चिंतनदिशा में समकालीन कविता पर विजय बहादुर सिंह और विजय कुमार की चिट्ठियां आप पढ़ चुके हैं. फिर अगले अंक में उन चिट्ठियों पर विजेंद्र और जीवन सिंह की प्रतिक्रिया भी पढ़ चुके हैं. चिंतनदिशा के ताजा अंक में राधेश्याम उपाध्याय, महेश पुनेठा, सुलतान अहमद और मेरी प्रतिक्रियाएं छपी हैं. इन्हें बारी बारी से यहां रखने का इरादा है. आइए पहले राधेश्याम उपाध्याय की प्रतिक्रिया पढ़ें.
चिंतन-दिशा में आपने विजय बहादुर सिंह तथा विजय कुमार के बीच हुए निजी पत्राचार को प्रकाशित कर एक अच्छी पहल की थी। उम्मीद यह थी कि दोनों के बीच हुआ यह पत्र-व्यवहार हिंदी की समकालीन कविता पर एक सार्थक बहस को जन्म देगा और कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर केंद्रित होकर यह बहस आगे बढ़ेगी, पर अक्टूबर-दिसंबर 2011 के अंक में वरिष्ठ कवि विजेंद्र जी के पत्र ने सब गुड़ गोबर कर दिया। अपने पत्र में विजेंद्र जी अनावश्यक रूप से आक्रामक, बौखलाए हुए से तथा उपदेशक की मुद्रा में लगते हैं। इतना ही नहीं, कवियों को लेकर वे जिस तरह की गुटबाजी करने में लगे हुए हैं, वह उनकी संकीर्ण दृष्टि का परिचायक तो है ही, आज की कविता पर हो रही एक महत्वपूर्ण बहस को दिग्भ्रमित करने का प्रयास भी है समकालीन कविता के परिदृश्य में रघुवीर सहाय, केदारनाथ सिंह तथा कुंवर नारायण का अवदान महत्वपूर्ण माना गया है। हिंदी जगत में ये नाम समादृत रहे हैं। बिना मार्क्सवाद का ढोल पीटे भी ये कवि दूसरे किसी कवि से कम लोकतांत्रिक तथा प्रगतिशील नहीं हैं। विजेंद्र जी यदि इनके महत्व को नकारते हैं तो, इनका तो कुछ भी नहीं बिगड़ता, पर विजेंद्रजी की निजी कुंठाएं ही ज़ाहिर होती हैं। विजेंद्र जी के भीतर की फांस तब और ज़ाहिर हो जाती है जब वे अपने साथ के कवियों राजकमल चौधरी, धूमिल, जगूड़ी, विनोद कुमार शुक्ल, अशोक वाजपेयी, ॠतुराज, विष्णु खरे तथा भगवत रावत जैसे महत्वपूर्ण कवियों को तो छोड़ देते हैं, पर कुमारेंद्र पारसनाथ सिंह या शलभ श्री रामसिंह जैसे कवियों को याद करने लगते हैं। उनकी यह कोशिश लगभग अप्रासंगिक हो चुके कवियों को प्रासंगिक नहीं बना देती। इसके लिए जो आवश्यक औजार चाहिए, वे भी नहीं हैं उनके पास। इसके अलावा आज जो कविता लिखी जा रही है, उसमें कुछ नाम तो ऐसे हैं जिनके बिना समकालीन कविता की कोई भी चर्चा अधूरी है। जैसे राजेश जोशी, अरुण कमल, मंगलेश डबराल या नरेश सक्सेना की कविताओं को व्यापक स्तर पर सराहना मिली है। इन्होंने अस्सी के दशक के बाद की धारा को बदला है, लेकिन विजेंद्रजी जानबूझकर इन नामों की तरफ से आंखें फेर लेते हैं। हद तो तब हो जाती है जब वे अपने ही द्वारा संपादित पत्रिका 'कृति ओर' में अपने कुछ 'टहलुआ' किस्म के आलोचकों से निरंतर अपना ही प्रशस्तिगान करवाते रहते हैं। इसमें उन्हें न तो कोई संकोच होता है और न कोई ग्लानि होती है। यानी एक तो करेला, ऊपर से नीम चढ़ा, लेकिन ऐसी तमाम कोशिशें भी उन्हें आज की कविता के लिए प्रासंगिक नहीं बना पातीं। समय निर्मम होता है। वह ऐसी सारी आत्ममुग्धताओं तथा उठापटक को ठिकाने लगाकर आगे बढ़ जाता है। रचनाशीलता की बहती धारा में आप कहीं पीछे छूट जाते हैं।
बहरहाल विजेंद्रजी की सोच और उनकी रचनात्मकता को लेकर आपत्तियां कहीं इससे भी अधिक गंभीर हैं और वे ज्यादा बड़े मुद्दों को उठाती हैं। समकालीन कविता में विजेंद्र जैसे लोग जिस तरह की बहसें चलाते हैं, उनके अंतर्विरोधों पर बात करना भी ज़रूरी है। इसीलिए यह पत्र लिखने के लिए विवश भी हुआ हूं। बड़ा मुद्दा यह है कि विजेंद्र जी आधुनिकता का अर्थ औपनिवेशिक चेतना से जोड़कर किसी अमूर्त 'भारतीयता' की खोह में घुस जाना चाहते हैं। कोई भी विचारवान व्यक्ति यह जानता है कि भारतीयता की कोई सरल और एकपक्षीय अवधारणा नहीं बनाई जा सकती। भारतीयता में अनेक देश, काल तथा संस्कृतियां एक साथ उपस्थित हैं। पिछले हजार वर्षों में भारतीयता का रूप विभिन्न धर्मों, संप्रदायों, संस्कृतियों, परपंराओं जीवन-शैलियों तथा चेतनाओं के आपसी समागम से बना है। यह निरंतर बनता और बदलता रहा है। भारतीयता की किसी एकल या अमूर्त अवधारणा को बनाना कठमुल्ले किस्म की सांप्रदायिक शक्तियों और सांस्कृतिक पुन्तरूत्थानवाद की तरफ चले जाना है। भारतीयता और लोकजीवन या 'लोक संस्कृति' की भी कोई काल निरपेक्ष, इतिहास-निरपेक्ष या स्वायत्त अवधारणा नहीं बनाई जा सकती। आज निरंतरता और परिवर्तन की जटिल अंत: क्रियाओं को समझने की ज़रूरत है। इन्हीं के द्वारा हम अपनी समकालीनता को परिभाषित कर सकते हैं। एक 'भारत' के भीतर कई भारत हैं। एक 'लोक' के भीतर कई तरह के 'लोक' हैं। एक 'समय' के भीतर कई तरह के समय हैं। लोक की जीवन स्थितियां हमारे समूचे इतिहास में परिवर्तनशील रही हैं, लेकिन आज भूमंडलीकरण या वैश्वीकरण के दबावों में इस 'लोकजीवन' को समझना ज्यादा कठिन और चुनौतीपूर्ण हो गया है। नए सूचना समाज, टेक्नोलॉजी, औद्योगिक उत्पादन, बाज़ार की ताकतों तथा पूंजी के आबाध प्रसार ने हमारे चारों तरफ परिवर्तनों की गति को बहुत अधिक तेज़ कर दिया है और ये परिवर्तन बहुआयामी हैं। इन परिवर्तनों तथा मनुष्य जीवन पर उनके प्रभावों-परिणामों को जो कि भूमंडलीकरण की प्रक्रिया की ही परिणति है, किसी एक जगह पर केंद्रित करना तक कठिन हो गया है। जीवन का कोई क्षेत्र आज ऐसा नहीं है जो इन परिवर्तनों से अछूता रह गया हो।
विजेंद्रजी जैसे लोगों के लोकजीवन की अवधारणा बहुत यांत्रिक तथा जड़ाऊ किस्म की है, जबकि डॉ. रामविलास शर्मा, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, मुक्तिबोध, नागार्जुन, रेणु, हरिशंकर परसाई या श्रीलाल शुक्ल जैसे रचनाकारों ने लगातार लोकजीवन, समाज, राजनीति, परंपरा, मूल्य दृष्टि, सामूहिक अवचेतन, रहन-सहन, परिवेश तथा पर्यावरण की अवधारणाओं पर पड़ रहे दबावों को व्याख्यायित करते हुए 'भारतीयता' की खोज की है। लोकजीवन का जो लालित्य नागार्जुन की कविताओं में है या श्रम का जैसा सौंदर्य केदारनाथ अग्रवाल रचते हैं, क्या वैसा कुछ भी विजेंद्र जी के पास है? उन रचनाकारों के यहां लोकजीवन स्वायत्त, अमूर्त, अवैज्ञानिक, समाज निरपेक्ष तथा इतिहास विहीन नहीं है, लेकिन विजेंद्रजी लोकजीवन और लोक संस्कृति की अमूर्त बातें ही करते रहते हैं। वे 'लोक-लोक-लोक-लोक' इस तरह से करते रहते हैं जैसे साहित्य में कबड्डी खेल रहे हों और दूसरे पाले में घुसकर उन्हें चित कर देना चाहते हों। सवाल तो यह है कि पहले का कवि जब कहता था कि 'अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है क्यों न इसे सबका मन चाहे' तो क्या वही स्थिति आज भी है? विजेंद्रजी जिस 'चैत की लाल टहनी', 'उठे गूमड़ नीले' तथा 'कठफोड़वा पक्षी' को अपनी कविता में लाते हैं, क्या वह इतिहास निरपेक्ष हो सकता है? यह उनका कैसा 'लोक' है जिसमें अपने समय की स्थितियों का कोई दबाव ही नहीं है। उत्तर प्रदेश के ग्रामांचल से मेरा गहरा संबंध रहा है। गांवों के जीवन की परंपरागत लय, सादगी, सरलता, निष्कपटता, आत्मनिर्भरता, उच्च जीवन मूल्यों से जुड़ाव भाई चारे, स्नेह, आपसी सौहार्द तथा सामूहिक सह अस्तित्व की स्थितियों पर मंडराते संकट को मैं देख रहा हूं। मूल्य विहीन राजनीति, स्वार्थ, तिकड़मबाजी, क्षुद्र महत्वाकांक्षाओं, स्पर्धा, जातिवाद तथा संगठित अपराध ने ग्रामीण समाज को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। क्या यह हमारे समय का बड़ा संक्रमण नहीं है? विशाल बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नज़र भारत के ग्रामीण बाज़ार पर है। विजेंद्रजी बताएं कि वह परंपरागत लोकजीवन अब कहां रह गया है? गांवों में रोजगार नहीं है। भूमंडलीकरण के इस दौर में ग्रामीण विकास पर खर्च होने वाली राशि में भारी कटौती और विकास की बदलती परिभाषाओं ने किस कदर उथल-पुथल मचा रखी है। गाय-बैल, खेती के काम आने वाले उपकरणों, कारीगरों, परंपरागत काम-धंधों तथा आत्मनिर्भरता के तमाम स्रोतों का कितनी तेज़ी से क्षरण हो रहा है। कुएं, ताल-तलैया , पोखर, नदियों, अमराई चौपाल से जुड़े वे संस्कार अब बीते जमाने की बातें हो रही हैं। कृषि का वह आत्मनिर्भर ढांचा बदल रहा है। वहीं कारपोरेट कंपनियों की घुसपैठ, उर्वरक, कीटनाशक दवाओं, सिंचाई की आधुनिक मशीनों, निर्माण सामग्री, टेलीविजन, मोबाइल, बैंकों की निवेश योजनाओं के बड़े-बडे़ पोस्टर, शीतल पेय, टूथपेस्ट, चाय-काफ़ी, मोटर साइकिलों के विज्ञापन तो आज गांवों में देख ही रहे हैं। अब शीघ्र ही बीयरबारों हेयर ड्रेसिंग सैलूनों, ब्यूटी पार्लरों तथा साइबर कैफे की मौजूदगी भी संभव है। बाज़ार खोलने के बाद कृषि तंत्र को खोलने की तैयारी भी हो रही है!
इस दृश्य के साथ यह कौन सा समय गांवों में आ रहा है? क्या इसकी व्याख्या लोकजीवन की कविता लिखने वाले ये लोग करेंगे? गांव में अब कितना गांव बचा है? अब तो आपसी विवाद चौपाल पर नहीं, पुलिस थानों तथा कचहरियों में निपटाए जाते हैं। जिला अदालतों में चले जाइए, गांवों के लोग वकीलों के पास बैठे मिलेंगे। छोटे-छोटे विवाद, मारपीट के मुकदमों से लेकर धोखाधड़ी, खून-खराबे तथा कत्ल के किस्से जैसे अब रोजमर्रा की बातें हैं। ग्राम केंद्रित विकास विकेंद्रीकरण, आत्मनिर्भरता तथा आमजन की सहभागिता वाला वह सपना कहां तिरोहित हो गया है? बडे़-बडे़ पूंजीपति, कारपोरेट घराने साम्राज्यवाद के दलाल हमारे लोक जीवन तथा लोक संस्कृति के सौदागर बन गए हैं। भू-माफियाओं का उदय, लाखों किसानों की आत्महत्याएं, विशेष आर्थिक क्षेत्रों तथा राजमार्गों के निर्माण, छोटे-छोटे किसानों की ज़मीनों का छीना जाना, जंगलों तथा पहाड़ों से आदिवासियों का खदेडा़ जाना, चारागाहों पर पूंजी का कब्जा और पर्यावरण का विनाश, क्या इस नई औपनिवेशिक दासता को हमारी लोकसंस्कृति की ये तथाकथित अलम्वरदार अपनी कविता में कुछ भी महसूस कर पा रहे हैं। कहां है भारत का यह बदलता गांव और उसका लोकजीवन इनकी कविता में? 'भारतीयता' और 'लोक संस्कृति' का राग अलापने वाले इन बौद्धिकों के कविता-विमर्श में विस्थापन का वह दर्द क्यों नहीं उभरता जो आज भारत का आम किसान और आदिवासी भोग रहा है।
आज की कविता में शहरी जीवन के यथार्थ को पश्चिमी औपनिवेशिक मानसिकता कह देने से पहले यदि विजेंद्रजी गांवों से विस्थापित हो रहे किसानों को रेल के डिब्बे में खचाखच भरे आदिवासियों, पलायन कर रहे खेतिहर मजदूरों को बडे़-बडे़ शहरों के सीमांत पर फैलती झुग्गी झोपड़ियों को, गंदी बस्तियों के जीवन को एक बार देख लेते तो उन्हें समझ में आ जाता कि आज के भारतीय ग्राम जीवन का वास्तविक यथार्थ क्या है? मैं उन्हें मुंबई में असल्फा, धारावी, गोवंडी तथा कुरार गांव की धूल सनी बस्तियों में घूमने के लिए आमंत्रित करता हूं। वे लोकसंस्कृति के अपने शीश महल से बाहर निकलकर समकालीन समय को देखें तो उन्हें समझ में आ जाएगा कि किसानों, खेतिहर मजदूरों और आदिवासियों के जीवन में किस तरह का रूपांतरण हुआ है और हो रहा है। हो सकता है कि उन्हें यह बदलता हुआ यथार्थ कुछ समझ में आने लगे और वे एक बेहतर कविता की ओर अग्रसर हों। वे इस ओर ज़रूर देखें कि वास्तव में श्रमजीवी जनता के जीवन में रोजमर्रा की आपाधापी के बीच कितने सूर, तुलसी और मीरा बन पा रहे हैं और उनकी झुग्गी-झोपड़ियों में शाहरुख खान, सलमान खान, करीना कपूर, बिपाशा बसु तथा कैटरीना कैफ आकर बस गए हैं। बड़ी-बड़ी किताबी बातें करने से कुछ नहीं होता। वे देखें कि गांवों में किस तरह अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों की बाढ़ आई हुई है। वे इस बदलते यथार्थ को देखें और आज के लोकजीवन को समझने की कोशिश करें। शाश्वत किस्म का लोकजीवन तो कालीदास की कविता में भी आ चुका है और उनसे ज्यादा प्रकृति-चित्रण करना किसके बूते का है! अपने पूर्वग्रहों तथा यांत्रिक समझ से थोड़ा बाहर निकलने पर इस संक्रमणशील समय को अधिक समझा जा सकता है और अपने लिए एक नई ऊर्जा भी प्राप्त की जा सकती है।
अच्छी बात तो यह है कि हिंदी की समकालीन कविता में आज इस बात की अभिव्यक्ति अनेक प्रकार से हो रही है कि केंद्रीकृत विकास पूंजीवाद का सबसे बड़ा रोग है। विजेंद्रजी जैसे हमारे कुछ अग्रज कवियों को भले ही गांव की समकालीन स्थितियों तथा बनवासियों की समस्याओं का कोई अंदाजा न हो, पर हिंदी कविता इस संक्रमणशील वर्तमान की अनेक प्रकार से व्याख्या कर रही है। नंदीग्राम, सिंगुर से लेकर भट्टा पारसौल तथा नियमगिरी की पहाड़ियों तक लड़ते हुए किसान और आदिवासियों के साथ जो नया यथार्थ उभर रहा है, वह बहुत सारे युवा कवियों के यहां अभिव्यक्ति पा रहा है। खाप पंचायत, लड़कियों की भ्रूण हत्या, भूमि अधिग्रहण, ग्रामीण बेरोजगारी, बड़ी-बड़ी बांध योजनाओं के कारण विस्थापित होते किसानों और डूब क्षेत्र में आने वाले गांवों पर इधर अनेक कविताएं आई हैं। यही हमारी वास्तविक समकालीनता है। डॉ. रामविलास शर्मा की आड़ में अपनी कविता की कमजोरियों को छिपाने की कोशिश करने वाले कुछ लोग काश रामविलाजी के कविता संबंधी कथन की गहराई को समझ पाते। 'वसुधा' के ताजे अंक में स्व. रामविलास से हुई सुधीर रंजन सिंह की बातचीत पढ़ें। रामविलास जी स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि 'राजनीतिक कविता केवल विचारों की कविता नहीं होती, विचारों के साथ जब तक भावशक्ति नहीं होगी तब तक राजनीतिक कविता प्रभावशाली नहीं होगी। भावशक्ति के बिना विचार शक्ति अधूरी है। विचार में जान होनी चाहिए। ताकत होनी चाहिए- उधार लिए विचार से काम नहीं चलेगा।
इसी तरह मुक्तिबोध ने भी बहुत पहले साहित्य में 'जड़ीभूत सौंदर्याभिरुचि' के खतरे का सवाल उठाया था। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया था कि मार्क्सवाद की किताबों की बातें करने से वर्ग चरित्र नहीं बदल जाता। आपको 'संवेदनात्मक ज्ञान' और ज्ञानात्मक 'संवेदन' की लड़ाई लड़नी होगी। एक बहुत बड़ी लड़ाई अपने भीतर के बने दिमाग़ और उसके यथास्थितिवाद में है। इसी बात को आगे बढ़ाते हुए रघुवीर सहाय ने कहा था-
टूट रे मेरे मन टूट
एक बार टूट
अच्छी तरह से टूट
यह जो रचनाकार का आत्म संघर्ष है, अपनी ही गढ़ी हुई मूरत को तोड़ने का साहस- वह एक दिन की चीज़ नहीं, वह तो रोज-रोज की लड़ाई है। रघुवीर सहाय ने ही कहा था-' पावों में यह कील जो रोज-रोज गड़ती है रोज इस दर्द को समझना पड़ता है।' तीस पैंतीस वर्षों में और भी कितना कुछ बदल गया है।
कविता में 21वीं सदी की लड़ाइयां और भी जटिल हैं। आज लोक संस्कृति बनाम नगर संस्कृति या मुख्य धारा बनाम आंचलिकता की सारी बहसें कृत्रिम और बेमानी हो चुकी हैं। गांव हो या शहर आम आदमी हर जगह परेशान है और अपनी जड़ों से बेदखल हो रहा है। उसका यह विस्थापन जितना भौतिक है, उतना ही आत्मिक भी है। विकास के तमाम रोज़ रोज़ गढे़ जाते मिथकों तथा वस्तुओं के उपभोग के भीतर छिपी अन्याय, हिंसा शोषण, बदहाली तथा उन्मूलन की नंगी सच्चाइयों को समझना ज़रूरी है। ठीक है कि मनुष्य जब तक ज़िंदा है, स्वप्न देखेगा और संघर्ष भी करेगा, पर उसका यह स्वप्न देखना और उसकी यह जिजीविषा बहुत कठिन किस्म की चीज़ है। उसे बहुत सरलीकृत रूप में कविता में रुपायित करना खेल नहीं है, जैसा कि हमारे ऐसे कुछ कवियों ने समझ रखा है। मनुष्य की जिजीविषा उसके संकटों के बीच से ही परिभाषित होगी। आप संकटों की चर्चा ही नहीं करेंगे तो जिजीविषा को कैसे रचेंगे? यह असल में तो कुछ ऐसा होना चाहिए जो जितना हृदय विदारक हो, उतना ही आस्था जगाने वाले भी हो। इस द्वंद्वात्मकता को हासिल किए बिना कोई भी असाधारण रचना संभव नहीं है। खोखले आशावाद तथा लोक संस्कृति की ठहरी हुई अवधारणा और सतही ऐश्वर्य गायन से कुछ नहीं होता। इस तरह तो लोक संस्कृति को भी पंच सितारा होटल या शॉपिंग माल में बिकने वाली एक वस्तु में बदल दिया जाता है। आज की कविता का सामना सत्ता की उस संस्कृति से है जहां व्यवस्था हर विपत्ति को एक सामान्य स्थिति बना देती है। सारी नृशंशता रोजमर्रा के एक अनुभव में बदल जाती हैं। उनके एक तरफ फासिस्ट राजनीति है और दूसरी तरफ कवि का एक मध्यमवर्गीय सुविधापरस्त, सुखी, प्रसन्न संसार है। धूमिल ने कभी क्या इसी पूंजीवादी मानसिकता की ओर तो इशारा नहीं किया था-
यद्यपि यह सही है कि मैं
कोई ठंडा आदमी नहीं हूं
मुझमें भी आग... है
मगर वह
भभककर बाहर नहीं आती
क्योंकि उसके चारों तरफ
चक्कर काटता हुआ
एक पूंजीवादी दिमाग़ है
जो परिवर्तन तो चाहता है
मगर आहिस्सा आहिस्ता
कुछ इस तरह कि चीज़ों की
शालीनता बनी रहे
कुछ इस तरह कि कांख भी दबी रहे
और विरोध में उठे हुए हाथ की
मुट्ठी भी तनी रहे
और यही वजह कि बात
फैसले के हद तक
आते-आते रुक जाती है
क्योकि हर बार
चंद टुच्ची सुविधाओं की
लालच के सामने
अभियोग की भाषा चुक जाती है।
अंत में मैं विजेंद्र जी से सिर्फ़ इतना ही निवेदन करना चाहता हूं कि बंधुवर, हम कविता के चाहे जितने खांचे बना लें, पर हमारा पाठक उसकी चिंता नहीं करता। वह तो कविता में सिर्फ़ एक सिर्फ़ एक गहरा मर्मस्पर्शी अनुभव ढूंढता है। यदि यह अनुभव उसे मिलता है तो वह आपको स्वीकार करता है और यदि आप मर्मस्पर्शी कविता नहीं रच पाते हैं तो चाहे जितनी बड़ी-बड़ी बातें कर लें, चाहे जितने सिद्धांतों तथा विचारधाराओं का घटाटोप खड़ा कर लें, वह सब बेकार है। अनुभूति और 'संवेदनात्मक ज्ञान य ज्ञानात्मक संवेदन' के बिना ये सारे 'स्कूल' दुकानदारी में बदल जाते हैं। आप 'लोक संस्कृति' की भी दुकानदारी कर सकते हैं और नागर संस्कृति की भी, लेकिन इसके परे मनुष्य का जीवन बहुत विराट है। उसमें हर तरह के रंग की ज़रूरत है। हमें जितनी नागार्जुन की ज़रूरत है, उतनी ही शमशेर की भी। जितनी अज्ञेय की ज़रूरत है, उतनी ही मुक्तिबोध की भी। हर अच्छी कविता चाहे जिस ज़मीन से उठी हो, पाठकों द्वारा सराही ही जाएगी।
रघुवीर सहाय बनाम नागार्जुन या केदारनाथ सिंह बनाम पारसनाथ सिंह जैसी तमाम बहसें नकली बहसें है। ये आलोचकों की ख़ास तरह के धंधे हैं। और साहित्य के सट्टा बाज़ार में उनका कोई भरोसा नहीं होता। हमारा आलोचक कल तक मुक्तिबोध को बड़ा कवि बता रहा था आज अचानक अज्ञेय जन्मसदी में अज्ञेय को बड़ा कवि बता रहा है यह बौद्धिक कलाबाजी नहीं तो और क्या है। कविता अच्छी है तो चिंता नहीं कि वह गांव के पोखर पर है या शहर के ट्रैफिक सिग्नल पर। अच्छी नहीं तो तमाम विषयवस्तु और सारी कवियों से यह वसुंधरा पटी रहती है।
राधेश्याम उपाध्याय
मो.: 09969382160