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Thursday, April 23, 2020

कोरोना काल

सुमनिका द्वारा करीब पचीस साल पहले चारकोल से बनाया गया स्केच 


यह थकना भी कोई थकना है लल्लू!

हम अजीबोगरीब वक्त में फंस गए हैं । एक तरह से सारी दुनिया ही ठहर सी गई है । आगे हम लोगों को जीवन कैसा होगा कुछ पता नहीं ।  कुछ लोग कोरोना के शिकार हो गए हैं, कुछ उन्हें बचाने में लगे हैं । बाकियों को बचे रहने की सलाहें दी जा रही हैं । अभी सम्मुख निरा वर्तमान है । 


बीस मार्च के बाद मैं दफ्तर नहीं गया । दफ्तर तो छोड़िए स्वामी विवेकानंद रोड या गोरेगांव बाजार तक भी नहीं । हमारी हाउसिंग सोसाइटी के गेट के सामने एक सब्जी वाला बैठता है, एक आलू प्याज वाला, एक फल वाला, दो जनरल स्टोर हैं, एक मेडिकल स्टोर है, एक हलवाई है और दो चार दुकानें और । इसी सड़क के एक छोर पर राम मंदिर रोड लोकल स्टेशन की सीढ़ियां उतरती हैं । सड़क के सीमेंटीकरण का काम चल रहा था । जनता कर्फ्यू और फिर लॉकडाउन के बाद सब्जी वाला, आलू प्याज वाला, एक जनरल स्टोर और मेडिकल स्टोर सुबह शाम खुल रहे हैं, बाकी सुनसान है ।  सुनसान शब्द में एक तरह से रोमांस की या नीरवता की कौंध रहती है, यह तो उजाड़, भुतहा, और बियाबान के करीब का मंजर है । करीब दो हफ्ते पहले बेटी के साथ एक रात गाड़ी से हमारी इमारत से सटे  फ्लाईओवर तक गया था। सुनमिका ने अपनी खिड़की से देखा था, वहां एक कुत्ता अकेला पड़ गया लगता था । उसे पानी और रोटी दी । रात की उस खाली सड़क में जगह जगह कुत्ते भटक रहे थे । वो शायद इंसानों की गैर मौजूदगी से बौखलाए हुए थे । 

अलबत्ता हफ्ते में तकरीबन एक बार सब्जी वगैरह के लिए मैं अपनी इमारत से नीचे उतरता रहा हूं। टुथपिक, टिशू पेपर, सैनिटाइजर, मास्क से लैस होकर बाहर निकलता हूं । लिफ्ट के बटन छूते हुए डर लगता है । टुथपिक से बटन दबाता हूं । गेट तक की सड़क पर सूखे और पीले पत्तों के बिछावन बिछे हैं । गाड़ियों पर धूल जमी है । इक्का-दुक्का लोग दिखते हैं अजनबियों की तरह । दुकानों पर थोड़ी मानवीय हरकत रहती है । सब्जी वाला या और एक आध कमेरा जो दिखता है, उनकी देह भाषा में भय नहीं दिखता । खाते पीते लोगों की मानो सिट्टी-पिट्टी गुम है । उनमें भय ज्यादा व्याप्त है । हालांकि यह भी ध्यान में है कि बहुत से अनिवार्य सेवा वाले लोग नौकरियों पर जा रहे हैं, स्वास्थ्य कर्मी पुलिसकर्मी जान हथेली पर लिए घूम रहे हैं, पर हमें घरों में सिमटे रहने की ड्यूटी दी गई है । हम भय का पीपीई पहने हुए हैं । हमारे व्यक्तित्व की दूसरी परत है घरों में सकारात्मक बने रहने की जद्दोजहद, तरह-तरह के करतबों से सोशल मीडिया और खबरों से आने वाले संक्रमण से बचने की कबायद ।

हमारी सोसाइटी में व्हट्सएप के कई ग्रुप हैं, कुछ इन दिनों के खास इंतजाम के लिए और कुछ पुराने औपचारिक ।  यहां बीच-बीच में मस्ती का तेल चुपड़ने की हरकतें भी होती रहती हैं । हम तीनों को ही थोड़े-थोड़े वर्क फ्रॉम होम के होम में आहुति भी डालनी होती है। मन न पढ़ने-लिखने में लगता है, न काम में । ऊपर से अपराधबोध की पपड़ी भी खाल पर जमने लगती है । उस पर भी मस्त रहने का तेल चुपड़ना पड़ता है ।  नजरबंदी में स्वस्थ बने रहने की चुनौती भी है ।  बीमार पड़े तो कहीं डॉक्टर मिलने वाला नहीं ।  हमारे घर में सादा लेकिन स्वादिष्ट भोजन कराने का बीड़ा सुमनिका जी ने उठा रखा है ।  हर तरह की इंडल्जेंस लगभग बंद है ।  सामान जितना मिलता है उसी से काम चला रहे हैं । अपार जनसंख्या को जब बे-दर बे-घर होने के हृदय विदारक दृश्य देखते हैं, खबरें पढ़ते हैं तो अपने खाने-पीने, ओढ़ने-सोने पर अपराधबोध की गर्द जमती प्रतीत होती है । अपनी रहनी अय्याशी से कम नहीं लगती ।  अपने वर्ग में रहने की जकड़बंदी कम नहीं होती ।

ऐसे माहौल में कल बाइस अप्रैल का दिन बहुत हरकत भरा रहा ।  कल राशन वाले को सामान की सूची व्हट्सऐप से भेजी । दस बजे उसके यहां सामान लेने गया ।  कल ही सोसाइटी वालों ने एक सब्जी वाले को बुला लिया था ।  ग्यारह बजे के बाद उस लाइन में लगा ।  करीब ढाई घंटे बाद सब्जी खरीदने की मेरी बारी आई । हाउसिंग सोसाइटी के एक समूह ने आमों की सामूहिक खरीद का अभियान चलाया हुआ था । इसमें शामिल होने में थोड़ी मानसिक उलझन हो रही थी, कि सादा खाना खाओ ज्यादा स्वादों के पीछे न भागो, लेकिन अर्थशास्त्र के इस तर्क की ही विजय हुई कि किसानों की फसल बर्बाद हो जाएगी, उन्हें ग्राहक चाहिए । तो दो बजे के करीब उन आमों को लेने की वजह से फिर नीचे जाना पड़ा । उसके बाद संदेश आ गया कि शाम को सोसाइटी में एटीएम आ रहा है ।  यह पहली बार हो रहा था और पिछले डेढ़ महीने से जो नकदी घर में थी उसी से हम काम चला रहे थे ।  सोचा इस अवसर का भी लाभ उठा लेना चाहिए,  तो शाम सात बजे से आठ बजे तक फिर पंक्ति को दे दिया गया ।  मतलब यह कि करीब डेढ़ महीने बाद कल चार- पांच घंटे लाइनों में खड़े रहने की मशक्कत करनी पड़ी ।  पहले रोज लाइनों में खड़े नहीं होते थे लेकिन थोड़ी बहुत हरकत और आवाजाही तो होती थी । ऊपर से कल धूप में मुंह पर जुंगला बांधे हुए खड़े रहना पड़ा।  

हमारी बेटी नियम की बहुत पक्की है ।  मुझे बाहर से लौटने पर हर बार नहाना पड़ता है, कपड़े बदलने पड़ते हैं । कल चार जोड़ी कपड़े धोने पड़े ।  कितना पानी उसमें बहा होगा ।  शाम तक मेरी पींबोल गई । वरिष्ठता की देहरी पार कर ली है, इकसठ का हो गया हूं, जिस्मानी मेहनत की आदत भी नहीं है, जाहिर है रात तक बुरी तरह थक गया ।   पर उस थकने से तुलना करने का अपराध कभी कर ही नहीं सकता जो हजारों किलोमीटर चलकर अपने घरों को गए,  जो मानो पिछले सत्तर साल से चलते रहे और हमें दिखे ही नहीं ।  उनसे भी तुलना करना मुनासिब नहीं जो इस महामारी से लड़ने के लिए दिन-रात जुटे हुए हैं ।  उन सबकी थकान के सामने यह थकना भी कोई थकना है लल्लू!

Monday, November 25, 2013

गंध ने लगाई अतीत में सेंध

Pensive 80s
रेखांकन: सुमनिका, कागज पर चारकोल



डायरी के ये अंश सन् 1997 से 2000 के बीच के हैं। तब तक आईडीबीआई छोड़कर यूटीआई में स्‍थाई तौर पर आ गया था। हालांकि यह स्‍थायित्‍व भी ज्‍यादा चला नहीं। इस समय में नौकरी और रोजमर्रा की जिंदगी के ढर्रे का तानपूरा लगातार छिडा़ हुआ है। बीच-बीच में लिख न पाने की टूटी-फूटी तानें हैं। अल्‍पज्ञ रह जाने का शोक है। कट्टरवाद की एक ठंडी लपट है और रत्‍ती भर वर्तमान में से अतीत में झांकना है। पता नहीं इन प्रविष्टियों के लिखे जाने, छपने और पढ़े जाने का कोई मतलब भी है या नहीं। डायरी के ये टुकड़े हिंदी साहित्‍य की नवीन नागरिक कविता-पत्रिका सदानीरा के हाल में आए दूसरे अंक में छपे हैं। इस कडी़ के साथ ही यह श्रृंखला अब  संपन्‍न होती है।

 
07/11/2000
बांदरा से आने पर लिंकिंग रोड शुरू होती है तो बहुत भीड़ के बीच में, बडी़ तीखी महक से सबका पड़ता है। खास किस्म की महक, पंजाब पहाड़ में आम तौर पर यह महक पाई जाती है। यहां चिकन तंदूरी सिक रहा होता है। तंदूरी का खास तेल मसाला। अपना आलम बिखेरता मसाला। जगह बडी़ मज़ेदार है। लिंकिंग रोड का बाजार। जूते चप्पल। सूट और सूट। जनाना सूट। ग्राहक टूटे पड़ रहे होते हैं। बहुत से लड़के चादरों में बेचने वाली चीजें जैसे पर्स या कपडे़, टीशर्ट वगैरह बेचते हैं। ट्रैफिक एक के ऊपर एक चढा़ आता है। वहीं है यह मुर्ग मुसल्‍लम। सारे बाजार में इस दुकान की महक गमकती रहती है। जब भी गुजरो यह गंध बडी़ पहचानी सी लगती है। आज अचानत कौंधा - अरे यह तो वही गंध है। शायद 81-82 की बात है। हमीरपुर (हिमाचल) में मिली थी यह गंध। मैंने अथकथा राजा घसीट सिंह नाटक लिख लिया था। शायद नौकरी की तलाश थी। गुरूजी (रमेश-रवि) मंडी जा चुके थे। पता चला उनकी एक्‍जाम ड्यूटी हमीरपुर में लगी है। मैं मिलने जा पहुंचा। करीब दस बरस बाद हमीरपुर गया था। हीरानगर के पीडब्‍ल्‍यूडी रेस्ट हॉउस में वे रह रहे थे। शाम को गुरूजी की संगत लगती थी। नीचे बाजार से तली हुई मछली लेकर गए। उनके कमरे में गाटी लगी। मैं तो तब सूफी ही था। रात को नाटक सुनाया। या पता नही, शायद तब नाटक नहीं सुनाया था, मंडी में उनके घर पर सुनाया था। पर उस तली हुई मछली की गंध ही चिकन की यह गंध है।

बांद्रा में दो सेंधें लग गईं, दोनों गंध मादन सेंधें। एक लगी थी स्टेशन से बाहर निकल कर तालाब के किनारे, गंदे पानी की नाली में। उस नाली में ट्टटी मिली हई थी। उसकी गंध निरंतर व्‍याप्‍त थी। यह गंध कुल्‍लू में थी। सन 70-72 में। कहां कुल्‍लू, कहां मुंबई। ट्टटी की दुर्गंध एक सी। यह बात मैंने भाई साहब को चिट्ठी में लिखी भी थी। अतीत में जाने की एक सेंध तब लगी थी। और एक सेंध आज लगी है - तंदूरी चिकन के जरीए। सरे बाजार।

8/11/2000
आज देखा ध्यान से, हालांकि स्कूटर पर चलते हुए। ज्यादा देर तक रुकने की फुर्सत नहीं थी इसलिए जितना ध्यान दिया जा सकता था, दिया। वह पंजाबी फिश फ्राई और चिकन की दुकान है। तदूंरी नहीं फ्राई। वही मसाला। वही गंध। हमीरपुर वाली। कहां हमीरपुर, कहां मुंबई की लिकिंग रोड। पर क्या यह गंध गुरूजी की संगत के कारण अविस्‍मरणीय हुई है?

Saturday, November 23, 2013

भरोसा और आस्‍था

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रेखांकन : सुमनिका, कागज पर चारकोल 



डायरी के ये अंश सन् 1997 से 2000 के बीच के हैं। तब तक आईडीबीआई छोड़कर यूटीआई में स्‍थाई तौर पर आ गया था। हालांकि यह स्‍थायित्‍व भी ज्‍यादा चला नहीं। इस समय में नौकरी और रोजमर्रा की जिंदगी के ढर्रे का तानपूरा लगातार छिडा़ हुआ है। बीच-बीच में लिख न पाने की टूटी-फूटी तानें हैं। अल्‍पज्ञ रह जाने का शोक है। कट्टरवाद की एक ठंडी लपट है और रत्‍ती भर वर्तमान में से अतीत में झांकना है। पता नहीं इन प्रविष्टियों के लिखे जाने, छपने और पढ़े जाने का कोई मतलब भी है या नहीं। डायरी के ये टुकड़े हिंदी साहित्‍य की नवीन नागरिक कविता-पत्रिका सदानीरा के हाल में आए दूसरे अंक में छपे हैं।
 

05/12/99 प्रात: सात बजे
लगभग एक महीना हो गया, खुद से सामना किए हुए। यूं नहीं कि इस बीच सामना या मुठभेड़ नहीं होती रही है, पर ज्यादातर एक ही ट्रैक चलता रहता है। त्वरित, निरवकाश, नियमित, निरंतर। पिछले दिनों निर्मल वर्मा की भारत और यूरोप - प्रतिश्रुति के क्षेत्र पुस्तक के कई निबंध पढे़। भारतीयता की नई सी व्‍याख्‍या है। भारतीयता ही क्यों, यूरोप की भी। आपसी संबंधों की भी। इसी व्याख्या के कारण इन्हें दक्षिणपंथी, बल्कि भाजपाई कहा जाता होगा। पर यह व्‍याख्‍या विचारोत्‍तेजक है।

दूसरे, सारे लेखन में लेखन, लेखन-कर्म, जीवन और लेखक के संबंध के प्रति बडी़ सम्‍पृक्‍तता प्रतिभासित होती है। एक तरह की मंद्रता भी उनमें है। लेखन के प्रति खूब भरोसा प्रकट होता है। भरोसा और महत्व। लखनऊ में काशीनाथ सिंह को नामवर सिंह के पत्र पढ़ते हुए सुनते-देखते समय भी ऐसा ही विश्वास और आस्‍था महसूस हुई थी।

इधर के लेखकों में यह भरोसा-आस्‍था कितनी है, कहां है... शब्द की शक्ति को महसूस करना... नकारत्मक दृष्टिकोण इतना हावी होता जाता है कि भरोसा उठता जाता है। भरोसे को बचाना और महसूस करना शायद ज़रूरी है।

Friday, November 22, 2013

किस बिनाह पर कहूं कि कवि हूं ?

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रेखांकन : सुमनिका, कागज पर चारकोल



डायरी के ये अंश सन् 1997 से 2000 के बीच के हैं। तब तक आईडीबीआई छोड़कर यूटीआई में स्‍थाई तौर पर आ गया था। हालांकि यह स्‍थायित्‍व भी ज्‍यादा चला नहीं। इस समय में नौकरी और रोजमर्रा की जिंदगी के ढर्रे का तानपूरा लगातार छिडा़ हुआ है। बीच-बीच में लिख न पाने की टूटी-फूटी तानें हैं। अल्‍पज्ञ रह जाने का शोक है। कट्टरवाद की एक ठंडी लपट है और रत्‍ती भर वर्तमान में से अतीत में झांकना है। पता नहीं इन प्रविष्टियों के लिखे जाने, छपने और पढ़े जाने का कोई मतलब भी है या नहीं। डायरी के ये टुकड़े हिंदी साहित्‍य की नवीन नागरिक कविता-पत्रिका सदानीरा के हाल में आए दूसरे अंक में छपे हैं।

25/05/99
मसला यह है कि मैं कवि हूं कवि ऐसा हूं कि कविताएं लिखता हूं साल में चार। फिर भी कवि कहलाता हूं।

27/05/99
मसला यह है कि कवि कहलाता हूं या खुद को कवि मानता हूं या असल में कवि हूं। मसला यह है कि कविताएं पत्रिकाओं को भेजता हूं और वे छप जाती हैं। बाज़दफा पत्रिकाएं मंगवा लेती हैं, तो भी छप जाती हैं। छप जाती हैं तो मानना यह चाहिए कि वे ग्राहकों यानी पाठकों के पास पहुंचती हैं। लेखकों के पास भी पहुंचती हैं। पिछले करीब बीस साल से तो ऐसा ही हो रहा है। यह मसला अर्से से दिमाग में अटका हुआ है कि यूं तो पूरा ही साहित्य, लेकिन खास तौर से कविता, कितने लोगों द्वारा पढी़ जाती है। कोई सर्वेक्षण तो उपलब्ध है नहीं। पक्की सूचना भी नहीं है। पत्रिकाओं की वितरण संख्या से ही अंदाज़ होता है कि पाठक कविता पसंद नहीं करता।

जो बात मैं अर्से से दर्ज करना चाहता हूं, वह यह भी है कि मैं मानता हूं कवि हूं, परिवार और दोस्त मानते हैं। कुछ लेखक संपादक मानते हैं लेकिन जात-विरादरी में, पास-पडो़स में, काम-धंधे के माहौल में मैं भूल कर भी यह जिक्र नहीं कर सकता कि कवि हूं। इसकी क्या वजह है ?





Tuesday, November 19, 2013

क्या यह यश-लिप्‍सा थी ?


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रेखांकन : सुमनिका, कागज पर चारकोल


डायरी के ये अंश सन् 1997 से 2000 के बीच के हैं। तब तक आईडीबीआई छोड़कर यूटीआई में स्‍थाई तौर पर आ गया था। हालांकि यह स्‍थायित्‍व भी ज्‍यादा चला नहीं। इस समय में नौकरी और रोजमर्रा की जिंदगी के ढर्रे का तानपूरा लगातार छिडा़ हुआ है। बीच-बीच में लिख न पाने की टूटी-फूटी तानें हैं। अल्‍पज्ञ रह जाने का शोक है। कट्टरवाद की एक ठंडी लपट है और रत्‍ती भर वर्तमान में से अतीत में झांकना है। पता नहीं इन प्रविष्टियों के लिखे जाने, छपने और पढ़े जाने का कोई मतलब भी है या नहीं। डायरी के ये टुकड़े हिंदी साहित्‍य की नवीन नागरिक कविता-पत्रिका सदानीरा के हाल में आए दूसरे अंक में छपे हैं।


03/10/98
आज आकाशवाणी के लिए अली सरदार जाफरी का साक्षात्‍कार लिया। मैं 10-12 सवाल लिख के ले गया था। किताब भी थोडी़ बहुत पढ़ गया था। पर ज्‍यादातर बात PWA पर ही केंद्रित हो गई। फिर मुडी़ तो हिंदी उर्दू से होती हुई भाषा समस्या पर पहुंच गई। अपनी कविता की विकास यात्रा पर महाराज ने कुछ बोला नहीं, माने मार्के का, और बाद में शिकायत करने लगे कि और सब पर हुई कविता पर बात नहीं हुई। फिर जो बात कविता पर की भी, वह अपनी ही कविता का वखान थी। उर्दू कविता के मिजाज या परिवर्तन पर कुछ खास नहीं बोले। प्यास और आग (1960) संग्रह के बाद उनकी कविता में क्या तब्‍दीलियां आईं, उन पर भी वे बहुत नहीं बोले। ''PWA का रोल खत्म हो गया है। तब की जरूरत थी, पूरी हुई। अब साहित्‍य अकादमी है, NBT है, दूसरी अकादमियां हैं, वे इस भूमिका को निभा रही हैं।'' ये टिप्पणियां बहसतलब हैं लेकिन साक्षात्कार में इतना समय नहीं था, कि और उलझा जाता।

इन्टरव्यू लेने के लिए हालांकि सुमनिका को बुलाया गया था, पर उसका कॉलेज था। मैं इसीलिए चला गया कि इस बहाने से सरदार से वाकि‍फियत हो जाएगी और सुमनिका जो प्रदीप सक्‍सेना के आलोचना अंक (पहल) के लिए इन्टरव्यू लेना चाहती है, वह आसान हो जाएया। हालांकि मन में कहीं यह भी था कि भारतीय ज्ञानपीठ सम्‍मान प्राप्त साहित्कार से इस तरह सार्वजनिक बातचीत करने का अवसर चूकना नहीं चाहिए। क्या यह यश-लिप्‍सा का एक रूप है? पता नहीं, मन में बात खटकी क्योंकि अर्से से इस तरह के मौकों से भागता रहा हूं। क्या यह लाइकोपीडियम (होम्‍योपैथी) का असर है?

Sunday, November 17, 2013

डंडे के ज़ोर पर जयकारा

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रंखांकन : सुमनिका, कागज पर चारकोल


डायरी के ये अंश सन् 1997 से 2000 के बीच के हैं। तब तक आईडीबीआई छोड़कर यूटीआई में स्‍थाई तौर पर आ गया था। हालांकि यह स्‍थायित्‍व भी ज्‍यादा चला नहीं। इस समय में नौकरी और रोजमर्रा की जिंदगी के ढर्रे का तानपूरा लगातार छिडा़ हुआ है। बीच-बीच में लिख न पाने की टूटी-फूटी तानें हैं। अल्‍पज्ञ रह जाने का शोक है। कट्टरवाद की एक ठंडी लपट है और रत्‍ती भर वर्तमान में से अतीत में झांकना है। पता नहीं इन प्रविष्टियों के लिखे जाने, छपने और पढ़े जाने का कोई मतलब भी है या नहीं। डायरी के ये टुकड़े हिंदी साहित्‍य की नवीन नागरिक कविता-पत्रिका सदानीरा के हाल में आए दूसरे अंक में छपे हैं।


25/09/98
आज दफ्तर के काम के सिलसिले में बाल ठाकरे के प्रभाव की बदमग्‍जी का प्रत्‍यक्ष अनुभव हआ। अब तक बातें सुनने में ही आती थीं। आज पता चला कि 'जोर-जबरदस्ती' कैसे काम करती है। कोई फौजदारी नहीं हुई। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को जबरदस्ती कैसे रोका जाता है, शक्तिशाली प्रबंधन भी कैसे घुटने टेक देता है, यह पता चला। पिछले कई महीने से हम लोग स्टाफ की रचनाओं का संकलन प्रकाशित करने में जुटे थे। उसे आकर्षक बनाने में मेहनत कर रहे थे। कल ही पत्रिका के रूप में 'संभावना' नाम का यह संकलन वितरित हुआ। आज शाम को लोकाधिकार समिति ने विरोध दर्ज करा दिया। विरोध क्‍या, पूरा का पूरा जत्‍था कार्यपालक निदेशक के पास पहुंच गया। शिकायत यह थी कि एक लेख में लिखा गया था कि फूलन देवी और बाल ठाकरे जैसे लोगों के पीछे जनता कैसे पागल है। जनता का बडा़ पतन हो गया है। आपत्ति इस बात पर थी कि 'दिंदू हृदय सम्राट' बाल ठाकरे की तुलना फूलन देवी से कैसे कर दी गई। कार्यपालक निदेशक वासल साहब ने निर्णय लिया कि प्रकाशन को वापस ले लिया जाए। इसका वितरण न किया जाए। हम लोग, उनके सेनानी, जुट गए टेलीफोन करने, चिट्ठी लिखने, पत्रिका उठवाने में, कि उसे लेकर डंप कर दिया जाए। किए को अनकिया कर दिया जाए।

दफ्तर में कर्मचारियों की यूनियन पर शिव सेना का वर्चस्‍व है, लोकाधिकार समिति भी उनका ही एक अंग है। विरोध उसी ने दज किया। ढेर सारे चपरासियों और ड्राइवरों ने पत्रिका बंद करवा दी। सवाल चपरासियों ड्राइवरों का नहीं है, सवाल अक्‍खड़पन और कुंदजहनी का है। आलोचना सुनने का धैर्य नहीं है। दूसरे का पक्ष सुनने की समझ नहीं है। घेराव, धरना, जोर आज़माइश के तमाम तरह के तरीकों से अपनी बात मनवाने की जिद्द है। डंडे के ज़ोर पर जयकारा बुलवाना है। महाराष्ट्र के इस आतंक का सामना आज इस तरह से हुआ। अब देखना है आगे क्या होता है।

Saturday, November 16, 2013

परिपक्‍वता, मतलब समझदारी कब आएगी ?

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रेखांकन : सुमनिका कागज पर चारकोल


डायरी के ये अंश सन् 1997 से 2000 के बीच के हैं। तब तक आईडीबीआई छोड़कर यूटीआई में स्‍थाई तौर पर आ गया था। हालांकि यह स्‍थायित्‍व भी ज्‍यादा चला नहीं। इस समय में नौकरी और रोजमर्रा की जिंदगी के ढर्रे का तानपूरा लगातार छिडा़ हुआ है। बीच-बीच में लिख न पाने की टूटी-फूटी तानें हैं। अल्‍पज्ञ रह जाने का शोक है। कट्टरवाद की एक ठंडी लपट है और रत्‍ती भर वर्तमान में से अतीत में झांकना है। पता नहीं इन प्रविष्टियों के लिखे जाने, छपने और पढ़े जाने का कोई मतलब भी है या नहीं। डायरी के ये टुकड़े हिंदी साहित्‍य की नवीन नागरिक कविता-पत्रिका सदानीरा के हाल में आए दूसरे अंक में छपे हैं।
 

15/09/98
पांच हफ्ते कैसे बीत गए पता ही नहीं चला। डायरी लिखने का मौका भी नहीं मिला। एक बार फिर दिल्ली जाना पडा़ और लौटकर वही नियमति व्‍यस्‍तता।
कल शाम को लौटते समय (वर्ड ट्रेड सेंटर से) संजीव चांदोरकर (आईडीबीआई में सहकर्मी और मराठीभाषी सचेतन मानुस) मिल गए। ट्रेन में भी थोडी़ बातचीत होती रही। वे एक मराठी पत्रिका पर्याय का जिक कर रहे थे। हिंदी की लघु पत्रिकाओं जैसी पत्रिका है लेकिन वे उसकी संपादकीय दृष्टि, रचना-चयन यदि से प्रसन्‍न नहीं थे। उनका आशय यह था कि इस तरह...
16/ 09/98
... की पत्रिकाएं बहुत सीमित पाठकों तक जाती हैं। लेखकों और कार्यकर्ताओं के बीच ही जाती हैं, जिनकी बौद्धिक तैयारी काफी हद तक हुई होती है। तो उन्हें ऐसी सामग्री चाहिए जिससे उन्हें कुछ नई बात, नया दृष्टिकोण जानने को मिले। लेकिन पत्रिका में कुछ भी भर दिया जाता है। शायद पत्रिका छापने का शौक ज्यादा होता है। सब लोग कई कई वर्षो से काम कर रहे हैं और उनकी उम्रें भी चालीस को छू रही हैं लेकिन मामला कॉलेज विद्यार्थियों जैसा रहता है। इस पर मैंने कहा कुछ गड़बड़ है। शायद परिपक्‍व होने की उम्र बढ़ गई है। अब लोग जल्दी मैच्‍योर नहीं होते। मेरी उमर भी चालीस बरस हो गई है लेकिन बहुत से मसलों पर लगता है, स्पष्टता नहीं है। कई बातें पता ही नहीं हैं। बहुत कुछ तो पढ़ सीख ही नहीं पाए। पहले छोटी उमर में ही लोग बडे़ हो जाते थे। शायद यह बात सिर्फ अतीत राग नहीं है। कहीं कुछ गड़बड़ तो है। अगर कोई 50 वर्ष तक युवा ही होगा तो वह परिपक्‍व कब होगा, प्रौढ़ कब होगा और ज्ञानी वृद्ध होने के लिए उसके पास अपनी उमर के कितने बरस बचेंगे? क्या हमारी आयु इतनी बढ़ गई है? अगर औसत उमर 70 भी हो तो भी उसके पास परिपक्‍व समझ के 20 ही बरस बचते हैं यानी युवावस्था से कम। इसके कारणों को ढूंढना बडा़ मुश्किल है और अपने मामले में तो लगता है 50 तक भी परिपक्‍वता शायद भी आये। मतलब समझदारी।

Thursday, November 14, 2013

मध्‍यवर्गीय होने से कविता जनविरोधी नहीं हो जाती

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रेखांकन : सुमनिका, कागज पर चारकोल


डायरी के ये अंश सन् 1997 से 2000 के बीच के हैं। तब तक आईडीबीआई छोड़कर यूटीआई में स्‍थाई तौर पर आ गया था। हालांकि यह स्‍थायित्‍व भी ज्‍यादा चला नहीं। इस समय में नौकरी और रोजमर्रा की जिंदगी के ढर्रे का तानपूरा लगातार छिडा़ हुआ है। बीच-बीच में लिख न पाने की टूटी-फूटी तानें हैं। अल्‍पज्ञ रह जाने का शोक है। कट्टरवाद की एक ठंडी लपट है और रत्‍ती भर वर्तमान में से अतीत में झांकना है। पता नहीं इन प्रविष्टियों के लिखे जाने, छपने और पढ़े जाने का कोई मतलब भी है या नहीं। डायरी के ये टुकड़े हिंदी साहित्‍य की नवीन नागरिक कविता-पत्रिका सदानीरा के हाल में आए दूसरे अंक में छपे हैं। 

05/08/98 नई दिल्ली यूटीआई गेस्ट हाऊस, ग्रेटर कैलाश

गोविंद सिंह (पत्रकार) और तापस चक्रवर्ती (आईडीबीआई के सहकर्मी और अंग्रेजी कवि) से बात हुई। गोविंद से संयोग से राकेश वत्‍स (अंबाला वाले नहीं, ये हिमाचल के हैं) का नंबर मिल गया। अर्से बाद उससे बात की। पिछले साल चंडीगढ़ में कई सालों बाद भेंट हुई थी। तब उसके पिता का एक्सिडेंट हुआ था। आज उससे पता चला जगदीश मनहास (गुरु नानक देव विश्‍वविद्यालय में हमारे सीनियर, अब पोर्ट ब्‍लेयर में) के भाई का देहांत हो गया है। बड़ी बुरी खबर है। सम्पर्क तो बरसों से नहीं था, यूनिवर्सिटी के बाद ही कोई खबर नहीं थी कहां है। अचानक पता चला तो बुरा लगा। यह भी पता चला कि सांगरा (हिमाचल से) फिर बे-रोजगार है। उस पर भाग्य की मार हमेशा पडी़ रहती है।

तापस ने भी उद्भभावना कविता विशेषांक में छपी कवितायों की आलोचना की। सभी एक सुर से आलोचना कर रहे हैं। हां यह है मध्यवर्गीय कविता। जब कवि मध्यवर्ग का है तो कविता किसकी लिखेगा। वह लिखने में ईमानदार है। नौकरीपेशा है। वक्त का उसके पास टोटा है। अपने वर्ग से बाहर की दीन-दुनियां वह कहां से देखे। बाहर की बात फार्मूले से लिखेगा तो नकल ही होगी। जब समाज का बड़ा तबका सारे विमर्श से बाहर है तो अकेला कवि क्‍या इन्‍कलाब कर लेगा। यह कवि और इसकी कविता जनविरोधी नहीं है। जन का प्रतिनिधित्‍व उस रूप में नहीं हो रहा हो, ऐसा हो सकता है। पर जनभक्‍त या जनमित्र कट्टरपने की बात करते हैं। संस्कृति के दूसरे पहलुओं के साथ मिलाकर, दूसरे कला माध्‍यमों के साथ मिलाकर कविता की बात होनी चाहिए। पत्रकारिता को भी सामने रखना चाहिए। भक्तिकाल जैसा बंजारा कवि समय लौट कर नहीं आ सकता। आज का कवि अलग धारतल पर है, जनता अलग धरातल पर। और जनता के भी ढेरों धरातल हैं। हवेली की छत तक पहुंचने वाली सीढ़ी की तरह के धरातल हैं। अगर कवि की ताल या कदमताल अलग है तो कहानीकार भी अपने ही घाट पर कपडे़ पछींट रहा है। जरा उपन्यास भी गिन लिए जाएं, मध्यवर्ग से बाहर के जीवन के कितने हैं। मतलब यह कि ऐसा बयान करते समय विधा की मर्यादा का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। तुक ताल छंद का दुराग्रह जनता को बदल डालेगा, अगर ऐसा विश्वास है तो यह बालोचित विश्वास है।


Saturday, November 9, 2013

नीरवता, साहित्‍य व संगीत

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रेखांकन : सुमनिका, कागज पर चारकोल


डायरी के ये अंश सन् 1997 से 2000 के बीच के हैं। तब तक आईडीबीआई छोड़कर यूटीआई में स्‍थाई तौर पर आ गया था। हालांकि यह स्‍थायित्‍व भी ज्‍यादा चला नहीं। इस समय में नौकरी और रोजमर्रा की जिंदगी के ढर्रे का तानपूरा लगातार छिडा़ हुआ है। बीच-बीच में लिख न पाने की टूटी-फूटी तानें हैं। अल्‍पज्ञ रह जाने का शोक है। कट्टरवाद की एक ठंडी लपट है और रत्‍ती भर वर्तमान में से अतीत में झांकना है। पता नहीं इन प्रविष्टियों के लिखे जाने, छपने और पढ़े जाने का कोई मतलब भी है या नहीं। डायरी के ये टुकड़े हिंदी साहित्‍य की नवीन नागरिक कविता-पत्रिका सदानीरा के हाल में आए दूसरे अंक में छपे हैं।


14/05/98 प्रात: 8:20

जब से मैत्रेयी पुष्पा का उपन्यास चाक पढ़ कर खत्‍म किया है मन इतना भरा-भरा रहा है कि डायरी लिखना चाहता रहा हूं। चाक से कुछ ही दिन पहले इदन्‍मम् पढा़ था। दोनों ने बहुत उद्वेलित किया था। चार्ज किया था। लेकिन जीवन का ढर्रा ऐसा है कि वक्‍त निकल नहीं पाया। कल आजकल में पं.जसराज के भजनों की कैसेट की समीक्षा पढी़। शाम को कैसेट खरीद भी ली। रात से सुन रहा हूं। अभी जो भजन चल रहा था वह भी वैसे ही चार्ज कर रहा था। सोचा कम से कम यह बात तो दर्ज कर दूं। रह जाएगी तो रिस जाएगी। विस्तार से बाद में लिखूंगा इन पिछले दिनों की मन: स्थिति के बारे में। नीरवता के आनंद के बारे में। साहित्य की सहचरता के बारे में। संगीत के राग के बारे में।

 
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रेखांकन : सुमनिका, कागज पर चारकोल


साहित्य साहचर्य

16/05/98 शाम 5 बजे मथुरा, मुंबई अमृतसर स्वर्ण मंदिर मेल में

बाहर गर्मी बहुत है। भीतर (ए सी में) शांति है। पिछले दिनों की साहित्य साहचर्य की बातें दिमाग में हैं। पता नहीं आज भी लिखी जाएंगी या नहीं। गाडी़ हिचकोले जम के ले रही है।

इदन्‍मम् में राजनैतिक कार्यनीति की एक रूपरेखा उभरती है। वही उसकी रीढ़ है। हालांकि भाषा की गुंझलक ज्यादा है। जनता के बीच से जनता का आदमी (बल्कि औरत) दु:खों से तप के निकले (जनता में भी किसान) और जागरण या आंदोलन की अगुआई करे। मानवीय रहते हुए, सहज साधारण रहते हुए, इच्‍छा-शक्ति को संजोए रखते हुए। मंदाकिनी ऐसी ही युवती है।

चाक भी सुंदर प्रभावशाली उपन्यास है। सारंग नैनी के चरित्र में बहुत उठान है। राजनिति की धक्‍कमपेल प्रत्‍यक्ष है। प्रधान, प्रधान पद के प्रत्‍याशी, जातिवाद, भ्रष्टाचार, आदर्श पर अडिग अध्‍यापक। इस सारे चहबच्‍चे के बीच सारंग का चरित्र विकल्प के रूप में उभरता है। सच्चाई का पक्षधर। पति से भी लोहा ले लेने वाली। संबंधों की अंतर्धाराएं, सभी चरित्रों की गजब की हैं।

उपन्यास में पाठक को धर दबोचने की शक्ति भी है। क्या यह राजनैनिक कथा-वस्‍तु के कारण है, चारित्रिक सघनता के कारण है, समाज की बेहतरी के विचार के कारण है, पूरी लेखन कला के कारण है? शायद इन सभी कारणों से है।

एक और मकनातीसी कारण है। सारंग और श्रीधर मास्‍टर का प्रेम। श्रीधर अपने कर्तव्य के प्रति अडिग है। सारंग अन्याय से लड़ने के लिए हर बार श्रीधर से ही ताकत पाती है। तथाकथित सामाजिक नैतिकता से ऊपर उठा हुआ प्रेम-पाश है। यह भी पाठक को बांधता है। इन दोनों चरित्रों के कारण एक ऊर्जा प्रवाहित होती है। बाहरी स्तर पर नाटकीयता भी बनती है।

पं. जसराज के कंठ में सरस्‍वती है। भजन बडे़ सुंदर गाए हैं। आह्लादित करते हैं। संगीत में ताल मेरी पकड़ में पहले आती है, शायद इसलिए भी ये भजन आकर्षक लगे हों। देह उस ताल के वशीभूत होने लगती है। बहुत साल पहले रेडियो से फिलर के रूप में शहनाई का एक टुकडा़ बजा। मैंने रिकार्ड कर लिया। बाद में पता नहीं, उसे कितनी बार सुना। जितनी बार सुना, उतनी बार उसने देह को पिघला दिया। पता नहीं वैसे संगीत का कैसा असर होता है कि देह वश में नहीं रहती। खो जाती है। ये शब्द भी उस मन:स्थिति के लिए उपयुक्‍त नही लग रहे। पूरी तरह प्रकट नहीं कर पा रहे। फिर से जसराज के ये कृष्ण भजन सुने जाएं, तो पता नहीं कैसे लगें।

इदनमम् और चाक से पहले नरक कुंड में बास (जगदीश चंद्र), पांचवा पहर (गुरदयाल सिंह, पजांबी) अनुभूति (हेमांगिनी रानाडे) उपन्यास पढे़ थे। नरक कुंड में बास दलि‍त चेतना का बडा़ निर्मम यथार्थवादी उपन्यास है। सारे वर्णन बडी़ निर्ममता से किए गए हैं। एक दूरी, एक ठंडेपन से। अतिरिक्‍त भावुकता के बिना। पाठक चमडे़ के कारखाने के जीवन के चित्रण से दहलता चला जाता है। शिल्प की परवाह जगदीश चंद्र ज्यादा नहीं करते।

पांचवा पहर तो साधारण उपन्यास है। अनुभूति भी। यह मुंबई के पारसी समुदाय पर है। एक समाप्त होती हुई जाति की कहानी। बिन मां-बाप की एक संघर्षशील लड़की की कहानी। हेमांगिनी जी को भाषा और वर्णन के लिए और मेहनत करने की जरूरत है। (ये बात अगर उनको पता चले तो वे दुखी हो जाएं। मेरी पिटाई भी हो जाए।) इस उपन्यास के बाद पहल में मैत्रेयी पुष्‍पा की कहानी राय प्रवीण पढी़ थी। बडा़ प्रभावशाली वर्णन। आलोड़ित कर देने वाला। वह कहानी आधी पढ़ ली थी, कुछ पंक्तियां सुमनि‍का को सुनाने लगा तो ऐसा समा बंधा कि सारी कहानी ही सुना डाली। अंत तक पहुंचते-पहुंचते उसने द्रवि‍त कर दिया। सहज मनोदशा में लौटने में वक्‍त लगा। भावुकता का उद्रेक पेश करना क्‍या कहानी की कमजोरी है?

ट्रेन में शिव प्रसाद सिंह का गली भागे मुड़ती है पढ़ना शरू किया। उपन्यास में वैसी ताकत नहीं है। लगा मैत्रेयी के उपन्‍यासों के प्रभाव को अगर दर्ज नहीं करुंगा तो काशी की बाढ़ में ये धुल जाएंगे। यह अभी तक साधारण उपन्यास लगता है। बहुत पहले इन की लिखी हुई श्री अरविंद की जीवनी उत्तर योगी पढी़ थी। बडी़ अच्छी लगी थी।

Monday, November 4, 2013

कोरा कागज

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रेखांकन: सुमनिका, कागज पर चारकोल

डायरी के ये अंश सन् 1997 से 2000 के बीच के हैं। तब तक आईडीबीआई छोड़कर यूटीआई में स्‍थाई तौर पर आ गया था। हालांकि यह स्‍थायित्‍व भी ज्‍यादा चला नहीं। इस समय में नौकरी और रोजमर्रा की जिंदगी के ढर्रे का तानपूरा लगातार छिडा़ हुआ है। बीच-बीच में लिख न पाने की टूटी-फूटी तानें हैं। अल्‍पज्ञ रह जाने का शोक है। कट्टरवाद की एक ठंडी लपट है और रत्‍ती भर वर्तमान में से अतीत में झांकना है। पता नहीं इन प्रविष्टियों के लिखे जाने, छपने और पढ़े जाने का कोई मतलब भी है या नहीं। डायरी के ये टुकड़े हिंदी साहित्‍य की नवीन नागरिक कविता-पत्रिका सदानीरा के हाल में आए दूसरे अंक में छपे हैं।

05/01/98
इस बीच कई दिन बीत गए हैं। कई रातें गुज़र गई हैं। न कविता हूक बन के दिल में समाई। न छुट्टी वाली रात को हाहाकार बन कर निकली। दिसंबर खत्म हो गया। यानी सन् सत्‍तानवे खत्म हो गया। यानी एक और साल बीत गया। अ भी-अभी थोडी़ देर पहले सोच रहा था क्या किया। इतने साल बीत गये। लिखना तो दूर की बात, मसले ठीक से समझ भी नहीं पाए। समझ बनी ही कहां। उमर चालीस की हो गई। जैसे अभी तक कुछ पल्ले पडा़ ही नहीं है। सोचा था साहित्य अपना क्षेत्र है। लेकिन साहित्य की भी समझ कहां है? जेब में कोरा कागज़ ही है। उस पर ककहरा भी नहीं उकेरा गया है। जब कागज़ ही कोरा है तो लिखा कहां से जाएगा।

क्या यह अवसाद का दौरा है? हो सकता है, कुछ हद तक अवसाद ही हो। या हो सकता है कुछ न कर पाने की कुंठा हो। सुमनिका तो कहती है, चिढे़ हुए रहते हो। चेहरा भी वैसा ही दिखता है। तो क्या चेहरे में भी चिढ़ भर गई है।
नौकरी तो दिमाग़ पर चारों याम छायी ही रहती है। (इससे बडी़ मुसीबत और क्या होगी) इधर रेडियो वालों ने फंसा दिया है। भारती पर प्रोग्राम बनाने का बिल्कुल मन नहीं है। रत्‍ती भर उत्साह नहीं है। वे इस बात को समझते नहीं। सुमनिका भी नहीं समझती। मना कर देने का मन है पर किसे कैसे कहा जाए।

भारती को पूरा पढा़ भी नहीं है। छिटपुट पढा़ई के बूते पर न्याय नहीं हो जाएगा। उससे बडी़ बात यह कि जो प्रोग्राम उनके मरणोपरांत उनके जन्म-दिन का देखा 'पुष्पांजली', उससे मन और भी मर गया है। काफी फूहड़ था।

कविताओं के प्रति यही धारणा बन रही है कि वासना लिप्त मांसलता का ही गान भारती ने किया है। कविता में वे उससे बाहर नहीं निकले। जहां कविता में कथात्मकता या चरित्र या मिथ या इतिहास या पुराण का सहारा लिया गया है, वहां समाज की व्याख्या होने लगती है। अंधायुग उसका चरम है जबकि कनुपिया मिथक के सहारे के बावजूद दूसरे छोर की कविता है। देह की उपासना। कुल मिला कर भारती आकर्षित नहीं करते। (आज 2013 में सोचता हूं, यह कितना सरलीकरण है)




Friday, June 29, 2012

अबे! ओ!! कवि!!!

Achhi kavita likh 0612
तू लिक्‍ख
कागज को घोच मत
अच्‍छी कविता लिक्‍ख

Saturday, November 5, 2011