Saturday, April 17, 2021

 


मनोज वाजपेयी हमारे समय के एक सशक्त अभिनेता हैं। उन्हें हाल ही में भोंसले फिल्म के लिए सर्वज्ञेष्ठ अभिनेता चुना गया है। इस फिल्म में उनका अभिनय ही नहीं, पूरी फिल्म ही सोचने के लिए भरपूर सामग्री देती है।  


दो तीन सिटिंग में सोनी लिव पर भोंसले' फिल्म देखी। इंटरनेट पर ओटीटी का फायदा यह है कि आप अपनी सुविधा से फिल्म आदि देख सकते हैं। भोंसले बड़ी कठिन फिल्म है। मनोज वाजपेई की ही फिल्म है यानी मनोज कॉन्स्टेबल भोंसले की मुख्य भूमिका में हैं और शायद सह निर्माता भी हैं।

कॉन्स्टेबल भोंसले के सेवानिवृत्त होने की शाम से फिल्म शुरू होती है, गणपति उत्सव तक चलती है। मराठी मानुस की राजनीति से बजबजाती हुई फिल्म। हिंदी बनाम मराठी समाज की शरारती राजनीति पर भोंसले फिल्म मारक नैतिक प्रहार करती है।

भोंसले बहुत ही चुप्पा, अकेला, एकांतवासी, अपने में खोया हुआ, अपनी नौकरी की एक्सटेंशन चाहने वाला गंभीर व्यक्ति है।

भोंसले की चॉल (जो हमारे समाज की तरह जर्जर, जाले लगी और चौहद्दी में बंद है) में रहने वाली हिंदी भाषी पड़ोसन लड़की बीमारी में उसकी मदद करती है। अपने घर से हजारों मील दूर अपने पैरों पर नर्स बनकर खड़ी यह लड़की उसी चॉल के एक वाचाल और महत्वाकांक्षी युवक, जो मराठी मानुस के नाम पर राजनीति करने की चालें चलता रहता है, की शिकार हो जाती है। भोंसले इस लड़की के साथ हुए जुर्म का बदला लेने के लिए अपराधी को पीट-पीटकर मार देता है, खुद भी हृदयाघात से मर जाता है। फिल्म की ये घटनाएं विचलित करती हैं। फिल्म चॉल के इर्द-गिर्द ही घटित होती है।

तकरीबन सभी दृश्य रात के हैं या अंधेरे के हैं या रात में रोशनियों के बीच हैं। अगर कहीं दिन या सुबह है भी तो वह भी धूसर और उदास है। भोंसले की खोली बेहद अंधेरी, जर्जर और उदास है। सारी चॉल ही खस्ताहाल है। सुबह का एक दृश्य अंत में आता है जब क्रोध से भरा भोंसले सार्वजनिक बाथरूम में अपराधी युवक को ढूंढ़ने निकलता है।

फिल्म बड़े गहरे धूसर रंगों में फैली है। कैमरा बहुत ही रूखे यथार्थ को पकड़ता है - दरवाजे, सीढ़ियां, खिड़की, कौवा, कुत्ता... कुत्ते का मुड़ा हुआ पैर... भोसले का किचन...

संगीत और ध्वनियां भी आद्यंत खलबली मचाए रहती हैं, कर्कश होने की हद तक।

अजीब विडंबना है कि मनुष्यता और नैतिकता और सच्चाई का पक्षधर भोंसले बीमार है, रिटायर हो चुका है, चौथी अवस्था के ब्रेन ट्यूमर से ग्रस्त है, ज्यादा जीवन उसके पास नहीं है। उसके बरक्स राजनीति को अपना पेशा बनाने को उतावला हुआ पड़ा उसी चॉल का एक निवासी टैक्सी चालक है जिसे सच-झूठ, सही-गलत से कोई मतलब नहीं। ऐसे महत्वाकांक्षी नौजवान से बूढ़ा और बीमार कॉन्स्टेबल लोहा लेता है। नर्स लड़की में मानवीयता, सरलता और मदद की रोशनी है पर वह सुरक्षित नहीं है। कठोर और कुत्सित यथार्थ के बीच जीवन की कांपती सी लौ यहां दिखती है। एक हारी हुई सी परिस्थिति हमारे सामने है कि समाज में फूट डालने का पेशा अपनाने को लालायित व्यक्ति राजनीतिज्ञों के निकट, ताकतवर, नौजवान और बड़बोला है। दूसरी तरफ न्याय, समानता, मनुष्यता, कोमल भावनाओं का पक्ष लेने वाले वृद्ध, नादान, कमजोर, चुप्पे, भयभीत और बीमार लोग हैं।

फिल्म के अंतिम दृश्यों में जब भोंसले बदला ले चुका है और मर चुका है, गणपति विसर्जन के बाद के दृश्य इस सारे आख्यान को अखिल भुवन में गुंजायमान कर देते हैं। देवी देवताओं की खंडित प्रतिमाएं रेत में धंसी पड़ी हैं। एक देवता की मूर्ति पानी में ऊबचूब हो रही है। चटख रंग वाली टूटी हुई मुखाकृति की केवल पलक हवा के झोंके से हिल रही है। सारे विध्वंस के बीच मानव जीवन का हल्का सा स्फुरण वहां हो रहा है।

उस तुमुल कोलाहल में भी भोंसले के सांस की आवाज गूंजती रहती है। भोंसले के भीतर पता नहीं कितना क्रोध और असंतोष जमा हुआ है कि उसका जबड़ा हमेशा भिंचा रहता है। उसके मुंह से कभी कभी ही कोई बोल फूटता है। वह प्रायः उदासीन और निरपेक्ष बना रहता है लेकिन तन मन से घायल नर्स को ढांढ़स बंधाते समय भोंसले के भीतर की सारी ममता करुणा बह निकलती है।


Saturday, February 6, 2021

साहित्य कला में ‘कल’ की कलाकारियां

 

 

साहित्य कला में  कल की कलाकारियां

यंत्र का सभ्यता से बहुत पुराना संबंध है। हर युग में नए-नए यंत्र ईजाद हुए हैं। हमारा जीवन उनसे प्रभावित होता रहा है। यंत्र या मशीनें जीवन को आरामदेह बनाने के लिए बनती हैं। जब तक प्रकृति, मशीन और मनुष्य का आपस में संतुलन बना रहा, तब तक कोई समस्या नहीं आई। लेकिन जैसे जैसे या जिस जिस क्षेत्र में  मशीनें मनुष्य पर हावी हुईं, हमारे जीवन पर उनका गंभीर असर पड़ा। मशीनों की उपस्थिति से जीवन की चाल-ढाल, समाज के तौर-तरीके बदलते रहे हैं। यंत्रों या मशीनों की दखलअंदाजी जब ज्यादा बढ़ने लगी, तभी यह मुहावरा बना होगा कि जीवन यंत्रवत हो गया।

यह विषय इतना व्यापक और पेचीदा है कि इसके किसी एक पहलू पर बात करना ही ठीक रहेगा, वरना हम उलझ जाएंगे। सूचना क्रांति के साथ आए कंप्यूटरीकरण और  इंटरनेट ने साहित्य में कैसे दखलअंदाजी की है, हम इसी को समझने की कोशिश करेंगे। इसके लिए पिछले वक्तों पर जरा सी नजर डाल ली जाए।

यूं तो छापेखाने ने साहित्य-लेखन और साहित्य-पाठक संबंध को बदल दिया था। छापेखाने के आने के बाद उपन्यास जैसी साहित्य की नई विधा आई। पुस्तक की प्रतियां बनाना आसान हो गया। उसके साथ बाजार जुड़ गया और पुस्तक बिकने लगी। जहां बाजार प्रवेश कर जाता है, अपना रंग दिखाने लगता है क्योंकि उसके पीछे मुनाफे का जादू काम कर रहा होता है। लोकप्रिय साहित्य शायद इसी तरह परवान चढ़ा होगा। आज जब हम छापेखाने के प्रभाव को इस तरह देखते हैं तो यह बहुत ही साधारण बात लगती है। कागज, मुद्रण, पुस्तक, पुस्तकालय हमारे सांस्कृतिक जीवन में इतने घुलमिल गए हैं कि ये हमें अपने जीवन में अनादि काल से चले आ रहे सुंदर तोहफे प्रतीत होते हैं। पुस्तक ही क्यों, ललित कलाओं में यंत्र और मशीनों ने गजब का प्रभाव डाला है। इन्होंने हमारे लिए नया  सौंदर्यशास्त्र रच डाला है। जैसे मूर्तियों का बनाना और उनकी प्रतिकृतियां तैयार करना। चित्रकला में रंगों, कूचियों, और कैनवस का प्रयोग। संगीत के वाद्ययंत्र। इनकी तो दुनिया ही अलग है। ये कलाकार के व्यक्तित्व और उसकी मौलिक सृजनशीलता से इस कदर एकमेक हुए रहते हैं कि हमें ये यंत्र प्रतीत ही नहीं होते। जैसे सरोद, सितार,  हारमोनियम, पियानो, सैक्सोफोन अपने आप में यंत्र हैं। विश्व मोहन भट्ट की विचित्र वीणा तो गजब का आधुनिक वाद्ययंत्र है। लेकिन कलाकार जैसे ही सुर छेड़ता है, वाद्ययंत्र की सत्ता संगीत लहरियों में पिघलने लग जाती है। इसके अलावा आज हम साउंड सिस्टम के बिना संगीत सभाओं की कल्पना ही नहीं कर पाते। यही संगीत जब एल पी रिकॉर्ड, कैसेट, सीडी और पेन ड्राइव के जरिए पुनरुत्पादितहोता है, तो मशीनीकरण की भूमिका बदल जाती है। संगीतकार के साथ उसका वाद्ययंत्र संगीतकार के सुर में ढल जाता है। उस संगीत को जनता तक पहुंचाने के लिए रिकॉर्डिंग आदि के यंत्र तिजारत का हिस्सा बन जाते हैं। यहां मशीन में बाजार प्रवेश कर जाता है।

इसी तरह रेडियो की तकनीक आई तो रेडियो नाटक, फीचर जैसी नई विधाएं अस्तित्व में आईं। और हमें अंधा युग जैसा कालजयी नाटक मिला। प्राय: नाटकों के मंचन में भी प्रकाश, संगीत, दृश्यविधान की बड़ी भूमिका होती है। यानी आधुनिक नाटक मशीनों से अच्छा खासा घिरा हुआ है। नाटककार और निर्देशक ही नहीं, अभिनेता भी इन अदृश्य मशीनों से अपनी नाट्य कला में नए नए प्रयोग करते हैं। हालांकि ये बीते जमाने की बातें हो गई हैं। हम इस तरह से मशीनों के प्रयोग को आत्मसात कर चुके हैं। यह भी सच्चाई है कि इस तरह के यंत्रों के आगमन से कलाओं में मौलिकता के नए नए आयाम तो जुड़े ही हैं, रसास्वादन के फलक भी विस्तृत हुए हैं। रिकॉर्डिंग की सुविधा ने कलाओं का अभिलेखीकरण कर दिया है। वे तात्कालिकता की भंगुरता से निजात पा गईं। दिक् और काल में भी उनका फैलाव हो गया।

पिछली सदी के अंत में एल्विन टॉफलर ने बदलते हुए जीवन पर अपनी तीन पुस्तकों से अंगुली रखी थी। उनमें से एक थी फ्यूचर शॉक। आद्योगिकीकरण से जीवन पर होने वाला असर इस गति से हो रहा था कि मनुष्य समाज उसके हिसाब से खुद को ढाल ले रहा था। धीरे धीरे मशीनी परिवर्तन की गति बढ़ने लगी। यह गति ऐसी हो गई कि आदमी झटके खाने लगा। जाहिरा तौर पर दिखता न हो, पर ये झटके मनुष्य को गुम चोट देने लगे। इलेक्ट्रिक से इलेक्ट्रॉनिक, और टेक्नीकल से टेक्नोलॉजिकल में परिवर्तन बहुतायत में ही नहीं होने लगा, तेजी से भी होने लगा। रेल, हवाई जहाज के जाल ने भूगोल को सिकोड़ा था, लेकिन कंप्यूटर और इंटरनेट के आगमन ने जीवन में आमूलचूल परिवर्तन कर दिया। हवाई जहाज से भौगोलिक दूरी कम समय में तय होती है, शरीर की घड़ी लड़खड़ाने लगती है। और हम जेटलैगमें चले जाते हैं। इंटरनेट और कंप्यूटर की जोड़ी ने पहले तो वास्तविक की जगह आभासी (एक्चुअल की जगह वर्चुअल) संसार खड़ा किया। दूसरे यह जेटलैग की जगह रीयल टाइममें काम करने लगी। हमारा अधिकांश जीवन, हमारी दैनिक चर्याएं, हमारा कारोबार, पढ़ाई-लिखाई, मनोरंजन इसकी जद में आ गया। फायदे कई गुणा दिखने लगे। यह जोड़ी हमारे ज्यादा से ज्यादा स्पेस को घेरने लगी। यह काम तफरीह की तरह या मौज-मस्ती के लिए नहीं होता है। इसके लिए बिजनेस मॉडल ढाल लिए गए। इसमें अंतर्राष्ट्रीय पूंजी लग गई। यह सर्वसमावेशी मॉडल बन गया। यह वाला यंत्रीकरण जीवन की रही सही आजादी को लीलने को तैयार बैठा है। अगर आप लील लिए जाने से बच भी गए तो गुलाम तो बनना ही होगा। कोरोना के बाद प्रौद्योगिकी की जरूरत कई गुना बढ़ गई है। जो गरीबी, अशिक्षा या जिद के कारण इसके आगे नतमस्तक नहीं होगा, उसका अस्तित्व खतरे में है।

ऐसे परिदृश्य में साहित्य की तरफ नजर डालना दिलचस्प होगा। हम जानते ही हैं कि कलऔर कलाआपस में घुलती मिलती रही है। छपाई, रंगीन छपाई और सिनेमा जैसे माध्यमों में मशीनों का योगदान अधिक रहा है। गीता प्रेस गोरखपुर की पुस्तकों और उनकी पत्रिका कल्याण के माध्यम से हमारे देवी देवताओं की खास तरह की छवियां हमारे जन मानस में बैठीं। लघु चित्रकला पहले से विद्यमान थी, पर उस शैली की छवियां उतनी लोकप्रिय नहीं हुईं। महादेवी वर्मा के गीतों की पुस्तक में उनकी बनाई चित्रकृतियां आमने सामने रहकर पाठक को नया चाक्षुष अनुभव देती हैं। हरिशंकर परसाई की एक रचना है – प्रेमचंद के जूते। यह प्रेमचंद की उस फोटो को देखकर लिखी गई है, जिसमें प्रेमचंद के फटे हुए जूते दिखाई देते हैं। एक्फ्रेसिसयानी एक कलाकृति से प्रभावित हो कर की गई शब्द रचना के और भी उदाहरण मिलते हैं। विष्णु खरे की एक मार्मिक कविता है जो एक बीमार स्त्री को ले जाते हुए एक पुरुष के छायाचित्र पर आधारित है। फोटोग्राफी एक महीन और पेचीदा मशीनी कला है। लिखित साहित्य उसके साथ कैसे हमकदम होता है, ये इसी बात के उदाहरण हैं। देवी प्रसाद मिश्र की एक लंबी कविता पहल पत्रिका में छपी थी। यह कविता पन्ने पर कविता की तरह तो है ही, उसके बाएं हाशिए पर भी कवि ने कुछ लिखा है। उसे उसी तरह छापा गया है। कविता के साथ हाशिए पर नोट लेने की तरह की इबारत से कविता का चाक्षुष प्रभाव बदल जाता है। पाठक कविता पहले पढ़ेगा या हाशिए की इबारत? एक दो बार इधर उधर आवाजाही तो जरूर करेगा। कविता में अपनी बात पर जोर देने का यह तरीका छापेखाने की प्रूफरीडिंग की याद दिला देता है जिसमें गलतियां,  सुधार आदि हाशिए पर लिखे जाते हैं। बल्कि यह तरकीब इससे ज्यादा किसी पुस्तक को पढ़ते समय हाशिए पर की गई टिप्पणी के ज्यादा करीब लगती है। विश्व की दूसरी भाषाओं में ग्राफिक साहित्य (यानी रेखांकन और वाचिक भाषा का मिला जुला रूप) खूब लिखा जा रहा है। हिंदी में अभी लेखकों का ध्यान उस तरफ कम ही गया है। अपवाद स्वरूप सदानीरा पत्रिका में कुछ प्रयोग देखने को मिले हैं। हालांकि आज के दौर के तकनीकी साधनों के जलवे के सामने ये उदाहरण बहुत ही मासूम से हैं।

यह सच्चाई है कि लेखकों ने कंप्यूटर का काम ज्यादातर स्मृति वाले टाइपराइटर की तरह ही किया है। अधिकांश पहले कागज पर लिखते हैं, बाद में कंप्यूटर में टाइप करते हैं। कुछ लेखक अब सीधे कंप्यूटर पर टाइप करने लगे हैं। कुछ तकनीक प्रेमी बोल कर टाइप कर लेते हैं। इस तरह बोल कर लिखी जा रही रचनाओं का अध्ययन होना चाहिए। अज्ञेय के उपन्यास अपने अपने अजनबीके अलग तरह के डिक्शन के मद्देनजर लोगों ने यह पता लगाया था कि वह बोल कर लिखवाया गया था।

लगभग एक दशक पहले जब इंटरनेट पर हिंदी में ब्लॉगिंग शुरु हुई थी तो बहुत से नए लेखक दृश्यपटल पर आए। शुरुआत में इनमें आइटी के इंजीनियर आदि ज्यादा थे। कुछ विदेश पहुंच गए तो वतन और भाषा की याद में लिखने लगे। वह एक नई और ताजा सी विधा थी। ब्लॉगिंग में बाद में इतने नौसिखिए लोग आ गए कि सब धान बाइस पंसेरी हो गए। यहां संपादक नाम की छलनी नहीं थी। आगे नाथ न पीछे पगहा जैसी हालत हो गई। जिसके जो मन में आया लिखने लगा। ट्विटर, वट्सऐप और फेसबुक के आने पर ब्लॉगिंग पीछे चली गई। ये माध्यम ऐसे हैं कि यहां हर वक्त नया और ताजा सामान चाहिए। छोटा और चटपटा। देखा, पढ़ा और आगे निकल गए। इन मंचों से एक नई विधा निकली –लप्रेकयानी लघु प्रेम कहानी। लप्रेक के कई संकलन पुस्तकाकार भी निकले। पर लप्रेक, दशकों से लिखी जा रही लघु कहानी से कितनी अलग थी, शोध का विषय है।    

ब्लॉगिंग की तुलना में फेसबुक और वट्सऐप के लेखन में तो और भी खुला खेल फर्रुखाबादी हो गया। यहां बच्चन, प्रेमचंद, महादेवी के नाम से रचनाएं फारवर्ड होती रहती हैं। यहां फारवर्ड होने वाली रचनाओं की प्रामाणिकता संदिग्ध होती है।

ये कथित तौर पर खुले, लोकतांत्रिक और स्वतंत्र मंच हैं। ये ऐसे लगते हैं, असल में हैं नहीं। आर्टीफीशियल इंटैलिजेंसनामक की अति महीन कलभीतर ही भीतर इन माध्यमों को नियंत्रित, संचालित और निर्देशित करती रहती है। इनके पीछे मिथकीय से प्रतीत होते विशाल बिजनेस मॉडल हैं। फेसबुक की कुल संपत्ति  146.437 बिलियन डॉलर है। ये व्यक्ति के जीवन, उसके मन, उसके अतींद्रिय स्पेस में कितनी घुसपैठ कर रहे हैं, यह अलग ही मुद्दा है। और उसकी थाह पाना कठिन भी है।

इन माध्यमों ने दिक् काल की सीमाएं तोड़ी हैं। आप विश्व में कहीं भी हों, सब कुछ तत्काल घटित हो रहा होता है। भला-बुरा सब कुछ, वहीं का वहीं। एक तरफ, व्यक्ति की वास्तविकता का प्रामाणिक सिद्ध किया जाना जरूरी होता है, जिसकी वजह से उसकी निजता पर खतरा मंडराता रहता है। दूसरी तरफ, बेनाम, गुमनाम, छद्मनाम, चोर उचक्कों की भी भरमार है। तथ्य और सत्य की ऐसी-तैसी होती रहती है। केवल उत्तर सत्य बचता है जिसका सिर पैर किसी को पता नहीं।

ऐसे भ्रामक और भ्रमशील मंचों पर क्लासिक साहित्य, समकालीन साहित्य और आभासी दौर का नया साहित्य एक साथ चला रहता है। किसी के लिखे को कौन अपने नाम कर लेता है, कौन किसकी मिट्टी पलीद कर जाता है, कौन खुद को महान साबित कर या करवा लेता है, कुछ पता नहीं चलता। कई बार यहां पर साहित्य का होना ही संदिग्ध प्रतीत होने लगता है।

इस दौर में साहित्य लिखित शब्द तक सीमित नहीं है। पिछले एक दशक से यूट्यूब ने वीडियो क्रांति ला दी है। आम दर्शक श्रोता के लिए यह मुफ्त है। पर इसका भी बाकायदा बिजनेस मॉडल है। इसकी सालाना कमाई 16 से 25 बिलियन डॉलर तक है, मतलब 1600 से 2500 करोड़ डॉलर तक। इसके मालिक यहां वीडियो रखने वाले के साथ अपना लाभ बांटते हैं। यूट्यूब पर नई पुरानी फिल्में, फिल्मी गैर फिल्मी गीत, हर तरह का संगीत, नाटक तो मिल ही जाते हैं, साहित्य भी पर्याप्त मात्रा में है। साहित्य और साहित्य के प्रचारक, विचारक और टीकाकार यहां मिल जाएंगे। यहां भी गुणवत्ता का कोई बेली-वारिस नहीं है। यह एक नई तरह का फोक-स्पेस है यानी लोक-चरागाह। सामने से नि:शुल्क दिखता है, पर आप कारोबार का गुर सीख जाएं तो यह पैसा भी देता है। यहां शब्द, ध्वनि, संगीत, दृश्य, वीडियो की मंडी लगी रहती है, वह भी चारों याम। आपके पास हर तीसरे साल स्मार्ट से स्मार्टतर होते फोन को बदलने और नित्यप्रति डाटा फूंकने के पैसे होने चाहिए।

कोरोना महामारी ने इस परिदृश्य के जल रहे हवन में घी उढ़ेलने का काम किया है। लोगों का घर से बाहर निकलना बंद हो गया। स्मार्ट फोनों के जरिए सारी दुनिया नए जोश के साथ आपकी मुट्ठी में आ गई। पिछले कुछ महीनों में फेसबुक लाइव की जो बाढ़ आई, वह किसी से छिपी नहीं है। अभी तक तो पुराने लिखे को ही नए माध्यम में पेला जा रहा है, लेकिन धीरे धीरे ये माध्यम भी साहित्य पर अपना रंग चढ़ा रहे हैं। लिखित और उच्चरित शब्द तथा वीडियो कैमरे का शगल साहित्य के नए रूपों को गढ़ रहा है। इस दौर में काफी समय तक उच्चरित शब्द या ऑडियो रिकॉर्डिंग को जगह नहीं मिल रही थी। सोशल मीडिया में कैमरा और वीडियो कैमरा व्यापकता से फैला। जैसे ईबुक्स और किंडल का बाजार बना, वैसा ही ऑडियो पुस्तकों का भी बाजार अब बन रहा है। बहुत से पॉडकास्ट चलने लग गए हैं। रेडियो प्रेमी लोगों के लिए यह सहज विकल्प है। हिंदी में अभी इस तरफ लोगों का ध्यान ज्यादा नहीं गया है। लेकिन नवभारत टाइम्स अखबार ने नवभारत गोल्ड नाम से गद्य के नए प्रयोग किए हैं। वहां हर पोस्ट ऑडियो रूप में भी उपलब्ध है।    

हरेक माध्यम उसके प्रयोक्ता को भी प्रभावित करता है। ये नए माध्यम हमारे लेखक, कलाकार, संस्कृतिकर्मी, चिंतक और विचारक  को कैसे प्रभावित कर रहे हैं और कितना प्रभावित कर रहे हैं और कितना करेंगे, धीरे धीरे पता चलेगा। ये माध्यम जटिल हैं, तकनीक आधारित हैं, बहुपरतीय हैं, बहुरूपिए हैं, अंतर्राष्ट्रीय पूंजी के नवल औजार हैं, बल्कि हथियार कहना चाहिए। इनके सामने खूसट-खुर्राट राज सत्ताएं भी रपट जा रही हैं। कौन किसकी जासूसी कर रहा है, कौन किसे बेच खा रहा है, कोई पता नहीं। सत्य और तथ्य दिखता है, हाथ नहीं आता। साहित्यकार को ऐसी आभासी चरागाह जैसी मंडी में रहते हुए साहित्य रचना है। मुझे लगता है यहां भी कंपनियों के व्यवसाय का स्वॉट (SWOT) फार्मूला लग जाएगा यानी हमें माध्यम की स्ट्रेंथ (शक्ति), वीकनेस (कमजोरी), ऑपर्च्युनिटी (अवसर) और थ्रेट (खतरे) की पहचान करनी होगी और अपनी बात अपने दर्शक श्रोता और पाठक तक पहुंचानी होगी। केवल पाठक नहीं, वह एक साथ दर्शक श्रोता और पाठक तीनों हो सकता है। जैसे फिल्म में दृश्य चलता है, वह दिखाई और सुनाई देता है, अगर फिल्म अन्य भाषा की हो तो भावक सब टाइटल को भी पढ़ता चलता है। अगर दर्शक को अपरिचित भाषा की फिल्म देखने के लिए कई परतों में मेहनत करनी पड़ती है जैसे देखना, सुनना, पढ़ना, तारतम्य बिठाना, और रसास्वाद लेना, तो यह सोचिए कि रचनाकार को भी इस बहुविध माध्यम में अपनी बात कहने के लिए वैसे ही तैयारी करनी होगी जैसे फिल्म बनाने के लिए की जाती है। एकांत में साहित्य रचा जाता रहेगा, पर साहित्यकार को ध्वनि, संगीत और विजुअल के लिए और लोगों की सहायता भी लेनी पड़ेगी। यह एक तरह का सामूहिक रचना कर्म हो जाएगा। हमारी भाषाओं में भी ये प्रयोग होने लगेंगे, इसमें कोई शक नहीं है। मल्टी मीडिया रचनाओं के लिए पूरा आसमान खुला है। (ऊपर दी गई चित्रकृति : संजय कुमार श्रीवास्तव) 


भारतीय विद्या भवन की मासिक प्रत्रिका नवनीत के जनवरी 2021 विशेषांक 'मशीन होती मनुष्यता' में प्रकाशित 


 

Thursday, January 28, 2021

नीम बेहोशी



बनास जन में छपी कविताओं की कड़ी में अंतिम कविता  


।।नीम बेहोशी।। 

मंत्री की गाड़ी के काफिले से डर लगता है।

उनकी प्रेस कॉन्‍फ्रेंस के प्रपंच से

लोक लुभावन नीति से

बकबकी उथली प्रीति से

मितली आने गश खाने का डर लगता है।

देश प्रेम के जबर जोश से

मर जाएंगे डटे रहेंगे

छली तब्‍दीली के डंडे से डर लगता है। 

 

नेता, सहनेता, उपनेता, धननेता

नेता निर्माता, नेता क्रेता, विक्रेता, नीलामीकर्ता

घेर घार के खड़े हुए हैं

गलियों सड़कों चौराहों पर अड़े हुए हैं।


               हम नीम बेहोशी में पड़े हुए हैं सड़े हुए हैं।।


Wednesday, January 6, 2021

हलफनामा

 


बनास जन में छपी कविताओं में से एक और कविता पढ़िए। 

   

।।हलफनामा।।

फंसा फंसा तो इसलिए लग रहा है

क्‍योंकि दर्जी ने कमीज तंग सिल दी है

यह कहना खतरे से बाहर नहीं है कि दर्जी किसकी सलाह पर चला है

रेडीमेड से ही काम चलाना पड़ता है

माप ले के सिलने वाले चलन और जेब से बाहर हैं

हम कंफर्ट फिट वाले स्‍लिम फिट में कैसे समाएं

 

इधर उधर की ही हांकनी पड़ेगी

वर्ना मेरी क्‍या मजाल कि कहूं कैसे वक्‍त में आ गए हम

मैं पंतजली का राशन लेता हूं

पहले श्री श्री को सुनता था

अब सदगुरू की राह सद्गती पर हूं
विज्ञापन बेनागा देखता हूं

सोशल मीडिया पर बोलता नहीं

हवा बहुत भर जाती है

तो इशारों इशारों में निकल जाती है

उस पर मेरा कोई बस नहीं डिस्‍क्‍लेमर अलबत्‍ता लगाए रहता हूं

 

समझ गया हूं हम कैसे तीसमार खां थे

समझ कुछ रहे थे चल कुछ रहा था

घबराने की इसमें क्‍या बात! रेलमपेल रुक थोड़ा न जाएगी

 

सोचना भी अब जरूरी नहीं

न हरिद्वार जाकर नहीं त्‍यागा सोचना

यूं ही, यहीं, पता नहीं कैसे ? कब्ज की तरह अपने आप

ओंठ सिले (गए) तो सोचना भी बंद हो गया

अब क्‍या ? अब सब बंद ही है

बंदा है सलामत है

 

न यह न पूछिए ये बयान लिखवाया गया है

या खुद लिखा है  



Monday, November 23, 2020

नया हाकिम

 


आपने बनास जन में छपी चार कविताओं में से एक कविता खेल कुछ दिन पहले पढ़ी थी। यह अंक ऑनलाइन ही छपा है। आज उन्हीं चार में से दूसरी कविता नया हाकिम पढ़िए। धीरे धीरे चारों कविताएं पढ़वाता हूं। ऊपर जलरंग में चित्रकृति कवि महेश वर्मा की है। हमारे पहाड़ी भाषा के ब्लॉग दयार के लिए उन्होंने कृपापूर्वक अपनी कुछ चित्रकृतियां हमें दी थीं। यह उन्हीं में से एक है।   



    ।।नया हाकिम।।

 बातों की लड़ी थी, कड़ियल छड़ी थी

वो फुलझड़ी कतई न थी

जहर बुझी बारूद लिपटी

कांटेदार तार थी

सरहद पर खूंखार थी या

सरहदें छेक रही भूगोल में

इतिहास में, विश्‍वास में, श्‍वास में

 

अपनी ही तरह का ताना बाना बुनना था

सारी दुनिया को धुनना था

एक गद्दा एक लिहाफ, मन चाहा गिलाफ

जनता ने ऐसे ही हाकिम को चुनना था।





Monday, November 2, 2020

खेल

 

कागज पर जलरंग : महेश वर्मा 

यह कविता कोरोना काल से पहले की है। दरअसल कोरोना शरु होने के बाद मुझसे कोई कविता लिखी ही नहीं गई। अलबत्ता दो-एक टिप्पणियां और एक रेडियो नाटक जरूर लिखा। पर सारे लिखने-पढ़ने, सोचने-समझने पर एक धुआंसा सा छाया हुआ है। इस बीच बनास जन में चार कविताएं छपीं। अंक हालांकि ऑनलाइन छपा। यह कविता उन्हीं में से एक है। आज यह कविता पढ़िए। धीरे धीरे चारों कविताएं पढ़वाता हूं। ऊपर जलरंग में चित्रकृति कवि महेश वर्मा की है। हमारे पहाड़ी भाषा के ब्लॉग दयार के लिए उन्होंने कृपापूर्वक अपनी कुछ चित्रकृतियां हमें दी थीं। यह उन्हीं में से एक है।   


                   ।। खेल ।।

 

हिंदूस्‍तानियों के बीच अक्‍सर जाना होता है 
कभी खरीद फरोख्‍त के वास्‍ते कभी सगे संबंधियों से मिलने के वास्‍ते 

इंडियनों के बीच अक्‍सर जाना होता है 
कामकाज के वास्‍ते सगे 

संबंधियों से हाए हैलो के वास्‍ते 

हिंदूस्‍तानियों को भारतीय कहा जाता है जिद की तरह 
इंडियनों को भारतीय कोई नहीं कहता 
मजाक में भी नहीं 
इंडियन को इंडियन ही कहते हैं 

मेरा दिल हिंदूस्‍तानियों में रमता है 
मेरा  दिल इंडियनों में रमता है 
मेरा दिल भारतीयों में रमता है 

फिर मेरा दिल ऊब जाता है 

जब रोज रोज  स्‍टापू  खेलना पड़ता है 
एक टांग उठा कर खानों में छलांगें लगाने का खेल तो 
मेरा दिल डूब जाता है 

इतिहास का मेरा पिछवाड़ा अपने ही भार से धराशाई हो जाता है 
वर्तमान का मेरा धड़ अभी बिल्‍कुल अभी की धक्‍काशाही से दरक जाता है 
भविष्‍य की नोक शुतुरमुर्ग की तरह जमीन में मुंह छिपा लेती है 

                   इस तरह दिन में कई कई बार मैं इस तरह दृश्‍य में होता हूं  
                   इस तरह दिन में कई कई बार दृश्‍य में होते हुए भी मैं अदृश्‍य होता रहता हूं 


बनास जन, जुलाई 2020


Friday, September 25, 2020

विजय कुमार की तीन कविताओं पर एक टिप्पणी



छायांकन : हरबीर सिंह मनकू 


बजती हुई सांकल

(विजय कुमार की तीन कविताओं पर एक टिप्पणी)


कुछ को-

सबको नहीं

सब में से बहुतों को भी नहीं

बल्कि बहुत कम को।

नहीं गिन रही स्कूलों को, जहां जरूरी है

और खुद कवियों को

एक हजार में कोई दो लोगों को।

 

 पसंद है-

 पर किसी को चिकन सूप और नूडल भी पसंद है

 किसी को तारीफें पसंद हैं और नीला रंग

 किसी को पुराना स्कार्फ पसंद है

 किसी को रौब जमाना पसंद है

किसी को कुत्ते को सहलाना।

 

कविता-

पर कविता है क्या

कई ढुलमुल जवाब दिए गए हैं इस सवाल के

लेकिन मैं नहीं जानती, नहीं ही जानती

पर थामे हुए हूं इसे

जैसे जंगला पकड़ते हैं।

विस्लावा सिंबोर्स्का (अंग्रेजी अनुवाद : रेगीना ग्रोल)

 

प्रसिद्ध कवयित्री विस्लावा सिंबोर्स्का की इस कुछ को पसंद है कवितानामक कविता में दो बातें स्पष्ट दिखाई पड़ रही हैं।  पहली यह कि कविता के प्रेमी बहुत ही कम लोग हैं। स्कूलों में यह जबरदस्ती पढ़ाई जाती है। और कवि चूंकि खुद लिखते हैं इसलिए वे तो पढ़ेंगे ही। बाकी दुनिया जहान को ढेर सी और चीजें पसंद हैं। कविता उनकी पसंदगी के दायरे में नहीं आती। कविता में दूसरी बात एक सवाल की तरह है कि कविता है क्या? कवयित्री को ऐसा लगता है कि कोई भी कविता की परिभाषा से संतुष्ट नहीं है। दूसरे शब्दों में कविता की सारी परिभाषाएं आधी-अधूरी हैं। कवयित्री जोर देकर कहती हैं कि वह नहीं जानती, नहीं ही जानती। अपने यहां की शब्दावली में सोचें तो क्या यह अनिर्वचनीय’ ‘अगम्यकिस्म की शैहै? या एक कदम आगे जाकर नेति नेतिकह दें? तब तो यह ब्रह्म स्वरूपहोने लग जाएगी जिसे कोई नहीं समझ सकता। यानी समझ नहीं सकता तो समझा नहीं सकता यानी व्याख्या नहीं कर सकता यानी यह अपरिभाषेय है। यहां ध्यान दीजिए, इन पारिभाषिकों का प्रयोग करने से कविता का संबंध हमारी जीती जागती कविता से टूट सा गया लगता है। वह एक ऑर्गैनिक एंटिटीन रहकर कोई रहस्यमयी सत्तासी हो गई लगती है। इससे यह पता चलता है कि नहीं जानती, नहीं ही जानतीजैसे साधारण शब्दों से जो अर्थ ध्वनित हो रहा है, वह पारिभाषिकों के घटाटोप में छिप जा रहा है। कविता के शब्दों मेंन जान पानेकी सहजता और लाचारी सी है जो पारिभाषिकों में ध्वनित नहीं होती।

 

कविता की अगली पंक्ति इस नकार और लाचारी को एक सकारात्मकता प्रदान कर देती है, जब कवयित्री कहती है कि कविता भले ही कम पसंद की जाती है लेकिन वह इसे थामे हुए है जैसे जंगले को पकड़ते हैं। जंगले को पकड़ने से अर्थ छटाएं बिखरने लगती हैं। वह जंगला बरामदे का हो, बालकनी का हो, जहां सामने का विस्तार खुलता है या किसी पहाड़ी सड़क के मोड़ का जंगला हो जहां से घाटी खुलती है।

 

इस अर्थ में कविता एक भरोसा हमारे भीतर पैदा करती है। समाज में तरह-तरह के अल्पसंख्यकों को यूं ही हजार तरह के भय होते हैं। कविता प्रेमी जैसे अल्पसंख्यकों की तो बिसात ही क्या है। यह बहुत ही सीमित दायरे वाली अल्पसंख्या यानी माइनारिटीहै। पर मजे की बात है की बावजूद नगण्यताके, यह सभ्यता की शुरुआत से ही मौजूद है और तमाम तरह की ताकतों के सामने खड़ी है। यूं तो कविता लोक में भी है, लोकप्रियता के स्पेस में भी है, अकादमिक जगत में भी है, सत्ता के साथ भी है सत्ता के विरोध में भी है। कविता मनोरंजन और आनंद की तरह भी है और असुविधा भी पैदा करती है। इस पृष्ठभूमि में विजय कुमार की तीन कविताओं अनुपस्थित कवि’, ‘कवि का यकीनऔर लिखनाको हम यहां देखते हैं।

 

अनुपस्थित कविनामक कविता शुरू ही इस प्रश्न से होती है कि जब कोई कविता नहीं लिखता, तब भी कविताएं लिखी जाती हैं। क्या इसका अर्थ यह है कि कविता शब्दबद्ध हो या न हो, जीवन-जगत में तो कविता घटित होती ही रहती है। जिन तत्वों से कविता रूपाकार ग्रहण करती है, वे तत्पर हैं - कविता के प्रसूतिगृह में कविता के रूप में जन्म लेने को आतुर कि कोई कविता लिखने के लिए उनका इस्तेमाल करे । कविता के तत्व भी बताए गए हैं जैसे - दृश्य, बिंब, प्रतीक, बयान, पंक्तियां, कोरा कागज, शब्द, छूटी हुई जगहें, इत्यादि। ये सब प्रतीक्षातुर हैं। कविता उद्घोषणा के रूप में होगी या या शोक सभा में लिखी जाएगी। इस कविता को लिखने वाला कवि -

जो अनुपस्थित है

... तब वह कहां रमा हुआ है?

 दुनिया के किन पचड़ों में?

 दुख की किस रातपाली में?

ऊब के किस ओवरटाइम में?

दुनिया की ताकत के सामने खड़ा है यह अनुपस्थित कवि, निहत्थे व्यक्ति की बगल में। जीवन में जो प्रतिकूल घटित हो रहा है, वह उसे देख रहा है। कविता लिखे जाने के लिए एक 'सनक' चाहिए, 'कल्पना' चाहिए, 'विवरणों' के भीतर जाना होगा, घोंसलों में नींद जल का स्पर्श / और थोड़ी सी धुकधुकीकविता में आगे जो तत्व बताए गए हैं, वे एक तरफ जीवन को पूर्णता, गहनता, व्यापकता और संवेदना के साथ समझने के औज़ार प्रतीत होते हैं और शायद कवि को इनकी जरूरत है। पहले हिस्से में कविता के शिल्प से जुड़ी चीजें हैं और उसके बाद जीवन से जुड़े जीवंत घटक हैं, कविता लिखने के लिए इनकी भी जरूरत है।

 

सफलता की सीढ़ियों को नजरअंदाज करना, मयनोशी, रातों में सड़कों पर भटकना, मीलों पैदल चलना प्राय: बोहेमियन के लक्षण हैं और कवियों कलाकारों के साथ भी चस्पां होते हैं। इन लक्षणों के कारण कवियों की बदनामी ज्यादा है। लेकिन ध्यान से देखा जाए तो इसके पीछे एक भीतरी बेचैनी और आजादी की चाह है। कविता में कहा गया है -

क्या ये अब भी एक कवि के दरवाजे की सांकल

 बजाते हैं कभी कभी?

कविता में यह सवाल उठाया गया है कि कविता जो चारों तरफ बिखरी पड़ी है और लिखे जाने के लिए बेताब है, उसे रूपाकार देने वाला कवि कहां है? कविता की अगली पंक्तियां यानी कविता लिखने के उपादान कुछ इसी तरह कवि को उकसा रहे हैं।

... शीर्षक इतना अधीर

 कि डरा दे आधी रात

 कागज जो कोरे हैं

 क्या देंगे धमकी ...

 

 डराए यह रौशनाई ...’  

 

पसलियों में जलती लालटेन, जिद, बेकली, नशीली धुन, ढोलक पर थाप, गटर के गंदे पानी में सितारों की परछाइयां, सीने पर पत्थर जैसा बोझ, निस्सारताएं, विफलताएं, ये सब किसी अजूबे की तरह जीवन के हाशिए पर पड़े हैं ... ये कुछ ऐसे अवयव हैं, जिन्हें कवि कविता के लिए आवश्यक समझता है। लेकिन कवि अनुपस्थित है।

 

विस्लावा सिंवोर्स्का को लगता है कि जीवन में कविता की मौजूदगी बहुत क्षीण है। पर कवयित्री को कविता पर भरोसा है। वह उसे सहारे की तरह थामे हुए है। विजय कुमार काव्य रचना के बाहरी और भीतरी पुर्जों को तरह तरह से हमारे सामने रखते हैं; और खासे दिलकश और आवेग भरे अंदाज में; और बिंबों, रूपकों और बयानों के माध्यम से रखते हैं। लेकिन वहां कवि गैर हाजिर है। क्या यह अजीब है कि कविता लिखे जाने के सभी तत्व मौजूद हैं, वे तत्पर हैं कि कोई उनसे कविता बनाए पर कवि गैरहाजिर है? क्या यह किसी तरह का विरोधाभास है? आगे बढ़ने से पहले विजय जी की दो अन्य कविताओं पर भी नजर डाली जाए। ये कविताएं भी कवि और कविताओं से ही संबंधित हैं।

बुजुर्ग कवि का यकीन एक कठिन समय के बीच खड़ी है। विजय जी की ही एक अन्य गद्य पुस्तक है अंधेरे समय में विचार। यह कविता कुछ कुछ उसी तरह के अंधेरे समय को या एक विकराल समय को कविता की सत्ता में स्थापित करती है।

शहर का सबसे बूढ़ा कवि 

आधी रात शहर के सबसे पुराने इलाके में 

एक दुकान में 

अधजली रोटी शोरबे में डुबोकर खाता है

कविता इस दृश्य से शुरू होती है। आगे बहुत लंबी उदास रात है, हवा बंद है, चांद पहले से ज्यादा टेढ़ा है (यह मुक्तिबोध के प्रसिद्ध बिंब से आगे और अधिक कठिन समय का बिंब है), पेड़ कट चुके हैं, पक्षी कलरव नहीं विलाप कर रहे हैं, नदियों में पानी सूख चुका है, पुस्तकें फट चुकी हैं, स्वप्नदर्शी की स्मृति को भी मिटा दिया गया है। और ऐसे भयावह समय में सड़कें एकतरफा हैं यानी मत भिन्नता की जगह नहीं बची है।

 

इस भयावह स्थिति में कवि की कोई जगह नहीं बची है। लेकिन कवि का यकीन कायम है। यह यकीन सनक की तरह लग सकता है, पर है। कवि को विश्वास है कि जो तरह-तरह के अपराध करने में लिप्त हो गए हैं, वे थक कर लौटेंगे ही नहीं, कवि के शब्दों को भी तलाश करेंगे। कविता पर यह गजब का यकीन है। दुनिया को रहने लायक बनाने का एक तरीका भी यह है। कवि का यह यकीन शुरू में दी गई विस्लावा सिंबोर्स्का की कविता में व्यक्त यकीन से थोड़ा अलग है, ज्यादा जिद्दी। कवि को तो यकीन है पर इस कविता में इस यकीन के बारे में कहा गया है कि ... कवि का यकीन / बाहर के बियावान से ज्यादा भयावना है। इससे यह प्रतीत होता है कि यह यकीन अविश्वसनीय ढंग से गहरा है। गहरे से भी गहरा। यानी कि अमानवीय होती इस दुनिया को आखिरकार कविता ही बचाएगी।

 

विजय जी की तीसरी कविता है लिखना। यह भी कविता से पाए जाने वाले भरोसे को जिंदा करती है। कविता कोई जादू की पोटली नहीं है कि वह दुनिया को सुधार देगी, इन्साफ दिला देगी, जानलेवा बीमारियों से निजात दिलवा देगी, न्यायधीशों को भावुक कर देगी या भुखमरी दूर कर देगी। हम ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जो नियॉन साइनबोर्ड की तरह चमक रही है। शाम का वक्त है और यह हमारे लिए निरर्थक है। हम घर का रास्ता भी भूल गए हैं। इस बिंब के जरिए मन:स्थिति की कल्पना कीजिए, कितनी दारुण और डरावनी है। समय इतना बदहाल है और

दुनिया के तमाम कवि

 रोज असंख्य कविताएं लिख रहे हैं

इसके बाद कविता में प्रश्न किया गया है कि

तो क्या ये तमाम कविताएं  

चाबियां हैं किन्हीं ओझल दरवाजों की  

जो समय के बाहर खुलते हैं?

के किन घावों का निशान लिए

इंसानों की परछाइयां बैठी हुई हैं भाषा में?’

प्रश्न की तरह एक संभावना व्यक्त की गई है कि शायद ऐसा हो सकता है कि कविता समय के परे ले जा सकती है।

तमाम कविताएं उस भाषा को पकड़ने की कोशिश करती हैं जिनमें इंसानों की परछाइयां हैं और उनकी आत्मा पर घावों के निशान हैं। यानी कविता में आभ्यंतर तक घायल मनुष्य दिखाई पड़ता है। या यह कोई मौन स्मृति है जिस पर तितली मंडराती है। यानी वह स्मृति किसी फूल की तरह है। यानी कविता में मनुष्य की पीड़ा, दुख और स्मृति दर्ज रहती है। यह कोमल है; इसमें रंग और खुशबू हैं जिसकी तरफ तितली आकर्षित होती है। यानी सौंदर्य की खोज करती है कविता। सौंदर्य में दुख, पीड़ा, स्मृति, कोमलता, रंग, खुशबू, सृजनात्मकता का समावेश है। इस तरह कविता के अर्थ खुलते जाते हैं और उसकी उपादेयता, उसकी उपस्थिति, उसकी अनिवार्यता स्वयं सिद्ध हो जाती है।

 

कोई भी रचना या कलाकृति एक दिक् और काल में निबद्ध होती है। उसी में रहते हुए वह दिक् और काल के आर-पार विचरण करती है। सिंबोर्स्का की कविता एक रोमानी सा और बादलों की तरह का हल्का-फुल्का यानी भारहीन और बेठोस सा दिक् काल रचती है। उसी में से कविता के प्रति दृढ़ विश्वास उभरता है। दूसरी तरफ विजय कुमार की कविताएं कठिन, कर्कश, बीमार, अपराध, हिंसा, लूट-खसूट, ज्ञान-कला-संवेदना विरोधी और अमानवीय होता हुआ सा दिक् काल रचती हैं। बेशक इसमें हमारे ही समय का वर्तमान धड़कता है। इस कठीन, कठोर, ठोस, सांद्र, परिस्थिति के बीच कवि काव्य रचना की संवेदना- संभावना की तलाश करता है। इसी बीमार समय में कवि और कविता पर भरोसे को संभव करता है, वह भी शिद्दत के साथ। 

   

हमारे समय में भरपूर कविता लिखी जा रही है। तरह तरह की कविताएं लिखी जा रही हैं। कवियों और कविताओं के कई संस्तर हैं। कवि और उनके जितने भी थोड़े बहुत रसिक हैं, वे अपने अपने दायरे में मस्त हैं। वे अपनी अपनी तरह की कविताई से संतुष्ट हैं।

 

यहां जिन कविताओं की चर्चा की गई है, इनकी केंद्रीय चिंता है कि कविता जीवन के भीतर कुछ और धंसे। कविता जहां-जहां जो-जो संधान की रही है, वह पर्याप्त नहीं है, उससे और आगे जाए। हमारा यह स्वप्नदर्शीकवि जिस तरह से कविता को देख रहा है, उस तरह की कविता का रचयिता कवि दृश्य में मौजूद नहीं है। जीवन के भीतर धंसकर कविता को खंगालने, ढूंढ़ने और साकार करने की बेचैनी इन कविताओं में है। इन कविताओं में मौजूदा कविताओं और काव्य-स्पेस के प्रति नकार का भाव नहीं है। यहां सिर्फ कविता के बनने को ही तरह-तरह से कहा गया है। कवि के अनुपस्थितहोने की असहायता केवल ध्वनित हो रही है।      

 

यह लगता है कि वह कुछ भिन्न चाहता है। ऐसा हर कवि के साथ होता है या हो सकता है कि वह जो लिखता है, उससे कभी कभी पूरी तरह संतुष्‍ट न हो। वह जीवन की अतल गहराइयों में घुस कर सच्ची और अप्रतिम कविता संभव करना चाहता है। खुद से भी और अपने वक्‍त के कवियों से भी वह ऐसी ही अपेक्षा करता है। इन तीनों कविताओं में काव्य लेखन के कुछ नवीन, कुछ अनछुए, कुछ गहन आयाम तलाश करने की एक तरह की छटपटाहट महसूस होती है।

 

इन चारों कविताओं में कुछ शब्द स्फटिक मणियों की तरह चमकने लगते हैं। नहीं जानती’, ‘जंगला’, ‘लिखना’, ‘अनुपस्थित कवि’, ‘यकीन’, ‘सांकलऔर चाबियां। इन सप्त मणियों की अपनी-अपनी अलग-अलग व्याख्याएं इन कविताओं के संदर्भ में दीप्त होने लगती हैं। ये परस्पर संबद्ध होकर ही अर्थच्छायाओं के नए आयाम खोल सकती हैं। यह इस काव्य आस्वाद का अगला चरण हो सकता है।   

इस बिंदु पर विजय कुमार जी की पहली आलोचना पुस्‍तक कविता की संगतको खंगालना दिलचस्प‍ होगा। इस किताब में उनका एक लेख है, ‘क्‍या कविता गवाही देगी?’ सन् 1993 में लिखा गया यह लेख सोवियत संघ के विघटन और भूमंडलीकरण के पैर पसारने के दौरान हो रहे परिवर्तनों को दर्ज करता है और अपेक्षा करता है कि कविता इस बदलते हुए समय की परख करे। कुछ उद्धरण दिए जा रहे हैं जिनकी व्याख्या की जरूरत नहीं है।  

‘‘हमारे समय में कविता की गवाह बनने, याद रखने और दर्ज करने की शायद एक नई तरह की भूमिका उभरी है।’’ (पृष्‍ठ 34) 

‘‘आज लिखी जा रही कविता घटनाओं की गवाही इसी अर्थ में देगी कि हम तुष्‍टि, विस्‍मृति और उदासीनता के इस भयावह अंधकार के खिलाफ कितनी देर तक टिके रह सकते हैं।’’ (पृष्‍ठ 35-36) 

‘‘हिन्दी की समकालीन कविता के एक बड़े हिस्से में दुर्भाग्य से इस तरह की गवाही आज ज्यादा नहीं है।’’ (पृष्‍ठ 36)

‘‘यह एक सच्चाई है कि आज हम अपने समय का एकीकृत और कन्डेंस अनुभव प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं। हम विवरणों, घटनाओं, प्रसंगों में इस प्रकार नहीं धँस पा रहे हैं कि उनमें रमें भी, एक साथ उन्हें ट्रांजेंड भी कर दें।’’ (पृष्‍ठ 37-38) 

 

जो छटपटाहट, अकुलाहट और प्रश्नाकुलता यहां उल्लिखित तीन कविताओं  ‘अनुपस्थित कवि’, ‘कवि का यकीनऔर लिखनामें है, लगभग उसी तरह की मन:स्थिति  इस लेख में प्रतीत होती है। ऊपर दिए गए उद्धरणों से यह झलक मिल जाती है। इसी किताब में विजेंद्र जी को एक खत के रूप में लिख गया एक लेख है, 'अमानुषिकता के बीच कविता जिंदा है'। इस लेख में विजय जी ने कविता के प्रयोजन को खोला है। 

‘‘... जानकारियां देने वाले दूसरे तमाम माध्यमों की तरह कविता भी अपने समय की गवाही देना चाहती है पर इस गवाही में केवल तथ्यों को इकट्ठा कर लेना भर नहीं है।’’ (पृष्‍ठ 201)

‘‘कवि चीजों से गुजरते हुए एक ओर स्वयं को बचाये रखने की जद्दोजहद में रहता है, दूसरी ओर वह चीजों को भी बदल देना चाहता है। यह दोतरफा लड़ाई है।’’ (पृष्‍ठ 201) इस बात को विजय जी ने विष्णु खरे की 'घर' कविता के जरिए स्पष्ट भी किया है। 

‘‘एक कवि के रूप में हम बार बार इस चीज को जानना चाहते हैं कि हमारी उलझनें क्या हैं और हमारी क्षमताएं क्या हैं? क्योंकि हमारे सबसे अच्छे इरादों के बावजूद, हमारे सबसे महान विचारों के बावजूद हमारे जीवन से कितना कुछ छूटता चला जा रहा है, कितना कुछ हम भूलते चले जा रहे हैं। वे तमाम चीजें जिनमें हमारा हस्तक्षेप हो सकता था, वे हमसे याचना करती दिखाई पड़ती हैं, हम लगातार उन्हें विस्मृत करते चले जाते हैं। हमारी अधूरी इच्छाएं और हमारी स्वीकृतियां, हमारा लगातार संतप्त निजी अन्तर्द्वन्द्व और हमारे विचारों की ऊंचाई, हमारे इरादे और हमारे भीतर का आदिम अंधकार, हमारे आदर्श और हमारे साधनों की सीमाएं, हमारी दुनियावी सफलताएं, और हमारी झूठी स्वैरकल्पनाओं में जीने की थकी हुई इच्छाएं, हमारी अनवरत और अनिश्चित किस्म की उत्कंठित अन्यमनस्कताएं और हमारी सबसे स्पष्ट व्यावहारिकताएं - यही सब कुछ कविता का विषय बनता है। और सबसे अचरज की बात है कि रचते हुए हमेशा एक आधुनिक कवि को यह लगता है कि कविता केवल इसी सबकी गवाही ही नहीं देना चाहती, वह इस सबको भरपूर गाना भी चाहती है। बहुत प्रकट दिखाई देने वाले अन्तर्विरोधों में और इसी सबको साफ तौर पर न सुलझा पाने पर हमेशा भीतर मौजूद  रहने वाली कसक कविता में छिपी रहती है।’’ (पृष्‍ठ 202)

 

इस तरह विजय जी की ये कविताएं और उनके लेख हमें कविता के रूपाकार, कविता से अपेक्षाओं-आकांक्षाओं और कविता के प्रयोजन को समझने में मदद करते हैं। वे परस्पर भी एक दूसरे को स्पष्ट करते हैं। और एक विमर्श की निर्मिति होती है। 

(इस टिप्पणी के  लिए हृदयेश जी का आभार, जिनके कई बार कहने पर यह लिखी जा सकी। साथ ही केरल के हिन्दी के युवा प्रोफेसर महेश एस का आभार। एक वेबिनार में महेश ने विजय जी की तीन कविताओं की सुंदर व्याख्या की। उन तीन में से एक कविता 'अनुपस्थित कवि' भी थी। संयोग से ही मैं उस वेबिनार को सुन पाया और महेश जी की बातों से ही मुझे लगा कि मैं भी इस कविता पर कुछ बात कर सकता हूं। अरुंधती का भी आभार जिसने विस्लावा सिंबोर्स्का की कविता ढूंढ़ कर दी। इस कविता का जो अनुवाद मैंने किया है, वह बहस-तलब हो सकता है। इसे बेहतर बनाया जा सके तो खुशी होगी।)  



विजय कुमार की तीन कविताएं