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Sunday, May 17, 2026

नहीं रहे अदरक के पंजे


मशहूर नाटक अदरक के पंजे के लेखक निर्देशक अभिनेता बब्बन खां का 17 अप्रैल 2026 को निधन हो गया। उनके इस एक नाटक ने दुनिया में कई तरह के रिकॉर्ड बनाए। यह 1965 से 2001 यानी तीन दशकों तक खेला जाता रहा। 1984 में ही यह एक अभिनेता द्वारा सबसे अधिक समय तक खेले जाने वाले नाटक के रूप में गिनीज़ बुक में आ चुका था। इसके प्रदर्शन मुंबई में भी हुए हैं। मैंने यह नाटक 1988 में देखा था। कुछ दिन पहले मुझे इसके प्रदर्शन पर अपनी टिप्पणी पुराने कागज़ों में मिली थी। यानी यह टिप्पणी 38 साल पहले की है। तब मैं नाटकों को अपनी तरफ से पैनी नजर से देखता था और लिखते वक्त लिहाज नहीं करता था। इस टिप्पणी में भी आप उस तेवर की झलक पाएंगे। अब कई बार लगता है इतना कठोर रवैया भी ठीक नहीं। पर नेमिचंद्र जैन ने मुझे एक बार कहा था कि नख-दंत विहीन समीक्षा नहीं होनी चाहिए। मैंने उनकी यह बात गांठ बांध ली थी। बिना यह जाने कि नाटक और रंगमंच की मेरी समझ कितनी कच्ची थी। बहरहाल! यह टिप्पणी पेशेनजर है। 


अदरक के पंजे

स्वनामधन्य बब्बर खान और उनका ख्यातिप्राप्त नाटक अदरक के पंजेअभी भी अपनी प्रसिद्धि के झंडे गाड़ता जा रहा है। 1987 में ही उसके 7000 प्रदर्शन पूरे होने वाले थे, अब तो अट्ठासी का भी  एक महीना बीत गया और इस नाटक के प्रदर्शन बदस्तूर जारी हैं। यह बब्बन खान का ही साहस है कि वे उसे पिछले तेइस वर्षों से खेलते आ रहे हैं। अपने उत्साह के बलबूते पर ही उन्होंने दुनिया के छोटे बड़े कई देशों में इसे प्रदर्शित किया है और कई नामी गिरामी हस्तियों की सम्मतियां हासिल की हैं। 

काफी लोगों ने इस नाटक को देखा होगा और इसकी कहानी से वाकिफ होंगे, कि रमतू मियां (नायक) फटेहाल सरकारी नौकर हैं। उनके आठ बच्चों ने उन्हें कंगाल, बदहाल बना दिया है। बी पाशा उनकी पत्नी और रमतू मियां शायद गुरवत की वजह से ही चिड़चिड़े मिज़ाज के हैं। पर वे दोनों बड़बोले भी हैं। एक तरह से मुंहज़ोर। किसी को कुछ भी कह देने में उनकी ज़ुबान लिहाज़ नहीं करती। वे अपनी इस ज़ुबानबाज़ी से हास्य पैदा करने की कोशिश करते हैं। इस कोशिश में वे खुद और सारा कारोबार हास्यास्पद हो जाता है। अदरक के पंजेमें नाटक के लायक कहानी नहीं है। कहानी के नाम पर कुछ पात्र (सेठ, दूधवाला, लाला, पड़ोसी, ससुर, साला आदि) मंच पर आते हैं और अपने पैसे वसूलने, खाना खाने आदि के लिए बहस करते हैं। बब्बन खां अपनी ऊल जलूल बतंगड़ी से उन्हें पटकन देते रहते हैं। सरकार के परिवार नियोजन की तर्ज पर ज्यादा बच्चे पैदा करने की गलती के एहसास के साथ नाटक समाप्त होता है।  

इस नाटक में स्टेज क्राफ्ट के नाम पर फटेहाल घर के दृश्यबंध के अलावा सर्कसी जोकरों की तरह के पात्र और अटपटी भंगिमाएं हैं। भंगिमाएं अभिनय बिल्कुल नहीं हैं। मंच के बीचोंबीच एक तख्त पड़ा है। उसके साथ एक कुर्सी है। सामने एक-एक माइक्रोफोन रखा है। रमतू मियां अपवाद स्वरूप दो एक बार उठने के सिवा सारा वक्त तख्त पर जमे रहते हैं। हर आने वाला पात्र तख्त के बगल में रखी या दूसरे कोने की कुर्सी पर बैठता है और उनका वाक्युद्ध शुरू हो जाता है। यह वाक्युद्ध चुटकुले से शुरू होता है और फूहड़ता में खत्म होता है। सारा नाटक चुटकुलों से अटा पड़ा है। शुरू के पंद्रह मिनट कुछ चुटकुले सुन लेने के बाद कोई भी दर्शक बब्बन खां की प्रतिभा का अनुमान लगा लेता है। मसलन आने वाला पात्र अगर किसी तरह गधे का प्रसंग ले आया तो खां साहब तीसरे ही संवाद में उसे गधा साबित कर देंगे। इसी तरह पात्र को कुत्ता, पागल या भिखारी भी सिद्ध किया जाता है। रमतू मियां अपनी बेचारगी का भी खूब मज़ाक उड़ाते हैं। इस सारे ताम-झाम में उनका मकसद दर्शक को हंसाने का रहता है। 

करीब तीस साल पहले इस नाटक का प्रदर्शन शुरू हुआ था। तब से अब तक शायद कुछ चुटकुले और जोड़े गए हों, कहानी संभवत: वैसी ही चल रही है। अगर चुटकुलों को ही कहानी मान लिया जाए तो निश्चित रूप से कहानी में काट-छांट हुई है। यहां भी बब्बन खां वक्त से पिछड़ गए हैं। उनके एक दोस्त मिर्ज़ा साहब अपने बिगड़ैल बेटे के साथ मंच पर आते हैं और रमतू मियां से बेटे को सुधारने की सिफारिश करते हैं। लड़का बातें तो आज की करता है लेकिन उसका रूपाकार सातवें दशक का है। अगर खां साहब लड़के के रूपाकार को समकालीन बनाते तो उन्हें उससे जुड़े हुए चुटकुले भी बदलने पड़ते।  

गतिविधियों के नाम पर नाटक सिफर है। केवल पात्रों के आने जाने और परिधान में पारसी रंगमंच की छाप दिखती है। पारसी रंगमंच में भी हंसोड़ पात्र और स्थितियां होती थीं। बब्बन खां ने हंसोड़ पात्र खड़े करने की कोशिश की है, स्थितियां बनाने की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। यह स्पष्ट है कि बिना स्थितियों के नाटक का स्वरूप ही नहीं बन सकता। उनका सारा ज़ोर उच्चरित शब्द पर है। इस तरह यह नाटक रेडियो नाटक के रूप में ज्यादा न्याय संगत होता। इस सब के बावजूद वर्षों से नाटक को मंच पर प्रस्तुत करते रहने का अर्थ हुआ, दुनिया भर के सारे नाट्यशास्त्रों को खारिज कर देना। 

अतः एक जरूरी सवाल यह पैदा होता है कि हद दर्जे का अनाटक वर्षों से नाटक के नाम पर क्यों और कैसे चल रहा है ?   सीधा सा जवाब बब्बन खां की हठधर्मी के रूप में दिया जा सकता है। लेकिन व्यावसायिकता के इस युग में एक आदमी की हठधर्मिता की क्या बिसात। निश्चित रूप से इसकी सफलता के पीछे कुछ दूसरे कारण भी काम कर रहे हैं। सबसे बड़ी बात दर्शक की रुचि है। सभ्यता संस्कृति के विकास के बावजूद एक दर्शक वर्ग फूहड़ता और निरर्थकता में रस ले लेता है। कला को परखने के संस्कार उसमें नहीं हो सकते हैं पर वह सुघड़ता-फूहड़ता, सार्थकता-निरर्थकता के फर्क को भी नहीं समझता। उसे प्रसंगहीन हास्य (जो हास्यास्पद ज्यादा है) में ठहाके लगने का मसाला  मिल जाता है। उपभोक्ता संस्कृति का करिश्मा भी इस नाटक की सफलता एक कारण है। विज्ञापन की चकाचौंध उपभोक्ता को चुंधियाने में कोई कसर नहीं छोड़ती। जैसे जैसे बब्बन खां ने लगातार प्रदर्शन किए, नाटक की सफलता के ढिंढोरे से दर्शक को बरग़लाना शुरु कर दिया। इस नाटक के प्रदर्शनों में वे अपनी उपलब्धियों को भुनाते हैं। जैसे उनका नाम गिनीस बुक में शामिल हो गया है। इसी तरह कुछ बड़ी हस्तियों को आदमकद चौखटों में बंद करके प्रचार के लिए रखा जाता है।   

इस बहु प्रदर्शित नाटक के बारे में कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि इससे हमारे दर्शक की नाटक को परखने की असमर्थता प्रकट होती है। और उधर बब्बन खां एक चालाक प्रदर्शक की तरह मनोरंजन के नाम पर दर्शक को नासमझी के अंधेरे से बाहर नहीं निकलने दे रहे। हमें बब्बन खां जैसे तमाम सफल प्रदर्शकों और मनोरंजन प्रेमी दर्शकों,  दोनों पर गहराई से सोचना होगा। (सन 1988)

          


Sunday, January 25, 2026

रेगिस्तान में पानी



खबर मिली कि नाटशाला के सिरजनहार सरदार जतिन्दर बरार नहीं रहे। 
नाटशाला पर अपनी पुरानी पोस्ट फिर से साझा कर रहा हूं।
मुझे सन 2011 में अमृतसर में उनके बनाए थियेटर पंजाब नाटशाला देखने का मौका मिला था.  
उस समय उत्‍तर भारत में शिमला में गेयटी थियेटर और चंडीगढ़ में टेगोर थियेटर के अलावा 
और कोई नाम ध्‍यान में नहीं आता था. अब तो उस तरफ नाट्य गतिविधियां होने लगी हैं।

अमृतसर की पंजाब नाटशाला अपनी तरह का नवीन नाट्यगृह है. 
खासियत यह है कि यह एक अकेले व्‍यक्ति का उद्यम है.  

हिंदी भाषी क्षेत्रों में नाटक खेलने की परंपरा एक लगभग सूखी हुई नदी की तरह है. रामलीला को छोड़ दीजिए तो नाटक कुछ ही शहरों में होते हैं. प्रायः न नाटक होते हैं, न ही लोगों में नाटक देखने की रुचि का ही विकास हुआ है. जो नाट्यकर्म होता भी है उसमें अधिकतर कलानुरागी (एमेच्‍योर) किस्‍म का होता है. नाटक नहीं हैं तो नाट्यगृह भी नहीं हैं. सरकार ने किसी जमाने में राज्‍यों की राजधानियों में कविगुरू रवींद्र के नाम पर प्रेक्षागृह बनवाए थे. लेकिन बाकी शहरों में सन्‍नाटा है. जैसे साहित्यिक किताबों की दुकानों का अकाल है. ऐसे माहौल में जब कोई अकेला व्‍यक्ति पहल करता है तो उम्‍मीद जगती है कि धीरे धीरे कला आस्‍वाद की परंपरा बनेगी. 


मंच पर नाटक का पूर्वाभ्‍यास चल रहा है
ऐसा ही एक अकेला बंदा गुरुओं की तीर्थ नगरी अमृतसर में है जिसने वहां नाटक का एक तीर्थ निर्मित कर दिया है. जतिंदर बरार ने 1998 में पंजाब नाटशाला की नींव रखी और धीरे धीरे इसे एक शानदार नाट्यगृह में बदल डाला है. पेशे से इंजीनियर श्री बरार कई साल विदेश में रहे. देश का प्रेम और नाटक का शौक उन्‍हें वापस हिंदुस्‍तान खींच लाया. अमृतसर शहर के पुतलीघर इलाके में लगी अपनी फैक्‍ट्री को शहर से बाहर ले गए और वहां एक प्रेक्षागृह बना दिया. 


बरार की इंजीनियरी आंख ने इस सभागार को तकनीकी रूप से अत्‍याधुनिक प्रेक्षागृह बना दिया है. इसका मंच घूमने वाला (रिवाल्विंग) है. हमारे देश में घूमने वाले मंच  कम ही हैं. इस तरह के मंच में दृश्‍यबंध बदलने में आसानी होती है. पार्श्‍व में दृश्‍यबंध तैयार रखा जाता है. जैसे ही एक दृश्‍य खत्‍म होता है और अंधेरा होता है तो बिजली चालित मंच घूम जाता है. पिछला हिस्‍सा आगे अगला पीछे चला जाता है. मंच आलोकित होने पर दर्शक के सामने नया दृश्‍य संसार साकार हो जाता है. आम तौर पर नाटक में अभिनेता अगल बगल से प्रवेश करते हैं, लेकिन पंजाब नाटशाला के मंच पर जरूरत पड़ने पर पात्र मंच फाड़ कर यानी नीचे से भी प्रकट हो सकता है. नाटशाला में इस सुवि‍धा को एक नया आयाम कहा जा सकता है. एक हाइड्रालिक लिफ्ट लगाई जा रही है जिसके जरिए दृश्‍यबंध उठाकर मंच तक पहुंचाया जा सकेगा. जिन नाटकों में बड़े और ज्‍यादा सेटों की जरूरत हो, उनके लिए यह लिफ्ट फायदेमेद रहेगी. दृश्‍य परिवर्तन में समय कम लगेगा और नाटकीय प्रभाव भी पड़ेगा. बरार साहब को नाटक के दौरान और भी कई तरह के चामत्‍कारिक किस्‍म के यथार्थवादी प्रभाव पैदा करने का शोक है. ऐसी व्‍यवस्‍था की गई है कि अगर नाटक में बरसात का दृश्‍य हो तो छींटे दर्शकों पर भी पड़ जाते हैं. रसोई में पंजीरी बन रही हो तो खुशबू दर्शकों को भी आ जाती है. श्री बरार इन प्रभावों का जिक्र बड़े चाव से करते हैं. उनके लिखे नाटकों में इस तरह के दृश्‍य रहते हैं. नाटक में आम तौर पर दर्शक की सुनने और देखने की इंद्रियों का प्रयोग होता है. बरार साहब अपने दर्शक को सूंघने और छूने का सुख भी देना चाहते हैं. इस तरह वे दर्शक को यथार्थ का सांगोपांग किस्‍म का अनुभव देना चाहते हैं. उन्‍होंने एक नए नाट्य प्रभाव का जिक्र भी किया जिसमें नदी या तालाब यानी पानी के होने का वास्‍तविक प्रभाव पेदा किया जा सकेगा. इतना ही नहीं सैलोरामा पर पानी में झिलमिलाती रौशनियों का प्रभाव भी आ सकता है. यथार्थवादी और ऐतिहासिक नाटकों के लिए इस तरह की सुविधाओं की जरूरत पड़ती है.  


दृश्‍यबंध से सजा मंच
पिछले दस बारह सालों में उन्‍होंने इस प्रेक्षागृह को एक नाट्य संकुल का रूप दे दिया है. बड़े बड़े ग्रीन रूम बनाए गए हैं. वस्‍त्राभूषण का एक भंडारगृह है. बाहर से आने वाली मंडलियों के लिए अतिथिशाला है. प्रेक्षागृह भी अब वातानुकूलित हो गया है. पंजाब नाटशाला को जतिंदर बरार ने घर की तरह स्‍नेह और चाव से खड़ा किया है. लगभग हर वस्‍तु में उनकी छाप नजर आती है. इंजीनियर होने के नाते उन्‍होंने तकनीक के नए नए प्रयोग किये हैं, प्रेक्षागार के अंदर भी और बाहर भी. बरार सा‍हब नाटशाला को एक सामाजिक जिम्‍मेदारी की तरह लेते हैं. उनके खुद के लिखे नाटक सामाजिक समस्‍या प्रधान नाटक हैं. नाटक के दर्शकों में अभिरुचि जगाने के अलावा परिसर की सफाई और सजावट पर भी उनका ध्‍यान रहता है. यहां तक कि मध्‍यांतर में परोसे जाने वाले चाय नाश्‍ते की नफासत में भी उनकी छाप दिख जाती है. नाटशाला की एक और खासियत है कि हरेक प्रदर्शन के बाद राष्‍ट्रगान गाया जाता है. समय की पाबंदी यहां की एक और खासियत है. समय की यह पाबंदी तब भी बरकरार रही जब पंजाब के मुख्‍यमंत्री कैप्‍टन अमरेंद्र सिंह नाटक देखने आए. मुख्‍यमंत्री नाटक और परिसर से इतने प्रभावित हुए कि सारे राज्‍य को नाटक पर लगने वाले मनोरंजन कर से छूट मिल गई. 


प्रकाश व्‍यवस्‍था
एक बार को ऐसा लगता है कि बरार साहब का झुकाव ऐंद्रिक यथार्थपरकता की तरफ ज्‍यादा है. लेकिन इसका अपना महत्‍व है. दर्शक को आकर्षित करने में ये तरकीबें काम आती हैं. इस तरह की ऐंद्रिक यथार्थपरकता से दर्शक के नाट्य अनुभव में भी गहनता आती है. जिस तरह हास्‍य नाटक दर्शकों को खींचते हैं. तकरीबन सभी रंगमंडलियां उसमें मिर्च मसाला भी डालती ही हैं. पंजाब नाटशाला में भी हास्‍य नाटक होते हैं. टेलिविजन के लाफ्टर चैलेंज वाले राजीव ठाकुर और भारती सिंह इसी नाटशाला से निकले हैं. अगले दौर में हम एम्‍मीद कर सकते हैं कि पंजाब नाटशाला से कुछ और नए अभिनेता, निर्देशक और नाटककार निकलेंगे.

अब यहां दूसरे शहरों की रंगमंडलियां भी नाटक करने आती हैं. कई पाकिस्‍तानी नाटकों का मंचन भी हुआ है. नाटशाला ने अपना एक दर्शक वर्ग बना लिया है. स्‍कूली बच्‍चों के लिए भी नाटक के प्रदर्शन किए जाते हैं. हमारे समाज को जतिंदर बरार जैसे कई धुनी लोगों की जरूरत है.

पंजाब नाटशाला की और अधिक जानकारी यहां है.

कुछ और चित्र- 


भीतरी दीबारें 
सभागार में प्रवेश
बांस के दरवाजे









 
 

 

जतिंदर बरार अपने दफ्तर में

जतिंदर बरार और सुरेंद्र मोहन मेहरा के साथ









Monday, April 28, 2025

बंदिशों पर बंदिश


26 अप्रैल को नेहरू सेंटर में बंदिश नाटक देखा। यह नाटक पूर्वा नरेश का लिखा हुआ है और उन्होंने ही इसका निर्देशन किया है। प्राय: पूर्वा के नाटक संगीत प्रधान होते हैं। कह सकते हैं कि संगीत उनके नाटकों का स्थाई भाव होता है। इस नाटक की तो विषय-वस्तु भी संगीत से जुड़ी हुई है। आजादी की 70वीं सालगिरह के मौके पर किसी दूर दराज के इलाके में शायद एक सरकारी कार्यक्रम हो रहा है जिसमें संगीत के पुराने कलाकारों को केवल सम्मानित किया जाना है। नए जमाने के कलाकारों के गीत पेश किए जाएंगे। बदलते समय के साथ बदलते संगीत संसार की दास्तान इस नाटक में कही गई है। दास्तान के बहाने नाटक में इस तरह का विमर्श चलता है कि संगीत और कलाकारों पर किस-किस तरह की बंदिशें लगती आई हैं।  

एक जमाने में तवायफें या कोठेवालियां संगीत का परचम फहरा रही थीं। राजाओं राजवाड़ों का प्रश्रय उन्हें प्राप्त था। धीरे-धीरे उनका ओज मंद पड़ गया। उनकी सामाजिक हैसियत कम हो गई। माली हालत भी खस्ता हो गई। इसी तरह नौटंकी कलाकार जनता में लोकप्रिय तो बहुत थे, लेकिन शुचितावादी सोच उन्हें सम्मान नहीं देती। समाज में नौटंकी कलाकारों को अच्छा नहीं माना जाता था। आकाशवाणी जैसा सरकारी महकमा भी शायद इसी तरह की शुचितावादी सोच से प्रभावित होकर तवायफों के गायन पर रोक लगा चुका है। एक जमाने में हारमोनियम पर भी बंदिश लगाई गई थी।  

इसके बरक्स नए जमाने में बंदिशों या बंधनों या सीमाओं के नए तौर-तरीके आ गए हैं। जैसे युवा गायिका मौशमी बहुत लोकप्रिय है पर वह अब सभाओं में नहीं गाती। वह केवललिपसिंक' करती है। यानी रिकॉर्ड किया हुआ गाना बजता है, वे गाने का अभिनय मात्र करती हैं। दूसरे युवा गायक कबीर पड़ोसी देश में प्रोग्राम करने के कारण सोशल मीडिया के नए रोगट्रोलिंगका शिकार हो गए हैं। यह किसी व्यक्ति या संस्था द्वारा लगाई गई रोक नहीं है। एक कलाकार टेक्नोलॉजी की सहायता के बिना नहीं गा सकती। और दूसरा टेक्नालॉजी के ही रथ पर सवार सामाजिक रोष का शिकार हो जाता है। आयोजक ट्रोलिंग में फंसे कलाकार से गीत गवाने का जोखिम नहीं उठाना चाहते।  

संगीत की दुनिया की यह सारी चर्चा, बहस या विमर्श इस नाटक में बेहद चुटीले अंदाज में चलता है। मुन्नू और नौटंकी की गायिका चंपाबाई की नोक झोंक और बाबू की बौखलाहट मंच को जीवंत बनाए रखती है। नौटंकी गायिका चंपा बाई और उपशास्त्रीय संगीत की गायिका बेनी बाई परस्पर पेशेवराना ईर्ष्या करती रही हैं। अब मौका पाकर अपने-अपने मन कर बात करके वे जी हल्का कर लेती हैं। अंतरंग सहेलियों की तरह एक दूसरे का गायन सुनती हैं। ज़मीन पर बैठ कर दो बूढ़ियों की खिलखिलाहट जी खुश कर देती है। लेकिन थोड़ी देर बाद जब वे सब गीत गाने न गाने के बारे में बात करते हैं तो नब्बे वर्षीय बेनी बाई मंच पर चलते हुए और बतियाते हुए नब्बे वर्षीय नहीं लगती। उनकी आवाज भी किंचित कम उम्र लगने लगती है।       

सभी कलाकार अभिनय करने के साथ-साथ गाने में भी माहिर हैं। लेकिन जहां ठहर कर या लंबे समय तक ठुमरी, दादरा या शास्त्रीय गायन करना होता है वहां एक अन्य प्रशिक्षित गायिका मंच संभाल लेती हैं।  

निर्देशिका ने पात्रों के बीच आवागमन की एक तरकीब इस्तेमाल की है। नौटंकी वाली चंपा बाई और तवायफ बेनी बाई उम्रदराज कलाकार हैं। जब उनकी जवानी के दिनों के फ्लैशबैक में जाने का दृश्य आता है तो युवा गायिका मौशमी बेजोड़ ढंग से (seamlessly) युवा अवतार में चली जाती है। इससे बूढ़े शरीर की मर्यादा भी बनी रहती है और युवावस्था की फुर्ती और आवाज़ का टटकापन भी साकार हो जाता है। पुराने जमाने को दिखाते हुए आजादी की लड़ाई में गायिकाओं के योगदान के बहाने कलाकारों के सामाजिक सरोकारों को भी दर्शाया गया है। 

नाटक में इस बात पर जोर दिया गया है कि कलाकार को अपनी आवाज बंद नहीं करनी चाहिए। उसे हर हाल में अपनी कला के माध्यम से अपने समय पर टिप्पणी करनी ही चाहिए।  

नाटक में अंत तक आते-आते स्थिति यह बन जाती है कि एक भी कलाकार गीत पेश करने के लिए उपलब्ध नहीं है। तवायफ रेडियो पर प्रतिबंधित होने के बाद गाना छोड़ चुकी हैं। नौटंकी की गायिका को गाने की इजाजत नहीं दी जाती है। उन्हें केवल सम्मानित किए जाने के लिए बुलाया गया है। यह भी एक विडंबना ही है। युवा मौशमी नए जमाने की तामझाम वाली गायिका है। केवललिपसिंककरती है। बिजली चले जाने की वजह से वह गाने से लाचार है। युवा गायक कबीर लोकप्रिय होने के बावजूद ट्रोलिंग का शिकार है इसलिए आयोजक उसका गाना रद्द कर देते हैं।  

सारे बहस मुहाबसे के बाद चारों गायक मिलकर अपने ही लिए गाते हैं और मंच से बाहर चले जाते हैं। एक तरह से वे आयोजन का बहिष्कार कर देते हैं। वे इस बात की भी तस्दीक करते हैं कि संगीत पर लोग बंदिश लगाते हैं, लेकिन वे बंदिश में गाते हैं। पुरानी बंदिशों का संभाल कर रखते हैं।  

पूर्वा नरेश की संस्था आरंभ के इस नाटक का यह प्रदर्शन आदित्य बिरला सेंटर फॉर परफॉर्मिंग आर्ट्स की तरफ से आयोजित था। संगीत शुभा मुद्गल का तैयार किया हुआ है। मंच पर तबले और हारमोनियम पर पूर्व जागड़ और वरुण गुप्ता थे। सभी कलाकारों ने नाटक को एक यादगार पेशकश में बदल दिया। मंच पर ये कलाकार थे- चंपा बाई - अनुभा फतेहपुरिया, बेनी बाई - निवेदिता भार्गव, मौशमी/युवा चंपा और युवा बेनी - इप्शिता सिंह चक्रवर्ती,  कबीर - शायोन सरकार, बाबू - हर्ष खुराना और मुन्नू - दानिश हुसैन। 

पिछले कुछ समय से नाटक के साथ-साथ सभागार के माहौल के बारे में भी आपको जानकारी देता आ रहा हूं। यह नाटक नेहरू सेंटर के सभागार में खेला गया। नाटक से पहले और मध्यांतर में शुरुआती हॉल में जहां पैंट्री है, अच्छी खासी भीड़ देखी जा सकती है। यहां 30-30 रुपए में जंबो बटाटा बड़ा और समोसा मिल रहा था। चाय कॉफी ₹50 में। अधिकांश भोजन-सजग दर्शक अपनाचीट डेमनाते प्रतीत हो रहे थे। नेहरू सेंटर में इस सभागार के अलावा भारत की खोज की एक स्थाई प्रदर्शनी है। एक दो और सभागार हैं। एक कैफे है एक रेस्त्रां। इसी परिसर में तारांगण भी है। यह एक पुराना सांस्कृतिक ठिकाना है।

Tuesday, February 25, 2025

चांदनी रातें - भारत में रूस की बातें

 


नरेश सक्सेना जी के आमंत्रण पर हम दोनों 1 फरवरी को चांदनी रातें नाटक देखने गए थे। वहां मित्र मिलन भी हो गया- विजय कुमार, ओमा शर्मा और मधु कांकरिया भी आई थीं। पहली बार सीरज सक्सेना जी से मिलना हुआ। अंग्रेजी कवि अश्विनी कुमार भी मिले। पहली ही बार कवि पत्रकार फिरोज खान भी मिले। जरा सी झलक अविनाश दास की भी दिखी। छह सौ से ऊपर की क्षमता वाला सभागार लगभग भरा हुआ ही था। भांति भांति के लोग। सजे धजे लोग।

सभागार था बाल गंधर्व रंग मंदिर। यह बांद्रा में लिंकिंग रोड के पास स्थित है। नाम से लगता है पुराना सभागार होगा। पर यह तो नूतन अवतार में है। अब इसका नाम है शीला गोपाल रहेजा ऑडिटोरियम। साफ सुथरा, बड़ा और भव्य पर भयभीत करने वाला नहीं। कई बार भव्यता भीति भी पैदा करती है।

पिछले कुछ समय में हमने कई सभागार देखे हैं। एनसीपी के तीनों ऑडिटोरियम; पृथ्वी तो देखते ही आए हैं; बीकेसी में नीता मुकेश अंबानी सांस्कृतिक केंद्र- यह भव्यता विशालता की वजह से दूरियां खड़ी करने में सक्षम है, पर वहां छोटे-छोटे सभागार भी हैं, वे नहीं डराते। माटुंगा कल्चरल सेंटर भी नवीकरण के बाद सहज है और पुराने जमाने की झलक देने वाला है। षणमुखानंद हॉल नवीकरण के बावजूद अपनी पहले ही जैसी धज लिए हुए मौजूद है। (इन सब की जानकारी आपको मेरे ब्लॉग की नाटक संबंधी टिप्पणियों में मिल जाएगी।)

बाल गंधर्व रंग मंदिर की कैंटीन नहीं कैफे शुरू में ही यानी लॉबी में ही एक तरफ है। चाय, कॉफी, समोसा, सैंडविच उपलब्ध हैं, पर महंगे नहीं हैं। मध्यवर्गीय दर्शक यहां चाय पीने में संकोच नहीं करेगा। इसी लॉबी में आगंतुकों के दर्शन हो जाते हैं‌। मध्यवर्गीय कला अनुरागियों से लेकर डिजाइनर पोशाकों वाले सजावटी कला प्रेमियों तक, सब।

चांदनी रातें नाटक पूर्वा नरेश ने लिखा भी है और निर्देशित भी किया है। यह दोस्तोएव्स्की के प्रसिद्ध लघु उपन्यास वाइट नाइट्स पर आधारित है। नाटक देखने के बाद घर आते ही सुमनिका ने प्रगति प्रकाशन की किताब ढूंढ़ निकाली। इसमें दरिद्र नारायण और रजत रातें नाम से दो लघु उपन्यास हैं। रजत रातें में व्यक्ति के भीतर चलने वाली उमड़-घुमड़ का इतना सघन वृत्तांत है कि उसे यथावत नाटक में बदलना आसान नहीं। कथा की तरह वाचन करना भी सहज नहीं। पूर्वा ने एक तरह से ठीक ही किया। कथा की तमाम नाट्य संभावनाओं का प्रयोग करते हुए एक बड़ा शाहकार पेश किया। अपने निर्देशकीय वक्तव्य में उन्होंने कहा भी है कि उस प्रेम कथा को आज के संदर्भ में पेश करना चुनौतीपूर्ण है। और वे वैसे भी एक संगीत प्रधान नाटक ही बनाना चाहती थीं।

मूल कहानी का किराएदार व्यापारी प्रेमी यहां सूत्रधार की भूमिका भी निभाता है। वह मूल कथा के दोनों पात्रों को पेश करता चलता है; उन दोनों के मिलने और लंबे लंबे वार्तालापों की संभावित एकरसता को तोड़ता चलता है। नाटक में मूल प्रेम कथा के समानांतर एक समसामयिक प्रेम कथा भी बुनी गई है। इस कथा का प्रेमी बिना कागजात के विदेश यानी रूस में आ गया है और प्रेमिका को साथ लेकर लौट जाना चाहता है। प्रेमिका ऐसा नहीं चाहती। वह विवाह भी कर चुकी है और यहां काम भी करती है। अंततः यहां भी वैसा ही आदर्श प्रेम साकार होता है। जैसा दोस्तोएव्स्की की मूल कथा में है। भीतर तमाम तरह की उथल-पुथल और बाहर आदर्श और त्याग से परिपूर्ण कहानी। यहां प्यार पाने की जद्दोजहद भी है। नाटक के बीच-बीच में आज के समय की विडंबनाओं, तकलीफों को भी उजागर किया गया है। केदारनाथ सिंह, विनोद कुमार शुक्ल, अशोक वाजपेयी जैसे हिंदी के नामी कवियों की पंक्तियों को सलमा सितारे की तरह टांका गया है। पता नहीं मकसद बड़े और चर्चित नामों को शामिल करना है या कथ्य को वजनदार बनाना। क्योंकि दो समानांतर प्रेम कथाओं के बावजूद जैसी तड़प, पीड़ा, सघनता और व्याकुलता और व्यापकता मूल कथा में है वैसी इस नाटक में अनुभव नहीं होती।

इस प्रेम कथा को एक विशाल भव्य संगीत नाटक के रूप में पेश किया गया है। अभिनेता गायन में भी प्रवीण हैं। मंच पर म्यूजिक बैंड भी है। दृश्यबंध में पीट्सबर्ग शहर को उभारा गया है। वहां नदी, आसमान, पुल, सीढ़ियां, छज्जे, बार, रेस्त्रां, पार्क, घर कई कुछ मौजूद है या थोड़े बहुत फेर बदल के साथ खड़ा कर दिया जाता है। प्रकाश का भी इसी के अनुरूप स्वप्निल प्रयोग किया गया है।

नाटक में रूसी माहौल का दृश्यांकन है। नाटकों में प्राय: जिस संस्कृति-समाज का चित्रण किया जाता है, वहां की दृश्यावलियां मंच पर निर्मित की जाती हैं। यह दृश्यबंध, पात्रों, उनकी वेशभेषा आदि के जरिए रूपाकार पाती हैं। कायदे से संवाद भी उसी समाज की भाषा के होने चाहिए। लेकिन तब संप्रेषण केवल उसी भाषा-भाषी दर्शकों में हो सकेगा। संसार के दूसरे भाषा-भाषी समाज तक बात पंहुचेगी ही नहीं। इसलिए भाषा को तो बदलना पड़ेगा ही। नाटक मंडली और निर्देशक की महारत इसी में निहित है कि वह किसी संस्कृति-विशेष के जीवन को किसी दूसरे भाषा-भाषी समाज तक ले जाए। और वे सारी दृश्यावलियां जीवंत और सच्ची लगें। चांदनी रातें में भी रूसी समाज नाटक के दृश्यबंध, पात्रों, उनकी वेशभूषा के कारण असली लगता है। रूसी संगीत उसे और प्रामाणिक बनाता है। हिंदी के संवाद यहां गैर भाषी नहीं लगते। रूसी समाज के इस प्रदर्शन को भारतीय संगीत और प्राणवान तथा प्रामाणिक बनाता है। भारतीय संगीत इस पूरी दृश्य रचना का अभिन्न अंग बन जाता है।

प्रस्तुति में सब कुछ बहुत चमकीला है। सुबद्ध है। त्वरा से भरा है। किसी तरह के झोल की कोई जगह यहां नहीं है। शायद सांगीतिक शाहकार होने की वजह से ही हर कलाकार के गाल के पास अदृश्य सा माइक्रोफोन लगाया गया है। उससे संवाद साफ सुनाई पड़ते हैं। इतने साफ जैसे रिकॉर्ड किए गए हों या जैसे हमें सिनेमा हाल में संवाद सुनाई पड़ते हैं। नाट्य गृहों में खेले जाने वाले नाटकों में प्राय इस तरह से माइक्रोफोन का प्रयोग नहीं होता है। लेकिन शायद संगीत की वजह से और पूरी प्रस्तुति की भव्यता को बरकरार रखने की लिए इन उपकरणों का प्रयोग किया गया हो। नाटक में एक पुरुष और दो स्त्रियों को शायद कोरस की तरह रखा गया है। ये किसी दृश्य में अतिरेकी किस्म की नाटकीयता पैदा करते हैं, किसी दृश्य में मुख्य पात्र के मन में घुमड़ रहे विचारों या भावों को व्यक्त करने में मदद करते हैं। और किसी दृश्य में नायिका के परिचर बनकर दृश्य को हल्का बनाने की कोशिश करते हैं। वे कभी मसखरे लगते हैं कभी सर्कस के पात्र, कभी साधारण पात्र। कभी-कभी वे दृश्य को अतिरंजित कर डालते हैं।

कुल मिलाकर नाटक बेहद ऊर्जावान, ओजस्वी और दर्शक को अपने साथ ले चलने वाली प्रस्तुति के रूप में ही याद आता है। इसे आदित्य बिड़ला समूह के आद्यम थिएटर ने प्रस्तुत किया है। जब कॉर्पोरेट समूह कला को सहारा देता हो तो उसमें भव्यता एक अनिवार्य तत्व होगा ही।

Thursday, February 20, 2025

पटकथा



मुंबई विश्वविद्यालय में पटकथा 


10 फरवरी को धूमिल की पुण्यतिथि पर उनकी प्रसिद्ध लंबी कविता ‘पटकथा’ का नाट्य मंचन देखने का मौका मिला। यह मंचन मुंबई विश्वविद्यालय के अकादमी का थिएटर के सभागार में संपन्न हुआ। आर एस विकल के निर्देशन में प्रसिद्ध अभिनेता राजेंद्र गुप्ता ने इस कविता को मंच पर प्रस्तुत किया। आर एस विकल प्रतिबद्ध थिएटर के लिए जाने जाते हैं। बहुत लंबे समय से नाटक में सक्रिय हैं। मैं जब मुंबई में नया-नया था, दिल्ली से डॉक्टर विनय मुंबई आया करते थे। उन दिनों शायद विकल जी शंकर शेष के नाटक पोस्टर पर फिल्म बना रहे थे या उस पर काम कर रहे थे। तब विनय जी के जरिए उनसे पहली बार भेंट हुई थी। इस बात को शायद तीन दशक बीत गए हैं। 


धूमिल की कविता को मंच पर साकार करना आसान नहीं है। सर्वांग राजनीतिक कविताओं को नाट्य रूप देना आसान नहीं। सर्वांग राजनीतिक मैं इस दृष्टि से कह रहा हूं क्योंकि धूमिल का मुख्य स्वर राजनीति ही है। उसके साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक यथार्थ कविता में सामने आता है। कविता में छटपटाहट से ज्यादा तल्खी है। तल्खी मोहभंग की ओर ले जाती है। कविता बिंबों और सूक्ति-प्रवण भाषा से बुनी गई है। सूक्तियों की तरह की काव्य पंक्तियां धूमिल की पहचान है। ये सूक्तियां नाट्यांतरण में सशक्त संवादों का काम करती हैं। इस वजह से  इसे नाटक या नुक्कड़ नाटक में तब्दील किया जा सकता है। इसका लाभ निर्देशक और अभिनेता दोनों ने उठाया है। कविता में कथा-तंतु नहीं है। कविता में कथात्मकता हो ही यह जरूरी नहीं। कथा-तंतु का न होना नाट्यांतरण के लिए चुनौती है, जिसका सामना निर्देशक ने किया है।     


राजेंद्र गुप्ता अपनी रुचि की कविताओं के पाठ के लिए साहित्य समाज में जाने जाते हैं। पटकथा का पाठ भी आप करते हैं। शायद दो वर्ष पहले जब धूमिल समग्र प्रकाशित हुआ था तब मुंबई के गोरेगांव में विमोचन कार्यक्रम में राजेंद्र जी ने इस कविता का पाठ किया था। उन्होंने बताया था कि वे पिछले कई वर्ष से इस कविता का पाठ करते हैं।  


राजेंद्र गुप्ता काव्य पाठ का नाट्यांतरण बखूबी करते हैं। वे कविता के भीतर घुस जाते हैं। स्थितियों, परिस्थितियों, मन:स्थितियों को वे अपने नाट्य पाठ और अभिनय से साकार करते हैं। निर्देशक ने कुछ अंशों को अभिनेता के अंतःसंवाद में बदला है। इस वजह से कविता और स्पष्ट तथा मुखर हो जाती है। थके हुए तिरंगे को केंद्र में रखकर बनाया गया दृश्य बंध, लाल रंग की प्रधानता वाली प्रकाश व्यवस्था नाटक की तासीर को और सघन बना देती है। ध्वनि प्रभावों का प्रयोग कविता के ध्वन्यार्थ को और गहरा करता है। पार्श्व संगीत के रूप में गीत, संगीत का भी प्रयोग किया गया है। मुझे कई बार एक पाठ के ऊपर दूसरे पाठ को रख देने से संप्रेषण में असुविधा प्रतीत होती है। जैसे अभिनेता कविता का पाठ संवाद की तरह कर ही रहा है। उसके पीछे कोई गीत बजने लगे तो उसके बोल ध्यान बांट लेते हैं। यदि केवल संगीत का कुशल प्रयोग हो तो वह नाट्य पाठ या कविता पाठ या संवाद की अर्थच्छायाओं को बढ़ाने में मदद करता है। 


थिएटर अकैडमी का सभागार व्यावसायिक सभागारों जैसा नहीं है। वहां शायद छात्र अपनी नाट्य प्रस्तुतियों का अभ्यास करते होंगे। इस वजह से नाटक की प्रस्तुति में एक तरह की अनौपचारिकता का माहौल भी रहा। यह पूरी प्रस्तुति से जुड़ने में सहायक ही था।

 

थिएटर अकैडमी और शोधावरी पत्रिका और हूबनाथ पांडे के प्रयत्नों से यह मंचन संभव हो पाया। इस नाटक की प्रस्तुतियां जगह-जगह होनी चाहिए।

Friday, September 8, 2023

पृथ्वी थियेटर और एक नाटक

 


जब हम नाटक देखते हैं तो नाटक के अलावा प्रेक्षगृह, उसके माहौल, उसकी तासीर का असर भी हम पर पड़ता है। इसी साल जुलाई में नए नए बने नीता मुकेश अंबानी केंद्र में नाटक देखा था। वहां के माहौल को भी देखा था। इस बार पृथ्वी को जरा सा उस नजर से देखा है। और नाटक है मोहन का मसाला।     


5 अगस्त शनिवार को पृथ्वी थिएटर में हिंदी नाटक 'मोहन का मसाला' देखने का अवसर मिला। नाटक 4 बजे खेला जाने वाला था। पहले तो 6 और 9 बजे के ही शो यहां होते थे। कभी कोई दूसरी तरह का आयोजन किसी दूसरे समय पर होता था लेकिन शायद नाटकों की आमद इधर बढ़ गई होगी इसलिए इस नाटक को 4 बजे का समय दिया गया। हम लोग पौने तीन के करीब घर से निकले। साढ़े तीन बजे पहुंचे तो देखा वहां नाट्यगृह के अंदर जाने वालों की एक कतार पहले से लगी हुई है। बाकी आ रहे लोगों के लिए रस्सियां तान कर बीच में रास्ता बनाया गया है। चूंकि सभागार में सीटों के नंबर नहीं हैं इसलिए कतार में जो पहले है वह अपने हिसाब से बेहतर सीट संभाल लेता है। इसलिए नाटक प्रेमी आधा पौना घंटा पहले आकर इंतजार करने लगते हैं। इस चलन को देखकर थियेटर वालों ने वहां पर कुछ बेंच लगा दिए हैं ताकि लोगों को घंटों खड़े न रहना पड़े। 

थिएटर के बाहर पृथ्वी कैफे में भी इतनी ज्यादा गहमागहमी रहती है कि बैठने की जगह पाने के लिए इंतजार करना पड़ता है। लगभग प्रवेश स्थल पर ही एक स्टैंड पर बड़ा सा बार कोड डिसप्ले कर दिया गया है, जिसे स्कैन करके आप वेटिंग लिस्ट में अपना नंबर दर्ज करवा सकते हैं। यहां लगभग सारा दिन ही खानपान चलता रहता है। नाटक देखने वालों की तुलना में खाने का मजा लेने वाले लोगों की तादाद शायद ज्यादा रहती है। और पृथ्वी कैफे में बैठने में एक स्वैग या एटीट्यूड भी रहता है; लोग उसका भी आनंद लेते हैं। यह थोड़ा अप मार्केट अड्डा टाइप जगह है। पुराने जमाने का पृथ्वी थिएटर नहीं है जहां अपनी धज दिखाने के लिए लोग आइरिश कॉफी पीते और पिलाया करते थे। साधारण लोग या कड़के नाट्यप्रेमी कटिंग चाय से ही कम चलाते थे। वैसे अभी भी कैफे के अलावा चाय नाश्ते का काउंटर है। लेकिन वह भी कदाचित नए जमाने का है। चाय की टपरी या बड़ा पाव का ठेला टाइप नहीं। वहां पर आप चाय, कॉफी, बन मस्का, केक, क्रोंजां वगैरा बिना वेटिंग के खा पी सकते हैं। हमने भी यही किया, लेकिन नाटक देखने के बाद। पुराने दिनों की तरह अभी भी नाटक शुरु होने का संकेत घंटा बजा कर किया जाता है। और नाटक तीसरी घंटी के बाद ही शुरु होता है। 


नाटक का नाम है 'मोहन का मसाला'। यह ईशान दोशी के मूल अंग्रेजी नाटक का अर्पित जैन द्वारा किया गया अनुवाद है। यह 2015 से अंग्रेजी, गुजराती और हिंदी  में खेला जा रहा है। निदेशक हैं मनोज शाह और अभिनेता प्रतीक गांधी। ओटीटी पर जिन लोगों ने हर्षद मेहता पर स्कैम 1992 सीरीज देखी होगी वे प्रतीक गांधी की प्रतिभा से भलीभांति परिचित होंगे। प्रतीक गुजराती रंगमंच और सिनेमा के जाने-माने अभिनेता हैं। कल के हिंदी प्रदर्शन में भी उन्होंने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। 

जैसा कि नाम से ही अंदाजा लग जाता है कि नाटक बहुत गंभीर नहीं होगा। ऐसा नहीं है कि यह नाटक गंभीर नहीं है। यह सिर्फ मजाहिया नाटक नहीं है। लेखक और निर्देशक का मकसद अपनी बात को हंसते-खेलते हुए दर्शक तक पहुंचना है। अभिनेता के साथ मिलकर वे तीनों इसमें सफल होते हैं। दर्शकों की बेसाख्ता हंसी और संजीदा पलों में चुप्पी इसका प्रमाण है। आम नाटकों में जैसे ज्वलंत मुद्दों पर पंच मारे जाते हैं वैसे इस नाटक में भी हैं। महात्मा गांधी खुद जिस तरह हमारे जीवन में नायक-खलनायक और सफल-असफल व्यक्ति की तरह व्याप्त रहते हैं; उन पर तरह-तरह के चुटकुले बनते रहते हैं, उसी तरह की चुटकियां इस नाटक का पात्र मोहन खुद पर और अपने महात्मा और बापू जैसे रूप पर लेता रहता है।   

नाटक का मुख्य पात्र मोहन यानी मोहनदास करमचंद गांधी है बापू नहीं। न ही वह महात्मा है। मोहन अपने बचपन की तरफ हमें ले जाता है। उन सब प्रसंगों को बहुत ही आत्मीयता से बताता है जिनका आजीवन असर गांधीजी पर रहा। या कहना चाहिए कि जिन प्रसंगों ने गांधीजी को गांधीजी या महात्मा गांधी या बापू बनाया। जैसे श्रवण कुमार की कहानी, सत्यवादी हरिश्चंद्र की कहानी, उनके दादा और पिता और बड़े भाई और खासतौर से उनकी माता का चरित्र। उनकी पत्नी कस्तूरबा का चरित्र, जिसे मोहन बड़े बेलाग तरीके से बिना किसी संकोच या कुंठा के याद करता है। याद ही नहीं करता, उनके प्रभाव को स्वीकार भी करता है। इन्हीं तत्वों की वजह से महात्मा या बापू जैसे चरित्र का निर्माण हुआ है। इसमें इंग्लैंड में कानून की पढ़ाई करने और वहां की जिंदगी की कठिनाइयों के अनुभवों ने भी महात्मा के निर्माण में योगदान किया है। उन्होंने यह जाना की सत्य बोलना ही बेहतर उपाय है। इसी तरह ज्ञान अर्जित करना जरूरी है। गरीबी से घबराने की जरूरत नहीं। और भूखे रहने के बावजूद जिंदा रहा जा सकता है। अफ्रीका में जब अंग्रेज और भारतीयों को कुली और सामी कहकर संबोधित करते हैं; जज उन्हें पगड़ी पहनने की आज्ञा नहीं देता है; रेल के पहले दर्जे से बाहर फेंक दिया जाता है; घोड़ा गाड़ी में भी अंग्रेज उनका अपमान करता है, तब गांधी जी को यह इलहाम होता है - यह शरीर न भी रहे, तो क्या! यह मुझे मार तो सकते हैं, मेरी सम्मति नहीं ले सकते। जो बच्चा कक्षा में खड़ा होकर बोल नहीं पाता था, बैरिस्ट्री करने के बाद अदालत में बहस नहीं कर पाता था, जिसमें आत्मविश्वास की बेहद कमी थी, वह जब देखता है कि अपमान और हिंसा में उसकी जान चली जाएगी, तब भीतरी शक्ति उसे सारे शक्तिमानों के सामने अडिग खड़ा कर देती है। 


ये कुछ तत्व हैं जिनसे गांधीजी का व्यक्तित्व निर्मित होता है। नाटक में हल्के-फुल्के अंदाज में उन्हें मसाला कहा गया है। मसाला यानी वे चीजें जिनके मिश्रण से कोई पूर्ण वस्तु निर्मित होती है। यह मसाला ऐसा है कि इनसे कोई व्यक्ति गांधी जैसा भी बन सकता है। 

प्रतीक गांधी बड़ी सहजता से मोहन दास के चरित्र को निभाते हैं। लोगों को हंसाते हैं, रुलाते हैं और जिन तत्वों से जीवन बनता है उन्हें दर्शकों तक पहुंचाने में सफल रहते हैं। उन्होंने अपने अभिनय में एक टेक बनाई है कि जब भी किसी मसाले यानी तत्व के वर्णन को पूर्णता तक लाते हैं यानी कि बताते हैं कि मुझे यह नुस्खा मिला, तो अपने ऊपर इतराते हुए गर्दन को दो तीन झटके देते हैं। ऐसे दूसरे या तीसरे झटके के बाद दर्शक उनकी इस अदा पर ताली बजाने लग जाते हैं। दर्शक समझ जाते हैं कि गर्दन का यह झटका कब आने वाला है। यह अभिनेता की खूबी है कि वह दर्शक को अपनी अदाओं के साथ बांध लेता है।  

नाटक एकपात्रीय है। सारा दारोमदार प्रतीक गांधी पर ही है। कुछ दृश्यों में प्रतीक खुद दो पात्रों का अभिनय करते हैं। गांव के, परिवार के, अंग्रेजों के साथ के कई दृश्य ध्वनि के माध्यम से रचे गए हैं। उन दृश्यों में रिकॉर्ड की हुई ध्वनियां हैं, लोगों के संवाद हैं। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि कोई बोल रहा है और मंच पर अभिनेता उसका उत्तर दे रहा है। यहां निर्देशक ने एक अलग तरह की तकनीक का प्रयोग किया है। पार्श्व से आपको संवाद सुनाई पड़ते हैं। या कहें ऐसा लगता है कि रेडियो पर कोई दृश्य चल रहा है जो आपको सुनाई ही देता है। उसके बीच में मंच पर गांधी जी की भूमिका निभा रहा चरित्र अपने संवाद बोलता रहता है। एक तरह के अनौपचारिक साउंड इफेक्ट के साथ दृश्य साकार हो जाता है। कई प्रसंगों में गीतों का भी प्रयोग है। यह प्रयोग तो हम प्रायः नाटकों में देखते हैं। 

यह सोचना भी दिलचस्प है कि यह एक पात्रीय नाटक है या यह कथा वाचन है? जैसा आजकल कई लोग दास्तानगोई या कहानियों का मंचन करते हैं। यह उस तरह से पूर्व लिखित कहानी पर आधारित नाटक नहीं है। इसे शायद नाटक की तरह ही लिखा गया है और एक ही पात्र को केंद्र में रखकर लिखा गया है। यह जरूर है कि कहानी सुनने और नाटक देखने दोनों के मिले-जुले रूप हमें इसमें मिलते हैं। इस तरह के प्रयोग आजकल अकसर होते हैं। क्योंकि अभिनेता फिल्म, टेलीविजन और ओटीटी वगैरह में व्यस्त रहते हैं। इसलिए रंग मंडलियां ज्यादा अभिनेताओं वाले नाटकों की तुलना में एक या दो पात्रीय नाटकों को चुनना ज्यादा पसंद करते हैं। जो भी हो निर्देशन, लेखन और अभिनय अगर अच्छा हो तो एक पात्रीय नाटक भी आकर्षक हो जाता है। 

प्रतीक गांधी ने यह नाटक हिंदी के अलावा गुजराती और अंग्रेजी में भी किया है। वे मूलत: गुजराती भाषी हैं। हिंदी नाटक में उनके गुजराती भाषी होने की छाया बिल्कुल दिखाई नहीं देती। जहां गुजरातीपन आता है, जहां जरूरी है, क्योंकि गांधीजी गुजराती ही थे, उनका परिवेश गुजरात का ही था। अकेला अभिनेता डेढ़ घंटे के नाटक को तीनों भाषाओं में इतनी सफाई से निभा ले, यह प्रशंसनीय है।

                                 



Friday, July 28, 2023

कला का अधुनातन ठिकाना और एक नाटक

 


नया सांस्कृतिक केंद्र


हमारी एक बच्ची ने अपने माता-पिता और हमारे लिए एक नाटक का टिकट खरीद दिया था। उसे देखने कल शाम हम लोग नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर बांद्रा कुर्ला कंपलेक्स में गए थे। पिछले दिनों प्रकाश हिंदुस्तानी ने इस सेंटर पर विस्तृत रिपोर्ट लिखी थी। शायद तब यह केंद्र शुरू हो रहा था। वह एक तरह की विस्तारित प्रेस रिलीज लग रही थी। इतना महिमामंडन उस पोस्ट में था कि अधिकांश लोग केंद्र की विराटता से भयभीत हो गए थे। उस पर विद्याधर दाते की टिप्पणी भी विजय कुमार जी ने शेयर की थी। कल डरते डरते हम उस परिसर में घुसे। जाहिर है विशालकाय और भव्य तो है ही। उसमें तीन सभागार हैं - ग्रैंड थिएटर, स्टूडियो और क्यूब। ग्रैंड थिएटर में दो हजार लोगों के बैठने की व्यवस्था है। उसमें अलग-थलग बैठने के बॉक्स भी हैं। स्टूडियो उससे छोटा सभागार है। क्यूब नाम का सभागार उससे भी छोटा है जिसमें चारों तरफ दर्शक बैठते हैं। इस परिसर में चित्रकला प्रदर्शनी का भी एक आर्ट हाउस है। हम सब जगहों को नहीं देख पाए। नाटक क्यूब नामक सभागार में था। हम उसके इर्द-गिर्द ही रहे। मुख्य प्रवेश द्वार से लेकर सभागार तक मुस्कुराता हुआ स्टाफ मौजूद है जो बढ़-चढ़कर आपकी मदद करता है।
मुंबई में ऐसा एक बड़ा केंद्र एनसीपीए यानी नेशनल सेंटर फॉर परफॉर्मिंग आर्ट्स है जिसे टाटा और जमशेद भावा ने पचास साल पहले बनवाया था। उसमें भी कई सभागार हैं। उनकी अपनी भव्यता और सौंदर्य है। वह पिछले 50 वर्षों से एक बड़ा और देदीप्यमान सांस्कृतिक केंद्र रहा है। उसकी वास्तुकला अपने जमाने की है। वह तब अधुनातन ही दिखता था। उस परिसर में टाटा और भावा थिएटर की भव्यता आज भी देखते ही बनती है। एक्सपेरिमेंटल थियेटर की सादगी के बावजूद उसकी एक क्लास तो है ही।
अब बीकेसी यानी बांद्रा कुर्ला कंपलेक्स में यह नया केंद्र बना है। उप नगरों में सांस्कृतिक गतिविधि के केंद्रों की बहुत ज्यादा जरूरत है। इस केंद्र की वास्तुकला आज के समय की है- विराट, भव्य, रोशन, चमचमाती। एनसीपीए कॉलोनियल छाया के साथ आधुनिक वास्तु रचना थी। एनएमएसीसी यानी नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर उत्तर आधुनिक भव्यता से ओतप्रोत है। अब यहां नियमित गतिविधियां होने लगी हैं- संगीत, नाटक, नृत्य, सभी तरह की। पिछले दिनों यहां विश्व प्रसिद्ध नाटक साउंड ऑफ म्यूजिक के शो हुए। परिचय फिल्म इसी पर आधारित थी। यहां इसके टिकट एक हजार से तीस हजार तक में बिके। ऐसा इंप्रेशन था कि यह बहुत मंहगी जगह है। मराठी नाटक का टिकट तीन सौ से शुरु हो रहा है। हमने जो नाटक देखा उसका टिकट दो सौ पचास में आया था। पृथ्वी में भी नाटक की कीमत अब काफी ज्यादा है। पूर्वा नरेश के नाटक का टिकट सात सौ में है। पृथ्वी में चाय नाश्ता भी सस्ता नहीं है। वह तो हर सांस्कृतिक केंद्र पर मंहगा ही है। यह मानना ही होगा कि नाटक देखना महंगा शौक है। यूं फिल्म देखने में भी काफी पैसा लगता है पर उसकी तुलना नाटक से नहीं की जाती। नाटक को हम मुफ्त में या सस्ते में देखना चाहते हैं।


ढूंढो हर शानदार चीज़ दुनिया में


हम लोगों ने एक अंग्रेजी नाटक देखा। एवरी ब्रिलियंट थिंग। यह डंकन मैकमिलन और जॉनी डोनाहो का अंग्रेजी नाटक है। इसमें एक ऐसा व्यक्ति अपने अनुभव साझा करता है जिसकी मां डिप्रेशन में थी और आत्महत्या की तरफ झुक जाती थी। इस व्यक्ति ने बचपन से ही अपनी मां को इस तरह की उदासी में झूलते देखा है। मृत्यु से उसका पहला सामना अपने कुत्ते की बीमारी के वक्त होता है जब डॉक्टर उसे बिना दर्द मरने की दवा देता है। बच्चा मां को डिप्रेशन से बाहर लाने के लिए आसपास की खूबसूरत चीजों की सूची बनाता है। यह सूची वह ताउम्र बनाता रहता है। इसमें धीरे-धीरे एक लाख प्रविष्ठियां जमा हो जाती हैं। इस सूची में आइसक्रीम, चॉकलेट, पिलो फाइट जैसी चीजें है तो कविता, पुस्तक और नाटक जैसी भी। असल में एक लाख चीजों की सूची में कुछ भी शामिल हो सकता है जिससे खुशी मिलती हो। मकसद है जिंदगी से प्रेम करना। बच्चा इसी जद्दोजहद में बड़ा होता है। कॉलेज जाता है। प्रेम करता है। प्रेमिका की पहल पर शादी करता है। खुद भी डिप्रेशन में डूबने लगता है। उससे बाहर भी निकल आता है। पर मां को नहीं बचा पाता।

हंसते खेलते हुए आत्महत्या की प्रवृत्ति जैसे पेचीदा और संजीदा विषय के गिर्द एक घंटे का यह नाटक रोचकता से बुना गया है। इसमें एक ही पात्र है। अपनी सूची में से बहुत सी पर्चियां वह दर्शकों में नाटक शुरू होने से पहले ही बांट देता है। नाटक के दौरान नंबर बोलता है और उस नंबर की पर्ची जिस दर्शक के पास है वह उस पर्ची को पढ़ता है। इस तरह के खेल से विषय की गहराई, जिंदगी में खुशी ढूंढ़ने की व्यापकता तो आती ही है, नाटक में रोचकता भी बनी रहती है। दर्शकों में से ही वह अन्य पात्र चुनता है जैसे डॉक्टर, पिता, शिक्षिका, प्रेमिका आदि। उन्हें भूमिका निभाने को प्रेरित करता है। वे लोग रोल प्ले कर भी लेते हैं। हालांकि उन्हें अचानक इस नाटक का हिस्सा बनना पड़ता है जिस वजह से एक झिझक, हड़बड़ाहट, और अनघड़पन की स्थिति वहां मौजूद हो जाती है। ऐसे स्थिति में पैदा होने वाली झेंप को लोग मुस्कुराहट और हंसी से दबाने की कोशिश भी करते हैं। लेकिन मुख्य पात्र अपनी इंप्रोवाइजेशन से स्थितियां निर्मित कर लेता है। और दर्शकों की भूमिकाएं सभी को लुभाने लगती हैं।
क्यूब नाम के छोटे से सभागार में जहां यह नाटक खेला गया चारों तरफ दर्शक बैठे थे। बीच में अभिनय हो रहा था। मुख्य पात्र दर्शकों में घुल मिल जाता है। चूंकि वह मानसिक रूप से अस्वस्थ अम्मा की कहानी सुना रहा है इसलिए सभी दर्शक उससे जुड़े हुए रहते हैं।

यह नाटक क्यूटीपी कंपनी ने तैयार किया है। क़ासर ठाकुर पदमसी ने भारतीय परिवेश में ढालकर इसे निर्देशित किया है। हालांकि संगीत और पुराने गीतों के रिकॉर्ड अंग्रेजी के ही हैं। चूंकि नाटक अंग्रेजी में खेला गया शायद इसलिए गीत भी उन्होंने अंग्रेजी फिल्मों के ही रखे हैं। बेंगलुरु के अभिनेता विवेक मदन ने इसमें एक मात्र अदाकार की भूमिका निभाई है।
नाटक को मानसिक स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता से जोड़ते हुए प्रदर्शन के बाद इच्छुक व्यक्तियों के लिए काउंसलिंग सत्र भी रखा गया था। इस तरह इसे थैरेप्यूटिक या उपचारात्मक थिएटर भी कहा जा सकता है, मगर दिलचस्प और गंभीर।