Friday, September 25, 2020

विजय कुमार की तीन कविताओं पर एक टिप्पणी



छायांकन : हरबीर सिंह मनकू 


बजती हुई सांकल

(विजय कुमार की तीन कविताओं पर एक टिप्पणी)


कुछ को-

सबको नहीं

सब में से बहुतों को भी नहीं

बल्कि बहुत कम को।

नहीं गिन रही स्कूलों को, जहां जरूरी है

और खुद कवियों को

एक हजार में कोई दो लोगों को।

 

 पसंद है-

 पर किसी को चिकन सूप और नूडल भी पसंद है

 किसी को तारीफें पसंद हैं और नीला रंग

 किसी को पुराना स्कार्फ पसंद है

 किसी को रौब जमाना पसंद है

किसी को कुत्ते को सहलाना।

 

कविता-

पर कविता है क्या

कई ढुलमुल जवाब दिए गए हैं इस सवाल के

लेकिन मैं नहीं जानती, नहीं ही जानती

पर थामे हुए हूं इसे

जैसे जंगला पकड़ते हैं।

विस्लावा सिंबोर्स्का (अंग्रेजी अनुवाद : रेगीना ग्रोल)

 

प्रसिद्ध कवयित्री विस्लावा सिंबोर्स्का की इस कुछ को पसंद है कवितानामक कविता में दो बातें स्पष्ट दिखाई पड़ रही हैं।  पहली यह कि कविता के प्रेमी बहुत ही कम लोग हैं। स्कूलों में यह जबरदस्ती पढ़ाई जाती है। और कवि चूंकि खुद लिखते हैं इसलिए वे तो पढ़ेंगे ही। बाकी दुनिया जहान को ढेर सी और चीजें पसंद हैं। कविता उनकी पसंदगी के दायरे में नहीं आती। कविता में दूसरी बात एक सवाल की तरह है कि कविता है क्या? कवयित्री को ऐसा लगता है कि कोई भी कविता की परिभाषा से संतुष्ट नहीं है। दूसरे शब्दों में कविता की सारी परिभाषाएं आधी-अधूरी हैं। कवयित्री जोर देकर कहती हैं कि वह नहीं जानती, नहीं ही जानती। अपने यहां की शब्दावली में सोचें तो क्या यह अनिर्वचनीय’ ‘अगम्यकिस्म की शैहै? या एक कदम आगे जाकर नेति नेतिकह दें? तब तो यह ब्रह्म स्वरूपहोने लग जाएगी जिसे कोई नहीं समझ सकता। यानी समझ नहीं सकता तो समझा नहीं सकता यानी व्याख्या नहीं कर सकता यानी यह अपरिभाषेय है। यहां ध्यान दीजिए, इन पारिभाषिकों का प्रयोग करने से कविता का संबंध हमारी जीती जागती कविता से टूट सा गया लगता है। वह एक ऑर्गैनिक एंटिटीन रहकर कोई रहस्यमयी सत्तासी हो गई लगती है। इससे यह पता चलता है कि नहीं जानती, नहीं ही जानतीजैसे साधारण शब्दों से जो अर्थ ध्वनित हो रहा है, वह पारिभाषिकों के घटाटोप में छिप जा रहा है। कविता के शब्दों मेंन जान पानेकी सहजता और लाचारी सी है जो पारिभाषिकों में ध्वनित नहीं होती।

 

कविता की अगली पंक्ति इस नकार और लाचारी को एक सकारात्मकता प्रदान कर देती है, जब कवयित्री कहती है कि कविता भले ही कम पसंद की जाती है लेकिन वह इसे थामे हुए है जैसे जंगले को पकड़ते हैं। जंगले को पकड़ने से अर्थ छटाएं बिखरने लगती हैं। वह जंगला बरामदे का हो, बालकनी का हो, जहां सामने का विस्तार खुलता है या किसी पहाड़ी सड़क के मोड़ का जंगला हो जहां से घाटी खुलती है।

 

इस अर्थ में कविता एक भरोसा हमारे भीतर पैदा करती है। समाज में तरह-तरह के अल्पसंख्यकों को यूं ही हजार तरह के भय होते हैं। कविता प्रेमी जैसे अल्पसंख्यकों की तो बिसात ही क्या है। यह बहुत ही सीमित दायरे वाली अल्पसंख्या यानी माइनारिटीहै। पर मजे की बात है की बावजूद नगण्यताके, यह सभ्यता की शुरुआत से ही मौजूद है और तमाम तरह की ताकतों के सामने खड़ी है। यूं तो कविता लोक में भी है, लोकप्रियता के स्पेस में भी है, अकादमिक जगत में भी है, सत्ता के साथ भी है सत्ता के विरोध में भी है। कविता मनोरंजन और आनंद की तरह भी है और असुविधा भी पैदा करती है। इस पृष्ठभूमि में विजय कुमार की तीन कविताओं अनुपस्थित कवि’, ‘कवि का यकीनऔर लिखनाको हम यहां देखते हैं।

 

अनुपस्थित कविनामक कविता शुरू ही इस प्रश्न से होती है कि जब कोई कविता नहीं लिखता, तब भी कविताएं लिखी जाती हैं। क्या इसका अर्थ यह है कि कविता शब्दबद्ध हो या न हो, जीवन-जगत में तो कविता घटित होती ही रहती है। जिन तत्वों से कविता रूपाकार ग्रहण करती है, वे तत्पर हैं - कविता के प्रसूतिगृह में कविता के रूप में जन्म लेने को आतुर कि कोई कविता लिखने के लिए उनका इस्तेमाल करे । कविता के तत्व भी बताए गए हैं जैसे - दृश्य, बिंब, प्रतीक, बयान, पंक्तियां, कोरा कागज, शब्द, छूटी हुई जगहें, इत्यादि। ये सब प्रतीक्षातुर हैं। कविता उद्घोषणा के रूप में होगी या या शोक सभा में लिखी जाएगी। इस कविता को लिखने वाला कवि -

जो अनुपस्थित है

... तब वह कहां रमा हुआ है?

 दुनिया के किन पचड़ों में?

 दुख की किस रातपाली में?

ऊब के किस ओवरटाइम में?

दुनिया की ताकत के सामने खड़ा है यह अनुपस्थित कवि, निहत्थे व्यक्ति की बगल में। जीवन में जो प्रतिकूल घटित हो रहा है, वह उसे देख रहा है। कविता लिखे जाने के लिए एक 'सनक' चाहिए, 'कल्पना' चाहिए, 'विवरणों' के भीतर जाना होगा, घोंसलों में नींद जल का स्पर्श / और थोड़ी सी धुकधुकीकविता में आगे जो तत्व बताए गए हैं, वे एक तरफ जीवन को पूर्णता, गहनता, व्यापकता और संवेदना के साथ समझने के औज़ार प्रतीत होते हैं और शायद कवि को इनकी जरूरत है। पहले हिस्से में कविता के शिल्प से जुड़ी चीजें हैं और उसके बाद जीवन से जुड़े जीवंत घटक हैं, कविता लिखने के लिए इनकी भी जरूरत है।

 

सफलता की सीढ़ियों को नजरअंदाज करना, मयनोशी, रातों में सड़कों पर भटकना, मीलों पैदल चलना प्राय: बोहेमियन के लक्षण हैं और कवियों कलाकारों के साथ भी चस्पां होते हैं। इन लक्षणों के कारण कवियों की बदनामी ज्यादा है। लेकिन ध्यान से देखा जाए तो इसके पीछे एक भीतरी बेचैनी और आजादी की चाह है। कविता में कहा गया है -

क्या ये अब भी एक कवि के दरवाजे की सांकल

 बजाते हैं कभी कभी?

कविता में यह सवाल उठाया गया है कि कविता जो चारों तरफ बिखरी पड़ी है और लिखे जाने के लिए बेताब है, उसे रूपाकार देने वाला कवि कहां है? कविता की अगली पंक्तियां यानी कविता लिखने के उपादान कुछ इसी तरह कवि को उकसा रहे हैं।

... शीर्षक इतना अधीर

 कि डरा दे आधी रात

 कागज जो कोरे हैं

 क्या देंगे धमकी ...

 

 डराए यह रौशनाई ...’  

 

पसलियों में जलती लालटेन, जिद, बेकली, नशीली धुन, ढोलक पर थाप, गटर के गंदे पानी में सितारों की परछाइयां, सीने पर पत्थर जैसा बोझ, निस्सारताएं, विफलताएं, ये सब किसी अजूबे की तरह जीवन के हाशिए पर पड़े हैं ... ये कुछ ऐसे अवयव हैं, जिन्हें कवि कविता के लिए आवश्यक समझता है। लेकिन कवि अनुपस्थित है।

 

विस्लावा सिंवोर्स्का को लगता है कि जीवन में कविता की मौजूदगी बहुत क्षीण है। पर कवयित्री को कविता पर भरोसा है। वह उसे सहारे की तरह थामे हुए है। विजय कुमार काव्य रचना के बाहरी और भीतरी पुर्जों को तरह तरह से हमारे सामने रखते हैं; और खासे दिलकश और आवेग भरे अंदाज में; और बिंबों, रूपकों और बयानों के माध्यम से रखते हैं। लेकिन वहां कवि गैर हाजिर है। क्या यह अजीब है कि कविता लिखे जाने के सभी तत्व मौजूद हैं, वे तत्पर हैं कि कोई उनसे कविता बनाए पर कवि गैरहाजिर है? क्या यह किसी तरह का विरोधाभास है? आगे बढ़ने से पहले विजय जी की दो अन्य कविताओं पर भी नजर डाली जाए। ये कविताएं भी कवि और कविताओं से ही संबंधित हैं।

बुजुर्ग कवि का यकीन एक कठिन समय के बीच खड़ी है। विजय जी की ही एक अन्य गद्य पुस्तक है अंधेरे समय में विचार। यह कविता कुछ कुछ उसी तरह के अंधेरे समय को या एक विकराल समय को कविता की सत्ता में स्थापित करती है।

शहर का सबसे बूढ़ा कवि 

आधी रात शहर के सबसे पुराने इलाके में 

एक दुकान में 

अधजली रोटी शोरबे में डुबोकर खाता है

कविता इस दृश्य से शुरू होती है। आगे बहुत लंबी उदास रात है, हवा बंद है, चांद पहले से ज्यादा टेढ़ा है (यह मुक्तिबोध के प्रसिद्ध बिंब से आगे और अधिक कठिन समय का बिंब है), पेड़ कट चुके हैं, पक्षी कलरव नहीं विलाप कर रहे हैं, नदियों में पानी सूख चुका है, पुस्तकें फट चुकी हैं, स्वप्नदर्शी की स्मृति को भी मिटा दिया गया है। और ऐसे भयावह समय में सड़कें एकतरफा हैं यानी मत भिन्नता की जगह नहीं बची है।

 

इस भयावह स्थिति में कवि की कोई जगह नहीं बची है। लेकिन कवि का यकीन कायम है। यह यकीन सनक की तरह लग सकता है, पर है। कवि को विश्वास है कि जो तरह-तरह के अपराध करने में लिप्त हो गए हैं, वे थक कर लौटेंगे ही नहीं, कवि के शब्दों को भी तलाश करेंगे। कविता पर यह गजब का यकीन है। दुनिया को रहने लायक बनाने का एक तरीका भी यह है। कवि का यह यकीन शुरू में दी गई विस्लावा सिंबोर्स्का की कविता में व्यक्त यकीन से थोड़ा अलग है, ज्यादा जिद्दी। कवि को तो यकीन है पर इस कविता में इस यकीन के बारे में कहा गया है कि ... कवि का यकीन / बाहर के बियावान से ज्यादा भयावना है। इससे यह प्रतीत होता है कि यह यकीन अविश्वसनीय ढंग से गहरा है। गहरे से भी गहरा। यानी कि अमानवीय होती इस दुनिया को आखिरकार कविता ही बचाएगी।

 

विजय जी की तीसरी कविता है लिखना। यह भी कविता से पाए जाने वाले भरोसे को जिंदा करती है। कविता कोई जादू की पोटली नहीं है कि वह दुनिया को सुधार देगी, इन्साफ दिला देगी, जानलेवा बीमारियों से निजात दिलवा देगी, न्यायधीशों को भावुक कर देगी या भुखमरी दूर कर देगी। हम ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जो नियॉन साइनबोर्ड की तरह चमक रही है। शाम का वक्त है और यह हमारे लिए निरर्थक है। हम घर का रास्ता भी भूल गए हैं। इस बिंब के जरिए मन:स्थिति की कल्पना कीजिए, कितनी दारुण और डरावनी है। समय इतना बदहाल है और

दुनिया के तमाम कवि

 रोज असंख्य कविताएं लिख रहे हैं

इसके बाद कविता में प्रश्न किया गया है कि

तो क्या ये तमाम कविताएं  

चाबियां हैं किन्हीं ओझल दरवाजों की  

जो समय के बाहर खुलते हैं?

के किन घावों का निशान लिए

इंसानों की परछाइयां बैठी हुई हैं भाषा में?’

प्रश्न की तरह एक संभावना व्यक्त की गई है कि शायद ऐसा हो सकता है कि कविता समय के परे ले जा सकती है।

तमाम कविताएं उस भाषा को पकड़ने की कोशिश करती हैं जिनमें इंसानों की परछाइयां हैं और उनकी आत्मा पर घावों के निशान हैं। यानी कविता में आभ्यंतर तक घायल मनुष्य दिखाई पड़ता है। या यह कोई मौन स्मृति है जिस पर तितली मंडराती है। यानी वह स्मृति किसी फूल की तरह है। यानी कविता में मनुष्य की पीड़ा, दुख और स्मृति दर्ज रहती है। यह कोमल है; इसमें रंग और खुशबू हैं जिसकी तरफ तितली आकर्षित होती है। यानी सौंदर्य की खोज करती है कविता। सौंदर्य में दुख, पीड़ा, स्मृति, कोमलता, रंग, खुशबू, सृजनात्मकता का समावेश है। इस तरह कविता के अर्थ खुलते जाते हैं और उसकी उपादेयता, उसकी उपस्थिति, उसकी अनिवार्यता स्वयं सिद्ध हो जाती है।

 

कोई भी रचना या कलाकृति एक दिक् और काल में निबद्ध होती है। उसी में रहते हुए वह दिक् और काल के आर-पार विचरण करती है। सिंबोर्स्का की कविता एक रोमानी सा और बादलों की तरह का हल्का-फुल्का यानी भारहीन और बेठोस सा दिक् काल रचती है। उसी में से कविता के प्रति दृढ़ विश्वास उभरता है। दूसरी तरफ विजय कुमार की कविताएं कठिन, कर्कश, बीमार, अपराध, हिंसा, लूट-खसूट, ज्ञान-कला-संवेदना विरोधी और अमानवीय होता हुआ सा दिक् काल रचती हैं। बेशक इसमें हमारे ही समय का वर्तमान धड़कता है। इस कठीन, कठोर, ठोस, सांद्र, परिस्थिति के बीच कवि काव्य रचना की संवेदना- संभावना की तलाश करता है। इसी बीमार समय में कवि और कविता पर भरोसे को संभव करता है, वह भी शिद्दत के साथ। 

   

हमारे समय में भरपूर कविता लिखी जा रही है। तरह तरह की कविताएं लिखी जा रही हैं। कवियों और कविताओं के कई संस्तर हैं। कवि और उनके जितने भी थोड़े बहुत रसिक हैं, वे अपने अपने दायरे में मस्त हैं। वे अपनी अपनी तरह की कविताई से संतुष्ट हैं।

 

यहां जिन कविताओं की चर्चा की गई है, इनकी केंद्रीय चिंता है कि कविता जीवन के भीतर कुछ और धंसे। कविता जहां-जहां जो-जो संधान की रही है, वह पर्याप्त नहीं है, उससे और आगे जाए। हमारा यह स्वप्नदर्शीकवि जिस तरह से कविता को देख रहा है, उस तरह की कविता का रचयिता कवि दृश्य में मौजूद नहीं है। जीवन के भीतर धंसकर कविता को खंगालने, ढूंढ़ने और साकार करने की बेचैनी इन कविताओं में है। इन कविताओं में मौजूदा कविताओं और काव्य-स्पेस के प्रति नकार का भाव नहीं है। यहां सिर्फ कविता के बनने को ही तरह-तरह से कहा गया है। कवि के अनुपस्थितहोने की असहायता केवल ध्वनित हो रही है।      

 

यह लगता है कि वह कुछ भिन्न चाहता है। ऐसा हर कवि के साथ होता है या हो सकता है कि वह जो लिखता है, उससे कभी कभी पूरी तरह संतुष्‍ट न हो। वह जीवन की अतल गहराइयों में घुस कर सच्ची और अप्रतिम कविता संभव करना चाहता है। खुद से भी और अपने वक्‍त के कवियों से भी वह ऐसी ही अपेक्षा करता है। इन तीनों कविताओं में काव्य लेखन के कुछ नवीन, कुछ अनछुए, कुछ गहन आयाम तलाश करने की एक तरह की छटपटाहट महसूस होती है।

 

इन चारों कविताओं में कुछ शब्द स्फटिक मणियों की तरह चमकने लगते हैं। नहीं जानती’, ‘जंगला’, ‘लिखना’, ‘अनुपस्थित कवि’, ‘यकीन’, ‘सांकलऔर चाबियां। इन सप्त मणियों की अपनी-अपनी अलग-अलग व्याख्याएं इन कविताओं के संदर्भ में दीप्त होने लगती हैं। ये परस्पर संबद्ध होकर ही अर्थच्छायाओं के नए आयाम खोल सकती हैं। यह इस काव्य आस्वाद का अगला चरण हो सकता है।   

इस बिंदु पर विजय कुमार जी की पहली आलोचना पुस्‍तक कविता की संगतको खंगालना दिलचस्प‍ होगा। इस किताब में उनका एक लेख है, ‘क्‍या कविता गवाही देगी?’ सन् 1993 में लिखा गया यह लेख सोवियत संघ के विघटन और भूमंडलीकरण के पैर पसारने के दौरान हो रहे परिवर्तनों को दर्ज करता है और अपेक्षा करता है कि कविता इस बदलते हुए समय की परख करे। कुछ उद्धरण दिए जा रहे हैं जिनकी व्याख्या की जरूरत नहीं है।  

‘‘हमारे समय में कविता की गवाह बनने, याद रखने और दर्ज करने की शायद एक नई तरह की भूमिका उभरी है।’’ (पृष्‍ठ 34) 

‘‘आज लिखी जा रही कविता घटनाओं की गवाही इसी अर्थ में देगी कि हम तुष्‍टि, विस्‍मृति और उदासीनता के इस भयावह अंधकार के खिलाफ कितनी देर तक टिके रह सकते हैं।’’ (पृष्‍ठ 35-36) 

‘‘हिन्दी की समकालीन कविता के एक बड़े हिस्से में दुर्भाग्य से इस तरह की गवाही आज ज्यादा नहीं है।’’ (पृष्‍ठ 36)

‘‘यह एक सच्चाई है कि आज हम अपने समय का एकीकृत और कन्डेंस अनुभव प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं। हम विवरणों, घटनाओं, प्रसंगों में इस प्रकार नहीं धँस पा रहे हैं कि उनमें रमें भी, एक साथ उन्हें ट्रांजेंड भी कर दें।’’ (पृष्‍ठ 37-38) 

 

जो छटपटाहट, अकुलाहट और प्रश्नाकुलता यहां उल्लिखित तीन कविताओं  ‘अनुपस्थित कवि’, ‘कवि का यकीनऔर लिखनामें है, लगभग उसी तरह की मन:स्थिति  इस लेख में प्रतीत होती है। ऊपर दिए गए उद्धरणों से यह झलक मिल जाती है। इसी किताब में विजेंद्र जी को एक खत के रूप में लिख गया एक लेख है, 'अमानुषिकता के बीच कविता जिंदा है'। इस लेख में विजय जी ने कविता के प्रयोजन को खोला है। 

‘‘... जानकारियां देने वाले दूसरे तमाम माध्यमों की तरह कविता भी अपने समय की गवाही देना चाहती है पर इस गवाही में केवल तथ्यों को इकट्ठा कर लेना भर नहीं है।’’ (पृष्‍ठ 201)

‘‘कवि चीजों से गुजरते हुए एक ओर स्वयं को बचाये रखने की जद्दोजहद में रहता है, दूसरी ओर वह चीजों को भी बदल देना चाहता है। यह दोतरफा लड़ाई है।’’ (पृष्‍ठ 201) इस बात को विजय जी ने विष्णु खरे की 'घर' कविता के जरिए स्पष्ट भी किया है। 

‘‘एक कवि के रूप में हम बार बार इस चीज को जानना चाहते हैं कि हमारी उलझनें क्या हैं और हमारी क्षमताएं क्या हैं? क्योंकि हमारे सबसे अच्छे इरादों के बावजूद, हमारे सबसे महान विचारों के बावजूद हमारे जीवन से कितना कुछ छूटता चला जा रहा है, कितना कुछ हम भूलते चले जा रहे हैं। वे तमाम चीजें जिनमें हमारा हस्तक्षेप हो सकता था, वे हमसे याचना करती दिखाई पड़ती हैं, हम लगातार उन्हें विस्मृत करते चले जाते हैं। हमारी अधूरी इच्छाएं और हमारी स्वीकृतियां, हमारा लगातार संतप्त निजी अन्तर्द्वन्द्व और हमारे विचारों की ऊंचाई, हमारे इरादे और हमारे भीतर का आदिम अंधकार, हमारे आदर्श और हमारे साधनों की सीमाएं, हमारी दुनियावी सफलताएं, और हमारी झूठी स्वैरकल्पनाओं में जीने की थकी हुई इच्छाएं, हमारी अनवरत और अनिश्चित किस्म की उत्कंठित अन्यमनस्कताएं और हमारी सबसे स्पष्ट व्यावहारिकताएं - यही सब कुछ कविता का विषय बनता है। और सबसे अचरज की बात है कि रचते हुए हमेशा एक आधुनिक कवि को यह लगता है कि कविता केवल इसी सबकी गवाही ही नहीं देना चाहती, वह इस सबको भरपूर गाना भी चाहती है। बहुत प्रकट दिखाई देने वाले अन्तर्विरोधों में और इसी सबको साफ तौर पर न सुलझा पाने पर हमेशा भीतर मौजूद  रहने वाली कसक कविता में छिपी रहती है।’’ (पृष्‍ठ 202)

 

इस तरह विजय जी की ये कविताएं और उनके लेख हमें कविता के रूपाकार, कविता से अपेक्षाओं-आकांक्षाओं और कविता के प्रयोजन को समझने में मदद करते हैं। वे परस्पर भी एक दूसरे को स्पष्ट करते हैं। और एक विमर्श की निर्मिति होती है। 

(इस टिप्पणी के  लिए हृदयेश जी का आभार, जिनके कई बार कहने पर यह लिखी जा सकी। साथ ही केरल के हिन्दी के युवा प्रोफेसर महेश एस का आभार। एक वेबिनार में महेश ने विजय जी की तीन कविताओं की सुंदर व्याख्या की। उन तीन में से एक कविता 'अनुपस्थित कवि' भी थी। संयोग से ही मैं उस वेबिनार को सुन पाया और महेश जी की बातों से ही मुझे लगा कि मैं भी इस कविता पर कुछ बात कर सकता हूं। अरुंधती का भी आभार जिसने विस्लावा सिंबोर्स्का की कविता ढूंढ़ कर दी। इस कविता का जो अनुवाद मैंने किया है, वह बहस-तलब हो सकता है। इसे बेहतर बनाया जा सके तो खुशी होगी।)  



विजय कुमार की तीन कविताएं 






Monday, June 29, 2020

वीटी बेबे

वीटी स्टेशन की धरोहर इमारत पर लगी मूर्ति 




मैंने कहानियां ज्यादा नहीं लिखीं हैं । जो लिखी हैं वे भी पचीस तीस साल पहले । रोटियां कहानी हिमाचल की ग्रामीण पृष्ठभूमि पर है, जो मधुमति में छपी थी । मुंबई के आवारा कुत्तों के पकड़ने की कुत्ताघर नाम की कहानी वर्तमान साहित्य में छपी थी । एक और सीधी-सादी कहानी सवा दो अक्षर नव भारत टाइम्स में छपी थी । जो कहानी आपको आज पढ़वा रहा हूं, वह मुंबई के सीएसटी स्टेशन को केंद्र में रखते हुए लिखी थी । तब मुंबई, बंबई और सीएसटी, वीटी कहलाता था । यह वीटी बेबे नाम से कथादेश में सन 2002 में छपी थी ।    

गांव की उस बुजुर्गवार महिला को सब लोग बेबे कहते थे । बच्चों बड़ों सबकी बेबे । औरत होने के बावजूद बेबे गांव के गिने-चुने बुजुर्गों में से एक थी । हर कोई सलाह सूतर लेता । वह भी जब तक हर किसी का सुख-दुख जान समझ न ले, चैन से नहीं बैठती थी । किसी का लड़का बाहर से आया हो, कोई धियाण मायके लौटी हो, मत्था टेकने के बहाने बेबे के पास जरूर जाते । कोई जा रहा हो, बेबे असीसें देते थकती नहीं थी ।

हम छोटे छोटे थे । जितना मजा बेबे से कहानियां सुनने में आता था, बाकी बातों में इतना रस नहीं आता था । एक से एक नायाब कहानियां । कभी न खत्म होने वाले किस्से और आंखों के सामने साक्षात खड़े हो जाने वाले किरदार । अगर कोई पात्र कुछ हासिल कर लेता तो वह हमें अपनी ही जीत लगती । कोई मुश्किल में पड़ा होता या कोई तकलीफ होती तो हम डर जाते । आंखों में आंसू तैरने लगते । हम बेबे के पास सिमट आते । बेबे हमें अपने आगोश में ले लेती और हम निर्भय हो जाते ।
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मैं जब आजाद मैदान से वीटी की तरफ आता, स्टेशन की इमारत के गुंबद पर लगी मूर्ति जीवंत हो उठती । नाइट शिफ्ट करके बारह-एक के करीब लोकल ट्रेन पकड़नी होती । सारा इलाका तकरीबन सुनसान होता । इक्का-दुक्का टैक्सी । एक दो आखिरी ट्रेनें । और थोड़े से लोग । खिड़की वाली सीट पर बैठकर सामने पैर पसार कर बाहर देखता । हवा के साथ थोड़ा अंधेरा और एक बराबर अंतराल पर रोशनी की फांक चेहरे से टकराती । गाड़ी एक ताल पर फिसलती रहती । बीच-बीच में पटरियों की चमकती हुई लकीरें गुजरती जातीं ।  एक अवसाद मुझे डुबोने लगता । गुंबद पर लगी मूर्ति न जाने कब गुंबद से नीचे उतर कर मेरे साथ चली आती । और सफेद  सौम्य परिधान में सामने आ बैठती । हाड़-मास की जीवंत मूर्ति । और वह मुझसे बातें करने लगती । बातें क्या, इकतरफा संवाद । वही बोलती । मैं सुनता बातें भी कैसी ? लोगों के बारे में । चीजों के बारे में । ज्यादातर स्टेशन से जुड़ी हुई । मैं उसके चेहरे पर बनती-मिटती भाव-रेखाएं पढ़ता रहता । वह हर उस घटना, इंसान या परिवर्तन का बड़ी शिद्दत के साथ जिक्र करती, जो किसी भी तरह स्टेशन से या मुंबई की जिंदगी से जुड़ा रहता । मैं एक तंद्रिलता में सारी बातें सुनता । शयद बेजुबान प्रतिक्रिया भी मुझसे नहीं दी जाती । ट्रेन से उतरकर पैदल घर जाते हुए सारी बातों को याद करता रहता । एक रहस्यमय पोटली में बंधी सारी बातें दिमाग में घुसती जातीं ।

अगले दिन दोपहर बाद वीटी पहुंचता तो इधर उधर नजर उठाते ही मूर्ति की बातों में सच्चाई नजर आने लगती । भीड़ की धक्कमपेल में सरकते हुए चेहरों की खुशियां, उदासियां, उनकी सारी कहानियां स्पष्ट साकार हो उठतीं । उन औरतों को खोजी नजर से ढूंढ़ने की कोशिश करता जो मेन हॉल के आसपास सज-संवर कर खड़ी रहती हैं या टहलती रहती हैं । अभ्यस्त नजरों से ग्राहकों को पहचान लेती हैं । मूर्ति की तरह मेरे भीतर भी ऐसी मजबूर औरतों और सपाट चेहरे वाले लोगों को देखकर करुणा ही पैदा होती । मूर्ति ने इन लोगों के बारे में कहा था कि अपने खंभों के इर्द-गिर्द इस व्यापार को महसूस करके अजीब सरसराहट होती थी । जैसे टांगों पर तिलचट्टे चलते हों । पर इन बेचारी औरतों की घर-परिवार की मजबूरियों का ख्याल कर इस लिजलिजे एहसास को सह जाती है । मजबूरियों में कहां की नैतिकता और कहां के मूल्य । 


इसी तरह मवाली छोकरे मुझे अक्सर देखने को मिल जाते, जो स्टेशन पर भटकते हुए बेमकसद लगते हैं पर इनकी रोजी रोटी वहीं पर चलती है । जेबें काटकर, मुसाफिरों का सामान चुराकर, गाड़ियों के टिकट और सीटें बेचकर । मूर्ति उन्हें चींटियों की संज्ञा देती । कहती, इन लोगों ने तो जैसे मुझे अपना घर ही बना रखा है । और कि अब मेरी खाल ऐसी हो गई है कि कुछ फर्क नहीं पड़ता । इन मवालियों से मूर्ति अपनी सहानुभूति जतलाती । जिस दिन मूर्ति ने यह बात बताई, मैं घर जाकर हैरान हुआ कि इनसे सहानुभूति क्यों हो ? ये तो अपराध करते हैं । इसका दंड मिलना चाहिए । अगले दिन मेरे सोचे हुए पर मूर्ति ने पानी फेर दिया । अब तो यह संपर्क ऐसा हो गया था कि आमने सामने तो सवाल जवाब न हो पाते, लेकिन जो मैं घर जाते हुए रास्ते में या घर जाकर सोचता, उनके जवाब मूर्ति अगले दिन, बल्कि अगली रात मुझे दे देती । बिना कुछ पूछे । खुद ब खुद । बूझ के । सो मूर्ति का मत था कि स्टेशन तो इनकी शरणस्थली है । ठीक है बेचारे भटके हुए लोग हैं, लेकिन पेट तो सबके साथ है । इनके अपराध सबको नजर आ जाते हैं, क्योंकि हालात के मारे हुए लोग हैं । किसी तरह का लुकाव-छिपाव या पर्दा इनके पास नहीं है । न पैसे का न रसूख का । न सुविधा का न संयोग का । न जात का न जमात का । न दीन का न धर्म का । न भगवान का न हिवान का । किसी तरह का कोई कवच नहीं । ये लोग अपनी जहालत, जलालत और अपराधों में निपट अकेले हैं । मूर्ति इस ख्याल से विचलित हो जाती कि ये लोग जिस तरह फटेहाल आते हैं, उसी तरह गुमनाम मौत मारे भी जाते हैं । इन्हें सुधारने-संवारने की जिम्मेदारी जिस तबके पर है वह भी जम कर इस्तेमाल करता है । इन्हें यहीं पड़े रहने पर मजबूर करता है । मूर्ति कहती, दिन-रात इमारत के ऊपर ठुकी रह कर देखती रहती हूं । हर एक को अपनी ही पड़ी है । ऐसी आपाधापी कि अपने सिवा कोई नहीं दिखता ।

मुझे मूर्ति की ऐसी बातों से जिनमें लोगों से प्रेम घृणा का एक अजीब सा रिश्ता था, कभी हंसी आती कभी उदासी । वह देखती रहती और गरियाती रहती रोज-रोज ।

मेरी नाइट शिफ्ट मजे में चल रही थी । मूर्ति के बहाने मेरा भी इस शहर के प्रवेश द्वार से रिश्ता जुड़ गया था । जैसे संवेदना की खिड़की खुल गई थी । मुझमें गुस्से, सहानुभूति, प्रेम के भाव तैरते रहते । बीटी स्टेशन से दोस्ती मजे में चल रही थी ।

एक रात उसने एक किस्सा सुनाया । जो आदमी आज ट्रेन से कटकर मर गया, वह कोई बीस साल पहले यहां आया था । कहने को वह आदमी था, पर आदमी तो वह कभी हुआ ही नहीं । जब आया था तब बालक था । मैला कुचैला छौना । जब मरा तो बूढ़ी ठठरी था । जब आया था, महीना दस दिन भटकता रहा भूखा प्यासा । फटेहाल । पुलिस वालों के हत्थे भी चढ़ा । अजनबी माहौल के खौफ में वह सड़कों पर भटकने निकल जाता पर प्लेटफॉर्म छोड़कर वह कभी गया नहीं । आधी रात के बाद दो बजे के करीब जब वह कोने वाले खंभे से पीठ सटा कर निढाल पड़ जाता तो मेरा दिल पसीज उठता । मेरे हाथ अगर उसे छू सकते तो मैं उसे सहला कर सुलाती । पर मैं तो बस देखने और कुढ़ने के लिए ही अभिशप्त हूं । कोई दैवी ताकत भी मुझ में नहीं है कि उसके सामने खाने की थाली परोस सकती या कोई ठीहा ही ढूंढ़ देती । वह तो भैया हर किसी को अपने ही उद्यम से पाना है । चाहे उस उद्यम में मेहनत हो, तिकड़म हो या संयोग हो । जैसे हालात बन जाएं और इंसान मौके का फायदा उठा ले । खैर! कुछ दिन तक तो वह आदमी गायब रहा । मेरी ढूंढ़ती आंखों ने एक दिन देखा कि वह सामने छोकरों की पांत में बैठा है और पॉलिश की पेटी पीट पीट कर गला फाड़ फाड़ कर ग्राहकों को बुला रहा है । मेरी छाती में ठंडक पड़ी । जी उमड़ने लगा । भैया बउ़ा चैन पड़ा कि चलो अपने पैरों पर खड़ा हो गया । मेरे सामने उसने कमाना खाना शुरु कर दिया । पिछले बीस सालों से वह वहीं उसी जगह पर लोगों की जूतियां चमकाता रहा । बूढ़ा तो वह दो ही साल में हो गया था । पर काम बदस्तूर करता रहा । और चाहे कुछ हो न हो सौ तरह की बीमारियों की कृपा इन लोगों पर हुई रहती है । मुझे इनके पीले चेहरों को देखने और उनकी खसखसाती छातियों की लय ताल सुनने की आदत पड़ गई है । वह कहां रहते हैं, इस बारे में भी मैं ज्यादा नहीं सोचती । वह सुबह प्रकट होता, रात को चला जाता । मेरे आंगन की वह जगह उसने कभी नहीं छोड़ी । दो बाई दो फुट की उस जगह पर कब्जा जमाए रखने के लिए उसे पुलिस वालों को हफ्ता देना होता था । मैं जानती हूं, पर हालात कैसे बदल सकती हूं । मैं तो जड़ आंख हूं । देखती हूं और बिसूरती रहती हूं ।

और वह आज ट्रेन के नीचे आ गया वह गाड़ियों की हर अदा से वाकिफ था । यूं बेमौत नहीं मर सकता था । पर जिस्म ने साथ नहीं दिया । ट्रेन से छलांग लगाने की पुरानी आदत ।  कमबख्त ने अपने जर्जर शरीर का ख्याल करके नहीं छोड़ी । दूसरा पैर नीचे रखने से पहले ही उसका हाथ छूट गया और देह गाड़ी और प्लेटफार्म के बीच रगड़ती चली गई । शरीर बुरी तरह चिथ गया था । उसकी पॉलिश की पेटी दूर जा गिरी ।

किस्सा यहीं खत्म हो जाता तो मैं भूल जाती । आदमी पैदा होता है । मर खप जाता है । कुदरत कहो या हालात यह गोरखधंधा ऐसे ही चलता रहता है ।

उसकी लाश उठा दी गई । पॉलिश की पेटी प्लेटफार्म पर पड़ी रही । देखती क्या हूं कि एक बारह तेरह साल का छोकरा बड़ी देर से वहां चक्कर लगा रहा था । चक्कर में इधर उधर नजर दौड़ाने के बाद चुपके से पेटी उठा ली । मेरा जिस्म तो जैसे सुन्न पड़ गया । यह क्या हो रहा है ? इस लड़के को मैंने पहली दफे नहीं देखा था । कोई दो हफ्ते पहले यह गाड़ी से उतरा था । सूनी और डरी हुई आंखों से प्लेटफार्म को, भीड़ को, हर चीज को देख रहा था । तब मैंने ध्यान नहीं दिया । अपना भाग लेकर गाड़ी से उतरा है । खुद ही निकाल लेगा रास्ता, और चलता बनेगा । इतने दिनों तक मेरे आसपास चक्कर लगाता रहा तो भी मैंने खास ध्यान नहीं दिया । इकहरे बदन का छोकरा, मसें अभी भीगी नहीं थीं । घर से भाग आया होगा । बंबई किस किस को नहीं खींच लाती । यह भी भटक रहा है । राह पा जाएगा । पर यह ऐसी राह पाएगा यह नहीं सोचा था । दस ही दिनों में वह पत्थर हो गया । उस बूढ़े को मरते हुए उसने देखा । उठने का इंतजार करता रहा । और मौका पाते ही पॉलिश की पेटी उठाकर इत्मीनान से चलने लगा । न उठाने में कोई उतावली दिखाई, न ले के भागा । ताकि किसी को चोरी की भनक तक न लगे । इसके दिल-दिमाग में कैसी बजरी बिछ गई है ।

उसे जिंदगी जीने का एक सबब मिल गया, मुझे खुश होना चाहिए था । मैं तो पिघली जा रही थी । कैसा इतिहास बन रहा है । मेरी आंखों के सामने आज की घटना और बीस साल पहले का यह दृश्य गड्डमड्ड होकर फड़फड़ाने लगा । जो मर गया वह तब कितना हताश था । फिर पॉलिश की पेटी की लाकर हालात से लड़ने लगा था । और यह छोकरा बीस साल बाद अपने मरे हुए अतीत पर चल कर उसी पॉलिश की पेटी को उठा कर इत्मीनान से चल रहा है । उसे अपनी ही फिक्र है । वह जान गया है, अगर मौके का फायदा नहीं उठाया तो उसे कुछ हासिल नहीं होगा । हाय रब्बा, इसकी उम्र मासूमियत की है और यह दुनियावी समझदारी में माहिर हो गया है । बालक अब कितनी जल्दी बड़े हो जाते हैं । पर इस अनजान लड़के को कुछ नहीं मालूम । अतीत क्या था । बीस या पचीस साल बाद या कल या अगले ही पल क्या होगा । कुछ नहीं मालूम । उसने तो जैसे एक किनारा पकड़ लिया है और दुनिया उसके सामने खुलती चली जाएगी ।

इस किस्से को सुनने के बाद जब मैं घर पहुंचा तो सो नहीं पाया । मूर्ति से मुझे पहली बार डर लग रहा था । मूर्ति से यह संवाद इकतरफा ही होता था । जवान खोलने का सवाल नहीं उठता । लेकिन जो सवाल मन में उठ भी रहे थे, वे घर पहुंच कर गायब हो गए । सिर्फ मूर्ति की बातें ही दिल दिमाग में घुमड़ने लगीं ।

अगले दिन में काम पर नहीं जा सका । भागता हुआ खौफनाक अंधेरा, तेज चमकती रोशनियां, मूर्ति का सफेद लिबास, गाड़ी की ठक-ठक, भीड़ का शोर, चिल्लाहटें मुझे घेरे हुए थीं । मुझे बुखार आ गया । उठकर चाय पीने तक की हिम्मत बाकी नहीं बची थी । जैसे बहुत लंबी बीमारी से शरीर निचुड़ गया हो ।

दिमाग खाली नहीं हो पा रहा था । उस सारे दिमागी तूफान में एक बात बार-बार भड़भड़ा रही थी । जहां मैं काम करता था, उसी महकमे में मेरे पिता नौकरी करते थे । दो साल पहले एक दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई । घर टूटने के कगार पर ही था । मैं उनका बड़ा लड़का नौकरी की तलाश में भटक रहा था । पिता के महकमे ने दरियादिली दिखाई और मुझे नौकरी पर रख लिया । मैं मुंबई आ गया । घर उजड़ने से बच गया । पिता की जिम्मेदारियां मैं निभाने लगा ।

जैसे काले सागर में लाइट हाउस की रोशनी घूमती रहती है और रोशनी की लकीर पानी पर खिंचती चली जाती है । जर्द और उदास । चमकता पीला काला पानी थरथ्राता हुआ दिखता है । मूर्ति का सुनाया हुआ किस्सा काले सागर की तरह मेरे चारों ओर पसरा हुआ था । अपना और पिता का रिश्ता पीली डोलती लकीर की तरह इस स्याह पारावार में दूर तक चिरता चला जाता । मैं उस काले स्याह में डूब रहा था ।

बीमारी के दौरान एक दोस्त मेरा हाल चाल पूछने आता था । मेरे चेहरे के पल-पल बदलते रंग देखकर पूछता, ‘‘कोई चीज तुम्हें खाए जा रही है।  बता दो ।’’ मैं हिम्मत नहीं कर पाया ।  बार-बार इसरार करने पर धीरे-धीरे सारा किस्सा कह डाला । मूर्ति के सारे संवाद उसे सुनाए । जो मेरे दिमाग में पक्की स्याही से इतनी बार लिख डाले गए थे कि न मिटने का नाम लेते थे न अंदरूनी नजर से ओझल होते थे । उसने सारी बातें ध्यान से सुनीं । और बोला, ‘‘ तुम सनकी आदमी हो’’ मैं सफाइयां देता रहा । आखिर उसने फैसला सुनाया, ‘‘अगर तुम ठीक होना चाहते हो तो आगे से ट्रेन के खाली डिब्बे में कभी मत चढ़ना । और रात की शिफ्ट तो बंद ही कर दो । मैडिकल सर्टिफिकेट दो और दिन की ड्यूटी करो ।’’

उसकी इन बातों पर पहले मैंने ध्यान नहीं दिया । लेकिन एक फर्क महसूस किया कि सारी बात बता कर मैं जरा हल्का हुआ था । वो अंधेरे और रोशनी के धब्बे, और शोर कुछ कम हो गया । और मैं स्वस्थ होने लगा ।


Sunday, June 7, 2020

कोरोना के बाद कहां तक है कुदरत की तरफ लौटना मुमकिन


भारतीय विद्या भवन का मासिक कोरोना काल की घरबंदी के दौरान ऑनलाइन शाया हो गया है। संपादक विश्वनाथ सचदेव जी ने कोरोना आवरण कथा आयोजित करके भविष्य की दुनिया पर गंभीर बहस में योगदान दिया है । मेरा यह लेख नचनीत के इसी अंक में है ।  
   


खलील जिब्रान की एक छोटी सी कहानी है जिसमें जिक्र आता है कि एक भागता हुआ कुत्ता दूसरे कुत्ते को पूछने पर बताता है कि जल्दी करो सभ्यता हमारे पीछे पड़ी है । पर्यावरण को बचाने यानी उसे मूल रूप में रखने या  कुदरत के कुदरती रूप में बने रहने पर जब हम विचार करने लगते हैं तो 'सभ्यता' शब्द बीच में आ खड़ा होता है । यूं 'संस्कृति' शब्द भी बीच में आता है पर वह 'सभ्यता' की तरह रोड़ा नहीं बनता । लेकिन सभ्यता और संस्कृति का आपस में चोली दामन का संबंध है इसलिए संस्कृति भी कटघरे में खड़ी हो जाती है ।

कुछ चिंतक यह मानते हैं कि मनुष्य ने जब से अपने रहने खाने-पीने की आदतें डालीं, तभी से वह कृत्रिम होना शुरू हो गया । यानी उसकी रहनी में नकलीपन या कृत्रिमता आने लगी । यानी वह वैसा ही नहीं रहा जैसा कोई भी अन्य कुदरती पदार्थ या प्राणी होता है। पर सत्य इतना एक रेखीय नहीं है । यह खासा गुंझलक भरा है ।

इसी तरह जो लोग मौजूदा रहन-सहन और कृत्रिमता से परेशान हैं वे सीधे सृष्टि के आरंभ में लौट जाना चाहते हैं । पर क्या ऐसा संभव है ? पीछे लौटना इतना ही आसान होता तब तो कोई दिक्कत ही नहीं थी । इसलिए जहां हम आज हैं उससे आगे ही बढ़ना है । और कोई रास्ता नहीं । आगे की इस यात्रा में ही हमें तय करना है कि हमें क्या और कितना परिवर्तन करना है या हम क्या और कितना परिवर्तन करना चाहते हैं ।

यहां तक पहुंचने की प्रक्रिया में हमारी मनुष्य बनने की प्रक्रिया भी शामिल है । यानी हम बाकी प्राणियों से थोड़ा अलग तरह के प्राणी हैं । हमारा मस्तिष्क, हमारा स्नायुतंत्र, हमारा मन, हमें बाकियों से अलग करता है । प्रकृति के बीच जीवित बचे रहने तक की जद्दोजहद होती तो ठीक था, जिसे सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट कहते हैं । यह सहजवृत्ति जीवित रहने से जुड़ी है । लेकिन मनुष्य के पास सोचने के लिए दिमाग भी है महसूस करने के लिए दिल भी है । यहीं से खुराफात शुरू हो जाती है ।

मनुष्य अपने लिए चीजों को आसान करने की कोशिश करता है । वह प्रकृति के लगभग सभी अवयवों का उपयोग करना शुरू करता है । मनुष्य के पास कर्मेंद्रियां और ज्ञानेंद्रियां भी हैं । दिमाग, दिल, मन, कर्मेंद्रियां, ज्ञानेंद्रियां, मनुष्य के बहुत ही परिष्कृत, महीन और श्रेष्ठ उपकरण हैं जो अवसर आने पर आयुध भी बन जाते हैं । इंद्रियां अन्य प्राणियों में भी हैं पर मस्तिष्क के प्रयोग से मनुष्य ने इनका बहुविध उपयोग सीख लिया है । इन उपकरणों के इस्तेमाल से वह दूसरे प्राणियों के बीच खुद को अपनी इच्छा अनुसार स्थापित कर सका है । इन जटिल औजारों की वजह से मनुष्य सोचने लगा, बोलने लगा, उसने भाषा बना ली, लिपि बना ली; इसी क्रम में उसने स्मृति बना ली । एक तरफ उसकी भौतिक यात्रा है जिसमें कृषि सभ्यता का विकास होता है । साथ साथ बौद्धिक यात्रा है जिसमें वह अपने इन अतिरिक्त औजारों की मदद से भौतिक यात्रा को उत्तरोत्तर अधिक उपयोगी और आसान करने की जुगत करता रहता है । एक तरह से देखा जाए तो इस सारे उपक्रम में वह प्रकृति से दूर ही जा रहा था ।  यानी जो उसका प्राकृतिक स्वरूप या स्वभाव था उसमें परिवर्तन आता चलता है ।  एक उदाहरण से बात स्पष्ट हो जाएगी ।  जब आदमी ने कच्चा मांस खाना छोड़ दिया, आग ढूंढ़ ली और मांस पकाने लग गया तो उसके दांत कम हो गए, छोटे भी हो गए और उनकी संख्या भी कम हो गई । अपने रहने के लिए गुफा बनाई, फिर छत बनाई, तो उसके लिए नंगा रहना मुश्किल हो गया।  उसे बदन ढकना पड़ा ।  फिर ठंड और गर्मी से बचने के उपाए करने पड़े ।  मतलब वह थोड़ा कम कुदरती होता गया ।

मनुष्य की मानसिक संरचना ऐसी है कि वह सोच-समझ सकता है, उसमें सुख-दुख की भावनाएं भी है, वह महसूस भी कर सकता है और अभिव्यक्त भी कर सकता है । अगर किसी जीव को मारकर खुश होता है तो दुखी भी हो सकता है । वह दूसरे के दुख के प्रति संवेदनशील भी हो सकता है, करुणा की दृष्टि भी उसे प्राप्त है । ये ऐसी शक्तियां हैं जिनकी सहायता से वह प्रकृति के साथ अपने रिश्ते को परिभाषित करता है या कर सकता है ।

वह अपने खाने भर के लिए कमाने तक सीमित नहीं रहा । वह संग्रह करने लगा । संग्रह किया तो उसे लालच आने लगा । लालच आया तो वह दूसरे का हिस्सा छीनने से नहीं हिचकिचाया । उसकी न्याय बुद्धि डावांडोल हो गई । इसी क्रम में वह आमोद-प्रमोद और विलास की सीढ़ियां चढ़ता है । यह पाने के लिए वह ‘पुरुषार्थ’ करता है । उसकी विवेक बुद्धि उसे ‘परमार्थ’ की सीख देती है लेकिन वह ‘पराक्रम’ की तरफ भी झुकने लगता है । पराक्रम का आनंद उठाने और दूसरों के सामने उसका प्रदर्शन करने के चक्कर में वह ‘विजयी’ होने की तरफ बढ़ता है । विजयी होने का अर्थ है कि जो वह सोच रहा है वही सत्य है । वह अपने चाहे हुए को येन केन प्रकारेण पा लेना चाहता है । जब इस वृत्ति पर कोई अंकुश नहीं हो तो यह ‘अपराध’ में बदल जाएगी । मतलब यह कि विजय भाव की निरंकुशता उसके भीतर ‘अहंकार’ भरती जाती है और वह ‘न्याय भावना’ को छोड़ता चलता है । जब मनुष्य किसी के प्रति ‘अन्याय’ कर रहा होता है तो उसे दूसरे शब्दों में ‘अपराध’ कहा जाता है । यह  वृत्ति ‘वीर भोग्या वसुंधरा’ जैसी परंपरा में बदलती है ।

हम अपनी सभ्यता के विकास में इसी वीर भोग्या वसुंधरा को फलीभूत होता देखते हैं । यानी मनुष्य इस ब्रह्मांड के केंद्र में है और वह पृथ्वी का किसी भी प्रकार और किसी भी सीमा तक भोग कर सकता है । संस्कृति में ज्ञान, न्याय, करुणा, और कोमलता आदि की विचारसरणीयां भी विकसित हुई हैं जिनकी वजह से विजय भाव को बार-बार प्रश्नांकित किया जाता है । लेकिन हम पाषाणकाल से कोरोना काल तक आते-आते अच्छी तरह देख लेते हैं कि हम प्रकृति का व्यभिचार की हद तक दोहन करने से चूके नहीं ।

हम यही नहीं भूले कि हम प्रकृति के एक मामूली अंश हैं, हम उसके साथ सह अस्तित्व तक बनाकर रखना भी भूल गए । हमने अपने रहन-सहन, खान-पान, सोच-विचार का ऐसा आडंबर रच डाला कि प्रकृति और प्राकृतिक तरीकों से दूर होते गए । हम प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट करने में जरा भी नहीं हिचके । पर्यावरण को दूषित करने के बाद घड़ियाली आंसू बहा कर पता नहीं हम किसे मूर्ख बनाते रहे । 


यूं तो यह सवाल हमेशा से उठते रहे हैं और ये सवाल खुद मनुष्य ही उठाता रहा है पर इधर कोरोना वायरस के उभरने पर जैसे प्रकृति ने एक चेतावनी दी है । प्रकृति पहले भी चेतावनी देती रही है । वह मनुष्य को उसकी ‘औकात’ दिखाती रही है । इस बार यह वायरस ऐसा फैला है जिसकी वजह से हमारे रहन-सहन के तरीकों पर बंधन लग गया है । तकरीबन सभी देशों के सभी तरह के कारोबार पिछले दो-तीन महीने से ठप पड़े हैं । हमने पिछली कई शताब्दियों से खुद को अर्थव्यवस्था, औद्योगिकीकरण, मशीनीकरण और प्रौद्योगिकीकरण के जटिल और महीन जाल में फंसा लिया है । यह सारा तंत्र इस समय ‘पॉज’ या ‘रुके होने’ या ‘फ्रीज’ के मोड में है ।

इस ठहराव में भय बहुत है । रोग के संक्रमण का भय, मृत्यु का भय, अर्थव्यवस्थाओं के चौपट होने का भय । दूसरी तरफ उम्मीद भी है । उम्मीद है कि जल्दी ही यह विषाणु मर जाएगा या इसकी दवा ढूंढ़ ली जाएगी या वैक्सीन बना ली जाएगी और जीवन यथावत चलने लगेगा । एक अन्य रोमांचकारी उम्मीद है, जो यूटोपिया जैसी ज्यादा है। यह उम्मीद बताती है कि इस ठहरे हुए समय में प्रकृति अपने वास्तविक रूप में लौट रही है । हवा साफ हो गई है, समुद्री पानी साफ हो रहा है, ध्वनि प्रदूषण घट रहा है, ओजोन परत फिर से बनने लगी है । जीव जंतु निर्भय होकर विचरण कर रहे हैं ।

अब सवाल उठता है कि भविष्य के गर्भ में क्या है ? लगता है यह कायनात तो बनी रहेगी । यक्ष प्रश्न है कि कौन सी उम्मीद फलीभूत होगी ? दवा बन जाएगी और दुनिया धीरे-धीरे विकास की उसी रफ्तार को पकड़ लेगी ? उसी विकास की जो सत्यानाशी किस्म का है । या स्वप्नजीवियों की उम्मीद को साकार करते हुए प्रकृति केंद्र में आ जाएगी और मनुष्य हाशिए में चला जाएगा ? मनुष्य हाशिए में जाएगा तो उसकी अब तक बनाई गई दुनिया भी हाशिए में चली जाएगी ?

लगता है कि दोनों उम्मीदें ‘अति’ की तरफ झुकी हुई हैं । कोरोना के बाद दुनिया पहले जैसी नहीं रहेगी । उसमें बहुत से परिवर्तन लाने ही पड़ेंगे । फिलहाल किए जा रहे उपायों को देखें तो मनुष्य की सामाजिकता पर गहरा असर पड़ेगा । जब तक वैक्सीन नहीं बनती उसे शारीरिक दूरी और स्वच्छता की घुट्टी पीनी पड़ेगी । सामूहिक गतिविधियों पर अंकुश लगा जाएगा । इससे काम धंधे भी प्रभावित होंगे । अर्थव्यवस्थाएं चरमराएंगी । आर्थिक गतिविधि चालू न हुई तो लोग भूखों मरेंगे । पुराने ढर्रे पर चल पड़ी तो रोग से लोग मरेंगे । इसलिए अब गतिविधि की गति धीमी होगी । दूरसंचार, इंटरनेट जैसे साधनों (यह भी तो कृत्रिम ही हैं) पर निर्भरता और बढ़ेगी ।