सन 2000 में हम यानी मैं, सुमनिका और बेटी अरुंंधती माता-पिता को लेकर तीर्थाटन, पर्यटन और गृहगमन हेतु मुंबई से निकले। शायद गर्मियों की छुट्टियों के ही दिन थे। पिताजी की हरिद्वार जाने की बड़ी इच्छा थी। ऋृषिकेष वे पहले गए भी थे, स्वामी शिवानंद की डिवाइन लाइफ सोसाइटी से वे जुड़े रहे थे। देहरादून में मेरे ताया जी रहते थे। हिमाचल में धर्मशाला में अपने घर माता-पिता हर साल जाते ही थे। साथ हम भी जाते थे। वहां बड़े भाई तेज जी का परिवार है। यही तय पाया गया कि हरिद्वार, देहरादून होते हुए धर्मशाला चलें। मुंबई से दिल्ली ट्रेन से गए। कुछ घंटे बसंत कुंज में चचेरे भाई सुभाष जी के पास रुके। उसके आगे की कथा यहां पेश है। यह वृत्तांत सन 2000 में विपाशा पत्रिका में छपा था। मतलब ये छबीस पहले का इतिहास है।
तीर्थाटन, पर्यटन और गृहगमन
हरिद्वार हम लोग आधी रात को पहुँचे। मई महीने के पहले हफ्ते की आधी
रात । ठीक बारह बजे। अंग्रेज़ी हिसाब से नया दिन शुरू हो रहा था। देसी हिसाब से
निशाचरों का पहर था। एक भवन के सिंह द्वार के सामने पाँच प्राणी खड़े हुए। यही
सिंध पंचायत की सराय थी। इतनी रात गए यूँ तो सारा हरिद्वार नींद में डूबा था, फिर भी कोई-कोई राहगीर दिख जाता था। ऐसे लोगों ने इस सराय तक पहुँचने
में मदद की और इन्हीं में से एक ने कहा- 'खटखटाओ । बोलो
राना जी ।' द्वार खुल गया। राना जी आँखें मलते हुए
अपनी पीढ़ी पर उठ बैठे, उनके सोने की व्यवस्था वहीं है। क्षमा
याचना करते हुए हमने अपनी बुकिंग की याद दिलाई। बोले- 'जल्दी
आना चाहिए था न ।' वास्तव में शाम को चार बजे दिल्ली से फोन
पर बताया था कि देर हो गई है,
पर चल रहे हैं।
हम लोग इसी सुबह दिल्ली पहुँचे थे। शाम को कार से हरिद्वार के लिए
निकल पड़े। येन केन प्रकारेण सवा पाँच के करीब हम दिल्ली शहर को फांदने लगे। लेकिन
महानगर फांदने से फांदा जा सके तो फिर क्या चाहिए। साहिबाबाद, गाजियाबाद
और मोदीनगर मानो एक-दूसरे पर चढ़े ही चले आते हैं। मुजफ्फरनगर से पहले ही अच्छा
अँधेरा घिर आया था। लंबी सड़क यात्रा का आवश्यक कर्मकांड तभी सम्पन्न होना था।
टायर पंचर । करीब बीस मिनट बदलने में लगे। पहले यह सोच रखा था कि थोड़ा वक्त से
पहुँच जायेंगे तो गंगा स्नान,
रात को ही कर लेंगे। लेकिन
अब उम्मीद छोड़ दी। अब एक मात्र लक्ष्य था कि किसी तरह जल्दी से जल्दी पहुँचा जाए।
खाना वहीं खाया जाए। लेकिन रुड़की पहुँचते ही दस बज गए। यही तय पाया गया कि खाना
खा ही लिया जाए। हरिद्वार कोई मुंबई तो है नहीं कि रात दो बजे भी शान से पेट भरा
जा सके। आखिर ठीक मध्य रात्रि में सिंध पंचायत सराय का यह सिंहद्वार खटखटाया।
सराय क्या है, होटलों का भारतीय संस्करण है। कमरे में
डबल बैड है। अटैच्ड बाथरूम है। गीजर है। सुबह उठकर देखा- इस तीन मंजिला इमारत में
चारों तरफ कमरे हैं। बीच में आँगन है, छाया हुआ ।
यहीं सराय का दफ्तर है। सराय के बाहर सड़क के किनारे एक ठेला लगा है। चाय बन रही
है। ढेर सारी केतलियाँ, प्याले और गिलास हैं। कमरों में चाय यहीं
से आती है। इस चौघरे के बीच जो आँगन है वहाँ गैस के चूल्हे पर पतीले में दूध उबल
रहा है। पता चला यात्री भिखारियों को दूध या चाय पिलाते हैं। तीर्थस्थल का धार्मिक
कर्मकांड आरंभ हो गया है। सराय के बाहर बगल की गली में भिखारियों की लाइन लगी है।
अपने-अपने कटोरे-प्याले में चाय ले जा रहे हैं। साथ में ब्रेड स्लाइस ।
सराय वाले चाय बनाने या दूध उबालने में मदद करके पुण्य कमाते हैं।
यहाँ के भिखारी मुंबई की तुलना में थोड़े मोटे-ताजे हैं। इनमें बहुत से साधु हैं।
यहाँ इन लोगों का शायद पेट पूरा भर जाता है। हरिद्वार में तकरीबन हर सम्प्रदाय, हर समुदाय, हर बड़े घराने की सराय मिल जाएगी। धनाढ्य
व्यक्तियों और शहरों के नाम के ठीहे भी यहाँ मिल जाएँगे। जैसे दुनिया में आवागमन
का मेला लगा रहता है वैसे ही हरिद्वार में भक्तों का रेला ठाठें मारता है। यह ठीहे
हर दम आबाद बने रहते हैं आना जाना ही ज्यादा होता है। तपस्या करने वाले ही शायद
ज़्यादा दिन रुकते होंगे, वह भी ऋषिकेश की तरफ। यहाँ तो बस गंगा
स्नान किया, गंगाजल की बोतल भरी और चलते बने। दोस्त
मित्रों ने हिदायत दे रखी थी कि जेबकतरों से सावधान रहना। जिसे मुम्बई की लोकल
ट्रेन और बस में यात्रा करने का अनुभव हो, उसे भारतवर्ष
में कहीं भी जेबकतरों से डर नहीं लग सकता। इस महानगर में अपनी देह और आत्मा, गठड़ी और दमड़ी को बचाने की कला हर नश्वर प्राणी को अनिवार्य रूप से
सीखनी पड़ती है। न सीखे तो उनके अनश्वर होने में निमिष भी नहीं लगता। फिर भी
हरिद्वार की महिमा से भय बराबर बना हुआ था। संयोग से मुंबई के अनुभव की लाज बच गई।
हर हर गंगे
चाय पीकर हम लोग गंगा की तरफ बढ़ चलते हैं। हमारी सराय ललिता पुल के
करीब है। इस पुल के पास भी घाट बने हैं। पर हम पुल पार कर हर की पैड़ी की तरफ जाते
हैं। बीजी (माँ) को चलने में काफी दिक्कत होती है। फिर भी बढ़ते-बढ़ते केंद्रीय
स्थल तक पहुँच ही जाते हैं। बीजी-पिताजी पूरी आस्था के साथ यहाँ आए हैं। अपनी
आस्था तो कभी वैसी रही नहीं। मोक्ष के इस द्वार को देखने की जिज्ञासा ज़्यादा है।
जैसे-जैसे हम हर की पैड़ी की तरफ बढ़ते हैं, पहले अस्थि
विसर्जन करने वाली पीढ़ियाँ आती है। बहुत से स्वयं सेवक हैं, हमें
वहाँ जाने से बरजते हैं। आगे पूजा करवाने की पीढ़ियाँ पग-पग पर हैं। भीड़ है।
आपाधापी है। पूजा करवाने के लिए ग्राहक को फांस लेने की चतुराई है। जैसे शहरों में
बाज़ार लगता है। जहाँ माल मांग से ज़्यादा होता है, विक्रेता
ग्राहक पर टूट पड़ते हैं। ग्राहक की जिज्ञासा को टहोका दिया जाता है। ग्राहक अगर
समझदार है तो उसे शर्मिंदा करने की हद तक कोंचा जाता है। तब भी अगर उसमें विवेक
बचा रह जाए तो वह जुआ तोड़कर,
पूँछ उठाकर नए-नए बैल की तरह
भाग खड़ा होता है। इसके उलट अब यह ज़्यादा होने लग गया है कि ग्राहक सम्मोहित होकर
अपनी जेबें उलीचता चला जाता है। दुनिया भर के सामान से घर बाहर भर लेता है और खुद
को समृद्धि में ऊब-चूब महसूस करता है।
हर की पैड़ी पर आकर बाज़ार और ग्राहक क्यों याद आते हैं? हमने धर्म को भी तो बाज़ार ही बना रखा है। नाना प्रकार के बिचौलिए
खड़े कर लिए हैं। पाप धोने, पुण्य कमाने, मोक्ष
पाने के हज़ारों नुस्खे बताए जाते हैं। बताने की एवज़ में बेचे ही ज़्यादा जाते
हैं। जुते हुए बैल की तरह सब धर्म की खेती में हल जोतते रहते हैं। विनम्रता, संकोच, क्षमायाचना का भाव इतनी गहराई तक भारतीय
मानस में घुसा हुआ है कि एक तरफ तो यह अपराधबोध में बदल जाता है, दूसरी तरफ खुद को 'मैं मूरख खल कामी' या
'पतितन कौ टीकौ' समझने
का यह भाव रेटॉरिक मात्र रह जाता है। आदमी दीनता की रट लगाए रखता है। धर्म की
मूल्यचेतना का लेशमात्र भी उसके व्यवहार में नहीं होता। जीवन विभाजित हुआ रहता है।
दुनिया के सारे कारोबार सम्पूर्ण चतुराई और व्यावहारिकता से चलाए जाते हैं। ऐसे
वक्त में धर्म या धर्म का कोई भाव शायद ही किसी निर्णय या कार्य को प्रभावित करता
है। भगवान, धर्म-कर्म, सदाचार
या इस तरह की मूल्यचेतना की बातें हम मंत्रों की तरह रट लेते हैं। एक तरफ धार्मिक
कर्मकांड करते हुए खानापूरती भी करते रहते हैं। दूसरी तरफ भीतर अपराधबोध भी पाले
रहते हैं। भारतीय मानस का यह दुचित्तापन नया नहीं है। सदियों से है। अब तो जैसे
कंडीशनिंग ही हो गई है। धर्म की गदा शायद सभी धर्मों के अनुयाइओं के सिर फोड़ती
है। इसाई क्या कम दयनीयता से गरियाते हैं? शायद यह सत्ता
का ही खेल है। आज पुलिस और अदालत से हर शरीफ आदमी बचता फिरता है। कौन-सी दफा लगाकर
आपको कब गुनहगार साबित कर दिया जाए,
कोई पता नहीं। इसलिए या तो
उनके सामने न पड़ो और यदि पड़ ही जाओ, जान बचाने के
लिए पैर पकड़ लो। धर्म ने भी तो इसी प्रकार शासन ही किया है। क्या हरिद्वार उसी
शासन, सत्ता का एक द्वार है? धर्म
की चौकी है? लेकिन क्या धार्मिक कहकर लोगों, जगहों, जीवन-पद्धतियों को इस तरह अलग किया जा
सकता है? शायद यह जटिल प्रश्न है। न तो धर्म शब्द
सुनते ही बिदकना ठीक है, और न ही धर्म के नाम पर लुट मरने को तैयार
हो जाना। यह सच्चाई है कि यह सारी जीवन-पद्धति हमारे लोकमानस में सदियों से घुली
हुई है। हरिद्वार हो या कोई और तीर्थ, ये हमारी
सांस्कृतिक अस्मिता के भी हिस्से हैं।
जब हम जाने की तैयारी कर रहे थे, हरिद्वार
की गंगा की एक कल्पना उभर रही थी। गंगा को देखने जाना, यह
कल्पना नदी किनारे मैदानी शहरों के चित्रों से ज़्यादा प्रेरित थी। हरिद्वार में
गंगा की दिशा थोड़ी बदली गई है या कहा जाए श्रद्धालुओं के लिए सुविधाजनक बना दी गई
है। भागीरथी पहाड़ से उतर कर मैदान में बस पग धरती ही है। पानी काफी ठंडा और
वेगवान है। किनारे- किनारे मंदिरों और घाटों की भरमार है। गंगाजल की मांग शायद
भारत भर में हर परिवार में है। इस कारण सबसे ज़्यादा और सब कहीं मिलती हैं
प्लास्टिक की केनियाँ, कनस्तर, बोतलें
और शीशियाँ । दूसरा यहाँ सर्वाधिक दानार्थी समुदाय पाया जाता है। यहाँ पर ही देखा
कि लोग रसीद बुकें लेकर आपके पीछे पड़ जाते हैं। वैसे मांगने के लिए पीछे पड़ना तो
तीर्थ स्थल का प्रमुख लक्षण है ही। यहाँ हाथों हाथ रसीद काट कर उसे प्रामाणिक
बनाया जाता है। शायद यकीन दिलाने के वास्ते कि वे सच्चे और ईमानदार सेवक हैं।
मोक्ष के मध्यस्थों की एक और श्रेणी यहाँ है, भोजनालयों
की इंस्टेंट सर्विस। श्रद्धालु की श्रद्धा (जेब) के मुताबिक हल्वा-पूरी, साग-सब्जी हाजिर है। आप एक मुश्त पैसा दीजिए। जीमन, जीमनदाता, जीमनपाता सब हाजिर हैं।
हम लोग ऐन हर की पौड़ी पर जाकर नहाए (पुण्य कमाना हो तो पूरा ही कमाएँ, अधूरा क्यों) नहाए क्या,
पानी में उतरे। ठंडा इतना कि
समझ आ गया, पुण्य कमाना इतना आसान काम नहीं है। वहीं
एक युवक बांस की टोकरी के पैंदे जैसे छाज को बार-बार पानी में डुबोता था। नीचे सतह
तक ले जाता और पैरों से कुछ कदमताल-सी करता। मैंने पूछा- 'यह
क्या ?' बोला- 'सोना
चाँदी।' मैंने कहा- 'मिलता
है?' 'बोला- 'हाँ लोग चढ़ाते
हैं न ।' समझदार था। आश्चर्य कि वहाँ कोई दूसरा न
था। उसे खदेड़ कर खुद ढूँढ़ने लग जाए।
बजबजाता हुआ बाज़ार
स्नान के बाद हम बाजार में आ गए। भूख लग रही थी। ऋषिकेश वाला चोटीवाला
भोजनालय यहाँ भी है। मुंबई जैसी ही भीड़ । लेकिन तंदूरी भरवां परांठों का लोभ हम
कैसे संवरण करते। उसके ठीक सामने अचारों की दुकान थी। दुनिया-जहान के सारे अचार।
पिताजी अचार प्रेमी हैं। मुआइना कर आए। बाकी हम सब माला-मनकों की दुकानों की तरफ
झुके। छोटे शहरों की तंग गलियों वाला बाज़ार है। ज़्यादातर टीका-कुमकुम, माला, मनके, शंख, गमछे, रामनामी। धार्मिक कर्मकांड में काम आने
वाली चीज़ों का बाज़ार है। भीड़-भड़क्का वैसा ही है, हर
शहर जैसा । पतली गलियों में कार स्कूटर ले जाना मना है। पर जिसकी धौंस जमती है वह
हाँक ले जाता है। अपनी दुकान के आगे कार-स्कूटर खड़ा भी कर देता है। जैसे घर के
आगे गाय बंधी रहती है। जनता को तकलीफ होती है तो ठेंगे से। वही बात। धर्म त्वचा पर
है। भीतर नहीं उतरा। हम नाहक अध्यापकों को कोसते हैं कि खुद बिगड़ गए, अनैतिक हो गए तो समाज में नैतिकता कहाँ से बचेगी। हिंदी अफसर अपने
बच्चे को अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाता है। उसकी भाषा के प्रति खाक प्रतिबद्धता है।
लेकिन ये बातें बेमानी हैं। अगर नहीं हैं तो मंदिरों वगैरह के परिसरों में सबसे
ज़्यादा चोरियाँ क्यों होती हैं?
यहाँ हरिद्वार में लोग
पंडों-पंडितों से क्यों डरते हैं?
यहाँ के व्यापारी बाकी जगहों
के व्यापारियों जैसे ही क्यों हैं?
पर्वतासीन माता
बाज़ार का चक्कर लगाकर हम मंशादेवी मंदिर को चले। यह मंदिर एक ऊँची
पहाड़ी पर है। मंदिर अक्सर ऊँची पहाड़ियों पर क्यों होते हैं? भक्तों
की आत्मा के साथ-साथ, कसरत करवा कर शरीर को भी निरोग रखने के
लिए या नीचे सारे शहर पर नज़र रखने के लिए? या फिर कहीं
इंसान की कच-कच से बचने के लिए तो ऐसा नहीं करते? एक
पहाड़ी पर मंशा देवी है, दूसरी पर चंडी देवी। हमने मंशा देवी का ही
रुख किया। लेकिन मंशा देवी की बहू को (हमारी दादी का नाम भी मंशा देवी था) चलने
में बड़ी दिक्कत होती है। ऊपर से इतनी ऊँचाई। सोचना ही नामुमकिन है। इसलिए बीजी को
सराय में छोड़ा। पिताजी और अरू (बेटी) को
मंदिर के आकर्षण से ज़्यादा उड़नखटोले (रज्जू मार्ग, रोप
वे) का चाव था। चले तो उसे भी पूरा करने, लेकिन कार
चालक की अतिरिक्त चतुराई ने दूसरे ही फेर में डाल दिया। उड़नखटोले के अड्डे का
रास्ता वह भूल गया। सड़क में चढ़ता चला गया। आगे देखा सड़क किसी दूसरी दिशा में जा
रही है। मंदिर किसी दूसरी दिशा में खड़ा है। हारकर, जहाँ
से सीढ़ियाँ शुरू होती हैं, वहाँ आए और पद-यात्रा शुरू की। पद यात्रा
नहीं, पद सोपान यात्रा। अरू को कई बार कई तरह की रिश्वत
देनी पड़ी। चौहत्तर साल के पिताजी चलने के अपने शौक को इन सीढ़ियों पर मुस्तैदी से
पूरा करने लगे। चढ़ते समय तो होश नहीं आया, लौटते समय अरू
को चलायमान रखने के लिए सीढ़ियाँ गिनीं। सौ-सौ के टुकड़ों में करीब चार सौ तो
होंगी। वह भी कभी एकदम खड़ी,
कभी थोड़ी पसरी हुईं। पर
सीढ़ियाँ तो आखिर सीढ़ियाँ ही होती हैं। जीवन में किसी भी तरह की सीढ़ियों को
चढ़ना-उतरना बच्चों का खेल नहीं होता। चढ़ते वक्त हम आते-जाते उड़नखटोलों को हसरत
भरी नज़र से देखते रहे। कैसे चुपचाप चले जा रहे हैं। फिर उनके दोष भी गिनने लगे।
अंगूर खट्टे जो निकले थे। आखिर सीढ़ियाँ चढ़ गए। तकरीबन सारे रास्ते भर दुकानें
हैं। वही टीका, कुमकुम, माला
मनके । रामनामी और गमछे यहाँ नहीं हैं। यहाँ कैसेटें हैं। रखी हुई भी और गाती हुई
भी।
एक दुकान में तो गला ही फाड़ रही थीं। कनस्तर जैसे स्पीकरों का गला तो
क्या फटेगा, हम लोगों के कान फटने लगे। मैंने नौजवान
दुकानदार को कहा, ज़रा धीमे करो। कहा-सुनी होने लगी। मुझे
लगा बात व्यर्थ में बढ़ जाएगी। हम आगे निकल गए। जब लौटे तो नज़र फिर मिली। बालक
दुष्ट था। उसने कैसेट की आवाज़ पहले से भी ऊँची कर दी। यह सीनाजोरी और धृष्टता एक
नवयुवक कर रहा था, जिसकी दुकान प्रसिद्ध मंशा देवी मंदिर के
रास्ते पर, मंदिर से करीब सौ मीटर पहले थी और कैसेट
भजनों की थी, प्रभु-भक्ति की। उस संगीत की जो मन की
शुद्धि करने वाले और शांति प्रदान करने वाला माना जाता है। मतलब यह कि भजन अपनी
जगह और बालक के संस्कार अपनी जगह। उसके जीवन में शिष्टाचार मंदिर, भजन का लेशमात्र भी प्रभाव दिख नहीं रहा था। ऐसा है तीर्थ, धर्म, अध्यात्म का परिवेश।
इस रास्ते में बीच-बीच में साधु-महात्मा भी बैठे हुए थे। एक साधु एक
सज्जन का हाथ देखकर उसे लुभाने में लगा था। काली दाढ़ी वाला साधु । परिधान भी भगवा
नहीं, श्वेत । चेहरे पर मुस्कान ऐसी कि दंत-पंक्ति
अनायास अनावृत्त हो जाए। इस दंतिल मुस्कान में एक शरारत। एक खिंचाव उस व्यक्तित्व
में था। हमारी नज़र मिली। लेकिन मैं तुरंत अपनी चढ़ाई में मग्न हो गया। उसके मोहक
जाल में फंसने का डर था। वह भी एक ग्राहक में व्यस्त ही था। लौटते में वह अकेला था
। तब तक शायद मेरी भी मानसिक तैयारी हो गई थी। नज़र मिली मैं भी मुस्कुराया। आगे
निकल गया। पीछे से आवाज़ आई- 'एक चाय हो जाए।' मैंने
पलट कर कहा- 'ज़रूर हो जाए।' और
एक की बजाए दो-दो सीढ़ियाँ एक साथ उतर आया।
रास्ते की दुकानों (टपरियाँ ज़्यादा हैं) में लाल रंग प्रधान है। माता
की चुन्नियाँ। नीचे हरिद्वार में बाज़ार का रंग गाढ़ा भूरा है। रुद्राक्ष और माला
के मनकों का रंग। बीच-बीच में पीतल की घंटियों के रंग की चौंध। गंगा के घाट, पुल और रास्ते में हालाँकि सफेद ओर गुलाबी रंग है पर कुल प्रभाव गेरुए
रंग का है।
माता के मंदिर में बड़ी लम्बी प्रतीक्षापंक्ति है। सर्पिल। करीब आधे
घंटे बाद मुख्य मंदिर में पहुँचे। रुकने-रुकाने, माता
को निहारने की फुर्सत नहीं है चढ़ावा चढ़ाओ, प्रसाद पाओ और
जाओ। प्रबंधकीय दृष्टि से ठीक भी है। दूसरी कोई दृष्टि लगानी हो तो मन-मंदिर में
बैठे भगवान से लगानी ही श्रेष्ठ होगी। तीर्थ यात्री, तीर्थ
को तीर्थ मान कर यात्रा कर आएगा। पर्यटक उसमें मौज-मस्ती के पल ढूँढ़ निकालेगा।
(उड़नखटोले से हर पाँच मिनट में एक रेला निकल रहा है)। मन्नत मानने वाला खुद तय की
हुई या प्रचलित शर्तों पर मन्नत पूरी करेगा (बेशक फल पाने के बाद)। जैसे बिल
पेमेंट करते हैं उसे माता के सामने रुकने दो या न रुकने दो। क्या फर्क पड़ता है? जो इन सबमें नहीं है, सिर्फ भाव में रमा है,
उसे किसी भी दृष्टि से क्या
लेना। इसलिए तीर्थ स्थलों में प्रबंध करने वाली दृष्टि का ही महत्त्व ज्यादा है।
लौटते समय देखा,
मंदिर खासा ऊँचा है।
हरिद्वार नीचे किसी छोटे कस्बे की तरह दिखता है। छत से छत सटी हुई। कस्बा नदी के
एक ही तरफ ज़्यादा बसा हुआ है। बगल में गंगा बहती है। इस ऊँचाई से देखो तो हैरानी
होती है। यही है भगीरथ की भागीरथी। न जाने कब से बह रही है। न जाने किस-किस को किस
तरह संस्कारित कर रही है। एक माता के प्रागंण से निहारो, दूसरी
माता का सजल ममत्व । शीतल, लहरीली देह के भीगते, स्पंदित
होते स्पर्श से आह्लादित होते रहिए।
जलदीप बहते हुए
शाम को हम फिर हर की पौड़ी तक गए। बहुतों ने खास तौर से कहा था कि
संध्या की आरती ज़रूर देखना। जहाँ आरती होती है, हमें
उसके सामने जगह न मिल सकी। फिर भी संध्या समय नदी किनारे घाट पर बैठना। वह भी अपार
जन-समूह के साथ। अलग ही अनुभव था । जलदीप बहते हुए आते। लहरों में खो जाते। शाम को
सारे रास्ते में पत्ते के बड़े-बड़े दोनों में आरतियाँ (दीप बातियाँ मिलती हैं।
पत्ते का दोना, उसमें थोड़े से फूल और बीच में छोटी-सी
बाती। पानी का वेग यहाँ बहुत है। कोई बाती ही जीवट दिखा पाती। वरना एक ही थपेड़े
में किश्ती उलट जाती। कुछ कागज़ी पहलवान किस्म के युवक नदी पार करने के करतब भी
दिखा रहे थे। धीरे-धीरे ये युवक इन जलदीपों को मंझधार में या जहाँ पानी समतल बह
रहा होता, वहाँ ले जाते। दीपदान करने वाला अपने दीप
को दूर तक जलते देखना चाहता। नदी के साथ यह सम्बन्ध अद्भुत है। हम नदी में डुबकी
लगाकर अपने भूत और भविष्य को निर्मल कर लेना चाहते हैं। जल में प्रकाश की धाराएँ
जगमगा देना चाहते हैं।
भोजन में खीर कुल्हड़ में दूध
रात को भोजन ढूँढ़ते हुए हम लोग मुख्य बाज़ार यानी रेलवे स्टेशन की
तरफ आ गए। दिल्ली के चाँदनी चौक में हरिद्वार के वैष्णव भोजनालयों का नाम चलता है।
यहाँ भी उन्हीं की तलाश थी। दिन में शहरी किस्म का रेस्त्रां हमारे पल्ले पड़ा था।
हरिद्वार की कोई स्थानीयता उसमें नहीं थी। अब मुख्य सड़क पर ज़रा आगे चलने पर मिला
एक अग्रवाल भोजनालय । छोटा और साफ सुथरा । बाकि व्यंजनों के अलावा कटहल की सब्जी, कढ़ी और खीर भी मिली। भोजन में खीर। तीर्थ पूरा हुआ। बाहर निकले तो
बगल में मिष्ठान भंडार था। बड़े कड़ाह में दूध पक रहा था। कुल्हड़ों में बिक रहा
था। पैप्सी तथा कोला और फ्रूटी भी है। लेकिन लोगों में दूध-प्रेम अभी बचा है। बालक
फैंट-फैंट कर पिलाए जा रहा था। हमने कुल्हड़ में दूध पीने और फिर कुल्हड़ फोड़ने, दोनों के आनंद लिए।
जल से रिश्ता है निर्मल
अगली सुबह हमें ऋषिकेश होते हुए देहरादून चले जाना था। गंगा स्नान का
लाभ, ज़ाहिर है उठाना ही था। आज हर की पौड़ी नहीं गए।
सीढ़ियाँ, पत्थर, घाट, मंदिर, बहता पानी, लोग, सुबह की धूप। मंद-मंथर जीवन। पुरुष स्त्रियाँ गंगा स्नान का पुण्य कमा
रहे थे। स्त्री-पुरुष देह का कोई ऐसा भेद नहीं था। सब सहज भाव से अपने-अपने में
मग्न थे। नदी-स्नान माने बीच मझदार में जाने जैसा यहाँ भी नहीं है। पहाड़ से बस
सीढ़ी उतर के नीचे आई हुई धियान है। छरहरी । चपल । खिलखिलाती। छलछलाती। दनदनाती।
यह जा वह जा। इसलिए प्रिय जन अपनी डोर अपने हाथ में थामे रहते हैं। अगर हाथ उठाकर
बीच मझधार में छलांग लगाएँगे तो हो जाएगा, यह जा वह जा।
इतना तेज और वेग है भागीरथी में। घाट के साथ-साथ सीढ़ियाँ बनी हैं। थोड़ी दूरी पर
जंजीरें लगी हैं। प्रियजन इन लोहे की डोरों को थामे-थामे नहाते हैं। इन्हें न
थामें, दिल और पैर कमज़ोर हो तो भागीरथी थाम लेगी
हाथ। ऐसा कि फिर कभी न छोड़ेगी। लेकिन जंजीर के भीतर तय की गई सीमा-रेखा में रहें
तो गंगा निरापद है। सीमा में तो सभी कुछ निरापद होता है। इसी निरापद स्थिति में सब
बड़े अनौपचारिक ढंग से चल रहा है। नहाना भी, कपड़े धोना
भी। यहाँ धर्म का, कर्मकांड का घटाटोप नहीं है। जल से रिश्ता
है। निर्मल । निर्कुंठ । उसी बहते जल से अँजुरी भर कर उसी को समर्पित कर देने का
अनौपचारिक और निजी किस्म का सम्बन्ध । यह दृश्य, यह
सम्बन्ध भीतर जीवित है। जैसे घर में गंगाजल रखा है, उसी
तरह यह मन-प्राण में धरा है।
ऋषिकेश के रास्ते में शांतिकुंज रुके। बहुत बड़ा परिसर है। नियोजित ।
उसमें प्रवेश करने के लिए एक स्वागत कक्ष है। वहाँ तैनात सेवक ने संस्थान का परचिय
देने के लिए कक्षा लगा ली। शांतिकुज का बीज-मंत्र गायत्री मंत्र है। उसी की महिमा
महात्म्य और वेदांत की वैज्ञानिकता समझाने लगे। हमें भूख लगी हुई थी। संकोचवश उनके
प्रवचन में विघ्न डालने की हिम्मत भी नहीं थी। कक्षा के दूसरे विद्यार्थी, हमारे अजनबी सहपाठी एक डाक्टर दंपति ने हमारी सहायता की। उन्हें जाना
था। रेलगाड़ी का वक्त हो रहा था। कक्षा स्थगित हुई। तब तक दूसरे आगंतुक भी आ गए
थे। हम कैंटीन ढूँढते हुए स्वागत कक्ष से बाहर निकले। धूप चढ़ आई थी। पता चला
कैंटीन साफ-सफाई के लिए बंद है। भोजनालय खुला है। अंधे को क्या चाहिए, दो आँखें। वहाँ भागे । बीजी को भी घसीट ले गए। बिना दीवारों के एक हाल
में पांतें बैठ रही थीं। अपनी थाली,
गिलास लेकर हम भी बैठ गए।
अभ्यागत। कद्दू की सब्जी, रोटी, चावल
और कढ़ी। गर्मागर्म । बड़ी तृप्ति मिली। उठकर थाली धोई और चल पड़े। यह प्रसाद था।
लंगर लगा था। हर रोज लगा रहता है। आगे दफ्तर के बरामदे में एक सज्जन पत्रिकाओं का
चंदा और दानादि स्वीकार करने के लिए बैठे थे। उन्होंने यहाँ की गतिविधियों पर और
प्रकाश डाला। पर कक्षा के रूप में नहीं, अनौपचारिक ।
यहाँ शिविर लगते हैं। सप्ताह,
पंद्रह दिन और एक महीने के ।
पिताजी ने मन बना लिया। एक शिविर में भाग लेंगे। शांतिकुंज में जड़ी-बूटियों की या
कहें देसी या आयुर्वेदिक दवाइयाँ भी मिलती हैं। हम भी कुछ बानगियाँ खरीद लाए।
शिविर के लिए पंजीकरण कार्यालय में गए। वहाँ का माहौल थोड़ा दफ्तरी किस्म का था।
नौजवान प्रबंधक किसी व्यवस्थागत उलझन को सुलझा रहे थे। थोड़ी जानकारी हमने ली।
लेकिन शिविर की बात अंततः भविष्योन्मुखी हो गई और हम ऋषिकेश की ओर आगे बढ़े।
करीब घंटे भर बाद फिर गंगा दिखी। शांत, गठी
हुई। लक्ष्मण झूले से देखिए,
मानो पहाड़ों ने अपनी
अँजुलियाँ ढार दी हैं और जलधारा अपने में ही लिपटी हुई अजस्र बहे जा रही है।
ध्यानमग्न । अक्षत जल । अक्षय भंडार । ऋषिकेश के इस पार वही बाज़ार, दुकानें। उस पार पहाड़। सीधा खड़ा है ऊँचा। आश्रमों की पांत की पांत
सटी हुई है। पहाड़ की छाती से चिपकी हुई। लगभग हर हिंदू सम्प्रदाय का केन्द्र यहाँ
पर है। इस पार या उस पार । कहीं भी। जहाँ जगह मिल गई। जैसे स्वर्ग के द्वार पर
अपनी चुंगी सबने बना रखी है। मानो यह भाव मन में रहा है कि आगे की पंक्ति में ऐसी
जगह चुन ली जाए, जहाँ ईश्वर की नज़र सबसे पहले पड़े। हमारा
समाज कितनी पाँतों में एक साथ रहता है। एक तरफ ईश्वर अन्तर्यामी, सर्वव्यापक और दूसरी ओर ऐसे आध्यात्मिक पत्तन, जहाँ
से भव सागर पार करने के लिए अलग-अलग डिज़ाइन के पोत छूटते। हमने इस सारे दृश्य पर
विहंगम दृष्टि ही डाली।
मसूरी और कैम्पटी
शाम करीब साढ़े चार बजे देहरादून की दीपलोक सोसाइटी में एक मकान में
दो भाई हंस- हंस कर एक-दूसरे को मिठाई खिला रहे थे। इसमें हैरानी की कोई बात नहीं
है, अभी भी ऐसे भाई हैं, जो
आपस में हंस-बोल लेते हैं। अगले दिल मसूरी गए। शाम को लौट आए। दिन में कार वाला
पहले कैम्पटी फॉल ले गया। पहाड़ में पहले चढ़ो, फिर
उतरो । कैम्पटी माने एक झरना। सड़क उसके बगल से गुज़रती है। नीचे से उतर कर एक
तालाब । टोह्बा । रास्ते में वही आलम। दुकानें । यहाँ चाट-मसाले और फोटोग्राफरों
की भीड़ थी। झरने से बना कुंड छोटा था। लोग बहुत थे। हम भी नहाए । सिर्फ अरू
(बेटी) के लिए। तीन फुट गहरे तालाब में सिर्फ उसी ने सबसे ज़्यादा आनंद उठाया।
जैसे सेना मोर्चे पर लड़ती है,
सेनापति पीछे शिविर में रहता
है। हम इस झरने तक मुस्तैद सिपाहियों की तरह जा आए। बीजी को एक चाय की दुकान में
बिठा दिया था। पैदल चलें उनके दुश्मन । सड़क इस झरने से होकर गुज़रती है। बस अड्डे
की व्यवस्था नहीं है। कारों और टूरिस्ट बसों की रेलमपेल है। पहाड़ पैट्रोल से
महकता है। ज़्यादा देर वहाँ नहीं रुक सकते । नीचे घाटी में जल की खेलों जैसा कुछ
संकुल अधबना है। बनेगा तो वाटर किंगडम जैसा कुछ होगा। जैसे आजकल टीवी में दिखता
है। पगलाई हुई-सी जनता पानी छपछपाती रहती है।
मसूरी लौटे तो रोप-वे में सैर करने की अतृप्त इच्छा जाग उठी। मसूरी की
माल रोड शिमला का स्मरण कराती है हालाँकि यह ज़्यादा लम्बी चौड़ी समतल है। शिमला
में राज्य की राजधानी होने के नाते व्यस्तता और गुरुता का भाव है। रोप-वे का अड्डा
दूसरे छोर पर है। बीजी और अरू को साईकल-रिक्शे पर डिस्पैच करा दिया। हम पैदल
पहुँचे। उबले हुए मसालेदार चने खाते हुए रोप-वे में भीड़ थी। आधा घंटा लाइन में
खड़ा रहना पड़ा तो जाके बारी आई । उड़नखटोले की यह ट्राली पहाड़ी के सिर पर ले गई।
एक मैदान है मैदान नहीं, जल भंडार की छत है। बाज़ार यहाँ भी सज गया
है। अस्थाई किस्म के स्टूडियो । नीलामी में खरीदे डिजनी लैण्ड के झूलेनुमा खेल ।
सारा परिवेश कृत्रिम, शुष्क और लूट लेने पर आमादा। हम दस मिनट
से ज़्यादा वहाँ नहीं रुक पाए उड़नखटोले में बैठ के उतर आए। माल में सैलानियों की
तरह चहलकदमी की। एक दुकान में जलेबियाँ जाती बार ही दिख गई थीं। समोसे, जलेबी और दूध। नए चलन के सिर स्वाह। अपने देसी नाश्ते ने तृप्त किया।
जिस लड़के ने सब परोसा, उससे बतियाने में भी मज़ा आया । शाम छः
बजे हम कार में हवा खाते हुए मसूरी से उतरे। हवा ज़्यादा इसलिए खानी पड़ रही थी
क्योंकि कार की विंड स्क्रीन टूट गई थी।
कैम्पटी फाल से लौटते समय एक कैंची मोड़ पर एक गुम पटाके की आवाज़
सुनाई दी। कार के आगे के काँच की किरचें हमारे ऊपर बिखर चुकी थीं। आगे बीजी और
ड्राइवर था। उनके ऊपर काँच वर्षा ज़्यादा हुई। समझ नहीं आया, अचानक
यह क्या हुआ। सड़क के दूसरे किनारे पर कुछ लोग खड़े थे। उन्होंने देखा था, ड्राइवर को भी उड़ती-सी झलक मिली थी। पानी पीने की थर्मोस्टेट की बड़ी
केनी ऊपर किसी के हाथ से छूटी और हमारी कार के अगले शीशे पर आ गिरी थी। वह आदमी भी
सहम गया था ड्राइवर ने जब ऊँची आवाज़ में उससे दरयाफ्त किया तभी उसने यह बात कबूल
की। हमारी भी धड़कन सामान्य हुई तो मैंने उसे कहा भाई, अब
कम से कम कार को साफ तो कराओ । सब जगह किरचें थीं। वह अखबार ले आया और मदद करने
लगा। ड्राइवर ने सात सौ रुपए लेकर शीशे की भरपाई कर ली।
घर जाने के रास्ते अनेक
देहरादून से धर्मशाला की यात्रा लंबी थी। ड्राइवर इस बार नया था। उसने
बड़ी डींग हाँकी थी कि सारे मुल्क में गाड़ी चलाने का पचास साल का अनुभव है। उसे
झेलने पर पता चला कि उसका अनुभव उम्र पर ज़्यादा खर्च हुआ था। अब उम्र बढ़ गई तो
हद दर्जे की एहतियात में बदल गया। उम्मीद थी दस घंटे में पहुँच जाएँगे। लग गए
पंद्रह। तय हुआ था कि पौंटा साहब और नाहन होते हुए जाएँगे। सुबह-सुबह जब देहरादून
शहर से कोई दस किलोमीटर बाहर निकल आए तो मैंने पूछा। ड्राइवर महाराज बोले- 'नहीं, हम यमुनानगर, अंबाला
होते हुए जा रहे हैं। दूसरी सड़क खराब है।' (बाद में
अनुभव से जाना कि वे पहाड़ में गाड़ी चलाने से घबराते थे)। हम गर्मी से बचने के
लिए पहाड़ के रास्ते से जाना चाहते थे । उससे भी बड़ा कारण हिमाचल की धरती के
स्पर्श का था। जब भी जाना होता है,
चंडीगढ़ से या पठानकोट से, तो हिमाचल की सीमा रेखा छूते ही दिल में छलाक-सी होती है। पठानकोट शहर
के बाहर चक्की का पुल पार करते ही धौलाधार के दर्शन हो जाते हैं। पसीना चू रहा हो
तो भी भीतर ही भीतर ठंडक की फुहार रोमांच से भर जाती है।
चंडीगढ़ से जाते वक्त भाखड़ा डैम, नंगल
और उसके बाद ऊना से गुज़रते हुए यह रोमाच हालाँकि उतना नहीं होता। क्योंकि सरहद तो
हिमाचल की शुरू हो जाती है, पर इलाका वैसा ही है सीधा सपाट । वो तो बस
जब चिंतपुर्णी या दूसरी तरफ नैहरियाँ चढ़ने लगती है तब भीतर कोलाहल मचता है। यह
नैहरियाँ वही जगह है, जब करीब बीस साल पहले एक रात अपने कॉलेज
के साथी विवेक कौल के घर रुका था। वह बैंक में भर्ती हो चुका था और मैं जालंधर में
जनवादी लेखक संघ के पहले अधिवेशन में भाग लेकर लौट रहा था। ये वे दिन थे जब गुरु
नानक देव विश्वविद्यालय से एम. फिल. कर चुका था। अमृतसर लगभग छूट गया था। धर्मशाला
जाने वाली बस छूट गई थी। तभी वहाँ एक ट्रक में चचेरे भाई अश्विनी मिले। वे
होशियारपुर से अपने व्यापार का सामान लेकर आ रहे थे। उन्होंने खबर दी कि बेबेजी
(दादी) का देहांत हो गया है। बेबे धर्मशाला में हमारे ही घर पर थीं। वे नहीं रहीं।
मैं अधिवेशन में रहा। पता ही नहीं चला। आधी रात तक विवेक के पास रुका। सुबह तीन या
चार बजे चंडीगढ़ या शिमला से आने वाली नाइट बस पकडी और घर पहुँचा।
इसी नैहरियाँ के कुछ मील आगे गरली परागपुर में प्रो. शिव कुमार का घर
है। वे कॉलेज में हमें अर्थशास्त्र पढ़ाते थे। उनके जैसा समर्पित अध्यापक और नहीं
मिला। उनकी देखरेख में यहीं पर आँखों के ऑपरेशन के शिविर में हमने स्वयं सेवक की
भूमिका निभाई है। चिंतपुर्णी की तरफ से प्रवेश करो तो भी एक गरली आती है। वहाँ से
कड़ोआ गाँव को उतरते हैं। वहाँ डीपी का घर है। उसके घर पहली बार तब गया, जब धर्मशाला कॉलेज से काव्य पाठ प्रतियोगिता में भाग लेने हम ढलियारा
कॉलेज में आए। पुरस्कार पा गए थे। उन दिनों वहाँ रेखा डढवाल पढ़ाती थीं उन पर अपनी
काव्य कला का रौब भी डाल आए थे । ऐसी खुशफहमी तब थी। दूसरी बार कड़ोआ तब जाना हुआ
जब डीपी के छोटे भाई की गोली लगने से हत्या हो गई। इन पहाड़ियों की तरफ से गुज़रने
पर अब भी भीतर घमासान ही मचता है।
और ये टैक्सी वाले ड्राइवर महाराज थे कि हमें नाहन से हिमाचल में
प्रवेश करने का अनुभव नहीं लेने देना चाहते थे। उनसे अच्छी खासी चिखचिख हो गई। वे
घबरा गए। लौटने को तैयार हो गए। लेकिन न जाने क्यों मैंने ही समर्पण कर दिया। कार
सीधी यमुना नगर की सड़क पर दौड़ पड़ी। एक तरह से अच्छा ही हुआ। नाहन के बाद भी
चंडीगढ़ से होकर ही आना पड़ता । मेरा भ्रम था कि हम सीधे कीरतपुर निकलेंगे।
आनंदपुर पहुँचते भूख लग आई थी। सोचा यहीं कुछ खा लिया जाए। पुरानी
किस्म के नए कोट कंगूरे यहाँ बहुत बन गए हैं। इन नई इमारतों की तरफ आवाजाही कम
दिखती है। शक्ल से लगता है पहुँच आसान भी नहीं है। सब कुछ सामने है लेकिन दूर है।
इतना दूर कि क्या है, यह भी खबर नहीं। परिसर के दालान में
बाज़ार बना है। यह बाज़ार पंजाब,
हरियाणा, हिमाचल के उन कृत्रिम कस्बों की तरह है, जहाँ
सब एक ही जैसी चीजें बिकने के लिए सजी होती हैं। उस सारी सजावट में वैसी ही बेचैनी
होती है जैसी जुकाम की खुश्की में होती है बड़ी मुश्किल से पहले तो पेशाब करने की
जगह ढूँढ़ी। हम नगर बसा लेते हैं,
इन ज़रूरी सुविधाओं की
ज़रूरत नहीं समझते । वहाँ भी प्रसाधन कक्ष के नाम पर शेड तो बने थे, पानी की व्यवस्था बदस्तूर नहीं थी। यह कस्बा दिल्ली जैसा भी नहीं है
कि कोई बड़ा दफ्तर या होटल हो और अंग्रेज़ी झाड़कर सुविधा पाई जा सके। हो भी तो
जिन्हें अंग्रेज़ी नहीं आती,
वे अपनी हाजत कहाँ निबटाएँ।
खाने के लिए एक दुकान ढूँढ़ी। चुनाव ज़्यादा नहीं था, फिर भी। लोहे की कुर्सियों और सनमाइका की मेजों वाली। परांठे हमने
बांध रखे थे। छोले खरीद लिए। लेकिन खाने से ज़्यादा ध्यान मक्खियाँ उड़ाने पर
दिया। लस्सी अलबत्ता स्वाद लेकर पी।
अपने इलाके की सरहद आने वाली थी। पर ऊना शहर के बाहर ही कार दगा दे
गई। करीब डेढ़ घंटा बनवाने में लगा। सड़क यात्रा का एक और अनिवार्य कर्मकांड
सम्पन्न हुआ। वहीं एक बड़ा खुला-सा प्लाट था। हाउसिंग सोसायटी का बोर्ड लगा था। तो
नए ढब के शहरीकरण में ऊना ने पग धर दिया है। अब वहाँ एक जैसे मकान बनेंगे। फिर एक
जैसी सुविधाएँ आएँगी। एक जैसा रहन-सहन होगा। एक जैसी सोच होगी। एक जैसा होगा तो
मौलिक कितना होगा? मौलिक नहीं होगा तो सोच क्या होगी? सोच नहीं होगी तो समाज क्या होगा ? तो
क्या यही होगा भविष्य का समाज?
चारों तरफ छाए हुए बाज़ार की
कालोनियाँ !
ऊना बस अड्डे के पास से हमने तरबूज खरीदे। वैसे ही धारीदार, हल्के हरे रंग के जैसे मुंबई में मिलते हैं। यह पारंपरिक गाढ़े हरे
रंग जैसे नहीं हैं। आम भी वैसे ही। जैसे देहरादून में भी हैं। चंद बरस पहले ठियोग
में भी ऐसे ही आम थे। रामपुर बुशहर में भी होंगे। कुल्लू में भी । सोडियम पके ।
वक्त की बचत करने के लिए चिंतपुर्णी की तरफ से नहीं गए। नैहरियाँ की
चढ़ाई ही चढ़ी। दिन ढल गया था। बीस बरस पहले का-सा ही वक्त था। इस बार रुके नहीं।
दम साधे निकल गए। वहाँ भी नहीं,
जहाँ शिविर लगा था। गरली
परागपुर की उन दुकानों के पास भी नहीं, जहाँ से प्रो.
शिव कुमार के घर की तरफ को चढ़ते हैं। ऊहापोह थी मन में, क्या
ज़रा देर रुकना चाहिए? प्रणाम करके आगे बढ़ना चाहिए? गतिमान वाहन ज़्यादा देर दुविधा में नहीं रहने देता। मुख्य सड़क पर आए
तो कड़ोआ गाँव, डीपी, उसके
वृद्ध माता-पिता ... दिमाग के पीछे खिड़की खुली ... बंद हो गई। यह गृह राज्य में
कैसा प्रवेश है। पर यह धमाचौकड़ी पार्श्व में है। सम्मुख घिरता अँधेरा ही प्रमुख
है।
चलते-चलते आकर रुके तो कांगड़ा में। कांगड़ा की ऐसी कोई खिंचती चली
आती स्मृति नहीं है। यूँ कुरेदने लग जाओ तो तब से है जब मैं तीसरी में पढ़ता था और
लाहौल जाने के वास्ते मनाली जाने वाली बस में बैठना था। बस हार्न बजाती थी, मैं डर के मारे चिल्लाता था। लेकिन वह संसार बर्फ के बहुत नीचे दबा
ढका है। पिताजी को फलों से संतोष नहीं हो रहा था। मिठाई के बिना घर आगमन अधूरा
रहता है।
कांगड़ा में भी अब पार्किंग एक समस्या हो गई है। हम पुराने बस अड्डे
से मंदिर की तरफ करीब दस मिनट बाद लौटे। घर में सबकी मनभावन बरफी खरीदी। वापस आए
तो बीजी बिफर रहीं थीं। उन्हें हाजत हो आई थी। नगर पालिका ने यहाँ कोई इंतजाम किया
नहीं है। निर्जल शेड निर्माण का भी नहीं। आसपास अब निरापद खेत भी बचे नहीं हैं।
सड़क से यात्रा करने का यह घनघोर यथार्थवादी संकट है। दिल्ली से लेकर धर्मशाला तक
इसका विकराल अनुभव होता रहा। मैं इसी आसन्न संकट के कारण एक बार रामपुर हापुड़ की
यात्रा में पिटते-पिटते बचा हूँ। अभी उसका ज़िक्र न ही करूं तो बेहतर।
करीब पंद्रह घंटे की यात्रा के बाद हम लोग अपने आँगन में अपनी टाँगें
और पीठ सीधी कर रहे थे। इधर यह बदलाव आया है कि वाहन आँगन तक पहुँच जाता है। अब
आँगन कितने दिन तक रहेगा पता नहीं।
महबूब शहर के सदके
धर्मशाला को निस्संग भाव से नहीं देखा जा सकता। समय की तुला पग-पग पर
शहर के सामने रहती है। अक्सर यही प्रतिक्रिया होती है कि अरे! अच्छा! अब यहाँ यह
नहीं रहा। यह हो गया है। कभी-कभार प्रतिक्रया होती है- देखो, यह
अभी भी है। बदलने न बदलने वाली इमारतें, जगहें या लोग
कुछ भी हो सकता है। सिविल बाज़ार से शाम नगर की तरफ को नज़र दौड़ाई जाए तो शहर
दाड़ी तक फैल गया दिखता है। पहले दाड़ी गाँव अलग होता था।
कचहरी अड्डे की पता नहीं क्या जिद्द है कि यह नहीं बदलता । कोतवाली का
बाज़ार विकसित हो गया है। शहर चीलगाड़ी, दाड़ी, सकोह, घनियारा, चड़ी, काले पुल की तरफ काफी फैल गया है। लेकिन कचहरी की दुकानों में एक
उदासी उसी तरह बरकरार है जैसे प्यारे लाल जी के चेहरे पर अभी भी रहती है। अवसाद
ग्रस्तता । प्यारे लाल जी हमारे पड़ोसी हैं। एक ठीक-ठाक दुकानदार के भाई हैं। हद
दर्जे के खुद्दार हैं। लेकिन काम करके राजी नहीं। उनकी पत्नी ने अगर घर न संभाला
होता, तो उजड़ गया होता। और ये भाई प्यारे लाल बीस साल
पहले भी वैसे ही दाढ़ी बढ़ाए,
अपनी खाली दुकान की गद्दी पर
बैठे रहते थे, जैसे अब विराजते हैं। हालाँकि उनकी यह
दुकान कचहरी अड्डे में नहीं कोतवाली बाज़ार में उन अग्रवालों की दुकान के पास है, जो खूब चलती है। इन्हीं अग्रवालों का एक भाई हमारा सहपाठी होता था।
बातूनी, गप्प लगाने में माहिर। कॉलेज में कई नाटक
हमने साथ-साथ किए । कोतवाली बाज़ार में प्यारे लाल जी जैसे अवसादग्रस्त
कोने-नुक्कर कम हैं। कचहरी, डीपू बाजार, सिविल
बाज़ार पर जैसे प्यारे लाल जी की छाया है। यह उदासी कचहरी के उस परिसर में भी है
जहाँ तहसीलदार का दफ्तर है। ऐसा लगता है इन दुकानों में ग्राहक ज़्यादा नहीं आते।
जो आते हैं उनके पास पैसे ज़्यादा नहीं होते । हो सकता है हमारी ही नज़र पूरा सच न
देखती हो। सिविल लाइन्स की तरफ ज़्यादा ध्यान ही नहीं जाता। हालाँकि वहाँ सलीके की
कोठियाँ हैं। कोठियाँ तो वैसे नाम की सारे ही कस्बे में हैं। पर यहाँ नीलकंठी की
करीने से कटी बाड़ के भीतर सजे-धजे लॉन भी हैं। वहाँ डॉ. खन्ना का क्लीनिक भी है
जहाँ सुबह से ही मरीज़ों का तांता लग जाता है। वह वंश ही डाक्टरों का है। वैसे तो
अब एक बड़ा-सा क्लीनिक रामनगर में भी बन गया है डॉ महाजन का । वह बाद में बना, मारुति का सर्विस स्टेशन पहले खुला था।
यूँ तो सभी जगह उठा-पटक चल रही है। हमारे विकास का डाँचा ही है, शहरों को ठसाठस भरो । लोहा-कंक्रीट के डिब्बे खड़े करते जाओ। उनमें
लक्कड़-पत्थर भरते जाओ। क्या है,
कैसा है, विचार मत करो । जो पड़ोसी कर रहा है उससे इक्कीस करने की कोशिश करो, उन्नीस नहीं। दिन- रात इसी जुगत में रहो। इस शहर की रहनी में भी फर्क
पड़ गया है। ज़्यादातर जनता-जनार्दन बाबू क्लास है। नई पीढ़ी में पति-पत्नी दोनों
कमाऊ हो गए हैं। आमद बढ़ी है। ज़्यादा खर्च करने की आदत भी पड़ी है। भागमभाग उसी
अनुपात में बढ़ गई है। शहर में वाहन भी बहुत हो गए हैं। अब तो डाकखाने, सिविल बाज़ार में सिग्नल लग गए हैं। शहर से एक हिन्दी अखबार निकलना
शुरू हो गया है। बड़े क्षेत्रीय अखबारों ने उत्तर भारत को नए बाज़ार के रूप में
मूंडा है। इसलिए अब सुबह-सुबह आठ बजे तक तीन-चार नए अखबार मिल जाते हैं।
मैक्लोडगंज में पेड़ों और भेठों की मार-काट मची है। कंक्रीट के पहाड़
खड़े किए जा रहे हैं। यह जगह एक अलग तरह के पर्यटन केन्द्र के रूप में उभरी है।
छोटी-सी पहाड़ी है। ठसाठस भर गई है। हम लोग धर्मशाला अपने घर आते हैं। सैलानी भाव
तो रहता नहीं है। मैक्लोडगंज़ जाने के दो आकर्षण होते हैं। एक हैं रामस्वरूप।
कॉलेज के वक्त से चले आ रहे अंतरंग। युवा नेता। कुशल आयोजक । उनके साथ प्रेम सागर।
पेशे से पर्वतारोहण सहायक । हद दर्जे के मिलनसार और विनम्र। दूसरा आकर्षण बजाते
खुद मैक्लोडगंज है। गिरजाघर से बाज़ार तक की सड़क, सीलन, देवदार, हवा, ठंड, धूप, बारिश, मॉनेस्ट्री, तिब्बती वास्तु में चटख रंग वगैरह-वगैरह। क्या यही सब मिलकर सैलानी
भाव बन जाता है? शायद। जब हम घर में होते हैं तो कुछ नहीं
देख रहे होते। दूरी से देखते हैं तभी देखना हो पाता है। रामस्वरूप और उनके मित्रगण
इंडो-तिब्बत संस्था के जरीए मैक्लोडगंज में नए प्राण फूंकने के प्रयास कर रहे हैं।
यहाँ की समस्या यह है कि भारतीयों से ज़्यादा विदेशी पर्यटक आते हैं। धन विदेशियों
के पास ज़्यादा होता है। यह जगह एक तरह का नुमाइशी द्वीप बन गया है। भारत, भारतीय संस्कृति,
बौद्ध धर्म के नाना रूप
नानाविध प्रस्तुत किए जाते हैं। सार कम दिखावा ज़्यादा होता है। कई बार लगता है यह
कोई अलग ही भूखण्ड है। स्थानीय जनता से कोई सम्बन्ध नहीं। सारे संसार से भाग कर आए
हुए लोग। गुआचे (खोए) हुए लोग। उनकी उनमें ही खोई हुई दुनिया।
हम लोग चिनार लॉज के खुले रेस्तरां में कॉफी पीने गए। कोई मेज़ खाली
नहीं था। एक विदेशी एक मेज़ पर बैठा पढ़ रहा था। बाकी जगहों के लिए दुर्लभ यह
दृश्य यहाँ बहुत आम है। अक्सर लोग दिख जाएँगे। कुछ पढ़ते हुए या लिखते हुए। शायद
डायरियाँ। दुकानों, होटलों, लॉजों, रेस्तराओं में। खुले में। किसी पेड़ के नीचे, किसी
पत्थर पर, सड़क या रास्ते के किनारे । कहीं भी। जैसे
किसी को कोई जल्दी नहीं है। ईर्ष्या होती है। ऐसे कुछ महीने, कुछ
हफ्ते, कुछ दिन, कुछ
घंटे ही मिल जाएँ। इस द्वीप में हमारी दुनिया के लोग भी झाँक आएँ। एक आदमी दनदनाता
हुआ उस मेज तक आ गया। कहने लगा,
'यह पढ़ने की जगह नहीं है।
खाली कर दो।' सारा माहौल थोड़ा सख्त हो गया। हवा अपमान
से भारी हो गई है। युगल अपना सामान समेट कर रेस्तरां से चला गया। कुछ पल बाद लौट
आया। बेरे से पूछा, 'क्या वह मालिक था?' बेरे
ने कहा, 'हाँ।' 'उससे
कहना थोड़ी विनम्रता से बात किया करे ।' युगल ने अपने
अपमान पर विचार किया होगा। नसीहत के रूप में अहिंसक और सभ्य प्रतिरोध कर दिया।
दलाई लामा के निवास से कुछ मीटर दूरी पर ऐसी शांत प्रतिक्रिया अस्वाभाविक नहीं थी।
एक और दिन हम भागसू नाग तक गए। सुमनिका का भाई, पत्नी
और बच्ची सहित आ गया था । मैक्लोडगंज से भागसू तक का करीब तीन किलोमीटर का रास्ता
पैदल तय किया। रास्ते में अरू की चप्पल टूट गई सुमनिका ने अपनी उसे दे दी। मेरी
चप्पल दोनों में से किसी को आ नहीं सकती थी। सुमनिका ने देवदारों वाली उस धरती का
नंगे पैर से स्पर्श किया। धरती के इस नज़दीकी स्पर्श का अनुभव लेते हुए जल प्रपात
तक जाना मुश्किल था। रास्ता पिछले बरसों की तुलना में कुछ ज़्यादा ही खराब था।
मंदिर तक गए। लोग साबुन मल के पानी में घुस जाते हैं। पानी साफ नहीं रह पाता ।
छोटे कुंड में बच्चे नहाए। नहाए क्या, ठंड के मारे
पानी छू-छू के चीखें मारते रहे। पकड़ के डुबकी लगवाई तो रोने लगे। बड़ी मुश्किल से
बन्नी पर बैठ कर पैर पानी में डाल के छपछपाते रहे। बीच-बीच में छाती तक देह भिगोते
रहे। बच्चों का खेल, जिसमें रम गए, रम
गए। उसी कुंड में स्थानीय गद्दी बच्चे भी नहाने आ गए। स्कूल से लौटे, तफरीह मना रहे थे। करीब सात-आठ साल का बच्चा बड़ी अदा से डुबकी लगाने
को खड़ा होता। हर बार घबरा कर छोटी-सी छलांग लगाता। पर छलांग लगाने की तैयारी में
उसके चेहरे का तनाव, इरादा, जोश
देखने लायक था।
मैक्लोडगंज लौटे तो बारिश शुरू हो गई। यह इस सारे ही शहर की खासियत
है। ज़रा गर्मी तेज हो जाए, बादल घुमड़ आएँगे। देखते ही देखते बरस
जाएँगे। इधर मौसम में तब्दीली आई है।
फिर भी इस नियम को प्रकृति साध रही है। बाज़ार के सिरे पर ही हम बारिश
में फंस गए। जहाँ छत दिखी घुस गए। यदु, सोनिया एक
दुकान की परछत्ती के नीचे रुके। एकदम नए ढब की दुकान। काँच की दीवार के अंदर सजा
सामान । चमकता हुआ। हमें सड़क के दूसरी ओर पनाह मिली। चाय का छोटा-सा खोखा । बड़ी
मुश्किल से उसमें अटे। ऐसे खोखे यहाँ कि आदि दुकानें हैं। इन खोखों में स्टोव
(पहले लकड़ी की भट्ठी होती थी),
चाय का पैन, कड़ाही में तेल,
पकौड़े। एक दो मेज और बेंच।
सरलतम और सहजतम व्यवस्था। पहले लोग इन्हीं से संतुष्ट हो जाते थे। चाय पकौड़े के
अलावा ज्यादा से ज़्यादा बेसन की बर्फी खा ली। अब ऐसी दुकानों के लिए खास जगह नहीं
बची है। नए नकोर रेस्टोरेंट बन गए हैं। दुनिया भर के व्यंजन वहाँ मिल जाएँगे। इस
सब का उपभोग करने के लिए आपको पर्यटक बनना पड़ेगा। जो पर्यटक नहीं है, खरीददार नहीं है,
उसके लिए जगह नहीं है। लेकिन
स्थानीय व्यक्ति पर्यटक कैसे बन सकता है? सब लोग
पर्यटकों के पेशेवर जजमान भी तो नहीं बन सकते। तो वे कहाँ जाएँ? इस बाज़ार से कैसे निबटें ?
भागसूनाथ में हमें कथाकार बल्लभ डोभाल दिखे थे। उनकी एक पुस्तक की समीक्षा डॉ. बी. सी खन्ना के घर पर देखी। उस पुस्तक में जहाँ-जहाँ 'एक', 'दो', 'तीन' शब्द लिखा था, पेन से गोला लगा दिया गया था। लगा कोई तथ्यात्मक ग़लती नज़र में आई होगी। एक दो तीन को मार्क करने का और क्या आशय हो सकता है। लेकिन ये गोले आखिरी पन्ने तक बने हुए थे। पता चला, जो लोग इसे ले गए थे, उनके घर में बच्चे को जो समझ में आता था उसने आँक दिया। बालक को केवल एक दो तीन आते थे। उसने वही रंग डाले। आज तक ऐसी समीक्षा शायद किसी पुस्तक की न हुई होगी।
गुरुजी के पास मंडी जाना जरूर
इस बार मंडी जाने का प्रोग्राम था, प्रोफेसर रवि से मिलने। यूँ प्रोग्राम तो हर बार ही होता है, इस बार संकल्प दृढ़ था। जाना फलीभूत हो गया। तय किया कि अंदरेटा और बैजनाथ मंदिर देखते हुए जाएँगे। अंदरेटा के बारे में सुना ज़रूर था, देखा कभी नहीं था। अभी तक यह जानकारी थी कि वहाँ सरदार सोभा सिंह रहते थे। पालम घाटी में रहकर उन्होंने चित्रकारी की। इस साल शायद अप्रैल में ह्यूमन स्केप पत्रिका का अंक देखा। उसमें अंदरेटा पर एक लेख था। एक एनजीओ की पत्रिका का यह अंक वैकल्पिक जीवन शैलियों पर केंद्रित था। लेख में अंदरेटा का थोड़ा इतिहास था। लाहौर विश्वविद्यालय की एक रचनाकार नोराह रिचर्ड पिछली सदी में अंदरेटा में आ बसी थी। वहाँ उसने स्थानीय लोगों के साथ मिलकर नाटक/रंगमंच के प्रयोग किए। एक मुक्ताकाशी थियेटर भी बनाया। लाहौर, और बाद में पंजाबी विश्वविद्यालय का यह कार्यशाला स्थल जैसा बन गया। चित्रकार सान्याल भी यहाँ से जुड़े। अब उनकी बेटी अम्बा सान्याल वहाँ की देखरेख करती है। अपने गृहनगर के पड़ोस में ऐसा काम हो रहा है, जानकर बड़ी खुशी हुई। जोश में आकर अम्बा के नाम अंदरेटा चिट्ठी भेज दी कि हम मई में आएँगे और भेंट होगी। धर्मशाला पहुँच कर डॉ. बी. सी. खन्ना से भी बात की। उस इलाके में कला- साहित्य की खोज-खबर पेशे से मनोचिकित्सक इस डॉक्टर को खूब रहती है। नई पुस्तकों की जानकारी भी आप उनसे ले सकते हैं। शायर और मशहूर फिल्मी हस्ती जावेद अख्तर का भाई सलीम अख्तर भी शायर है, यह बात डॉ. खन्ना से ही पता चली थी। ये दोनों विद्यार्थी जीवन के साथी हैं। तीन साल पहले कोतवाली बाज़ार में हिमाचल केसरी के संपादक प्रवीण राय की चाय की पैतृक दुकान में मैंने और मुंबई के परिदृश्य प्रकाशन के रमन मिश्र ने करीब-करीब पूरा दीवान डॉ. खन्ना से सुना है। उन्हीं डॉ. खन्ना ने बताया कि नोराह रिचर्ड को तो पंजाबी नाटक की दादी माना जाता है। यह सुनकर अंदरेटा जाने का आकर्षण और भी बढ़ गया।
हम लोग करीब आठ बजे घर से रवाना हो गए। मारुति वैन कर ली थी। शायद
हिमाचल में टैक्सी के रूप में मारुति वैन का प्रयोग सबसे ज़्यादा होने लगा है।
दिल्ली, देहरादून में पूछा तो सलाहकार ने सुरक्षा
का हवाला देकर मना कर दिया। लेकिन यहाँ तो मारुति वैनों को देखकर 'लुह्सरी कुत्ती'
की उपमा याद आती है।
लुतर-लुतर यहाँ से वहाँ भागती रहती हैं और संख्या पर भी कोई रोक नहीं है। पर यह
उपमा वापस ले लेने का मन करता है,
क्योंकि ज़्यादातर नौजवानों
का यह रोज़गार है। और वे जान हथेली पर रखकर पहाड़ों में इस नाजुक वाहन को दौड़ाते
हैं। वैन से सुविधा यह हो गई कि यात्रा को अपने हिसाब से खींचा-ताना जा सकता था।
कलाकारों के ठीहे
हम पालमपुर शहर में नहीं घुसे। ठाकुरद्वारे से बाहर-बाहर निकल गए।
पहला भ्रम टूटा कि अंदरेटा पालमपुर से सटा हुआ है। असलियत यह है यह पंजरुखियाँ से
आगे जयसिंहपुर की सड़क पर है। सड़क के किनारे दो-अढ़ाई दुकानें अंदरेटा को आबाद
करती हैं। सरदार सोभा सिंह की कोठी (अब संग्रहालय बन गई है) अपनी नव्यता के कारण
अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है। हम पहुँचे तो उसी वक्त एक फैशनेवल-सी टूरिस्ट बस भी
रुक रही थी। पॉटरी का काम ढूँढते हुए हम करीब मील भर अंदर कच्ची सड़क में घुसे।
आगे आया पंजाबी विश्वविद्यालय का अवकाश गृह। लगभग तालाबंद । कहते हैं नोराह रिचर्ड्स के नाम
पर नाटक की वर्कशाप साल में एक बार लगती है। एक मोड़ और आगे गए तो मकानों का एक
झुरमुट आया। गेट। पेड़ पौधे । हरियाली। थोड़ा सलीका, थोड़ी
लापरवाही। यहाँ मिट्टी का काम हो रहा था। हम प्रसन्न हुए। कुछ नया, कुछ सार्थक मिला। यहाँ कुम्हार का पारंपरिक चाक और आंवा नहीं है। यह
वर्कशाप है। इसलिए ज़रा आधुनिक दिखती है। एक चश्माधारी नवयुवती स्टूल पर बैठकर
पैडल चला रही थी। सामने मेज पर छोटा चाक घूम रहा था। ऊपर एक कॉफी मग के आकार का
बर्तन घूम रहा था। नाई के न्हेरन जैसे औज़ार से नवयुवती उसे तराश रही थी। हमने उस
लड़की से बात की। वह पूना से आई थी पॉटरी की ट्रेनिंग लेने। उसकी एक और साथिन अंदर
एक भिगौने को सिरेमिक से चमकाने में लगी थी। बाहर बैठी लड़की ने पेंट और टीशर्ट
पहनी हुई थी। दोनों आपस में अंग्रेजी में बतियाती थीं। कुम्हार का चाक सोलह आने
वर्कशॉप बन गया था। लड़की ने वहाँ के लगभग मैनेजर से हमें मिलवाया। स्थानीय युवक ।
एक कॉटेज में शोरूम है, हमें वहाँ ले नगा। बड़े सलीके से, कलात्मकता और नाटकीयता और सायास लापरवाही से पॉटरी प्रदर्शित की गई
थी। पॉटरी में ज़्यादातर प्लेटें,
ट्रे, कप
आदि थे। कीमतें सौ से ऊपर। उन मैनेजर से पता चला कि यह प्रतिष्ठान चित्रकार गुरचरण सिंह का है। उनके बाद अब मनसिमरन सिंह (मिनी) उनके बेटे मिनी सिंह उसे देखते हैं। दिल्ली
से आते जाते रहते हैं। कुम्हार स्थानीय हैं। कुछ छात्र भी रहते हैं। सामान यहाँ
नहीं बिकता। दिल्ली और मुम्बई की एक-दो बड़ी दुकानों से सम्बन्ध जुड़ा है। वे इसे
बेचती हैं या निर्यात करती हैं। मैनेजर ने साथ में ही बने एक मकान की चाबी दी। यह
पॉटरी संग्रहालय था। उसमें मिट्टी की कई कलाकृतियाँ थीं। संग्रहालय छोटा था पर
दर्शनीय । दीवारों पर पलस्तर मिट्टी के रंग का था। गाँवों के कच्चे घर ऐसे ही पोते
जाते हैं गोलू (मिट्टी) से। यहाँ एहसास मिट्टी का था, दीवारें
पक्की थीं। छत भी ढलवाँ थी। पर थीं कंक्रीट की। शायद मजबूती के लिए। इस संग्रहालय
का विधिवत उद्घाटन अभी होना था।
मैनेजर को नोराह के बारे में जानकारी नहीं थी। मुक्ताकाशी थियेटर के
बारे में भी नहीं। अम्बा सान्याल का नाम भी वे नहीं जानते। कला-वीथी कलाकार सिंह
जी की थी। तभी वहाँ टूरिस्ट मंडली आ धमकी और पॉटरी को उलट-पलट कर देखने लगी, जैसे यह उसके लिए अनिवार्य पर्यटन कर्म हो। हमें बाहर निकलना ही उचित
लगा। अंदरेटा के नाम की फांस मन में फंसी रह गई। मैक्लोडगंज के रंग-ढंग देखने के
बाद भी फांस मन में गड़ती है। कविता,
कला, साहित्य
भी इसी तरह रड़कते हैं। मैकलोडगंज अपने सारे सौंदर्य, पर्यटन, कलात्मकता, अध्यात्म, शांति, विपश्यना, प्रकृति वगैरह के साथ विदेशियों पर ही
न्योछावर होता जा रहा है। स्थानीय लोग खारिज हैं। वह तो चलो पर्यटन के नाम पर और
तिब्बती शरणार्थियों के अजूबे और अंतर्राष्ट्रीयकरण के नाम पर द्वीप में बदल रहा
है। पर यह अंदरेटा ? गुरुओं के चित्रकार और अत्यंत लोकप्रिय
कृति सोहनी महीवाल के रचयिता सोभा सिंह और पंजाबी नाटक की नोराह दादी का गाँव
अंदरेटा। इसका क्या हुआ ? पॉटरी बनती है, बिकती
दिल्ली, मुंबई और विदेशों में है। दाम ऐसे हैं कि
स्थानीय खरीददार सुनकर ही बिदक जाए। दाम के अलावा सौंदर्यबोध भी एक बड़ी बाधा है।
हमारे यहाँ निम्न मध्यवर्ग में जीवन की रोज़मर्रा की बहुत-सी चीज़ों को उपयोगिता
की नज़र से देखा जाता है। चीज़ सस्ती और टिकाऊ होनी चाहिए। सौंदर्य के नाम पर
भड़काऊ हो तो चलेगी। इस मामले में भेड़चाल भी खूब चलती है। अलग तरह के रंग रूप या
देसीपन एथनिसिटी के नाम पर उच्च भ्रू वर्ग का फैशन बन जाता है। या पॉटरी ज़्यादातर
उसी वर्ग की सेवा में पेश होती है। हालाँकि गाँवों में आज भी ऐसी कला या शिल्प विद्यमान
है। ज़्यादा स्थानीय और ज़्यादा कलात्मक। वहाँ के लोग उसे स्वीकार करते हैं।
ज़्यादातर वहीं खप भी जाता है। जैसे बांस की टोकरियों का काम, कुम्हारों
के बर्तन, शॉलें, उनके
डिज़ाइन वगैरह। लेकिन यह पॉटरी सिस्टम, जिसका
सूत्रधार भी दिल्ली के, जिसका बाज़ार भी दिल्ली तथा मुंबई और
न्यूयार्क में। सिर्फ तफरीह के लिए फैक्टरी नोराह के गाँव अदरेटा में।.jpg)
गुरचरण सिंह, मनसिमरन सिंह, नोराह रिचर्डस, सोभा सिंह
यह कुछ-कुछ वैसा ही मामला है जैसे चित्रकला के प्रति आम दर्शक में
आस्वाद बोध ही नहीं है। बोध तो बाद की बात है, पहुँच
ही नहीं है। वह तो कैलेंडर देखता है। फिल्मों के पोस्टर चिपकाता है। घर की दीवारों
पर ट्रेस किए हुए चेहरे और सीन-सीनरियाँ लगाता है। महानगरों में चित्र दीर्घाओं
में जाना एक खास वर्ग का ही काम है। और इन दीर्घाओं का कारोबार तो कमोबेश आर्ट
लवर्स के हाथों में ही है। संगीत की भी गति इससे भिन्न नहीं है। साहित्य में भी
दूरी उतनी ही है। यहां पैसा भी नहीं है। हालाँकि कुछ हलकों में पैसा ही नहीं, सत्ता भी है। आज की हिन्दी कविता यूँ विश्व कविता का मुकाबला करती है
लेकिन आम आदमी के सिर के ऊपर से गुज़रती है। अपनी धरती पर पग धरे बिना ही अखिल
विश्व की हो जाती है। कवि की अपनी दुनिया है। आम आदमी की अपनी । कवि की दुनिया में
आम आदमी है, आम आदमी की दुनिया में कवि या कविता नहीं
है।
यह ठीक है कि साहित्य,
कला, संगीत
कभी भी इतने लोकप्रिय नहीं रहे। सम्पूर्ण जन संस्कृति में कलाओं के अपने द्वीप
होते हैं। लेकिन यह बात भी पूरी तरह सच नहीं लगती। लोक कलाओं को किस खाते में डाला
जाएगा। गीत, संगीत, चित्र, नृत्य, वास्तु, बल्कि
जीवन के हर पहलू के लोक कलात्मक रूप सुदृढ़ परंपरा के रूप में दिख जाते हैं। तो
क्या कलाओं के क्लासिकीकरण से समाज और कला में फांक पड़नी शुरू हो जाती है ? या नागर जीवन लोक परंपरा को रौंदता है? क्या
क्लासिकीकरण नागर जीवन से सम्बन्धित है? फिर आज के
ज़माने में, मकैनिकल प्रोडक्शन के ज़माने में कलाओं का
क्या रूप बनता है? वे कहाँ जा छिपती हैं? आज क्या ऐसे ही अंदरेटे बनेंगे? पर्यटन और
धर्म का द्वीप मैक्लोडगंज, कला का द्वीप अंदरेटा। अंदरेटा में एक और
फांक साफ नज़र आई कि मैनेजर तो स्थानीय व्यक्ति है मगर बाकी कारीगर? ज़्यादा नहीं दिखे। स्थानीय कुम्हारों की खास हिस्सेदारी नहीं है। इन
टापुओं में आसपास रहने वाले लोगों का आना-जाना इतना वर्जित क्यों है? कलाओं पर यह कैसा अभिशाप है?
रमणीयता में रमते चलो
सवाल चुभते रहते हैं हम पतली सड़क पर तैरते हुए बैजनाथ पहुँचते हैं।
वहाँ मंदिर दर्शन के लिए रुकते हैं। मंदिर क्या दरबार ही है। शिव मध्य में विराजे
हैं। चारों ओर दरबार सजा है। पूरा का पूरा संसार पत्थरों में जीवंत कर दिया गया
है। इस संसार को नीह्ज लगाकर सुमनिका देख रही है। मैं अरू को बोर होने से बचा रहा
हूं। कूद-कूद कर घंटे बजवा कर,
तलवे जला देने वाले फर्श में
छलाँगें लगाते हुए कोने में लगे नल तक पहुँच कर हाथ मुँह धोकर, नगाड़ा बजवा कर। और जब धीरज धराशायी हो जाता है तो डपट कर (बच्चे को
बिज़ी रखना कोई खाला जी का बाड़ा नहीं)।
यूँ तो पहाड़ में सारा ही रास्ता सुरम्य होता है। हाँ ज़्यादा चलना
पड़ जाए तो कठिन हो जाता है। रमण किया जाए तो ही रम्य बनेगा। रमण तभी किया जा
सकेगा जब थोड़ा होगा। लेकिन जिसे चलने की आदत ही न हो, वह
प्रकृति में बिना चले तो रमण कर सकता है, चल कर नहीं।
मतलब रमने के लिए चलना ज़रूरी नहीं है। तो क्या विचरना ज़रूरी है? कोई बिना विचरे भी तो रम सकता है। चराचर में बिना विचरे भी तो रम सकता
है। हम इस दुविधा से मुक्त थे क्योंकि नए ज़माने की फुर्तीली घोड़ी यानी वैन पर
सवार थे। इसमें बैठे हुए चर भी रहे थे (चना चबेना) और रमे हुए भी थे। मंडी तक जाने
की सड़क ऐसी है कि पहाड़ की पसली पर चलते जाओ। पहले ऊपर चढ़ो। लगभग आधे सफर में एक
जगह आती है जब सड़क पहाड़ में सबसे ऊँचे बिंदु पर है। उसके बाद नीचे उतरने लगती है। छोटी-मोटी चढ़ाई-उतराई इस बीच चलती
रहती है क्योंकि किसी सूखे या भरे हुए नाले को पार करने के लिए नीचे उतरना पड़ता
है वर्ना पुल की लम्बाई मीलों हो जाए। जंगल तकरीबन सारे रास्ते में साथ रहा।
ज़्यादातर चीड़ का जंगल। गर्मियों की दोपहर की यात्रा थी। पसीना चुवाने वाली
गर्मी। हवा में ठंडक का एहसास सबसे ऊँचे बिंदु पर पहुँच कर ही हुआ था।
मंडी से कुछ मील पहले खाना खाने के लिए रुके। एक ही होटल था। सभी वहीं
खा रहे थे। हिमाचली, पंजाबी खाने का मिश्रण । तंदूरी रोटी, राजमाह, चावल, कढ़ी।
कुछ जगहों में खास पहाड़ी खाना मिल जाता है। दालभात, खट्टा, लेकिन यहाँ थोड़ा मिलावटी था। सड़क के दूसरी तरफ एक चश्मे को पाइप से
घेर कर नल के रूप में बदल दिया गया था। बिना टूटी का नल । अजस्र धारा प्रवाही नल।
मेरे लिए मंडी शहर मतलब गुरुजी
| रमेश रवि |
गुरू जी से पिछली बार तीन साल पहले मुंबई में मिलना हुआ था। वे
अंतरविश्वविद्यालय समारोह में हिमाचल की तरफ से नाटक लेकर आए थे। मुक्तिबोध की
कहानी ब्रह्मराक्षस पर आधारित । उनके शहर में, उनके
घर में, उनसे मिलने का वादा हमने पूरा किया करीब
बीस साल बाद सन् 2000 के मई महीने की 17
तारीख की शाम को ।
मंडी शहर व्यास के लगभग तट पर ही बसा है। सौ साल पुराना पुल, पुराने और नए शहर को जोड़ता है। गुरू जी पुरानी मंडी में रहते हैं।
सभी पहाड़ी शहरों की तरह ढलान पर मकान। और फिर मकान। बीच-बीच में गलियाँ। शहर के
इस हिस्से ने अभी भी एक बावड़ी बचा रखी है। नए पन की सब चीज़ों से लदा जाता शहर।
कंक्रीट, लोहा, सिरेमिक, लकड़ी, प्लाई, फ्रिज, टीवी, पेप्सी, आइसक्रीम, बिजली, पावर कट, दवा, दारू, भागमभाग, होड़, किसी अनजानी हसीन दुनिया के सपने, और
भी पता नहीं क्या-क्या । उसी शहर के बीचों-बीच यह बावड़ी। प्राकृतिक जल का सोता।
इमारतों के नीचे-नीचे गहरे से छन कर आता। ताजा ठंडा पानी। मुहल्ले वालों ने इस
बावड़ी को सिर आँखों पर सजा कर रखा भी है। लोग नए पन में हैं। पुरानेपन में भी
हैं। पूरी तरह नए नहीं। पूरी तरह पुराने भी नहीं। पेंट-कमीज़ पहनेंगे, टाई नहीं। टाई तभी,
जब बाराती बनेंगे या
इंटरव्यू देंगे।
शाम को गुरू जी दो बार बाज़ार ले गए। एक बार आथित्य का सामान जुटाने ।
पूरे शहर का चक्कर लगाने के बाद सब्जी मंडी की आत्मा तक पहुँच कर देसी खीरे ढूँढ़े।
यहाँ लगभग हर शहर में खीरे सहित हरी सब्जियाँ भरपूर मिलने लगी हैं। बिकती भी हैं
लेकिन उनकी इज्ज़त कम है। पंजाब से आती हैं। उर्वरकों से थोक में उगती हैं। इसलिए
देसी खीरे, देसी गोभी की अपनी ही वकअत है। बावड़ी के
पानी की तरह। उसके सामने नल तो नल,
फ्रिज का पानी और कोक भी
पानी भरते हैं। दूसरी बड़ी चीज़ खरीदी, आइसक्रीम ।
पिघल जाने के डर से दौड़-दौड़ कर घर पहुँचे। फिर शहर घूमने हम सभी निकले। सीधे
तारणा देवी के मंदिर पहुँचे। शहर की छत । एक चोटी पर मंदिर है। जैसे हरिद्वार में
मनसा देवी भी चोटी पर विराजती हैं। यहाँ भी बहुत बड़ा परिसर है। वहाँ से सारे शहर
का विहंगम दृश्य दिखता है। पार्क बना दिया गया है। यह प्रेमियों का पार्क है। गुरू
जी की याद टिमटिमाने लगती है। कॉलेज के वक्त में गुरू-गुरयाणी यहाँ अक्सर आते थे।
देवी का मंदिर और प्रेम का प्रांगण । वह भी शहर की छत पर । धर्म-कर्म साथ-साथ ।
इसे मंडी की खासियत भी कह लें। मंडी हिमाचल में खासा आधुनिक शहर माना जाता है।
शिमला के बाद प्रदेश में यही है ज़िंदगी से सराबोर शहर । अँधेरा घिर आया था। तीन
तरफ नज़र पड़ती है। इमारतें और इमारतें। दूर-दूर तक फैल गया है। बीच में व्यास और
उसकी सहायक नदी सुकेती। इन दोनों का संगम गुरू जी के घर से फर्लाँग भर दूरी पर ही
है।
मंदिर से उतर कर मुख्य बाजार में आ गए। सारा शहर जैसे उमड़ा पड़ा हो।
यह रोज़ का आलम है। बीचों-बीच पैगोड़ा शैली में एक बारादरी बनी है, चाँदनी। सीढ़ियाँ हैं। खुला दरबार है। यहाँ राजा आकर बैठता था। उत्सव
मनाए जाते थे। अब भी मनाए जाते हैं। इसी के सामने नया मार्केट संकुल बना दिया गया
है। इंदिरा मार्केट। दो मंजिला,
उसी पैगोड़ा शैली का। यह एक
चौघरा है। चारों तरफ दुकानें। बीच में लॉन। शाम को इस बाज़ार में टहलने जाना है।
नई मार्केट में टिक्की-छोले खाने हैं। साज-सिंगार का सामान खरीदना है। सज संवर के
यहीं आना है। सभी को पैसा कमाना है। यहीं पर खर्च करना है। रोज़-रोज़ यहाँ आकर
खर्च करना है। इसलिए मार्केट में भीड़ है। हम सारे कार्य व्यापार को घटित होता
देखते हैं। फिर मफलर के एक सिरे की तरह पकड़ कर पीठ पीछे डाल देते हैं। पुराना
परिसर भी यह सब देखता रहता है।
यहीं पर गुरू जी ने नाटक किए हैं। नुक्कड़ नाटक । आधुनिक प्रयोगशील
नाटक । अपने समय की चीरफाड़ कर देने वाले नाटक । घनघोर वर्तमान के सार्वजनिक रूप
से अपने समय की शल्यक्रिया । मेरा नाटक भी यहीं खेला गया होगा। घसीटाराम कैसे राजा
बना होगा | कैसे रानी की बलि दी गई होगी।
जैसे पुरानी मंडी के नए शहर में पुरानी बावड़ी है, वैसे ही नई मार्केट के बावजूद शहर में सरन की दही-बूंदी है। दुकान सरन
हलवाई की है पर मशहूर दही-बूंदी है। हलवाई अब नहीं है। दुकान उसके नाम पर चलती है।
एक ब्रांड की तरह। कोई ऐसा न होगा जिसने इसका यह दही न खाया होगा। शराबी बदनाम हैं
कि नशा उतारने के लिए वहाँ जाते हैं गुरूआणी जी ने बताया कि यह गप्प प्रचलित है कि
घर में कोई शराबी हो और गायब हो गया हो तो सरन हलवाई के यहाँ से पकड़ के ले आओ। वह
नशा उतारने वहीं गया होगा। इस गप्प से पता चलता है कि मंडी के लोग कितने शैकीन
हैं। खाने के ही नहीं, पीने के भी । लौटते में गुरूजी ने हमारे
लिए भी दही बूंदी बंधवाई। भीड़ जमी हुई थी। मिठाइयाँ नहीं, दही-बूंदी
बिक रही थी। लोग खा भी रहे थे,
साथ ले जा भी रहे थे। जीवन
की यह संलिप्तता मंडी को हिमाचल के बाकी शहरों से अलग कर देती है।
दूसरी सुबह पुरानी मंडी से, गूरु जी के घर
की छत से मंडी शहर को देखा। हम तारणा देवी जैसी ऊँचाई पर नहीं थे। पहाड़ों से घिरे
हुए, पहाड़ की गोद में सिमटे हुए थे। रात को प्रकाश दिख
रहा था। फैला हुआ। सारी तराई तलहटी को जगमगाता । इस वक्त इमारतें हैं। सफेद, लाल, भूरी, पीली।
ऊपर उठती हुईं। पर बहुत ऊपर नहीं। चोटियाँ निर्जन हैं। धौलाधार की श्रृंखला जैसी
वनस्पति विहीन नहीं। धर्मशाला में तो इस अंतिम श्रृंखला के गंजेपन को ढकने के लिए
प्रकृति सारा साल बर्फ की टोपी पहनाए रहती है। यह हैं हरी-भरी। सामने एक लीक उभर
रही है। सड़क । धीरे-धीरे ऊपर जाती हुई। पहाड़ की परिक्रमा करके दूसरी तरफ चली
जाती है। गुरु जी बताते हैं,
यही सड़क है। सुखराम ने
बनवाई है। उसके गाँव तक जाती है।
नदी : एक शोकगीत
हम नदियों से विमुख भी हो सकते हैं और विमुक्त भी । और मंडी शहर तो
समझिए हो ही गया है। एक बड़ी नदी,
आकार में भी, आयु में भी, और संस्कार में भी शहर के बीचों-बीच बहती
है। व्यास । विपाशा। भला हो आधुनिक इंजीनियरों का, पंडोह
के पास घेर दी है। व्यास का पेट फुलाकर झील बना दी है। सुरंगें खोद-खोद कर जलधारा
बदल दी गई है। अब शहर में बहती है दीन-हीन क्षीण जलधार। सुकेती और व्यास के संगम
पर मंदिर है। किसी समय वह जगह आबाद रही होगी। पानी कम और पंकिल है। लोग नहाने और
कपड़े धोने भी नहीं आते। हाजत ज़रूर शात करते होंगे।
यह ठीक है कि नदी पहाड़ी इलाके में है। पानी भी ठंडा है। मैदानी इलाके
जैसा पाट विस्तीर्ण और बहाव मंथर नहीं हो सकता। फिर भी पता नहीं क्यों, नदी के साथ यहाँ वैसा जीवंत रिश्ता नहीं दिखता। हमने विकसित भी नहीं
किया है। जहाँ-जहाँ पत्तन रहा है,
वहाँ थोड़ा रिश्ता बना है।
पर अब तो पुल बन गए हैं। जो भव्यता और ऊँचाई के कारण नदी को और भी बौना बना देते
हैं। नदियों से बिजली बनाना तो ठीक,
पर नदियों का महत्त्व हमने
कूता ही नहीं। पुल डिज़ाइन करते समय शायद ही सोचा जाता है कि लोगों के साथ उसके
रिश्ते पर क्या असर पड़ेगा। नादौन में भी अब पुल चार किलोमीटर दूर बन गया है।
पत्तन के पास का शहर ही उजड़ गया है। हालाँकि किश्ती अभी वहाँ पड़ती है। पर इलाका
बड़ा बीयावान है। यहाँ मंडी में भी व्यास पर नया पुल बन गया है। वह भी वैसा ही है
हवा हवाई। पार करते हुए लगता ही नहीं कि नदी पार कर रहे हैं। मानो सीमेंट के मैदान
पर धाव रहे हों। नदी नीचे गहरी खाई में अश्रुपूरित, अश्रुविगलित
बहती रहती है। उदास, चुप और अकेली ।
विपाशा, (हिमाचल प्रदेश के भाषा एवं संस्कृति विभाग की द्वैमासिक पत्रिका), सितंबर-अक्तूबर 2000