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Saturday, October 2, 2021

हाशिए की मुश्किलें


 

हिमाचल प्रदेश के दैनिक समाचार पत्र 'दिव्य हिमाचल' में इन दिनों प्रदेश के साहित्यिक माहौल और लेखन पर विचार विमर्श चल रहा है। रेखा डढवाल इस श्रृंखला का संपादन कर रही हैं। 26 सितंबर के रविरायीय परिशिष्ट में इस विमर्श में मैंने भी अपनी बात रखी जो 'हाशिए की मुश्किलें' शीर्षक से छपी और यहां नीचे प्रस्तुत है। 


यूं तो साहित्य की समाज में उपस्थिति नजर नहीं आती पर रहती जरूर है, भले ही अगोचर हो। इसी तरह, दूसरी तमाम चीजों की तरह साहित्य की भी अपनी सत्ता होती है। यह आम आदमी को सीधे नहीं दिखती। ज्यादातर इसकी जद में केवल वही व्यक्ति आता है जो साहित्य कर्म में लगा हो। साहित्य के भी सत्ता केंद्र बनते हैं, जिनके केंद्र में साहित्यकार होते हैं, लेकिन वे ताकत अन्य कई प्रकार के उपक्रमों से पाते हैं। जैसे विश्वविद्यालय, प्रकाशन गृह, पत्रिकाएं, पुरस्कार, सरकारी योजनाएं, आदि। इसी तरह जैसे पहले इलाहाबाद एक बड़ा केंद्र था, फिर दिल्ली पहले साहित्य का केंद्र बना और फिर साहित्य का गढ़ बन गया। चूंकि साहित्य के पाठक ज्यादा नहीं हैं, इसलिए वे साहित्य की सत्ता का कारक नहीं बन पाते हैं। इसके अलावा हिंदी में लोकप्रियता को श्रेष्ठ साहित्य का विलोम मान लिया जाता है। इसलिए और भी लोकतांत्रिकीकरण नहीं हो पाता है। 

ऐसे परिदृश्य में साहित्य के केंद्र और परिधियां बनती हैं। जो लेखक केंद्र से जितना दूर है, यानी परिधि पर है या परिधि से बाहर है या हाशिए पर है, उसके लिए साहित्य में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना उतना ही कठिन है। हालांकि यह छल-छद्म सरीखा विभाजन है। साहित्य कर्म में इसकी उतनी भूमिका नहीं है। 

इसी तरह साहित्य की मुख्य धारा होती है। मुख्यधारा के लेखन की प्रवृत्तियों के आधार पर लेखन की श्रेणियां बनती हैं। यहां भी मुख्यधारा और गौण धारा जैसा विभाजन हो जाता है। मुख्यधारा का संबंध ज्यादातर अपने समकाल से होता है। कोई भी दौर अपने वक्त के बड़े मसलों पर फोकस करता है या कहें कि हर दौर की अपनी बहसें चलती हैं, उसी से मुख्यधारा बनती है। यह मुख्यधारा अपनी साहित्य परंपरा का हिस्सा ही होती है। 

मुझे लगता है कि साहित्य के बड़े केंद्रों से दूर बैठा व्यक्ति कई स्तरों पर जूझता है। वह उत्साह बढ़ाने वाले बाहरी माहौल के लिए तरसता है। वैसे यह कमी बड़े केंद्रों में भी बनी रहती है। वहां भी कई ऐसे कोने अंतरे होते हैं जहां कई साहित्य कर्मी दुबके रहते हैं। निजी तैयारी का माहौल, मौका और साधन जुटाना भी आसान नहीं है। यूं देखा जाए तो आज के दौर में हिमाचल प्रदेश तमाम साधनों की दृष्टि से मुख्यधारा के समकक्ष ही है। फिर भी जो गतिविधि शिमला और मंडी में चलती है, और कुछ सालों से कुल्लू में चल रही है, वह कांगड़ा, ऊना, सोलन, हमीरपुर या बिलासपुर में नहीं है। यूं हर शहर में देखें तो कवियों कहानीकारों की संख्या कम न होगी; भाषा अकादमी के रजिस्टर में भी संख्या भरपूर होगी। 

हमारे प्रदेश के उन्हीं लेखकों की आवाज वृहत्तर हिंदी समाज तक पहुंच सकी है, जो अपने युगबोध के प्रति सजग रहे हैं; जिनकी रचनाओं में समकाल के साथ मुठभेड़ है; अपनी बात को सलीके से कहने की बेचैनी है; जिन्होंने अपनी भाषा को मांजने के गहन प्रयास किए हैं। यूं सत्ता केंद्रों में जगह-जगह लटकी खूंटियों के सहारे किंचित जगह पाने वाले भी बहुतेरे हैं, पर उनका लेखन मुख्यधारा में शामिल हो सकने की गवाही नहीं देता है। ऐसे लेखकों की भी कमी नहीं है जो साहित्य कर्म से शौक की तरह जुड़े होते हैं। वे अपने रचे हुए आनंद संसार में विचरण करते रहते हैं। 

परिधि पर रह रहे लेखकों की कई शिकायतें होंगी। सत्ता केंद्रों और मुख्यधारा की मौजूदगी के बावजूद कहीं कोई अदालत नहीं है, जहां पीड़ित या दर-किनार पड़ा साहित्यकार न्याय की मांग कर सके। उसकी शिकायतें हो सकती हैं, बहुत सी जायज भी हो सकती हैं। लेकिन उसे खुद ही उनका हल ढूंढ़ना होता है। इसके उलट साहित्य कर्मी से अपेक्षाएं कहीं ज्यादा होती हैं। वह अपेक्षाओं पर खरा उतरेगा, तभी उसकी बात दूर तक पहुंचेगी। 

इस बिंदु पर आकर हम कह सकते हैं कि इस पृष्ठभूमि में साहित्य कर्मी का आंतरिक संघर्ष ही उसे रास्ता दिखा सकता है। संघर्ष में सफलता उसकी आंतरिक तैयारी पर निर्भर करती है। बने-बनाए ढांचे से साहित्यकार नहीं बनते। हर एक को अपना रास्ता खुद बनाना पड़ता है। मेरा मानना है कि इस तैयारी में उसे अपनी परंपरा को आत्मसात करना पड़ता है; अपने समकाल को समझने की हरचंद कोशिश करनी पड़ती है। बने-बनाए ढांचे और सांचे उसकी इस यात्रा को भरमाते हैं, रोकते हैं, उसे पीछे खींचते हैं। इस आंतरिक तैयारी में हर लेखक को अपनी भाषा पर मेहनत करनी पड़ती है। यह आसान नहीं है। भाषा सिर्फ शब्दावली और व्याकरण और वाक्य रचना नहीं है। अभी हाल में असगर वजाहत ने स्वयं प्रकाश के संदर्भ में जिंदा भाषा का मर्म समझाया था। हर लेखक को अपनी जिंदा भाषा अर्जित करनी होती है। वह सारी परिधियों, हाशियों, सत्ता केंद्रों, गढ़ों, मठों और मठाधीशों को पार करते हुए अपनी उपस्थिति दर्ज करवा ही लेती है। उसे कोई रोक नहीं सकता।


Saturday, February 6, 2021

साहित्य कला में ‘कल’ की कलाकारियां

 

 

साहित्य कला में  कल की कलाकारियां

यंत्र का सभ्यता से बहुत पुराना संबंध है। हर युग में नए-नए यंत्र ईजाद हुए हैं। हमारा जीवन उनसे प्रभावित होता रहा है। यंत्र या मशीनें जीवन को आरामदेह बनाने के लिए बनती हैं। जब तक प्रकृति, मशीन और मनुष्य का आपस में संतुलन बना रहा, तब तक कोई समस्या नहीं आई। लेकिन जैसे जैसे या जिस जिस क्षेत्र में  मशीनें मनुष्य पर हावी हुईं, हमारे जीवन पर उनका गंभीर असर पड़ा। मशीनों की उपस्थिति से जीवन की चाल-ढाल, समाज के तौर-तरीके बदलते रहे हैं। यंत्रों या मशीनों की दखलअंदाजी जब ज्यादा बढ़ने लगी, तभी यह मुहावरा बना होगा कि जीवन यंत्रवत हो गया।

यह विषय इतना व्यापक और पेचीदा है कि इसके किसी एक पहलू पर बात करना ही ठीक रहेगा, वरना हम उलझ जाएंगे। सूचना क्रांति के साथ आए कंप्यूटरीकरण और  इंटरनेट ने साहित्य में कैसे दखलअंदाजी की है, हम इसी को समझने की कोशिश करेंगे। इसके लिए पिछले वक्तों पर जरा सी नजर डाल ली जाए।

यूं तो छापेखाने ने साहित्य-लेखन और साहित्य-पाठक संबंध को बदल दिया था। छापेखाने के आने के बाद उपन्यास जैसी साहित्य की नई विधा आई। पुस्तक की प्रतियां बनाना आसान हो गया। उसके साथ बाजार जुड़ गया और पुस्तक बिकने लगी। जहां बाजार प्रवेश कर जाता है, अपना रंग दिखाने लगता है क्योंकि उसके पीछे मुनाफे का जादू काम कर रहा होता है। लोकप्रिय साहित्य शायद इसी तरह परवान चढ़ा होगा। आज जब हम छापेखाने के प्रभाव को इस तरह देखते हैं तो यह बहुत ही साधारण बात लगती है। कागज, मुद्रण, पुस्तक, पुस्तकालय हमारे सांस्कृतिक जीवन में इतने घुलमिल गए हैं कि ये हमें अपने जीवन में अनादि काल से चले आ रहे सुंदर तोहफे प्रतीत होते हैं। पुस्तक ही क्यों, ललित कलाओं में यंत्र और मशीनों ने गजब का प्रभाव डाला है। इन्होंने हमारे लिए नया  सौंदर्यशास्त्र रच डाला है। जैसे मूर्तियों का बनाना और उनकी प्रतिकृतियां तैयार करना। चित्रकला में रंगों, कूचियों, और कैनवस का प्रयोग। संगीत के वाद्ययंत्र। इनकी तो दुनिया ही अलग है। ये कलाकार के व्यक्तित्व और उसकी मौलिक सृजनशीलता से इस कदर एकमेक हुए रहते हैं कि हमें ये यंत्र प्रतीत ही नहीं होते। जैसे सरोद, सितार,  हारमोनियम, पियानो, सैक्सोफोन अपने आप में यंत्र हैं। विश्व मोहन भट्ट की विचित्र वीणा तो गजब का आधुनिक वाद्ययंत्र है। लेकिन कलाकार जैसे ही सुर छेड़ता है, वाद्ययंत्र की सत्ता संगीत लहरियों में पिघलने लग जाती है। इसके अलावा आज हम साउंड सिस्टम के बिना संगीत सभाओं की कल्पना ही नहीं कर पाते। यही संगीत जब एल पी रिकॉर्ड, कैसेट, सीडी और पेन ड्राइव के जरिए पुनरुत्पादितहोता है, तो मशीनीकरण की भूमिका बदल जाती है। संगीतकार के साथ उसका वाद्ययंत्र संगीतकार के सुर में ढल जाता है। उस संगीत को जनता तक पहुंचाने के लिए रिकॉर्डिंग आदि के यंत्र तिजारत का हिस्सा बन जाते हैं। यहां मशीन में बाजार प्रवेश कर जाता है।

इसी तरह रेडियो की तकनीक आई तो रेडियो नाटक, फीचर जैसी नई विधाएं अस्तित्व में आईं। और हमें अंधा युग जैसा कालजयी नाटक मिला। प्राय: नाटकों के मंचन में भी प्रकाश, संगीत, दृश्यविधान की बड़ी भूमिका होती है। यानी आधुनिक नाटक मशीनों से अच्छा खासा घिरा हुआ है। नाटककार और निर्देशक ही नहीं, अभिनेता भी इन अदृश्य मशीनों से अपनी नाट्य कला में नए नए प्रयोग करते हैं। हालांकि ये बीते जमाने की बातें हो गई हैं। हम इस तरह से मशीनों के प्रयोग को आत्मसात कर चुके हैं। यह भी सच्चाई है कि इस तरह के यंत्रों के आगमन से कलाओं में मौलिकता के नए नए आयाम तो जुड़े ही हैं, रसास्वादन के फलक भी विस्तृत हुए हैं। रिकॉर्डिंग की सुविधा ने कलाओं का अभिलेखीकरण कर दिया है। वे तात्कालिकता की भंगुरता से निजात पा गईं। दिक् और काल में भी उनका फैलाव हो गया।

पिछली सदी के अंत में एल्विन टॉफलर ने बदलते हुए जीवन पर अपनी तीन पुस्तकों से अंगुली रखी थी। उनमें से एक थी फ्यूचर शॉक। आद्योगिकीकरण से जीवन पर होने वाला असर इस गति से हो रहा था कि मनुष्य समाज उसके हिसाब से खुद को ढाल ले रहा था। धीरे धीरे मशीनी परिवर्तन की गति बढ़ने लगी। यह गति ऐसी हो गई कि आदमी झटके खाने लगा। जाहिरा तौर पर दिखता न हो, पर ये झटके मनुष्य को गुम चोट देने लगे। इलेक्ट्रिक से इलेक्ट्रॉनिक, और टेक्नीकल से टेक्नोलॉजिकल में परिवर्तन बहुतायत में ही नहीं होने लगा, तेजी से भी होने लगा। रेल, हवाई जहाज के जाल ने भूगोल को सिकोड़ा था, लेकिन कंप्यूटर और इंटरनेट के आगमन ने जीवन में आमूलचूल परिवर्तन कर दिया। हवाई जहाज से भौगोलिक दूरी कम समय में तय होती है, शरीर की घड़ी लड़खड़ाने लगती है। और हम जेटलैगमें चले जाते हैं। इंटरनेट और कंप्यूटर की जोड़ी ने पहले तो वास्तविक की जगह आभासी (एक्चुअल की जगह वर्चुअल) संसार खड़ा किया। दूसरे यह जेटलैग की जगह रीयल टाइममें काम करने लगी। हमारा अधिकांश जीवन, हमारी दैनिक चर्याएं, हमारा कारोबार, पढ़ाई-लिखाई, मनोरंजन इसकी जद में आ गया। फायदे कई गुणा दिखने लगे। यह जोड़ी हमारे ज्यादा से ज्यादा स्पेस को घेरने लगी। यह काम तफरीह की तरह या मौज-मस्ती के लिए नहीं होता है। इसके लिए बिजनेस मॉडल ढाल लिए गए। इसमें अंतर्राष्ट्रीय पूंजी लग गई। यह सर्वसमावेशी मॉडल बन गया। यह वाला यंत्रीकरण जीवन की रही सही आजादी को लीलने को तैयार बैठा है। अगर आप लील लिए जाने से बच भी गए तो गुलाम तो बनना ही होगा। कोरोना के बाद प्रौद्योगिकी की जरूरत कई गुना बढ़ गई है। जो गरीबी, अशिक्षा या जिद के कारण इसके आगे नतमस्तक नहीं होगा, उसका अस्तित्व खतरे में है।

ऐसे परिदृश्य में साहित्य की तरफ नजर डालना दिलचस्प होगा। हम जानते ही हैं कि कलऔर कलाआपस में घुलती मिलती रही है। छपाई, रंगीन छपाई और सिनेमा जैसे माध्यमों में मशीनों का योगदान अधिक रहा है। गीता प्रेस गोरखपुर की पुस्तकों और उनकी पत्रिका कल्याण के माध्यम से हमारे देवी देवताओं की खास तरह की छवियां हमारे जन मानस में बैठीं। लघु चित्रकला पहले से विद्यमान थी, पर उस शैली की छवियां उतनी लोकप्रिय नहीं हुईं। महादेवी वर्मा के गीतों की पुस्तक में उनकी बनाई चित्रकृतियां आमने सामने रहकर पाठक को नया चाक्षुष अनुभव देती हैं। हरिशंकर परसाई की एक रचना है – प्रेमचंद के जूते। यह प्रेमचंद की उस फोटो को देखकर लिखी गई है, जिसमें प्रेमचंद के फटे हुए जूते दिखाई देते हैं। एक्फ्रेसिसयानी एक कलाकृति से प्रभावित हो कर की गई शब्द रचना के और भी उदाहरण मिलते हैं। विष्णु खरे की एक मार्मिक कविता है जो एक बीमार स्त्री को ले जाते हुए एक पुरुष के छायाचित्र पर आधारित है। फोटोग्राफी एक महीन और पेचीदा मशीनी कला है। लिखित साहित्य उसके साथ कैसे हमकदम होता है, ये इसी बात के उदाहरण हैं। देवी प्रसाद मिश्र की एक लंबी कविता पहल पत्रिका में छपी थी। यह कविता पन्ने पर कविता की तरह तो है ही, उसके बाएं हाशिए पर भी कवि ने कुछ लिखा है। उसे उसी तरह छापा गया है। कविता के साथ हाशिए पर नोट लेने की तरह की इबारत से कविता का चाक्षुष प्रभाव बदल जाता है। पाठक कविता पहले पढ़ेगा या हाशिए की इबारत? एक दो बार इधर उधर आवाजाही तो जरूर करेगा। कविता में अपनी बात पर जोर देने का यह तरीका छापेखाने की प्रूफरीडिंग की याद दिला देता है जिसमें गलतियां,  सुधार आदि हाशिए पर लिखे जाते हैं। बल्कि यह तरकीब इससे ज्यादा किसी पुस्तक को पढ़ते समय हाशिए पर की गई टिप्पणी के ज्यादा करीब लगती है। विश्व की दूसरी भाषाओं में ग्राफिक साहित्य (यानी रेखांकन और वाचिक भाषा का मिला जुला रूप) खूब लिखा जा रहा है। हिंदी में अभी लेखकों का ध्यान उस तरफ कम ही गया है। अपवाद स्वरूप सदानीरा पत्रिका में कुछ प्रयोग देखने को मिले हैं। हालांकि आज के दौर के तकनीकी साधनों के जलवे के सामने ये उदाहरण बहुत ही मासूम से हैं।

यह सच्चाई है कि लेखकों ने कंप्यूटर का काम ज्यादातर स्मृति वाले टाइपराइटर की तरह ही किया है। अधिकांश पहले कागज पर लिखते हैं, बाद में कंप्यूटर में टाइप करते हैं। कुछ लेखक अब सीधे कंप्यूटर पर टाइप करने लगे हैं। कुछ तकनीक प्रेमी बोल कर टाइप कर लेते हैं। इस तरह बोल कर लिखी जा रही रचनाओं का अध्ययन होना चाहिए। अज्ञेय के उपन्यास अपने अपने अजनबीके अलग तरह के डिक्शन के मद्देनजर लोगों ने यह पता लगाया था कि वह बोल कर लिखवाया गया था।

लगभग एक दशक पहले जब इंटरनेट पर हिंदी में ब्लॉगिंग शुरु हुई थी तो बहुत से नए लेखक दृश्यपटल पर आए। शुरुआत में इनमें आइटी के इंजीनियर आदि ज्यादा थे। कुछ विदेश पहुंच गए तो वतन और भाषा की याद में लिखने लगे। वह एक नई और ताजा सी विधा थी। ब्लॉगिंग में बाद में इतने नौसिखिए लोग आ गए कि सब धान बाइस पंसेरी हो गए। यहां संपादक नाम की छलनी नहीं थी। आगे नाथ न पीछे पगहा जैसी हालत हो गई। जिसके जो मन में आया लिखने लगा। ट्विटर, वट्सऐप और फेसबुक के आने पर ब्लॉगिंग पीछे चली गई। ये माध्यम ऐसे हैं कि यहां हर वक्त नया और ताजा सामान चाहिए। छोटा और चटपटा। देखा, पढ़ा और आगे निकल गए। इन मंचों से एक नई विधा निकली –लप्रेकयानी लघु प्रेम कहानी। लप्रेक के कई संकलन पुस्तकाकार भी निकले। पर लप्रेक, दशकों से लिखी जा रही लघु कहानी से कितनी अलग थी, शोध का विषय है।    

ब्लॉगिंग की तुलना में फेसबुक और वट्सऐप के लेखन में तो और भी खुला खेल फर्रुखाबादी हो गया। यहां बच्चन, प्रेमचंद, महादेवी के नाम से रचनाएं फारवर्ड होती रहती हैं। यहां फारवर्ड होने वाली रचनाओं की प्रामाणिकता संदिग्ध होती है।

ये कथित तौर पर खुले, लोकतांत्रिक और स्वतंत्र मंच हैं। ये ऐसे लगते हैं, असल में हैं नहीं। आर्टीफीशियल इंटैलिजेंसनामक की अति महीन कलभीतर ही भीतर इन माध्यमों को नियंत्रित, संचालित और निर्देशित करती रहती है। इनके पीछे मिथकीय से प्रतीत होते विशाल बिजनेस मॉडल हैं। फेसबुक की कुल संपत्ति  146.437 बिलियन डॉलर है। ये व्यक्ति के जीवन, उसके मन, उसके अतींद्रिय स्पेस में कितनी घुसपैठ कर रहे हैं, यह अलग ही मुद्दा है। और उसकी थाह पाना कठिन भी है।

इन माध्यमों ने दिक् काल की सीमाएं तोड़ी हैं। आप विश्व में कहीं भी हों, सब कुछ तत्काल घटित हो रहा होता है। भला-बुरा सब कुछ, वहीं का वहीं। एक तरफ, व्यक्ति की वास्तविकता का प्रामाणिक सिद्ध किया जाना जरूरी होता है, जिसकी वजह से उसकी निजता पर खतरा मंडराता रहता है। दूसरी तरफ, बेनाम, गुमनाम, छद्मनाम, चोर उचक्कों की भी भरमार है। तथ्य और सत्य की ऐसी-तैसी होती रहती है। केवल उत्तर सत्य बचता है जिसका सिर पैर किसी को पता नहीं।

ऐसे भ्रामक और भ्रमशील मंचों पर क्लासिक साहित्य, समकालीन साहित्य और आभासी दौर का नया साहित्य एक साथ चला रहता है। किसी के लिखे को कौन अपने नाम कर लेता है, कौन किसकी मिट्टी पलीद कर जाता है, कौन खुद को महान साबित कर या करवा लेता है, कुछ पता नहीं चलता। कई बार यहां पर साहित्य का होना ही संदिग्ध प्रतीत होने लगता है।

इस दौर में साहित्य लिखित शब्द तक सीमित नहीं है। पिछले एक दशक से यूट्यूब ने वीडियो क्रांति ला दी है। आम दर्शक श्रोता के लिए यह मुफ्त है। पर इसका भी बाकायदा बिजनेस मॉडल है। इसकी सालाना कमाई 16 से 25 बिलियन डॉलर तक है, मतलब 1600 से 2500 करोड़ डॉलर तक। इसके मालिक यहां वीडियो रखने वाले के साथ अपना लाभ बांटते हैं। यूट्यूब पर नई पुरानी फिल्में, फिल्मी गैर फिल्मी गीत, हर तरह का संगीत, नाटक तो मिल ही जाते हैं, साहित्य भी पर्याप्त मात्रा में है। साहित्य और साहित्य के प्रचारक, विचारक और टीकाकार यहां मिल जाएंगे। यहां भी गुणवत्ता का कोई बेली-वारिस नहीं है। यह एक नई तरह का फोक-स्पेस है यानी लोक-चरागाह। सामने से नि:शुल्क दिखता है, पर आप कारोबार का गुर सीख जाएं तो यह पैसा भी देता है। यहां शब्द, ध्वनि, संगीत, दृश्य, वीडियो की मंडी लगी रहती है, वह भी चारों याम। आपके पास हर तीसरे साल स्मार्ट से स्मार्टतर होते फोन को बदलने और नित्यप्रति डाटा फूंकने के पैसे होने चाहिए।

कोरोना महामारी ने इस परिदृश्य के जल रहे हवन में घी उढ़ेलने का काम किया है। लोगों का घर से बाहर निकलना बंद हो गया। स्मार्ट फोनों के जरिए सारी दुनिया नए जोश के साथ आपकी मुट्ठी में आ गई। पिछले कुछ महीनों में फेसबुक लाइव की जो बाढ़ आई, वह किसी से छिपी नहीं है। अभी तक तो पुराने लिखे को ही नए माध्यम में पेला जा रहा है, लेकिन धीरे धीरे ये माध्यम भी साहित्य पर अपना रंग चढ़ा रहे हैं। लिखित और उच्चरित शब्द तथा वीडियो कैमरे का शगल साहित्य के नए रूपों को गढ़ रहा है। इस दौर में काफी समय तक उच्चरित शब्द या ऑडियो रिकॉर्डिंग को जगह नहीं मिल रही थी। सोशल मीडिया में कैमरा और वीडियो कैमरा व्यापकता से फैला। जैसे ईबुक्स और किंडल का बाजार बना, वैसा ही ऑडियो पुस्तकों का भी बाजार अब बन रहा है। बहुत से पॉडकास्ट चलने लग गए हैं। रेडियो प्रेमी लोगों के लिए यह सहज विकल्प है। हिंदी में अभी इस तरफ लोगों का ध्यान ज्यादा नहीं गया है। लेकिन नवभारत टाइम्स अखबार ने नवभारत गोल्ड नाम से गद्य के नए प्रयोग किए हैं। वहां हर पोस्ट ऑडियो रूप में भी उपलब्ध है।    

हरेक माध्यम उसके प्रयोक्ता को भी प्रभावित करता है। ये नए माध्यम हमारे लेखक, कलाकार, संस्कृतिकर्मी, चिंतक और विचारक  को कैसे प्रभावित कर रहे हैं और कितना प्रभावित कर रहे हैं और कितना करेंगे, धीरे धीरे पता चलेगा। ये माध्यम जटिल हैं, तकनीक आधारित हैं, बहुपरतीय हैं, बहुरूपिए हैं, अंतर्राष्ट्रीय पूंजी के नवल औजार हैं, बल्कि हथियार कहना चाहिए। इनके सामने खूसट-खुर्राट राज सत्ताएं भी रपट जा रही हैं। कौन किसकी जासूसी कर रहा है, कौन किसे बेच खा रहा है, कोई पता नहीं। सत्य और तथ्य दिखता है, हाथ नहीं आता। साहित्यकार को ऐसी आभासी चरागाह जैसी मंडी में रहते हुए साहित्य रचना है। मुझे लगता है यहां भी कंपनियों के व्यवसाय का स्वॉट (SWOT) फार्मूला लग जाएगा यानी हमें माध्यम की स्ट्रेंथ (शक्ति), वीकनेस (कमजोरी), ऑपर्च्युनिटी (अवसर) और थ्रेट (खतरे) की पहचान करनी होगी और अपनी बात अपने दर्शक श्रोता और पाठक तक पहुंचानी होगी। केवल पाठक नहीं, वह एक साथ दर्शक श्रोता और पाठक तीनों हो सकता है। जैसे फिल्म में दृश्य चलता है, वह दिखाई और सुनाई देता है, अगर फिल्म अन्य भाषा की हो तो भावक सब टाइटल को भी पढ़ता चलता है। अगर दर्शक को अपरिचित भाषा की फिल्म देखने के लिए कई परतों में मेहनत करनी पड़ती है जैसे देखना, सुनना, पढ़ना, तारतम्य बिठाना, और रसास्वाद लेना, तो यह सोचिए कि रचनाकार को भी इस बहुविध माध्यम में अपनी बात कहने के लिए वैसे ही तैयारी करनी होगी जैसे फिल्म बनाने के लिए की जाती है। एकांत में साहित्य रचा जाता रहेगा, पर साहित्यकार को ध्वनि, संगीत और विजुअल के लिए और लोगों की सहायता भी लेनी पड़ेगी। यह एक तरह का सामूहिक रचना कर्म हो जाएगा। हमारी भाषाओं में भी ये प्रयोग होने लगेंगे, इसमें कोई शक नहीं है। मल्टी मीडिया रचनाओं के लिए पूरा आसमान खुला है। (ऊपर दी गई चित्रकृति : संजय कुमार श्रीवास्तव) 


भारतीय विद्या भवन की मासिक प्रत्रिका नवनीत के जनवरी 2021 विशेषांक 'मशीन होती मनुष्यता' में प्रकाशित 


 

Sunday, June 7, 2020

कोरोना के बाद कहां तक है कुदरत की तरफ लौटना मुमकिन


भारतीय विद्या भवन का मासिक कोरोना काल की घरबंदी के दौरान ऑनलाइन शाया हो गया है। संपादक विश्वनाथ सचदेव जी ने कोरोना आवरण कथा आयोजित करके भविष्य की दुनिया पर गंभीर बहस में योगदान दिया है । मेरा यह लेख नचनीत के इसी अंक में है ।  
   


खलील जिब्रान की एक छोटी सी कहानी है जिसमें जिक्र आता है कि एक भागता हुआ कुत्ता दूसरे कुत्ते को पूछने पर बताता है कि जल्दी करो सभ्यता हमारे पीछे पड़ी है । पर्यावरण को बचाने यानी उसे मूल रूप में रखने या  कुदरत के कुदरती रूप में बने रहने पर जब हम विचार करने लगते हैं तो 'सभ्यता' शब्द बीच में आ खड़ा होता है । यूं 'संस्कृति' शब्द भी बीच में आता है पर वह 'सभ्यता' की तरह रोड़ा नहीं बनता । लेकिन सभ्यता और संस्कृति का आपस में चोली दामन का संबंध है इसलिए संस्कृति भी कटघरे में खड़ी हो जाती है ।

कुछ चिंतक यह मानते हैं कि मनुष्य ने जब से अपने रहने खाने-पीने की आदतें डालीं, तभी से वह कृत्रिम होना शुरू हो गया । यानी उसकी रहनी में नकलीपन या कृत्रिमता आने लगी । यानी वह वैसा ही नहीं रहा जैसा कोई भी अन्य कुदरती पदार्थ या प्राणी होता है। पर सत्य इतना एक रेखीय नहीं है । यह खासा गुंझलक भरा है ।

इसी तरह जो लोग मौजूदा रहन-सहन और कृत्रिमता से परेशान हैं वे सीधे सृष्टि के आरंभ में लौट जाना चाहते हैं । पर क्या ऐसा संभव है ? पीछे लौटना इतना ही आसान होता तब तो कोई दिक्कत ही नहीं थी । इसलिए जहां हम आज हैं उससे आगे ही बढ़ना है । और कोई रास्ता नहीं । आगे की इस यात्रा में ही हमें तय करना है कि हमें क्या और कितना परिवर्तन करना है या हम क्या और कितना परिवर्तन करना चाहते हैं ।

यहां तक पहुंचने की प्रक्रिया में हमारी मनुष्य बनने की प्रक्रिया भी शामिल है । यानी हम बाकी प्राणियों से थोड़ा अलग तरह के प्राणी हैं । हमारा मस्तिष्क, हमारा स्नायुतंत्र, हमारा मन, हमें बाकियों से अलग करता है । प्रकृति के बीच जीवित बचे रहने तक की जद्दोजहद होती तो ठीक था, जिसे सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट कहते हैं । यह सहजवृत्ति जीवित रहने से जुड़ी है । लेकिन मनुष्य के पास सोचने के लिए दिमाग भी है महसूस करने के लिए दिल भी है । यहीं से खुराफात शुरू हो जाती है ।

मनुष्य अपने लिए चीजों को आसान करने की कोशिश करता है । वह प्रकृति के लगभग सभी अवयवों का उपयोग करना शुरू करता है । मनुष्य के पास कर्मेंद्रियां और ज्ञानेंद्रियां भी हैं । दिमाग, दिल, मन, कर्मेंद्रियां, ज्ञानेंद्रियां, मनुष्य के बहुत ही परिष्कृत, महीन और श्रेष्ठ उपकरण हैं जो अवसर आने पर आयुध भी बन जाते हैं । इंद्रियां अन्य प्राणियों में भी हैं पर मस्तिष्क के प्रयोग से मनुष्य ने इनका बहुविध उपयोग सीख लिया है । इन उपकरणों के इस्तेमाल से वह दूसरे प्राणियों के बीच खुद को अपनी इच्छा अनुसार स्थापित कर सका है । इन जटिल औजारों की वजह से मनुष्य सोचने लगा, बोलने लगा, उसने भाषा बना ली, लिपि बना ली; इसी क्रम में उसने स्मृति बना ली । एक तरफ उसकी भौतिक यात्रा है जिसमें कृषि सभ्यता का विकास होता है । साथ साथ बौद्धिक यात्रा है जिसमें वह अपने इन अतिरिक्त औजारों की मदद से भौतिक यात्रा को उत्तरोत्तर अधिक उपयोगी और आसान करने की जुगत करता रहता है । एक तरह से देखा जाए तो इस सारे उपक्रम में वह प्रकृति से दूर ही जा रहा था ।  यानी जो उसका प्राकृतिक स्वरूप या स्वभाव था उसमें परिवर्तन आता चलता है ।  एक उदाहरण से बात स्पष्ट हो जाएगी ।  जब आदमी ने कच्चा मांस खाना छोड़ दिया, आग ढूंढ़ ली और मांस पकाने लग गया तो उसके दांत कम हो गए, छोटे भी हो गए और उनकी संख्या भी कम हो गई । अपने रहने के लिए गुफा बनाई, फिर छत बनाई, तो उसके लिए नंगा रहना मुश्किल हो गया।  उसे बदन ढकना पड़ा ।  फिर ठंड और गर्मी से बचने के उपाए करने पड़े ।  मतलब वह थोड़ा कम कुदरती होता गया ।

मनुष्य की मानसिक संरचना ऐसी है कि वह सोच-समझ सकता है, उसमें सुख-दुख की भावनाएं भी है, वह महसूस भी कर सकता है और अभिव्यक्त भी कर सकता है । अगर किसी जीव को मारकर खुश होता है तो दुखी भी हो सकता है । वह दूसरे के दुख के प्रति संवेदनशील भी हो सकता है, करुणा की दृष्टि भी उसे प्राप्त है । ये ऐसी शक्तियां हैं जिनकी सहायता से वह प्रकृति के साथ अपने रिश्ते को परिभाषित करता है या कर सकता है ।

वह अपने खाने भर के लिए कमाने तक सीमित नहीं रहा । वह संग्रह करने लगा । संग्रह किया तो उसे लालच आने लगा । लालच आया तो वह दूसरे का हिस्सा छीनने से नहीं हिचकिचाया । उसकी न्याय बुद्धि डावांडोल हो गई । इसी क्रम में वह आमोद-प्रमोद और विलास की सीढ़ियां चढ़ता है । यह पाने के लिए वह ‘पुरुषार्थ’ करता है । उसकी विवेक बुद्धि उसे ‘परमार्थ’ की सीख देती है लेकिन वह ‘पराक्रम’ की तरफ भी झुकने लगता है । पराक्रम का आनंद उठाने और दूसरों के सामने उसका प्रदर्शन करने के चक्कर में वह ‘विजयी’ होने की तरफ बढ़ता है । विजयी होने का अर्थ है कि जो वह सोच रहा है वही सत्य है । वह अपने चाहे हुए को येन केन प्रकारेण पा लेना चाहता है । जब इस वृत्ति पर कोई अंकुश नहीं हो तो यह ‘अपराध’ में बदल जाएगी । मतलब यह कि विजय भाव की निरंकुशता उसके भीतर ‘अहंकार’ भरती जाती है और वह ‘न्याय भावना’ को छोड़ता चलता है । जब मनुष्य किसी के प्रति ‘अन्याय’ कर रहा होता है तो उसे दूसरे शब्दों में ‘अपराध’ कहा जाता है । यह  वृत्ति ‘वीर भोग्या वसुंधरा’ जैसी परंपरा में बदलती है ।

हम अपनी सभ्यता के विकास में इसी वीर भोग्या वसुंधरा को फलीभूत होता देखते हैं । यानी मनुष्य इस ब्रह्मांड के केंद्र में है और वह पृथ्वी का किसी भी प्रकार और किसी भी सीमा तक भोग कर सकता है । संस्कृति में ज्ञान, न्याय, करुणा, और कोमलता आदि की विचारसरणीयां भी विकसित हुई हैं जिनकी वजह से विजय भाव को बार-बार प्रश्नांकित किया जाता है । लेकिन हम पाषाणकाल से कोरोना काल तक आते-आते अच्छी तरह देख लेते हैं कि हम प्रकृति का व्यभिचार की हद तक दोहन करने से चूके नहीं ।

हम यही नहीं भूले कि हम प्रकृति के एक मामूली अंश हैं, हम उसके साथ सह अस्तित्व तक बनाकर रखना भी भूल गए । हमने अपने रहन-सहन, खान-पान, सोच-विचार का ऐसा आडंबर रच डाला कि प्रकृति और प्राकृतिक तरीकों से दूर होते गए । हम प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट करने में जरा भी नहीं हिचके । पर्यावरण को दूषित करने के बाद घड़ियाली आंसू बहा कर पता नहीं हम किसे मूर्ख बनाते रहे । 


यूं तो यह सवाल हमेशा से उठते रहे हैं और ये सवाल खुद मनुष्य ही उठाता रहा है पर इधर कोरोना वायरस के उभरने पर जैसे प्रकृति ने एक चेतावनी दी है । प्रकृति पहले भी चेतावनी देती रही है । वह मनुष्य को उसकी ‘औकात’ दिखाती रही है । इस बार यह वायरस ऐसा फैला है जिसकी वजह से हमारे रहन-सहन के तरीकों पर बंधन लग गया है । तकरीबन सभी देशों के सभी तरह के कारोबार पिछले दो-तीन महीने से ठप पड़े हैं । हमने पिछली कई शताब्दियों से खुद को अर्थव्यवस्था, औद्योगिकीकरण, मशीनीकरण और प्रौद्योगिकीकरण के जटिल और महीन जाल में फंसा लिया है । यह सारा तंत्र इस समय ‘पॉज’ या ‘रुके होने’ या ‘फ्रीज’ के मोड में है ।

इस ठहराव में भय बहुत है । रोग के संक्रमण का भय, मृत्यु का भय, अर्थव्यवस्थाओं के चौपट होने का भय । दूसरी तरफ उम्मीद भी है । उम्मीद है कि जल्दी ही यह विषाणु मर जाएगा या इसकी दवा ढूंढ़ ली जाएगी या वैक्सीन बना ली जाएगी और जीवन यथावत चलने लगेगा । एक अन्य रोमांचकारी उम्मीद है, जो यूटोपिया जैसी ज्यादा है। यह उम्मीद बताती है कि इस ठहरे हुए समय में प्रकृति अपने वास्तविक रूप में लौट रही है । हवा साफ हो गई है, समुद्री पानी साफ हो रहा है, ध्वनि प्रदूषण घट रहा है, ओजोन परत फिर से बनने लगी है । जीव जंतु निर्भय होकर विचरण कर रहे हैं ।

अब सवाल उठता है कि भविष्य के गर्भ में क्या है ? लगता है यह कायनात तो बनी रहेगी । यक्ष प्रश्न है कि कौन सी उम्मीद फलीभूत होगी ? दवा बन जाएगी और दुनिया धीरे-धीरे विकास की उसी रफ्तार को पकड़ लेगी ? उसी विकास की जो सत्यानाशी किस्म का है । या स्वप्नजीवियों की उम्मीद को साकार करते हुए प्रकृति केंद्र में आ जाएगी और मनुष्य हाशिए में चला जाएगा ? मनुष्य हाशिए में जाएगा तो उसकी अब तक बनाई गई दुनिया भी हाशिए में चली जाएगी ?

लगता है कि दोनों उम्मीदें ‘अति’ की तरफ झुकी हुई हैं । कोरोना के बाद दुनिया पहले जैसी नहीं रहेगी । उसमें बहुत से परिवर्तन लाने ही पड़ेंगे । फिलहाल किए जा रहे उपायों को देखें तो मनुष्य की सामाजिकता पर गहरा असर पड़ेगा । जब तक वैक्सीन नहीं बनती उसे शारीरिक दूरी और स्वच्छता की घुट्टी पीनी पड़ेगी । सामूहिक गतिविधियों पर अंकुश लगा जाएगा । इससे काम धंधे भी प्रभावित होंगे । अर्थव्यवस्थाएं चरमराएंगी । आर्थिक गतिविधि चालू न हुई तो लोग भूखों मरेंगे । पुराने ढर्रे पर चल पड़ी तो रोग से लोग मरेंगे । इसलिए अब गतिविधि की गति धीमी होगी । दूरसंचार, इंटरनेट जैसे साधनों (यह भी तो कृत्रिम ही हैं) पर निर्भरता और बढ़ेगी । 

Sunday, September 15, 2019

हिन्दी का राजयोग


सतीश गुजराल : साभार


एक और हिन्‍दी दिवस बीत गया। इस मौके पर राजभाषा के पद पर आसीन हिन्‍दी पर एक और तरह से भी नजर डाली जाए। यह लेख बहुत पहले लिखा था। समय बदला है पर ये बातें अभी भी प्रांसगिक हैं। पढ़कर देखिए।  


हिन्दी का राजयोग 1949 से शुरू हुआ। उस साल 14 सितंबर के दिन संविधान सभा ने हिन्दी का राज्याभिषेक कर दिया। हिन्दी राजभाषा बन गई और हिन्दी का राजयोग शुरू हो गया। राजयोग की आम धारणा बड़ी भोली और खुश करने वाली रही है। राज दरबार से जुड़ा हुआ काम मिल जाता था तो समझा जाता था राजयोग शुरू हो गया। पंडित और ज्योतिषी लोग नौजवानों का हाथ देख के कहते हैं, राजयोग है। सब कोई राजा बनने से तो रहे। राज दरबार में, सेना में, राजा के किसी महकमे में कोई काम मिल गया तो समझिए राजा से लड़ बंध गया। राजयोग हो गया।

सरकारी क्षेत्र नए जमाने का राज दरबार ही है। इसलिए सरकारी क्षेत्र में छोटी से छोटी नौकरी भी राजयोग ही मानी जाती है। इसका सीधा संबंध शायद जीवन की सुरक्षा से है। सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन से है। जरा गहराई से देखें तो यह राजयोग सत्ता की भागीदारी है। निर्णय शक्ति बहुत जनों के पास नहीं होती। निर्णय लेने के अधिकार के रूप में भले ही भागीदारी न हो, (क्योंकि वह शक्ति तो कुछ ही जनों के पास होगी) लेकिन निर्णयों को लागू करवाने के रूप में तो होती ही है। इस प्रयोग में सत्ता सुख भी है। ऐसे लोग सत्ता की छाया से ही काम चला लेते हैं। राज दरबार के भीतर तक पहुंच होगी, ऐसे अनेकानेक भय राज दरबार की छाया को विकराल बनाते जाते हैं। सत्ता इस रूप में भी बलशाली सिद्ध होती है। शायद इसीलिए अदना से अदना नौकरी भी राजयोग से विभूषित होती है। 

भाषा के मामले में राजयोग जरा टेढ़ा मसला है। एक जनभाषा पर राजभाषा की भूमिका निभाने की जिम्मेदारी आ पड़ी। राजभाषा की जिम्मेदारी एक भारी जिम्मेदारी है।  क्योंकि जनभाषा को राजभाषा में रूपांतरित होने में काफी समय लगेगा।  बीते हुए साल इसी संक्रमण के साल हैं।  जनभाषा यानी आम आदमी की भाषा उसके सुख-दुख, उसकी स्मृतियों-विस्मृतियों, सपनों-दुस्वप्नों को जबान देती है। उसमें सारा जीवन समग्रता में, सारी ऊंच-नीच के साथ समाया होता है। उसमें छल छद्म नहीं होता। उसमें चुहल होती है तो रुदन भी होता है। उसमें गाली होती है तो सदियों से संचित दर्शन भी होता है। हमारी जन भाषाओं में (हिन्दी ही नहीं सभी भाषाओं में) अध्यात्म फूल में खुशबू की तरह घुला हुआ है। षड्दर्शन की बड़ी से बड़ी गुत्थी को भारत के किसी भी गांव का बुजुर्ग एक आध कहावत से ही खोल देगा। यह ज्ञान जीवन में घुल मिल गया है। आम आदमी बड़े से बड़े सदमे को इसी ताकत से झेल जाता है। वो तो जब आधुनिकता का राजरोग फैलने लगा तब गांव के लोगों को निरक्षर करार दिया गया। निरक्षर कहकर फिर भी थोड़ी इज्जत बख्श दी गई, गनीमत है अनपढ़ नहीं कहा गया। सब जानते हैं कि जिसे अक्षर चीन्हने न आएं, वह मूर्ख सिद्ध नहीं हो जाता। पढ़ाई और विवेक में फर्क है। साक्षरता की बात भारत जैसे देश में और भी गैर जरूरी हो जाती है क्योंकि यहां तो श्रुति परंपरा रही है। तू कहता कागद की लेखी। मैं कहता आंखन देखी। वेदांत का सारा ज्ञान बिना लिखे, सुन सुन कर ही एक से दूसरी पीढ़ी तक यात्रा करता आया है। इसका यह मतलब नहीं कि लिखने के मामले में भारतीय लोग कोरे रहे हैं। वो एक अलग समृद्ध परंपरा है। विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक भाषाएं और लिपियां यहां विकसित हुईं। प्राचीनतम व्याकरण भारत में रचा गया। प्राचीन थिसारस यहां बना। यह सारा ज्ञान ध्यान इस जनभाषा में समाया हुआ है। जैसे पानी धरती में समाया हुआ होता है। धरती को सींचता भी है, बहुत सारे तत्व लेता भी रहता है। जगह जगह मधुर शीतल सोतों की तरह फूट पड़ता है। शताब्दियों की यात्रा में इस जनभाषा में और कई भाषाएं समाहित होती रहीं। दूसरे समुदायों की भाषाएं। दूसरी जीवन पद्धतियों की भाषाएं। जनभाषा का भंडार भरता रहा। कहने का मतलब यह कि जनभाषा उस सच्चे संत और ज्ञानी व्यक्ति की तरह होती है जिसका विवेक ही उसका आभूषण होता है। अध जल गगरी छलकत जाए जैसा अधकचरापन उसमें नहीं होता। ज्ञान जितना अधिक, सरलता सहजता उतनी ही अधिक। विवेक भी कैसा, सम्पूर्ण। जिसमें प्राकृतिक न्याय और समस्‍त प्राणियों का हित फल में बीज की तरह बैठा रहता है। इस फल को कोई जितना चखता है, इस विवेक का उतना ही विस्तार होता जाता है। तो यह है हमारी जनभाषाओं का मूल स्वभाव। प्रकृति में रमा हुआ। प्राणिमात्र की सुध-बुध रखने वाला। इस स्वभाव की पहचान जन भाषा के लोक-साहित्य से हो जाती है। लोक गीत की एक झलक मात्र प्रकृति और प्राणि प्रेम को सिद्ध कर देती है। शब्दों, कहावतों, मुहावरों के अकूत भंडार में झांक कर देखने पर शताब्दियों का संचित अनुभव साकार होने लगता है। ऐसी अक्षत सारस्वत जनभाषाओं में से एक है हमारी हिन्दी।

आजादी की लड़ाई के दौरान इसे एक मकसद मिला। राष्ट्र भावना, राष्ट्र प्रेम और आजादी के जज्बे जनभाषा के स्वभाव के अनुकूल थे। यह जनाकांक्षाएं थीं। जनभाषा ने अंगीकार कर लीं। भाषा को नए आयाम मिले। भाषा परवान चढ़ी। पुनर्जागरण का जमाना था। यूरोप की  ज्ञान की खिड़कियां भी खुल गई थीं। औद्योगिक क्रांति के बाद तकनीक भी सिर उठाने लगी थी। भाषा ने उसके साथ भी कदम मिला लिए। छापेखाने के आगमन के साथ भाषा के प्रचार-प्रसार की गति बढ़ गई। भाषा की भंगिमा भी बदलने लगी। उसमें किंचित आधुनिकता का सुरूर भी आ मिला। हिन्दी जैसी भाषा, जिसकी कई सहभाषाएं थीं, खड़ी बोली के रूप में प्रमुखता में आ गई। बाकी बोलियां कहलाई जाने लगीं। बावजूद इसके, इस खड़ी बोली ने भी अपना जनभाषा का चोला पहने रखा। बाना भले ही बदल गया हो, बानी? वही रही। जन साधारण की जन भाषा।

यूं राजभाषा भी कायदे से होनी तो जनभाषा ही चाहिए, लेकिन जो होना चाहिए वह होता कहां है! राज शब्द काफी गझिन शब्द है। राज राजा का होता है। राजा का काम होता है, राजकाज चलाना। कायदा कानून बनाना, उसे कायम रखना। कायदा कानून बनाने और कायम रखने का काम खासा पेचीदा है। इसे बरकरार रखने में कई हार गए, कई डूब गए। हर कोई जानता है, राजकाज के मूल में सत्ता है। सत्ता एक तरह की शक्ति है। सत्ता मद। जब कोई राजा कानून बनाता है और चलाता है तो उस कानून की ताकत राजा के पास होती है। हमारे इस मामले में ज्यादा डर की बात नहीं थी, क्योंकि नया निजाम जनता का था। लोकतंत्र था। निजाम जनता का होगा, अपनी जनता का, इसी भरोसे जनभाषा राजभाषा बनी थी। (बेलाग ढंग से देखा जाए तो जितना राज जनता का है, जनता की भाषा भी उतनी ही मात्रा में है।) सरकार चलाने, नए शब्दों में कहें तो प्रशासन चलाने, के तौर तरीके हमने अंग्रेजों वाले रखे। उसमें बहुत तब्दीलियां नहीं की गईं। अदालतों का ढांचा भी वही रखा गया। नौकरशाही भी उसी रूप में रही। सरकार चलाने के काम का एक तरह से संस्थानीकरण हो जाता है। जैसे राज का मूल स्वभाव सत्ता होता है, उसी तरह संस्थान का मूल स्वभाव नियमबद्धता होता है। हर चीज नियम में बंधती चली जाती है।  प्रशासन चलाने के लिए छोटी से छोटी चीज का ध्यान रखा जाता है। ध्यान तभी रखा जा सकता है जब नियम विनियम बनाए जाएं। वे भी ऐसे जो हर प्रत्यक्ष-परोक्ष संभावित पहलू को समेट लें। उन्हें उसी विस्तार के साथ लागू किया और कराया जाता है। लागू कराने में कायदे कानून का तामझाम बढ़ता चला जाता है और भावना लुप्त होती जाती है। यह कायदा कानून, पद्धति-प्रणाली सिद्धांत रूप में बनाई जाती है आम आदमी को ध्यान में रखकर। उसी का लाभ सर्वोपरि होता है। लेकिन संस्थानीकरण का जादू चल जाता है। ढांचा रह जाता है, आत्मा गायब हो जाती है। प्रशासन में या कायदे में आदमी इंसान नहीं रहता, व्यक्ति बन जाता है। व्यक्ति यानी नाम-गांव विहीन आदमी। सर्वनाम। (हालांकि सरकारी पर्चों में दस जगह आदमी का मय बालिद, मय गांव नाम दर्ज हुआ रहता है।) रह जाता है सर्वोपरि कायदा कानून, नियम, उप नियम। यहां तक तो फिर भी गनीमत है लेकिन यह व्यक्ति संस्थानीकरण की पेचीदगियों में संख्या में बदल जाता है। सिर्फ नंबर। संख्याओं का समूह। भाषा जब किसी संख्या को संबोधित होती है, तो उसका चरित्र बदलने लगता है। नाम को तो वह जन को संबोधित हो रही होती है, लेकिन वास्तव में वह किसी अदृश्य अनाम संख्या को मुखातिब हो रही होगी। मानवीय गर्माहट उसमें से गायब हो जाती है। सब जानते हैं कि व्यक्तित्व से ही व्यक्ति बनता है। जबकि कायदा कानून संख्या में बदल चुके व्यक्ति के  लिए होता है, मन मसि्तष्क वाले व्यक्तित्व सम्पन्न व्यक्ति के लिए नहीं। सामान्यीकरण के बिना कायदा चल नहीं सकता और सामान्यीकरण व्यक्तित्व के रास्ते का रोड़ा है। विलक्षणता व्यक्तित्व का स्वभाव है। कोई कायदा इस विलक्षणता को न संजो सकता है न पोस सकता है।

कायदे कानून में निष्पक्षता बनाए रखने के लिए वस्तुनिष्ठता लाई जाती है। वस्तुनिष्ठता के साथ साथ तार्किकता आती है। तर्क और तार्किकता एक ऐसा ऊंट है जो किसी भी करवट बैठ सकता है। तर्क तथ्य प्रधान होता है। लेकिन जरूरी नहीं कि सत्य प्रधान भी हो। तार्किकता की दृष्टि से सत्य वस्तुनिष्ठता की हद से बाहर भी रह सकता है। वस्तुनिष्ठता और तार्किकता कायदे-कानून को अकाट्य बना देते हैं। इनकी अपनी भाषा होती है। यह व्यक्ति निरपेक्ष, खुश्क और बेजान होती है। व्याकरण की रस्सी में बंधा शब्दों का पुलिंदा होती है। इन शब्दों में तार्किकता और निरपेक्षता से तराशे हुए अर्थ मढ़े जाते हैं। कायदे कानून के कागज में ताकत इसी तरह की भाषा से आती है।

ताकत तभी बनी रह पाती है जब सारे गुर प्रकट न हों। ताकतवर के अगर सारे भेद हर कोई जान लेगा तो हर कोई ताकतवर हो जाएगा। इसलिए ताकत की फितरत में ही लुकाव छिपाव शामिल होता है। कुशल प्रशासन के लिए कुछ भेद बनाए रखने पड़ते हैं। कुछ भेद खुले आम होते हैं। कुछ नियम विनियम की पेचीदगियों से पैदा हो जाते हैं। कुछ भाषा में पैदा किए जाते हैं। राजकाज को परिभाषित करने और चलाने में भाषा एक प्रमुख माध्यम होती है। यूं विचार से लेकर भूगोल तक कई कुछ राजकाज के माध्यमों में आ जाता है। विचार-दर्शन, भाषा, कला, व्यक्ति, वास्तु और भूगोल को अपने हिसाब से व्याख्यायित करना, अपने हित में मोड़ लेना सत्ता का स्वभाव है। प्रकृति की हर वस्तु का संसाधन की तरह प्रयोग सत्ता में होता है।

पुराने राजतंत्रों की सत्ता शायद एकायामी रही है। प्रकृति से उनका पूर्णतया संबंध विच्छेद नहीं हुआ था। उनकी कुटिलता-क्रूरता के अपने अन्तर्विरोध रहे हैं। आधुनिक सत्ता में पेचीदगियां बढ़ी हैं। प्रकृति पर विजय भाव ने सत्ता मद को प्रचंड किया है। ज्ञान विज्ञान की जटिलताओं ने राज्य सत्ता के माध्यमों को उसी अनुपात में बढ़ा दिया है। ये माध्यम जितने जटिल बने उतने ही अगम्य भी हुए। जनता के तंत्र के भीतर ही ये पेचीदगियां पनपीं हैं। आज जटिलता का आलम यह है कि संभवतः सत्ता को खुद पता नहीं चलता कि वह किस रुख चल रही है। सार्वदेशीय स्तर पर संपुंजन है। प्रकट लक्ष्य कुछ है, निहित लक्ष्य कुछ और है। जो लक्ष्य सिद्ध होता है, वह कुछ और ही होता है। मसलन सरकार अर्थव्यवस्था को सुधारना चाहती है। इसके लिए दूसरे बहुत से उपायों के साथ साथ विनिवेश करना चाहती है ताकि एक ओर कार्य संस्कृति में सुधार हो, दूसरी ओर धन का संकट भी दूर हो। यह प्रकट लक्ष्य है। निहित लक्ष्य है कि कारपोंरेट जगत फलता-फूलता रहे। हालांकि यह भी अब लगभग प्रकट लक्ष्य ही है। बाजार का दबाव सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका को उत्तरोत्तर सीमित करना चाहता है। तीसरे स्तर पर, यानी असल में क्या लक्ष्य सिद्ध हो रहा है? वह यह कि बाजार में वैश्विक स्तर पर जिसकी पूंजी सबसे ज्यादा है, वह अपनी शर्तों पर निर्णय करवा लेता है, ताकि वह अपना विस्तार अपने हिसाब से कर सके। सरकार की भूमिका न्यूनतम होती जाए। यूं ये लक्ष्य जनोन्मुखी हैं। इन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए क्या किया जाता है, कार्यवाहियां क्या हैं, उनके भी ऐसे ही तीन स्तर हैं - प्रकट कुछ, निहित कुछ और वास्तविक कुछ।

इन जटिलताओं को लिपिबद्ध करने वाली भाषा की क्या गत होगी, समझा जा सकता है। इन जटिलताओं को ग्रहण करने, वहन करने, अभिव्यक्त करने, दस्तावेजीकरण करने में भाषा का पुनर्संस्कार होगा। पुनर्वातरण होगा। (ये शब्द उपयुक्त नहीं हैं। इसकी ध्वनि सकारात्मक है। लिखना चाहिए, मरण होगा, फिर जन्म होगा।) वह सत्ता की भाषा होगी। जनभाषा जब इस भार को संभालने की कोशिश करने लगेगी तो वही सब मुश्किलें सामने आएंगी जो हम कुछ हद तक हिन्दी के संबंध में देखते हैं। उसमें अन्तर्विरोध पैदा होंगे। हम चाहें कि भाषा कायदे कानून को यथावत् भी रखे और सरल भी रहे। प्रशासन की बात प्रशासन की शैली में बताए और  अपना स्वभाव, अपनी प्रकृति भी न खोए, तो यह कैसे संभव है। या तो कायदे कानून के तौर तरीकों को सरल यानी वास्तव में जनसापेक्ष होना होगा या भाषा जटिल और दुरूह होगी। राजकाज का कामकाज का तरीका बदल नहीं सकता, उस पर दूसरे कई दबाव हैं तो भाषा ही बदलेगी। यही भाषा का राजयोग है। यही जनभाषा की राजभाषा की ओर की यात्रा है।

हमारे देश में यह यात्रा और भी जटिल इस कारण से भी है, क्योंकि अंग्रेजों की गुलामी का समय लंबा रहा। शासन की भाषा अंग्रेजी रही। उससे पहले फारसी रही। दोनों कलमी भाषाएं हैं। उससे पहले की देवभाषा संस्कृत भी बड़े विलक्षण तरीके से राजभाषा है। वह भाषा लोक से उपजी है। लोक में नहीं है। साहित्य में है। धर्म में है। कर्मकांड में है। संस्कृत भाषा खुद में ही एक कर्मकांड है। संस्कृत संस्थानीकरण की भी भाषा है। पंडित घर परिवार, समाज के सारे कार्य व्यापार सम्पन्न कराता है, संस्कृत में। लोक परलोक सुधारने का काम भी इसी देवभाषा में होता है। जीवन व्यवहार की भाषाएं जन भाषाएं रही हैं। छोटे से छोटे संस्थानीय किस्म के कर्मकांड की भाषा संस्कृत। सत्ता बदली तो फारसी हो गई। फिर सत्ता बदली तो अंग्रेजी हो गई। फिर सत्ता बदली, अपने हाथ में आ गई तो केंद्र में हिन्दी और राज्यों में राज्यों की भाषाओं को लाने का प्रावधान हुआ, पर वे सभी जनभाषाएं रही हैं। वे राजभाषाएं उसी अनुपात में हैं जिस अनुपात में राजकाज में जन की भागीदारी है।