Friday, January 6, 2023

समरस जीवन का अवसर



श्री नारायण धाम : समरस जीवन का अवसर


पिछले साल दिवाली हमने घर पर नहीं मनाई।दीप पर्वन चाहते हुए भीस्वीट पर्वमें बदल जाता है। फिर उसका खामियाजा महीनों भुगतना पड़ता है। इसमें कोई शक नहीं कि मिठाई अच्छी लगती है। घर में आ जाती है तो हाथ रुकता नहीं। उसके बाद मिठाई अपना खेल खेलने लगती है। अपराध बोध अलग से कई दिन तक रहता है। शहरी जीवनशैली के कारण खानपान में यूं भी कई कुछ शामिल रहता है जो सेहत के लिए अच्छा नहीं है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों से जागरूकता की लहर भी चल रही है कि साधारण, नैसर्गिक, सादा जीवन हमें जीना चाहिए। यह लहर आकर्षित करती है पर अमल कहां हो पाता है! 

इसी ख्याल से सुमनिका की पहल पर हम दोनों दिवाली की छुट्टियों में मिठाइयों को धता बता कर पूना से तीस किलोमीटर दूर सासवड़ की खुली वादियों में श्री नारायण धाम पहुंच गए।  आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा का केंद्र। आठ दिन वहां रहे। जाने से पहले वहां के डॉक्टर ने वीडियो कॉल करके हमारे स्वास्थ्य और बीमारियों आदि की जानकारी ली थी। जाने पर ब्लड रिपोर्ट जमा करानी पड़ी। हमने रहने के लिए कमरा बुक किया और डॉक्टरों ने अस्पताल की तरह का कार्ड बना दिया उनके हिसाब से समान्य, लेकिन हमारे हिसाब से सख्त दिनचर्या शुरू हो गई। 

सबसे ज्यादा कमी खली दूध वाली चाय की। हमें रियायत के तौर पर, क्योंकि दोनों को ही कोई गंभीर बीमारी नहीं थी इसलिए, सुबह नाश्ते के साथ एक कप चाय  मिलना  तय हुआ। शाम को हर्बल चाय हर किसी को मिलती थी।  यहां की दिनचर्या में प्राकृतिक चिकित्सा, आयुर्वेद और योग का अच्छा मिश्रण है। सुबह पांच बजे एनिमा लीजिए, हर रोज तो नहीं लेकिन जरूरत के मुताबिक हफ्ते में दो या तीन बार।  साढ़े पांच बजे सेहन में जमा हो जाइएजल नेति कीजिए, आंखें धोइए, गरारे कीजिए और जिनको अनुमति हो वे कुंजल यानी खूब सारा पानी गटागट पीकर  वमन करें। उसके बाद एक हर्बल चाय पीजिए और छह से सात बजे तक योगाभ्यास  कीजिए। सात बजे एक सज्जन आसपास के पहाड़ी इलाके में सैर करने के लिए ले जाते थे। जो लंबी सैर पर नहीं जाना चाहते, वे परिसर के आहाते में ही टहलते। नवंबर का महीना था। गुलाबी ठंड का आनंद था। सैर के वक्त अलग-अलग जगहों से आए हुए लोग आपस में अच्छे घुममिल गए। आठ बजे बजे नाश्ता कीजिए। शुरु में तो इस रूटीन से हम चकरा गए। सुमनिका को उबली मूंग और ढेर सारा पपीता, तरबूज, भिगोए हुए तीन बादाम और दो खजूर मिले। मुझे पोहा, इडली, उपमा, इनमें से जो भी बना हो, लेकिन अतिसीमित मात्रा में। सिर्फ दो इडली देखकर मैं बहस करने लग गया- कम खाना दोगे तो सिर दर्द हो जाएगा। दिन में भी आधी रोटी और बिना मसाले की पनीली सब्जी। दाल, दही, चटनी, अचार कुछ नहीं। मतलब स्वाद पर विजय पाइए। पहले ही दिन शंका सच साबित हुई और मुझे सच में ही सर दर्द हो गया। पेट में गैस भरने से प्राय: हो जाती है। ज्यादा देर उदर को खाली नहीं रख सकता। मुझसे व्रत भी नहीं रखा जाता। पेट में गैस भरने से चक्कर खा कर गिरने के कई हादसे मेरे साथ हो चुके हैं। रमन मिश्र जैसे मित्र गवाह हैं। उस दिन डॉक्टरों ने आंखों पर और पेट पर मिट्टी का लेप लगाया। दो-तीन घंटे बाद शांति मिली। यह अनुभव मेरे लिए नया था। शाम को एक खाखरा और हर्बल चाय और रात को भी वही रोटी सब्जी। मैं तो तीसरे दिन डॉक्टर से लिखवा लाया कि मांगने  पर दूसरी बार कुछ और खाने को दे दें। इस अनुमति का प्रयोग शुरु में तो किया और जोश में एक दिन ज्यादा भी खा लिया। लेकिन बाद में अकल आ गई और अतिरिक्त लेने पर खुद ही लगाम लग गई। यह एक तरह का मनोवैज्ञानिक संबल ही रहा कि डॉक्टर की अनुमति से ज्यादा भोजन मिल जाएगा। असल दिक्कत यह है कि हम अपनी आदत और डर से  चालित होते हैं। खानपान या रहन-सहन में प्रयोगशीलता से बचते हैं। खानपान शरीर को स्वस्थ रखने का एक माध्यम है। इस विचार का भरपूर इस्तेमाल इस संस्थान में किया जाता है। 

श्री नारायण धाम की दिनचर्या का दूसरा हिस्सा है, प्राकृतिक चिकित्सा। नाश्ते के बाद नेचुरोपैथी का सेशन चलता है। हर दिन अलग तरह की मालिश की जाती है। आठ दिन में पता नहीं कितना    तेल देह पर चुपड़ दिया गया। तिल का तेल। पहले दिन सिर की मालिश की गई। अंतिम दिन फेस पैक वगैरह लगाया गया। दाढ़ी की वजह से मुझे उसका फायदा नहीं हुआ। यह एक तरह का फैशन लगा जो सौंदर्य प्रसाधन अधिक है। पर हर दिन जो देह पर मालिश होती थी उसका मैंने सबसे ज्यादा आनंद लिया। एक दिन तेल, एक दिन पोटली, जिसमें उबले हुए पत्ते होते हैं। एक दिन शायद रेत, एक दिन नमक। मालिश के बाद भाप वाले चेंबर में करीब दस मिनट तक देह की सिकाई होती थी। खूब पसीना बहता था। उसके बाद वहीं बाथरूम बने हैं, सोलर सिस्टम से पानी गर्म होता है, आप मजे से नहा लीजिए। बारह बजे भोजन करके थोड़ा आराम कीजिए। शाम को फिर से हर दिन कोई न कोई  उपचार होता था जो चार बजे तक चलता था। 

वहां रक्तचाप और मधुमेह के मरीज बहुत आते हैं। वजन कम करने के इच्छुक और खुद को डीटॉक्स करवाने वाले भी कम नहीं। कुछ गंभीर व्याधियों वाले लोग भी आते हैं। रोग के हिसाब से भोजन, मालिश, सिकाई और योगासनों की व्यवस्था होती है। जरूरत हो तो आयुर्वेदिक दवा भी दी जाती है।

 

एनिमा और बस्ती अदल-बदल कर प्राय: हर व्यक्ति को दी जाती है। यहां पर विरेचन का भी बड़ा नाम है यानी तीन दिन तक घी पिला कर उदर शुद्धि की जाती है। इसी तरह लघु शंख प्रक्षालन है जो एलएसपी के नाम से जाना जाता है। इसमें  एक ही दिन में ढेर सा पानी पिला कर अंतड़ियों की सफाई की जाती है। ये सभी आयुर्वेद के उपचार हैं। वजन कम करने के इच्छ़क लोगों के लिए सिर्फ योग नहीं पसीना निकलवाने वाला पावर योगा भी करवाया जाता है। शाम को चार बजे हर्बल चाय और एक खाखरे के बाद थोड़ा आराम करने का वक्त मिलता है। शाम छह  से सात फिर योगासन करवाए जाते हैं। योग के अंत में लाफ्टर थैरेपी और उसके बाद करीब आधा घंटा पब्लिक स्पीकिंग जैसी सामाजिक गतिविधि होती है। संस्थान में रह रहे लोगों में से कोई भी अपने अनुभव या अपनी कला साझा कर सकता है। कथा-कहानी, कविता, गीत सुना सकता है। बच्चे अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। यह एक तरह के सामुदायिक जीवन का हिस्सा है। सुबह शाम की सैर करते समय, कैंटीन में नाश्ता खाना खाते समय लोग आपस में घुल मिल जाते हैं। गप-शप हो जाती है। सुख-दुख भी बंट जाते हैं।  

एक दिन एक सज्जन के साथ ऐसे ही बातचीत के दौरान  मेरे मुंह से निकल गया, मैं कविता लिखता हूं। मुझे खुद पर ही ताज्जुब हुआ कि यह मैंने यह कैसे कह दिया! ‘मैं कवि हूंकहने में हमेशा बहुत संकोच होता है। कविता लिखना स्वभाव का बहुत ही निजी सा हिस्सा है। इसे सार्वजनिक करने की हिम्मत नहीं होती। हालांकि यह इच्छा हमेशा बनी रहती है कि सब लोग मेरी कविता पढ़ें। इस तरह के द्वन्द्व के शिकार बहुत जन होते होंगे। खैर! बात मुंह से निकल चुकी थी।  फिर क्या था। बात फैल गई। एक शाम वहां के प्रभारी डॉक्टर भी अपने संबोधन में कह गए, यहां तो कविराज विराजमान हैं। कविराज को संकोच के मारे समझ न आए कहां छुपें। दिन ब दिन लोग इसरार करने लग गए। और एक शाम की सभा में कविता सुनानी ही पड़ी। हम जैसे लोग सिर्फ साहित्यिक गोष्ठियों में कविता-वीर बनते हैं। जनता के बीच जाने का मौका आए तो सांप सूघ जाता है। लगा, कि हम कितनी 'विशेषीकृत' सी कविता लिखते हैं। लोग तुक, लय, ताल की अपेक्षा करते हैं। सुमनिका ने कविताएं चुनने में मदद की। मैंने भी अपने आकाशवाणी के दिनों को याद किया कि अपनी बात को दूसरे तक पहुंचाना जरूरी है। छोटी सी भूमिका के साथ अपनी दो कविताएं सुना दीं। संयोग से वे सभी को पसंद आईं। 

एक महिला मुंबई से ही गईं थीं, अपनी बेटी के साथ। वे बहुत अच्छा गाती थीं। अपने पिता से बहुत प्रभावित थीं। एक तरह से अपने अध्यात्म में मगन रहती थीं। एक रात हमारे कमरे में करीब घंटा भर महफिल जमी। थोड़ा काव्य रस, थोड़ा रहस्यवाद, बहुत सा आनंद। एक और महिला भी अपनी बेटी के साथ आई थीं, मुंबई से ही।  उन्होंने कुछ ही समय पहले अपने पति को खोया था। बार-बार उनके घाव टीस जाते। सुमनिका के साथ उनका तार जुड़ गया। इन दोनों के आपस में लंबे-लंबे सत्र चले। फिर अचानक उनके परिवार में कोई हादसा हो गया और उन्हें तुरंत लौटना पड़ा। एक सज्जन नवी मुंबई से आए थे। सफल व्यवसाई, बहिर्मुखी, सब से दोस्ती करने वाले, सब का हाल-चाल जानने वाले। वे कैंटीन में कम चाय और कम खाने पर कैंटीन स्टाफ से बहुत बहस करते थे। एक दिन कुछ ज्यादा ही बरस पड़े। और अचानक छोड़-छाड़ कर चले गए। संस्थान में उनकी डिटॉक्सिंग नहीं हो पाई। अतिरेकी वाद-विवाद,  बहस, गुस्सा, तुनकना भी तो तनाव पैदा करता है। वह भी एक तरह का टॉक्सिन ही है। अगर मन शांत रहेगा तो रक्तचाप और तनाव का स्तर भी संभला रहेगा। वहां इन्हीं व्याधियों का इलाज होता है। वे इन्हीं के चंगुल में फंस कर अपनी व्याधियों सहित लौट गए। 

संस्थान में दो ऐसे समूह मिले जो गुजरात से आए थे। उन मस्त मौला लोगों ने हमारी आंखें खोल दीं। उनमें से अधिकांश कारोबारी लोग थे। वे एक तरह से स्वास्थ्य पर्यटन पर आए थे। उनका कहना था कि लोग जगह जगह घूमने जाते हैं, पैसा खर्च करते हैं, ऊट-पटांग खाते हैं, बदले में सेहत बिगाड़ते हैं। क्या फायदा? ऐसी जगह जाओ, जहां घूमने-फिरने का आनंद मिले, शरीर भी निरोग हो जाए। ये लोग देश भर में अलग-अलग प्राकृतिक चिकित्सा केंद्रों में घूम चुके थे। यह ख्याल बड़ा रोमांटिक था। यूं देखा जाए तो यह जगह उस तरह से सैर-सपाटे वाली नहीं है। यह चिकित्सा केंद्र है। यहां पर संस्थान का अनुशासन मानना पड़ता है। जैसे सुबह की सैर के अलावा आप गेट के बाहर नहीं जा सकते। आपसे मिलने कोई नहीं आ सकता। दूर-दूर तक कोई बाजार कोई हाट नहीं है। केंद्र में सिर्फ एक दुकान है जिसमें जरूरी सामान और दवाइयां मिलती हैं। 

इस जगह का आनंद तभी लिया जा सकता है जब हम खुद को यहां की दिनचर्या में ढाल लें। फिर जिस चीज में हम आनंद लेने लग जाते हैं, तो उसमें कोई कमी, कोई असुविधा हमें नजर नहीं आती। अगर (तथाकथित) सात्विक जीवन आपको अच्छा लगता है तो यहां पर रहना भी अच्छा ही लगेगा। 

इस यात्रा से और इस शिविर में कई बातें साफ हुईं। सात्विक जीवन शैली थोड़ा ज्यादा कठोर शब्द है, क्योंकि उस तरह की जीवन शैली अपनाना आसान नहीं है। हम अपने रोजमर्रा के जीवन में साधारण तरीके से भी रहें तो भी हमारे काम-धाम, बाजार, मनोरंजन के साधनों, आस-पड़ोस और हमारे सोच विचार का असर हमारे ऊपर पड़ता ही है। इन सब का असर हमारे शरीर और मन पर पड़ता है। इस तरह के केंद्रों में जाकर हम अपनी ढर्रेदार जिंदगी को कुछ दिन किनारे रख देते हैं। उसके बदले उस भारतीय नैसर्गिक जीवन पद्धति को अपने रोजमर्रा के व्यवहार में लाते हैं, जिसकी बहुत रोमांटिक छवियां हमारे मनों में हैं। और जो साधारण घरों में सध नहीं पाती है। गंभीरता से सोच-विचार करने वाले लोग बाजार की चालबाजियां समझते तो हैं लेकिन उनके पाश में बंधे भी रहते हैं। गौरतलब बात है कि इस संस्थान में बहुत स्पष्ट रूप से बाजार से प्रभावित जीवन शैली का निषेध पाया जाता है। सादा जीवन व्यतीत किया जाता है। संस्थान में ही पका सादा भोजन खाने को मिलता है। जंक फूड, मिठाई, नमकीन, कोल्ड ड्रिंक्स वगैरह यहां कुछ नहीं मिलता। किसी तरह के धार्मिक कर्मकांड का दबाव यहां नहीं है। स्टाफ के लोग सुबह शाम आरती करते हैं। आपकी इच्छा है तो उसमें शामिल होइए या न होइए। अपने में मस्त रहिए। योग की कक्षा में ओंकार बोला जाता है। यह धार्मिक कर्मकांड नहीं है, कसरत का हिस्सा है। यहां बार बार याद दिलाया जाता है कि बाजार की बनी बनाई चीजें नहीं खानी चाहिए। जंक फूड नहीं खाना चाहिए। बहुत अधिक भोजन नहीं करना चाहिए। नियमित व्यायाम करना चाहिए। आलस्य नहीं करना चाहिए। नैसर्गिक जीवन पद्धति अपनानी चाहिए। भोजन भी जैविक यानी ऑर्गैनिक करना चाहिए। करना चाहिए ही नहीं, बल्कि यहां पर यह करवाया भी जाता है। यह अलग बात है कि जब हम अपने घरों को वापस आ जाते हैं तो उस तरह की दिनचर्या को बनाए रखना कठिन होता है। थोड़े दिन तो जोश रहता है, धीरे-धीरे हम अपने पुराने ढर्रे पर लौट आते हैं। 

यही वजह है कि यहां पर कई लोग हर साल आते हैं। साल भर अपने शरीर में गलत-सलत माल भर लिया। यहां आकर एक बार उसकी सफाई करा ली। 

मुझे नारायण धाम की एक दो चीजें ज्यादा अच्छी लगीं। एक तो यह कि यहां पर आप अपने शरीर को पहचानने में थोड़ा समय लगाते हैं। शरीर के साथ समय बिताते हैं। यह एक अलग तरह का अनुभव है। क्योंकि दिनचर्या ही शरीर से जुड़ी हुई है। फुर्सत से अपने शरीर के साथ संवाद स्थापित किया जा सकता है। मन को साधने के कोई अभ्यास यहां नहीं है। वह शायद एक अलग तरह की प्रक्रिया  है। और वह प्राकृतिक चिकित्सा में आती भी है या नहीं, इसमें संदेह है। दूसरा, यह कि जिन चीजों का हम अपने लेखन में, साहित्य में विरोध करते हैं या जिन चीजों पर प्रश्न उठाते हैं या पसंद नहीं करते, संस्थान में उन चीजों को छोड़ने का अभ्यास व्यावहारिक रूप से कराया जाता है। मतलब यह कि यहां एक तरह से विचार और कर्म का सामंजस्य करने का अवसर मिलता है। इसे केवल पर्यटन की दृष्टि से घूमना या अपने रोगों का इलाज करने के लिए किसी पद्धति को अपनाना ही नहीं कहा जाएगा। बल्कि अपनी जीवन शैली को समरस करने का एक  सुअवसर भी कहा जाएगा।

Tuesday, August 30, 2022

रमेश कुंतल मेघ की चिट्ठियां

 

मेघ जी अपने छात्रों के साथ:
बाएं से-जगदीश मिन्हास, सुमनिका सेठी, मेघ जी, नीलम मित्तू, राकेश वत्स
 

जब मुझे गुरु नानक देव विश्वविद्यालय में एम. फिल. में दाखिला मिला तब रमेश कुंतल मेघ वहां हिन्दी विभागाध्यक्ष थेा। धर्मशाला कालेज से एम. ए. करने के बाद अपने प्रदेश के विश्वविद्यालय शिमला नहीं गया, बल्कि अमृतसर गया। सबसे बड़ी वजह रमेश कुंतल मेघ ही थे। दूसरे, हमारे कालेज के प्राघ्यापक ओम अवस्थी धर्मशाला कालेज छोड़कर मेघ जी के पास आ गए थे। कालेज में ओम अवस्थी जी से अपार स्नेह मिला था। अमृतसर आकर मेघ जी से भी बहुत अपनापन मिला। हालांकि उनकी विद्वता का आतंक भी कम न था। उनका स्नेह आज तक मिल रहा है। मेरे पास उनकी कुछ चिट्ठियां हैं। जब बनास जन का मेघ अंक तैयार होने लगा तो वे चिट्ठियां बाहर निकलीं। मैं मुंबई में आकाशवाणी में 1983 में आ गया था। और पहली चिट्ठी 1986 की है। अभी यहां दो चिट्ठियां दे रहा हूं। 


9-8-1986

डॉ. रमेश कुंतल मेघ    

प्रोफेसर – अध्यक्ष

ए-5, यूनिवर्सिटी कैंपस, अमृतसर – 143005                                                                             

प्रियवर,

‘‘मधुमती’’ (उदयपुर) के ताजे अगस्त 1986 के अंक में तुम्हारी नास्टेलजिक किंतु प्यारी कविता पढ़कर खुशी हुई। यूं भी अब लेखन की समझदारी तथा साहित्यिकता के सरोकार से दिन-ब-दिन गुत्थमगुत्था होते जा रहे हैं – जो कि अच्छा शकुन है।

            यहां यूजीसी की दक्षता-व-प्रोन्नति वाली संयोजना के अंतर्गत मई माह में दो लेक्चरर (डॉ. हरमोहन लाल सूद तथा डा. विनोद तनेजा) रीडर हो गए हैं तथा एक रीडर प्रोफेसर हो गया है। प्रोफेसरों के बीच चक्रमण-प्रणाली (रोटेशन सिस्टम) पहले से ही लागू थी। अत: अब डॉ. पांडेय शशि भूषण प्रसाद श्रीवास्तव शीतांशु प्रोफेसर-और-अध्यक्ष हो गए हैं छै जून से (वे तीन वर्ष तक अर्थात पांच जून 1989 तक इस पदभार को वजनी बनाए रखेंगे। ... जगदीश सिंह मन्हास ... आजकल सुदक्ष बेरोजगारों की कतार में खड़ा है। उधर श्री राकेश वत्स छात्रवृत्ति छोड़कर जनवरी-फरवरी में ही चले गए। वे कहां हैं, क्या कर रहे हैं, कैसे बसर कर रहे हैं – कुछ पता नहीं है। संभवत: यदि तुमसे उनका पत्राचार हो तो उन्हें प्रेरित करो – शोध पूरा करने के लिए : तथा संभव हो तो अपने आसपास कहीं कोई समुचित काम दिलवा दो।

            यहां अवस्थी जी ठीक हैं। उम्र ऐसी है हम सभी की, कि कुछ लाभों के लिए समझौतों का बीमा (LIC) भी गुपचुप करते चलते हैं। घर में सब ठीक ठाक है।

पत्रोत्तर तो दोगे ही, शायद।

नीलम शर्मा इसी माह अपनी थीसिस जमा कर सकेंगी, ऐसा विश्वास है।

शुभाकांक्षी

तुम्हारा –

रमेश कुंतल मेघ (हस्ताक्षर)

पुनश्च: अप्रैल के अंत में मैं महाराष्ट्र जनवादी लेखक संघ के अधिवेशन में शामिल होने दो दिन के लिए बंबई आया था। दूरी और व्यस्तता के कारण तुमसे भेंट नहीं कर सका।    

 

12/09/1988

प्रिय अनूप,

आपका कार्ड पत्र मिला था। जिन संस्कृतियों में ज्ञानधारा प्रवहमान नहीं होती अर्थात् जहाँ निरंतर संवाद और अनवरत पोलेमिक्स के बजाय विद्वानों तथा कलाकारों को ईर्ष्या और घृणा लोभ के साँप डँसते हैं वहां विचारों का इतिहास नहीं लिखा जा सकता। हिन्दी साहित्य के आधुनिक संदर्भ ऐसे ही हैं।

आप तो बंबई में ऐसे रमे हैं कि धर्मशाला आते-जाते होंगे किंतु सालों से अमृतसर की ओर मुँह उठाकर कभी नहीं झाँका। एकाध बार इधर भी आ जाएँ। आपको हम कभी नहीं भूल सकेंगे। आपकी स्थायी छाप हमारे हृदय-पटल पर रहेगी। इसे अतिशयोक्ति न मानें।

राकेश वत्स दिल्ली में इंदिरा गांधी खुले वि. वि. में आ गए हैं। अब उन्हें मन की जगह तथा मन का काम मिल गया है।

जगदीश सिंह मन्हास अंडमान के गवर्नमेंट कॉलेज में लेक्चरर होकर 1986 में चले गए थे। अब दिसंबर 1988 में शादी करवा रहे हैं। सुमनिका का काम चल रहा है।

डॉ. अवस्थी ठीक हैं। शुभ्रा ने M.B.A. का कोर्स ले लिया है, अमित हमीरपुर के गवर्नमेंट कॉलेज में नियुक्त हैं (अवस्थी जी की पुत्री और पुत्र)।

शेष मिलने पर।

पत्रोत्तर देंगे।

आपका

रमेश कुंतल मेघ (हस्ताक्षर)         

Sunday, July 17, 2022

रमेश कुंतल मेघ की भाषा और उनका भाषा-विषयक चिंतन : कुछ नोट्स

 

मेघजी के साथ सुमनिका - मुंबई की एलिफेंटा गुफाओं से लौटकर जेट्टी के पास 


रमेश कुंतल मेघ की भाषा और भाषा-विषयक चिंतन : कुछ नोट्स

आप जानते ही हैं कि रमेश कुंतल मेघ के समग्र कार्य पर बनास जन का विशेष अंक प्रदीप सक्सेना के संपादन में फरवरी 2022 में प्रकाशित हुआ। मेघ जी की भाषा पर लंबे समय से टीका-टिप्पणी होती रही है। मैंने उनकी भाषा और भाषा के बारे में उनके विचारों पर एक लेख इस अंक के लिए लिखा था। वह लेख यहां आपके लिए पेश है।

 

यह रमेश कुंतल मेघ की भाषा, भाषा के उनके ट्रीटमेंट, साहित्य और अन्य कलाओं के आस्वाद एवं विश्लेषण के लिए वांछित भाषा; हमारी साहित्यिक विरासत में भाषा चिंतन के उनके आकलन का कोई सुचिंतित या शोधपरक विश्लेषण या व्याख्या नहीं है। यहां उस दिशा में आगे अध्ययन करने की दृष्टि से बुनियादी तौर पर नजर डालने की कोशिश की गई है।

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रमेश कुंतल मेघ की भाषा के प्रति साहित्य-समाज में प्रचलित धारणाएं उनकी भाषा को दुरूह की श्रेणी में धकेल देती हैं। दुरूह होने के कारण मेघ जी के लिखे को अपठनीय मान लिया जाता है। इसलिए त्याज्य। जैसे कि विष्णु खरे ने एक बार वयक्तिगत बातचीत में मेघ जी का जिक्र आते ही शुचिता ग्रंथि से ग्रसित ब्राह्मण की तरह दुत्कारते हुए कहा कि अरे! अरे! किसका नाम ले लिया। उनको तो पढ़ना ही ...। इसी तरह राजेंद्र यादव ने हंस में लेख छापने से इसलिए मना कर दिया क्योंकि पत्र में मेघ जी का छात्र होने का जिक्र कर दिया था। (इस प्रसंग का जिक्र इसी अंक में शामिल एक बातचीत में है)। मेघ जी को भी कठिन भाषा के प्रेत जैसी श्रेणी में रखा जाता है।

सोचने की बात है कि ऐसे अछूत किस्म के वर्गीकरण कर देने की वजह सिर्फ भाषा है या उनके विषयों का आलोचना के प्रचलित ढांचे से भिन्न होना है। या उनकी लेखन शैली और विश्लेषण पद्धति इसके मूल में है, जो हिन्दी के वृत्तांत प्रेमी वितान और फेनिल भाषा के मोह में बंधे प्रबुद्धपाठक को अनजानी और अबूझ लगती है।

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अपनी भाषा का मजाक उड़ाए जाने के प्रति मेघ जी सजग थे। वे उसे खिलंदड़े भाव से ही लेते हैं। सन 2012 में हमने उनसे हुई बातचीत में यह सवाल पूछा था। उन्होंने समाज विज्ञानों और पारिभाषिकों का जिक्र करने के साथ-साथ यह भी कहा,

‘‘हमारे गंगा प्रसाद विमल ने भी हमारा भट्ठा बिठाया है। एक चुटकुला मेरे बारे में बताया कि हजारी प्रसाद द्विवेदी ने गंगा प्रसाद विमल से कहा कि विमल कुंतल की किताब आई है जरा इसका हिंदी अनुवाद तो करके हमें पढ़ा दो। (समवेत ठहाका) यह मुहावरा बड़ा चल गया। लेकिन कहते हैं न कि पहला बच्चा मां को बहुत प्यारा होता है तो विमल हमारे बड़े प्रिय हैं।’’ (यह बातचीत इसी अंक में है)

इसी तरह पल प्रतिपल के सितंबर-दिसंबर 2004 अंक में प्रकाशित अपने आत्मकथ्य में डॉ मेघ ने लिखा है, ‘‘हिन्दी की विशुद्धतावादी चौकड़ियों में गुपचुप गुमसुम मुझे दुरूह, विशृंखल, कन्फ्यूज्ड, असम्प्रेष्य आदि घोषित करके खारिज किया जाता रहा है, आज तक।’’[i]  उन्होंने गंगाप्रसाद विमल के फैलाए एक और चुटकुले का भी जिक्र किया है, ‘‘जब प्रेस में कम्पोजीटर मटरगश्ती या टालमटोल करते थे तो मैनेजर उन्हें डराते हुए यह कह कर सही रास्ते पर लाता था कि कुंतल मेघ की पांडलिपि कम्पोज करने को दे देंगे, तो सही हो जाओगे।’’[ii] मेघ इस तरह से मजाक उड़ाए जाने या खारिज किए जाने से विचलित नहीं होते, ‘‘किंतु मैं भाषा-चक्र में पुच्छल तारे की तरह बढ़ता चला आया। मैं अपने भावी संदर्भ को कतई धु्ंधला या भटका हुआ नहीं करना चाहता हूं।’’[iii] स्वीकार अस्वीकार से परे उन्होंने अपने काम से मतलब रखा। उनका कहना है, ‘‘विज्ञान के स्नातक के नाते मुझे तार्किकता का अच्छा अभ्यास रहा है जिससे मेरी भाषा समीकरण सूत्रों-तर्क चक्रों जैसी होती चली है। प्रकारांतर से मैं शनै:शनै: मार्क्सवादी व्यापकता तथा सांस्कृतिक प्रतिबद्धता के कारण सभी समाज विज्ञानों के सटीक-सुनिश्चित पारिभाषिकों का भरपूर इस्तेमाल करने लगा ताकि साहित्य में आलोचना’, ‘कुएं के मेंढ़क के दर्जे’, अथवा बैलगाड़ी के नीचे लटकी लालटेन के पीछे चलने वाले कुत्तेकी अपेक्षा ज्ञानार्जुन के रथ की पार्थसारथी हो जाए।’’[iv]

यहां मेघ जी की भाषा को समझने के दो सूत्र मिलते हैं। वे बखानवर्णन, वृत्तांत से भरे निबंधपरक लेखन के बजाए समीकरणों, सूत्रों, तर्कों का सहारा लेते हैं, जिससे उनकी भाषा वस्तुपरक और विश्लेषणधर्मी होती है। दूसरे, उन्होंने अपनी आलोचना में समाज विज्ञानों का सहारा लिया है। इसके लिए संबंधित विषय के पारिभाषिक का प्रयोग अनिवार्य है। हिन्दी साहित्य समाज प्राय: समाज विज्ञानों को पढ़ता नहीं है, जो लोग पढ़ते भी हैं, वे अंग्रेजी माध्यम में पढ़ते हैं। मेघ जी पारिभाषिकों का हिन्दी रूप बनाते हैं। प्राय: वे उसका अंग्रेजी रूप भी साथ दे देते हैं। फिर भी जो पाठक पारिभाषिक से परिचित नहीं होगा, उसे विषय ठीक से समझ नहीं आएगा और भाषा गरिष्ठ या दुरूह लगेगी। विनोद शाही मेघ जी के साथ बातचीत में कहते हैं, ‘‘आपके पास हमेशा एक वैज्ञानिक व्यवस्था या पद्धति आपके कार्य में मौजूद दिखाई देती रहती है। यह पद्धति इतनी नुमायां है कि ... इतना अनुशासन, इतनी बारीक भेद-कोटियां, इतने मामूली फर्कों को रेखांकित करते इतने सारे पारिभाषिक कि आपको मूलत: एक वैज्ञानिक कहना चाहिए। परंतु जितना और जैसा मैं समझ पाया हूं ... उससे लगता है कि आप मूलत: एक दार्शनिक हैं।’’[v] मेघ जी के ही शब्दों में, ‘‘इस प्रसंग में विनय करूं कि हमारे जैसों की भाषा एक ओर लटको-झटकों, ठुमकों-झुमकों वाली रसीली न होकर तार्किक सीढ़ियों तथा तारतम्यपरक संरचना से संयुक्त होती है तथा दूसरी ओर विभिन्न ज्ञानानुशासनों के शब्दभंडारों एवं पारिभाषिक कुलकों से मंडित। ... मुझे अपने लंबे अनुभव से यही संबोध हुआ है कि (अपनी) भाषा वाक्य-रचना-विन्यास के कारण कतई दुर्बोध नहीं होती, बल्कि शब्दावली तथा पारिभाषिकों के गुंफन से क्लिष्ट उपमानित होती है।’’[vi]  

सम्प्रेषण दुतरफा प्रक्रिया है। अगर लेखक को पाठक के स्तर तक उतरना पड़ता है तो पाठक को भी लेखक के स्तर तक उठने का प्रयास करना होता है। ‘‘अगर लेखक को भी सामान्य तथा मार्मिक पाठक के बोध स्तरों पर अवरोहण करना श्रेयस्कर है तो पाठक वर्ग को भी अपने लेखक या अन्य विषयों के प्रति अपना आरोहण करना वांछनीय है। यह दुतरफा, किंतु एकतान, धारावाहिक व्यापार है।’’[vii]

विनोद शाही से बातचीत में मेघ जी पारिभाषिकों के उदाहरण देकर समझाते भी हैं कि अंग्रेजी जैसी बारीकी हिन्दी में नहीं है। इसलिए शब्द बनाने ही पड़ेंगे। जैसे इफेक्ट’, ‘अफेक्ट’, ‘इन्फ्लुएंसके लिए प्रभावशब्द से काम नहीं चलता। जो लोग राजभाषा में अनुवाद कार्य और शब्दावली निर्माण कार्य से जुड़े हैं, वे हिन्दी अंग्रेजी की इस समस्या से बखूबी वाफिफ हैं। अंग्रेजों का उपनिवेश होने के कारण आज भी विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका का काम अंग्रेजी में चलता है। राजभाषा के कानून का पालन करने के लिए उसका अनुवाद किया जाता है। उच्च शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी है। वैज्ञानिक शब्दावली आयोग टकसाल की तरह अंग्रेजी के हिन्दी पर्याय बनाता है। चूंकि वे शब्द इस्तेमाल नहीं होते, उन पर रुरूह होने का लांछन लगा दिया जाता है। मेघ जी अपने पक्ष को इस तरह स्पष्ट करते हैं, ‘‘मेरी भाषा कठिन नहीं है, रुकावट पारिभाषिकों को लेकर ही है, मैं ऐसा मानता हूं। मैं एक ऐसी भाषा का इस्तेमाल करता हूं जो स्टैप बाई स्टैप चलती है – पाइथागोरस की थियोरम या थर्मोडायनैमिक्स की तरह। उसे समझना कठिन नहीं है। पर सामान्य हिन्दी पाठक अंग्रेजी पर्यायों को अलग-अलग जानता हुआ भी हिन्दी शब्दों को लेकर उलझ जाता है और दोष मेरे ऊपर आता है कि मेघ जी कनफ्यूज कर रहे हैं या हो हो गए हैं।’’[viii] पारिभाषिकों के निर्माण और शब्दकोशों के महत्व के बारे में मेघ जी कहते हैं, ‘‘बहुभाषी भारत में तो शब्दकोश समझदारी-साझेदारी के रामेश्वरम् सेतुबंध की तरह होते हैं। इनके द्वारा ही एक दूसरे की भाषा तथा संस्कृति की आपसी भागीदारी तो बढ़ती ही है, साथ-साथ अखिल भारतीय भाषिक संस्कृति के वैश्वकों (यूनिवर्सल्स) के निर्माण को भी प्रोत्साहन मिलता है।’’[ix]  

‘‘नए-नए ज्ञान-विज्ञानों को अर्जित करने के लिए हजारों-लाखों पारिभाषिक एवं तकनीकी शब्दों को गढ़ना लाज़िमी हो गया है। यही हमारी ऐतिहासिक तथा राष्ट्रीय प्रारब्ध है। केंद्र का विज्ञान और टेक्नालॉजी आयोग, विभिन्न राज्यों की ग्रंथ तथा भाषा अकादमियां तथा यूनिवर्सिटियों के शोध-संस्थान अपने-अपने स्तर पर यह काम कर रहे हैं।’’[x]  

‘‘पारिभाषिक शब्द की स्थिति विशिष्ट है। यह एक सचेत-सुनिश्चित-साधारणीकृत अभिव्यक्ति है। इसमें अर्थ का एसाइनमेंट किया जाता है। पारिभाषिक शब्द की केंद्रीय समस्या विभ्रांतिहीनता (अन-एंबिग्विटी) समानता (कामननेस) है।’’[xi]

भाषा लिपि के कारण दृश्य है, बोलने के कारण श्रव्य है। यह देश काल की एकता है। शब्दों के विशिष्ट अर्थ, ध्वनियां और व्याकरणिक प्रकार होते हैं। ‘‘इस तरह यह (शब्द) परिभाषा और प्रयोग, नियम और अभिव्यंजनाओं के चतुरंग पर भाषा-क्रीड़ा करता है। भाषा एक सामाजिक व्यवस्था के साथ-साथ शब्दों का विज्ञान भी है। अतएव शब्दकोश (लेक्सिकन) तथा शब्द-प्रयोग (लेक्सिकोग्राफी) समाज में विकास को भी प्रतिबिंबित-अनुचिंतित करते हैं। अत: कहा गया है कि सबसे पहले शब्द का द्रष्टा ऋषि होता है।’’[xii]

3

रमेश कुंतल मेघ यह भी मानते हैं कि, ‘‘साहित्य में रचनात्मकता और दर्शन-चिंतन दोनों शामिल होते हैं।’’ लेकिन हमारे यहां आलोचना में रचनाशीलता और दर्शन-चिंतन को वर्टिकल ढंग से अलग-अलग माना जाता है। वे चिंतनपरकलेखन को भी रचनात्मकताकी श्रेणी में रखते हैं।[xiii]

रमेश कुंतल मेघ अपने आलोचनात्मक लेखन में समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, वास्तुशास्त्र, मनोविज्ञान, नृविज्ञान, इतिहास, दर्शन, आदि अनुशासनों का अनुप्रयोग करते हैं। इसी क्रम में वे सौंदर्यबोधशास्त्र के अध्ययन की ओर बढ़ते हैं। वे भारतीय और पाश्चात्य ऐस्थैटिक्स को खोलते-खंगालते हुए अपने सौंदर्यबोध शास्त्र की रचना करते हैं। यह उनकी एक प्रदीर्घ परियोजना रही है। अथातो सौंदर्य जिज्ञासासन 1977 में छपी थी और साक्षी है सौंदर्य प्राश्निक सन 1980 में। उसके बाद मेघ जी अपने अध्ययन क्रम में देह भाषा और मिथकों की ओर बढ़ जाते हैं। मिथक अध्ययन में वे प्रागैतिहास में भी चले जाते हैं। कहने का अर्थ यह है कि उनके चिंतन-मनन, प्रेक्षण-लेखन का दायरा व्यापक और गहन होता गया है। वे एक दार्शनिक-चिंतक की तरह कृतिका अध्ययन-विश्लेषण करते हैं। एक साक्षात्कार में मेघ जी ने कहा है, ‘‘मैं जो पहले लिखता था वो दूसरा था, फिर मैंने साहित्य पर लिखा, फिर सौंदर्यबोध शास्त्र पर, मिथकों पर लिखा, फिर देह भाषा पर आ गया। मुझमें परिवर्तन आया और मेरे ज्ञान में भी परिवर्तन आया।[xiv]

4

भाषा का संधान करने के लिए मेघ जी ने भारतीय काव्य की शास्त्रीय परंपरा में गहरी डुबकी लगाई है। कलाशास्त्र का अध्ययन करते हुए वे पाणिनी, भरत, भट्टलोल्लट, कुंतक, दंडी आदि आचार्यों से होकर महाकलाभाषाकी संकल्पना की ओर बढ़ते हैं। ‘‘हमारा बोध आधुनिक है, हमारी यथार्थता आध्यात्मिक नहीं है, हमारी रुचियां तथा मनोविज्ञान कुलीनता तथा संविद्विश्रांति पर आश्रित न होकर द्वंद्व और संघर्ष पर आश्रित हैं। अत: हमारा भावलोक बदल गया है जिससे हमारी आधुनिक भाषा के सौंदर्यतात्विक गुण भी भिन्न होंगे।[xv]

रमेश कुंतल मेघ दैनिक व्यवहार, जमीनी हकीकत तथा सामान्य सम्प्रेषण की सरल भाषा के बरक्स समृद्ध भाषाकी अपनी धारणा स्पष्ट करते हैं। उनके मुताबिक समृद्ध भाषा में नवीनता, विविधता, बहुलता होगी तो उसमें शास्त्रीयता और क्लिष्टता की भी संभावना है। ऐसा शुरु शुरु में होता है। धीरे-धीरे जैसे-जैसे समाज भाषिकी (सोशियोलिंग्विस्ट) दबाव बढ़ते जाते हैं, बहुआयामी ज्ञान सामाजिक शक्ति बन जाता है। तब शब्द कर्मवाची और अर्थ व्यवहारी होते जाते हैं। राहुल सांकृत्यायन ने दर्शन-दिग्दर्शन, वासुदेव शरण अग्रवाल ने भाषिकी-नृतत्व (लिंग्विस्ट एंथ्रोपोलोजी) तथा कलाओं, आचार्य शुक्ल ने रसऔर लोकको शामिल किया। नए-नए अनुशासनों के शामिल होने पर हमेशा ही हलचल, उथल-पुथल, प्रेषणीयता का संकट, व्याकरण का अतिक्रमण, ज्ञानानुशासनों का घालमेल या घपला प्रतीत होता है। ... समृद्ध भाषा मानव समूह, समाज तथा संस्कृति के उन्नयन एवं प्रगति का भी मानदंड हो जाती है।[xvi]            

भाषा को समकालीन बनाना ही होगा। विभिन्न अनुशासनों के शब्दों के समन्वय से ही ऐसा हो पाएगा। सूचना प्रौद्योगिकी, प्रबंधन, इंजीनियरी, डाक्टरी, तथा समाज विज्ञानों की दूरियां पाटनी होंगी। शब्द भंडार व्यापक करना ही होगा।

इसके बरक्स मानविकी तथा कला शास्त्रों में समृद्ध भाषा की कसौटी भावानुभूति तथा शोभाकारिता की होती है। जैसे सृष्टि, समाज, मानव, सभी कुछ त्रिआयामी है। समृद्ध भाषा भी बहुआयामी है। ‘‘अत: आज समृद्ध भाषा को मानविकी, साहित्य एवं कलाओं के साथ-साथ तथा आगे-आगे चिंतन, दर्शन, विचारधारा, अनेकानेक समाजविज्ञानों के अनुशासनों से अवश्यंभावी संयुक्त होना ही होगा।[xvii]    

5

मेघ जी सौंदर्यबोधशास्त्र की सैद्धांतिकी बनाने में बरसों लगे रहे हैं। इसकी बहुआयामी और सम्यक भाषा की खोज में वे प्रागैतिहास में जाते हैं, शैलचित्रों को समझने की कोशिश करते हैं। भाषा के संदर्भ में मरुतोंके मिथ को खोलते हैं। काव्यपुरुष, चित्रपुरुष, और काव्यरमणी जैसे रूपकों की व्याख्या करते हैं। पाणिनी से वाचिक भाषा और भरत से अवाचिक भाषा (दृश्य श्रव्य) की कुंजियां हासिल करते हैं। ‘‘हम नानाविध भाषा की प्रज्ञा के नव-नवीन अंगों की वैभवशाली राशि का साक्षात्कार करते हैं जो शब्द-बिंब, रेखा-रंग, सुर-ताल, रस-राग, मुद्रा-भंगिमा आदि की महाप्रभूत इकाइयों का नानाविध साहित्य तथा सौंदर्यबोधशास्त्र गढ़ती हैं।’’[xviii] वाचिक या व्याकरणिक भाषा देश, काल, समाज अनुसार बदलती रहती है।

गणित, भौतिकी, रसायनशास्त्र, अलजब्रा, कंप्यूटर साइंस आदि में संकेत, सारणी, आकृतिमूलक भाषा का पर्याप्त प्रयोग होता है। नृत्य, संगीत, अभिनय में अवाच्य सम्प्रेषण भी होता है। चित्रकला में रंग और रेखाएं, स्पेस और संयोजन बोलता है। अत: भाषा की सरलता की मांग उन्नत समाजों का लक्षण नहीं है।

रमेश कुंतल मेघ मानते हैं कि जब दो कलाओं (भाषिक कला – काव्य एवं नाटक या काव्य और चित्रकला या  चित्रकला और संगीत) को मिलाते हैं तो सौंदर्यबोध की स्थिति उत्पन्न होती है। अत: इसकी मूल प्रकृति तुलनात्मक है। इसके आस्वाद और अन्वेषण के लिए नेत्र, कर्ण (पढ़ना देखना, सुनना), ही नहीं, नासिका (सूंघना), जिह्वा (स्वाद), त्वचा (स्पर्श) की भी भूमिका होती है। भाव एवं दर्शन, संरचना एवं पद्धति, सौंदर्य एवं कला, अभिरुचि एवं अनुभव भी इसमें समाहित रहते हैं। इसमें काव्यशास्त्र, साहित्यशास्त्र और कलाशास्त्र का समावेश है। ‘‘सौंदर्यबोधशास्त्र, और उसकी विलक्षण भाषा के बिना हममें सौंदर्यसांस्कृतिक बोध, दार्शनिक दृष्टिकोण तथा आधुनिक कला-साहित्य-संस्कार ही विकसित नहीं हो सकता।’’[xix]

मेघ जी ने सौंदर्यबोधशास्त्र की भाषा का व्याकरण बड़े तार्किक ढंग से बनाया है। इसमें कलाकार, अभिव्यक्ति और आशंसक की क्रियाओं-प्रक्रियाओं-प्रतिक्रियाओं के कई पर्म्युटेशन और कम्बीनेशन बनाए हैं। इनमें रचना-प्रक्रिया, सम्प्रेषण, आशंसा, इतिहास, दर्शन, वस्तुतत्व, रूपतत्व जैसे सभी कलातत्व आ जाते हैं।[xx]

6


मेघ जी अपनी आलोचना में वाचिक भाषा के अलावा अवाचिक भाषा जैसे रेखाचित्रों, सारणियों, आरेखों, छायाचित्रों का भी
प्रयोग करते हैं। इसके पीछे उनकी तार्किक, मैथॅाडिकल कार्यपद्धति काम करती है। चित्रकला या शिल्पकला के सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन में तो जाहिर है चित्र का प्रयोग होगा हीलेकिन कला भाषा की सैद्धांतिक व्याख्या भी उन्होंने सारणियों और आरेखों के जरिए की है। इसके अलावा साहित्यिक कृतियों की समीक्षा-आलोचना में भी वे अपनी बात आरेखों के माध्यम से स्पष्ट करते हैं। जैसे हजारीप्रसाद द्विवेदी के बाणभट्ट की आत्मकथाका संरचनात्मक (स्ट्रक्चरल) विश्लेषण करते हुए वे नियति तत्व के छह चरणों का भूगोल के अक्ष में एक आरेख बनाते हैं, फिर उसकी व्याख्या करते हैं।[xxi] इसी उपन्यास के पात्रों की भौगोलिक यात्राओं को स्पष्ट करने के लिए नक्शे का चित्र देते हैं। वृंदावन लाल वर्मा के उपन्यास मृगनयनीमें तो कई पाई चार्ट और आरेख बनाए गए हैं। समृद्ध भाषा नामक लेख में भी छायाआकृति (सिलुऐट silhouette) दी गई है जिसमें एक नारी एक ऊंचे पाएदान से छलांग लगाने को उद्धत है। दोनों बाहें मानो उड़ान भरने के लिए पंखों की तरह फैली हुई हैं।  एड़ियां उचकी हुई हैं। धड़ आगे को झुका है। समूची देह छलांग लगा देने के तनाव और उत्तेजना से अकड़ी हुई है। इस चित्र का शीर्षक है – समृद्ध भाषिक अंतर्उद्वेल। समृद्ध भाषा के अपने तर्क को पुष्ट करने के लिए, उसे अंगीकार करने का आह्वान करने के लिए यह शब्दातीत उद्बोधन है। अवाचिक भाषा का ऐसा अनूठा प्रयोग रमेश कुंतल मेघ ही कर सकते हैं। 

7

यहां मेघ जी की भाषा में बेमालूम ढंग से अवतरित होने वाले पंजाबी भाषा के कतिपय शब्दों का उदाहरण देने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूं। सोणा अते निक्का इतिहास’, ‘सुतरां’, ‘होंद’, ‘प्रकटावा’, ‘मिलवर्तन’, ‘उसारा

अब निर्मल वर्मा के वे दिनकी भाषा पर मेघ जी की भाषा का एक उद्धरण-

‘‘यह भाषा – सहसा जुगनू सी चमक उठती है, नदी सी गहरी और अंधेरी हो जाती है, रायना के मफलर सी फहराती-उमड़ती चपल हो जाती है और अंतिम क्षणों में आकर स्वयं एक सहचरी बन जाती है। इस उपन्यास में भाषा न तो केवल माध्यम है, न ही केवल सांस्कृतिक उद्दीपन, बल्कि भाषा पात्रों का ही मन है, भाषा शहर की सांस है और भाषा स्वयं एक अदृश्य और सर्वप्रिय पात्र है। भाषा एक नई पहचान है। वह भाषा ही है जो रायना के इर्द-गिर्द एक ओर प्राग का सांस्कृतिक भूगोल और प्राकृतिक लैंडस्केप घुमाती है तो दूसरी ओर भावलोक में मरी युवती रायना के इर्द-गिर्द सारा काव्यपरिक्रमा करता है और रायना अतीत के युद्ध तथा मृत्यु की अंधेरी और गहरी घाटी में छटपटाती है – डार्क एंड डीप।’’[xxii]       

















































[i]  आत्मकथ्य, रमेश कुतल मेघ, पल प्रतिपल, वर्ष 19 अंक 69-70, सितंबर-दिसंबर 2004, चंडीगढ़ (संपादक : देश निर्मोही), पृष्ठ 23    

[ii]  उपरोक्त पृष्ठ 23     

[iii] उपरोक्त पृष्ठ 23     

[iv] उपरोक्त पृष्ठ 22-23     

[v] रमेश कुतल मेघ से विनोद शाही की बातचीत, पल प्रतिपल, वर्ष 19 अंक 69-70, सितंबर-दिसंबर 2004, चंडीगढ़ (संपादक : देश निर्मोही), पृष्ठ 31

[vi] वाक्भाष-प्रोटो भाषा-देह भाषा, समाज-संस्कृति तथा समाज-विज्ञान से समेकित साहित्य, रमेश कुतल मेघ, अमन प्रकाशन, कानपुर, 2016, पृष्ठ 15

[vii] समृद्ध भाषा, आपकी खातिर मुनासिब कार्यवाहियां, रमेश कुंतल मेघ, अमन प्रकाशन, कानपुर, 2018, पृष्ठ 163

[viii] रमेश कुतल मेघ से विनोद शाही की बातचीत, पल प्रतिपल, वर्ष 19 अंक 69-70, सितंबर-दिसंबर 2004, चंडीगढ़ (संपादक : देश निर्मोही), पृष्ठ 32

[ix] लेक्सिकन और कोशकारी, समाज-संस्कृति तथा समाज-विज्ञान से समेकित साहित्य, रमेश कुतल मेघ, अमन प्रकाशन, कानपुर, 2016, पृष्ठ 23

[x] शब्द-व्यवहार, समाज-संस्कृति तथा समाज-विज्ञान से समेकित साहित्य, रमेश कुतल मेघ, अमन प्रकाशन, कानपुर, 2016, पृष्ठ 26

[xi] उपरोक्त, पृष्ठ 28-29

[xii] उपरोक्त, पृष्ठ 28

[xiii] रमेश कुतल मेघ से विनोद शाही की बातचीत, पल प्रतिपल, वर्ष 19 अंक 69-70, सितंबर-दिसंबर 2004, चंडीगढ़ (संपादक : देश निर्मोही), पृष्ठ 29

[xiv] लक्ष्मण यादव द्वारा साक्षात्कार, समाज-संस्कृति तथा समाज-विज्ञान से समेकित साहित्य, रमेश कुतल मेघ, अमन प्रकाशन, कानपुर, 2016, पृष्ठ 76

[xv] रसवस्तु तथा उक्तिरूपों की डायलैक्टिक्स और विचारदर्शन, कलाशास्त्र और मध्यकालीन भाषिकी-क्रांतियां, रमेश कुंतल मेघ, गुरुनानक यूनिवर्सिटी, अमृतसर, 1975, पृष्ठ 11

[xvi] समृद्ध भाषा, समाज-संस्कृति तथा समाज-विज्ञान से समेकित साहित्य, रमेश कुतल मेघ, अमन प्रकाशन, कानपुर, 2016, पृष्ठ 36

[xvii] उपरोक्त, पृष्ठ 38

[xviii] वाक् और मरुत:भाषा के प्रति एक अव्याकरणिक संधान, हमारा लक्ष्य लाने हैं लीलाकमल, रमेश कुंतल मेघ, किताबघर प्रकाशन, दिल्ली, 2013, पृष्ठ 16

[xix] सौंदर्यबोधशास्त्र और उसकी भाषा, आपकी खातिर मुनासिब कार्यवाहियां, रमेश कुंतल मेघ, अमन प्रकाशन, कानपुर, 2018, पृष्ठ 167

[xx] उपरोक्त, ,ष्ठ 166 से 174

[xxi] प्रतीकवाद और संरचनावाद:बाणभट्ट की आत्मकथाका संरचनात्मक विश्लेषण, क्योंकि समय एक शब्द है, रमेश कुंतल मेघ, लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज, 2020, पृष्ठ 196

[xxii] वे दिन, क्योंकि समय एक शब्द है, रमेश कुंतल मेघ, लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज, 2020, पृष्ठ 307