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Sunday, May 31, 2026

पीर घनेरी

 


पीर घनेरी

(लीलाधर मंडलोई की आपबीती - जब से आँख खुली है)


लीलाधर मंडलोई की आत्मकथा जब से आँख खुली हैसे पहले मधु कांकरिया की ढाका डायरीपढ़ी थी। यह डायरी हमारे पड़ोसी मुल्क की हाल की राजनीतिक सामाजिक दुर्दशा का लगभग आँखों देखा हाल है; बेचैनी भरा। पुस्तक पढ़ने के बाद बनी इस बेचैन मन:स्थिति के बाद लीलाधर मंडलोई की आत्मकथा के दो पन्ने पढ़ने पर ही मानो ठंडा पानी सर पर पड़ गया।

पहला प्रसंग उनके अपने शिशु रूप का है। जाहिर है यह स्मृति बहन-भाई और माँ-पिता के जरिए बनी होगी। गुदड़ियों  से बने झूले के ऊपर माँ की साड़ी लटका दी जाती अैर उसमें माँ की कुछ चूड़ियां बांध दी जातीं। हिलने पर चूड़ियों के खनकने से और साड़ी से माँ की उपस्थिति का आभास शिशु को हो जाता। इसी के आगोश में आने पर शिशु लीलाधर की रुलाई बंद होती थी। अन्यथा वह माँ के घर से बाहर जाने पर बहुत रोता था। यह जुगाड़ बहुत मौलिक, मार्मिक और प्यार भरा है। 

लीलाधर मंडलोई के संसार में माँ, पिता, दो भाई और एक बहन हैं। बाद में एक छोटा भाई और एक बहन भी शामिल होते हैं। छोटे भाई को सामान्य जीवन नहीं मिला और ज्यादा भी नहीं मिला। यह कचोट लीलाधर के मन में है। बचपन के दोस्त भी लीलाधर के जीवन में हैं। जीवन कठिन और बीहड़ है, इतना कि आप सोच भी नहीं सकते। दुख और पीड़ा और अभाव भी उन्होंने मस्ती में जिए। जीवन के साथ यह संलग्नता गजब है। पुस्तक में कुल पैंसठ प्रसंग है। प्रसंग दर प्रसंग एक पूरा संसार खुलता चला जाता है। हालांकि ये प्रसंग बचपन से लेकर भोपाल में कॉलेज की पढ़ाई खत्म करने तक ही हैं। कॉलेज के और भोपाल के प्रसंग भी ज्यादा नहीं हैं। अधिकतर खदान के आसपास का बचपन का जीवन ही यहां है। कोयले की खदान में मजदूर परिवार का जीवन। 

ये वर्णन पाठक को रुलाते हैं, ताकत देते हैं, दृष्टि देते हैं, जीवन प्रेम से भर देते हैं। मानव मन की भीतरी परतों को खोलने से लेकर प्रकृति से प्रेम और सहजीवन की गाथाएं गाते चलते हैं। 

कुछ साल पहले कवि शरद कोकास के ब्लॉग पर लीलाधर मंडलोई का एक छायाचित्र देखा था, जिसमें वह किसी घर के बरामदे में उकड़ूं यानी पैरों के भार बैठे हैं; उस मुद्रा में जिसे मल आसन कहते हैं। शहरी लोगों के लिए इस तरह पैरों पर बैठना आसान नहीं। मैं बचपन में इस तरह आसानी से बैठ लेता था। प्राय: बच्चे या जिनके कूल्हे के जोड़ लचीले हों वे, इस तरह बैठ लेते हैं। अभ्यास न रहने की वजह से ये जोड़ कड़े पड़ जाते हैं। मेरे लिए अब इस तरह बैठना संभव नहीं रहा है। वह चित्र देखकर मैं बहुत प्रभावित हुआ था कि मंडलोई जी इस तरह बैठ लेते हैं। क्योंकि तब मैं उन्हें आकाशवाणी के अपने वरिष्ठ अधिकारी के रूप में जानता था, जो बाद में दूरदर्शन के महानिदेशक भी बने। जब मैं उनके संपर्क में आया था, तब भी वे आकाशवाणी में शायद सहायक निदेशक के पद पर पहुंच गए थे। मैं कार्यक्रम निष्पादक था। एक उच्च अधिकारी इस तरह बैठ लेता है मेरे लिए यह खुशी और हैरानी की बात थी। 

उनकी आत्मकथा को पढ़कर उनका इस तरह बैठ पा सकने का रहस्य खुल गया। उनके लिए कुछ भी असहज नहीं है। जिसने इतना कठिन जीवन जिया हो, वह किसी भी परिस्थिति में रह सकता है। उसका शरीर उसके वश में रह सकता है। 

जब से आंख खुली है आत्मकथा को पढ़ते हुए लगा, हिमाचल के एक छोटे से गाँव में बीते मेरे बचपन में भी तो जीवन ऐसा ही था। पैरों में चप्पल है या नहीं फर्क नहीं पड़ता था। जंगल पार कर स्कूल जाना होता था। स्कूल में पेड़ के नीचे टाट-पट्टी पर बैठते थे। बाजार और शहर बहुत दूर था। घर में बिजली नहीं थी। पानी बावड़ी से भरकर लाया जाता था। सारा गांव शौच के लिए जंगल की तरफ जाता था। धीरे-धीरे समझ आया कि यह जीवन स्थितियां भले ही एक जैसी लग रही हों, लेकिन दोनों की जिंदगी में ज़मीन आसमान का अंतर है। इसमें समानता ढूंढ़ना मूर्खता है। जिस बचपन और जिस जीवन को मंडलोई जी याद कर रहे हैं, वह एक मजदूर बस्ती के बच्चे का जीवन है। वह भी कोयला खदान की मजदूर बस्ती का। यहां सब कुछ अस्थाई, अनिश्चित और तदर्थ है। रोज की मज़दूरी करोगे तो घर में चूल्हा जलेगा। घर के बड़ों को ही नहीं बाल बच्चों को भी पैसा कमाने की जुगत करनी होगी। मेरा बचपन तो इसके बिलकुल विपरीत था। हम अपने पक्के घर में थे। भोजन, कपड़े वगैरह की चिंता नहीं करनी पड़ती थी। बहुत समृद्धि नहीं थी पर अभाव भी नहीं था। यहां तो इस बालक के घर में न दीवारें थी न छत। बस किसी तरह वे झुपड़िया में रहते थे।

बेतरह परेशान कर देने वाले इन अभावों और असुविधाओं के बावजूद वे जीवन में सुख ढूंढ़ लेते थे। साथ में उन्हें जी तोड़ मेहनत करने की सीख मिल रही थी। 

गजब बात यह है कि गरीबी और उससे जुड़ी तमाम दिक्कतों के बावजूद उस परिवार में सांस्कृतिक उजास थी। जीवन जीने की सुघड़ता थी। जो जैसा उपलब्ध है, उसमें से सौंदर्य और सुख का बिरवा उगा लेने का हुनर था। इस हुनर में मंडलोई जी की माँ की भूमिका सर्वोपरि है। न कुछ में से भी वे खाने, पहनने, ओढ़ने की चीजें बना लेने में और खुशी की लहर पैदा कर देने में माहिर थीं। 

उनका परिवार एक विस्थापित परिवार था। उस दंपति ने अपने बूते पर गृहस्थी खड़ी की थी। पिछले जीवन यानी माँ के पीहर का सांस्कृतिक अवदान उनकी पूंजी थी। इस पूंजी को कोई छीन नहीं सकता था। बल्कि यह पूंजी उनके परिवार और संतति के लिए संजीवनी थी। वे चाहे थोड़े में गुजारा करने की जुगत हो, धीरे-धीरे गृहस्थी का सामान जोड़ने की दूरदृष्टि हो, लोरियों और लोकगीतों से मिल रही कला का संबल हो, कहावतों से दुनिया को समझने की अंतर्दृष्टि हो, जीवन में धंसी प्रकृति, वनस्पति की उपयोगिता की सीख हो। यह सब इन बच्चों को अपने माता-पिता से छतनार पेड़ की शीतल और जीवनदाई छाया की तरह मिलता रहा। 

मंडलोई को अपने परिवार और मित्रों ने तो सिखाया ही, वहां के परिवेश ने भी उनकी मूल्य चेतना और दृष्टि का निर्माण किया। इसमें जंगल, वनस्पति, पशु, पक्षियों की भी भूमिका है। घर और बाहर के जीवन के अनुभवों से गुजरते हुए उनकी सौंदर्य चेतना भी जागृत हुई। उन्होंने दुख-तकलीफ और मेहनत के बीच रहते हुए सुंदर को पहचानना सीखा। उनके अलग-अलग कथा-प्रसंगों में रंगों, आकारों, ध्वनियों को पहचानने और उसके आस्वाद की कथाएं मिलती हैं। यह सब अधिकतर उन्हें प्रकृति से मिला। घर के पास जंगल था, खेत थे, पहाड़ था, नदी थी, और इस सब में प्रकृति अपनी सुरम्यता और बीहड़ता तथा विस्तीरणता और संपूर्णता में विद्यमान थी। मंडलोई की कलाओं की कक्षाएं इसी खुले प्रकृति-प्रांगण में लगीं। जिस तरह वे स्कूली शिक्षा में अव्वल आए, उसी तरह सौंदर्य संपन्न आस्वादक के रूप में भी वे प्रवीण हुए। ऐसा लगता है कि पीड़ा और प्रेम के इस मणिकांचन रसायन ने उनके साहित्यकार, कवि, कलाकार को गढ़ा है। 

मंडलोई का परिवार प्रवासी मजदूरों की तरह झोपड़ी या झुपड़िया में रहने को मजबूर था। किन परिस्थितियों और विवशताओं के कारण वह अपना वतन और अपनी धरती और अपने लोगों को छोड़कर आया होगा, यह हमें पता नहीं चलता। यही दिखता है कि कोयले की खदान में उन लोगों ने अपना जीवन झोंक दिया। 

इस विस्थापन या उखड़ेपन के बीच मंडलोई के माता-पिता का अतीत का ज्ञान, अनुभव और स्मृति इस परिवार को एक सांस्कृतिक जमीन मुहैया कराती है। हमें सहज ही यह गलतफहमी हो जा सकती है कि अगर कोई परिवार दिहाड़ीदार है, कच्चे अस्थाई घर में रहता है, आसपास कोई नाते-रिश्तेदार या बिरादरी नहीं है, तो वह सांस्कृतिक और सभ्याचार संबंधी मूल्यों की दृष्टि से भी विपन्न होगा। पर इस परिवार के साथ ऐसा बिल्कुल नहीं था। पिता की भाषा और उनके मुहावरों कहावतों से उनकी जड़ों का अंदाज लग जाता है। और माता ने इस बीहड़ और उजाड़ जगह में जिस कौशल, धीरज और दूर दृष्टि से जीवन के बिरवे को रोपा और परिवार की बगिया को हरा-भरा, कठोर-कर्मठ और संजीव-सुंदर बनाया, वह उनकी स्मृति, परवरिश के बिना संभव ही नहीं था। ऐसा लगता है कि माता के परिवार ने अपनी बेटी को जीने के कुछ अनिवार्य सूत्र सहज ही सिखा दिए थे। वे दोनों ही अपने अतीत का न बखान करते हैं न गुणगान करते हैं। निरे वर्तमान के बोझ से दबे हुए प्रतीत होते हैं। पर इस बोझ को ढोने की सामर्थ्य वे अपने अतीत से पाते हैं। 

आत्मकथा के इस खंड में मंडलोई ने अपने माता-पिता के अतीत के बारे में रोशनी नहीं डाली है। पर हमें ऐसे जुझारू दम्पति के बचपन को जानने की इच्छा होती है। एक ही प्रसंग मेरे ध्यान में आता है, जब बारिश होती है और माता भाग कर खेत में जा खड़ी होती हैं, भीगती रहती हैं। और वे अपने बचपन में पहुंच जाती हैं कि किस तरह वे बारिश में मिट्टी की सोंधी खुशबू में रम जाया करती थीं। पता नहीं किस वजह से यह प्यारी जोड़ी अपने घर से बिछुड़ जाती है और विंध्य की पहाड़ियों में पहाड़ खोदू कोयला खदानों के शिकंजे में फंस जाती है। और यह दुश्चक्र ऐसा है कि एक बार कोई व्यक्ति इस खोह में कदम धर दे तो फिर बाहर का रास्ता मिलना आसान नहीं है। 

लीलाधर मंडलोई को पता नहीं कितनी मेहनत करनी पड़ी होगी कि वे उस चंगुल से छूटे। खुद पढ़-लिखकर जीवन की नई इबारत लिखी और अपने परिजनों को भी वहां से उबारा। 

मेरे लिए इस पुस्तक को पढ़ना आसान नहीं था। बार-बार मैं अपने बचपन में चला जाता था और खुद को समझाता था कि भाई तेरे जीवन से इस जीवन का कोई साम्य नहीं है। उन अनुभवों को उसी रूप में देखो और महसूस करो। और मैं ठिठक जाता।

अनेक अवसर ऐसे आए जब किसी प्रसंग विशेष को पढ़कर रुकना पड़ जाता था। सतत पढ़ना संभव नहीं होता। जीवन की सघनता तो उसके पीछे है ही, मंडलोई जी का उन अनुभवों को भाषा में बदलना, उनकी सच्चाई, उनकी कोमलता, सांद्रता, संगीत, रंग, चित्रात्मकता - ये सब ठहरने पर मजबूर कर देते हैं कि जो पढ़ा उसे भीतर जज्ब होने दो, उसमें रमे रहो। यह पुस्तक हमारे भीतर कुछ रासायनिक प्रक्रिया कर देती है। शायद लिखे हुए को अनुभव करना यही होता होगा।

जब से आँख खुली है (आत्मकथा)लीलाधर मंडलोई, राजकमल प्रकाशन, 2025, पृष्ठ 246, मूल्य रु. 225/-

यह समीक्षा समालोचन पर भी है। 


Wednesday, August 30, 2023

युद्ध और निर्वासन

 


पिछले वर्ष विश्वरंग में एक मुख्य सत्र युद्ध और निर्वासन पर था। उसमें मेरी भागीदारी भी रही। अभी विश्वरंग पत्रिका का कथेतर गद्य अंक आया है। उसमें यह प्रस्तुति भी प्रकाशित हुई है। आप भी पढ़िए। 


मैं युद्ध और निर्वासन पर अपनी बात कुछ कवियों, उनकी कविताओं और एक कहानी के हवाले से रखने की कोशिश करूंगा। कवि अलग-अलग काल और अलग-अलग जगहों के हैं। 

युद्ध पर कवियों ने लिखा है। सैनिकों ने भी लिखा है - कवि जो सेना में गए और सैनिक जो कविता लिखने को विवश हुए। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान एक कविता संग्रह छपा (Poems of This war by Younger Poets) जिसमें सैनिकों की लिखी हुई कविताएं हैं। इसमें एक कविता डग्लस गिब्सन की है-


Air Raid Warning यानी हवाई हमले की चेतावनी


सायरन की आवाज के बाद, हवा 

अजीब तरीके से स्थिर है, इसमें सांस

खींची गई निराशा में

कि बच्चे मौत से हाथ मिला रहे हैं

गली में जोरदार ठहाका

अचानक बंद हो जाता है टूटी हुई धुन की तरह

हवा से होकर आती है ताल

बमवर्षकों की दूर से

आसमान जो जानता है शाश्वत सूर्य और चंद्रमा को

हर एक हवा और लहर के रहस्य को

आदमी की बेवकूफी का मजाक उड़ाता है

विश्व कर रहा है आत्महत्या

उदास है विधाता की आंख।

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पोलिश कवि तदेउष रोजेविच के बारे में हम सभी जानते हैं कि दूसरे विश्व युद्ध में वे भी सेना में थे। उनका भाई भी सैनिक था और नाजी यंत्रणा शिविर में मारा गया था। रोजेविच की दो कविताओं के बिंब देखिए। एक कविता है

The Surviver

बचा हुआ

मैं चौबीस का हूं

कसाईखाने में ले जाया गया

मैं बच गया

 

ये खोखले समानार्थी शब्द हैं

इंसान और जानवर

प्यार और नफरत

दोस्त और दुश्मन

अंधकार और प्रकाश

एक सा तरीका है इंसानों और जानवरों को मारने का

 

मैंने देखा है :

कटे पिटे लोगों से लदे ट्रकों के ट्रक

वे बचाए नहीं जाएंगे।

 

विचार महज शब्द हैं :

गुण और गुनाह

सच्च और झूठ

खूबसूरती और बदसूरती

हिम्मत और कायरता

गुण और गुनाह का वजन है बराबर

मैंने देखा है :

इंसान में जो था गुनहगार और गुणवान भी

 

मिले कोई गुरू मुझे

जो मुझे फिर से देखने सुनने बोलने के काबिल बनाए

वस्तु और विचार को नाम दे फिर से 

प्रकाश से अंधेरा दूर करे

 

मैं चौबीस का हूं

कसाईखाने में ले जाया गया

मैं बच गया।

 

 

·         माने सब इतना गडमड हो गया है कि वस्तु-अंतर्वस्तु, वृत्ति-प्रवृत्ति, विचार-अवधारणा में अंतर करना ही मुश्किल है।   

·         कटे-पिटे लोगों से लदे ट्रकों के ट्रक का बिंब ही समय की वीभत्सता को व्यक्त कर देता है।

·         गुण – गुनाह / सच – झूठ / खूबसूरती – बदसूरती / हिम्मत – कायरता महज शब्द हैं। उनके अर्थ नहीं बचे हैं।

·         कवि इतनी भर कामना करता है कि कोई मिले तो वह देखने सुनने बोलने के काबिल बनाए।

 

इनकी एक और कविता है

रूपांतरण

मेरा छोटा बेटा आता है

कमरे में और कहता है 

'तुम गिद्ध हो तो मैं चूहा'

मैं अपनी किताब फेंकता हूं परे

डैने और पंजे उग आते हैं मुझमें

उनकी अपशगुनी छाया

दीवारों पर दौड़ती है

मैं हूं गिद्ध वह है चूहा

'तुम हो भेड़िया मैं हूं बकरा'

मैंने मेज का चक्कर लगाया

और मैं हो गया भेड़िया

खिड़की के पल्ले चमकते हैं

जैसे विषदंत

अंधेरे में

वह दौड़ता है मां की तरफ

निरापद

उसका सिर छुपा हुआ उसकी पोशाक की गर्माहट में

 

·         इसमें बेटा पिता को कहता है कि तुम गिद्ध हो मैं चूहा। पिता वैसा ही महसूस करने लगता है।

·         फिर बेटा कहता है – तुम भेड़िया हो मैं बकरा। और पिता वैसा ही हो जाता है।

·         यह है युद्ध का असर जो व्यक्ति को भीतर तक बदल देता है।

 

शुरु में मैंने Poems of This war by Younger Poets पुस्तक का जिक्र किया है। उसकी भूमिका अंग्रेजी कवि एडमंड ब्लंडन {Edmund Blunden (1896-1976)} ने लिखी है। उन्होंने लिखा है –

·         कविता का सिद्धांत है मासूमियत भरी नजर।

·         कविता वहीं देखती है जहां सत्य होता है।

·         कविता उन्हीं चीजों को दर्ज करती है जिन्हें वह ऑब्जर्व करती है।

इस तरह हम देखते हैं कि

युद्ध से पैदा होती भयावहता, विनाश और असंतुलन को कवि कई रूपों में देखता है। युद्ध बाहरी तौर पर ही तबाही नहीं मचाते, भीतर से भी तोड़ते हैं और संवेदनहीन बनाते हैं।

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हम जानते हैं, टी. एस. एलियट की कविता में युद्धों की छाया दिखती है। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में मारे गए भारतीयों पर एक कविता लिखी थी 1943 में।

दक्षिण अफ्रीका में मारे गए भारतीयों के लिए

(यह कविता भारत पर क्वीन मेरी की किताब (हराप एंड कं. लि. 1943) के लिए सुश्री सोराबजी के अनुरोध पर लिखी गई थी। एलियट ने यह कविता बोनामी डोबरी को समर्पित की है।)

 

आदमी का ठिकाना होता है उसका अपना गांव

उसका अपना चूल्हा और उसकी घरवाली की रसोई;

अपने दरवाज़े के सामने बैठना दिन ढले

अपने और पड़ोसी के पोते को

एक साथ धूल में खेलते निहारना।

 

चोटों के निशान हैं पर बच गया है, हैं उसे बहुत सी यादें

बात चलती है तो याद आती है

(गर्मी या सर्दी, जैसा हो मौसम)

परदेसियों की, जो परदेसों में लड़े,

एक दूसरे से परदेसी।

 

आदमी का ठिकाना उसका नसीब नहीं है

हरेक मुल्क घर है किसी इंसान का

और किसी दूसरे के लिए बेगाना। जहां इंसान मर जाता है बहादुरी से

नसीब का मारा, वो मिट्टी उसकी है

उसका गांव रखे याद।

 

यह तुम्हारी ज़मीन नहीं थी, न हमारी: पर एक गांव था मिडलैंड में,

और एक पंजाब में, हो सकता है एक ही हो कब्रस्तान।

जो घर लौटें वे तुम्हारी वही कहानी सुनाएं:

कर्म किया साझे मकसद से, कर्म

पूर्ण हुआ, फिर भी न तुम न हम

जानते हैं, मौत आने के पल तक,

क्या है फल कर्म का।

 

·         एक सैनिक अपने गांव लौट आया है और अपने परिवेश में रहते हुए याद करता है

·         परदेसियों को, जो परदेसों में लड़े / एक दूसरे से परदेसी

·         कोइ सैनिक अपने घर से दूर परदेस में मारा जाता है।

·         एक ही कब्रस्तान में न जाने कहां कहां के सैनिक दफ्न होंगे।

·         यह है विडंबना ।

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यूक्रेन रूस के बीच अभी भी लड़ाई चल रही है। तबाही के बीच भी कवि कलाकार अपनी आवाज उठा रहे हैं। वहां की एक कवयित्री है ल्यूबा किमचुक। वह कहती है भाषा उतनी ही खूबसूरत है जितनी यह दुनिया। पर जब कोई आपकी दुनिया को नष्ट करता है, तो भाषा उसे प्रतिबिंबित करती है। वह डेनवास क्षेत्र की रहने वाली है। जब अपनी मातृभूमि को नष्ट होते देखती है तो तकलीफ से कहती है-

‘‘शहरों और कस्बों के डीकम्पोजीशन को बताने के लिए मैं शब्दों को डीकम्पोज करती हूं।’’

        मतलब मातृभूमि की तोड़फोड़ के बरक्स शब्दों की तोड़फोड़। और इस शब्द डीकम्पोज को कम्पोज या कम्पोजीशन, और खास तौर पर संगीत की कम्पोजीशन के संदर्भ में सोच कर देखिए। संगीत कम्पोज किया जाता है या उसकी रचना की जाती है। उसका उलट हुआ कि उसे डीकम्पोज किया जाएगा यानी उसकी विरचना की जाएगी। एक कवि को अपने समय की भयावहता, विसंगति औार बर्बरता को दर्ज करने के लिए मानवता के कोमल, सुंदर, सभ्य तत्वों की विरचना करके दिखाना पड़ रहा है। मानवता के इन अमूल्य तत्वों को हासिल करने में शताब्दियां लगी हैं। और इन्हें अमानवीयता के खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल करना पड़ रहा है। 

यह कवयित्री ल्यूबा किमचुक अपनी कविता The Making of Tenderness में कोमलता को सारे ध्वंस के बरक्स खड़ा करती है। यह कोमलता रोजमर्रा की जिंदगी के कामों से जुड़ी है। वह एक वृत्तांत रचती हैं। घर की खिड़कियों पर सेलो टेप लगी हुई है। वह एक मॉल से साफ-सफाई का सामान लाती है। बाल बनाने के लिए हेयर ब्रश खरीद लेती है जो मेड इन खारकीव है। वही खारकीव जो युद्ध में लगभग ध्वस्त हो चुका है। खारकीव का अर्थ है- सनातन। ध्वंस के बावजूद मेड इन खारकीवउसके अंदर भरोसा जगाता है। वह महसूस करती है कि ब्रश कितना कोमल है। वह यह सोच कर रोमांचित हो उठती है कि टूटते हुए शहर में कोमलता का सृजन हो रहा है। यह टेंडरनेस कहां बनती होगी? फैक्टरी में या बमशेल्टर में? मॉल में उसे एक और शहर माइकोलेव का बना संतरे का रस मिल जाता है। खेरसन का बना टमाटर का पेस्ट मिलता है कैचअप जैसा। क्रेमंचक का योगर्ट वहां है। वह बखमत का नमक ढूंढ़ती रहती है। 

अपने कई शहरों की चीजें वह ले आई। खिड़कियां साफ कर लीं। रेडियो पर उद्घोषणा होती है कि काले सागर से दागी गई मिसाइल नाकाम कर दी गई है। सारे शहर से होती हुई एक टेंडरनेस यानी कोमलता पूरे घर में फैल जाती है। वह इसी से बाल बनाती है। ब्रेकफास्ट में, खाने में, कोमलता भरी चीजें मौजूद हैं।

·                    यह है बर्बरता के खिलाफ दैनंदिन जीवन की कोमलता का महास्वप्न।

·         वह कहती है, ‘‘मेहनत से हासिल हुई जीत बेहतर होती है / कभी जाना नहीं था कोमलता हो सकती है इतनी धारदार / कभी नहीं / पर इसे मैं आज़माउंगी जरूर / वादा रहा’’ 

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अब युद्ध से उपजे निर्वासन पर बात करें। युद्ध प्रत्यक्ष परोक्ष कई तरह के होते हैं। इंग्लैंड की एक कवयित्री है वार्सन शाइर, जिसका जन्म एक सोमाली परिवार में कीनिया में हुआ। उनका परिवार विस्थापित होकर ब्रितानिया आ बसा। उसकी एक कविता है Home यानी घर । यह उन लोगों के बारे में है जिन्हें घर छोड़ना पड़ता है। जिनका घर शार्क के जबड़े की तरह हो गया है, बंदूक की नाल हो गया है। घर घरवाले को खदेड़ देने पर उतर आया है। घर के इस तरह खूंखार हो जाने या दुश्मन हो जाने की कई वजहें होती हैं, हम जानते ही हैं। पर यह परिवर्तन बेहद पीड़ादायक है। वतन को छोड़ने की मजबूरी, अपनी पहचान का संकट, अपमान, दूसरे देशों के कानून, उनके जुल्म…. कई कुछ बनैले और घातक प्राणियों की तरह सामने आता जाता है। जब कोई निवासी निर्वासित होता है, अपना घर खोता है, शरणार्थी बनता है तो वह एक भयावह दौर से गुजरता है। और ऐसा दुनिया में कई जगह हो रहा है। कई वजहों से हो रहा है। हम भी इससे अछूते नहीं हैं। लोग तथाकथित गैरकानूनी ढंग से दूसरी सरहदों में प्रवेश करते हैं। नावों से लंबी समुद्री यात्राएं। ट्रकों बसों में छिप कर यात्राएं। पैदल यात्राएं। बच्चों बूढ़ों महिलाओं बीमारों की जान जोखिम में डाल कर। पराई जगहों पर प्रताड़नाओं, यंत्रणाओं का सामना करना पड़ता है। निजी, मनोवैज्ञानिक, शारीरिक सदमे अलग से।  निर्वासन के ये सारे पहलू वार्सन शाइर ने अपनी इस कविता में बयान किए हैं।

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निर्वासन का एक और रूप देखिए। फिलीस्तीन की पीड़ा और अपने वतन के लिए उनके संघर्ष से हम सब परिचित हैं। वहां के एक लेखक हसन कानाफानी (Ghassan Kanafani) की एक कहानी है गाज़ा से एक खत। यह कहानी बमवारी के बीच ढहते हुए अपने शहर के साथ नए सिरे से रिश्ता कायम करने की दास्तान है।

चूंकि मुल्क के हालात बदतर हैं, हमेशा जान हथेली पर रख कर रहना पड़ता है। कथानायक मुल्क छोड़ देना चाहता है। यानी वार्सन शाइर के शब्दों में शार्क के जबड़ेसे निकल भागना चाहता है। अपने एक दोस्त के साथ उसका समझौता है कि पहले दोस्त जाएगा, फिर वह कथानायक को बुला लेगा। वे दोनों कैलिफोर्निया जा बसना चाहते हैं। घर में कथानायक की बूढ़ी मां है, एक बेवा भावी और उसके छोटे-छोटे बच्चे हैं। वह सोचता है, चला जाउंगा, मेरी जिंदगी बेहतर हो जाएगी। इन्हें कुछ पैसे भेजता रहूंगा। उसके लिए उसकी अपनी सुरक्षा प्रमुख है। जब तक यह इंतजाम हो, वह कुवैत में मास्टरी करके गुजारा करता है। एक बार छट्टी पर घर आता है, मुल्क छोड़ देने की तैयारी के साथ। भाभी कहती है उसकी बेटी जख्मी हालत में अस्पताल में भर्ती है, उसे मिल आओ। अस्पताल में मासूम बच्ची को देखकर वह पिघल जाता है- चाय के कप में चीनी की तरह। बच्ची की वेदना को कम करने के लिए वह उसे बहलाता है कि वह उसकी मनपसंद लाल पेंट लाया है। जल्दी ठीक हो जाओ और पहनो। बच्ची धीरे से चादर हटाती है। उसकी एक टांग काटनी पड़ गई थी।

यह दृश्य कथानायक को आमूलचूल बदल देता है। अब उसे तपते सूरज में नया गाजा दिखता है, खून से लथपथ। उसे लगा यह एक नई शुरुआत है। उदासी का अब कोई काम नहीं है। यह एक चुनौती है। बमों, मिसाइलों के हमलों के कारण काटे जाने वाले अंगों को वापस हासिल करने की चुनौती। उस बच्ची ने अपने छोटे भाइयों को बचाने की खातिर अपनी टांग खोई है। भाग जाती तो बच जाती। पर वह भागी नहीं। और कथानायक कैलिफोर्निया भाग रहा था। अब वह इरादा बदल देता है। दोस्त को भी कहता है अपने वतन लौट आओ। 

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अब निर्वासन का एक और उदाहरण। निर्वासन ही नहीं, अपने देश को लौट जाने का स्वप्न। तिब्बती शरणार्थी। आप जानते हैं। अब तो इनकी यहां जन्मी पीढ़ी भी प्रौढ़ हो रही है। तिब्बती शिद्दत के साथ अपने देश को प्यार करते हैं। लौट जाने का महास्वप्न देखते हैं। इस सारे प्रसंग में

·                         सत्ता के सामने अस्मिता, अहिंसा और धीरज का एक लंबा विमर्श निर्मित होता है।

·                         मानवता का एक और रूप।

    तिब्बती कवि लासंग शेरिंग की एक कविता है-

तिब्‍बत अपनी आंखों से

मैं देखूं तिब्‍बत का स्‍वच्‍छ शफ्फाक आकाश

उसकी ऊंची बर्फ लदी चोटियां

हरी भरी पहाड़ियां और वादियां

पर देखूं सिर्फ बंद आंखों से

 

मैं देखूं अपनी प्‍यारी न्‍यारी मादरे जमीन को

मैं देखूं वो घर जहां मैं पैदा हुआ

मैं देखूं अपने बचपन के दोस्‍त सारे

पर देखूं सिर्फ बंद आंखों से

 

मैं लौट रहा आजाद तिब्‍बत को

मैं पहुंचा अपने पुराने घर के कस्‍बे में

मैं जा मिला अपने कुनबे से

पर देखूं सिर्फ बंद आंखों से

 

ऐसा क्‍यूं है कि

यह सिर्फ मेरे सपनों में है

सिर्फ बंद आंखों से ही

देखूं तिब्‍बत मैं

 

पर ऐसा क्‍यों है कि

मेरी जिंदगी में अच्‍छी बातें

होती हैं सिर्फ

मेरे सपनों में

 

क्‍या जागूंगा मैं एक सुबह

पाउंगा खुद को तिब्‍बत में

और सच में होगा यह

कि नहीं देख रहा होउंगा सपना मैं

हां क्‍या कभी लौटूंगा मैं

आजाद तिब्‍बत में ?

और देखूंगा कभी

तिब्‍बत को अपनी आंखों से

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दुनिया चूंकि देशों, सरकारों, धर्मों, जातियों में बंटी हुई है, आदमी का दिमाग तेज है पर फितरती भी है। श्रेष्ठताबोध, वर्चस्व, आधिपत्य और लालच भी अपना खेल खेलते रहते हैं। इसलिए दुनिया निरंतर छलनी और लहूलुहान होती रहती है। बहुत से लोग राष्ट्र की सीमाओं को बेमानी मानते हैं। यूं तो हमारा भी स्वप्न वाक्य है – बसुधैव कुटुंबकम्। पर फिलहाल तो साधो! कुटुंब में झगड़ा भारी। खैर! 

इस्राइल का एक लेखक है सलमान मासाल्हा। वह हिब्रू और अरबी दोनों भाषाओं में लिखता है और ड्रूज है यानी अनेक दर्शनों के मिश्रण में यकीन करने वाला।

          सन् 2006 में उसने जेरुसलम में एक ऐसा बहुलतावादी मादरे-वतन बनाने की घोषणा की, यहूदी, अरब और दूसरे सभी जिसके नागरिक होंगे और इसका अंग्रेजी नाम रखा 'स्‍टेट ऑफ होमलैंड'। उसने कहा कि इसमें किसी को अतीत से चले आते कोई अधिकार नहीं मिलेंगे, बल्कि भविष्‍य के प्रति उत्‍तरदायित्‍व होंगे। यहूदीवाद और इस्‍लाम दोनों 'स्‍मृति' पर बहुत महत्‍व देते हैं, लेकिन होमलैंडर 'भूलना' चाहेंगे। उसने लिखा भी है, ''विस्‍मृति स्‍मृति की शुरुआत है''। इस नए मुल्‍क की भाषाएं हिब्रू और अरबी होंगी। यहां सरकार का मुखिया नहीं, लोगों का मुखिया होगा, जिसकी सत्‍ता सिर्फ कूड़ा इकट्ठा करने, सड़कें पक्‍की करने और स्‍कूल बनवाने तक सीमित होगी। यह देश एक बडी़ नगरपालिका की तरह होगा। राष्‍ट्रीयता की भावना व्‍यक्ति के भीतर रहेगी। यहां मीटिंग हाउस नाम का मंदिर होगा, एक बढ़िया डी जे उसका पुजारी होगा और प्रार्थनाओं का स्‍थान कविताएं ले लेंगी। धर्म यहां बिल्‍कुल निजी मामला होगा। धर्म पर आधारित राजनैतिक पार्टियों पर रो‍क होगी, बल्कि बेहतर हो अगर कोई पार्टी हो ही नहीं। बजाए इसके सार्वभौमिक मानववाद को मंच प्रदान करने वाली एकमात्र पार्टी हो। कवि पश्चिमी लोकतंत्र के खिलाफ है क्‍योंकि वो पूरब को मुआफिक नहीं आता। यहां तो ''उदारपंथियों की तानाशाही'' होगी। वो कहता है हम शांतिवादी नहीं हैं। हम अपने मुल्‍क में आजाद बने रहने के अपने अधिकार के लिए दृढ़ रहेंगे। हमारी फौज तो होगी पर हम लडा़ई नहीं लड़ेंगे। यह मुल्‍क एक ऐसी प्रबुद्ध किस्‍म की रचना होगी कि हर कोई इसका नागरिक बनना चाहेगा। एक दिन हम सारी दुनिया को, बिना एक भी गोली दागे, जीत लेंगे।