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Sunday, May 4, 2025

एक सच और

चित्रकृति - सुमनिका, कागज पर चारकोल 


 मैंने कहानियां ज्यादा नहीं लिखीं हैं । जो लिखी हैं वे भी पचीस तीस साल पहले । रोटियां कहानी हिमाचल की ग्रामीण पृष्ठभूमि पर है, जो मधुमति में 1989 में छपी थी । मुंबई के आवारा कुत्तों के पकड़ने की कुत्ताघर नाम की कहानी भी वर्तमान साहित्य में 1989 में ही छपी थी । एक और सीधी-सादी कहानी सवा दो अक्षर नव भारत टाइम्स में छपी थी । वीटी बेबे नामक कहानी कथादेश में सन 2002 में छपी थी। मुंबई के तंगहाल जीवन को केंद्र में रखते हुए लिखी दोस्त कहानी भी नव भारत टाइम्स में छपी थी। जो कहानी आपको आज पढ़वा रहा हूं, वह अपने युवा दिनों में युवा मनों की एक झलक है। यह कहानी दैनिक ट्रिब्यून में 1986 में छपी थी। हाल ही में पुरानी फाइल में यह कहानी मिली। कहानी का नाम है - एक सच और



प्रिय दोस्त,

आज मैं इस मोड़ पर आ खड़ी हुई हूं कि देख पा रही हूं, मौसम साफ ही नहीं शांत भी है। न ठंड, न उमस। ये चीड़ के पते हिल रहे हैं तो जान रही हूं कि धीधी-धीमी हवा चल रही है। इस कमरे की बड़ी खिड़की से सड़क को देख रही हूं। वह खाली है। जरा सुनने लगी तो बस के आने की आवाज सुनाई पड़ी। पर कुछ नहीं है। अब जान पाई कि सिर्फ कान बज रहे हैं। पहाड़ पर वैसे ही बसें गिनी-चुनी आती हैं, प्रमोद जिस बस से आते हैं वह चार बजे पहुंच जाती है। अब दो घंटे ऊपर बीत चुके हैं। वैसे भी प्रमोद को आना होता तो कल आ जाते । अब शायद अगले हफ्ते ही आएंगे। 

तुम्हें क्या इतना ही काफी नहीं लग रहा कि मैं तुम्हें एक लंबे अरसे के बाद लिख रही हूं। खैर! मेरे लिए यह बहुत बड़ा सहारा है कि मैं इस पल अपने को देख पा रही हूं कि मैं तुम्हें पत्र लिख रही हूं। यह पत्र इसलिए भी, बल्कि इसीलिए लिख रही हूं कि तुम्हारे माध्यम से अपने को तोल पाऊं । तुम मेरे बहुत करीबी दोस्त, मेरे इतिहास के साक्षी रहे हो। इसलिए तुम्हें लिख कर अपने को देखना एक सही तरीका मुझे लग रहा है। तुम मेरे इतिहास के साक्षी ही नहीं, मैं इतिहास को जिस हिसाब से मोड़ना चाहती थी, तुम उसमें गाहे-बगाहे सहायक भी रहे हो। उसे कितना मोड़ पाई या खुद मुड़ गई उससे तुम्हारी जगह पर कोई असर नहीं पड़ा। 

प्रमोद के साथ शादी के लगभग एक साल बाद मैं इस स्थिति पर पहुंची हूं कि तुम्हें पत्र लिख सकूं। तुम्हें इसे पढ़कर संतोष होगा। जिस धैर्य की और जिंदगी को खुले रूप में अपनाने की सीख दिया करते थे, उसके काफी करीब खुद को पा रही हूं। आज मैं अपने पिछले चार-पांच वर्षों को परत दर परत खोल कर देख पा रही हूं। चार-पांच वर्ष ही क्यों, अपने सारे ही अतीत को। जिस परिवार में मैं जन्मी थी, एक स्कूल मास्टर की बेटी। तीन और बहनों की एक और बहन। समाज की तमाम गलियों नुक्कड़ों से घिरा एक कस्बाई परिवार । जिसमें कालेज जाने की छूट तो थी, लड़कों के साथ दोस्ती करने की बर्दाश्त नहीं थी। वह किशोर अवस्था का विद्रोह ही होगा कि उन संस्कारों को तिड़का कर बाहर आने में एक विजय का एहसास होता था। एक हूक सी उठती थी कि किसी परिवार की शालीनता और सभ्यता गली के नलों पर कैसे तय होती है। आप संस्कारों को सिर पर दुपट्टे की तरह ओढ़े हैं तो आपके शरीफ होने की चर्चा है और अगर बिना चुन्नी के चलने की आधु‌निकता कर रहे हैं तो भी उसी धुरी में फंसे हुए है। निरंजन के साथ दोस्ती इसी चुन्नी को छोड़ने का परिणाम थी। 

उधर मैंने नंगे सिर चलने का विद्रोह तो कर दिया पर इधर निरंजन की दोस्ती मुझे अपने होने के एहसास में दबाती चली गई। शायद वह उम्र का या शरीर का एक दौर ही होता होगा कि होने का एहसास कोई सहारा पाकर परवान चढ़ता है। अब देख रही हूं, दायरों को तोड़ना गौण हो गया था, अपने को छू पाने और संवारने की इच्छा प्रमुख हो गई थी। उसी वेग में निरंजन मेरा कल्पना-पुरुष बन गया था। तब अपने को हवा में उड़ाने में भी कितना सुख मिलता था। तमाम तरह की कल्पनाओं में खोने का सुख। पर बहुत एकांतिक। निरंजन के साथ मैं सहज कभी नहीं हो पाई। उसके लिए अंदर से मैं जितना पिघलती चली जा रही थी, बाहर अपरिचय और संकोच की दीवार उतनी ही कड़ी हो जाती थी। बहुत बाद तक, जब उसकी तरफ से शादी के लिए इंकार का संकेत भी लगभग मिल ही गया था। सामने पड़ते ही मैं नर्वस हो जाती थी। कान गर्म हो जाते, गला सूख जाता। बोला भी कुछ न जाता। अंदर से हमेशा उसके बारे में ही सोचती। निरंजन के साथ एक अंतरंगता। एक रोमांटिक और मस्त जिंदगी का कल्पनाएं। वॉटर फाल देखने जाना, उसके मोटरबाईक पर उससे सटे हुए आसपास की सारी जगहें घूमना। यह तो जानने की कोशिश ही नहीं की कि यह संभव है या नहीं। उसके साथ होना इतना अच्छा लगता था कि उससे बाहर ही नहीं निकल पाती। उसकी गर्म सांस तो जैसे मुझे रोमांचित कर दिया करती थी। एक विश्वास सा अंदर में था कि निरंजन मुझे समझता है। उसे चीज़ों को या मनःस्थितियों को खोल कर बताने की जरूरत नहीं है। जिसने मुझे होने का एहसास दिलवाया है वह उसे निरंतरता भी देगा। अपना हर निर्णय उसे ही मान लिया था। जो सोचती हूं वही तो करेगा वो। पता नहीं तब उसने इस दोस्ती को कितनी गहराई से लिया था। मुझे यह पता था कि शादी करने में उसे एतराज नहीं है। मेरे लिए इससे बड़ा सुख क्या हो सकता था। और मैं इस संसार में गहरे उतरती जाती थी। तुम तो जानते हो जब बी. एड. करने गई तब तक बाहरी रूप से काफी कुछ बदल गया था। उसे पत्र लिखने की संभावनाएं भी न रही थीं। मैं उसी तरह थी। ताजे बर्फ पर चलती हुई अपने पैरों के निशानों को देखती हुई, गोल-गोल दायरे बनाती हुई, इस उम्मीद में कि बहुत जल्दी नई ताज़ी बर्फ पड़ेगी और सब ठीक हो जाएगा। तब तुम्हें पत्र लिखती थी। निरंजन कैसा है, कभी मेरी बात करता है या नहीं, मेरे बारे में अपने घर में फिर से कोई बात की है या नहीं। यही बातें मुझे तुमसे जाननी होती थीं। तब भी इसके अलावा और कुछ सोच ही नहीं पाती थी। अब आज उस वक्त की  खुद को याद कर रही हूं तो झुंझलाहट होती है। झुंझलाहट भी नहीं अपने दब्बूपन पर तरस आ रहा है। पर उसमें दोष मेरा कितना था। अब बात बहुत साफ नजर आ रही है। मैं अपने घरवालों को दुखी नहीं करना चाहती थी। दूसरी तरफ निरंजन अपने घर में मेरे लिए वकालत करे, गिड़गिड़ाए या छोटा बने, मुझे यह भी अच्छा नहीं लगता था। अपने घर से विद्रोह करने का तो एक बार निर्णय ले लिया था, पर निरंजन कहीं भी छोटा पड़ जाए, यह सहन नहीं होता था। बदले में अपने को दाव पर लगाने को तैयार थी। शायद यह उस अवस्था का आदर्श ही था कि क्या है जिंदगी तो निरंजन के नाम हो ही गई है। वैसे उसके साथ उसके घर में रहती, ऐसे अकेले ही उसके नाम के सहारे रह लूंगी। 

नौकरी लगने के बाद स्कूल में आ गई। वहां बच्चों के साथ, हॉस्टल में दूसरी लड़कियों के साथ अपने को व्यस्त कर लिया। वो एक वर्ष ऐसा बीता है जब न निरंजन का ख्याल आता था न अपने घर का। न ही ज़िंदगी से कोई खास आकर्षण होता था। दिन बहुत ही चुपचाप बीत रहे थे। अपने पैरों पर खड़े होने की खुशी नहीं होती थी। प्रेम के आदर्श को पकड़े रहने का संतोष नहीं होता था। अपने प्रेम को खो देने का दुख या टीस नहीं होती थी। जैसे मैं बहुत सुनसान हो गई थी। पर दुखी या हारी हुई नहीं। तुम बता सकते हो कि क्या वह स्थिति ठीक थी ? तब तो मुझे लगता था क्या है पचीस वर्ष बीत गए हैं। इतने ही और इसी तरह निकल जाएंगे। एक आर्थिक आधार यह नौकरी तो मिल ही गई है। किसी पर बोझ नहीं बनूंगी और कहीं दखल भी नहीं दूंगी। पर उन दिनों एक फर्क जरूर था। उन्हीं दिनों का तुम्हारा एक पत्र मुझे छू गया था। निरंजन के साथ शादी न हो पाने की वजह से मुझमें कोई ग्रंथि नहीं बननी चाहिए। अगर अकेली रहना हो तो सहज निर्कुंठ भाव से रहूं अन्यथा शादी कर लूं। धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा। तुम्हारी बात एकदम भारी लगी। तुम भी मुझे समझ नहीं पाए। आखिर कटाक्ष कर ही दिया। घर से तो कई तरह की बातें सुनने की आदी हो ही गई थी। तुमसे यह अपेक्षा नहीं थी। धीरे-धीरे जब कई दिन तक सोचती रही तो तुम्हारी बात में वजन लगा। मैंने अपनी चुप्पी को देखा। एकदम ग्रंथि तो नहीं, ऐसा लगा कुछ दिन तक अगर यह स्थिति चलती रही तो सचमुच ही कहीं उसी गर्त में न फिसल जाऊं । तब एक बार मैंने अपने संबंधों को संभाला। अपना आधार ढूंढ़ने की कोशिश की। शायद यही खोज मुझे सहजता की तरफ ले आई। 

तुम बता सकते हो कि आखिर निरंजन मेरे काफी नजदीक आने के बाद मेरे प्रति इतना उदासीन क्यों हो गया था? अंदर ही अंदर मुझसे चिढ़ गया था? उसी ने मुझे इंतजार करने को कहा था। उसके साथ की हर बात, हर घटना याद है। ऐसे संबंधों में शायद हर कोई अपने को ऐसा ही समझता है। वह सब अभी भी पुरानी डायरी की तरह सुरक्षित है। उसके इंतजार करने को मैंने मान लिया था। कुछ दिन बाद ही मेरी बहन ने उसकी भाभी से बात कर दी थी। सिर्फ औपचारिक रिश्ते की ही नहीं, हमारे परस्पर आकर्षण की भी। उसके बाद तो निरंजन जैसे बदल ही गया। उसने सोचा यह सब मेरी जानकारी में कहा गया है। शायद उसे लगा मुझमें सबर नहीं है। सबर ही नहीं उसके ऊपर विश्वास भी नहीं है। क्या पता उसे यह भी डर लगा हो कि मैं इतनी जल्दबाजी कर रही हूं और दबाव डाल रही हूं तो इसके पीछे  मेरा कोई स्वार्थ है। मेरे लिए तो यह सब पहेली ही था। पर इस सब में मेरा क्या दोष था। यह छोटी सी बात दीवार की तरह खड़ी हो गई। धुंध की तरह फैल गई। जैसे कुछ चरमरा गया। मैंने बदले में कुछ नहीं किया, यह तुम जानते हो। निरंजन धीरे-धीरे मुझसे कटता गया। उसने अपने को समेट लिया। मैं उसे अपने और पास महसूस करती रही। करीब डेढ़ साल। जब तक नौकरी नहीं लग गई। सारी पढ़ाई और बेकारी के दौरान अपने को उसके सम्मोहन में ही पाया। 

आज जब पिछली सारी बातों से अपने को अलग करके देख रही हूं तो लग रहा है शादी का निर्णय लेकर मैंने ठीक ही किया। जिस तरह की चुप्पी से मैं गुजर रही थी, शायद और दो साल बाद बिल्कुल जड़ हो जाती। आज सोच रही हूं तो यह बात और साफ हो रही है। जब स्कूल में मेरी एक कुलीग शादी के बाद आई थी, वह इतनी चहक रही थी, बात-बात पर उनकी हंसी रुकती ही नहीं थी, वह सहेलियों के साथ शहर घूमना चाहती थी, पिक्कर देखना चाहती थी। मुझे तब सिर दर्द होने लगा। मैं कमरे की लाइट आफ करके लेट गई थी। बहुत रात तक नींद नहीं आई थी कि यह क्या कुछ था? क्या तुम बता सकते हो? 

आज और भी कुछ बातें तुम से कह लेना चाहती हूं। बहुत सारी लड़कियों की तरह मेरी भी शादी हो गई। लगभग मेरे घर जैसा ही परिवार, सास-ससुर, बाकी संबंधी। कोई बहुत फर्क नहीं पड़ा। पर निरंजन की जगह प्रमोद को नहीं रख पाई। आज भी निरंजन एक अलग अध्याय की तरह मेरे पास है। प्रमोद से कोई शिकायत नहीं है। प्रमोद से इस बीच कई बातें हुई हैं। खास उत्साह उनमें नजर नहीं आया। इसीलिए निरंजन की बात उनसे नहीं की। असल में मुझे लगता भी नहीं कि वे मुझसे मेरे अतीत को बांटना चाहते हैं। तुम्हारी बात मैंने दो-एक बार ज़रूर की। पर प्रमोद को अच्छा नहीं लगा। शायद किसी भी पति को यह अच्छा नहीं लगता कि पत्नी किसी दूसरे पुरुष पर इतनी निर्भर रहे। शायद अपना आधिपत्य छिनता लगता हो। शादी के पहले भी किसी का कुछ अपना नहीं होता क्या? अपनी पसंद अपने फैसले, अपने दोस्त, या कुछ भी। 

मैंने शुरू में ही कहा था कि इस मोड़ पर पहुंच गई हूं कि चीजों को साफ-साफ देख सक रही हूं। पिछली सारी बातों के साथ यह भी उतनी ही जरूरी बात या परिवर्तन है। मुझे नहीं लगता शादी करके मैंने कोई अपराध कर दिया है। या अपने प्रेम के आदर्श के सामने झूठी पड़ रही हूं। यहां दोनों बातें अलग-अलग हो गई हैं। अब तो शादी ऐसा ही काम लग रहा है जैसे आत्मनिर्भर होने के लिए नौकरी की थी। समाज में एक सामान्य सी जिंदगी जीने के लिए एक मान्य घर और व्यक्तिगत संदर्भों में शरीर की ज़रूरतों के लिए एक बना बनाया रास्ता। एक सवाल अपने से पूछ रही हूं तुम्हारी तरफ से। वो यह कि क्या मैं खुश हूं? हां! खुश ही हूं।  ऐसी नहीं जैसी तब कल्पनाओं में डूब कर होती थी पर दुखी भी नहीं। और खास वैसी चुप भी नहीं। इतना ही फर्क है। जब प्रमोद के घर जाती हूं। (वैसे अब वह मेरा ही घर कहलाता है) या प्रमोद यहां आ जाते हैं, तो व्यस्त हो जाती हूं। घर के कामों में, खाना बनाने में या कहीं बाहर घूमने जाने में। अभी तुम्हें लिख रही हूं तो थोड़ी भिन्न मानसिकता है। एक हल्कापन मेरे अंदर है। बाहर घिरता हुआ अंधेरा अच्छा लग रहा है। एक गुनगुनापन महसूस हो रहा है। इतने लंबे अर्से बाद लिख कर जी हल्का हुआ है। तो इतना काफी है? फिलहाल के लिए? जिस परिवेश में हूं यह बांधता तो है ही। कितने गहरे तक यह बाद में सोचूंगी। खुद से पूछती रहूंगी। जब जवाब मिल जाएगा, एक बार फिर शाम को इसी खिड़की के सामने बैठ कर तुम्हें लिखूंगी। अभी प्रमोद का एक स्वेटर पूरा करना है। पता नहीं कहां से वो एक डिजाइन ढूंढ़ लाए हैं। शर्त लग गई है कि मैं उसे ठीक से उतार दूं तो मान जाएं। घरों की ही बात है। डिजायन की उलझन दिमाग में है। शायद प्रमोद को मनपसंद स्वेटर पहना कर शर्त जीत ही लूं। 

शेष फिर....

Thursday, April 6, 2023

दोस्त

 


मैंने कहानियां ज्यादा नहीं लिखीं हैं । जो लिखी हैं वे भी पचीस तीस साल पहले । रोटियां कहानी हिमाचल की ग्रामीण पृष्ठभूमि पर हैजो मधुमति में छपी थी । मुंबई के आवारा कुत्तों के पकड़ने की कुत्ताघर नाम की कहानी वर्तमान साहित्य में छपी थी । एक और सीधी-सादी कहानी सवा दो अक्षर नव भारत टाइम्स में छपी थी । वीटी बेबे नामक कहानी कथादेश में सन 2002 में छपी थी।  जो कहानी आपको आज पढ़वा रहा हूंवह भी मुंबई के तंगहाल जीवन को केंद्र में रखते हुए लिखी थी । दोस्त शीर्षक से यह कहानी भी नव भारत टाइम्स में छपी थी। 


फाइलों से घिरे फैले पसरे मेज के ऊपर डाक के पांच सात लिफाफे और आ जुड़े । शर्मा जी बादामी और खाकी से लिफाफों को फाड़-फाड़ कर देखने लगे । उस मटमैली जमात में अलग-थलग पड़ा, नीले रंग का एक अंतर्देशीय शर्मा जी के हाथ में आकर खुलने ही वाला था कि बाईफोकल चश्मे ने पते पर लिखे गणपत राम शर्मा को सीधे शर्मा जी के दिमाग में घुसा दिया ।

यहां उन्हें हर कोई जी आर शर्मा के नाम से ही जानता है ।

गणपत राम शर्मा ने पत्र को पलटा । भेजने वाले का नाम साफ पढ़ा जा सकता था । धनवंत सिंह ठाकुर ।

आगे-आगे गनपत राम पीछे-पीछे धनवंत सिंह, दोनों नाम शर्मा जी के दिल में छपाक से गोता लगा गए । शर्माजी की पीठ पीछे हटकर कुर्सी की पीठ से जा लगी और मेज के नीचे उनके पैर हिलने लग गए । अरे! यह तो वही अपना धनवंत लगता है । चुकस्ता मारकर लिखने की वही पुरानी आदत ।

शर्मा जी ने चिट्ठी खोल ली । पढ़ाई के दिनों की तैरती छवियों के साथ खत पढ़ने लगे । खत के खत्म होते-होते आंखों की पुतलियां, नाक और होंठ फैलने सिकुड़ने लगे करीब । करीब दस साल बाद यार को याद आई खत लिखने की । पिताजी के गुजरने पर शर्मा जी गांव गए थे तो वहां आया था धनवंत विचार करने ।

खत में लिखा था कि वो जिला वन अधिकारी हो गया है और बंबई घूमने आ रहा है । शर्मा जी समझ नहीं पाए, वे खुश हो रहे हैं या झेंप रहे हैं । वो लफंटर डिस्ट्रिक्ट फॉरेस्ट ऑफिसर हो गया और बंबई भी आ रहा है ।

शर्मा जी को जरा गर्मी सी महसूस हुई । उठकर खिड़की के पास खड़े हुए । अंतर्देशीय तहा कर जेब में रखा । अब दफ्तर के काम में उलझे रहने की मन:स्थिति नहीं थी । अंतर्देशीय शर्मा जी को इस बदामी खाकी मटमैली कागजों की धूसर दुनिया से बाहर ले आया । उसी झोंक में वे इमारत से बाहर निकल आए । थोड़े से फैले हुए पेट को साथ लेकर बेध्यानी में चाय के खोखे के पास आ गए, जहां उनके महकमे का कोई न कोई हर वक़्त जमा ही रहता है । पवार और दलवी के साथ कटिंग पीने के लिए रुक गए । दूसरी तरफ तीन-चार महिलाएं भी चाय के बहाने खड़ी थीं । शर्मा जी ने चारों महिलाओं की साड़ियों के रंग अलग-अलग पहचान लिए । किस साड़ी का प्रिंट अच्छा है, किसका बॉर्डर सलीके से कंधे पर चढ़ा हुआ है । धनवंत के शब्द टनटनाते हुए शर्मा जी के दिमाग में कौंधे  - वह फूल वाली, वो टोकरी । धनवंत साड़ी के डिजाइन से औरतों के रूपाकार की कल्पना करता था ।

पवार ने टोका

- क्यों शर्मा जी बड़े खुश नजर आ रहे हैं ।

- नहीं-नहीं, बोलते हुए शर्मा जी की दोनों आंखों के बीच माथे का भारी सा हिस्सा हरकत में आ गया । अनजाने में हाथ जेब तक गया और अंतर्देशीय को छूकर निश्चिंत हो गया ।

रात को घर में घुसते ही शर्मा जी का मन उचाट सा हो गया । चौदह साल की बेटी सात साल के बेटे और अधेड़ सी दिखती पत्नी से कोई खास बात भी नहीं हुई ।

दूसरे दिन सुबह चाय के साथ अखबार पलटते हुए अपने प्रदेश की खबर पर नजर गई तो शर्मा जी ने आंखें मिचमिचा कर उसे पूरा पढ़ा । दाढ़ी बनाते हुए उन्होंने पत्नी को धनवंत के बारे में बताया कि अब जिले भर का अफ्सर हो गया है । वे उसके मुंबई आने की बात नहीं बता पाए । तरक्की की खबर सुनकर पत्नी को कैसा लगा शर्मा जी भांप न सके। वे खुद को भी जांच नहीं पाए थे कि दोस्त की पदोन्नति से खुश हैं या मुंबई आने से तनिक चिंतित ।  

पत्नी ने उस दिन अपने डेढ़ कमरे के फ्लैट की हर चीज को खूब झाड़ा पोंछा । शाम को जब शर्मा जी के ब्रीफकेस से उसने सब्जी निकाली तो ब्रीफकेस की किनारियों पर जमी धूल को देखकर बड़बड़ करने लगी । शर्मा जी ने नोट किया कि पत्नी ने सलीकेदार कपड़े पहन रखे थे । कमरे की ताजगी को देखकर उन्होंने तहकीकात भी की – क्या कोई आया था ?

- कौन आएगा यहां । और पत्नी ने बेटी को ब्रीफकेस साफ करने की हिदायत दी ।

कोई चार दिन तक शर्मा जी जब भी अकेले होते उनके माथे पर बल पड़ जाते और नाक के ऊपरी हिस्से पर गुमटी सी खड़ी हो जाती ।

आठवें दिन उनके ये बल खत्म हो गए । इसके बाद ठाकुर धनवंत सिंह के मुंबई आने के दिन ज्यों-ज्यों नजदीक आने लगे, वे निश्चिंत से दिखने लगे । शर्मा जी जैसे निर्भार हो गए थे ।

·        

और एक दिन शर्मा जी ने अपने परिवार को खुशी-खुशी विदा कर दिया । बच्चे खुश थे कि तीन-चार दिन छुट्टी मनाएंगे, पिंकू-टिंकू के साथ खेलेंगे, आंटी आइसक्रीम खिलाएगी । वीडियो पर फिल्में दिखाएंगी । पत्नी ने राहत महसूस की कि गृहस्थी की चक्की से चार दिन तो निजात मिलेगी ।

विरार में शर्मा परिवार के परिचित रहते हैं अपने ही इलाके के । अच्छे खाते पीते । उनकी कई सारी टैक्सियां हैं । विरार में दो साल हुए एक बड़ा बंगला बनवाया है । शर्मा पत्नी को वहां जाकर माईके जैसा ही लगता है सो तुरंत जाने को तैयार भी हो गईं । एक टैक्सी लेने आ गई थी और शर्मा जी ने हाथ हिलाकर विदा कर दिया । विदा करते समय मुस्कुराना वे नहीं भूले । पेंट की जेबों में हाथ डालकर चलने लगे तो उन्हें अपना वजन कम महसूस हुआ ।

·        

- क्यों शर्मा जी सब्जी नहीं लेनी ?

- नहीं । फैमिली बाहर गई है ।

- मतलब आप भी बैचलर हो गए ?

- ऐसे ही समझो ।

- तो चलो आज मेरे यहां ।

दफ्तर से लौटते हुए शर्मा जी बिना न नुकर किए श्रीवास्तव के साथ हो लिए । चाय के बाद तय हुआ कि जरा महफ़िल जमाई जाए तभी कुंवारापन सार्थक हो ।

रम का एक-एक पैग अंदर गया तो कमरा चहकने लगा । श्रीवास्तव ने बताया कि घर से इतना दूर होने के बावजूद लोग उसके यहां आते रहते हैं । सबसे ज्यादा तो दोस्त यार । हर महीने कोई न कोई । यूनिवर्सिटी में पढ़ने और हॉस्टल में रहने का यही तो नुकसान होता है । मेरे बैच के कोई दस लोग यहीं मुंबई में होंगे । फिर दिल्ली, हैदराबाद, मद्रास, कहीं न कहीं से चले ही रहते हैं । बंबई ससुर जगह ही ऐसी है ।

- अच्छा है न दिल लगा रहता है ।

- पर यह दिल लगाना बड़ा महंगा पड़ता है ।

- दोस्तों से मिलना तो हो जाता है न ?  

- हां, यह तो है । पर शर्मा जी आपका परिवार कहां गया है ?

- वो भी दोस्त के यहां गए हैं । घर जैसे ही हैं ।

- आप नहीं गए ?

- मुझे आपसे जो मिलना था । शर्मा जी ने मसखरी सी की ।

- छोड़िए शर्मा जी । यह तो मैं जबरदस्ती ले आया वरना आप कहां आते हैं ।

- नहीं श्रीवास्तव ऐसी बात नहीं है । तुम तो मुझे बहुत अच्छे लगते हो । पर घर गिरस्ती और दफ्तर । वक्त ही कहां मिलता है ।

- शर्मा जी, आप तो यहां कई सालों से हैं । आपके दोस्त मित्र भी काफी होंगे ।

- दोस्त ! हां दोस्तों की कौन सी कमी है ।

शर्मा जी दूसरे पैग के साथ रौ में आने लगे थे । दोस्ती की लहर में बह चले ।

- डियर श्रीवास्तव, बीस बीस साल पुरानी दोस्तियां हैं अपनी । अपना एक लंगोटिया यार है ठाकुर । जिले भर का अफसर बन गया अभी कुछ दिन पहले । उसकी चिट्ठी भी आई । चिट्ठी लिखना नहीं भूला ।

- अच्छा ! आप तो बड़े आदमी हैं ।

- बड़े हम नहीं, बड़ा तो वो है । वन विभाग में है । खूब पैसे कूटता होगा साला ।

शर्मा जी का मन दोस्त के बारे में और बातें करने का हो रहा था, पर गला अटक अटक जाता था । पूरा गिलास गटक कर उन्होंने गला तर किया ।

- पर देखो श्रीवास्तव, में भी अजीब उल्लू हूं । वो अपना दोस्त अफसर ही नहीं बना, बंबई भी आ रहा था ... और मैं ...

शर्मा जी फिर अटक गए ।

- कब आ रहा है वो बंबई ?

शराब पी के शायद अपनी कमजोरियों का सामना करने की ज्यादा ताकत आ जाती है आदमी में । पिछले हफ्ते जो फैसला शर्मा जी ने किया था उस पर दुबारा विचार करने की हिम्मत वे नहीं कर पाए थे । खुद को भी उन्होंने याद नहीं दिलवाया कि उनका पुराना दोस्त आ रहा है और कई सालों बाद उससे मिलने का मौका मिलेगा ।

लेकिन नशे में मन के भीतर छिपी हुई बात जुबान पर आ ही गई । खुद को गालियां देखने देने लग गए शर्माजी ।

- मैं तो बहुत ही चूतिया निकला यार । भैनचो अपने ही दोस्त के आने की खबर को छिपा गया । शायद डर ही गया यार मैं कि वो बहुत बड़ा अफसर हो गया है । इधर मैं मुंबई में कैसे-कैसे तो रहता हूं । दोस्त देखेगा तो क्या इंप्रेशन पड़ेगा । फिर वह बीवी बच्चों के साथ आ रहा है । कहां ठहराऊंगा ? और साली चुप ही लगा गया मैं । ऐसी चुप कि घर में किसी को हवा तक नहीं लगने दी ।

श्रीवास्तव को समझ न आए,  शर्मा जी क्या बोल रहे हैं और क्यों बोल रहे हैं । वह उन्हें शांत करने लगा ।

- जो हो गया भूल जाइए ।

- भूल कैसे जाऊं मेरे दोस्त । नहीं, दोस्त कहने का हम मुझे नहीं है श्रीवास्तव साहब । मेरे जैसा बेगैरत कोई नहीं होगा। बीवी बच्चे विरार भेज दिए । खुद साला आपके पास आ गया ताकि अगर भूले भटके घर आ ही जाए तो ताला लगा देखकर अपना इंतजाम खुद करता रहे ।

और शर्मा जी ठहाका मार कर हंस पड़े । फिर उन्हें खांसी आ गई । जरा सांस लेकर उन्होंने घूंट भरा और फिर शुरु हो गए ।

- पर जानते हैं दोस्त से छिपता क्यों फिर रहा हूं ? इतने सालों से इस शहर में लल्लू सी नौकरी कर रहा हूं । घर में एक्स्ट्रा गद्दा नहीं है कि कोई आ जाए तो सुला सकूं । किसी की खातिरदारी करने की हिम्मत नहीं पड़ती । बीवी को कोई सुख नहीं दे सका । बच्चे भी जैसे समझदार हो गए हैं, कोई मांग नहीं करते । पता है पूरी ही नहीं होगी । पर श्रीवास्तव साहब घर में कभी झगड़ा नहीं किया मैंने । जितना बन पड़ा परिवार को सुख देने की कोशिश की पर साली चादर इतनी छोटी है कि पैर नंगे ही रहते हैं हमेशा । क्या जिंदगी है ?

श्रीवास्तव को लगा शर्मा अपने पर कुढ़ता ही रहेगा । सांत्वना देते हुए बोला

- तो इसमें आपकी क्या गलती है!

- गलती कैसे नहीं ? साला मैंने दोस्त से दगा किया । जान जाता न मैं कैसे रहता हूं ? क्या सोचता ? कौन सी इज्जत चली जाती ? ऐसे ही कौन से झंडे झूल रहे हैं ।

- अरे शर्मा जी आप तो यूं ही छोटी सी बात दिल पर लगा के बैठ गए ।

- श्रीवास्तव तुम इसे छोटी सी बात कहते हो ?

- छोड़ो छोड़ो शर्मा जी ग्यारह बज गए । अब खाना खाते हैं ।

- अब खाना क्या खाना । में तो बहुत ही नीच निकला श्रीवास्तव । तुम मेरे दोस्त हो न ?

- हां हां

- नहीं, दिल से बोलो, दोस्त हो ?

- हां हां बोल रहा हूं ।

- मेरी कसम ?

- हां आपकी कसम ।

शर्मा जी बुक्का फाड़ कर रो पड़े ।

- मेरे प्यारे दोस्त । मुझे माफ कर दो।

नशे में धुत शर्मा जी का नजारा देखने लायक था । वो रोते जा रहे थे और श्रीवास्तव के पैरों में झुके जा रहे थे ।

- माफ कर दो दोस्त... माफ कर दो... ।

झुकते हुए चप्पल उनके हाथ लग गई । उठा कर श्रीवास्तव को देने लगे ।

- लो मुझे जुत्ते लगाओ । मैं इसी लायक हूं । मारो मेरे दोस्त मारो मुझे । और खुद ही अपने सिर पर चप्पलें टिकाने लगे ।

श्रीवास्तव ने चप्पल छीन कर फेंकी । और बात करने लगा ।

- ये तो बताया ही नहीं वो आ कब रहा था ?

- कौन ?

-आपका दोस्त

- दोस्त नहीं, मेरे जिगर का टुकड़ा । बीस की रात को उसकी ट्रेन यहां पहुंचनी थी ।

- बीस तो आज ही है ।

- तभी तो फिर रहा हूं भागा भागा ।

- तो चलो पहनो जूते । चलो । उसको ले के आते हैं ।

- क्या कह रहे हो श्रीवास्तव । नहीं नहीं । मैं उसे मुंह दिखाने लायक नहीं हूं ।

- क्या कह रहे हैं शर्मा जी । वो आपका जिगरी दोस्त है । और ठहराने की चिंता न करो । उसका इंतजाम हो जाएगा।

- तुम तो देवता आदमी हो श्रीवास्तव । मुझे चरणबंदा करने दो मेरे दोस्त, मेरे देवता ।

एक बार फिर श्रीवास्तव ने शर्मा जी को उठाया ।

·        

आखिर वे दोनों मुंबई सेंट्रल रेलवे स्टेशन पहुंचे । संयोग से वक्त से पहुंच गए । गाड़ी रुक ही रही थी ।

 - हां शर्मा जी जल्दी करो । पहचानो । कहीं निकल न जाए ।

शर्मा जी का सारा नशा काफूर हो गया । वे पसीने से नहा गए । उतरती सवारियों पर उनकी नजर दौड़ती जाती थी । आखिर उन्हें झटका सा लगा जिसकी वे तैयारी सी भी कर ही रहे थे । आंखों से होता हुआ पैरों तक बिजली का करंट सरसराया । उन्होंने श्रीवास्तव का हाथ कसके पकड़ लिया । थोड़ा नजदीक गए और सारा सामान उतरने दिया। तीन चार लोगों के झुंड के पास दम साधे खड़े हो गए ।

मजदूरों को पैसे देकर व्यक्ति ने जैसे ही चारों तरफ नजर दौड़ाई, वह अचानक रुक गया । उसकी बांछें खिल गईं ।

- अरे गनपत ? तुम यहां ? मुझे लेने आए हो ? अरे देखो सावित्री गनपत आया है ।

नमस्ते-वमस्ते होती रही । गनपत छुई-मुई होता रहा ।

- क्या बात है, सब ठीक तो है ?

- हां... तुम...?

- बस आ गए तुम्हारे पास ।

- हां ... हां...

शर्मा जी के गले में कांटे चुभ रहे थे ।

- और बाल-बच्चे, राजी-बाजी ?

- हां सब ठीक है ... ये मिलो मरे कुलीग श्रीवास्तव ।

अपने बच्चों को हिदायत देते हुए ठाकुर सामान उठवाने और टैक्सी ढूंढ़ने में व्यस्त हो गया ।

- जल्दी करो, आगे ही इतनी देर हो चुकी है ।

शर्मा जी ने सूखते गले से फिर बोलने की कोशिश की

- तु... तुम ... क... कहां ...

- अरे यहीं ताड़देव में एक गेस्टहाउस में बुकिंग है । अपने एक टिंबर मर्चेंट ने करवा दी थी । आओ चलो वहीं गप्प लगाते हैं ।

शर्मा जी का गला जरा खुला ।

- मेरी चिट्ठी नहीं मिली तुम्हें ?

- न । चलने के दिन तक तो नहीं मिली थी ।

- आप दो दिन से दफ्तर भी कहां गए थे । ठाकुर पत्नी ने जोड़ा ।

और शर्मा जी सामान लदवाने के लिए टैक्सी की तरफ बढ़ गए ।        


Monday, June 29, 2020

वीटी बेबे

वीटी स्टेशन की धरोहर इमारत पर लगी मूर्ति 




मैंने कहानियां ज्यादा नहीं लिखीं हैं । जो लिखी हैं वे भी पचीस तीस साल पहले । रोटियां कहानी हिमाचल की ग्रामीण पृष्ठभूमि पर है, जो मधुमति में छपी थी । मुंबई के आवारा कुत्तों के पकड़ने की कुत्ताघर नाम की कहानी वर्तमान साहित्य में छपी थी । एक और सीधी-सादी कहानी सवा दो अक्षर नव भारत टाइम्स में छपी थी । जो कहानी आपको आज पढ़वा रहा हूं, वह मुंबई के सीएसटी स्टेशन को केंद्र में रखते हुए लिखी थी । तब मुंबई, बंबई और सीएसटी, वीटी कहलाता था । यह वीटी बेबे नाम से कथादेश में सन 2002 में छपी थी ।    

गांव की उस बुजुर्गवार महिला को सब लोग बेबे कहते थे । बच्चों बड़ों सबकी बेबे । औरत होने के बावजूद बेबे गांव के गिने-चुने बुजुर्गों में से एक थी । हर कोई सलाह सूतर लेता । वह भी जब तक हर किसी का सुख-दुख जान समझ न ले, चैन से नहीं बैठती थी । किसी का लड़का बाहर से आया हो, कोई धियाण मायके लौटी हो, मत्था टेकने के बहाने बेबे के पास जरूर जाते । कोई जा रहा हो, बेबे असीसें देते थकती नहीं थी ।

हम छोटे छोटे थे । जितना मजा बेबे से कहानियां सुनने में आता था, बाकी बातों में इतना रस नहीं आता था । एक से एक नायाब कहानियां । कभी न खत्म होने वाले किस्से और आंखों के सामने साक्षात खड़े हो जाने वाले किरदार । अगर कोई पात्र कुछ हासिल कर लेता तो वह हमें अपनी ही जीत लगती । कोई मुश्किल में पड़ा होता या कोई तकलीफ होती तो हम डर जाते । आंखों में आंसू तैरने लगते । हम बेबे के पास सिमट आते । बेबे हमें अपने आगोश में ले लेती और हम निर्भय हो जाते ।
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मैं जब आजाद मैदान से वीटी की तरफ आता, स्टेशन की इमारत के गुंबद पर लगी मूर्ति जीवंत हो उठती । नाइट शिफ्ट करके बारह-एक के करीब लोकल ट्रेन पकड़नी होती । सारा इलाका तकरीबन सुनसान होता । इक्का-दुक्का टैक्सी । एक दो आखिरी ट्रेनें । और थोड़े से लोग । खिड़की वाली सीट पर बैठकर सामने पैर पसार कर बाहर देखता । हवा के साथ थोड़ा अंधेरा और एक बराबर अंतराल पर रोशनी की फांक चेहरे से टकराती । गाड़ी एक ताल पर फिसलती रहती । बीच-बीच में पटरियों की चमकती हुई लकीरें गुजरती जातीं ।  एक अवसाद मुझे डुबोने लगता । गुंबद पर लगी मूर्ति न जाने कब गुंबद से नीचे उतर कर मेरे साथ चली आती । और सफेद  सौम्य परिधान में सामने आ बैठती । हाड़-मास की जीवंत मूर्ति । और वह मुझसे बातें करने लगती । बातें क्या, इकतरफा संवाद । वही बोलती । मैं सुनता बातें भी कैसी ? लोगों के बारे में । चीजों के बारे में । ज्यादातर स्टेशन से जुड़ी हुई । मैं उसके चेहरे पर बनती-मिटती भाव-रेखाएं पढ़ता रहता । वह हर उस घटना, इंसान या परिवर्तन का बड़ी शिद्दत के साथ जिक्र करती, जो किसी भी तरह स्टेशन से या मुंबई की जिंदगी से जुड़ा रहता । मैं एक तंद्रिलता में सारी बातें सुनता । शयद बेजुबान प्रतिक्रिया भी मुझसे नहीं दी जाती । ट्रेन से उतरकर पैदल घर जाते हुए सारी बातों को याद करता रहता । एक रहस्यमय पोटली में बंधी सारी बातें दिमाग में घुसती जातीं ।

अगले दिन दोपहर बाद वीटी पहुंचता तो इधर उधर नजर उठाते ही मूर्ति की बातों में सच्चाई नजर आने लगती । भीड़ की धक्कमपेल में सरकते हुए चेहरों की खुशियां, उदासियां, उनकी सारी कहानियां स्पष्ट साकार हो उठतीं । उन औरतों को खोजी नजर से ढूंढ़ने की कोशिश करता जो मेन हॉल के आसपास सज-संवर कर खड़ी रहती हैं या टहलती रहती हैं । अभ्यस्त नजरों से ग्राहकों को पहचान लेती हैं । मूर्ति की तरह मेरे भीतर भी ऐसी मजबूर औरतों और सपाट चेहरे वाले लोगों को देखकर करुणा ही पैदा होती । मूर्ति ने इन लोगों के बारे में कहा था कि अपने खंभों के इर्द-गिर्द इस व्यापार को महसूस करके अजीब सरसराहट होती थी । जैसे टांगों पर तिलचट्टे चलते हों । पर इन बेचारी औरतों की घर-परिवार की मजबूरियों का ख्याल कर इस लिजलिजे एहसास को सह जाती है । मजबूरियों में कहां की नैतिकता और कहां के मूल्य । 


इसी तरह मवाली छोकरे मुझे अक्सर देखने को मिल जाते, जो स्टेशन पर भटकते हुए बेमकसद लगते हैं पर इनकी रोजी रोटी वहीं पर चलती है । जेबें काटकर, मुसाफिरों का सामान चुराकर, गाड़ियों के टिकट और सीटें बेचकर । मूर्ति उन्हें चींटियों की संज्ञा देती । कहती, इन लोगों ने तो जैसे मुझे अपना घर ही बना रखा है । और कि अब मेरी खाल ऐसी हो गई है कि कुछ फर्क नहीं पड़ता । इन मवालियों से मूर्ति अपनी सहानुभूति जतलाती । जिस दिन मूर्ति ने यह बात बताई, मैं घर जाकर हैरान हुआ कि इनसे सहानुभूति क्यों हो ? ये तो अपराध करते हैं । इसका दंड मिलना चाहिए । अगले दिन मेरे सोचे हुए पर मूर्ति ने पानी फेर दिया । अब तो यह संपर्क ऐसा हो गया था कि आमने सामने तो सवाल जवाब न हो पाते, लेकिन जो मैं घर जाते हुए रास्ते में या घर जाकर सोचता, उनके जवाब मूर्ति अगले दिन, बल्कि अगली रात मुझे दे देती । बिना कुछ पूछे । खुद ब खुद । बूझ के । सो मूर्ति का मत था कि स्टेशन तो इनकी शरणस्थली है । ठीक है बेचारे भटके हुए लोग हैं, लेकिन पेट तो सबके साथ है । इनके अपराध सबको नजर आ जाते हैं, क्योंकि हालात के मारे हुए लोग हैं । किसी तरह का लुकाव-छिपाव या पर्दा इनके पास नहीं है । न पैसे का न रसूख का । न सुविधा का न संयोग का । न जात का न जमात का । न दीन का न धर्म का । न भगवान का न हिवान का । किसी तरह का कोई कवच नहीं । ये लोग अपनी जहालत, जलालत और अपराधों में निपट अकेले हैं । मूर्ति इस ख्याल से विचलित हो जाती कि ये लोग जिस तरह फटेहाल आते हैं, उसी तरह गुमनाम मौत मारे भी जाते हैं । इन्हें सुधारने-संवारने की जिम्मेदारी जिस तबके पर है वह भी जम कर इस्तेमाल करता है । इन्हें यहीं पड़े रहने पर मजबूर करता है । मूर्ति कहती, दिन-रात इमारत के ऊपर ठुकी रह कर देखती रहती हूं । हर एक को अपनी ही पड़ी है । ऐसी आपाधापी कि अपने सिवा कोई नहीं दिखता ।

मुझे मूर्ति की ऐसी बातों से जिनमें लोगों से प्रेम घृणा का एक अजीब सा रिश्ता था, कभी हंसी आती कभी उदासी । वह देखती रहती और गरियाती रहती रोज-रोज ।

मेरी नाइट शिफ्ट मजे में चल रही थी । मूर्ति के बहाने मेरा भी इस शहर के प्रवेश द्वार से रिश्ता जुड़ गया था । जैसे संवेदना की खिड़की खुल गई थी । मुझमें गुस्से, सहानुभूति, प्रेम के भाव तैरते रहते । बीटी स्टेशन से दोस्ती मजे में चल रही थी ।

एक रात उसने एक किस्सा सुनाया । जो आदमी आज ट्रेन से कटकर मर गया, वह कोई बीस साल पहले यहां आया था । कहने को वह आदमी था, पर आदमी तो वह कभी हुआ ही नहीं । जब आया था तब बालक था । मैला कुचैला छौना । जब मरा तो बूढ़ी ठठरी था । जब आया था, महीना दस दिन भटकता रहा भूखा प्यासा । फटेहाल । पुलिस वालों के हत्थे भी चढ़ा । अजनबी माहौल के खौफ में वह सड़कों पर भटकने निकल जाता पर प्लेटफॉर्म छोड़कर वह कभी गया नहीं । आधी रात के बाद दो बजे के करीब जब वह कोने वाले खंभे से पीठ सटा कर निढाल पड़ जाता तो मेरा दिल पसीज उठता । मेरे हाथ अगर उसे छू सकते तो मैं उसे सहला कर सुलाती । पर मैं तो बस देखने और कुढ़ने के लिए ही अभिशप्त हूं । कोई दैवी ताकत भी मुझ में नहीं है कि उसके सामने खाने की थाली परोस सकती या कोई ठीहा ही ढूंढ़ देती । वह तो भैया हर किसी को अपने ही उद्यम से पाना है । चाहे उस उद्यम में मेहनत हो, तिकड़म हो या संयोग हो । जैसे हालात बन जाएं और इंसान मौके का फायदा उठा ले । खैर! कुछ दिन तक तो वह आदमी गायब रहा । मेरी ढूंढ़ती आंखों ने एक दिन देखा कि वह सामने छोकरों की पांत में बैठा है और पॉलिश की पेटी पीट पीट कर गला फाड़ फाड़ कर ग्राहकों को बुला रहा है । मेरी छाती में ठंडक पड़ी । जी उमड़ने लगा । भैया बउ़ा चैन पड़ा कि चलो अपने पैरों पर खड़ा हो गया । मेरे सामने उसने कमाना खाना शुरु कर दिया । पिछले बीस सालों से वह वहीं उसी जगह पर लोगों की जूतियां चमकाता रहा । बूढ़ा तो वह दो ही साल में हो गया था । पर काम बदस्तूर करता रहा । और चाहे कुछ हो न हो सौ तरह की बीमारियों की कृपा इन लोगों पर हुई रहती है । मुझे इनके पीले चेहरों को देखने और उनकी खसखसाती छातियों की लय ताल सुनने की आदत पड़ गई है । वह कहां रहते हैं, इस बारे में भी मैं ज्यादा नहीं सोचती । वह सुबह प्रकट होता, रात को चला जाता । मेरे आंगन की वह जगह उसने कभी नहीं छोड़ी । दो बाई दो फुट की उस जगह पर कब्जा जमाए रखने के लिए उसे पुलिस वालों को हफ्ता देना होता था । मैं जानती हूं, पर हालात कैसे बदल सकती हूं । मैं तो जड़ आंख हूं । देखती हूं और बिसूरती रहती हूं ।

और वह आज ट्रेन के नीचे आ गया वह गाड़ियों की हर अदा से वाकिफ था । यूं बेमौत नहीं मर सकता था । पर जिस्म ने साथ नहीं दिया । ट्रेन से छलांग लगाने की पुरानी आदत ।  कमबख्त ने अपने जर्जर शरीर का ख्याल करके नहीं छोड़ी । दूसरा पैर नीचे रखने से पहले ही उसका हाथ छूट गया और देह गाड़ी और प्लेटफार्म के बीच रगड़ती चली गई । शरीर बुरी तरह चिथ गया था । उसकी पॉलिश की पेटी दूर जा गिरी ।

किस्सा यहीं खत्म हो जाता तो मैं भूल जाती । आदमी पैदा होता है । मर खप जाता है । कुदरत कहो या हालात यह गोरखधंधा ऐसे ही चलता रहता है ।

उसकी लाश उठा दी गई । पॉलिश की पेटी प्लेटफार्म पर पड़ी रही । देखती क्या हूं कि एक बारह तेरह साल का छोकरा बड़ी देर से वहां चक्कर लगा रहा था । चक्कर में इधर उधर नजर दौड़ाने के बाद चुपके से पेटी उठा ली । मेरा जिस्म तो जैसे सुन्न पड़ गया । यह क्या हो रहा है ? इस लड़के को मैंने पहली दफे नहीं देखा था । कोई दो हफ्ते पहले यह गाड़ी से उतरा था । सूनी और डरी हुई आंखों से प्लेटफार्म को, भीड़ को, हर चीज को देख रहा था । तब मैंने ध्यान नहीं दिया । अपना भाग लेकर गाड़ी से उतरा है । खुद ही निकाल लेगा रास्ता, और चलता बनेगा । इतने दिनों तक मेरे आसपास चक्कर लगाता रहा तो भी मैंने खास ध्यान नहीं दिया । इकहरे बदन का छोकरा, मसें अभी भीगी नहीं थीं । घर से भाग आया होगा । बंबई किस किस को नहीं खींच लाती । यह भी भटक रहा है । राह पा जाएगा । पर यह ऐसी राह पाएगा यह नहीं सोचा था । दस ही दिनों में वह पत्थर हो गया । उस बूढ़े को मरते हुए उसने देखा । उठने का इंतजार करता रहा । और मौका पाते ही पॉलिश की पेटी उठाकर इत्मीनान से चलने लगा । न उठाने में कोई उतावली दिखाई, न ले के भागा । ताकि किसी को चोरी की भनक तक न लगे । इसके दिल-दिमाग में कैसी बजरी बिछ गई है ।

उसे जिंदगी जीने का एक सबब मिल गया, मुझे खुश होना चाहिए था । मैं तो पिघली जा रही थी । कैसा इतिहास बन रहा है । मेरी आंखों के सामने आज की घटना और बीस साल पहले का यह दृश्य गड्डमड्ड होकर फड़फड़ाने लगा । जो मर गया वह तब कितना हताश था । फिर पॉलिश की पेटी की लाकर हालात से लड़ने लगा था । और यह छोकरा बीस साल बाद अपने मरे हुए अतीत पर चल कर उसी पॉलिश की पेटी को उठा कर इत्मीनान से चल रहा है । उसे अपनी ही फिक्र है । वह जान गया है, अगर मौके का फायदा नहीं उठाया तो उसे कुछ हासिल नहीं होगा । हाय रब्बा, इसकी उम्र मासूमियत की है और यह दुनियावी समझदारी में माहिर हो गया है । बालक अब कितनी जल्दी बड़े हो जाते हैं । पर इस अनजान लड़के को कुछ नहीं मालूम । अतीत क्या था । बीस या पचीस साल बाद या कल या अगले ही पल क्या होगा । कुछ नहीं मालूम । उसने तो जैसे एक किनारा पकड़ लिया है और दुनिया उसके सामने खुलती चली जाएगी ।

इस किस्से को सुनने के बाद जब मैं घर पहुंचा तो सो नहीं पाया । मूर्ति से मुझे पहली बार डर लग रहा था । मूर्ति से यह संवाद इकतरफा ही होता था । जवान खोलने का सवाल नहीं उठता । लेकिन जो सवाल मन में उठ भी रहे थे, वे घर पहुंच कर गायब हो गए । सिर्फ मूर्ति की बातें ही दिल दिमाग में घुमड़ने लगीं ।

अगले दिन में काम पर नहीं जा सका । भागता हुआ खौफनाक अंधेरा, तेज चमकती रोशनियां, मूर्ति का सफेद लिबास, गाड़ी की ठक-ठक, भीड़ का शोर, चिल्लाहटें मुझे घेरे हुए थीं । मुझे बुखार आ गया । उठकर चाय पीने तक की हिम्मत बाकी नहीं बची थी । जैसे बहुत लंबी बीमारी से शरीर निचुड़ गया हो ।

दिमाग खाली नहीं हो पा रहा था । उस सारे दिमागी तूफान में एक बात बार-बार भड़भड़ा रही थी । जहां मैं काम करता था, उसी महकमे में मेरे पिता नौकरी करते थे । दो साल पहले एक दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई । घर टूटने के कगार पर ही था । मैं उनका बड़ा लड़का नौकरी की तलाश में भटक रहा था । पिता के महकमे ने दरियादिली दिखाई और मुझे नौकरी पर रख लिया । मैं मुंबई आ गया । घर उजड़ने से बच गया । पिता की जिम्मेदारियां मैं निभाने लगा ।

जैसे काले सागर में लाइट हाउस की रोशनी घूमती रहती है और रोशनी की लकीर पानी पर खिंचती चली जाती है । जर्द और उदास । चमकता पीला काला पानी थरथ्राता हुआ दिखता है । मूर्ति का सुनाया हुआ किस्सा काले सागर की तरह मेरे चारों ओर पसरा हुआ था । अपना और पिता का रिश्ता पीली डोलती लकीर की तरह इस स्याह पारावार में दूर तक चिरता चला जाता । मैं उस काले स्याह में डूब रहा था ।

बीमारी के दौरान एक दोस्त मेरा हाल चाल पूछने आता था । मेरे चेहरे के पल-पल बदलते रंग देखकर पूछता, ‘‘कोई चीज तुम्हें खाए जा रही है।  बता दो ।’’ मैं हिम्मत नहीं कर पाया ।  बार-बार इसरार करने पर धीरे-धीरे सारा किस्सा कह डाला । मूर्ति के सारे संवाद उसे सुनाए । जो मेरे दिमाग में पक्की स्याही से इतनी बार लिख डाले गए थे कि न मिटने का नाम लेते थे न अंदरूनी नजर से ओझल होते थे । उसने सारी बातें ध्यान से सुनीं । और बोला, ‘‘ तुम सनकी आदमी हो’’ मैं सफाइयां देता रहा । आखिर उसने फैसला सुनाया, ‘‘अगर तुम ठीक होना चाहते हो तो आगे से ट्रेन के खाली डिब्बे में कभी मत चढ़ना । और रात की शिफ्ट तो बंद ही कर दो । मैडिकल सर्टिफिकेट दो और दिन की ड्यूटी करो ।’’

उसकी इन बातों पर पहले मैंने ध्यान नहीं दिया । लेकिन एक फर्क महसूस किया कि सारी बात बता कर मैं जरा हल्का हुआ था । वो अंधेरे और रोशनी के धब्बे, और शोर कुछ कम हो गया । और मैं स्वस्थ होने लगा ।


Tuesday, May 5, 2020

सवा दो अक्षर



मैंने कहानियां ज्यादा नहीं लिखीं हैं । जो लिखी हैं वो भी पचीस तीस साल पहले । रोटियां कहानी हिमाचल की ग्रामीण पृष्ठभूमि पर है, जो मधुमति में छपी थी । मुंबई के आवारा कुत्तों के पकड़ने की कुत्ताघर नाम की कहानी वर्ततान साहित्य में छपी थी । एक और  यह कहानी मुंबई के सीएसटी स्टेशन को केंद्र में रखते हुए वीटी बेबे नाम से कथादेश में छपी थी । यह सीधी सादी कहानी सवा दो अक्षर नव भारत टाइम्स में छपी थी। यहां इस कहानी में सभी चित्र गुरुदेव रवींदनाथ ठाकुर के हैं जो इंटरनेट से लिए हैं ।   



इस वक्त प्रेम कहानी के लिए बहुत बढ़िया माहौल बन रहा है । पर्यटन विभाग का होटल । सीधे घटनास्थल पर आ जाएं तो होटल का आंगन । आंगन अक्सर मकान के सामने होते हैं, यहां पिछली तरफ है । कालीनी फर्श और साफ चमकती दीवारों वाले रिसेप्शन और डायनिंग हॉल को पार करके खुले आसमान में यह आंगन खुलता है । आंगन के पार घाटी खुलती है ।  दूर तक घुमावदार सड़क और पहाड़ी ढलानों को एक नजर में देखा जा सकता है । लगता है यह आंगन नहीं किसी गगनचुंबी इमारत की आखिरी  मंजिल की बालकनी हो । हर चीज को देख पाने की सुविधा । दूधिया आसमान में ची़जों को साफ साफ पहचान न पाने और कल्पना करने की पूरी छूट वाली प्रेम कहानियों की आदर्श स्थिति । दूसरी तरफ गर्दन घुमाई जाए तो तनिक टेढ़ी भी करनी पड़ेगी । धौलाधार की अंतिम चोटियां ऊपर उठती जाती हैं । इतनी ऊपर कि वनस्पति भी उस ऊंचाई का साथ नहीं दे पाती । लेकिन अक्तूबर की पहली बर्फ उन पर ताजगी की एक पर्त चढ़ा गई है । खूबसूरती का आलम आसमान से लेकर नीचे सड़के के आखिरी छोर तक फैला हुआ है । आंख के कैमरे को घुमाकर आंगन पर फोकस किया जाए तो तीस फुट चौड़ाई रेलिंग पर आकर रुकती है । नियमित कुतरी जाने वाली, सींची जाने वाली गदराई हुई हरी दूब के कालीन पर इधर उधर केन की कुर्सियां और एक दो मेज पड़े हैं । वक्त यही कोई दोपहर बाद साढ़े तीन चार का । अक्तूबर के आखिरी दिनों की धूप के आखिरी डेढ़ दो घंटे । लगातार धूप में नहीं बैठ सकते, पर उस हरारत को हवा पोंछती जाती है । बैठना अच्छा लगता है । बैठकर मन को खुले छोड़ देना और भी अच्छा । है न प्रेम कहानी  के अनुकूल स्थिति । कहानी बनाने, कहानी सोचने और कहानी जीने की बढ़िया सिचुएशन ।
नायक पत्नी के साथ सुबह ही इस होटल में प्रवेश ले चुका है । आंगन रूपी इस रंगभूमि पर अभी उसका पदार्पण नहीं हुआ । वह इस वक्त मैक्लोडगंज गया हुआ है । दलाई लामा की पहाड़ी पर घूमने । चला गया बल्कि कहिए जाना ही पड़ा । वे दोनों आज सुबह बस से पिटे हुए से उतरे । करीब बारह तेरह घंटे की यात्रा । बस में सवारियों के नहीं पहाड़ी मोड़ों के धक्के । हड्डी पसली एक कर देने वाले । बस में सोना तो क्या, ढीले होकर पड़े रहना भी दूभर । ऊपर से वीडियो की कृपा, एक के बाद एक तीन फिल्में । आप आंखें तो मीच सकते हैं, कानों में कितनी रूई ठूसेंगे । सोचा था पहुंचते ही शरीर को जरा सीधा करेंगे । किस्मत का फेर, यहां भी चैन नहीं । पहाड़ों में लोग इस खामख्याली से आते हैं कि तन मन को ताजा करेंगे, आराम देंगे । पर मजबूरियों ने कब किसका पीछा छोड़ा है । जिंदगी का पिछवाड़ा साथ ही चिपका रहता है।
यहां पाठक गण, यह भी जान लीजिए कि नायक की पिछले हफ्ते ही शादी हुई है । जीवन के बाकी कामों, पढ़ाई, नौकरी आदि की तरह यह काम भी वक्त से निपट गया । सारे काम विधिवत हो रहे हैं तो यह हनीमून का रिचुअल क्यों छोड़ दिया जाए । हालांकि हमारे नायक की इसमें आस्था नहीं है, चोंचलेबाजी ही लगती है । जैसे दहेज लेना, शादी की धूमधाम उसे चोंचलेबाजी लगती थी, पर नायक अपने बड़ों, अपनी बिरादरी को नाराज नहीं करना चाहता, इसलिए उसने यह सब स्वीकार कर लिया । चलो भाई चार पांच दिन और कुछ हजार की ही तो बात है । जिंदगी भर खटना ही है, बहाने से पहाड़ की सैर भी कर ली जाए । इस तरह हमारे नायक मय पत्नी सुबह सुबह इस होटल में आ बिराजे ।
आप लोग हैरान होंगे कि मैं नायिका न कहकर पत्नी क्यों कह रहा हूं । श्रद्धेय पाठको! भेद की बात यह है कि अगर पत्नी को नायिका कह दिया तो शुरू में जो प्रेम कहानी की भूमिका बांधी है उसका क्या होगा । तब कहानी यों खत्म हो जाएगी - एक था नायक एक थी नायिका, दोनों मिल गए इति आख्यायिका । कहानी क्या उस भूमिका की इति हो जाएगी। इसलिए फिलहाल उसे नायिका नहीं पत्नी ही रहने दीजिए । 

हमारा नायक बड़ा पुरुषार्थी है। सब काम करता रहता है । शेव करते हुए शीशे में अपना चेहरा देखता है तो उसे अपने कर्तव्यों की याद आ जाती है । वो उन्हें निबटाने में जुट जाता है । पिछले हफ्ते से परिस्थिति किंचित बदल गई है । शादी क्या हुई शरीर की दूसरी छाया आ खड़ी हुई । शुरू में तो बेचारा नर्वस होता रहा । अब पत्नी का चेहरा देखते ही कर्तव्य पुकारने लगते हैं । फिलहाल नायक छुट्टी पर है पर इस छुट्टी को भी उसने कर्तव्यों में शामिल कर लिया है और उसी मुस्तैदी से उन्हें निभा रहा है । यही वो वजह थी कि चाह कर भी सुबह सो नहीं पाया वरन् उसने सोचा तो था कि होटल का कमरा खुलते ही सामान पटक कर धड़ाम से पलंग पर लेट जाएगा और नींद लेगा । वह धड़ाम से जैसे ही लेटने लगा, पत्नी ने घंटी टुनटुना दी थक गए न! इतना लंबा तो सफर था ।
- नहीं... नहीं... पहाड़ी रास्तों में ऐसा तो होता ही है ।
- थोड़ी देर आराम कर लें ।
- आराम तो होता रहेगा । बेहतर है हम घूमने का प्रोग्राम बना लें । नायक ने पत्नी का चेहरा देख लिया था और उसे कर्तव्य याद आ गए । धड़ाम से लेटना और नींद रफूचक्कर । उन लोगों ने तय किया कि आज मैक्लोडगंज चल के सबसे पहले डॉ. डोलमा से एपॉएंटमेंट ले लिया जाए ताकि इसी ट्रिप में उनसे भेंट हो जाए और चाचाजी का सारा केस उन्हें समझा के सलाह ले ली जाए । चाचाजी की इच्छा है कि तिब्बती डॉक्टर का इलाज करा कर भी देख लें । नाम तो बड़ा सुना है डॉ. डोलमा का । मैक्लोडगंज में तिब्बती ब्लेजर, एंटीक पीसेज वगैरह भी देख लेंगे, अगर वक्त मिल गया। वैसे दूसरी बार तो शायद जाना ही पड़ेगा । बाकी चीजें तब भी देखी जा सकती हैं, पहला काम है डॉ. डोलमा । और नव दम्पत्ति नहा धोकर रवाना हो गया ।
मैक्लोडगंज पहुंच कर डॉ. से मिलने का समय लेकर वे भागसूनाथ की तरफ चले । पत्नी ने चाहा भी होगा कि यह अकेला सा रास्ता है, देवदार अगल बगल खड़े हैं, उन पर हवा तैर रही है, हमारी नई नई शादी हुई है, जरा हाथ में हाथ डाल के चला जाए, पर नायक ने मौका नहीं दिया । अंतिम मोड़ आया तो दूर पानी का ऊंचा झरना दिखा । पत्नी के मन ने किलोल सी ली - अब तो वहां साथ साथ पानी में पैर डालकर बैठेंगे। लेकिन पत्नी की किस्मत में कुछ और ही बदा था, वो किलोलती रहे । नायक को पत्नी का चेहरा देखकर कर्तव्य दर्शन हो जाता था, प्रेम संप्रेषण नहीं हो पाता था । तो क्या उसमें कर्तव्य की धातु ज्यादा है, और प्रेम के नाम पर ठन ठन गोपाल, जो बस माहौल का, खुशगवार मौसम का भी असर नहीं हो रहा? जी नहीं! पाठक गण, अगर आप ऐसा सोच रहे हैं तो भूल कर रहे हैं । नायक पिघल गया है । एक दूसरे संसार ने पलटियां खाना शुरू कर दी हैं । नायक पत्नी से करीब दो साल दूर जा पहुंचा है । वो बेचारी किसका तो हाथ पकड़े और कहां पैर से पानी छपछपाए ।
असल में नायक दो साल पहले पहाड़ में नौकरी कर चुका है । पहाड़ से उसका रिश्ता पुराना है । पत्नी पहली बार आई है, इसलिए वह ज्यादा उत्साही है । नायक के मन में पहाड़ बसा हुआ है । उसे देवदार की इस सुगंध, हवा के इन झोंकों से अपनी दोस्ती याद आ रही है । इस अकेले रास्ते पर उसने दनादन दो चार फोटो अपने कैमरे से ले लिए । उड़ते हुए एक कव्वे के पीछे पहाड़ के फ्रेम पर निशाना साध रहा था कि उसने पत्नी का चेहरा देख लिया और वो झेंप गया । फट से उसने पत्नी का एक फोटो खींच लिया । पत्नी खुश हुई, नायक उदास हो गया । कैमरे के व्यू फांइडर में से उसने अपनी पत्नी का चेहरा देखा... और वही हो गया जिसे वो शादी के बाद से लगातार टाल रखा था... आह... एक टीस सी दिल में उठी और उसे लगा उसने नायिका का चित्र खींच लिया है । हालांकि उसने हकीकत में कभी नायिका का चित्र नहीं खींचा था । उसे समझ नहीं आया... ये चेहरों का, चीजों का, घटनाओं का घालमेल इस तरह क्यों हो रहा है । हनीमूनी उल्लास के कर्तव्य को निभाता नायक उदास हो गया । उसके बाद उसी उदासी में उसने घूमने के काम पूरे किए । पत्नी के साथ मंदिर में माथा टेका, पानी के झरने तक गया, हाथ मुंह धोए, और भी जो करते बना किया । और लौट आया... चुपचाप । 

पत्नी का सिर दर्दाने लगा है, वो कमरे में लेट गई है । नायक उठा, धीरे कदमों से होटल के पिछवाड़े के उसी दोपहर बाद वाले आंगन में प्रविष्ट हुआ । वह चारों तरफ नजरें घुमाता है... धीरे धीरे... एक कुर्सी की पीठ पर हाथ रखता है... जरा सा खिसकाता है... उसी तरह धीरे धीरे बैठ जाता है । उसके जीवन के पिछले दरवाजे खुलने लगते हैं ।
नायिका उसके सामने बैठी है । उसकी आंखों में धूप पड़ रही है । उठकर कुर्सी सरका कर नायक की बगल में बैठती है । सामने मेज पर पाइनेपल जूस के टिनों में स्ट्रा पड़े हैं । नायिका स्ट्रा छू रही है ...
मैं तुमसे कुछ... कहना चाहती हूँ
हां
– ...पूछना... चाहती हूं
पूछो
तुमने क्या सोचा
किस बारे में
जैसे तुम कुछ जानते नहीं
सब बहुत मुश्किल हो रहा है
क्या
मदन ने तुमसे कुछ कहा नहीं
हां कहा था
तो
इतनी जल्दी है?
मुझे नहीं, लोगों को
तो?
यही पूछने तो मैं तुमसे आई हूं
जानता हूं । मदन ने कहा था तुम आओगी
तो?
–... बर्फ पड़ गई है
कहां
हैं! नहीं । यही तो मुश्किल है
क्या? तुम्हें लगता है मैं तुम्हें समझ नहीं पाती?
नहीं... यह बात नहीं है
तो मुश्किल क्या है?
इतना आसान नहीं है
समझना?
नहीं... समझाना
किसे, मुझे?
ओ… हो... नहीं, पेरेंट्स को
कोशिश की तुमने?
कोशिश से फायदा?
तुम्हें अभी भी फायदा बेफायदा सूझता है?
फायदा नहीं… वे बहुत कंजर्वेटिव हैं
मतलब... कुछ नहीं हो सकता
मैंने यह कब कहा
वही तो पूछ रही हूं
वो ऐसा है कि... मदन ने तुम्हें कहा होगा... एक ही रास्ता है... मुझे लगता है कि... कि इंतजार करना पड़ेगा...
कब तक?
थोड़ी पेशेंस रखो... जब तक... जब तक वो लोग थक न जाएं... थक कर हार न जाएं...
तब तक चाहे तुम मुझे ही हार जाओ... वे तुम्हारी मर्जी पूरी नहीं करेंगे और... तुम उनकी मर्जी... या मर्जी के खिलाफ... शादी नहीं करोगे
मैं मना तो नहीं कर रहा... वेट ही करने के लिए कह रहा हूं
मेरे हालात जानते हुए भी? उन्हें छोटी बहन भी ब्याहनी है
जानता हूं
तो?
– ... लो ये पी लो... पाइनेपल बेकार हो जाएगा
– ....
–....
आज तुम्हारी मौसी मिली थीं
किसलिए?
रास्ते में मिल गईं, वो रिश्ते में मेरी भी बुआ हैं
कोई बात तो नहीं हुई?
तुम्हारे बारे में पूछ रहीं थीं। साथ में उनकी लड़की भी थी किरण
क्या कहा?
मैंने तो कुछ नहीं… किरण ने कमेंट पास किया... इसके लिए तो गुडी गुडी है
मैंने पहले भी कहा था इतना उतावला होने की जरूरत नहीं है
मैंने तो कुछ नहीं कहा । कह भी देती तो क्या यह सच नहीं है?
अपने ही लिए मुश्किल खड़ी कर रही हो
साफ साफ क्यों नहीं कहते
मैं भी चाहता हूं... पर वे लोग इतनी आसानी से मानेंगे नहीं...
इसलिए... वक्त के सहारे छोड़ने के सिवा और कोई चारा नहीं
तुम्हें भी शायद फर्क नहीं पड़ता... पर मैं... मैं ही... कमजोर हूं...
प्लीज तुम कोशिश तो करो
ठीक है... ऐसे हारने लगोगी तो... मुश्किल हो जाएगा... फिर भी झेलने के लिए तैयार रहो
वो तो हूं ही । जब तक आस रहेगी तो भी... टूट जाएगी तो भी...
तुम खुद ही अनसर्टन हो
सिर्फ तुम्हारी वजह से...

नायक बड़ी देर से देख रहा था, एक चिड़िया रेलिंग पर आकर बैठ गई थी । पता नहीं उसे कैसा खटका हुआ, वो उड़ गई । नायक का ध्यान भंग हुआ । उसने देखा एक अधेड़ कोहनियों के बल रेलिंग पर झुका हुआ है । दूसरी तरफ दो लोग बैठे हैं । बेयरा उन्हें चाय देकर लौट रहा है । नायक ने तय किया चाय पी जाए और वो उठा, जाहिर है चाय पत्नी के साथ ही पी जाएगी । वो कमरे में गया । पत्नी लेटी हुई कुछ पढ़ रही थी । नायक ने पूछा - अरे तुम सोई नहीं कैसा है सिर दर्द?
पत्नी तनिक सकपका गई । बोली - नींद नहीं आई
क्या पढ़ रही हो?
पत्नी ने डायरी आगे कर दी
ओह...
यह डायरी नायक ने लिखी है । शायद प्रेम करते हुए आदमी अकेला होता है । प्रेम और अकेलेपन की ऊहापोह शायद हर प्रेमी प्रेमिका को डायरी या कविता लिखने पर मजबूर कर देती है । खास तौर पर जब चुप्पा सा प्रेम चल रहा हो, सारी इंद्रियां बहुत सक्रिय हो जाती हैं, बहुत कुछ कहने को लबालब । कह के भी अनकहा ही रहता है । उस अनकहे में अकेलापन सिर उठाता है और सारे अनकहे को अपने विस्तार में समेट लेता है । चुप्पे प्रेम और अकेलेपन की डायरी नायक के घर से चलते वक्त पत्नी को दे दी थी यह कहते हुए कि बेहतर है तुम भी जान जाओ ।
पत्नी ने नायक की उदासी सुबह घूमते वक्त ही भांप ली थी । लौटकर सिर दर्द की वजह से सो नहीं पायी । खिड़की में से देखा नायक आंगन में बैठा है तो उसे डायरी याद आ गई और निकाल कर उसे पढ़ने लगी । सिर दर्द जाता रहा । नायक को उसने अकेले बैठने दिया, कमरे में उसके अकेलेपन से संवाद करती रही । पता नहीं यह एक और प्रेम की शुरुआत थी या खटास जमा होने लगी थी, पर उसे अच्छा नहीं लग रहा था । पूछे बिना रहा नहीं गया - याद आ रही है?
नायक के जवाब नहीं दिया - चलो बाहर चलते हैं । चाय पीएं ।
दोनों आंगन में कुर्सियों पर विराजमान हो गए । नायक अपने बालों में अंगुलियां उलझा कर चुप्पी तोड़ रहा था । पत्नी ही बोली - मुझे समझ नहीं आ रहा, ये सब अधूरा कैसे छूट गया...
तुमसे जो होना था पूरा
तुम्हें मलाल नहीं हो रहा? जो चाहा वो नहीं मिला, अनचाहा...
मैं तुमसे पूछता हूं, तुम्हें ईर्ष्या नहीं हो रही?
ईर्ष्या नहीं खराब लग रहा है । खास वजह भी नहीं, सब यूं ही छूट गया । सुनो, उसे पता है तुम्हारी शादी हो गई?
हां
कोई प्रतिक्रिया?
मुझसे पहले उसकी शादी हो गई थी
याद तो करती ही होगी
– … याद पर किसका बस चलता है... शादी तो मेरी भी हो चुकी
पछतावा होता है?
उससे क्या!
लौट नहीं सकते?
यह तुम कह रही हो... लौट सकता है कभी कोई... मतलब समझ रही हो जो कह रही हो?
खराब लग रहा है... मैं भी औरत हूं...
– .....
तो भूलने की कोशिश करोगे?
बच्चों जैसी बातें कर रही हो । मैंने डायरी इसलिए दी थी कि तुम सब जान लो
मेरा यह मतलब नहीं था
बेयरा चाय दे गया । नायक ने चाय की चुस्की ली । पत्नी कुछ देर मूढ़मति बैठी रही । फिर उसने भी चुस्की ली । काफी देर तक सिर्फ चुस्कियों की आवाजें आती रहीं । वे कुछ नहीं बोले । पता नहीं यह चुप्पे प्रेम की शुरुआत थी या अकेलापन सिर उठा रहा था या खटास जमा होने लगी थी । शायद कोई भी निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी करना था । पत्नी आखिर पत्नी थी, उसका मन भर्राने लगा, फुसफुसाहट ही निकली - कब तक ऐसे ही रहेगा?
क्या?
पछताने से भी डरते हो, भूलना भी नहीं चाहते?
हैं? … नहीं… देखते हैं... झेलना तो होगा ही
ओह...
इंतजार करो... जब तक थक न जाऊँ... थक कर... हार न जाऊं
जब ये दोनों चुस्कियां ले रहे थे, आंगन में बैठा दूसरा जोड़ा एक दूसरे के फोटो खींच रहा था । ‘‘एक्सक्यूज मी’’ कहकर वो महिला नायक के पास आई, नायक उठ खड़ा हुआ और उसने उस युगल का फोटो खींच दिया । लौटकर बिना पत्नी की तरफ देखे बोला - लाइट अच्छी हो रही है, एक दो फोटो खींच लूं । तुम जाओ तैयार हो जाओ । फिर बाजार चलेंगे । यहां की शॉपिंग आज निबटा ही दी जाए ।