Thursday, July 8, 2021

टी एस एलियट की तीन कविताएं

 

टी एस एलियट 1888-1965 

टी एस एलियट की कविताओं की किताब पलटते हुए मेरी नज़र उनकी लंबी कविता हॉलो मेनपर पड़ी। शीर्षक ने ही पकड़ लिया। खोखले लोगबिंब की प्रतिध्वनि सघन थी। बिंब की छवियां घेरने लगीं। पिछले साल से कोरोना ने जिस तरह हमें बंधक बना रखा है, वह कम तकलीफदेह नहीं है। ऊपर से हमें चालित करने वाले तमाम खिलाड़ी हमें जिस तरह हतप्रभ और हतकर्म बना रहे हैं; क्या सत्ता पक्ष क्या विपक्ष; क्या प्रगतिकामी-प्रगतिगामी क्या प्रतिगामी; क्या न्यायपालिका क्या कार्यपालिका; क्या बाजार क्या विज्ञापन और उसका सहोदर मीडिया; हमारे गोचर-अगोचर तमाम हरकारों ने हमें मानो पंगु, विवेकशून्य और कर्महीन बना दिया है। पूरी तरह से न भी बनाया हो, तो भी उस तरफ धकेलने की प्रकिया जारी है। मानसिक रूप से तो निचोड़ ही लिया है। ऐसा लगता है हम ढांचा मात्र हैं, हमारी संवेदना, भावना, विवेक, बोध, कर्मठता, पुरुषार्थ, अंर्तदृष्टि, दूरदृष्टि को ग्रस लिया गया है। परफेक्ट खोखले लोग। यह कविता 1925 में लिखी गई थी। करीब सौ साल बाद भी यह हमारे समय को कुछ उसी तरह उघाड़ रही है जैसे उस समय विश्वयुद्ध के बाद की हताशा-निराशा-बीहड़पन को उघाड़ा था। आज हम अलग तरह के युद्धकाल में हैं।

शीर्षक पढ़ते ही इन झनझनाते ख्यालों ने मुझे कविता की तरफ धकेल दिया। एलियट को पढ़ना-समझना आसान नहीं। मैं तो उलझ ही गया। न जाने क्या सोच कर हिंदी में उल्था करने लगा। पहले अंश को मक्षिका स्थाने मक्षिका रख कर पूरा कर दिया, अर्थ की परवाह किए बिना। तो भी बिंबों ने बांधे रखा। वह अंश अपनी हमसफर सुमनिका और बेटी अरुंधती को सुनाया। अरुंधती अंग्रेजी साहित्य के पठन-पाठन से जुड़ी है। उसने कविता के जाले जरा साफ किए, कविता के संदर्भों को खोला। मेरी हिम्मत बढ़ गई।

कविता में कई संदर्भ हैं। उन्हें देने पर कविता शोधपरक निबंध के भार से दब जाती। इटैलिक्स में दी गई पंक्तियां पुरानी किताबों, बाइबल और नर्सरी राइम से हैं। मैं कविता के अनुवाद में इसलिए उलझ गया क्योंकि इसके बिंब और भय का माहौल आज के माहौल के बहुत करीब है। जबकि यह कविता पहले विश्व युद्ध के बाद की है, सन् 1925 में लिखी हुई। लगभग सौ साल बाद महामारी ने वक्त का चक्का इस तरह घुमा दिया है। दूसरी कविता एलियट ने आम्तीय उद्गार की तरह अपनी पत्नी के लिए लिखी है। निजी उद्गार होने के बावजूद यह कविता उनके काव्य संग्रह में अंतिम कविता के रूप में संग्रहीत है। भारतीय संदर्भ की एक कविता भी मुझे मिल गई। एलियट ने यह कविता एक भारतीय महिला (प्रथम भारतीय महिला ग्रेजुएट) कोरनीलिया सोराबजी के अनुरोध पर लिखी थी। ये तीनों कविताएं वेब-पत्रिका समालोचन पर प्रकाशित हुई हैं। 


एक

खोखले लोग

एक बागी को याद करते हुए

 

1

हम ऐसे लोग जो खोखले हैं

हम ऐसे लोग जिनकी खाल भर दी गई है

झुके हुए एक साथ

खोपड़े में भरा है भूसा, आह!

हमारी खुश्क आवाज़ें, जब

हम फुसफुसाते हैं एक साथ

होती हैं चुप्पा और अर्थहीन

जैसे सूखी घास में हवा

या टूटे कांच पर चूहे के पंजे

हमारे सूखे तहखाने में

 

आकार रूप के बिना, छाया रंग के बिना

शक्तिहीन बल, भंगिमा हरकत के बिना

 

जो पार कर गए हैं

आंखें गड़ा कर, मौत की दूसरी सल्तनत

हमें याद करना, अगर करना ही हो,

मत मान लेना बागी रूहें, पर सिर्फ

जैसे खोखले लोग

ऐसे लोग जिनकी खाल भर दी गई है

 

2

आंखें मैं मिलाने की जुर्रत नहीं करता सपने तक में

मौत की ख्वाबी सल्तनत में

वे प्रकट नहीं होतीं:

वहां, आंखें हैं

धूप, टूटे खंभे पर

वहां, झूलता रूख

और आवाज़ें हैं

हवा के गाने में

डूबते तारे से

ज्यादा दूर और ज्यादा शांत

 

मैं और करीब न रहूं

मौत की ख्वाबी सल्तनत में

मैं बना लूं

जानबूझ कर ऐसे भेस

चूहे का कोट, कव्वे की खाल, बिजूके का डंडा

खेत में

ऐसे हिलूं जैसे हवा हिलती है

पर और करीब नहीं-

 

वो आखिरी मुलाकात नहीं

अस्त होती सल्तनत में

 

3

यह है मरी हुई ज़मीन

यह है नागफनी की ज़मीन

यहां पत्थर के बुत्त

उभरते हैं, उन्हें मिलती हैं

मरे हुए मानुस की याचना

डूबते तारे की टिमटिमाहट तले

क्या यह ऐसा है

मौत की दूसरी सल्तनत में

जागना अकेले

उस घड़ी जब हम

कांप रहे हों करुणा से

ओंठ जो चूम लें

इबादत करें, टूटे पत्थर को

 

4

आंखें यहां नहीं हैं 

यहां कोई आंखें नहीं हैं

मरते तारों की इस घाटी में

हमारी खो चुकी सल्तनतों के टूटे जबड़े

की इस खोखली घाटी में

 

मिलने के इस आखिरी ठिकाने में

हम टटोलते हैं मिलजुल कर

बोलने से बचते हैं

जुटे हुए इस उफनती नदी के तट पर

 

नज़रविहीने, जब तक

दृष्टि फिर न मिल जाए

जैसे मौत की अस्त होती सल्तनत 

का सनातन सितारा

बहुपंखुड़ी गुलाब

इकलौती उम्मीद

रीते हुए लोगों की

 

5

घूमो घूमो चारों ओर नागफनी के

नागफनी के नागफनी के

घूमो घूमो चारों ओर नागफनी के

पांच बजे सुबह सवेरे

 

विचार

और यथार्थ के बीच

हरकत और

कृत्य के बीच

गिरती है छाया

                        परमात्मा तेरी ही है यह सल्तनत

 

संकल्पना और

सृजना के बीच

भाव और

प्रतिक्रिया के बीच

गिरती है छाया

                        ज़िंदगी बहुत लंबी है

 

काम और

रति के बीच

शक्ति और

होने के बीच

सार और

अवरोहण के बीच

गिरती है छाया

                        परमात्मा तेरी ही है यह सल्तनत

 

तेरी है

ज़िंदगी

तेरी है

 

इस तरह खत्म होती है दुनिया

इस तरह खत्म होती है दुनिया

इस तरह खत्म होती है दुनिया

धमाके से नहीं रिरियाहट से 

 










दो 

अपनी पत्नी को समर्पित

जिसकी वजह से है उछाह भरी खुशी

जो मेरी चेतना में डाल देती है जान, हमारी जागबेला में  

और चैन भरी लय, रात की हमारी आरामबेला में,

सांस लेना एक सुर में

 

प्रेमी, एक दूसरे की महक से महकती हैं जिनकी देहें

जिनको आते हैं एक से ख्याल, बोलना वहां ज़रूरी नहीं

और बोलते हैं एक से बोल, मानी वहां ज़रूरी नहीं

 

चुभती सर्द हवा, ठिठुराएगी नहीं

सिर पर चिड़चिड़ा सूरज, कुम्हलाएगा नहीं

गुलाबों की बगिया के गुलाब जो हमारे हैं, सिर्फ हमारे

 

पर यह समर्पण पढ़ेंगे दूसरे:

हैं ये अंतरंग बोल तुम्हारे लिए सरेआम।

 










तीन

दक्षिण अफ्रीका में मारे गए भारतीयों के लिए

(यह कविता भारत पर क्वीन मेरी की किताब (हराप एंड कं. लि. 1943) के लिए सुश्री सोराबजी के अनुरोध पर लिखी गई थी। एलियट ने यह कविता बोनामी डोबरी को समर्पित की है।)

 

आदमी का ठिकाना होता है उसका अपना गांव

उसका अपना चूल्हा और उसकी घरवाली की रसोई;

अपने दरवाज़े के सामने बैठना दिन ढले

अपने और पड़ोसी के पोते को

एक साथ धूल में खेलते निहारना।

 

चोटों के निशान हैं पर बच गया है, हैं उसे बहुत सी यादें

बात चलती है तो याद आती है

(गर्मी या सर्दी, जैसा हो मौसम)

परदेसियों की, जो परदेसों में लड़े,

एक दूसरे से परदेसी।

 

आदमी का ठिकाना उसका नसीब नहीं है

हरेक मुल्क घर है किसी इंसान का

और किसी दूसरे के लिए बेगाना। जहां इंसान मर जाता है बहादुरी से

नसीब का मारा, वो मिट्टी उसकी है

उसका गांव रखे याद।

 

यह तुम्हारी ज़मीन नहीं थी, न हमारी: पर एक गांव था मिडलैंड में,

और एक पंजाब में, हो सकता है एक ही हो कब्रस्तान।

जो घर लौटें वे तुम्हारी वही कहानी सुनाएं:

कर्म किया साझे मकसद से, कर्म

पूर्ण हुआ, फिर भी न तुम न हम

जानते हैं, मौत आने के पल तक,

क्या है फल कर्म का।      


Saturday, April 17, 2021

गहरे धूसर रंगों वाली फिल्म

 


मनोज वाजपेयी हमारे समय के एक सशक्त अभिनेता हैं। उन्हें हाल ही में भोंसले फिल्म के लिए सर्वज्ञेष्ठ अभिनेता चुना गया है। इस फिल्म में उनका अभिनय ही नहीं, पूरी फिल्म ही सोचने के लिए भरपूर सामग्री देती है।  


दो तीन सिटिंग में सोनी लिव पर भोंसले' फिल्म देखी। इंटरनेट पर ओटीटी का फायदा यह है कि आप अपनी सुविधा से फिल्म आदि देख सकते हैं। भोंसले बड़ी कठिन फिल्म है। मनोज वाजपेई की ही फिल्म है यानी मनोज कॉन्स्टेबल भोंसले की मुख्य भूमिका में हैं और शायद सह निर्माता भी हैं।

कॉन्स्टेबल भोंसले के सेवानिवृत्त होने की शाम से फिल्म शुरू होती है, गणपति उत्सव तक चलती है। मराठी मानुस की राजनीति से बजबजाती हुई फिल्म। हिंदी बनाम मराठी समाज की शरारती राजनीति पर भोंसले फिल्म मारक नैतिक प्रहार करती है।

भोंसले बहुत ही चुप्पा, अकेला, एकांतवासी, अपने में खोया हुआ, अपनी नौकरी की एक्सटेंशन चाहने वाला गंभीर व्यक्ति है।

भोंसले की चॉल (जो हमारे समाज की तरह जर्जर, जाले लगी और चौहद्दी में बंद है) में रहने वाली हिंदी भाषी पड़ोसन लड़की बीमारी में उसकी मदद करती है। अपने घर से हजारों मील दूर अपने पैरों पर नर्स बनकर खड़ी यह लड़की उसी चॉल के एक वाचाल और महत्वाकांक्षी युवक, जो मराठी मानुस के नाम पर राजनीति करने की चालें चलता रहता है, की शिकार हो जाती है। भोंसले इस लड़की के साथ हुए जुर्म का बदला लेने के लिए अपराधी को पीट-पीटकर मार देता है, खुद भी हृदयाघात से मर जाता है। फिल्म की ये घटनाएं विचलित करती हैं। फिल्म चॉल के इर्द-गिर्द ही घटित होती है।

तकरीबन सभी दृश्य रात के हैं या अंधेरे के हैं या रात में रोशनियों के बीच हैं। अगर कहीं दिन या सुबह है भी तो वह भी धूसर और उदास है। भोंसले की खोली बेहद अंधेरी, जर्जर और उदास है। सारी चॉल ही खस्ताहाल है। सुबह का एक दृश्य अंत में आता है जब क्रोध से भरा भोंसले सार्वजनिक बाथरूम में अपराधी युवक को ढूंढ़ने निकलता है।

फिल्म बड़े गहरे धूसर रंगों में फैली है। कैमरा बहुत ही रूखे यथार्थ को पकड़ता है - दरवाजे, सीढ़ियां, खिड़की, कौवा, कुत्ता... कुत्ते का मुड़ा हुआ पैर... भोसले का किचन...

संगीत और ध्वनियां भी आद्यंत खलबली मचाए रहती हैं, कर्कश होने की हद तक।

अजीब विडंबना है कि मनुष्यता और नैतिकता और सच्चाई का पक्षधर भोंसले बीमार है, रिटायर हो चुका है, चौथी अवस्था के ब्रेन ट्यूमर से ग्रस्त है, ज्यादा जीवन उसके पास नहीं है। उसके बरक्स राजनीति को अपना पेशा बनाने को उतावला हुआ पड़ा उसी चॉल का एक निवासी टैक्सी चालक है जिसे सच-झूठ, सही-गलत से कोई मतलब नहीं। ऐसे महत्वाकांक्षी नौजवान से बूढ़ा और बीमार कॉन्स्टेबल लोहा लेता है। नर्स लड़की में मानवीयता, सरलता और मदद की रोशनी है पर वह सुरक्षित नहीं है। कठोर और कुत्सित यथार्थ के बीच जीवन की कांपती सी लौ यहां दिखती है। एक हारी हुई सी परिस्थिति हमारे सामने है कि समाज में फूट डालने का पेशा अपनाने को लालायित व्यक्ति राजनीतिज्ञों के निकट, ताकतवर, नौजवान और बड़बोला है। दूसरी तरफ न्याय, समानता, मनुष्यता, कोमल भावनाओं का पक्ष लेने वाले वृद्ध, नादान, कमजोर, चुप्पे, भयभीत और बीमार लोग हैं।

फिल्म के अंतिम दृश्यों में जब भोंसले बदला ले चुका है और मर चुका है, गणपति विसर्जन के बाद के दृश्य इस सारे आख्यान को अखिल भुवन में गुंजायमान कर देते हैं। देवी देवताओं की खंडित प्रतिमाएं रेत में धंसी पड़ी हैं। एक देवता की मूर्ति पानी में ऊबचूब हो रही है। चटख रंग वाली टूटी हुई मुखाकृति की केवल पलक हवा के झोंके से हिल रही है। सारे विध्वंस के बीच मानव जीवन का हल्का सा स्फुरण वहां हो रहा है।

उस तुमुल कोलाहल में भी भोंसले के सांस की आवाज गूंजती रहती है। भोंसले के भीतर पता नहीं कितना क्रोध और असंतोष जमा हुआ है कि उसका जबड़ा हमेशा भिंचा रहता है। उसके मुंह से कभी कभी ही कोई बोल फूटता है। वह प्रायः उदासीन और निरपेक्ष बना रहता है लेकिन तन मन से घायल नर्स को ढांढ़स बंधाते समय भोंसले के भीतर की सारी ममता करुणा बह निकलती है।


Saturday, February 6, 2021

साहित्य कला में ‘कल’ की कलाकारियां

 

 

साहित्य कला में  कल की कलाकारियां

यंत्र का सभ्यता से बहुत पुराना संबंध है। हर युग में नए-नए यंत्र ईजाद हुए हैं। हमारा जीवन उनसे प्रभावित होता रहा है। यंत्र या मशीनें जीवन को आरामदेह बनाने के लिए बनती हैं। जब तक प्रकृति, मशीन और मनुष्य का आपस में संतुलन बना रहा, तब तक कोई समस्या नहीं आई। लेकिन जैसे जैसे या जिस जिस क्षेत्र में  मशीनें मनुष्य पर हावी हुईं, हमारे जीवन पर उनका गंभीर असर पड़ा। मशीनों की उपस्थिति से जीवन की चाल-ढाल, समाज के तौर-तरीके बदलते रहे हैं। यंत्रों या मशीनों की दखलअंदाजी जब ज्यादा बढ़ने लगी, तभी यह मुहावरा बना होगा कि जीवन यंत्रवत हो गया।

यह विषय इतना व्यापक और पेचीदा है कि इसके किसी एक पहलू पर बात करना ही ठीक रहेगा, वरना हम उलझ जाएंगे। सूचना क्रांति के साथ आए कंप्यूटरीकरण और  इंटरनेट ने साहित्य में कैसे दखलअंदाजी की है, हम इसी को समझने की कोशिश करेंगे। इसके लिए पिछले वक्तों पर जरा सी नजर डाल ली जाए।

यूं तो छापेखाने ने साहित्य-लेखन और साहित्य-पाठक संबंध को बदल दिया था। छापेखाने के आने के बाद उपन्यास जैसी साहित्य की नई विधा आई। पुस्तक की प्रतियां बनाना आसान हो गया। उसके साथ बाजार जुड़ गया और पुस्तक बिकने लगी। जहां बाजार प्रवेश कर जाता है, अपना रंग दिखाने लगता है क्योंकि उसके पीछे मुनाफे का जादू काम कर रहा होता है। लोकप्रिय साहित्य शायद इसी तरह परवान चढ़ा होगा। आज जब हम छापेखाने के प्रभाव को इस तरह देखते हैं तो यह बहुत ही साधारण बात लगती है। कागज, मुद्रण, पुस्तक, पुस्तकालय हमारे सांस्कृतिक जीवन में इतने घुलमिल गए हैं कि ये हमें अपने जीवन में अनादि काल से चले आ रहे सुंदर तोहफे प्रतीत होते हैं। पुस्तक ही क्यों, ललित कलाओं में यंत्र और मशीनों ने गजब का प्रभाव डाला है। इन्होंने हमारे लिए नया  सौंदर्यशास्त्र रच डाला है। जैसे मूर्तियों का बनाना और उनकी प्रतिकृतियां तैयार करना। चित्रकला में रंगों, कूचियों, और कैनवस का प्रयोग। संगीत के वाद्ययंत्र। इनकी तो दुनिया ही अलग है। ये कलाकार के व्यक्तित्व और उसकी मौलिक सृजनशीलता से इस कदर एकमेक हुए रहते हैं कि हमें ये यंत्र प्रतीत ही नहीं होते। जैसे सरोद, सितार,  हारमोनियम, पियानो, सैक्सोफोन अपने आप में यंत्र हैं। विश्व मोहन भट्ट की विचित्र वीणा तो गजब का आधुनिक वाद्ययंत्र है। लेकिन कलाकार जैसे ही सुर छेड़ता है, वाद्ययंत्र की सत्ता संगीत लहरियों में पिघलने लग जाती है। इसके अलावा आज हम साउंड सिस्टम के बिना संगीत सभाओं की कल्पना ही नहीं कर पाते। यही संगीत जब एल पी रिकॉर्ड, कैसेट, सीडी और पेन ड्राइव के जरिए पुनरुत्पादितहोता है, तो मशीनीकरण की भूमिका बदल जाती है। संगीतकार के साथ उसका वाद्ययंत्र संगीतकार के सुर में ढल जाता है। उस संगीत को जनता तक पहुंचाने के लिए रिकॉर्डिंग आदि के यंत्र तिजारत का हिस्सा बन जाते हैं। यहां मशीन में बाजार प्रवेश कर जाता है।

इसी तरह रेडियो की तकनीक आई तो रेडियो नाटक, फीचर जैसी नई विधाएं अस्तित्व में आईं। और हमें अंधा युग जैसा कालजयी नाटक मिला। प्राय: नाटकों के मंचन में भी प्रकाश, संगीत, दृश्यविधान की बड़ी भूमिका होती है। यानी आधुनिक नाटक मशीनों से अच्छा खासा घिरा हुआ है। नाटककार और निर्देशक ही नहीं, अभिनेता भी इन अदृश्य मशीनों से अपनी नाट्य कला में नए नए प्रयोग करते हैं। हालांकि ये बीते जमाने की बातें हो गई हैं। हम इस तरह से मशीनों के प्रयोग को आत्मसात कर चुके हैं। यह भी सच्चाई है कि इस तरह के यंत्रों के आगमन से कलाओं में मौलिकता के नए नए आयाम तो जुड़े ही हैं, रसास्वादन के फलक भी विस्तृत हुए हैं। रिकॉर्डिंग की सुविधा ने कलाओं का अभिलेखीकरण कर दिया है। वे तात्कालिकता की भंगुरता से निजात पा गईं। दिक् और काल में भी उनका फैलाव हो गया।

पिछली सदी के अंत में एल्विन टॉफलर ने बदलते हुए जीवन पर अपनी तीन पुस्तकों से अंगुली रखी थी। उनमें से एक थी फ्यूचर शॉक। आद्योगिकीकरण से जीवन पर होने वाला असर इस गति से हो रहा था कि मनुष्य समाज उसके हिसाब से खुद को ढाल ले रहा था। धीरे धीरे मशीनी परिवर्तन की गति बढ़ने लगी। यह गति ऐसी हो गई कि आदमी झटके खाने लगा। जाहिरा तौर पर दिखता न हो, पर ये झटके मनुष्य को गुम चोट देने लगे। इलेक्ट्रिक से इलेक्ट्रॉनिक, और टेक्नीकल से टेक्नोलॉजिकल में परिवर्तन बहुतायत में ही नहीं होने लगा, तेजी से भी होने लगा। रेल, हवाई जहाज के जाल ने भूगोल को सिकोड़ा था, लेकिन कंप्यूटर और इंटरनेट के आगमन ने जीवन में आमूलचूल परिवर्तन कर दिया। हवाई जहाज से भौगोलिक दूरी कम समय में तय होती है, शरीर की घड़ी लड़खड़ाने लगती है। और हम जेटलैगमें चले जाते हैं। इंटरनेट और कंप्यूटर की जोड़ी ने पहले तो वास्तविक की जगह आभासी (एक्चुअल की जगह वर्चुअल) संसार खड़ा किया। दूसरे यह जेटलैग की जगह रीयल टाइममें काम करने लगी। हमारा अधिकांश जीवन, हमारी दैनिक चर्याएं, हमारा कारोबार, पढ़ाई-लिखाई, मनोरंजन इसकी जद में आ गया। फायदे कई गुणा दिखने लगे। यह जोड़ी हमारे ज्यादा से ज्यादा स्पेस को घेरने लगी। यह काम तफरीह की तरह या मौज-मस्ती के लिए नहीं होता है। इसके लिए बिजनेस मॉडल ढाल लिए गए। इसमें अंतर्राष्ट्रीय पूंजी लग गई। यह सर्वसमावेशी मॉडल बन गया। यह वाला यंत्रीकरण जीवन की रही सही आजादी को लीलने को तैयार बैठा है। अगर आप लील लिए जाने से बच भी गए तो गुलाम तो बनना ही होगा। कोरोना के बाद प्रौद्योगिकी की जरूरत कई गुना बढ़ गई है। जो गरीबी, अशिक्षा या जिद के कारण इसके आगे नतमस्तक नहीं होगा, उसका अस्तित्व खतरे में है।

ऐसे परिदृश्य में साहित्य की तरफ नजर डालना दिलचस्प होगा। हम जानते ही हैं कि कलऔर कलाआपस में घुलती मिलती रही है। छपाई, रंगीन छपाई और सिनेमा जैसे माध्यमों में मशीनों का योगदान अधिक रहा है। गीता प्रेस गोरखपुर की पुस्तकों और उनकी पत्रिका कल्याण के माध्यम से हमारे देवी देवताओं की खास तरह की छवियां हमारे जन मानस में बैठीं। लघु चित्रकला पहले से विद्यमान थी, पर उस शैली की छवियां उतनी लोकप्रिय नहीं हुईं। महादेवी वर्मा के गीतों की पुस्तक में उनकी बनाई चित्रकृतियां आमने सामने रहकर पाठक को नया चाक्षुष अनुभव देती हैं। हरिशंकर परसाई की एक रचना है – प्रेमचंद के जूते। यह प्रेमचंद की उस फोटो को देखकर लिखी गई है, जिसमें प्रेमचंद के फटे हुए जूते दिखाई देते हैं। एक्फ्रेसिसयानी एक कलाकृति से प्रभावित हो कर की गई शब्द रचना के और भी उदाहरण मिलते हैं। विष्णु खरे की एक मार्मिक कविता है जो एक बीमार स्त्री को ले जाते हुए एक पुरुष के छायाचित्र पर आधारित है। फोटोग्राफी एक महीन और पेचीदा मशीनी कला है। लिखित साहित्य उसके साथ कैसे हमकदम होता है, ये इसी बात के उदाहरण हैं। देवी प्रसाद मिश्र की एक लंबी कविता पहल पत्रिका में छपी थी। यह कविता पन्ने पर कविता की तरह तो है ही, उसके बाएं हाशिए पर भी कवि ने कुछ लिखा है। उसे उसी तरह छापा गया है। कविता के साथ हाशिए पर नोट लेने की तरह की इबारत से कविता का चाक्षुष प्रभाव बदल जाता है। पाठक कविता पहले पढ़ेगा या हाशिए की इबारत? एक दो बार इधर उधर आवाजाही तो जरूर करेगा। कविता में अपनी बात पर जोर देने का यह तरीका छापेखाने की प्रूफरीडिंग की याद दिला देता है जिसमें गलतियां,  सुधार आदि हाशिए पर लिखे जाते हैं। बल्कि यह तरकीब इससे ज्यादा किसी पुस्तक को पढ़ते समय हाशिए पर की गई टिप्पणी के ज्यादा करीब लगती है। विश्व की दूसरी भाषाओं में ग्राफिक साहित्य (यानी रेखांकन और वाचिक भाषा का मिला जुला रूप) खूब लिखा जा रहा है। हिंदी में अभी लेखकों का ध्यान उस तरफ कम ही गया है। अपवाद स्वरूप सदानीरा पत्रिका में कुछ प्रयोग देखने को मिले हैं। हालांकि आज के दौर के तकनीकी साधनों के जलवे के सामने ये उदाहरण बहुत ही मासूम से हैं।

यह सच्चाई है कि लेखकों ने कंप्यूटर का काम ज्यादातर स्मृति वाले टाइपराइटर की तरह ही किया है। अधिकांश पहले कागज पर लिखते हैं, बाद में कंप्यूटर में टाइप करते हैं। कुछ लेखक अब सीधे कंप्यूटर पर टाइप करने लगे हैं। कुछ तकनीक प्रेमी बोल कर टाइप कर लेते हैं। इस तरह बोल कर लिखी जा रही रचनाओं का अध्ययन होना चाहिए। अज्ञेय के उपन्यास अपने अपने अजनबीके अलग तरह के डिक्शन के मद्देनजर लोगों ने यह पता लगाया था कि वह बोल कर लिखवाया गया था।

लगभग एक दशक पहले जब इंटरनेट पर हिंदी में ब्लॉगिंग शुरु हुई थी तो बहुत से नए लेखक दृश्यपटल पर आए। शुरुआत में इनमें आइटी के इंजीनियर आदि ज्यादा थे। कुछ विदेश पहुंच गए तो वतन और भाषा की याद में लिखने लगे। वह एक नई और ताजा सी विधा थी। ब्लॉगिंग में बाद में इतने नौसिखिए लोग आ गए कि सब धान बाइस पंसेरी हो गए। यहां संपादक नाम की छलनी नहीं थी। आगे नाथ न पीछे पगहा जैसी हालत हो गई। जिसके जो मन में आया लिखने लगा। ट्विटर, वट्सऐप और फेसबुक के आने पर ब्लॉगिंग पीछे चली गई। ये माध्यम ऐसे हैं कि यहां हर वक्त नया और ताजा सामान चाहिए। छोटा और चटपटा। देखा, पढ़ा और आगे निकल गए। इन मंचों से एक नई विधा निकली –लप्रेकयानी लघु प्रेम कहानी। लप्रेक के कई संकलन पुस्तकाकार भी निकले। पर लप्रेक, दशकों से लिखी जा रही लघु कहानी से कितनी अलग थी, शोध का विषय है।    

ब्लॉगिंग की तुलना में फेसबुक और वट्सऐप के लेखन में तो और भी खुला खेल फर्रुखाबादी हो गया। यहां बच्चन, प्रेमचंद, महादेवी के नाम से रचनाएं फारवर्ड होती रहती हैं। यहां फारवर्ड होने वाली रचनाओं की प्रामाणिकता संदिग्ध होती है।

ये कथित तौर पर खुले, लोकतांत्रिक और स्वतंत्र मंच हैं। ये ऐसे लगते हैं, असल में हैं नहीं। आर्टीफीशियल इंटैलिजेंसनामक की अति महीन कलभीतर ही भीतर इन माध्यमों को नियंत्रित, संचालित और निर्देशित करती रहती है। इनके पीछे मिथकीय से प्रतीत होते विशाल बिजनेस मॉडल हैं। फेसबुक की कुल संपत्ति  146.437 बिलियन डॉलर है। ये व्यक्ति के जीवन, उसके मन, उसके अतींद्रिय स्पेस में कितनी घुसपैठ कर रहे हैं, यह अलग ही मुद्दा है। और उसकी थाह पाना कठिन भी है।

इन माध्यमों ने दिक् काल की सीमाएं तोड़ी हैं। आप विश्व में कहीं भी हों, सब कुछ तत्काल घटित हो रहा होता है। भला-बुरा सब कुछ, वहीं का वहीं। एक तरफ, व्यक्ति की वास्तविकता का प्रामाणिक सिद्ध किया जाना जरूरी होता है, जिसकी वजह से उसकी निजता पर खतरा मंडराता रहता है। दूसरी तरफ, बेनाम, गुमनाम, छद्मनाम, चोर उचक्कों की भी भरमार है। तथ्य और सत्य की ऐसी-तैसी होती रहती है। केवल उत्तर सत्य बचता है जिसका सिर पैर किसी को पता नहीं।

ऐसे भ्रामक और भ्रमशील मंचों पर क्लासिक साहित्य, समकालीन साहित्य और आभासी दौर का नया साहित्य एक साथ चला रहता है। किसी के लिखे को कौन अपने नाम कर लेता है, कौन किसकी मिट्टी पलीद कर जाता है, कौन खुद को महान साबित कर या करवा लेता है, कुछ पता नहीं चलता। कई बार यहां पर साहित्य का होना ही संदिग्ध प्रतीत होने लगता है।

इस दौर में साहित्य लिखित शब्द तक सीमित नहीं है। पिछले एक दशक से यूट्यूब ने वीडियो क्रांति ला दी है। आम दर्शक श्रोता के लिए यह मुफ्त है। पर इसका भी बाकायदा बिजनेस मॉडल है। इसकी सालाना कमाई 16 से 25 बिलियन डॉलर तक है, मतलब 1600 से 2500 करोड़ डॉलर तक। इसके मालिक यहां वीडियो रखने वाले के साथ अपना लाभ बांटते हैं। यूट्यूब पर नई पुरानी फिल्में, फिल्मी गैर फिल्मी गीत, हर तरह का संगीत, नाटक तो मिल ही जाते हैं, साहित्य भी पर्याप्त मात्रा में है। साहित्य और साहित्य के प्रचारक, विचारक और टीकाकार यहां मिल जाएंगे। यहां भी गुणवत्ता का कोई बेली-वारिस नहीं है। यह एक नई तरह का फोक-स्पेस है यानी लोक-चरागाह। सामने से नि:शुल्क दिखता है, पर आप कारोबार का गुर सीख जाएं तो यह पैसा भी देता है। यहां शब्द, ध्वनि, संगीत, दृश्य, वीडियो की मंडी लगी रहती है, वह भी चारों याम। आपके पास हर तीसरे साल स्मार्ट से स्मार्टतर होते फोन को बदलने और नित्यप्रति डाटा फूंकने के पैसे होने चाहिए।

कोरोना महामारी ने इस परिदृश्य के जल रहे हवन में घी उढ़ेलने का काम किया है। लोगों का घर से बाहर निकलना बंद हो गया। स्मार्ट फोनों के जरिए सारी दुनिया नए जोश के साथ आपकी मुट्ठी में आ गई। पिछले कुछ महीनों में फेसबुक लाइव की जो बाढ़ आई, वह किसी से छिपी नहीं है। अभी तक तो पुराने लिखे को ही नए माध्यम में पेला जा रहा है, लेकिन धीरे धीरे ये माध्यम भी साहित्य पर अपना रंग चढ़ा रहे हैं। लिखित और उच्चरित शब्द तथा वीडियो कैमरे का शगल साहित्य के नए रूपों को गढ़ रहा है। इस दौर में काफी समय तक उच्चरित शब्द या ऑडियो रिकॉर्डिंग को जगह नहीं मिल रही थी। सोशल मीडिया में कैमरा और वीडियो कैमरा व्यापकता से फैला। जैसे ईबुक्स और किंडल का बाजार बना, वैसा ही ऑडियो पुस्तकों का भी बाजार अब बन रहा है। बहुत से पॉडकास्ट चलने लग गए हैं। रेडियो प्रेमी लोगों के लिए यह सहज विकल्प है। हिंदी में अभी इस तरफ लोगों का ध्यान ज्यादा नहीं गया है। लेकिन नवभारत टाइम्स अखबार ने नवभारत गोल्ड नाम से गद्य के नए प्रयोग किए हैं। वहां हर पोस्ट ऑडियो रूप में भी उपलब्ध है।    

हरेक माध्यम उसके प्रयोक्ता को भी प्रभावित करता है। ये नए माध्यम हमारे लेखक, कलाकार, संस्कृतिकर्मी, चिंतक और विचारक  को कैसे प्रभावित कर रहे हैं और कितना प्रभावित कर रहे हैं और कितना करेंगे, धीरे धीरे पता चलेगा। ये माध्यम जटिल हैं, तकनीक आधारित हैं, बहुपरतीय हैं, बहुरूपिए हैं, अंतर्राष्ट्रीय पूंजी के नवल औजार हैं, बल्कि हथियार कहना चाहिए। इनके सामने खूसट-खुर्राट राज सत्ताएं भी रपट जा रही हैं। कौन किसकी जासूसी कर रहा है, कौन किसे बेच खा रहा है, कोई पता नहीं। सत्य और तथ्य दिखता है, हाथ नहीं आता। साहित्यकार को ऐसी आभासी चरागाह जैसी मंडी में रहते हुए साहित्य रचना है। मुझे लगता है यहां भी कंपनियों के व्यवसाय का स्वॉट (SWOT) फार्मूला लग जाएगा यानी हमें माध्यम की स्ट्रेंथ (शक्ति), वीकनेस (कमजोरी), ऑपर्च्युनिटी (अवसर) और थ्रेट (खतरे) की पहचान करनी होगी और अपनी बात अपने दर्शक श्रोता और पाठक तक पहुंचानी होगी। केवल पाठक नहीं, वह एक साथ दर्शक श्रोता और पाठक तीनों हो सकता है। जैसे फिल्म में दृश्य चलता है, वह दिखाई और सुनाई देता है, अगर फिल्म अन्य भाषा की हो तो भावक सब टाइटल को भी पढ़ता चलता है। अगर दर्शक को अपरिचित भाषा की फिल्म देखने के लिए कई परतों में मेहनत करनी पड़ती है जैसे देखना, सुनना, पढ़ना, तारतम्य बिठाना, और रसास्वाद लेना, तो यह सोचिए कि रचनाकार को भी इस बहुविध माध्यम में अपनी बात कहने के लिए वैसे ही तैयारी करनी होगी जैसे फिल्म बनाने के लिए की जाती है। एकांत में साहित्य रचा जाता रहेगा, पर साहित्यकार को ध्वनि, संगीत और विजुअल के लिए और लोगों की सहायता भी लेनी पड़ेगी। यह एक तरह का सामूहिक रचना कर्म हो जाएगा। हमारी भाषाओं में भी ये प्रयोग होने लगेंगे, इसमें कोई शक नहीं है। मल्टी मीडिया रचनाओं के लिए पूरा आसमान खुला है। (ऊपर दी गई चित्रकृति : संजय कुमार श्रीवास्तव) 


भारतीय विद्या भवन की मासिक प्रत्रिका नवनीत के जनवरी 2021 विशेषांक 'मशीन होती मनुष्यता' में प्रकाशित