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Friday, September 10, 2021

कहानी फिल्म और याद


 सन 2020 के मई महीने में भी कोरोना की दूसरी लहर का कहर जारी था। हमारा परिवार अप्रैल में इसकी चपेट में आ चुका था और धीरे धीरे उससे उबर रहा था। किसी काम में मन लगता नहीं था। 4 मई को फेसबुक पर मैंने कथाकार एस आर हरनोट की पोस्ट देखी और उनकी एक कहानी में उलझ गया। उसी दिन प्रिय कथाकार चित्रकार प्रभु जोशी को कोरोना ने लील लिया। उस दिन का जिक्र मैंने 5 मई को अपनी डायरी में किया।  

कल फेसबुक पर एसआर हरनोट ने अपनी एक कहानी 'लाल होता दरख़्त' का जिक्र करते हुए देवकन्या ठाकुर द्वारा उस पर बनाई फिल्म का लिंक दिया था। आधे घंटे की यह फिल्म यूट्यूब पर मैंने देखी। फिर हरनोट की कहानी भी पढ़ी। दोनों माध्यमों में कहानी को देखना पढ़ना अलग-अलग अनुभव रहे। यह मैंने ऐसे समय में किया जब साथ ही प्रभु जोशी के निधन की खबर फेसबुक पर आग की तरह फैल चुकी थी। महामारी के दुष्काल में रोज ऐसी ही खबरें आ रही हैं। संवेदना सुन्न सी हो गई है। जिन साहित्यकारों से परिचय रहा है या जिनसे मिलना जुलना रहा है, उनके जाने की खबरें ज्यादा आघात पहुंचाती हैं। लेकिन विवशता है कि कर कुछ नहीं सकते। उल्टे खुद को बचाए रखने की जद्दोजहद सी चली रहती है। रोजमर्रा के काम भी चलते रहते हैं। भीतर कुछ टीसता भी रहता है। तरह तरह से खुद को अवसाद, दुख, जड़ता से बचाने के खेल भी करते रहने पड़ते हैं। 

इसलिए कल जब हरनोट जी की कहानी देखी और फिर पढ़ी तो प्रभु जोशी साथ-साथ थे। उनसे हुई मुलाकातें, उनका बोलना, उनकी अदाएं, उनकी हंसी, बार-बार दिख रही थी। हम लोग तो आकाशवाणी के कुनबे के भी रहे हैं। वह भी एक तार था जो जोड़े रहता था। हरनोट की कहानी 'लाल होता दरख़्त' पर पहले फिल्म देखी। अपनी बोली के लहजे के बलाघात के साथ बोली जाने वाली हिंदी ने ध्यान खींचा। पहाड़ी दृश्यावलियों की ताजगी भरी हरियाली भी आकर्षक है। ग्रामीण इलाका, घरों और मंदिर का वास्तु शिल्प, पहरावा, जीवन शैली, फिल्म को प्रामाणिक बनाती है। हरनोट अपनी कहानियों के माध्यम से स्थानीय लोक जीवन की विषमताओं को उभारने वाले कथाकार हैं। विशेष मकसद लेकर भी चलते हैं कि समस्या का समाधान करना है। और उसी योजना के तहत अंत तक पहुंचते हैं। इस कहानी में तुलसी और पीपल के विवाह की परंपरा को निभाने का दबाव मुख्य किरदार मथरू पर है। तुलसी के विवाह के लिए वह अपने खेत को गिरवी रख चुका है। अब बेटी और पीपल के विवाह के लिए बाकी जमीन को भी गिरवी रख देगा। पंडित होने के कारण अपनी जमीन में उग आए पीपल का विवाह करने की परंपरा को निभाने या ढोने का दबाव उसके ऊपर है।  

तुलसी के विवाह के लिए वह अपने खेत को गिरवी रख चुका है। अब बेटी और पीपल के विवाह (जिसे वह करना ही चाहता है) के लिए बाकी जमीन को भी गिरवी रख देगा। यह समझ नहीं आया कि वह पुश्तैनी ही सही, पर पुरोहिती कैसे करता है? क्योंकि वह निरक्षर है, जमीन के कागजों पर वह अंगूठा ही लगाएगा। वह जंत्री कैसे पढ़ता होगा? तो क्या वह वाचिक परंपरा का पुरोहित है? लेकिन क्या यह परंपरा अब जीवित है? कहानी में बताया गया है कि वह मजदूरी भी कर लेता है पर फिल्म के किरदार को देखकर नहीं लगता कि कलाकार की देह को मजदूरी का अथ्यास है। बरहाल! बेटी जमीन को गिरवी नहीं रखने देना चाहती है इसलिए थोड़ी कश्मकश के बाद सुबह-सुबह शादी का जोड़ा पहन कर पीपल से खुद ही शादी कर लेती है। यानी पीपल के पत्ते पर से सिंदूर डालकर अपनी मांग भर लेती है। यह समाधान हमें वास्तविक जीवन में कहीं नहीं ले जाता। शादी के प्रपंच और रूढ़ियों के सांकेतिक विरोध के संकेत जरूर देता है। साथ ही जिस तरह से इस प्रसंग का फिल्मांकन किया गया है वह लोक कथा की तरह लगता है और काव्यात्मक हो उठता है। शायद यह फिल्म माध्यम की ताकत है। फिल्म में लोकगीतों का भी सरस और सार्थक प्रयोग है। 

यह कहानी मैंने पहले भी पढ़ी थी, कल फिर पढ़ी तो नए सिरे से पढ़ने जैसा ही हुआ। पढ़ते समय देखी हुई फिल्म के दृश्य भी भीतर घुमड़ रहे थे और प्रभु जोशी तो विद्यमान थे ही। वे तो आज यह डायरी लिखते समय भी उपस्थित हैं।  कहानी पढ़कर लगा कि कहानी में बारीकी ज्यादा है। वर्णन में चरित्र ज्यादा खुलते हैं। मुख्य पात्र मथरू का द्वंद्व और बेटी की उहापोह विस्तार से प्रकट होती है। फिल्म में यह एक घटना सी बन कर रह जाती है। फिल्म की प्रमाणिकता की अलग खूबियां हैं लेकिन जो बारीकी हरनोट जी ने कहानी लिखने में बरती है, वह व्यक्ति के भीतर के रेशों को ज्यादा खोलती है। 'दारोश और अन्य कहानियां' संग्रह में यह कहानी का संशोधित रूप है। हरनोट जी ने 1986 में लिखी इस कहानी को यहां दोबारा लिखा है। हो सकता है देवकन्या जी ने पुरानी कहानी के आधार पर फिल्म बनाई हो इसलिए उसमें सपाटता ज्यादा दिखती है। यह मेरा निजी मत है। हर दर्शक फिल्म को अपनी तरह से देखेगा। 

देख रहे हैं प्रभु जोशी! आप भाषा के महीन कारीगर थे। बोलियों के माहिर और रंगों-रेखाओं के मास्टर। आपने जिस दिन शरीर छोड़ा या इस महामारी के वक्त में चरमराई हुई व्यवस्था ने आपको शरीर छोड़ने पर मजबूर कर दिया, उस दिन आपको याद करते हुए मैंने कहानी के एक और शिल्पी की कहानी दो माध्यमों में देखी। जैसे आपके कई माध्यम थे - शब्द, रंग, रेखाएं, रेडियो, टेलीविजन, और सबसे बड़ा अपनेपन से लबालब भरा आपका प्यारा व्यक्तित्व। मैं आपके जाने के शोक में डूबूं या आपके होने को महसूस करूं!

देवकन्या ठाकुर की फिल्म : लााल होता दरख्त  

दिव्य हिमाचल 29 अगस्त 2021


Saturday, April 17, 2021

गहरे धूसर रंगों वाली फिल्म

 


मनोज वाजपेयी हमारे समय के एक सशक्त अभिनेता हैं। उन्हें हाल ही में भोंसले फिल्म के लिए सर्वज्ञेष्ठ अभिनेता चुना गया है। इस फिल्म में उनका अभिनय ही नहीं, पूरी फिल्म ही सोचने के लिए भरपूर सामग्री देती है।  


दो तीन सिटिंग में सोनी लिव पर ‘भोंसले' फिल्म देखी। इंटरनेट पर ओटीटी का फायदा यह है कि आप अपनी सुविधा से फिल्म आदि देख सकते हैं। भोंसले बड़ी कठिन फिल्म है। मनोज वाजपेई की ही फिल्म है यानी मनोज कॉन्स्टेबल भोंसले की मुख्य भूमिका में हैं और शायद सह निर्माता भी हैं।

कॉन्स्टेबल भोंसले के सेवानिवृत्त होने की शाम से फिल्म शुरू होती है, गणपति उत्सव तक चलती है। मराठी मानुस की राजनीति से बजबजाती हुई फिल्म। हिंदी बनाम मराठी समाज की शरारती राजनीति पर भोंसले फिल्म मारक नैतिक प्रहार करती है।

भोंसले बहुत ही चुप्पा, अकेला, एकांतवासी, अपने में खोया हुआ, अपनी नौकरी की एक्सटेंशन चाहने वाला गंभीर व्यक्ति है।

भोंसले की चॉल (जो हमारे समाज की तरह जर्जर, जाले लगी और चौहद्दी में बंद है) में रहने वाली हिंदी भाषी पड़ोसन लड़की बीमारी में उसकी मदद करती है। अपने घर से हजारों मील दूर अपने पैरों पर नर्स बनकर खड़ी यह लड़की उसी चॉल के एक वाचाल और महत्वाकांक्षी युवक, जो मराठी मानुस के नाम पर राजनीति करने की चालें चलता रहता है, की शिकार हो जाती है। भोंसले इस लड़की के साथ हुए जुर्म का बदला लेने के लिए अपराधी को पीट-पीटकर मार देता है, खुद भी हृदयाघात से मर जाता है। फिल्म की ये घटनाएं विचलित करती हैं। फिल्म चॉल के इर्द-गिर्द ही घटित होती है।

तकरीबन सभी दृश्य रात के हैं या अंधेरे के हैं या रात में रोशनियों के बीच हैं। अगर कहीं दिन या सुबह है भी तो वह भी धूसर और उदास है। भोंसले की खोली बेहद अंधेरी, जर्जर और उदास है। सारी चॉल ही खस्ताहाल है। सुबह का एक दृश्य अंत में आता है जब क्रोध से भरा भोंसले सार्वजनिक बाथरूम में अपराधी युवक को ढूंढ़ने निकलता है।

फिल्म बड़े गहरे धूसर रंगों में फैली है। कैमरा बहुत ही रूखे यथार्थ को पकड़ता है - दरवाजे, सीढ़ियां, खिड़की, कौवा, कुत्ता... कुत्ते का मुड़ा हुआ पैर... भोसले का किचन...।

संगीत और ध्वनियां भी आद्यंत खलबली मचाए रहती हैं, कर्कश होने की हद तक।

अजीब विडंबना है कि मनुष्यता और नैतिकता और सच्चाई का पक्षधर भोंसले बीमार है, रिटायर हो चुका है, चौथी अवस्था के ब्रेन ट्यूमर से ग्रस्त है, ज्यादा जीवन उसके पास नहीं है। उसके बरक्स राजनीति को अपना पेशा बनाने को उतावला हुआ पड़ा उसी चॉल का एक निवासी टैक्सी चालक है जिसे सच-झूठ, सही-गलत से कोई मतलब नहीं। ऐसे महत्वाकांक्षी नौजवान से बूढ़ा और बीमार कॉन्स्टेबल लोहा लेता है। नर्स लड़की में मानवीयता, सरलता और मदद की रोशनी है पर वह सुरक्षित नहीं है। कठोर और कुत्सित यथार्थ के बीच जीवन की कांपती सी लौ यहां दिखती है। एक हारी हुई सी परिस्थिति हमारे सामने है कि समाज में फूट डालने का पेशा अपनाने को लालायित व्यक्ति राजनीतिज्ञों के निकट, ताकतवर, नौजवान और बड़बोला है। दूसरी तरफ न्याय, समानता, मनुष्यता, कोमल भावनाओं का पक्ष लेने वाले वृद्ध, नादान, कमजोर, चुप्पे, भयभीत और बीमार लोग हैं।

फिल्म के अंतिम दृश्यों में जब भोंसले बदला ले चुका है और मर चुका है, गणपति विसर्जन के बाद के दृश्य इस सारे आख्यान को अखिल भुवन में गुंजायमान कर देते हैं। देवी देवताओं की खंडित प्रतिमाएं रेत में धंसी पड़ी हैं। एक देवता की मूर्ति पानी में ऊबचूब हो रही है। चटख रंग वाली टूटी हुई मुखाकृति की केवल पलक हवा के झोंके से हिल रही है। सारे विध्वंस के बीच मानव जीवन का हल्का सा स्फुरण वहां हो रहा है।

उस तुमुल कोलाहल में भी भोंसले के सांस की आवाज गूंजती रहती है। भोंसले के भीतर पता नहीं कितना क्रोध और असंतोष जमा हुआ है कि उसका जबड़ा हमेशा भिंचा रहता है। उसके मुंह से कभी कभी ही कोई बोल फूटता है। वह प्रायः उदासीन और निरपेक्ष बना रहता है लेकिन तन मन से घायल नर्स को ढांढ़स बंधाते समय भोंसले के भीतर की सारी ममता करुणा बह निकलती है।


Sunday, April 1, 2018

गांधीगिरी



लगे रहो मुन्‍ना भाई फिल्‍म 2006 में आई थी। उसके बाद गांधीवाद को गांधीगिरी नाम मिला और उछाल में भी रहा। यह भी लगा कि सामाजिक आंदोलनों की शुरुआत फिल्‍मों से भी हो सकती है। 
लेकिन जल्‍दी ही इस अवधारणा की हवा निकल गई। 
12 साल बाद इस समीक्षा पर नजर डाली जाए तो महसूस होता है कि माहौल काफी बदल गया है। 
गांधी कहीं गहरे भारतीय चित्‍त में तो बैठा प्रतीत होता है 
लेकिन इस समय गांधी विरोध की हवा फैलाने की कोशिशें भी लगातार हो रही हैं।




लगे रहो मुन्ना भाई गांधीगिरी के लिए चर्चा में आ गई है। फिल्में आम तौर पर नौजवानों को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। क्योंकि सबसे ज्यादा दर्शक इसी वर्ग से मिलता है। फिल्म का हिट होना या पिट जाना युवावर्ग की पसंद से ही तय होता है। गांधीवाद जैसे पिटे हुए विचार को इस फिल्म ने हिट बना दिया है। गांधीवाद की अंहिसा और असहयोग अचानक परिवर्तन के हथियार बन गए हैं। पिछले कुछ बरसों में ये हथियार म्यूजियम में रख दिए गए थे। खादी, चरखा, सत्य, अहिंसा असहयोग आदि  किताबी किस्म की बातें हो चुकी थीं। इनका मजाक उड़ाया जाता था।  प्रदर्शनी लगाई जाती थी। इन्हें राजनीति में इस्तेमाल किया जाता था।

गांधीगिरी शब्द को दादागिरी के वरक्स खड़ा करने से मानो गांधीवाद को नवजीवन मिल गया है। वह भी फिल्म जैसे लोकप्रिय माध्यम के जरिए। फिल्म में गांधीगिरी संजय दत्त करता है, जिसका अपना एक पेचीदा इतिहास है। पिता अभिनेता के साथ साथ सच्ची किस्म का नेता रहा है। खुद संजू बाबा टाडा में हथियार रखने का आरोपी रहा है, अपनी लतों के कारण भी खबरों में रहा है। पर इसके साथ साथ संजय दत्त लोकप्रिय स्टार भी बना हुआ है। मुन्ना भाई एमबीबीएस ने इस गांधीगिरी की जैसे नींव रख दी थी। उस फिल्म में मानववाद की एक धारा बहती रहती है, जो नौकरशाही और निर्मम मेडिकल साइंस की कली खोलती है, रिश्तों को और प्रेम को महत्व देती है। समाज के प्रति समभाव भी उसमें बना रहता है। यह सब मसाला फिल्मों के स्टाइल में होता है।  अपने मानववाद के कारण ही शायद यह फिल्म हिट हुई थी।

लगे रहो मुन्ना भाई में गांधीवाद पर अमल करके दिखा दिया गया है। इससे भ्रष्टाचार का सामना किया जाता है, सच्चाई का महत्व पता चलता है। हृदय परिवर्तन भी हो जाता है। यह अलग बात है कि फिल्म इन सिद्धांतों का प्रयोग अपनी सुविधा से करती है। जैसे नायक का गांधी से परिचय ही प्रेमिका से मिलने की जुगत भिड़ाने के लिए होता है। गांधी से जुड़े सवालों का जवाब देने के लिए भाड़े के प्रोफैसरों को लाने वाला सीन काफी विडम्बनापूर्ण है, लेकिन सच्चा है। मजेदार बात यह है कि इस गांधीगिरी का प्रयोग मुंबई का एक भाई कर रहा है जिसका पेशा दादागिरी करना है। यह भाई धीरे-धीरे गांधी के प्रभाव में आता जाता है।

नौजवान पीढ़ी को लगता है कि इस अस्त्र का इस्तेमाल किया जा सकता है। सत्य, शांति, अहिंसा, असहयोग वगैरह उसे अचानक आकर्षक औजार लगने लगे हैं।

इसी तरह रंग दे बसंती भी नौजवान पीढ़ी में खासी लोकप्रिय हुई है। वह फिल्म इसके बिल्कुल उलट है। वह आजादी के क्रांतिकारियों को याद करती है। उस समय और इस समय की जक्स्टापोजीशन उस फिल्म को मार्मिक और प्रामाणिक बनाती है। वह नौजवान पीढ़ी के सरोकारों को छूती है। पर हिंसा का रास्ता चुनती है। गुस्सा तो आज हर कहीं उबल ही रहा है। आंदोलनों की कमी गुस्से को दिशा नहीं दे पाती। मध्यवर्ग की बेहतर बनने की दौड़ और होड़ उसे अपने से बाहर सोचने नहीं देती। जीवन में शाùर्टकट उसे और भी आत्म केंद्रित और हड़बड़िया बनाते हैं। सब कुछ बहुत जल्दी और ज्यादा मिल जाए। अगर गृहस्थी चला रहे बाप और पढ़ाई कर रहे बेटे दोनों के मकसद इसी तरह के हों तो बड़े सपने नहीं देखे जा सकते। गुस्सा रोजमर्रा के जीवन से है, मतलब प्रशासन, सिस्टम, सरकार आदि के खोट  नजर आते हैं। निजी तरक्की में जब ये चीजें बाधा बनती हैं, तभी आदमी को गुस्सा आता है। मिलों के बंद होने पर, किसानों के आत्महत्या करने पर, सूखे बाढ़ से होने वाली तबाही पर, कालाहांडी पर गुस्सा नहीं आता। भुक्तभोगी को गुस्सा आता है, पर वो बेबसी में बदल जाता है। हमारे समय में एम्पेथी या समानुभूति के जज्बे को पाला मार गया है।  मुन्नाभाई को गांधीगिरी की जरूरत अपनी प्रेमिका को पाने के लिए पड़ती है। रंग दे बसंती में क्रांति अपने मित्र की दुर्घटना में हुई मृत्यु के बाद जन्म लेती है।

इन दोनों फिल्मों में मीडिया की विशेष भूमिका है। खास तौर से रेडियो का इस्तेमाल पुनर्जागरण की तरह होता है। परिवर्तन की दुंधुवी एफएम रेडियो से बजती है। ध्यान देने की बात है कि यह माध्यम खालिस युवा वर्ग का है। मुन्ना गांधीगिरी के नुस्खे रेडियो पर सुनाता है। जनता मानो आपस में जुड़ जाती है। रंग दे बसंती में भी सारा देश रेडियो से चिपक जाता है और क्रांतिकारियों से सवाल जवाब करता है। मीडिया का प्रयोग यह दिल है हिंदुस्तानी और नायक जैसी फिल्मों में पहले भी हुआ है लेकिन उनके पास विचारधारा नहीं थी। यहां गांधीवाद और इन्कलाब की जांची परखी विचारधाराएं नए अवतार में सामने आती हैं।

 ये फिल्में विरोध को एक रूप देने लगी हैं। मुन्नाभाई की सफलता के बाद गांधीगिरी को बढ़ावा देने के लिए कई मंच सामने आने लगे हैं। इंटरनेट पर भी इस विचार को फैलाया जा रहा है। कुछ युवकों ने एक थप्पड़ खाकर दूसरा गाल आगे करने के नुस्खे आजमाने शुरु कर दिए हैं। जैसे, प्रसिद्ध हास्य कलाकार राजू श्रीवास्तव कहता है कि मजाक - मजाक में बहुत लोग आ गए, मजाक मजाक में गांधी बापू फिर से लोकप्रिय हो गए।


गांधी के इस अवतार से यह भी पता चलता है कि विरोध के हमारे तरीके पुराने पड़ चुके हैं। जुलूस, हड़ताल, पोस्टर, जैसे माध्यम अब नकारा साबित हो जाते हैं। बदलते वक्त के साथ लोग विरोध और प्रतिरोध के नए नए तरीके तलाश कर रहे हैं। जैसे आंदोलनों की बागडोर अब लगभग एनजीओं के हाथ में चली गई है। अब इसका जज्बा बदल गया है। असल में अब दुनिया भी बदल गई है। दुश्मन भी पहले से कहीं ज्यादा जटिल, कुटिल, खल और कामी हो गया है। वह लुभाता भी है, भुनाता भी है और विषदंत  भी गड़ाता है। गांधी का नया अवतार मध्यमवर्ग को एक नए, लुभावने लेकिन कारगर हथियार के रूप मे वरदान की तरह मिला है। भले ही छोटी छोटी निजी  लड़ाइयों के लिए ही सही, उस सिंगल हड्डी आदमी की कीमत पहचानी तो जाने लगी है।  

Saturday, January 11, 2014

दीवारों की दरारों में पीपल

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पिछले कुछ महीनों में पूना में भारतीय फिल्‍म टेलिविजन संस्‍थान में तीन चार बार जाने का मौका मिला। कालेज यूनिवर्सिटी छोडे़ हुए करीब तीन दशक हो गए हैं। उसके बाद ऐसी जगहों पर जाने का खास मौका नहीं मिला। रस्‍मी तौर पर या मेहमान की तरह तो कभी कभार जाना हुआ, पर आम आदमी की तरह, और ज्‍यादा वक्‍त तक जाना न हुआ। एक समय में राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय, पृ‍थ्‍वी थियेटर, श्रीराम सेंटर, टाटा थियेटर में जाने की एक खास तरह की ललक रहती रही है। धीरे धीरे कई तरह की छायाएं इन जगहों पर पडी़ं, इनके रूप-स्‍वरूप, काम-धाम में तब्‍दीली आई। नतीजतन इनके प्रति खिंचाव भी नए सिरे से परिभाषित होने की मांग करने लगा।    DSC_1462-1

पूना के फिल्‍म टीवी संस्‍थान में जाने पर एक ठहरे हुए से समय से मुलाकात हुई। मुझे तीन दिन वहां यूं ही बिताने थे, कुछ न करते हुए। इसलिए मैं कैंटीन में, पेड़ के नीचे, सड़क किनारे बेंच पर या सी‍ढ़ियों पर अपना दिन बिताता रहा। इस ठहरे हुए समय में मुझे अपने कालेज के दिन याद आ गए। हिमाचल में धर्मशाला के सरकारी कालेज की दीवारें पत्‍थर की थीं, छतें निर्मल वर्मा वाली लाल टीन की थीं और ढलवां थीं। बरामदे चौड़े थे। मैदान हरियाले थे। वो युवा लोगों और युवा मनों की चहल-पहल, जोश और उम्‍मीद भरे दिन थे। यहां फिल्‍म संस्‍थान में एक आध दीवार ही पत्‍थर की है, बाकी जगह प्‍लास्‍टर लगा है। पत्‍थर की दीवार गेरू जैसे रंग में पुती है। बरामदे नहीं हैं, बन्‍नी सी है। एसबेस्‍टस की धंसती हुई सी ढलवां छत है। पेड़ हालांकि काफी हैं पर पहाड़ जैसी गदगद हरियाली मानसून के बाद यानी सितंबर महीने में भी नहीं है। प्‍लास्‍टर वाली दीवारों पर फिल्‍मी हस्‍तियों के चित्र बनाए गए हैं जो अलबत्‍ता दूर से ही ध्‍यान खींच लेते हैं। इसके अलावा लोक निर्माण विभाग की वास्‍तुकला प्रेरित नहीं कर पाती है। DSC_1475-1
मेरे तार वहां की बाहरी रफ्तार से जुडे़। एक तरह की सुस्‍ती, पस्‍ती, उदास सी दिखती चुप्‍पी, और इस सब में एक तरह की पिनक भरी मस्‍ती इस रफ्तार पर तारी रहती है। संस्‍थान में लगता है समय अभी भी झोला छाप बुद्धिजीवियों के समय में ही अटका है। लैपटॉप, बैकसैक, बाइक और बाइसैप्‍स वहां कम दिखते हैं। हालांकि संस्‍थान तकनीकी तौर पर समकालीन है। यह बाहरी लद्धड़ रफ्तार भले ही बीते हुए समय ही है, पर अपनी सी लगती है। शायद मैं भी वहीं अटका हूं।

संस्‍थान को थोडा़ नजदीक से देखने पर पता चला कि यहां छात्र ज्‍यादा नहीं हैं। इसलिए भी शायद गहमा गहमी कम है। यह संस्‍थान विधिवत् रूप से फिल्‍म निर्माण सिखाता है पारंपरिक से लेकर स्‍टेट ऑफ द आर्ट तकनीक तक। पर यहां के लोगों में बालीवुड की हीरो टाइप जगर-मगर नहीं है। सिर्फ अभिनय सीखने आए छात्र धुले-धुले से दिखते हैं, बाकी सब 'गुआचे' (खोए) हुए से पाए जाते हैं। इस खोए-DSC_1455-1खोए पन में सुबह सिद्धांत पढा़ए जाते हैं, दोपहर बाद प्रैक्टिकल। शाम, रात, देर रात फिल्‍में दिखाई जाती हैं। इसी धंसी हुई सी ढलवां छत के नीचे। संस्‍थान के शासी मंडल के मौजूदा अध्‍यक्ष सईद मिर्जा एक दिन इसी हॉल के बाहर किसी सहयोगी के साथ कुछ योजना बनाते समझाते दिखे। मेरे मन में आया क्‍या पता ये भी एसबेस्‍टस की छत को लाल टीन में बदल देने के बारे में चर्चा कर रहे हों। एक प्रोफैसर कहते हैं, छात्रों को हॉस्‍टल में ही रहना चाहिए वरना दिन ढलने के बाद जो चर्चाएं यहां होती हैं, उस लर्निंग अनुभव से वे वंचित रह जाएंगे। बाहर से 'सोतड़' से दिखने वाले संस्‍थान की दिनचर्या सुबह आठ बजे योग और मेडिटेशन से शुरू होती है और आधी रात को फिल्‍म प्रदर्शन से खत्‍म होती है। क्‍या पता इसीलिए यहां के बाशिंदे उनींदे से या टहलते हुए से चलते हैं। कल्‍पनाशीलता और रचनात्‍मकता के बादलों में स्‍लो मोशन में डग भरते हुए। प्राय: यहां छात्र दिखते नहीं हैं जबकि करीब दर्जन भर पाठ्यक्रम यहां पढा़ए जाते हैं। एक, दो और तीन साल लंबे। और तीन साला कोर्स पर्वतों में गूंजती आवाजों की तरह एक एक और साल तक लटके रहते हैं। मतलब पहले साल के नए छात्र अगले साल दूसरे साल में प्रवेश करते हैं। पर उनके आगे उनसे सीनीयर दूसरे साल वाले भी डटे रहते हैं। दूसरे साल वालों के सुपर सीनियर तीसरे साल में मोर्चे पर रहते हैं। जब तक उनके प्रोजेक्‍ट जमा नहीं हो जाते, डिप्‍लोमा पूरा नहीं होता। मतलब आवक मुस्‍तैद है, जावक ढीली। अपने अपने कामों को निपटाने के जुगाड़ में वे अदृश्य हुए रहते हैं और अधर में अटके रहते हैं। DSC_1456-1

संस्‍थान सरकारी है, इसका सकारात्‍मक पहलू यह है कि यहां देश के तकरीबन हर कोने के छात्र को मौका दिया जाता है और नियमानुसार आरक्षण भी मिलता है। फीस अपेक्षाकृत कम है इसलिए मध्‍यवर्ग की प्रतिभाओं को मौका मिल जाता है। सरकारी होने के कारण ही छात्रों की तुलना में प्रशासन अधिक दृश्‍यमान है। अखैं जी मैं कौण ? जी मैं चौधरी खामखाह। सारे कामकाज फाइलों से होकर ही पूरे हो पाते हैं। प्रशासन को लगता है, संस्‍थान उसके चलाए ही चलता है। पर कलाओं के स्‍थल प्रशासन के चलाए नहीं चलते। छात्रों की ललक और लपट दरार पडी़ दीवारों में उगते पीपल की तरह सिर उठाने लगती है। नौकरशाही के धूसर में छात्रशाही का वही हरियाला होता है। जड़ में वही चेतन होता है। जब संगठित हो जाता है तो दिशा भी देने लगता है, धक्‍का भी। कोई बस न चले तो दखल तो देने ही लगता है। छात्र संघ संस्‍थान की लस्‍टम-पस्‍टम चाल को सहारा देने का काम भी हाथ में ले लेता है।
 
इसका एक अनूठा उदाहरण हाल में सामने आया है। निनान वर्गीस यहां की मेस में करीब तीन दशक तक ठेके पर काम करने के बाद रिटायर हुए। इस दौरान वर्गीस ने पैसा देने वाले छात्रों को तो खाना खिलाया ही, जिनके पास पैसे नहीं होते थे उन्‍हें भी भूखे नहीं सोने दिया। इतना ही नहीं, यह दिलदार बंदा हर क्रिस्‍मस को छात्रों को अपने गरीबखाने पर बुलाकर खाना खिलाता था। इसके रिटायर होने पर छात्रों की बारी थी। नए पुराने कई छात्रों ने मिलकर करीब तीन लाख रुपए इकट्ठे करके इस क्रिस्‍मस के दिन वर्गीस को दिए। मदद करने वालों में स्‍लमडॉग मिलिनेयर वाले रेसुल पोकुटी और मुन्‍ना भाई वाले राजकुमार हिरानी भी थे। छात्र जब इस तरह अपने गुरुकुल से जुड़ते हैं तो लगता है सीमेंट की दरारों में उगे पीपल के पत्‍ते जरा सा और सिर और उँचा करके फहराने लगे हैं।

जनसत्‍ता में दुनिया मेरे आगे का लिंक 


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Saturday, September 10, 2011

श्याम बेनेगल की चार फिल्में


इच्छा दब ही नहीं, शायद मर भी गई थी। एनसीपीए के फिल्म सेंटर की सदस्यता का नवीनीकरण तो करवा लिया था, पर देखने जाने की इच्छा नहीं होती थी। प्रभात चित्र मंडल की सदस्यता लेकर फिल्में देखने का ख्याल भी करने की हिम्मत नहीं होती थी। बचते चले जाने की मानसिकता बन गई थी।

इस बार श्याम बेनेगल की सारी फिल्में दिखाई जाने लगीं तो उत्सव के दूसरे दिन अचानक जोश आ गया और साल भर की सदस्यता ले ली। इतना ही नहीं, जुलाई महीने की चार फिल्में भी देख डालीं। यह अनुभव अच्छा रहा। फिल्में देखीं, चरणदास चोर, निशांत, मंथन और भूमिका।

श्याम बेनेगल अपने माध्यम के मास्टर हैं। हर फिल्म अपने आप में संपूर्ण है। उद्वेलित करती है। चरणदास चोर काफी हद तक हबीव तनवीर के नाटक पर आधारित है। संगीत वही है, कलाकार वहीं हैं। पर कल्पना की उड़ान नाटक से कहीं ज्‍यादा है। खूब खेलते हैं और मानव स्वभाव पर अनजाने में टिप्पणियां करते चले जाते हैं।

निशांत सामंती दरिंदगी को तहस नहस करने की शुरूआत करने की फिल्म है। नायक की पत्नी का जमींदार के बेटों द्वारा उठा लिया जाना, नायक की लाचारी और फिर धीरे धीरे शोषित लोगों को इकट्ठा करना और बदला लेना। हालांकि यह लगा कि पीड़ा, दुख-तकलीफ दरिंदगी का चित्रण जितना सघन और सजीव है, परिवर्तन की शक्तियों को इकट्ठा करने के प्रयासों का चित्रण संकेतात्मक है। उसकी तैयारी जो वास्तव में कहीं बहुत दुष्‍कर कार्य है, लगभग असाध्य, वह गुपचुप होता चला जाता है और एक छोटी सी क्रांति भी हो जाती है। संघर्ष की इस तैयारी की भीतरी दुनिया या नजदीक से, माइक्रोस्कोपिक स्टडी उसमें नहीं दिखती। 

मंथन सहकारिता आंदोलन पर बड़ी कलात्मक और श्रेष्ठ फिल्म है। इस तरह के राजनीतिक विषय पर एक कलाकृति तैयार करना एक बड़ी प्रतिभा के दर्शन करवा देता है। समाज की भीतरी तहें बहुत साफ हो के  सामने आती हैं।

भूमिका बहुत तनाव देने वाली फिल्म है। हमारे समाज में स्त्री कलाकारों की जो हालत रही है, पुरुष वर्चस्व में वे जिस तरह जकड़ी रहती हैं, उसका बहुत सटीक और मार्मिक चित्रण इसमें है। कला-संस्कृति समाज और स्त्री की व्याख्या संपूर्ण गंभीरता से की गई है। स्त्री को स्त्री होना ही नसीब नहीं है। वह अंत तक भटकती रहती है। उसकी किस्मत में अंतत: अकेलापन ही है।
22-7-98

Tuesday, August 25, 2009

कमीने से उठते सवाल

जो सवाल सच का सामना धारावाहिक के बारे में उठ रहे थे, वे कमीने फिल्म के संदर्भ में और तीखे होकर चुभ रहे हैं। फिल्म में हिंसा का खेल है। जमकर। फोटोफिनिश। बेहद रीयलिस्टिक। शायद इसी वजह से विशाल भारद्वाज के प्रशंसक इसकी तुलना हॉलीवुड की फिल्मों से कर रहे हैं। और खुश हो रहे हैं। हिंसा? खालिस हिंसा। शरीर का कोई मोल नहीं। जिंदगी का कोई मानी नहीं। फोड़ के रख दो। सोचो मत। अंत में जब सारे खलनायक इकट्ठा होकर गोलीवारी करते हैं, तभी थोड़ा बहुत ड्रामा दिखता है। एक्शन या स्टंट फिल्मों में इसी तरह का ड्रामा और मेलोड्रामा दर्शक को कॉमिक रिलीफ देता है। लेकिन कमीने के प्रशंसकों को फिल्म का यह हिस्सा बेकार लगता है। ठकाठक मारकाट ने उनका मन मोह लिया है।

हमारे लिए यह विशाल भारद्वाज का सिनेमा से डिपार्चर है। उनके प्रशंसकों के लिए यह उनका मेनस्ट्रीम में आगमन है। यह विडंबना है। लेकिन सच है। हमने ब्लू अंब्रेला और मकड़ी का फिल्ममेकर खो दिया। शेक्सपीयर के ड्रामों की आधुनिक भारतीय समाजिक व्याख्या करने वाला रीयलिस्टिक फिल्ममेकर खो दिया।

मकबूल भी हिंसा में बुझी हुई फिल्म थी। अपराध और नाजायज रिश्तों का ड्रामा। ओमकारा में अपराध, हिंसा और नाजायज रिश्तों में राजनीति भी जुड़ गई। यह भी डिस्टर्बिंग फिल्म थी। इसमें एक तरह का भदेस और नंगापन था। दर्शक सहम जाता था। पर आखिर उसमें कहीं पे फिर भी ड्रामा बचा हुआ था। जहां आपको लगता था आप फिल्म देख रहे हैं।

कमीने में अलग तरह का यथार्थ है। भयावह। अपराध के कई स्तर हैं। चार्ली (शाहिद कपूर) रेसकोर्स का छुटभैया खिलाड़ी है। इसी धंधे के कई और खिलाड़ी हैं। एक एक सीढ़ी ऊपर के। नायिका का भाई मराठी दादा है। इसका मकसद अपराध से बरस्ता रीयल इस्टेट, राजनीति में जाने का है। फिर गर्द और तस्करी का अंतर्राष्ट्रीय जाल है। पुलिस के बड़े अधिकारी तस्करों के लिए काम कर रहे हैं। नायक डबल रोल में है। लाबारिस जुड़वां भाई। एक भाई अपराध की अंधी गली में गर्क हो रहा है। दूसरा तथाकथित सभ्य समाज में अपलिफ्ट होना चाहता है। लेकिन नायिका के फेर में अपराधियों के चंगुल में फंस जाता है। हर तीसरी एक्शन फिल्म में तकरीबन ऐसी ही कहानी तो होती है।

मतलब कहानी में कोई नयापन नहीं है। बस मारकाट, वीभत्स हंसी और निर्मम हत्याएं हैं। जबरदस्त तरीके से एडिट की हुई। ठकाठक। दर्शक को फुर्सत ही नहीं मिलती कि वह कुछ सोच पाए। या जो दृश्य उसकी आंखों के सामने आ रहे हैं उन्हें भीतर घुसने दे। यह फिल्म दर्शक को रिएक्ट करने की मोहलत ही नहीं देती।

दर्शक इससे डीसेंसीटाइज होता है। तभी तो पिटाई उसे गुदगुदाती है। किसी निहत्थे को मारे जाते देख उसकी हंसी फूटती है। गाली-गलौज, मारकुटाई और गोलीवारी में उसे मजा आता है। दर्शक इस तरह का मजा मेलोड्रैमेटिक एक्शन फिल्मों में भी लेता है। पर वहां मैलोड्रामा यथार्थ को थोड़ा मंद कर देता है। यह अतिनाटक कॉमिक रिलीफ में बदल जाता है। लेकिन हॉलीवुड चलन के फोटोफिनिश यथार्थ में कॉमिक रिलीफ की कोई जगह नहीं है। कैमरे, प्रकाश, ध्वनि प्रभाव की अत्याधुनिक तकनीकें इसे कंप्यूटराइज्ड प्रिसीजन (परिशुद्धता) देती हैं। इस तरह प्रौद्योगिकी फिल्म को मानवीय घटनाक्रम का अनुभव नहीं बनने देती। इसे रंगीन फोटोग्राफी की तरह निष्प्राण, अमानवीय और भयावह बना देती है। प्रौद्योगिकी फिल्म को इतना परफेक्ट बना दे रही है कि दर्शक उसे काल्पनिक दृश्यावली नहीं मान पाता। वह इस तरह के दृश्य देखने का आदी (एडिक्ट) होता जाता है। पैसा खर्च करके मल्टीप्लेक्स में जाता है। और एक तरह से इस परपीड़क आनंद का ग्राहक बनता है। फिल्म उद्योग में यह व्यापार खूब फल फूल रहा है। इसे सफलता माना जाता है। इसी सब परफेक्टनेस के बूते पर कहा जा रहा है कि यह हॉलीवुड से होड़ लेती बॉलीवुड की एक्शन फिल्म है। कि विशाल भारद्वाज पास हो गया।

पर हमें लग रहा है कि विशाल भारद्वाज फेल हो गया। क्या अब वह ब्लू अंब्रेला जैसी कोमल, अर्थवान और संवेदनशील फिल्म बनाएगा?