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Tuesday, August 30, 2022

रमेश कुंतल मेघ की चिट्ठियां

 

मेघ जी अपने छात्रों के साथ:
बाएं से-जगदीश मिन्हास, सुमनिका सेठी, मेघ जी, नीलम मित्तू, राकेश वत्स
 

जब मुझे गुरु नानक देव विश्वविद्यालय में एम. फिल. में दाखिला मिला तब रमेश कुंतल मेघ वहां हिन्दी विभागाध्यक्ष थेा। धर्मशाला कालेज से एम. ए. करने के बाद अपने प्रदेश के विश्वविद्यालय शिमला नहीं गया, बल्कि अमृतसर गया। सबसे बड़ी वजह रमेश कुंतल मेघ ही थे। दूसरे, हमारे कालेज के प्राघ्यापक ओम अवस्थी धर्मशाला कालेज छोड़कर मेघ जी के पास आ गए थे। कालेज में ओम अवस्थी जी से अपार स्नेह मिला था। अमृतसर आकर मेघ जी से भी बहुत अपनापन मिला। हालांकि उनकी विद्वता का आतंक भी कम न था। उनका स्नेह आज तक मिल रहा है। मेरे पास उनकी कुछ चिट्ठियां हैं। जब बनास जन का मेघ अंक तैयार होने लगा तो वे चिट्ठियां बाहर निकलीं। मैं मुंबई में आकाशवाणी में 1983 में आ गया था। और पहली चिट्ठी 1986 की है। अभी यहां दो चिट्ठियां दे रहा हूं। 


9-8-1986

डॉ. रमेश कुंतल मेघ    

प्रोफेसर – अध्यक्ष

ए-5, यूनिवर्सिटी कैंपस, अमृतसर – 143005                                                                             

प्रियवर,

‘‘मधुमती’’ (उदयपुर) के ताजे अगस्त 1986 के अंक में तुम्हारी नास्टेलजिक किंतु प्यारी कविता पढ़कर खुशी हुई। यूं भी अब लेखन की समझदारी तथा साहित्यिकता के सरोकार से दिन-ब-दिन गुत्थमगुत्था होते जा रहे हैं – जो कि अच्छा शकुन है।

            यहां यूजीसी की दक्षता-व-प्रोन्नति वाली संयोजना के अंतर्गत मई माह में दो लेक्चरर (डॉ. हरमोहन लाल सूद तथा डा. विनोद तनेजा) रीडर हो गए हैं तथा एक रीडर प्रोफेसर हो गया है। प्रोफेसरों के बीच चक्रमण-प्रणाली (रोटेशन सिस्टम) पहले से ही लागू थी। अत: अब डॉ. पांडेय शशि भूषण प्रसाद श्रीवास्तव शीतांशु प्रोफेसर-और-अध्यक्ष हो गए हैं छै जून से (वे तीन वर्ष तक अर्थात पांच जून 1989 तक इस पदभार को वजनी बनाए रखेंगे। ... जगदीश सिंह मन्हास ... आजकल सुदक्ष बेरोजगारों की कतार में खड़ा है। उधर श्री राकेश वत्स छात्रवृत्ति छोड़कर जनवरी-फरवरी में ही चले गए। वे कहां हैं, क्या कर रहे हैं, कैसे बसर कर रहे हैं – कुछ पता नहीं है। संभवत: यदि तुमसे उनका पत्राचार हो तो उन्हें प्रेरित करो – शोध पूरा करने के लिए : तथा संभव हो तो अपने आसपास कहीं कोई समुचित काम दिलवा दो।

            यहां अवस्थी जी ठीक हैं। उम्र ऐसी है हम सभी की, कि कुछ लाभों के लिए समझौतों का बीमा (LIC) भी गुपचुप करते चलते हैं। घर में सब ठीक ठाक है।

पत्रोत्तर तो दोगे ही, शायद।

नीलम शर्मा इसी माह अपनी थीसिस जमा कर सकेंगी, ऐसा विश्वास है।

शुभाकांक्षी

तुम्हारा –

रमेश कुंतल मेघ (हस्ताक्षर)

पुनश्च: अप्रैल के अंत में मैं महाराष्ट्र जनवादी लेखक संघ के अधिवेशन में शामिल होने दो दिन के लिए बंबई आया था। दूरी और व्यस्तता के कारण तुमसे भेंट नहीं कर सका।    

 

12/09/1988

प्रिय अनूप,

आपका कार्ड पत्र मिला था। जिन संस्कृतियों में ज्ञानधारा प्रवहमान नहीं होती अर्थात् जहाँ निरंतर संवाद और अनवरत पोलेमिक्स के बजाय विद्वानों तथा कलाकारों को ईर्ष्या और घृणा लोभ के साँप डँसते हैं वहां विचारों का इतिहास नहीं लिखा जा सकता। हिन्दी साहित्य के आधुनिक संदर्भ ऐसे ही हैं।

आप तो बंबई में ऐसे रमे हैं कि धर्मशाला आते-जाते होंगे किंतु सालों से अमृतसर की ओर मुँह उठाकर कभी नहीं झाँका। एकाध बार इधर भी आ जाएँ। आपको हम कभी नहीं भूल सकेंगे। आपकी स्थायी छाप हमारे हृदय-पटल पर रहेगी। इसे अतिशयोक्ति न मानें।

राकेश वत्स दिल्ली में इंदिरा गांधी खुले वि. वि. में आ गए हैं। अब उन्हें मन की जगह तथा मन का काम मिल गया है।

जगदीश सिंह मन्हास अंडमान के गवर्नमेंट कॉलेज में लेक्चरर होकर 1986 में चले गए थे। अब दिसंबर 1988 में शादी करवा रहे हैं। सुमनिका का काम चल रहा है।

डॉ. अवस्थी ठीक हैं। शुभ्रा ने M.B.A. का कोर्स ले लिया है, अमित हमीरपुर के गवर्नमेंट कॉलेज में नियुक्त हैं (अवस्थी जी की पुत्री और पुत्र)।

शेष मिलने पर।

पत्रोत्तर देंगे।

आपका

रमेश कुंतल मेघ (हस्ताक्षर)         

Tuesday, March 12, 2013

बचपन की कुछ यादें और


कुछ अर्सा पहले मैंने अपने बचपन की कुछ यादें यहां पर आपके साथ साझा की थीं. उन्‍हें पढ़कर हिमाचल के ठियोग केहमारे मित्र और कवि मोहन साहिल इतने उद्वेलित हो उठे कि टिप्‍पणी लिखते लिखते अपने बचपन की गलियों में ही खो गए. अपनी बात कहने की मस्‍तीऔर जल्‍दबाजी के साथ यह मेल उन्‍होंने मुझे भेजी. आप भी पढ़िए. ठियोग में बर्फ के ये फोटो भी मोहन ने भेजे हैं. आजकल मुंबई में जिस तरह से गर्मी पड़ रही है, यह दृश्‍य आंखों के रास्‍ते राहत पहुंचाते हैं.
 
आपके ब्लाग में जब आपके बचपन की कुछ यादें पढीं तो रहा नहीं गया. महान व्यक्ति न होते हुए भी मेरे जन्म को लेकर विवाद है. मां कहती थीं कि हम शिमला के स्नोडन अस्पताल में जिस दिन पैदा हुए उस दिन लोहड़ी थी और उन्होंने इसका पता ऐसे लगाया कि हमारे पैदा होने के बाद जब उन्हें होश आया और उन्हें बहुत भूख लगी , दया कर किसी साथ के बिस्तर की महिला के घर से लाई खिचड़ी (जो लोहड़ी पर बनती है) उन्हें दी गई थी. वे यह भी कहती थीं कि 1963 की उन सर्दियों में बहुत बर्फ पड़ी थी और ठियोग से हमारे बड़े भाई जब कई दिनों बाद शिमला अस्पताल पहुंचे तो वे बाजार से 2 ब्रेड लाए जिन्हें मां एक साथ दूध के साथ खा गई थीं. उनका कहना था कि वे बहुत भूखी थीं और मुझ आठवें बच्चे को पिलाने के लिए उनके पास दूध नहीं था. जिसकी कहानी ही भूख से शुरू हुई हो तो यह भी जान लीजिए कि जन्म टिपड़ा आदि कौन बनाएगा. हांलाकि मां मुझे यह दिलासा कई बार देती थीं कि मेरे जन्म का पूर्वानुमान एक बाबा यह कह कर लगा गए थे कि हे देवी तुम्हारे घर में अभी मोतीराम नाम का बालक आठवें बच्चे के रूप में आएगा. मुझसे बड़ी एक बहन ने जब स्कूल में भर्ती करवाया तो नाम के साथ आठ फरवरी जन्म तिथि लिखवा दी. लेकिन बाबा का यह वरदान मेरे लिए शाप था. 

मैं ऐसे घर में पैदा हुआ जहां पहले से आए लोगों की हालत भी ठीक नही थी. वैसे तो हम पांच भाईयों ने जैसा बचपन बिताया वैसा इस पहाड़ी इलाके में बहुत से बच्चे बिताते थे लेकिन शायद हमारी हालत आठ भाई बहन होने और पिता के गुजर जाने के बाद काफी खराब हो गई थी. मैं पिता के जाने के समय 6 साल का था और मुझे याद है कि पिता को ठियोग कस्बे में उनकी दूकान के बाहर जब नहलाया जा रहा था तो मुझे बड़ा कौतूहल हो रहा था. मुझे कई दिनों बाद समझ आया था कि अब ठियोग में न हमारी दूकान है न पिता. 

मेरे पास स्कूल जाने के समय तक पाजामा मलेशिए के कपड़े का होता था. उस समय आटे की थैलियां भी इसी कपड़े की होती थीं. बाद में वर्दी के लिए बड़े भाई जो पीडब्लयूडी में मजदूर थे ने मेरे लिए खाकी कपड़े का पाजामा बनवाया जो वर्दी भी थी, और नीली कमीज. हमारे पास बिस्तर के नाम पर बोरियों या पुराने कपड़ों की खिंदे होतीं थीं. बर्फ के दिनों में एक बड़ा भाई और मुझसे कुछ ही बड़े दो भाई चमड़े या रबड़ के डकबैक बूटों के उपर टांगों पर बोरियां लपेटकर फागू और कुफरी के बेहद सर्द इलाकों में एनएच22 पर बर्फ हटाने जाते थे. उस समय एक भाई 15 साल और एक 17 साल का था. उन्हें दो रुपए दिहाड़ी मिलती थी, वे शाम को कई बार मुंगफली और गुड़ लाते जिसे हम चाव से खाते. उस समय बिजली नहीं थी. बिजली हमारे गांव में 1972 में आई. सब भाई एक ही बिस्तर में सोते. मैं मां के साथ सोता, मुझे रात में पेशाब करने की आदत थी, जिस कारण सर्दियों में मां बिस्‍तर गीला होने के बावजूद मुझे कुछ नहीं कहतीं, सुबह बिस्तर सुखाए जाते. 


मेरी बड़ी बहन मुझे पीठ पर उठाकर दो मील दूर सबसे बड़े भाई को दोपहर में रोटी देने जाते. वे वहां नई सड़क के काम पर होते. एक बार रास्ते में ही थे कि जबरदस्त ओले पड़ने लगे. बहन ने मुझे पीठ से उतारा और अपने शरीर की ओट में लेकर बचाया. इस दौरान उसे कई ओले कानों और सिर पर जोर से लगे. हम दोनों भाई बहनों का काम पड़ोसियों से कभी छाछ कभी आलू कभी आटा या और कोई चीज मांगना या उधार मांगना था जो हमें बुरा लगता था, लेकिन और कोई चारा भी नहीं था. गांव के लाला से उधार सामान लाने भी हम ही जाते. कई बार झिड़के भी जाते. 

कंचे मेरा प्रिय खेल था क्रिकेट भी. गांव का एक सूखा तालाब हमें शाम तक धूल से धूसरित कर देता था.
जिन दिनों पिता के साथ ठियोग में रहते थे हमारे पास एक कुत्ता था जिसका नाम जीपू था; पिता के मरने के दूसरे दिन ही हम भेखलटी अपने गांव आ गए. ट्रक में सामान के साथ जीपू भी पीछे था. जब उसे उतारने लगे तो जीपू की एक टांग डाले में फंस कर टूट गई. बडे़ भाई और बहन कई दिन जीपू का ईलाज करते रहे. उस पर छांबर लगाते, उसे सेक देते लेकिन उसकी एक टांग हमेशा के लिए टेढ़ी हो गई. उन बेहद दुख के दिनों में जीपू हमारे लिए मन बहलाने का साधन और परिवार का सदस्य जैसा था. कई साल तक वह रहा....जब मरा तो सभी बहुत रोए थे, खासकर मुझे उससे बड़ा लगाव था. 

हमारे लिए वह दिन बड़ा खुशियों से भरा था जब एक बार गांव से कुछ दूर सड़क से गुजर रहे फौजियों के एक ट्रक से एक तंबू गिर गया. वह तंबू मेरे भाईयों को मिला, जिसकी मां ने कई खिंदें बनाईं और उस साल ही नहीं, बाद के भी कई साल बर्फ के दिन आराम से गुजरे. 

हमारें मामा जी जालंधर में बस स्टैंड के पास रहते थे. कई कई सालों के बाद मां सर्दियों के दिनों में जालंधर जातीं तो छोटा होने के कारण मुझे साथ ले जातीं. जाने के लिए किराया भी मामा ही भेजा करते. बस का वह सफर बड़ा मजेदार रहता. हमें बड़ा भाई छोड़ने जाता तो वही होता जो सभी बच्चों के साथ होता है. बस चलने को होती और भाई बाहर. मैं चिल्ला कर बुलाने लगाता मां भी परेशान हो उठती और भाई के लौट आने पर उन्हें डांटती. दो महीने के बाद जब हम वापिस लौटते तो मामा नए पुराने कपड़े देते. वे कपड़े पहन कर स्कूल जाते तो अकड़ कर. लेकिन ऐसा कई सालों में कभी कभी ही होता. बाकि समय तो वहीं मलेशिया या खद्दर पहनने को मिलता. या गांव में माड़ू राम के हाथों के चमड़े के जूते जो पांव खा जाते थे और हम रो भी नहीं पाते. वैसे ज़ूते भी काफी समय के बाद ही मिले थे. 

घर का खर्च मुश्किल से चलता लेकिन मजा बहुत आता. बड़े भाई और हम तीन भाईयों के बीच आयु में काफी अन्तर था. एक भाई बाहर ही रहता था. दो बहनों का विवाह मेरे जन्म से पहले ही हो गया था और एक बहन हमारे साथ रहती. हम सब बड़े भैया से डरते थे. वे पिता का स्थान ले चुके थे. उन्हीं से सारी मांगे, शिकायतें होतीं, उन्हीं से दिवाली, होली, लोहड़ी, शिवरात्रि‍ सभी त्यौहारों पर उम्मीदें रहतीं. ठियोग का सबसें बड़ा त्योहार 15 अगस्त का मेला था जिसे देखने ब्‍याही हुई बहनें भी आ जातीं. उनके साथ उनके पति और बच्चे भी आते. हम उन दिनों में मेहमानों से छिपते रहते। न अच्छे कपड़े होते न ढंग से बाल कटे होते. और भी कमियां महसूस होतीं जिस कारण संकोच रहता. उन दिनों में हम सब और एकजुट हो जाते, घर की सफाई, अच्छा खाना बनाना आदि सब कुछ मिलकर करते. मां का साथ देने को आतुर रहते. 

जब मैं तीसरी कक्षा में था तो भाई एक पुराना रेडियो किश्‍तों पर खरीदकर लाए, उस समय भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध चल रहा था और बाद में हम पाकिस्तान के बन्दी फौजियों के संदेश अपने परिजनों के नाम ऑलइंडिया रेडियों से सुनते थे. विविध भारती में अमीन सायनी का कार्यक्रम बड़े भाई सुनते. बर्फ के दिनों में क्रिकेट की कमेंटरी भी खूब सुनी जाती. पूरे गांव में एक ही रेडियो था, तो कई बार पडौ़सी मांग कर ले जाते. हम पड़ौसियों से खूब लड़ते. कई बार हमारी पिटाई भी हो जाती. बड़े भैया के घर आने पर रेडियो को कोई छू नहीं सकता था और हम उनके सोने के बाद ही चुपचाप रेडियो सुनते.

स्कूल में भी हमारी हालत ऐसी थी कि अध्यापक हम पर रहम करते. हांलाकि पढ़ने में मैं होशियार था और पहली से ही प्रथम आता रहा. इसका कारण क्या था मैं नहीं जानता क्योंकि हमारी कक्षा का सबसे अमीर सहपाठी फिर भी मुझसे अधिक अकड़ा हुआ और अध्यापकों का प्रिय रहता था..... 

सोच रहा हूं कि लिखता गया तो लिखता ही चला जाउंगा. आज चार दिनों बाद बिजली आई तो आधी रात के बाद ही लिखने बैठ गया... 

बाकी कभी बाद में लिखूंगा... स्कूल के बाद का बचपन दिल्ली के फुटपाथों पर कैसे बीता...

Sunday, October 25, 2009

वर्तमान के सिरे

कुल्लू (हिमाचल प्रदेश) से पत्रिका शुरू‍ हुई है, असिक्नी।
सपांदकों
को मैंने प्रतिक्रिया लिखी।
इधर कथादेश में बद्रीनारायण का साहित् का वर्तमान लेख छपा।
बात को आगे बढ़ाने के लिए मैंने यह पत्र कथादेश को भेजा जो अक्तूबर अंक में छपा है।
मित्रों का आग्रह है कि उस पत्र को मैं यहां भी रखूं।
कथादेश में छपी पूर्वपीठिका सहित यह पत्र आपके लिए पेश है.




जुलाई के कथादेश में बद्री नारायण का लेख साहित्यिक दुनिया का वर्तमान छपा है। यह साहित्य में सत्ता के संस्तरों की छानबीन करता है, भारत जैसे बहुस्तरीय और बहुपरतीय देश में साहित्य की अंतर्धाराओं की नब्ज पकड़ता है। इस लेख से एक विमर्श की शुरुआत होती लगती है। मैंने पिछले वर्ष एक नई पत्रिका के प्रवेशांक पर संपादकों को अपनी प्रतिक्रिया लिखी थी। यह पत्रिका कुल्लू से शुरू हुई है। यह हिमाचल प्रदेश के रोहतांग दर्रे के पार लाहुल स्पिति जिले के केलंग शहर की एक संस्था की पत्रिका है। यूं तो लाहुल स्पिति जिले का मुख्यालय केलंग है पर लोगों का व्यावहारिक मुख्यालय कुल्लू ही है। कुल्लू मनाली भाई भगिनी नगर हैं, पर्यटकों के पसंदीदा ठिकाने। यह पत्रिका इसी कुल्लू से प्रकाशित हुई है। अत्यंत दुर्गम क्षेत्र की यह पहल हिंदी साहित्य के लिए एक घटना होनी चाहिए थी। लेकिन मुख्य-धारा की साहित्यिक गहमा-गहमी अपने में ही इतनी रमी हुई है कि उसे अपने से बाहर कुछ भी नहीं दिखता। तथाकथित परिधि के बाहर की गतिविधियां जाने-अनजाने अन-नोटिस्ड रह जाती हैं। मैंने अपने पत्र में इसी तरह की आशंका-आकांक्षा- आवश्यकता से जुड़े मुद्दों को उठाया था। बद्री नारायण के लेख के बाद लगा, मैं भी प्रकारांतर से इसी तरह की बात सामने रख रहा था। यह पत्र यहां प्रस्तुत है। उम्मीद है इससे बात आगे बढ़ेगी।

मार्च 2008

प्रिय निरंजन और अजेय,

यह पत्र असिक्नी के हवाले से लिख रहा हूं इसलिए दोनों को संबोधित कर रहा हूं।


मेरे बचपन का कुछ समय केलंग और कुल्लू में बीता है इसलिए उन जगहों की ललक हमेशा बनी रहती है। वहां की हर चीज़ का माने भी मेरे लिए अलग है। यह एक अलग रोमानी दुनिया है। असिक्नी उसी दुनिया में से निकल कर मेरे सामने नमूदार होती है। इसलिए इसका स्पर्श ही अलग है। जब मैंने जाना कि पत्रिका का नाम चंद्रभागा नदी का वैदिककालीन नाम है तो यह रिश्ता एक आद्यबिंब में बदल गया जो सहस्रों वर्ष बाद जीवित हो उठा है। या सहस्र वर्ष बाद भी चला आता है और मेरा समकालीन होकर मरे पास आता है। काल को अखंड करता हुआ।

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हमारे एक मित्र जब भी इधर की कविता सुनते, कहते कि हां मेनस्ट्रीम कविता जैसी है। उनकी इच्छा कुछ अलग तरह की कविता सुनने की रहती थी। इस प्रसंग का असिक्नी से इतना ही संबंध है कि कुछ वर्ष पहले तक हिमाचल एक अलग-थलग पड़ा क्षेत्र ही था। कला और साहित्य में या तो दबा-ढंका लोक था या सरकारी पन्नी में लिपटा खेल-तमाशा था या स्थानीयता के बोझ तले दबा लेखक था जो बार-बार दिल्ली तक दौड़ लगाता था। और दिल्ली तो हमेशा से दूर रही है।


पहले साहित्य के गढ़ हुआ करते थे। जैसे इलाहाबाद बहुत बरस रहा। गढ़ बड़े साहित्यकार के कारण भी हुआ करते थे। (ये दरबार नहीं होते थे) प्रसाद हों, निराला हों, दिनकर हों, आचार्य द्विवेदी हों या रेणु हों। फिर गढ़ लगभग ढह गए। सिर्फ दिल्ली बच गई। साहित्य दिल्ली-केंद्रित हो गया। साहित्यकारों ने दिल्ली को दौड़ लगा दीý


इससे एक तरह का टाइपीफिकेशन हुआ। श्रेष्ठताग्रंथी पनपी। जो दिल्ली से दूर थे, उन्हें शहर बाहर ही रखा गया। जो बाहर रह गए उनमें हीनता की गांठ बनी। प्रकाशन और पुरस्कार श्रेष्ठता की जीन काठी हैं। यह साजो-सामान दिल्ली में बनता है। हर कोई दिल्ली में छपना चाहता है। हर कोई दिल्ली में और दिल्ली से पुरस्कृत होना चाहता है। हर कोई दिल्ली से मान्यता चाहता है


जो दिल्ली सरीखा नहीं हो सकता वह पिछड़ जाता है और क्षेत्रीयता या स्थानीयता के खाते में जा गिरता है


यह मेनस्ट्रीम साहित्य का बैकड्रॉप हैý


वास्तव में देखा जाए तो यह ड्रॉबैक है


साहित्य तो इसके बाहर भी है। पर वह परिधि पर रह जाता है। दिल्ली खुद को केंद्र में रखकर परिधियां बनाती है। पिछले साल नया ज्ञानोदय में भगवत रावत की दिल्ली पर छपी लंबी कविता पर परमानंद श्रीवास्तव ने परिधियों की चर्चा की भी है। भूमंडलीकरण और बाजारवाद और परापूंजी के जिस दौर में हम रह रहे हैं, कहते हैं उसकी एक विशेषता है या कहना चाहिए स्वभाव है कि उसमें केंद्र टूटते हैं। सबसे ज्यादा तो बाजार ही केंद्रों को तोड़ेगा। नए केंद्र बनाएगा। मतलब नई परिधियां होंगी। आम आदमी की बहुत मिट्टी पलीद होगी, पर पूंजी का खेल उसे पेर-पेर कर लुगदी में बदल कर नए सिरे से प्लाइवुड की तरह सीधा समतल कर देगा। स्थानीयताओं के लिए यही खतरा है। जो बरमूढ़ा बरमिंघम में पहना जाता है, वही मेरे पुश्तैनी गांव दरवैली में चलेगाý


असिक्नी एक तरफ दिल्ली का दामन पकड़ती है। यह पकड़ पत्रिका को समकालीन बनाती है। दूसरी तरफ असिक्नी लाहुल और कुल्लू और हिमाचल के जन-जीवन को समकालीनता के बरक्स रखती है। आज के परिदृश्य में ये दोनों ही पंख पत्रिका को संतुलित बनाते हैं। या तो दिल्ली को साथ ले के चलिए या दिल्ली के पीछे चलिए, दिल्ली को नज़रअंदाज़ करके नहीं चल सकते। इसे पत्रिका की कमज़ोरी न समझा जाए। यह यथास्थिति है। पत्रिका नए केंद्र बनने की स्थापना को भी पुष्ट करती है। जिस स्तर की सामग्री हमें लखनऊ से या पटना से या भोपाल से छपने वाली पत्रिका में मिलती है, उसी स्तर की सामग्री असिक्नी में मिलती है। यही वजह है कि साहित्यिक नक्शे में हिमाचल और कुल्लू और लाहुल दिल्ली से कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा हो जाता है। इससे स्थानीयता का हीनताबोध काफी हद तक छनता है।

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पत्रिका के लिए कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा होने के लिए एक और दृष्टिकोण मुझे ज़रूरी लगता है। समकालीन विमर्श करना आवश्यक है। उसका विहंगम होना, सांगोपांग होना और भी आवश्यक है। हमारे समय को प्रौद्योगिकी ने काफी हद तक 'सीमलेस' (बे-जोड़) कर दिया है। अजेय से रोहतांग पार फोन पर बात हो जाती है। मेल उन तक पहुंच जाती है। यह कम चमत्कारी बात नहीं है‎‎। इन्फ्रास्ट्रक्चर पहले से बेहतर हुआ है। कल्पना कीजिए बीस साल पहले दिल्ली पहुंचने में कितनी देर लगती थी। और अब? विदेशों से आवाजाही में भी आसानी हुई है। समाचार कितनी तेज़ी से हम तक पहुंच जाते हैं। मतलब मनुष्य और विचार के आवागमन की गति बढ़ी है। यह अलग बात है कि मनुष्य के संकट भी उसी अनुपात में बढ़े हैं। या कहें बदले हैं। विचार में नयापन है या नहीं; विचार विचारोत्तेजक है या नहीं; विचार और मनुष्य का आचार मनुष्य-हितैषी है या नहीं; यह विचारणीय प्रश्न है। पूंजीवाद और नवसाम्राज्यवाद और परापूंजी का दबदबा है। हर चीज़ में जल्दबाज़ी है, बदहवासी है, हड़प जाने की लोलुपता है। विकास की कीमत इस रूप में चुकानी पड़ रही है। पर यह शायद पैकेज डील है। और हमारे पास इस डील को नकारने का विकल्प नहीं हैý


यह सब मुंबई में हो रहा है। दिल्ली में, न्यूयॉर्क में, बीज़िंग में, शिमला में, कुल्लू में, दार्जलिंग में, मतलब हर कहीं कमोबेश एक ही तरह से हो रहा है। दबाव तकरीबन एक ही जैसे हैं। नॉम चॉम्स्की अमरीकी विदेश नीति की आलोचना करते हैं, तो उनके विचार छनकर बरास्ता 'पहल' हमें भी मिल जाते हैं। अरुंधती रॉय एक्टिविज्म का रास्ता अख्तियार करती हैं। यह बात वह अमरीका में कहती हैं। बांग्लादेश का ग्रामीण बैंक सबका ध्यान खींचता है‎‎। हेराल्ड पिंटर नोबल पुरस्कार लेते समय नोबल समिति के कान खींचता है। अमर्त्य सेन फ्रांसिसी सरकार का आर्थिक सलाहकार बनता है। विचार के हल्के में हो रही हरकत भी हम तक पहुंच रही है। यह क्रिकेट और बॉलीवुड और डब होकर आ रहे हॉलीवुड की तुलना में ज़रूर कम है। पर मैं बात यह कहना चाह रहा हूं कि सारी दुनिया की इस तेज़ हरकत के बीच हम भी हैं। हम परिधि से बाहर नहीं हैं। इस परिवर्तन से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। यही शायद ग्लोबलाइजेशन का मूर्त रूप है। वैश्विक गांव


लेकिन इस वैश्विक गांव में संस्तर खत्म हो गए हैं या समानता आ गई है‎‎? जाहिर है ऐसा नहीं है। बल्कि गलाकाट प्रतियोगिता है और अपनी सीढ़ी से ऊपर फलांगने की होड़ है। सब जानते हैं कि ऊपर की सीढ़ियों पर जगह कम होती जाती है शिखर पर तो एक ही जगह होती है। समृद्धि के घेरे में कम आ रहे हैं, बाहर ज्यादा लोग छिटक रहे हैं। गरीब देशों के साथ ऐसा ज्यादा हो रहा हैý


इस बाहरी परिदृश्य के साथ साथ मनुष्य की भीतरी उथल-पुथल भी बहुत है। बहुत खदबदाहट है। व्यक्तिगत जीवन शैली और सामूहिक लोकाचार के ढांचे तेज़ी से बदल रहे हैं। संभाले नहीं संभलते। घटना जितनी है, दुर्घटना उससे ज्यादा है। सुकून की तलाश एक व्यवसाय है। चाहे वह मैडिकल साइंस हो या योग विज्ञान होý


ऐसे घमासान में विरोध, प्रतिरोध, परिवर्तन, परिवर्धन के विचार को पकड़ना दुष्कर है। साहित्य तो अकुलाहट भर बनकर रह जाता है। वाम विचार पर चौतरफा दबाव है। परिवर्तन के पहरुए एनजीओ का रूप धर कर आ रहे हैं जो त्याग और नि:स्वार्थता की पुरानी अवधारणा को त्याग चुके हैं। यह फंडेड मामला है। सुविधा सहित सेवा का शगल है। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो हिंदी की साहित्यिक गतिविधि इस धन-प्रवाह से मुक्त है। पर उसके अपने अंतर्विरोध हैंý

3

इतना तूमार बांधने का मेरा मकसद क्या है? जाहिर है असिक्नी मेरे ध्यान के केंद्र में है। ऊपर का खंड 1 एक सच्चाई है जिसमें असिक्नी को अपना अस्तित्व बनाना है। इन दोनों में संतुलन साधा जाएगा तो पत्रिका समकालीन होगी। यह ध्यान भी रखना पड़ेगा कि खंड 1 की तरफ झुकाव हुआ तो साहित्यिक खेमेबाज़ी का खतरा रहेगा। कोई दिल्ली, कोई लखनऊ, कोई शिमला, कोई मंडी का दायरा बनने लगेगा। खंड 2 पर अंधाधुंध पिल पड़े तो सब कुछ हाई फंडा होकर बाकी सब को रोंदने लग पड़ेगा। इसलिए संतुलनý

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पर इसका एक कोण और है। यह पत्रिका घोषित रूप से लाहुल स्पिति की एक संस्था द्वारा चलाई जा रही है। यह अपने आप में बड़ा कदम है। यह लाहुल स्पिति की समकालीनता में बड़ी छलांग है। इसके नाते स्थानीयता मुख्यधारा से कदम मिलाएगी। अपनी पहचान को बचाए रखकर।

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यह सब है किसके लिए? हिंदी की पत्रिकाओं में ब्रेनस्टॉर्मिंग (विचार मंथन) खूब होता है (?)। उसका छल भी खूब होता है। प्रगतिशीलों का तो यह शगल भी रहा है। पर मेरी इच्छा, मेरा आग्रह पत्रिका को ज्यादा से ज्यादा पाठकों तक ले जाने का है। अभियान की तरह। यह एक चुनौती है। जितनी मेहनत फंड और सामग्री इकट्ठा करने में की जाती है, उतनी ही पाठक बनाने पर की जानी चाहिए। रोड शो, गोष्ठी, सभा, सम्मेलन, सेमिनार, घर-घर जाकर - जैसे भी हो। दस को समझाएंगे तो एक ग्राहक बनेगा। दस ग्राहक बनेंगे तो एक ग्राहक पढ़ेगा। दस ग्राहक पढ़ेंगे तो एक ग्राहक गुणवंत बनेगा। जैसे पानी ज़मीन में समाता है। सोता किसी दूसरी जगह फूटता हैý


मैंने रचनाओं पर अलग से बात नहीं की है। पत्रिका कैसे पोजीशन्ड होती है, मैं इसी में उलझ गयाý

ईषिता की कहानी सौकणें बहुत अच्छी लगीý


आपका,


अनूप सेठी