएगा। 

हम लोग सभागार में आगे यह सोचकर बैठे थे कि कलाकारों के संगीत के साथ-साथ उनकी भाव-भंगिमाओं का भी आनंद लेंगे। लेकिन संगीत का प्रभाव कुछ ऐसा था कि आप स्वर के साथ चलते हुए कहीं खो जाएं और आंखें बंद हो जाएं। तब बंद आंखों में संगीत का एक अलग ही तरह का संसार खुलता है। फिर थोड़ी देर में जब मन कहीं खोने लगता, तो  आंखें खुलतीं और रोशनी के बीच सितारे अपने साज़ों  के साथ डूबते और खेलते हुए नजर आते। आंखें मुंदने और खुलने का यह क्रम बार-बार चलता रहा।

Saturday, April 17, 2021

गहरे धूसर रंगों वाली फिल्म

 


मनोज वाजपेयी हमारे समय के एक सशक्त अभिनेता हैं। उन्हें हाल ही में भोंसले फिल्म के लिए सर्वज्ञेष्ठ अभिनेता चुना गया है। इस फिल्म में उनका अभिनय ही नहीं, पूरी फिल्म ही सोचने के लिए भरपूर सामग्री देती है।  


दो तीन सिटिंग में सोनी लिव पर भोंसले' फिल्म देखी। इंटरनेट पर ओटीटी का फायदा यह है कि आप अपनी सुविधा से फिल्म आदि देख सकते हैं। भोंसले बड़ी कठिन फिल्म है। मनोज वाजपेई की ही फिल्म है यानी मनोज कॉन्स्टेबल भोंसले की मुख्य भूमिका में हैं और शायद सह निर्माता भी हैं।

कॉन्स्टेबल भोंसले के सेवानिवृत्त होने की शाम से फिल्म शुरू होती है, गणपति उत्सव तक चलती है। मराठी मानुस की राजनीति से बजबजाती हुई फिल्म। हिंदी बनाम मराठी समाज की शरारती राजनीति पर भोंसले फिल्म मारक नैतिक प्रहार करती है।

भोंसले बहुत ही चुप्पा, अकेला, एकांतवासी, अपने में खोया हुआ, अपनी नौकरी की एक्सटेंशन चाहने वाला गंभीर व्यक्ति है।

भोंसले की चॉल (जो हमारे समाज की तरह जर्जर, जाले लगी और चौहद्दी में बंद है) में रहने वाली हिंदी भाषी पड़ोसन लड़की बीमारी में उसकी मदद करती है। अपने घर से हजारों मील दूर अपने पैरों पर नर्स बनकर खड़ी यह लड़की उसी चॉल के एक वाचाल और महत्वाकांक्षी युवक, जो मराठी मानुस के नाम पर राजनीति करने की चालें चलता रहता है, की शिकार हो जाती है। भोंसले इस लड़की के साथ हुए जुर्म का बदला लेने के लिए अपराधी को पीट-पीटकर मार देता है, खुद भी हृदयाघात से मर जाता है। फिल्म की ये घटनाएं विचलित करती हैं। फिल्म चॉल के इर्द-गिर्द ही घटित होती है।

तकरीबन सभी दृश्य रात के हैं या अंधेरे के हैं या रात में रोशनियों के बीच हैं। अगर कहीं दिन या सुबह है भी तो वह भी धूसर और उदास है। भोंसले की खोली बेहद अंधेरी, जर्जर और उदास है। सारी चॉल ही खस्ताहाल है। सुबह का एक दृश्य अंत में आता है जब क्रोध से भरा भोंसले सार्वजनिक बाथरूम में अपराधी युवक को ढूंढ़ने निकलता है।

फिल्म बड़े गहरे धूसर रंगों में फैली है। कैमरा बहुत ही रूखे यथार्थ को पकड़ता है - दरवाजे, सीढ़ियां, खिड़की, कौवा, कुत्ता... कुत्ते का मुड़ा हुआ पैर... भोसले का किचन...

संगीत और ध्वनियां भी आद्यंत खलबली मचाए रहती हैं, कर्कश होने की हद तक।

अजीब विडंबना है कि मनुष्यता और नैतिकता और सच्चाई का पक्षधर भोंसले बीमार है, रिटायर हो चुका है, चौथी अवस्था के ब्रेन ट्यूमर से ग्रस्त है, ज्यादा जीवन उसके पास नहीं है। उसके बरक्स राजनीति को अपना पेशा बनाने को उतावला हुआ पड़ा उसी चॉल का एक निवासी टैक्सी चालक है जिसे सच-झूठ, सही-गलत से कोई मतलब नहीं। ऐसे महत्वाकांक्षी नौजवान से बूढ़ा और बीमार कॉन्स्टेबल लोहा लेता है। नर्स लड़की में मानवीयता, सरलता और मदद की रोशनी है पर वह सुरक्षित नहीं है। कठोर और कुत्सित यथार्थ के बीच जीवन की कांपती सी लौ यहां दिखती है। एक हारी हुई सी परिस्थिति हमारे सामने है कि समाज में फूट डालने का पेशा अपनाने को लालायित व्यक्ति राजनीतिज्ञों के निकट, ताकतवर, नौजवान और बड़बोला है। दूसरी तरफ न्याय, समानता, मनुष्यता, कोमल भावनाओं का पक्ष लेने वाले वृद्ध, नादान, कमजोर, चुप्पे, भयभीत और बीमार लोग हैं।

फिल्म के अंतिम दृश्यों में जब भोंसले बदला ले चुका है और मर चुका है, गणपति विसर्जन के बाद के दृश्य इस सारे आख्यान को अखिल भुवन में गुंजायमान कर देते हैं। देवी देवताओं की खंडित प्रतिमाएं रेत में धंसी पड़ी हैं। एक देवता की मूर्ति पानी में ऊबचूब हो रही है। चटख रंग वाली टूटी हुई मुखाकृति की केवल पलक हवा के झोंके से हिल रही है। सारे विध्वंस के बीच मानव जीवन का हल्का सा स्फुरण वहां हो रहा है।

उस तुमुल कोलाहल में भी भोंसले के सांस की आवाज गूंजती रहती है। भोंसले के भीतर पता नहीं कितना क्रोध और असंतोष जमा हुआ है कि उसका जबड़ा हमेशा भिंचा रहता है। उसके मुंह से कभी कभी ही कोई बोल फूटता है। वह प्रायः उदासीन और निरपेक्ष बना रहता है लेकिन तन मन से घायल नर्स को ढांढ़स बंधाते समय भोंसले के भीतर की सारी ममता करुणा बह निकलती है।


Thursday, April 23, 2020

कोरोना काल

सुमनिका द्वारा करीब पचीस साल पहले चारकोल से बनाया गया स्केच 


यह थकना भी कोई थकना है लल्लू!

हम अजीबोगरीब वक्त में फंस गए हैं । एक तरह से सारी दुनिया ही ठहर सी गई है । आगे हम लोगों को जीवन कैसा होगा कुछ पता नहीं ।  कुछ लोग कोरोना के शिकार हो गए हैं, कुछ उन्हें बचाने में लगे हैं । बाकियों को बचे रहने की सलाहें दी जा रही हैं । अभी सम्मुख निरा वर्तमान है । 


बीस मार्च के बाद मैं दफ्तर नहीं गया । दफ्तर तो छोड़िए स्वामी विवेकानंद रोड या गोरेगांव बाजार तक भी नहीं । हमारी हाउसिंग सोसाइटी के गेट के सामने एक सब्जी वाला बैठता है, एक आलू प्याज वाला, एक फल वाला, दो जनरल स्टोर हैं, एक मेडिकल स्टोर है, एक हलवाई है और दो चार दुकानें और । इसी सड़क के एक छोर पर राम मंदिर रोड लोकल स्टेशन की सीढ़ियां उतरती हैं । सड़क के सीमेंटीकरण का काम चल रहा था । जनता कर्फ्यू और फिर लॉकडाउन के बाद सब्जी वाला, आलू प्याज वाला, एक जनरल स्टोर और मेडिकल स्टोर सुबह शाम खुल रहे हैं, बाकी सुनसान है ।  सुनसान शब्द में एक तरह से रोमांस की या नीरवता की कौंध रहती है, यह तो उजाड़, भुतहा, और बियाबान के करीब का मंजर है । करीब दो हफ्ते पहले बेटी के साथ एक रात गाड़ी से हमारी इमारत से सटे  फ्लाईओवर तक गया था। सुनमिका ने अपनी खिड़की से देखा था, वहां एक कुत्ता अकेला पड़ गया लगता था । उसे पानी और रोटी दी । रात की उस खाली सड़क में जगह जगह कुत्ते भटक रहे थे । वो शायद इंसानों की गैर मौजूदगी से बौखलाए हुए थे । 

अलबत्ता हफ्ते में तकरीबन एक बार सब्जी वगैरह के लिए मैं अपनी इमारत से नीचे उतरता रहा हूं। टुथपिक, टिशू पेपर, सैनिटाइजर, मास्क से लैस होकर बाहर निकलता हूं । लिफ्ट के बटन छूते हुए डर लगता है । टुथपिक से बटन दबाता हूं । गेट तक की सड़क पर सूखे और पीले पत्तों के बिछावन बिछे हैं । गाड़ियों पर धूल जमी है । इक्का-दुक्का लोग दिखते हैं अजनबियों की तरह । दुकानों पर थोड़ी मानवीय हरकत रहती है । सब्जी वाला या और एक आध कमेरा जो दिखता है, उनकी देह भाषा में भय नहीं दिखता । खाते पीते लोगों की मानो सिट्टी-पिट्टी गुम है । उनमें भय ज्यादा व्याप्त है । हालांकि यह भी ध्यान में है कि बहुत से अनिवार्य सेवा वाले लोग नौकरियों पर जा रहे हैं, स्वास्थ्य कर्मी पुलिसकर्मी जान हथेली पर लिए घूम रहे हैं, पर हमें घरों में सिमटे रहने की ड्यूटी दी गई है । हम भय का पीपीई पहने हुए हैं । हमारे व्यक्तित्व की दूसरी परत है घरों में सकारात्मक बने रहने की जद्दोजहद, तरह-तरह के करतबों से सोशल मीडिया और खबरों से आने वाले संक्रमण से बचने की कबायद ।

हमारी सोसाइटी में व्हट्सएप के कई ग्रुप हैं, कुछ इन दिनों के खास इंतजाम के लिए और कुछ पुराने औपचारिक ।  यहां बीच-बीच में मस्ती का तेल चुपड़ने की हरकतें भी होती रहती हैं । हम तीनों को ही थोड़े-थोड़े वर्क फ्रॉम होम के होम में आहुति भी डालनी होती है। मन न पढ़ने-लिखने में लगता है, न काम में । ऊपर से अपराधबोध की पपड़ी भी खाल पर जमने लगती है । उस पर भी मस्त रहने का तेल चुपड़ना पड़ता है ।  नजरबंदी में स्वस्थ बने रहने की चुनौती भी है ।  बीमार पड़े तो कहीं डॉक्टर मिलने वाला नहीं ।  हमारे घर में सादा लेकिन स्वादिष्ट भोजन कराने का बीड़ा सुमनिका जी ने उठा रखा है ।  हर तरह की इंडल्जेंस लगभग बंद है ।  सामान जितना मिलता है उसी से काम चला रहे हैं । अपार जनसंख्या को जब बे-दर बे-घर होने के हृदय विदारक दृश्य देखते हैं, खबरें पढ़ते हैं तो अपने खाने-पीने, ओढ़ने-सोने पर अपराधबोध की गर्द जमती प्रतीत होती है । अपनी रहनी अय्याशी से कम नहीं लगती ।  अपने वर्ग में रहने की जकड़बंदी कम नहीं होती ।

ऐसे माहौल में कल बाइस अप्रैल का दिन बहुत हरकत भरा रहा ।  कल राशन वाले को सामान की सूची व्हट्सऐप से भेजी । दस बजे उसके यहां सामान लेने गया ।  कल ही सोसाइटी वालों ने एक सब्जी वाले को बुला लिया था ।  ग्यारह बजे के बाद उस लाइन में लगा ।  करीब ढाई घंटे बाद सब्जी खरीदने की मेरी बारी आई । हाउसिंग सोसाइटी के एक समूह ने आमों की सामूहिक खरीद का अभियान चलाया हुआ था । इसमें शामिल होने में थोड़ी मानसिक उलझन हो रही थी, कि सादा खाना खाओ ज्यादा स्वादों के पीछे न भागो, लेकिन अर्थशास्त्र के इस तर्क की ही विजय हुई कि किसानों की फसल बर्बाद हो जाएगी, उन्हें ग्राहक चाहिए । तो दो बजे के करीब उन आमों को लेने की वजह से फिर नीचे जाना पड़ा । उसके बाद संदेश आ गया कि शाम को सोसाइटी में एटीएम आ रहा है ।  यह पहली बार हो रहा था और पिछले डेढ़ महीने से जो नकदी घर में थी उसी से हम काम चला रहे थे ।  सोचा इस अवसर का भी लाभ उठा लेना चाहिए,  तो शाम सात बजे से आठ बजे तक फिर पंक्ति को दे दिया गया ।  मतलब यह कि करीब डेढ़ महीने बाद कल चार- पांच घंटे लाइनों में खड़े रहने की मशक्कत करनी पड़ी ।  पहले रोज लाइनों में खड़े नहीं होते थे लेकिन थोड़ी बहुत हरकत और आवाजाही तो होती थी । ऊपर से कल धूप में मुंह पर जुंगला बांधे हुए खड़े रहना पड़ा।  

हमारी बेटी नियम की बहुत पक्की है ।  मुझे बाहर से लौटने पर हर बार नहाना पड़ता है, कपड़े बदलने पड़ते हैं । कल चार जोड़ी कपड़े धोने पड़े ।  कितना पानी उसमें बहा होगा ।  शाम तक मेरी पींबोल गई । वरिष्ठता की देहरी पार कर ली है, इकसठ का हो गया हूं, जिस्मानी मेहनत की आदत भी नहीं है, जाहिर है रात तक बुरी तरह थक गया ।   पर उस थकने से तुलना करने का अपराध कभी कर ही नहीं सकता जो हजारों किलोमीटर चलकर अपने घरों को गए,  जो मानो पिछले सत्तर साल से चलते रहे और हमें दिखे ही नहीं ।  उनसे भी तुलना करना मुनासिब नहीं जो इस महामारी से लड़ने के लिए दिन-रात जुटे हुए हैं ।  उन सबकी थकान के सामने यह थकना भी कोई थकना है लल्लू!

Sunday, April 1, 2018

गांधीगिरी



लगे रहो मुन्‍ना भाई फिल्‍म 2006 में आई थी। उसके बाद गांधीवाद को गांधीगिरी नाम मिला और उछाल में भी रहा। यह भी लगा कि सामाजिक आंदोलनों की शुरुआत फिल्‍मों से भी हो सकती है। 
लेकिन जल्‍दी ही इस अवधारणा की हवा निकल गई। 
12 साल बाद इस समीक्षा पर नजर डाली जाए तो महसूस होता है कि माहौल काफी बदल गया है। 
गांधी कहीं गहरे भारतीय चित्‍त में तो बैठा प्रतीत होता है 
लेकिन इस समय गांधी विरोध की हवा फैलाने की कोशिशें भी लगातार हो रही हैं।




लगे रहो मुन्ना भाई गांधीगिरी के लिए चर्चा में आ गई है। फिल्में आम तौर पर नौजवानों को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। क्योंकि सबसे ज्यादा दर्शक इसी वर्ग से मिलता है। फिल्म का हिट होना या पिट जाना युवावर्ग की पसंद से ही तय होता है। गांधीवाद जैसे पिटे हुए विचार को इस फिल्म ने हिट बना दिया है। गांधीवाद की अंहिसा और असहयोग अचानक परिवर्तन के हथियार बन गए हैं। पिछले कुछ बरसों में ये हथियार म्यूजियम में रख दिए गए थे। खादी, चरखा, सत्य, अहिंसा असहयोग आदि  किताबी किस्म की बातें हो चुकी थीं। इनका मजाक उड़ाया जाता था।  प्रदर्शनी लगाई जाती थी। इन्हें राजनीति में इस्तेमाल किया जाता था।

गांधीगिरी शब्द को दादागिरी के वरक्स खड़ा करने से मानो गांधीवाद को नवजीवन मिल गया है। वह भी फिल्म जैसे लोकप्रिय माध्यम के जरिए। फिल्म में गांधीगिरी संजय दत्त करता है, जिसका अपना एक पेचीदा इतिहास है। पिता अभिनेता के साथ साथ सच्ची किस्म का नेता रहा है। खुद संजू बाबा टाडा में हथियार रखने का आरोपी रहा है, अपनी लतों के कारण भी खबरों में रहा है। पर इसके साथ साथ संजय दत्त लोकप्रिय स्टार भी बना हुआ है। मुन्ना भाई एमबीबीएस ने इस गांधीगिरी की जैसे नींव रख दी थी। उस फिल्म में मानववाद की एक धारा बहती रहती है, जो नौकरशाही और निर्मम मेडिकल साइंस की कली खोलती है, रिश्तों को और प्रेम को महत्व देती है। समाज के प्रति समभाव भी उसमें बना रहता है। यह सब मसाला फिल्मों के स्टाइल में होता है।  अपने मानववाद के कारण ही शायद यह फिल्म हिट हुई थी।

लगे रहो मुन्ना भाई में गांधीवाद पर अमल करके दिखा दिया गया है। इससे भ्रष्टाचार का सामना किया जाता है, सच्चाई का महत्व पता चलता है। हृदय परिवर्तन भी हो जाता है। यह अलग बात है कि फिल्म इन सिद्धांतों का प्रयोग अपनी सुविधा से करती है। जैसे नायक का गांधी से परिचय ही प्रेमिका से मिलने की जुगत भिड़ाने के लिए होता है। गांधी से जुड़े सवालों का जवाब देने के लिए भाड़े के प्रोफैसरों को लाने वाला सीन काफी विडम्बनापूर्ण है, लेकिन सच्चा है। मजेदार बात यह है कि इस गांधीगिरी का प्रयोग मुंबई का एक भाई कर रहा है जिसका पेशा दादागिरी करना है। यह भाई धीरे-धीरे गांधी के प्रभाव में आता जाता है।

नौजवान पीढ़ी को लगता है कि इस अस्त्र का इस्तेमाल किया जा सकता है। सत्य, शांति, अहिंसा, असहयोग वगैरह उसे अचानक आकर्षक औजार लगने लगे हैं।

इसी तरह रंग दे बसंती भी नौजवान पीढ़ी में खासी लोकप्रिय हुई है। वह फिल्म इसके बिल्कुल उलट है। वह आजादी के क्रांतिकारियों को याद करती है। उस समय और इस समय की जक्स्टापोजीशन उस फिल्म को मार्मिक और प्रामाणिक बनाती है। वह नौजवान पीढ़ी के सरोकारों को छूती है। पर हिंसा का रास्ता चुनती है। गुस्सा तो आज हर कहीं उबल ही रहा है। आंदोलनों की कमी गुस्से को दिशा नहीं दे पाती। मध्यवर्ग की बेहतर बनने की दौड़ और होड़ उसे अपने से बाहर सोचने नहीं देती। जीवन में शाùर्टकट उसे और भी आत्म केंद्रित और हड़बड़िया बनाते हैं। सब कुछ बहुत जल्दी और ज्यादा मिल जाए। अगर गृहस्थी चला रहे बाप और पढ़ाई कर रहे बेटे दोनों के मकसद इसी तरह के हों तो बड़े सपने नहीं देखे जा सकते। गुस्सा रोजमर्रा के जीवन से है, मतलब प्रशासन, सिस्टम, सरकार आदि के खोट  नजर आते हैं। निजी तरक्की में जब ये चीजें बाधा बनती हैं, तभी आदमी को गुस्सा आता है। मिलों के बंद होने पर, किसानों के आत्महत्या करने पर, सूखे बाढ़ से होने वाली तबाही पर, कालाहांडी पर गुस्सा नहीं आता। भुक्तभोगी को गुस्सा आता है, पर वो बेबसी में बदल जाता है। हमारे समय में एम्पेथी या समानुभूति के जज्बे को पाला मार गया है।  मुन्नाभाई को गांधीगिरी की जरूरत अपनी प्रेमिका को पाने के लिए पड़ती है। रंग दे बसंती में क्रांति अपने मित्र की दुर्घटना में हुई मृत्यु के बाद जन्म लेती है।

इन दोनों फिल्मों में मीडिया की विशेष भूमिका है। खास तौर से रेडियो का इस्तेमाल पुनर्जागरण की तरह होता है। परिवर्तन की दुंधुवी एफएम रेडियो से बजती है। ध्यान देने की बात है कि यह माध्यम खालिस युवा वर्ग का है। मुन्ना गांधीगिरी के नुस्खे रेडियो पर सुनाता है। जनता मानो आपस में जुड़ जाती है। रंग दे बसंती में भी सारा देश रेडियो से चिपक जाता है और क्रांतिकारियों से सवाल जवाब करता है। मीडिया का प्रयोग यह दिल है हिंदुस्तानी और नायक जैसी फिल्मों में पहले भी हुआ है लेकिन उनके पास विचारधारा नहीं थी। यहां गांधीवाद और इन्कलाब की जांची परखी विचारधाराएं नए अवतार में सामने आती हैं।

 ये फिल्में विरोध को एक रूप देने लगी हैं। मुन्नाभाई की सफलता के बाद गांधीगिरी को बढ़ावा देने के लिए कई मंच सामने आने लगे हैं। इंटरनेट पर भी इस विचार को फैलाया जा रहा है। कुछ युवकों ने एक थप्पड़ खाकर दूसरा गाल आगे करने के नुस्खे आजमाने शुरु कर दिए हैं। जैसे, प्रसिद्ध हास्य कलाकार राजू श्रीवास्तव कहता है कि मजाक - मजाक में बहुत लोग आ गए, मजाक मजाक में गांधी बापू फिर से लोकप्रिय हो गए।


गांधी के इस अवतार से यह भी पता चलता है कि विरोध के हमारे तरीके पुराने पड़ चुके हैं। जुलूस, हड़ताल, पोस्टर, जैसे माध्यम अब नकारा साबित हो जाते हैं। बदलते वक्त के साथ लोग विरोध और प्रतिरोध के नए नए तरीके तलाश कर रहे हैं। जैसे आंदोलनों की बागडोर अब लगभग एनजीओं के हाथ में चली गई है। अब इसका जज्बा बदल गया है। असल में अब दुनिया भी बदल गई है। दुश्मन भी पहले से कहीं ज्यादा जटिल, कुटिल, खल और कामी हो गया है। वह लुभाता भी है, भुनाता भी है और विषदंत  भी गड़ाता है। गांधी का नया अवतार मध्यमवर्ग को एक नए, लुभावने लेकिन कारगर हथियार के रूप मे वरदान की तरह मिला है। भले ही छोटी छोटी निजी  लड़ाइयों के लिए ही सही, उस सिंगल हड्डी आदमी की कीमत पहचानी तो जाने लगी है।