दो दिन पहले यानी उन्नीस सितंबर को जनवादी लेखक संघ और स्वर संगम फाउंडेशन ने साहित्कार विनोद दास के कवितापाठ का आयोजन किया था। इसमें विनोद जी ने और कुछ कवियों कलाकारों ने उनकी कविताएं सुनाईं। कुछ कवियों लेखकों ने विनोद जी की कविता पर अपने विचार भी रखे। हृदयेश मयंक के जीवट से मुंबई के मीरा रोड उपनगर में विरंगला केंद्र साहित्यिक सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र बनगया है। यह कार्यक्रम वहीं पर करीब तीन घंटे चला। इसमें मुझे भी विनोद जी की कविता पर बोलने का मौका मिला। मैंने मुख्यत: उनके पतझड़ में प्रेम काव्य संग्रह पर अपनी बात रखी, जो यहां आपके लिए प्रस्तुत है।
विनोद दास की कविता पतझड़ में प्रेम
मैं अपनी बात विनोद दास के कविता संग्रह पतझड़ में प्रेम पर ही करने की कोशिश करूंगा। उससे पहले उनके दूसरे काम पर एक नजर डालना बेहतर होगा।
इस संग्रह से पहले विनोद दास के तीन कविता संग्रह हैं- खिलाफ हवा से गुजरते हुए, वर्णमाला से बाहर और कुजात।
कुजात संग्रह एक तरह से पिछले दो संग्रहों की अगली कड़ी है। इन संग्रहों की कविताओं से पता चलता है कि कवि की गहरी और तीखी नजर है जो मनुष्य और समाज की, समाज में व्याप्त दुख और गैर बराबरी की, गैर बराबरी भी हर तरह की, इन सब की शिनाख्त करती है। कुजात संग्रह में कई कविताएं पिछले संग्रहों की तुलना में लंबी हैं। उनमें विषय की पूरी डिटेलिंग है। कह सकते हैं कि वे सांगोपांग हैं। पिछली कविताओं के शिल्प का यहां एक तरह का विकास हुआ है। यूं लगता है मानो कवि जो कहता है वह सुनाई नहीं पड़ता, वह जो दिखाना चाहता है वह दर्शक को दिखाई नहीं पड़ता, जो वह लिखता है समाज उसे पढ़ नहीं पाता। यानी हमारा समय पहले से अधिक कठोर, रुक्ष और उदासीन हो गया है। और परिस्थितियां दारुण हैं। इसलिए कवि को पूरी शक्ति के साथ एक प्रहार की तरह अपनी बात कहने पर मजबूर होना पड़ता है। कविता लिखते हुए वह पूरी मूरत घड़ देना चाहता है। ऐसी मूरत जिसके रग रेशे, मांस मज्जा, अस्थि पंजर मन संसार सब साफ-साफ दिखाई दे। यह सब लिखते हुए कवि की जीवन दृष्टि स्पष्ट है, सधी हुई है और निष्कम्प है।
विनोद दास ने कविता के अलावा गद्य लेखन भी किया है। इनका एक उपन्यास है, एक कहानी संग्रह है, विश्व कथाकारों का अनुवाद है, विश्व कविता का अनुवाद है, संस्मरण लेखन है, और साक्षात्कार भी हैं। संपादन भी किया है। यानी ये कविता के साथ-साथ साहित्य की लगभग सभी विधाओं में सक्रिय हैं।
जब कोई लेखक एक से अधिक या कई विधाओं में काम करता है तो वह विधाओं की संभावनाओं और जरूरतों को अच्छे से समझता चलता है। वह यह भी तय कर पाता है कि कौन सी बात किस विधा में कहना ज्यादा उचित होगा। यानी वह शिल्प की प्रति भी उतना ही सजग होता है जितना अपने कथ्य के प्रति। और जब वह लेखक अपनी भाषा के पार देश की और दूसरे देशों की भाषाओं के साहित्य का अनुवाद करता है तो इसका लेखक भी साथ-साथ समृद्ध होता चलता है। जाने अनजाने वह उनसे प्रभाव भी ग्रहण करता चलता है। और उसके बीच वह अपनी पहचान या अपनेपन को बनाए रखने में भी लगा रहता है।
पिछले तीन संग्रहों के बाद विनोद दास का संग्रह आता है पतझड़ में प्रेम। यह उनकी काव्य यात्रा का एक नया सोपान है। इस संग्रह में मूलत: प्रेम कविताएं हैं। अपनी पत्नी या अर्धांगिनी के चार दशकों के संग-साथ की यात्रा है। यह दांपत्य जीवन का और ढलती उम्र का प्रेम आख्यान है। इस संग्रह में विनोद जी भीतर की ओर मुड़े हैं। वे अपने घर में चल रही जीवन लीला की काव्य लीला का गायन करते हैं। भीतर मुड़ने का यह अर्थ नहीं है कि वे अपने पिछले कविता संग्रहों में व्यक्ति के भीतर नहीं जाते। वहां वे एक सामाजिक प्राणी के नाते व्यक्ति के मनोविज्ञान और समाजशास्त्र की खोज खबर लेते हैं। इस संग्रह में वे खुद को देखते हैं। एक तरह से ये कविताएं आत्मचरित भी हैं। इन कविताओं के प्राथमिक तौर पर दो पात्र हैं -पति और पत्नी। वे गृहस्थ भी हैं और प्रेम पखेरू भी हैं। विनोद जी विनीता जी के प्रति प्रेम से सराबोर हैं। अपने प्रेम को अभिव्यक्त करने का मौका भी वे नहीं चूकते। उनके प्रेम राग का गायन गृहस्थी की खटर-पटर में भी चलता रहता है।
कविता लिखते हुए उन्हें एहसास है कि वह एक पुरुष हैं। संभवत: यह एहसास उनके जीवन में भी है। क्योंकि जीवन में यह एहसास न हो तो कविता में नकलीपन या ओढ़ा हुआ एहसास आएगा। जबकि उनकी कविता इस मामले में पारदर्शी है। वे जैसे हैं वैसे ही यहां व्यक्त हो रहे हैं। पुरुष होने के नाते अपनी कमियों, कमजोरियों, मजबूरियों के साथ। और वे उन्हें निर्कुंठ भाव से स्वीकार भी करते हैं। पुरुष वर्चस्व के कारण अपराध बोध नहीं है। व्यक्ति के तौर पर बराबरी पर आने की आकांक्षा जरूर दिखती है।
उनके मन में पत्नी के प्रति कृतज्ञता का भाव है। उन्हें लगता है कि उनकी पत्नी जैसी स्त्री के साथ रहने की वजह से वह प्रतिदिन बेहतर मनुष्य बनने की राह पर चलते रहे हैं। यह एहसास या अनुभूति एक स्वस्थ संबंध और स्वस्थ समाज के बनने की आवश्यक प्रक्रिया का हिस्सा है।
इन कविताओं में चार दशकों के दांपत्य की गाथा है। यह उस तरह से काव्य श्रृंखला नहीं है। हर कविता अलग है। बावजूद उसके वृहत्तर विषय के कारण हरेक कविता एक काव्य माला का हिस्सा है। यह दांपत्य प्रेम या दांपत्य जीवन की काव्य माला कहलाई जा सकती है। इन कविताओं में अभिव्यक्त प्रेम अशरीरी या वायवीय नहीं है। हम इसे सशरीरी प्रेम कह सकते हैं। पारंपरिक अर्थों में दैहिक नहीं है। लेकिन शरीर उपस्थित है।
कविताओं में प्रेम की स्मृति है। शरीर की भी स्मृति है। दैहिक सौंदर्य का गायन है। एक गृहस्थन का चित्रण है। शरीरों के ढलते जाने का एहसास भी है। जीवन के कम होते जाने की पीड़ा और भय भी है।
वे बीच-बीच में अपने प्रेम पात्र के मन में भी झांक लेते हैं। मन में झांकने का मौका गृहस्थी के कामकाज के भीतर ही उन्हें मिलता है। गृहस्थन अपने रोजमर्रा के काम के बोझ के बीच प्रतिक्रिया स्वरूप कुछ करती हैं तो कवि उनके मन के भावों को पढ़ लेता है या भांप लेता है।
यह कविताएं प्रेम का एकलाप हैं। वार्तालाप नहीं हैं। वार्तालाप संभव भी नहीं है। यदि होता भी तो उसे भी कवि ही लिखता। यानी कवि की नजर से ही पत्नी के संवाद हमें सुनाई पड़ते। वार्तालाप तो तब होता या तब होगा जब पत्नी यानी विनीता जी कविताएं लिखें या किसी और विधा में अपने सुंदर प्रेम भरे जीवन और गृहस्थ जीवन को अभिव्यक्त करें। तब उनकी नजर से हमें कवि और पुरुष और मनुष्य विनोद दास के बारे में पता चले।
कविताओं में प्रेम राग के साथ-साथ गृहस्थी का राग भी चलता रहता है। मध्यवर्गीय जीवन के सुख-दुख, उतार-चढ़ाव यहां मौजूद हैं। हमारा कवि निरंतर सजग है कि वह पुरुष है और वह इस बात से भी वाकिफ है कि स्त्री का मन गुप्त है। स्त्री के मन के बारे में भले ही ज्यादा न पता चले लेकिन हमारे सामने वह एक सुंदर-सुघड़ स्त्री, ममता भरी मॉं, प्रेयसी, पत्नी, गृहस्थन और हर जगह मौजूद मजबूत जीवन साथी के रूप में प्रकट होती हैं। विनोद जी के जीवन में विनीता जी का होना अविभाज्य है।
पत्नी पर केदारनाथ अग्रवाल की कविताएं भी हैं। वे आधी सदी पहले लिखी गई थीं। इन दोनों का साथ साथ अध्ययन करना दिलचस्प होगा।

