Monday, November 25, 2013

गंध ने लगाई अतीत में सेंध

Pensive 80s
रेखांकन: सुमनिका, कागज पर चारकोल



डायरी के ये अंश सन् 1997 से 2000 के बीच के हैं। तब तक आईडीबीआई छोड़कर यूटीआई में स्‍थाई तौर पर आ गया था। हालांकि यह स्‍थायित्‍व भी ज्‍यादा चला नहीं। इस समय में नौकरी और रोजमर्रा की जिंदगी के ढर्रे का तानपूरा लगातार छिडा़ हुआ है। बीच-बीच में लिख न पाने की टूटी-फूटी तानें हैं। अल्‍पज्ञ रह जाने का शोक है। कट्टरवाद की एक ठंडी लपट है और रत्‍ती भर वर्तमान में से अतीत में झांकना है। पता नहीं इन प्रविष्टियों के लिखे जाने, छपने और पढ़े जाने का कोई मतलब भी है या नहीं। डायरी के ये टुकड़े हिंदी साहित्‍य की नवीन नागरिक कविता-पत्रिका सदानीरा के हाल में आए दूसरे अंक में छपे हैं। इस कडी़ के साथ ही यह श्रृंखला अब  संपन्‍न होती है।

 
07/11/2000
बांदरा से आने पर लिंकिंग रोड शुरू होती है तो बहुत भीड़ के बीच में, बडी़ तीखी महक से सबका पड़ता है। खास किस्म की महक, पंजाब पहाड़ में आम तौर पर यह महक पाई जाती है। यहां चिकन तंदूरी सिक रहा होता है। तंदूरी का खास तेल मसाला। अपना आलम बिखेरता मसाला। जगह बडी़ मज़ेदार है। लिंकिंग रोड का बाजार। जूते चप्पल। सूट और सूट। जनाना सूट। ग्राहक टूटे पड़ रहे होते हैं। बहुत से लड़के चादरों में बेचने वाली चीजें जैसे पर्स या कपडे़, टीशर्ट वगैरह बेचते हैं। ट्रैफिक एक के ऊपर एक चढा़ आता है। वहीं है यह मुर्ग मुसल्‍लम। सारे बाजार में इस दुकान की महक गमकती रहती है। जब भी गुजरो यह गंध बडी़ पहचानी सी लगती है। आज अचानत कौंधा - अरे यह तो वही गंध है। शायद 81-82 की बात है। हमीरपुर (हिमाचल) में मिली थी यह गंध। मैंने अथकथा राजा घसीट सिंह नाटक लिख लिया था। शायद नौकरी की तलाश थी। गुरूजी (रमेश-रवि) मंडी जा चुके थे। पता चला उनकी एक्‍जाम ड्यूटी हमीरपुर में लगी है। मैं मिलने जा पहुंचा। करीब दस बरस बाद हमीरपुर गया था। हीरानगर के पीडब्‍ल्‍यूडी रेस्ट हॉउस में वे रह रहे थे। शाम को गुरूजी की संगत लगती थी। नीचे बाजार से तली हुई मछली लेकर गए। उनके कमरे में गाटी लगी। मैं तो तब सूफी ही था। रात को नाटक सुनाया। या पता नही, शायद तब नाटक नहीं सुनाया था, मंडी में उनके घर पर सुनाया था। पर उस तली हुई मछली की गंध ही चिकन की यह गंध है।

बांद्रा में दो सेंधें लग गईं, दोनों गंध मादन सेंधें। एक लगी थी स्टेशन से बाहर निकल कर तालाब के किनारे, गंदे पानी की नाली में। उस नाली में ट्टटी मिली हई थी। उसकी गंध निरंतर व्‍याप्‍त थी। यह गंध कुल्‍लू में थी। सन 70-72 में। कहां कुल्‍लू, कहां मुंबई। ट्टटी की दुर्गंध एक सी। यह बात मैंने भाई साहब को चिट्ठी में लिखी भी थी। अतीत में जाने की एक सेंध तब लगी थी। और एक सेंध आज लगी है - तंदूरी चिकन के जरीए। सरे बाजार।

8/11/2000
आज देखा ध्यान से, हालांकि स्कूटर पर चलते हुए। ज्यादा देर तक रुकने की फुर्सत नहीं थी इसलिए जितना ध्यान दिया जा सकता था, दिया। वह पंजाबी फिश फ्राई और चिकन की दुकान है। तदूंरी नहीं फ्राई। वही मसाला। वही गंध। हमीरपुर वाली। कहां हमीरपुर, कहां मुंबई की लिकिंग रोड। पर क्या यह गंध गुरूजी की संगत के कारण अविस्‍मरणीय हुई है?

Sunday, November 24, 2013

तीर्थाटन-सह-पर्यटन-सह गृहगमन

rain-w small
रेखांकन : सुमनिका, कागज पर चारकोल 


डायरी के ये अंश सन् 1997 से 2000 के बीच के हैं। तब तक आईडीबीआई छोड़कर यूटीआई में स्‍थाई तौर पर आ गया था। हालांकि यह स्‍थायित्‍व भी ज्‍यादा चला नहीं। इस समय में नौकरी और रोजमर्रा की जिंदगी के ढर्रे का तानपूरा लगातार छिडा़ हुआ है। बीच-बीच में लिख न पाने की टूटी-फूटी तानें हैं। अल्‍पज्ञ रह जाने का शोक है। कट्टरवाद की एक ठंडी लपट है और रत्‍ती भर वर्तमान में से अतीत में झांकना है। पता नहीं इन प्रविष्टियों के लिखे जाने, छपने और पढ़े जाने का कोई मतलब भी है या नहीं। डायरी के ये टुकड़े हिंदी साहित्‍य की नवीन नागरिक कविता-पत्रिका सदानीरा के हाल में आए दूसरे अंक में छपे हैं।


29/05/2000
नया साल शुरू हुए पांच महीने ख़त्म हो गए। नया साल नई शताब्‍दी। नई सहस्राब्‍दी। वक्‍त के इन टुकड़ों पर इतरा के क्या होगा। वक्‍त या तो अणु-परमाणु की तरह विखंडित होता है या फिर अंतहीन क्रम है। ये टुकडे़ तो सुविधा और भोग के खेल हैं।

मई महीने में करीब 20 दिन मुंबई से बाहर रहे। पिता जी के लिए खास तौर से हम सभी तीर्थाटन-सह-पर्यटन-सह गृहगमन करके आए। हरिद्वार, ॠषिकेश, देहरादून, मसूरी, धर्मशाला, मंडी, अमृतसर। हरिद्वार - गंगा स्नान। धर्म और कर्मकांड का एक और गढ़। पर भीतर झांक कर देखो तो यह एक सांस्कृतिक स्थल भी तो है। भारतीय परंपरा और मानस का एक जीवंत स्रोत। जीवंत पौराणिक आख्‍यान। जन समुदाय इह लोक परलोक सुधारने के लिए जुटा रहता है। धर्म के व्यपार की भी कई गझिन छायाएं यहां हैं।

धर्मशाला दो वर्ष बाद जाना हुआ। जब तक वहां न पहुंचो, एक तड़प बनी रहती है। टीस। हूक। पहुंच जाओ तो वर्तमान यथार्थ एक उदासी पैदा करने लगता है। हांलाकि शहर बहुत नहीं बदला है, पर न जाने वहां कैसी खुश्की और खालीपन है जो मुंबई की खुश्‍की और रीतेपन से अलग है। शायद घर भी एक कारक है। पर इस बार दो महत्वपूर्ण फैसले हो गए। भाई साहब को पूरे मकान में रहने की छूट। और बगल वाली ज़मीन की उनके नाम रजिस्ट्री। शायद अब उस शहर के कुछ रंग लौट आएं। हमारे वापस लौटने का हौसला थोडा़ पस्‍त हो गया है। नए सिरे से मंसूबे बांधने होंगे। खास तरह के जीवन को बनाए रखने का बंधन भी एक सीमा बन जाती है। उससे कैसे पार पाया जाए। रचनात्मकता को जीवित रखना ही शायद मूलमंत्र है।

01/10/2000
इस बीच फिर लंबा वक्‍फा बीता है, बिना कविता लिखे। यह फर्क ज़रूर है कि बिना कुछ लिखे नहीं रहा यह वक्त। इस बार यात्रा वृत्‍तांत लिखा। बहुत समय उसमें लग गया। 30 जुलाई को लिखना शुरू किया सितंबर के पहले हफ्ते में अंतिम रूप से तैयार हुआ। खरामा-खरामा। साथ में दीन दुनिया भी चलती रहती है। सुमनिका ने यात्रा के मिस बैजनाथ मंदिर पर अपनी विद्या के सहारे से लिखा। वह पहले पूरा हो गया था। मुझे ज्यादा वक्त लग गया। पर पूरा होते ही विपाशा को भेज भी दिया। अभी इन्टरनेट के लिए वेब दुनिया को भेजने की तैयारी है। अगर इन लोगों को पसंद आया तो, वैसे इन्टरनेट पर अभी गंभीर लेखन की परंपरा बनी नहीं है। इसीलिए उम्मीद कम ही है।

लाख टके का ख्याल यह रहता है कि कविता लिखी जाएगी?

Saturday, November 23, 2013

भरोसा और आस्‍था

Cycil15112013-1
रेखांकन : सुमनिका, कागज पर चारकोल 



डायरी के ये अंश सन् 1997 से 2000 के बीच के हैं। तब तक आईडीबीआई छोड़कर यूटीआई में स्‍थाई तौर पर आ गया था। हालांकि यह स्‍थायित्‍व भी ज्‍यादा चला नहीं। इस समय में नौकरी और रोजमर्रा की जिंदगी के ढर्रे का तानपूरा लगातार छिडा़ हुआ है। बीच-बीच में लिख न पाने की टूटी-फूटी तानें हैं। अल्‍पज्ञ रह जाने का शोक है। कट्टरवाद की एक ठंडी लपट है और रत्‍ती भर वर्तमान में से अतीत में झांकना है। पता नहीं इन प्रविष्टियों के लिखे जाने, छपने और पढ़े जाने का कोई मतलब भी है या नहीं। डायरी के ये टुकड़े हिंदी साहित्‍य की नवीन नागरिक कविता-पत्रिका सदानीरा के हाल में आए दूसरे अंक में छपे हैं।
 

05/12/99 प्रात: सात बजे
लगभग एक महीना हो गया, खुद से सामना किए हुए। यूं नहीं कि इस बीच सामना या मुठभेड़ नहीं होती रही है, पर ज्यादातर एक ही ट्रैक चलता रहता है। त्वरित, निरवकाश, नियमित, निरंतर। पिछले दिनों निर्मल वर्मा की भारत और यूरोप - प्रतिश्रुति के क्षेत्र पुस्तक के कई निबंध पढे़। भारतीयता की नई सी व्‍याख्‍या है। भारतीयता ही क्यों, यूरोप की भी। आपसी संबंधों की भी। इसी व्याख्या के कारण इन्हें दक्षिणपंथी, बल्कि भाजपाई कहा जाता होगा। पर यह व्‍याख्‍या विचारोत्‍तेजक है।

दूसरे, सारे लेखन में लेखन, लेखन-कर्म, जीवन और लेखक के संबंध के प्रति बडी़ सम्‍पृक्‍तता प्रतिभासित होती है। एक तरह की मंद्रता भी उनमें है। लेखन के प्रति खूब भरोसा प्रकट होता है। भरोसा और महत्व। लखनऊ में काशीनाथ सिंह को नामवर सिंह के पत्र पढ़ते हुए सुनते-देखते समय भी ऐसा ही विश्वास और आस्‍था महसूस हुई थी।

इधर के लेखकों में यह भरोसा-आस्‍था कितनी है, कहां है... शब्द की शक्ति को महसूस करना... नकारत्मक दृष्टिकोण इतना हावी होता जाता है कि भरोसा उठता जाता है। भरोसे को बचाना और महसूस करना शायद ज़रूरी है।

Friday, November 22, 2013

किस बिनाह पर कहूं कि कवि हूं ?

Babaji 80s -1
रेखांकन : सुमनिका, कागज पर चारकोल



डायरी के ये अंश सन् 1997 से 2000 के बीच के हैं। तब तक आईडीबीआई छोड़कर यूटीआई में स्‍थाई तौर पर आ गया था। हालांकि यह स्‍थायित्‍व भी ज्‍यादा चला नहीं। इस समय में नौकरी और रोजमर्रा की जिंदगी के ढर्रे का तानपूरा लगातार छिडा़ हुआ है। बीच-बीच में लिख न पाने की टूटी-फूटी तानें हैं। अल्‍पज्ञ रह जाने का शोक है। कट्टरवाद की एक ठंडी लपट है और रत्‍ती भर वर्तमान में से अतीत में झांकना है। पता नहीं इन प्रविष्टियों के लिखे जाने, छपने और पढ़े जाने का कोई मतलब भी है या नहीं। डायरी के ये टुकड़े हिंदी साहित्‍य की नवीन नागरिक कविता-पत्रिका सदानीरा के हाल में आए दूसरे अंक में छपे हैं।

25/05/99
मसला यह है कि मैं कवि हूं कवि ऐसा हूं कि कविताएं लिखता हूं साल में चार। फिर भी कवि कहलाता हूं।

27/05/99
मसला यह है कि कवि कहलाता हूं या खुद को कवि मानता हूं या असल में कवि हूं। मसला यह है कि कविताएं पत्रिकाओं को भेजता हूं और वे छप जाती हैं। बाज़दफा पत्रिकाएं मंगवा लेती हैं, तो भी छप जाती हैं। छप जाती हैं तो मानना यह चाहिए कि वे ग्राहकों यानी पाठकों के पास पहुंचती हैं। लेखकों के पास भी पहुंचती हैं। पिछले करीब बीस साल से तो ऐसा ही हो रहा है। यह मसला अर्से से दिमाग में अटका हुआ है कि यूं तो पूरा ही साहित्य, लेकिन खास तौर से कविता, कितने लोगों द्वारा पढी़ जाती है। कोई सर्वेक्षण तो उपलब्ध है नहीं। पक्की सूचना भी नहीं है। पत्रिकाओं की वितरण संख्या से ही अंदाज़ होता है कि पाठक कविता पसंद नहीं करता।

जो बात मैं अर्से से दर्ज करना चाहता हूं, वह यह भी है कि मैं मानता हूं कवि हूं, परिवार और दोस्त मानते हैं। कुछ लेखक संपादक मानते हैं लेकिन जात-विरादरी में, पास-पडो़स में, काम-धंधे के माहौल में मैं भूल कर भी यह जिक्र नहीं कर सकता कि कवि हूं। इसकी क्या वजह है ?





Tuesday, November 19, 2013

क्या यह यश-लिप्‍सा थी ?


Picture 031
रेखांकन : सुमनिका, कागज पर चारकोल


डायरी के ये अंश सन् 1997 से 2000 के बीच के हैं। तब तक आईडीबीआई छोड़कर यूटीआई में स्‍थाई तौर पर आ गया था। हालांकि यह स्‍थायित्‍व भी ज्‍यादा चला नहीं। इस समय में नौकरी और रोजमर्रा की जिंदगी के ढर्रे का तानपूरा लगातार छिडा़ हुआ है। बीच-बीच में लिख न पाने की टूटी-फूटी तानें हैं। अल्‍पज्ञ रह जाने का शोक है। कट्टरवाद की एक ठंडी लपट है और रत्‍ती भर वर्तमान में से अतीत में झांकना है। पता नहीं इन प्रविष्टियों के लिखे जाने, छपने और पढ़े जाने का कोई मतलब भी है या नहीं। डायरी के ये टुकड़े हिंदी साहित्‍य की नवीन नागरिक कविता-पत्रिका सदानीरा के हाल में आए दूसरे अंक में छपे हैं।


03/10/98
आज आकाशवाणी के लिए अली सरदार जाफरी का साक्षात्‍कार लिया। मैं 10-12 सवाल लिख के ले गया था। किताब भी थोडी़ बहुत पढ़ गया था। पर ज्‍यादातर बात PWA पर ही केंद्रित हो गई। फिर मुडी़ तो हिंदी उर्दू से होती हुई भाषा समस्या पर पहुंच गई। अपनी कविता की विकास यात्रा पर महाराज ने कुछ बोला नहीं, माने मार्के का, और बाद में शिकायत करने लगे कि और सब पर हुई कविता पर बात नहीं हुई। फिर जो बात कविता पर की भी, वह अपनी ही कविता का वखान थी। उर्दू कविता के मिजाज या परिवर्तन पर कुछ खास नहीं बोले। प्यास और आग (1960) संग्रह के बाद उनकी कविता में क्या तब्‍दीलियां आईं, उन पर भी वे बहुत नहीं बोले। ''PWA का रोल खत्म हो गया है। तब की जरूरत थी, पूरी हुई। अब साहित्‍य अकादमी है, NBT है, दूसरी अकादमियां हैं, वे इस भूमिका को निभा रही हैं।'' ये टिप्पणियां बहसतलब हैं लेकिन साक्षात्कार में इतना समय नहीं था, कि और उलझा जाता।

इन्टरव्यू लेने के लिए हालांकि सुमनिका को बुलाया गया था, पर उसका कॉलेज था। मैं इसीलिए चला गया कि इस बहाने से सरदार से वाकि‍फियत हो जाएगी और सुमनिका जो प्रदीप सक्‍सेना के आलोचना अंक (पहल) के लिए इन्टरव्यू लेना चाहती है, वह आसान हो जाएया। हालांकि मन में कहीं यह भी था कि भारतीय ज्ञानपीठ सम्‍मान प्राप्त साहित्कार से इस तरह सार्वजनिक बातचीत करने का अवसर चूकना नहीं चाहिए। क्या यह यश-लिप्‍सा का एक रूप है? पता नहीं, मन में बात खटकी क्योंकि अर्से से इस तरह के मौकों से भागता रहा हूं। क्या यह लाइकोपीडियम (होम्‍योपैथी) का असर है?

Sunday, November 17, 2013

डंडे के ज़ोर पर जयकारा

Picture 027-1
रंखांकन : सुमनिका, कागज पर चारकोल


डायरी के ये अंश सन् 1997 से 2000 के बीच के हैं। तब तक आईडीबीआई छोड़कर यूटीआई में स्‍थाई तौर पर आ गया था। हालांकि यह स्‍थायित्‍व भी ज्‍यादा चला नहीं। इस समय में नौकरी और रोजमर्रा की जिंदगी के ढर्रे का तानपूरा लगातार छिडा़ हुआ है। बीच-बीच में लिख न पाने की टूटी-फूटी तानें हैं। अल्‍पज्ञ रह जाने का शोक है। कट्टरवाद की एक ठंडी लपट है और रत्‍ती भर वर्तमान में से अतीत में झांकना है। पता नहीं इन प्रविष्टियों के लिखे जाने, छपने और पढ़े जाने का कोई मतलब भी है या नहीं। डायरी के ये टुकड़े हिंदी साहित्‍य की नवीन नागरिक कविता-पत्रिका सदानीरा के हाल में आए दूसरे अंक में छपे हैं।


25/09/98
आज दफ्तर के काम के सिलसिले में बाल ठाकरे के प्रभाव की बदमग्‍जी का प्रत्‍यक्ष अनुभव हआ। अब तक बातें सुनने में ही आती थीं। आज पता चला कि 'जोर-जबरदस्ती' कैसे काम करती है। कोई फौजदारी नहीं हुई। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को जबरदस्ती कैसे रोका जाता है, शक्तिशाली प्रबंधन भी कैसे घुटने टेक देता है, यह पता चला। पिछले कई महीने से हम लोग स्टाफ की रचनाओं का संकलन प्रकाशित करने में जुटे थे। उसे आकर्षक बनाने में मेहनत कर रहे थे। कल ही पत्रिका के रूप में 'संभावना' नाम का यह संकलन वितरित हुआ। आज शाम को लोकाधिकार समिति ने विरोध दर्ज करा दिया। विरोध क्‍या, पूरा का पूरा जत्‍था कार्यपालक निदेशक के पास पहुंच गया। शिकायत यह थी कि एक लेख में लिखा गया था कि फूलन देवी और बाल ठाकरे जैसे लोगों के पीछे जनता कैसे पागल है। जनता का बडा़ पतन हो गया है। आपत्ति इस बात पर थी कि 'दिंदू हृदय सम्राट' बाल ठाकरे की तुलना फूलन देवी से कैसे कर दी गई। कार्यपालक निदेशक वासल साहब ने निर्णय लिया कि प्रकाशन को वापस ले लिया जाए। इसका वितरण न किया जाए। हम लोग, उनके सेनानी, जुट गए टेलीफोन करने, चिट्ठी लिखने, पत्रिका उठवाने में, कि उसे लेकर डंप कर दिया जाए। किए को अनकिया कर दिया जाए।

दफ्तर में कर्मचारियों की यूनियन पर शिव सेना का वर्चस्‍व है, लोकाधिकार समिति भी उनका ही एक अंग है। विरोध उसी ने दज किया। ढेर सारे चपरासियों और ड्राइवरों ने पत्रिका बंद करवा दी। सवाल चपरासियों ड्राइवरों का नहीं है, सवाल अक्‍खड़पन और कुंदजहनी का है। आलोचना सुनने का धैर्य नहीं है। दूसरे का पक्ष सुनने की समझ नहीं है। घेराव, धरना, जोर आज़माइश के तमाम तरह के तरीकों से अपनी बात मनवाने की जिद्द है। डंडे के ज़ोर पर जयकारा बुलवाना है। महाराष्ट्र के इस आतंक का सामना आज इस तरह से हुआ। अब देखना है आगे क्या होता है।

Saturday, November 16, 2013

परिपक्‍वता, मतलब समझदारी कब आएगी ?

Tree 15112013
रेखांकन : सुमनिका कागज पर चारकोल


डायरी के ये अंश सन् 1997 से 2000 के बीच के हैं। तब तक आईडीबीआई छोड़कर यूटीआई में स्‍थाई तौर पर आ गया था। हालांकि यह स्‍थायित्‍व भी ज्‍यादा चला नहीं। इस समय में नौकरी और रोजमर्रा की जिंदगी के ढर्रे का तानपूरा लगातार छिडा़ हुआ है। बीच-बीच में लिख न पाने की टूटी-फूटी तानें हैं। अल्‍पज्ञ रह जाने का शोक है। कट्टरवाद की एक ठंडी लपट है और रत्‍ती भर वर्तमान में से अतीत में झांकना है। पता नहीं इन प्रविष्टियों के लिखे जाने, छपने और पढ़े जाने का कोई मतलब भी है या नहीं। डायरी के ये टुकड़े हिंदी साहित्‍य की नवीन नागरिक कविता-पत्रिका सदानीरा के हाल में आए दूसरे अंक में छपे हैं।
 

15/09/98
पांच हफ्ते कैसे बीत गए पता ही नहीं चला। डायरी लिखने का मौका भी नहीं मिला। एक बार फिर दिल्ली जाना पडा़ और लौटकर वही नियमति व्‍यस्‍तता।
कल शाम को लौटते समय (वर्ड ट्रेड सेंटर से) संजीव चांदोरकर (आईडीबीआई में सहकर्मी और मराठीभाषी सचेतन मानुस) मिल गए। ट्रेन में भी थोडी़ बातचीत होती रही। वे एक मराठी पत्रिका पर्याय का जिक कर रहे थे। हिंदी की लघु पत्रिकाओं जैसी पत्रिका है लेकिन वे उसकी संपादकीय दृष्टि, रचना-चयन यदि से प्रसन्‍न नहीं थे। उनका आशय यह था कि इस तरह...
16/ 09/98
... की पत्रिकाएं बहुत सीमित पाठकों तक जाती हैं। लेखकों और कार्यकर्ताओं के बीच ही जाती हैं, जिनकी बौद्धिक तैयारी काफी हद तक हुई होती है। तो उन्हें ऐसी सामग्री चाहिए जिससे उन्हें कुछ नई बात, नया दृष्टिकोण जानने को मिले। लेकिन पत्रिका में कुछ भी भर दिया जाता है। शायद पत्रिका छापने का शौक ज्यादा होता है। सब लोग कई कई वर्षो से काम कर रहे हैं और उनकी उम्रें भी चालीस को छू रही हैं लेकिन मामला कॉलेज विद्यार्थियों जैसा रहता है। इस पर मैंने कहा कुछ गड़बड़ है। शायद परिपक्‍व होने की उम्र बढ़ गई है। अब लोग जल्दी मैच्‍योर नहीं होते। मेरी उमर भी चालीस बरस हो गई है लेकिन बहुत से मसलों पर लगता है, स्पष्टता नहीं है। कई बातें पता ही नहीं हैं। बहुत कुछ तो पढ़ सीख ही नहीं पाए। पहले छोटी उमर में ही लोग बडे़ हो जाते थे। शायद यह बात सिर्फ अतीत राग नहीं है। कहीं कुछ गड़बड़ तो है। अगर कोई 50 वर्ष तक युवा ही होगा तो वह परिपक्‍व कब होगा, प्रौढ़ कब होगा और ज्ञानी वृद्ध होने के लिए उसके पास अपनी उमर के कितने बरस बचेंगे? क्या हमारी आयु इतनी बढ़ गई है? अगर औसत उमर 70 भी हो तो भी उसके पास परिपक्‍व समझ के 20 ही बरस बचते हैं यानी युवावस्था से कम। इसके कारणों को ढूंढना बडा़ मुश्किल है और अपने मामले में तो लगता है 50 तक भी परिपक्‍वता शायद भी आये। मतलब समझदारी।

Thursday, November 14, 2013

मध्‍यवर्गीय होने से कविता जनविरोधी नहीं हो जाती

dekhna
रेखांकन : सुमनिका, कागज पर चारकोल


डायरी के ये अंश सन् 1997 से 2000 के बीच के हैं। तब तक आईडीबीआई छोड़कर यूटीआई में स्‍थाई तौर पर आ गया था। हालांकि यह स्‍थायित्‍व भी ज्‍यादा चला नहीं। इस समय में नौकरी और रोजमर्रा की जिंदगी के ढर्रे का तानपूरा लगातार छिडा़ हुआ है। बीच-बीच में लिख न पाने की टूटी-फूटी तानें हैं। अल्‍पज्ञ रह जाने का शोक है। कट्टरवाद की एक ठंडी लपट है और रत्‍ती भर वर्तमान में से अतीत में झांकना है। पता नहीं इन प्रविष्टियों के लिखे जाने, छपने और पढ़े जाने का कोई मतलब भी है या नहीं। डायरी के ये टुकड़े हिंदी साहित्‍य की नवीन नागरिक कविता-पत्रिका सदानीरा के हाल में आए दूसरे अंक में छपे हैं। 

05/08/98 नई दिल्ली यूटीआई गेस्ट हाऊस, ग्रेटर कैलाश

गोविंद सिंह (पत्रकार) और तापस चक्रवर्ती (आईडीबीआई के सहकर्मी और अंग्रेजी कवि) से बात हुई। गोविंद से संयोग से राकेश वत्‍स (अंबाला वाले नहीं, ये हिमाचल के हैं) का नंबर मिल गया। अर्से बाद उससे बात की। पिछले साल चंडीगढ़ में कई सालों बाद भेंट हुई थी। तब उसके पिता का एक्सिडेंट हुआ था। आज उससे पता चला जगदीश मनहास (गुरु नानक देव विश्‍वविद्यालय में हमारे सीनियर, अब पोर्ट ब्‍लेयर में) के भाई का देहांत हो गया है। बड़ी बुरी खबर है। सम्पर्क तो बरसों से नहीं था, यूनिवर्सिटी के बाद ही कोई खबर नहीं थी कहां है। अचानक पता चला तो बुरा लगा। यह भी पता चला कि सांगरा (हिमाचल से) फिर बे-रोजगार है। उस पर भाग्य की मार हमेशा पडी़ रहती है।

तापस ने भी उद्भभावना कविता विशेषांक में छपी कवितायों की आलोचना की। सभी एक सुर से आलोचना कर रहे हैं। हां यह है मध्यवर्गीय कविता। जब कवि मध्यवर्ग का है तो कविता किसकी लिखेगा। वह लिखने में ईमानदार है। नौकरीपेशा है। वक्त का उसके पास टोटा है। अपने वर्ग से बाहर की दीन-दुनियां वह कहां से देखे। बाहर की बात फार्मूले से लिखेगा तो नकल ही होगी। जब समाज का बड़ा तबका सारे विमर्श से बाहर है तो अकेला कवि क्‍या इन्‍कलाब कर लेगा। यह कवि और इसकी कविता जनविरोधी नहीं है। जन का प्रतिनिधित्‍व उस रूप में नहीं हो रहा हो, ऐसा हो सकता है। पर जनभक्‍त या जनमित्र कट्टरपने की बात करते हैं। संस्कृति के दूसरे पहलुओं के साथ मिलाकर, दूसरे कला माध्‍यमों के साथ मिलाकर कविता की बात होनी चाहिए। पत्रकारिता को भी सामने रखना चाहिए। भक्तिकाल जैसा बंजारा कवि समय लौट कर नहीं आ सकता। आज का कवि अलग धारतल पर है, जनता अलग धरातल पर। और जनता के भी ढेरों धरातल हैं। हवेली की छत तक पहुंचने वाली सीढ़ी की तरह के धरातल हैं। अगर कवि की ताल या कदमताल अलग है तो कहानीकार भी अपने ही घाट पर कपडे़ पछींट रहा है। जरा उपन्यास भी गिन लिए जाएं, मध्यवर्ग से बाहर के जीवन के कितने हैं। मतलब यह कि ऐसा बयान करते समय विधा की मर्यादा का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। तुक ताल छंद का दुराग्रह जनता को बदल डालेगा, अगर ऐसा विश्वास है तो यह बालोचित विश्वास है।


Saturday, November 9, 2013

नीरवता, साहित्‍य व संगीत

Bhirti1
रेखांकन : सुमनिका, कागज पर चारकोल


डायरी के ये अंश सन् 1997 से 2000 के बीच के हैं। तब तक आईडीबीआई छोड़कर यूटीआई में स्‍थाई तौर पर आ गया था। हालांकि यह स्‍थायित्‍व भी ज्‍यादा चला नहीं। इस समय में नौकरी और रोजमर्रा की जिंदगी के ढर्रे का तानपूरा लगातार छिडा़ हुआ है। बीच-बीच में लिख न पाने की टूटी-फूटी तानें हैं। अल्‍पज्ञ रह जाने का शोक है। कट्टरवाद की एक ठंडी लपट है और रत्‍ती भर वर्तमान में से अतीत में झांकना है। पता नहीं इन प्रविष्टियों के लिखे जाने, छपने और पढ़े जाने का कोई मतलब भी है या नहीं। डायरी के ये टुकड़े हिंदी साहित्‍य की नवीन नागरिक कविता-पत्रिका सदानीरा के हाल में आए दूसरे अंक में छपे हैं।


14/05/98 प्रात: 8:20

जब से मैत्रेयी पुष्पा का उपन्यास चाक पढ़ कर खत्‍म किया है मन इतना भरा-भरा रहा है कि डायरी लिखना चाहता रहा हूं। चाक से कुछ ही दिन पहले इदन्‍मम् पढा़ था। दोनों ने बहुत उद्वेलित किया था। चार्ज किया था। लेकिन जीवन का ढर्रा ऐसा है कि वक्‍त निकल नहीं पाया। कल आजकल में पं.जसराज के भजनों की कैसेट की समीक्षा पढी़। शाम को कैसेट खरीद भी ली। रात से सुन रहा हूं। अभी जो भजन चल रहा था वह भी वैसे ही चार्ज कर रहा था। सोचा कम से कम यह बात तो दर्ज कर दूं। रह जाएगी तो रिस जाएगी। विस्तार से बाद में लिखूंगा इन पिछले दिनों की मन: स्थिति के बारे में। नीरवता के आनंद के बारे में। साहित्य की सहचरता के बारे में। संगीत के राग के बारे में।

 
gal suna-4-1
रेखांकन : सुमनिका, कागज पर चारकोल


साहित्य साहचर्य

16/05/98 शाम 5 बजे मथुरा, मुंबई अमृतसर स्वर्ण मंदिर मेल में

बाहर गर्मी बहुत है। भीतर (ए सी में) शांति है। पिछले दिनों की साहित्य साहचर्य की बातें दिमाग में हैं। पता नहीं आज भी लिखी जाएंगी या नहीं। गाडी़ हिचकोले जम के ले रही है।

इदन्‍मम् में राजनैतिक कार्यनीति की एक रूपरेखा उभरती है। वही उसकी रीढ़ है। हालांकि भाषा की गुंझलक ज्यादा है। जनता के बीच से जनता का आदमी (बल्कि औरत) दु:खों से तप के निकले (जनता में भी किसान) और जागरण या आंदोलन की अगुआई करे। मानवीय रहते हुए, सहज साधारण रहते हुए, इच्‍छा-शक्ति को संजोए रखते हुए। मंदाकिनी ऐसी ही युवती है।

चाक भी सुंदर प्रभावशाली उपन्यास है। सारंग नैनी के चरित्र में बहुत उठान है। राजनिति की धक्‍कमपेल प्रत्‍यक्ष है। प्रधान, प्रधान पद के प्रत्‍याशी, जातिवाद, भ्रष्टाचार, आदर्श पर अडिग अध्‍यापक। इस सारे चहबच्‍चे के बीच सारंग का चरित्र विकल्प के रूप में उभरता है। सच्चाई का पक्षधर। पति से भी लोहा ले लेने वाली। संबंधों की अंतर्धाराएं, सभी चरित्रों की गजब की हैं।

उपन्यास में पाठक को धर दबोचने की शक्ति भी है। क्या यह राजनैनिक कथा-वस्‍तु के कारण है, चारित्रिक सघनता के कारण है, समाज की बेहतरी के विचार के कारण है, पूरी लेखन कला के कारण है? शायद इन सभी कारणों से है।

एक और मकनातीसी कारण है। सारंग और श्रीधर मास्‍टर का प्रेम। श्रीधर अपने कर्तव्य के प्रति अडिग है। सारंग अन्याय से लड़ने के लिए हर बार श्रीधर से ही ताकत पाती है। तथाकथित सामाजिक नैतिकता से ऊपर उठा हुआ प्रेम-पाश है। यह भी पाठक को बांधता है। इन दोनों चरित्रों के कारण एक ऊर्जा प्रवाहित होती है। बाहरी स्तर पर नाटकीयता भी बनती है।

पं. जसराज के कंठ में सरस्‍वती है। भजन बडे़ सुंदर गाए हैं। आह्लादित करते हैं। संगीत में ताल मेरी पकड़ में पहले आती है, शायद इसलिए भी ये भजन आकर्षक लगे हों। देह उस ताल के वशीभूत होने लगती है। बहुत साल पहले रेडियो से फिलर के रूप में शहनाई का एक टुकडा़ बजा। मैंने रिकार्ड कर लिया। बाद में पता नहीं, उसे कितनी बार सुना। जितनी बार सुना, उतनी बार उसने देह को पिघला दिया। पता नहीं वैसे संगीत का कैसा असर होता है कि देह वश में नहीं रहती। खो जाती है। ये शब्द भी उस मन:स्थिति के लिए उपयुक्‍त नही लग रहे। पूरी तरह प्रकट नहीं कर पा रहे। फिर से जसराज के ये कृष्ण भजन सुने जाएं, तो पता नहीं कैसे लगें।

इदनमम् और चाक से पहले नरक कुंड में बास (जगदीश चंद्र), पांचवा पहर (गुरदयाल सिंह, पजांबी) अनुभूति (हेमांगिनी रानाडे) उपन्यास पढे़ थे। नरक कुंड में बास दलि‍त चेतना का बडा़ निर्मम यथार्थवादी उपन्यास है। सारे वर्णन बडी़ निर्ममता से किए गए हैं। एक दूरी, एक ठंडेपन से। अतिरिक्‍त भावुकता के बिना। पाठक चमडे़ के कारखाने के जीवन के चित्रण से दहलता चला जाता है। शिल्प की परवाह जगदीश चंद्र ज्यादा नहीं करते।

पांचवा पहर तो साधारण उपन्यास है। अनुभूति भी। यह मुंबई के पारसी समुदाय पर है। एक समाप्त होती हुई जाति की कहानी। बिन मां-बाप की एक संघर्षशील लड़की की कहानी। हेमांगिनी जी को भाषा और वर्णन के लिए और मेहनत करने की जरूरत है। (ये बात अगर उनको पता चले तो वे दुखी हो जाएं। मेरी पिटाई भी हो जाए।) इस उपन्यास के बाद पहल में मैत्रेयी पुष्‍पा की कहानी राय प्रवीण पढी़ थी। बडा़ प्रभावशाली वर्णन। आलोड़ित कर देने वाला। वह कहानी आधी पढ़ ली थी, कुछ पंक्तियां सुमनि‍का को सुनाने लगा तो ऐसा समा बंधा कि सारी कहानी ही सुना डाली। अंत तक पहुंचते-पहुंचते उसने द्रवि‍त कर दिया। सहज मनोदशा में लौटने में वक्‍त लगा। भावुकता का उद्रेक पेश करना क्‍या कहानी की कमजोरी है?

ट्रेन में शिव प्रसाद सिंह का गली भागे मुड़ती है पढ़ना शरू किया। उपन्यास में वैसी ताकत नहीं है। लगा मैत्रेयी के उपन्‍यासों के प्रभाव को अगर दर्ज नहीं करुंगा तो काशी की बाढ़ में ये धुल जाएंगे। यह अभी तक साधारण उपन्यास लगता है। बहुत पहले इन की लिखी हुई श्री अरविंद की जीवनी उत्तर योगी पढी़ थी। बडी़ अच्छी लगी थी।

Monday, November 4, 2013

कोरा कागज

Sumanikas sketch
रेखांकन: सुमनिका, कागज पर चारकोल

डायरी के ये अंश सन् 1997 से 2000 के बीच के हैं। तब तक आईडीबीआई छोड़कर यूटीआई में स्‍थाई तौर पर आ गया था। हालांकि यह स्‍थायित्‍व भी ज्‍यादा चला नहीं। इस समय में नौकरी और रोजमर्रा की जिंदगी के ढर्रे का तानपूरा लगातार छिडा़ हुआ है। बीच-बीच में लिख न पाने की टूटी-फूटी तानें हैं। अल्‍पज्ञ रह जाने का शोक है। कट्टरवाद की एक ठंडी लपट है और रत्‍ती भर वर्तमान में से अतीत में झांकना है। पता नहीं इन प्रविष्टियों के लिखे जाने, छपने और पढ़े जाने का कोई मतलब भी है या नहीं। डायरी के ये टुकड़े हिंदी साहित्‍य की नवीन नागरिक कविता-पत्रिका सदानीरा के हाल में आए दूसरे अंक में छपे हैं।

05/01/98
इस बीच कई दिन बीत गए हैं। कई रातें गुज़र गई हैं। न कविता हूक बन के दिल में समाई। न छुट्टी वाली रात को हाहाकार बन कर निकली। दिसंबर खत्म हो गया। यानी सन् सत्‍तानवे खत्म हो गया। यानी एक और साल बीत गया। अ भी-अभी थोडी़ देर पहले सोच रहा था क्या किया। इतने साल बीत गये। लिखना तो दूर की बात, मसले ठीक से समझ भी नहीं पाए। समझ बनी ही कहां। उमर चालीस की हो गई। जैसे अभी तक कुछ पल्ले पडा़ ही नहीं है। सोचा था साहित्य अपना क्षेत्र है। लेकिन साहित्य की भी समझ कहां है? जेब में कोरा कागज़ ही है। उस पर ककहरा भी नहीं उकेरा गया है। जब कागज़ ही कोरा है तो लिखा कहां से जाएगा।

क्या यह अवसाद का दौरा है? हो सकता है, कुछ हद तक अवसाद ही हो। या हो सकता है कुछ न कर पाने की कुंठा हो। सुमनिका तो कहती है, चिढे़ हुए रहते हो। चेहरा भी वैसा ही दिखता है। तो क्या चेहरे में भी चिढ़ भर गई है।
नौकरी तो दिमाग़ पर चारों याम छायी ही रहती है। (इससे बडी़ मुसीबत और क्या होगी) इधर रेडियो वालों ने फंसा दिया है। भारती पर प्रोग्राम बनाने का बिल्कुल मन नहीं है। रत्‍ती भर उत्साह नहीं है। वे इस बात को समझते नहीं। सुमनिका भी नहीं समझती। मना कर देने का मन है पर किसे कैसे कहा जाए।

भारती को पूरा पढा़ भी नहीं है। छिटपुट पढा़ई के बूते पर न्याय नहीं हो जाएगा। उससे बडी़ बात यह कि जो प्रोग्राम उनके मरणोपरांत उनके जन्म-दिन का देखा 'पुष्पांजली', उससे मन और भी मर गया है। काफी फूहड़ था।

कविताओं के प्रति यही धारणा बन रही है कि वासना लिप्त मांसलता का ही गान भारती ने किया है। कविता में वे उससे बाहर नहीं निकले। जहां कविता में कथात्मकता या चरित्र या मिथ या इतिहास या पुराण का सहारा लिया गया है, वहां समाज की व्याख्या होने लगती है। अंधायुग उसका चरम है जबकि कनुपिया मिथक के सहारे के बावजूद दूसरे छोर की कविता है। देह की उपासना। कुल मिला कर भारती आकर्षित नहीं करते। (आज 2013 में सोचता हूं, यह कितना सरलीकरण है)




Saturday, November 2, 2013

कम लिखे रह जाने का कलपना

Sadaneera 2
डायरी के ये अंश सन् 1997 से 2000 के बीच के हैं। तब तक आईडीबीआई छोड़कर यूटीआई में स्‍थाई तौर पर आ गया था। हालांकि यह स्‍थायित्‍व भी ज्‍यादा चला नहीं। इस समय में नौकरी और रोजमर्रा की जिंदगी के ढर्रे का तानपूरा लगातार छिड़ा हुआ है। बीच-बीच में लिख न पाने की टूटी-फूटी तानें हैं। अल्‍पज्ञ रह जाने का शोक है। कट्टरवाद की एक ठंडी लपट है और रत्‍ती भर वर्तमान में से अतीत में झांकना है। पता नहीं इन प्रविष्टियों के लिखे जाने, छपने और पढ़े जाने का कोई मतलब भी है या नहीं। डायरी के ये टुकड़े हिंदी साहित्‍य की नवीन नागरिक कविता-पत्रिका सदानीरा के दूसरे अंक में हाल में छपे हैं।

कविता की हूक
11/12/97
पहल के नए अंक के साथ एक पुस्तिका आई है- मंगलेश डबराल से ललित कार्तिकेय की बातचीत। बहुत से पहलुओं को उन्होंने छुआ है। कविता लिखने को लेकर उन्होंने कहा है कि हर बार नई कविता लिखते समय लगता है जैसे कविता लिखना भूल गए हैं। नए सिरे से लिखना शुरू करना होता है।

यह बात लगा, मेरी ही बात है। अर्से से मेरे साथ भी यही होता है। ऐसा लगता है जैसे कविता लिखनी आती ही नहीं। जब लिख लो तो वह भाती नहीं। कविता लिखने का वैसा उद्रेक नहीं होता। संवेदना ही जैसे सोई रहती है। बहुत बड़ी बड़ी चट्टानें जैसे राह में पड़ी रहती हैं। अपनी कविता के प्रति निर्ममता और भी भटकाती है। वर्तमान कविता की बाढ़ को देखकर निर्ममता ज़रूरी लगती है। लेकिन यह निर्मतता किसी बच्चे की निश्च्छलता को बरज देने जैसा कहर भी ढा देती है। जैसे अरू और सुमनिका (बेटी और पत्‍नी) को ज़रा ज़ोर से बोल दूं तो दोनों ढुलमुल हो जाती हैं। उनका उत्साह मर जाता है। अपनी कविता पर कड़ाई बरतने से भी ऐसा ही होता है। शायरों और कवि सम्मेलनी कवियों जैसी आत्म-मुग्धता की प्रतिक्रिया स्‍वरूप ही तो कहीं ऐसा नहीं होता है? ऐसा नहीं लगता। वह तो रास्ता ही अलग है। यह मौजूदा कविता के रंग-ढंग से बचने का मकैनिज्‍म है। जो वाज़ दफा क्‍या, अक्‍सर ही सिट्टी-पिट्टी गुम कर देता है। तीन कविताएं लिख रखी हैं। संतुष्ट नहीं करतीं। वे पूर्ण नहीं होतीं। नई बनती नहीं। यूं भी गति बेहद कम है। कविता लेखन के लिए अक्सर लगता है कि आदमी में आत्‍मरति होनी चाहिए। इसका ज़रा सुधरा हुआ रूप होगा अपने ऊपर भरोसा। अपने देखे, सोचे, महसूस किए पर विश्वास। अपनी बात की कीमत।

थोडी़ देर पहले अरू किताबों से खेल रही थी। क्लास के दृश्य की कल्पना कर, खुद अध्यापिका बन, सबको पुस्‍तकें बांट रही थी। उसमें मेरी एक पुरानी डायरी भी थी। वह डायरी मैंने उठायी। पलटी। उसमें शुरुआती दौर की हिंदी और पहाडी़ कविताएं हैं। एक कविता पढी़। पहाडी़ में। तुक में। पहाडी़ (भाषा) में बोली की लोच है। लावण्‍य भी। सुमनिका को अर्धनिद्रा में सुनाई। पढ़ कर मज़ा आया। संयोग यह भी था कि वह ठीक 22 वर्ष पहले की थी, सन् 1975 की। दिसंबर महीने की 12 तारीख की और आज 11 दिसंबर है। यह कविता 1977 में हिमभारती में छपी भी थी। कविता के नीचे यह भी दर्ज कर रखा है। पढ़ कर लगा, उस वक्त क़े हिसाब से, बी. ए. के दूसरे साल में बुरा प्रयास नहीं था। शायद यही कारण था कि रूह में थोडी़ फुरफुरी हुई। नीचे उतर कर पान-चर्वण कर आया। आ कर डायरी लिखने बैठ गया। मित्र कवियों की कविताएं पढ़ने तक सीमित हो चुके समय में इस तरह अपनी पुरानी कविता पढ़ कर जाग उठना उत्साहवर्धक है। नौकरी के बेतुकेपन के बीच यह जागृति ज़रा देर ठहर जाए! जैसे आजकल सुबह-शाम ज़रा सी तुर्शी, ज़रा सी ठंडी हवा, मन में नॉस्टेलिज्या भर रही है, कविता ने उस नॉस्टलिज्या को थोडा़ और सघन कर दिया है। मन करता है, रात भर जागे रहा जाए। बैठ कर मन के उच्छवास को उचारा जाए। पर दिनचर्या का भूत कड़ियल मास्‍टरनी की तरह कमरे में टहल रहा है। जो कहता है, बस करो। सो जाओ। वरना सुबह दफ्तर देर से पहुंचोगे। ओ कविता की हूक, तू फिर से दिल में समा जा। छुट्टी वाली रात को हाहाकार बन निकलना।

Saturday, October 12, 2013

परंपरा का बुजका

Pagdandi
पिछले दिनों हमारे एक चचेरे भाई का फोन आया कि वे मुंबई पहुंच गए हैं, कई दिन के सफर के कारण बच्‍चे बडे़ सभी बीमार पड़ गए हैं और रात को ही लौट भी जाना है, इसलिए घर नहीं आ पाएंगे। चाची जी के लिए कुछ सामान लाए थे, यहीं छोड़ रहे हैं, तुम आ कर ले जाना। सुबह का वक्‍त था। मैंने तैयार होते-होते ही फोन सुना था। यह भी बोल नहीं पाया कि कोई बात नहीं, मैं ही आता हूं मिलने। या शाम को प्‍लेटफार्म पर विदा करने आउंगा। दफ्तर से छुट्टी लेना नामुमकिन था। शाम को जाना भी बस में नहीं था। अच्‍छा अपना ख्‍याल रखिए, इतना भर कह पाया।
करीब दो महीने पहले से पता था वे आने वाले हैं और हिमाचल मित्र मंडल के गेस्‍ट हाउस में ठहरेंगे। भाई रिटायर हो गए हैं और हर साल पर्यटन पर निकलते हैं। पिछले साल भी आए थे तब नासिक में टिके थे। चाची को मत्‍था टेकने के वास्‍ते मुंबई का फेरा लगा के लौट गए। समझदारी यह की थी कि इतवार का दिन चुना था या क्‍या पता संयोग रहा हो।
इस बार संयोग नहीं बना। हफ्ते के बीच का दिन पड़ गया। एक ही शहर में होने के बावजूद मेरे और उनके बीच कई घंटों की दूरी थी। इस दूरी को इतवार के दिन ही पाटा जा सकता था। पर इतवार तक वे वापस हमीरपुर पहुंच चुके थे। इतवार के ही दिन मैं उनके रखे सामान को लेने हिमाचल मित्र मंडल पहुंचा। मंडल में और कुछ हो न हो, भाषा सुख खूब मिलता है। वहां आने वाले तकरीबन लोग अपनी बोली में बतियाते हैं। मुंबई में रहते हुए घर में मैं बीजी (मां) के साथ पहाडी़ बोलता हूं। फोन पर हिमाचल में बडे़ भाई से, यहां हिमाचल मित्र के संपादक कुशल से। पांच साल हमने यह पत्रिका निकाली और खूब भाषा सुख लूटा। हिमाचल मित्र मंडल में बाकी माहौल तो मुंबइया ही है, सिर्फ कानों को लगता है आप हिमाचल में हैं। और वहां पहुंच कर मन हलका हो जाता है।
भाई जिस थैले को उठाए-उठाए पूरा दक्षिण घूम आए थे, वह मेरा इंतजार कर रहा था। उसे उठा कर चलने लगा तो कई तरह के ख्‍याल मन में आए। मैंने थैले को नहीं, परंपरा को हाथ में उठाया है। यह परंपरा मुझे ले कर चल रही है या परंपरा को मैं चला रहा हूं। या जो परंपरा चली आती है, मैं उसका हरकारा हूं। तो क्‍या मैं परंपरा का बोझा उठा कर चल रहा हूं ? क्‍या यह सच में ही बोझ बन गई है।
बरसात का मौसम था। एक हाथ में छाता, एक में थैला लिए मैं चल निकला। आटो से विद्याविहार स्‍टेशन आया, वहां से लोकल ट्रेन पकड़ कर दादर। वहां से दूसरी ट्रेन लेकर गोरेगांव। वहां से फिर आटो। तब पहुंचा अपने घर। मतलब चार पडा़व के बाद आया घर। थैले को अपने सामने पाकर अस्‍सी वर्षीया बीजी इस तरह सजग हो गईं मानो डेढ़ हजार मील दूर से उनका कोई अपना उनके रू-ब-रू आ बैठा हो। सामान भरे थैले ने उनके तार जोड़ दिए और वे अपने लोगों से जुड़ गईं। वे सामान भेजने मंगवाने की परंपरा को आज भी नि:संकोच अमल में लाती हैं। वे इस तरह नहीं सोचतीं कि इससे दूसरे को असुविधा भी हो सकती है। खैर, सामान में क्‍या निकला – वड़ियां शायद घर की बनी हुईं, मक्‍की का आटा, चुख माने गलगल (बड़े नींबू) की काढ़ी हुई खटाई और उनके लिए सलवार कमीज का कपड़ा। सामान के उपयोग की उनकी योजनाएं शुरू हो गईं। मेरा आकलन यह था कि वड़ियां यहां मिल जाती हैं, मक्‍की का आटा ताजा पिस जाता है। यह सूट बीजी पहनेंगी नहीं। सिर्फ चुख ही नायाब चीज है। पर खटाई खाने से वैसे भी परहेज करने का दबाव बना रहता है क्‍योंकि‍ उनके घुटने जवाब दे चुके हैं।
तो फिर बाबू किस्‍म का एक भाई हजार किलोमीटर तक इसे ढोता रहा। यहां बाबू किस्‍म का दूसरा भाई महानगर की सड़कों पटड़ि‍यों को लांघ कर घर तक लाया। बिना भावुक हुए सोचने की बात है कि पहाड़ के इस बुजके (बोझ) को लादे रखा जाए या छोड़ दि‍या जाए। आज टेलिफोन क्रांति चरम पर है। बीजी भी अपने सगे संबंधियों की सुबह शाम की खबर नियमित रूप से रखे रहती हैं। थोड़े बहुत हेर-फेर के साथ हमारे घर पर खाना भी तकरीबन उन्‍हीं के स्‍कूल का बनता है। रसना के दोनों सुख हमें मिल जाते हैं। मैं और बीजी पहाडी़ में बतियाते हैं और दाल भात खाते हैं। सिर्फ रहने की जगह फर्क है। छोटी जगहों के घरों में बरामदा आंगन होता है, यहां माचिस की डिबिया जैसे फ्लैट हैं।
आज चालीस पहले जैसा वक्‍त नहीं है। तब वहां पर सौ किलोमीटर दूर अपने ननिहाल भी बाकायदा प्रोग्राम बनाकर जाना पड़ता था। आज लोग सुबह जाकर शाम को लौट आते हैं। आवागमन तेज और आसान हुआ है। यह अगल बात है कि‍ जाने की फुर्सत कम मिलती है। संपर्क रहता है, पर आना जाना उतना नहीं होता। सोयशलाइजिंग कम हो गई है। उसकी जगह आभासी सामाजिकता अमर बेल की तरह फैल रही है। कुल मिलाकर अलग-अलग इलाकों में रहन-सहन, खान-पान में ज्‍यादा अंतर नहीं रहा। शहर भी ग्‍लोबल, गांव भी ग्‍लोबल। इसलिए अब इस बोझे में से कुछ सामान हटा देना ठीक नहीं रहेगा ? सारे के सारे अतीत को बुहार देने की जरूरत नहीं है पर थोड़ी बहुत छंटाई बीनाई तो हमें करते रहना चाहिए। जैसे थैले के बारे में ही सोचो, कपडे़ की जगह सिंथैटिक ने ले ली है। झोले की जगह पिट्ठू ने ले ली है। उसे पिट्ठू कहते भी नहीं, बैकसैक या बैगपैक कहते हैं क्‍योंकि पिट्ठू बड़े आकार का होता था और लंबी, खासकर पैदल यात्राओं में काम आता था। अब तो बैक सैक को बच्‍चे बूढे़ सब अपनी पीठ पर गांठ के चलते हैं। अगर सामान ढोने वाला बदल रहा है, सामान ढोने का साधन बदल रहा है तो उसके अंदर के सामान को भी बदलना चाहिए।
दुनिया मेरे आगे, जनसत्‍ता

Sunday, July 14, 2013

आज की कविता : राजनीति का सन्दर्भ

 
 चित्रकृति: संजय राउत

समकालीन कविता पर जय प्रकाश का यह लेख 
कविता की अंतर्धारा को समझने में मदद करता है, वागर्थ के अप्रैल अंक से साभार

बीसवीं सदी के अन्तिम दशकों में जो अभूतपूर्व साभ्यतिक परिवर्तन हुए, उनके चलते मानवीय संवेदना के क्षरण की प्रक्रिया में भी तीव्रता आई। सोवियत संघ का विघटन, शीतयुद्ध की समाप्ति और एकध्रुवीय विश्व के नव-अधिनायकवाद की स्थापना, वित्तीय पूँजी की एकछत्र और निर्बाध प्रभुता, आर्थिक क्षेत्र में ढाँचागत सुधार की अनिवार्यता के चलते उदारीकरण और निजीकरण के नये मॉडल को अपनाने की विवशता, पूँजी और संस्कृति का वैश्वीकरण, संचार तकनीकी के क्षेत्र में अपूर्व क्रान्ति, विश्व-बाज़ार और अर्थव्यवस्था के एकीकरण की विवशता - ये तमाम प्रक्रियाएँ इन्हीं दशक में समूची दुनिया में सामाजिक विकास के बुनियादी ढाँचे को प्रभावित करने की स्थिति में आईं। संचार क्रान्ति ने ग्लोबल गाँव बनाया और वित्तीय पूँजी ने नई आर्थिक प्रणाली के ज़रिये उसे बाज़ार में बदल दिया। राष्ट्र-राज्य की ज्ञानोदयी अवधारणा ध्वस्त हो गयी। विश्व-बाज़ार ने स्थानिक और वैश्विक से फ़र्क को मिटा दिया। राजसत्ता अब सीमान्त में चली गयी और उससे जुड़ी 'लोककल्याणकारी राज्य' की अवधारणा भी अप्रासंगिक करार दी गयी। पूँजी की चाकरी करने पर अब राजसत्ता भी विवश थी। इस तरह बीसवीं सदी में अन्तिम दशकों को विश्व-इतिहास में पूँजी के असंदिग्ध वैश्विक वर्चस्व की शुरुआत के समय के रूप में याद किया जायेगा।
इस दौर का सबसे महत्त्वपूर्ण राजनैतिक बदलाव था, शीतयुद्ध की समाप्ति। इस बदलाव का असर हिन्दी कविता की राजनैतिक संवेदना पर भी दिखाई देता है। अस्सी के दशक में 'राजनैतिक वक्तव्य'1 में ढल जाने की, स्वघोषित अनिवार्यता से पिण्ड छुड़ाकर अपने परिवेश और आसपास की दुनिया को कविता का विषय बनाया गया, तो प्रकट रूप में अराजनैतिक दिखने की कोशिश के बावजूद कवि-कर्म का एक अप्रकट राजनैतिक परिप्रेक्ष्य अवश्य था। यह पूँजीवादी शिविर के विरोध के रूप में नहीं, किन्तु समाजवादी विचार के समर्थन के रूप में प्रत्यक्ष होता था। अनेक कवि समाजवादी दर्शन से प्रेरित हुए थे और उनकी कविताओं का आशावादी स्वर कमोबेश समाजवादी यूटोपिया का ठीक उसी तरह आह्वान करता था, जैसे कि शीतयुद्ध के शुरू-शुरू के दौर में मुक्तिबोध ने किया था-'संकल्पधर्मा चेतना का रक्त-प्लावित स्वर/हमारे ही हृदय का गुप्त स्वर्णाक्षर/प्रकट हो कर विकट हो जायेगा।'2 उदाहरण के लिए उस दौर में नव्य-रूपवादी कहे गये कवि विनोदकुमार शुक्ल भी लाल झण्डे और लालबत्ती की प्रतीकात्मकता का प्रयोग कर रहे थे-'कहाँ गया लाल झंडा! लाल बत्ती !! गाड़ी रोकने को/आ क्यों नहीं जाता सामने सूर्योदय लाल सिग्नल-सा।'3 या सोमदत्त एक पेड़ की जिजीविषा को चित्रित करते हुए उम्मीद ज़ाहिर कर रहे थे कि - 'नेस्तनाबूद करके हर साज़िश/वह/पतझर को बदल देगा लहलहाते समुद्र में।'4 एक नई क़िस्म की प्रतीकवत्ता में अपने को खोलती हुई यह उम्मीद इतनी संक्रामक थी कि प्रतीकों का बोझ उतार कर केदारनाथ सिंह जैसे बिन-आग्रही कवि को खुलकर कहना पड़ रहा था - 'यह जानते हुए कि लिखने से कुछ नहीं होगा/ मैं लिखना चाहता हूँ।'5 उम्मीद की यह संक्रामकता, पूछा जा सकता है कि क्या किसी राजनैतिक दृष्टि के बिना सम्भव थी? सच पूछा जाये, तो यह आशावाद राजनीतिक संवेदना को काव्य-संवेदना की बुनावट में अभिन्न रूप से संयोजित कर लिये जाने के कवि-कौशल का परिणाम था। यह एक नयी युक्ति थी, जो राजनीति-मात्र का विरोध करने वाली विद्रोही कविता के बड़बोलेपन से बचकर चल रही थी, तो दूसरी ओर दक्षिणपंथी या साम्राज्यवादी राजनीति की खुली मुख़ालिफ़त करने वाली वाम-कविता की अतिशय वाचालता6
से भी अपने को मुक्त रखने के लिए प्रयासरत थी। सामाजिक अन्तर्विरोध को राजनीति की भाषा में व्यक्त करने के बजाय वह राजनीति को सामाजिक अन्तर्विरोध की दृश्यावली के माध्यम से व्यक्त कर रही थी। ऐसे में उम्मीद ही वह मुहावरा हो सकती थी, जो उन अन्तर्विरोधों को सुलझा सके। कहने की आवश्यकता नहीं कि उम्मीद के प्रीतिकर मुहावरे से तब समूची वाम-राजनीति और उसके सारे तत्कालीन संस्करण संचालित हो रहे थे। यह विश्वास राजनीति से ही कविता में आयातित हुआ था कि क्रान्ति अब होने ही वाली है। उस दौर के काव्यात्मक आशावाद का यह राजनैतिक परिप्रेक्ष्य है, जिससे ऊर्जा ग्रहण कर कविता ने विद्रोह की निस्संग मुद्रा त्याग कर जनसंघर्षों से सम्बध्दता का साहस जुटाया था। यह अकारण नहीं कि पक्षधरता का नैतिक विवेक इस कविता का बुनियादी चारित्रिक लक्षण है। उसका बहुत बड़ा हिस्सा ऐसा भी था, जो जनसंघर्षों से सीधे-सीधे प्रेरित नहीं था, लेकिन घर-परिवार, आत्मीय सम्बन्धों और लोकजीवन की स्मृतियों को काव्य-विषय बनाते हुए वह काव्यात्मक आशावाद के भीतर ही अपने को सँजो रहा था। यह राजनीतिक पक्षधरता का अपेक्षाकृत वृहत् संस्करण, एक क़िस्म की मानवीय पक्षधरता थी। राजनीति के अमानवीयकरण के विरुध्द यह भी प्रतिवाद की एक विधि थी, किन्तु इस कविता की राजनीति इसकी सतह पर उतराती नहीं दिख रही थी, इसलिए रेडिकल वामपंथियों ने इसे मध्यवर्गीय, ग़ैर-राजनीतिक और बुनियादी राजनैतिक परिवर्तनों से दूर करार दिया।7 यह एक अतिवादी दृष्टिकोण है, जो कविता की मानवीय पक्षधरता को नज़रअन्दाज़ कर इस तथ्य को भी भूल जाता है कि कविता ने यह अराजनीतिक मालूम पड़ती भंगिमा अकारण ही नहीं, बल्कि वाचाल राजनीति का उपग्रह बनने से इन्कार करते हुए अपनायी है।
शीतयुध्द की समाप्ति और सोवियत शिविर के अवसान के बाद बौध्दिक हलक़ों में किर्ंकत्तव्यमूढ़ता और असमंजस का जो वातावरण निर्मित हुआ था, वह जल्द ही ख़त्म हो गया। खाड़ी युध्द के बाद विश्व के प्राकृतिक संसाधनों पर एकाधिकार करने के अमरीकी इरादे खुलने लगे। विश्व व्यापार संगठन की शर्तें मानने के लिए बनाये जा रहे दबावों ने इसे पुष्ट किया। साथ ही 'परमाणु अप्रसार संधि' और उसके बाद 'समग्र परमाणु प्रसार निषेध संधि' के द्वारा साम्राज्यवाद के निरापद और चुनौतीविहीन हो रहने की चतुर रणनीति भी पहचानी जाने लगी। एकाधिपत्य की इस राजनीति के विरुध्द साम्राज्यवादी ताक़तों की अनुपस्थिति के चलते जो असहायता और विवशता की स्थितियाँ निर्मित हुईं, दरअसल, वे ही आगे की प्रतिवादी राजनीति का परिप्रेक्ष्य बनीं। ग़ौर से देखें, तो दो शताब्दियों के संधि-काल में राजनीतिक-आर्थिक शक्तियों की विकरालता के आगे मानव-जाति ही बौनी दिखाई देती है। इस सच्चाई को पहचानने की कोशिश शायद इस दौर की कविता ही बेहतर ढंग से कर सकी है, यद्यपि इस कोशिश में उसने अपने समय की रिपोर्ताज़ में अपघटित होने का जोख़िम भी उठाया है। इस कविता में राजनैतिक समय को स्वायत्त करने के प्रयत्न में जो प्रमुख अभिलक्षण विकसित हुए हैं, उन पर भी ग़ौर किया जाना चाहिए-
एक- पिछले दौर की कविता का प्रमुख राजनीतिक एजेण्डा साम्राज्यवाद-विरोध था। उस दौर में साम्राज्यवाद का चेहरा पहचाना जा सकता था, इसलिए उससे मुक्ति के प्रयत्नों की काव्यात्मक चरितार्थता को कुछ सरलीकृत सूत्रों में ढाल लेने में कठिनाई न थी। मदन कश्यप की एक कविता 'भेड़िया' 8 इस स्थिति का ही खुलासा करती है। इसमें समकालीन जीवन में मनुष्यता के ऊपर मँडराते संकट को भेड़िये के प्रतीक में संकेतित किया गया है। उसका पंजा बेटे के कोमल चेहरे की ओर बढ़ता दिखाई देता है, पत्नी के साथ एकान्त में परदे के पीछे छिपा बैठा है, बेटियों के पीछे-पीछे स्कूल की तरफ़ जाता हुआ लगता है। वह एक अजानी आशंका में बदल जाता है, जिसका सामना प्रत्यक्ष रूप से नहीं होता, किन्तु उसके होने के बारे में सन्देह नहीं है। सहसा काव्यनायक के सपने में कवि सर्वेश्वर आते हैं- 'कहते हैं/भेड़िया है/तुम मशाल जलाओ।' फिर नाटककार भुवनेश्वर आते हैं- 'कहते हैं/तुम गोली चलाओ।' सपने में बेचैन काव्यनायक मुस्तैद है, लेकिन मुश्किल यह है कि 'कहीं दिखे तो भेड़िया।' आशंका और खीझ में अन्तत: वह कहता है-
सच, कितनी सहज और समर्थ थी पिछले दिनों की कविता जो भेड़ियों को देख रही थी और भेड़ियों से लड़ रही थी।
यह पिछली कविता पर अचूक आलोचनात्मक टिप्पणी है। साथ ही बदले हुए समय और उसके यथार्थ के समक्ष आज के कवि की विवशता को भी यह साफ़ इंगित करती है। यहाँ भेड़िये की प्रतीकार्थता का खुलासा करने की ज़रूरत नहीं है। साम्राज्यवाद अब भी है, लेकिन उसने ऐसी माया खड़ी कर ली है कि उसे पहचानना कठिन होता जा रहा है, जबकि उसका हस्तक्षेप समाज और व्यक्ति के अन्तरंग संसार तक पहुँचा जा रहा है। तात्पर्य यह कि सत्ता और यथार्थ का चरित्र भ्रामक है, जिसका सामना करने के लिए कविता विवश है। इसकी राजनीति यदि साम्राज्यवाद-विरोध की राजनीति है, तो कहना होगा कि वह अपना राजनैतिक परिप्रेक्ष्य यथार्थ की जटिलता को सुलझाने की प्रक्रिया में अर्जित करती है। वह राजनैतिक विचार को न तो कविता के आलंकारिक उपकरण की तरह इस्तेमाल करती है, न ही उसे कविता पर आरोपित करती है। इसलिए उसमें राजनैतिक शब्दावली का सर्वथा अभाव दिखता है। यूँ भी 'किसी कविता के राजनैतिक होने की शर्त, उस कविता में राजनैतिक शब्दावली होना हर्गिज नहीं है।' 9 कहने की ज़रूरत नहीं कि साम्राज्यवाद से मुक्ति का राजनैतिक एजेण्डा कविता की सतह पर चमकता दिखाई नहीं देता, लेकिन अनेक कवि इधर यदि उन जीवन-प्रक्रियाओं की पहचान के लिए प्रयत्नशील दिखाई देते हैं, जो साम्राज्यवाद के नये रूप में उभार के बाद से प्रारम्भ हुई हैं, तो कहना होगा कि यह अ-राजनैतिक कविता का लक्षण क़तई नहीं है।
दो- राजनैतिक आशय को, यथार्थ के अधिग्रहण की प्रक्रिया में अर्जित करने की विवशता के कारण अथवा यथार्थ के अभेद्य और लगभग जादुई या मायावी होते जाने के कारण अथवा उसकी विकराल आततायी उपस्थिति के चलते, या फिर सोवियत संघ के पतन के बाद के वैचारिक असमंजस के माहौल की वजह से नवें दशक के बाद कविता में पक्षधरात और विचारधारात्मक प्रतिबध्दता को लेकर उदासीनता नहीं तो एक क़िस्म के अनाग्रह की स्थिति निर्मित हुई है। शायद इस स्थिति को ही लक्ष्य कर कवि राजेश जोशी ने कहा है कि -'हमारे समय में व्यवस्था-विरोध का स्वर कुछ अधिक बौध्दिक है, लेकिन वह पक्ष लेने से कतराता है और ग़ुस्सा होने से परहेज़ करता है। कभी-कभी तो यह भी लगता है कि व्यवस्था-विरोध खुद व्यवस्था को भी सूटेबल लगता है।' 10 आलोचक नंदकिशोर नवल को भी लगता है कि- 'इधर की कविता में विचारधारा का आग्रह कम हुआ है।' 11 यह सच्चाई है कि प्रतिबद्धता और विचारधारात्मक आग्रह में कमी की वज़ह से ही कविता को 'अराजनीतिक भंगिमा' मिली, किन्तु इससे यह सुविधा भी मिली कि सामाजिक यथार्थ के विवरणों के बहाव में प्रतिवाद की राजनीति को विसर्जित किया जा सके। नवें दशक के बाद ही कविता में यह बदलाव आया है कि अमानवीयकरण के स्रोतों की तलाश में कवि समाज के मूल ढाँचे के भीतर दूर तक पैठ सका है, जबकि पिछली कविता में वह मानवीय रागात्मकता के स्रोतों की खोज में समाज की भीतरी गहराइयों तक जाने का आभास भर देता था (यद्यपि परिवार, प्रकृति और परम्पराओं के आत्मीय संसार को ही कुल समाज मानने का आग्रह उसके इस प्रयत्न की अर्थवत्ता को संदिग्ध बना देता था और कविता एक सुखद अहसास बनकर रह जाती थी)। दो शताब्दियों के संधिकाल के आसपास अगर कविता में विवरणधर्मिता विकसित हो सकी है, तो इसके लिए स्वयं यथार्थ की ख़ास रणनीति भी उत्तरदायी है, जो प्रतिरोध को प्रभावहीन बनाने के लिए नाना रूप धरती है। नतीजा यह है कि कविता पक्षधरता और वैचारिकता के चश्मे को उतार कर मायावी यथार्थ के पीछे भागती है और जैसे-तैसे उसकी छवियों को टुकड़ों-टुकड़ों में बटोरती है।
ऐसा करना शायद सुविधाजनक भी है, क्योंकि प्रतिबध्दता और पक्षधरता के अपने जोखिम हैं। जोखिम उठाये बिना कविता अगर प्रतिरोध का परचम उठाये रख सकती है, तो इससे निरापद स्थिति और क्या हो सकती है। शायद इसीलिए राजेश जोशी कहते हैं कि ऐसी कविता व्यवस्था को भी 'सूटेबल' लगती है। उन्हें, यह स्थिति और भी ख़तरनाक लगती है। वे मानते हैं कि बावन या छप्पन में मार्क्सवाद से मोहभंग की स्थिति उत्तर-सोवियत उदासीनता से बेहतर थी, क्योंकि 'मोहभंग की स्थिति में लोग आमने-सामने थे। वहाँ टकराव और बहसें थीं; जबकि यहाँ कतराने, चुप लगा जाने और टरकाने की चतुराई है।' 12 बौद्धिक जीवन में फैली यह चालाकी कमोबेश काव्य-विमर्श में भी देखी जा सकती है। यथार्थ को विवरणों में फैला देना भी शायद कवियों की ऐसी ही चतुर रणनीति हो।
पक्षधरता और प्रतिबद्धता के प्रश्न पर कुछ और गहराई से विचार करें, तो यह तथ्य भी ध्यान खींचता है कि हिन्दी क्षेत्र में एक ओर जहाँ उदारीकरण की नीतियों के चलते किसान-मज़दूरों के आन्दोलन कमज़ोर हुए है (जबकि इस दौर में उन्हें अधिक संगठित और जुझारू होने की ज़रूरत है) वहीं जन-समस्याओं के प्रति जागरूकता भी कम हुई है (जनता को जागरूक करने की ज़िम्मेदारी अब मानों सिर्फ़ स्वयंसेवी संगठनों, एन.जी.ओ. ने ले रखी है)। इसका सीधा नतीजा यह है कि कविता के लिए प्रतिबध्दता और पक्षधरता का वह 'स्पेस' खाली हो गया है, जहाँ से उसकी प्रतिवाद-धर्मिता को नैतिक समर्थन प्राप्त हो सकता था। यह स्पेस एक हद तक पाठकों के अभाव की भी भरपाई करता था- क्योंकि आस्वादकों-आशंसकों द्वारा पर्याप्त प्रशंसा (अप्रीसिएशन) न मिल सकने पर भी कविता जन-आन्दोलनों की उपस्थिति-मात्र से अपने वैचारिक आग्रहों की सामाजिक चरितार्थता को प्रमाणित कर सकती थी। जन-आन्दोलनों की क्षीणता ने उसके नैतिक पक्ष को कमज़ोर बना दिया है और वह कुल मिलाकर निपट मध्यवर्गीय कार्यकलाप बन गयी है।
तीन- रचनाकार की वर्गीय स्थिति को मुक्तिबोध ने साहित्य के केन्द्रीय प्रश्न और साहित्य-बोध के निर्धारक तत्त्व के रूप में प्रतिष्ठित किया था। 1980 के बाद के नव-प्रगतिवादी दौर में भी वर्गापसरण की समस्या पर बहसें होती थीं। कविता से भी उसका साक्ष्य देने की अपेक्षा की जाती थी, किन्तु उत्तर-सोवियत दौर में यह प्रश्न भी नेपथ्य में चला गया।
दरअसल, नव-प्रगतिवाद के दौर में घर-परिवार, प्रकृति और जातीय परम्पराओं के स्वकेन्द्रित वृत्त में जो काव्य-बोध फल-फूल रहा था, वह पिछली सदी के अन्तिम दशक में पहुँचकर लोकराग की कविता में अपने को संयोजित कर एक आकार ले चुका था। इस कविता में वर्ग-बोध ने किस तरह से लोक संवेदना में अपने को ढाल लिया, यह पता ही न चला। यहाँ वर्गीय चेतना अनुपस्थित नहीं थी तो अत्यन्त क्षीण हो चली थी। उसकी जगह लोक चेतना विराजमान थी।
लोकराग की यह कविता अ-राजनीतिक कविता नहीं थी, लेकिन वह राजनीति के उत्कट सन्दर्भों को तरल कर अन्तर्विलीन कर लेती थी। लोक संवेदना में राजनीतिक सन्दर्भों का यह अन्तर्विलय इस कविता के ऐन्द्रिक, सौन्दर्यात्मक और स्मृतिमूल्य चरित्र के अनुकूल था। केदारनाथ सिंह, विनोदकुमार शुक्ल, विजेन्द्र, ज्ञानेन्द्रपति, अरुण कमल, एकान्त श्रीवास्तव, स्वप्निल श्रीवास्तव, बद्रीनारायण, निलय उपाध्याय आदि अनेक कवियों का लोकराग निस्संदेह राजनीतिक संवेदना को आत्मसात् किये हुए है, मगर उसकी निर्मिति राजनैतिक चेतना के विकल्प की तरह जान पड़ती है। बद्रीनारायण ने तो स्वीकार भी किया है कि- 'लोक शब्दों का जो आगमन हुआ हमारी कविताओं में, उसका सामाजिक कारण है। जब कोई राजनैतिक आन्दोलन नहीं हमारी शक्ति बने।' 13 ज़ाहिर है, लोक को यहाँ एक सहज विकल्प की तरह देखने का आग्रह है। कवियों से कोई अवाँगार्द क़िस्म का लेखन करने की माँग नहीं की जा रही थी, लेकिन लोक को सौन्दर्यात्मक उपकरण की तरह इस्तेमाल करने से वह वर्गीय चेतना के स्थानापन्न-सरीखा मालूम पड़ने लगा।
लोकराग से इतर नागर भावबोध की जो कविता पिछली सदी के अन्तिम दौर में बड़े पैमाने पर लिखी गयी, उसमें वर्गीय चेतना की जगह स्पष्टत: एक नागरिक संवेदना सक्रिय दीखती है। यह बहुत मुखर ही नहीं, बल्कि प्रतिरोध की एक अविचलित मुद्रा और प्रशान्त गम्भीरता के साथ सामाजिक वंचना, दैत्याकार उपभोगवाद, सांस्कृतिक प्रदूषण, पर्यावरण और सभ्यता के संकट आदि का इस तरह से भाष्य लिखती है, गोया समाज के नाटकीय कार्यकलाप की अविरल रिपोर्टिंग की जा रही हो। उसमें संलग्नता-सम्बध्दता के बजाये कुछ-कुछ तटस्थता का भाव होता है। उसमें विवरणों की बहुलता और उनकी लगभग वैसी ही अविकल प्रस्तुति होती है जैसी कि पत्रकारिता में। इधर के सामाजिक जीवन में जिस पैमाने पर नागरिक उदासीनता और उसके चलते जीवन-विडम्बनाओं को सूचना के स्तर पर लेने की प्रवृत्ति बढ़ी है, उसे देखते हुए यह अस्वाभाविक भी नहीं मालूम पड़ता कि कविता और ख़बर का फ़र्क़ मिट जाये। इन विवरणों में निश्चय ही प्रतिवादधर्मिता मौजूद होती है, लेकिन पक्षधरता और वर्ग-चेतना की अनुपस्थिति में इस तरह के प्रतिवाद की राजनीति प्राय: आत्मलक्षी, स्वायत्त और आलंकारिक हो उठती है। यह परिप्रेक्ष्यविहीन प्रतिवाद है। इनकी मौजूदगी को सहनीय बनाकर व्यवस्था अपनी उदार लोकतांत्रिक छवि अर्जित करने की कोशिश करती है।
चार- भारतीय समाज में आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू होने के साथ-साथ संयोगवश साम्प्रदायिक राजनीति में भी उभार शुरू हुआ। कुछ ही समय में साम्प्रदायिक शक्तियाँ सत्ता पर क़ाबिज़ भी हो गई। फलत: समाज के साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की प्रक्रिया सत्ता का समर्थन प्राप्त कर तीव्र हुई, उसकी परिणति अन्तत: सत्ता के पूर्ण फासीकरण के प्रथम प्रयोग में हुई, जो गुजरात में फरवरी-मार्च, 2002 के भयानक नरसंहार का कारण बना।
हिन्दी कविता स्वभावत: साम्प्रदायिक राजनीति के विरोध में मुखर हुई। यूँ तो इस विषय पर पूर्ववर्ती दशकों में भी कवियों का ध्यान गया था और लगातार सम्प्रदायवाद का काव्य-प्रतिवाद सक्रिय था, लेकिन गुजरात की नरहिंसा ने जब साम्प्रदायिकता के फासीवादी चेहरे को बेनक़ाब कर दिया, तो काव्य-जगत् में इसकी त्वरित प्रतिक्रिया हुई। सन् 2002 की शायद ही कोई हिन्दी पत्रिका हो, जिसमें साम्प्रदायिक फासीवाद का प्रतिवाद न किया हो। सैकड़ों कविताएँ इन पत्रिकाओं में छपीं। कुछ पत्रिकाओं ने साम्प्रदायिकता-विरोधी कविताओं को संकलित भी किया। 14 आज यह स्पष्ट देखा जा सकता है कि 1992 में अयोध्याकाण्ड घटित होने के बाद से साम्प्रदायिक राजनीति की लगातार क़ामयाबी के चलते भारतीय समाज साम्प्रदायिक विखण्डन की मानसिकता के क़रीब पहुँच गया है। हिन्दी क्षेत्र में लड़ी जा रही इस कुत्सित लड़ाई की लपटें भले ही गुजरात में दिखाई दी हों, समूचा देश उससे कभी भी झुलस सकता है, यदि उसका सशक्त प्रतिरोध न किया जाए। गुजरात इतना भयावह था कि हिन्दी कविता ने उसके अनुभव के पकने के बाद काग़ज़ पर उतरने की प्रतीक्षा किये बगैर लगभग पत्रकारिता की-सी तात्कालिकता के साथ प्रतिक्रिया प्रकट की। यहाँ तक कि कवयित्री कात्यायनी की टिप्पणी थी कि- 'इस समय और इस मसले पर शिल्प और कला पर अतिरिक्त ध्यान देना अश्लील और घटिया बात लगती है।' 15 संजय चतुर्वेदी, देवीप्रसाद मिश्र, अष्टभुजा शुक्ल, संजय कुन्दन, चन्द्रभूषण, आर.चेतनक्रान्ति, सुन्दरचन्द ठाकुर आदि अनेक कवियों ने फासीवाद के इस नये रूपान्तर को कविता का विषय बनाया। कात्यायनी ने तो अपनी काव्यात्मक प्रतिक्रिया को विमर्श के आगे जाकर आन्दोलनधर्मीं भंगिमा प्रदान की-
गुजरात के बाद कविता संभव नहीं उसे संभव बनाना होगा कविता को संभव बनाने की यह कार्रवाई होगी कविता के प्रदेश से बाहर। 16
संजय चतुर्वेदी भी साम्प्रदायिकता को आत्मसीमित विमर्श और उसके बौध्दिक प्रतिवाद को अपर्याप्त बताते हुए लगभग कात्यायनी की-सी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं-
कविता के घोषित जनपद पर जनहित व्यभिचारी लोगों ने कोई राह नहीं अब छोड़ी जनता ने जनपद को छोड़ा और आज वह नए विकल्पों की तलाश में घूम रही है घूमी होगी कई बार पहले भी शायद इस हालत में जहाँ काव्य के स्त्रोत सभी कविता से बाहर पाए होंगे। 17
स्पष्टत: हिन्दी कविता साम्प्रदायिक फासीवाद का एक प्रतिवादी राजनीतिक विमर्श सम्भव करती है। कविता के प्रदेश से बाहर तक जाकर कविता सम्भव करने का यह विमर्श 'इतिहास के निर्णय की प्रतीक्षा किये बिना' 18 सक्रिय हस्तक्षेप का आह्वान करता है और आगाह करता है कि 'सुगम-सुरक्षित विरोध की कोई नपुंसक राह' ढूँढ़ते रहे, तो इतिहास का निर्णय आततायियों के पक्ष में होगा। ज़ाहिर है, फासीवाद की प्रतिवादी राजनीति की पड़ताल करते हुए इस तथ्य को अपरिहार्य सच्चाई मानकर चलना होगा कि फासीवाद महज राजनीति की बुनियाद पर टिका हुआ नहीं है, वह संस्कृति के आधार बनाता है। उसे अपने राजनैतिक विस्तार के लिए संस्कृति के इलाके से मुद्दे चुनने में महारत होती है। यक़ीनन 'संस्कृति वह रास्ता है, जिसके ज़रिये चौतरफ़ा नृशंसीकरण और क्रूरता को औचित्य प्रदान किया जा सकता है और लोकतांत्रिक आचार और व्यवहार की न्यूनतम शर्तों को अनदेखा किया जा सकता है। संस्कृति आज एक ख़तरे का इलाक़ा है। आज के हिन्दी कवि इसी डरावने और संवेदनशील क्षेत्र में रहते हैं और अपनी तरह से मौजूदा हालात की तकलीफ़देह शिनाख़्त करने को बाध्य हैं।' 19 समाज के 'डरावने' और 'संवेदनशील' क्षेत्र में रहकर कविता लिखने की बाध्यता और उसके तीव्र एहसास ने ही सम्भवत: उस नैतिक द्वन्द्व को उत्तेजित किया है, जिसके चलते 'कविता के प्रदेश से बारह' 20 कविता सम्भव करने का आग्रह जन्म लेता है या फिर कविता में लौट आने की 'व्यावहारिक बुध्दि' 21 को निन्दनीय बनाता है। साम्प्रदायिकता के मुद्दे पर कविता का यह आह्वानमूलक स्वर और उसकी आन्दोलनात्मक भंगिमा निस्संदेह एक नया प्रस्थान (शिफ्ट) है। कहना न होगा कि यह उस बेचैनी की वज़ह से भी है, जो बीसवीं और इक्कीसवीं सदी के संधिकाल में विखण्डनकारी शक्तियों के तीव्र उत्पात के कारण भारतीय बुध्दिजीवी की नागरिक संवेदना को झकझोर रही थी।
यह सहज ही देखा जा सकता है कि प्रतिबध्दता और वर्गीय पक्षधरता की क्षीणप्राय चेतना के बावजूद हिन्दी की समकालीन कविता साम्प्रदायिकता को लेकर अपने राजनैतिक दृष्टिकोण में बिल्कुल स्पष्ट और मुखर रही है। अपने मूलत: मध्यवर्गीय जीवन-बोध के बावजूद यह धर्मनिरपेक्ष शक्तियों की पक्षधर दिखाई देती है। वह एक निर्भीक और स्पष्ट प्रति-राजनीति विकसित कर मानवीय गरिमा के प्रश्न को उससे जोड़ती है और इस तरह कवि-कर्म की अर्थवत्ता अर्जित करती है।
इस विश्लेषण का अर्थ यह नहीं है कि समकालीन कविता वैचारिक और संवेदनात्मक रूप से कोई एकरूपात्मक (मोनोलिथिक) निकाय है। इसके उलट सच्चाई यह है कि समकालीन कवियों में एकाधिक वैचारिक निष्ठाओं की सक्रियता विद्यमान है। इनमें एक वर्ग उन कवियों का भी है, जो उन दिनों लिखी जा रही कविता के एक बहुत बड़े हिस्से को उसकी अतिशय सामाजिकता और यथार्थबध्दता के कारण निरस्त करते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि स्वयं इन कवियों के यहाँ एक प्रकट राजनीति-निरपेक्षता मौजूद है, जो वस्तुत: कविता की स्वायत्तता के अनेक आग्रह का प्रतिफलन है। वे 'आत्म' के परिप्रेक्ष्य में 'समाज' को देखने की चेष्टा करते हैं और इस चेष्टा में राजनीति उन्हें बहुत उपयोगी नहीं जान पड़ती; बल्कि आत्म के आच्छादन से समाज ओझल हो जाता है और कविता अपनी पवित्र स्वायत्तता में क़ैद। राजनीतिक उदासीनता का एक संस्करण उस लोकवादी कविता में भी मिलता है, जहाँ जीवन-जगत के प्रति अनुराग या आस्था का एक निर्द्वन्द्व संसार लोक के आन्तरिक संघर्ष से अछूता स्वायत्त लोक, साकार होता है।
आत्मवादी और लोकवादी, दोनों ही कविताओं की अराजनीतिक मुद्राएँ उनके सौन्दर्यवादी आग्रहों का परिणाम है। सौन्दर्यवाद का बुनियादी लक्षण यह है कि वह राजनीति और सामाजिक संघर्ष को कविता के स्वायत्त संसार में एक 'अन्तर्निषेध' (टैबू) की तरह देखता है।
इससे अलग, समकालीन कविता का बहुलांश, ख़ासतौर पर युवतर पीढ़ी का रचना-संसार अपनी स्वायत्तता और निपट स्वकीयता के आग्रह को त्याग कर कविता की सौन्दर्य-प्रक्रिया को सामाजिक विकास की समकालीन प्रक्रिया की संगति में सम्भव करने के प्रयत्न में आकार ग्रहण करता है। सामाजिक विकास के अन्तर्विरोधों के प्रति एक आलोचनात्मक रवैया विकसित करने की कोशिश में, स्वाभाविक है कि कविता राजनैतिक चेतना का भी इस्तेमाल करती है। सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों की अति नग्नता और उसके चलते चीज़ों का अति-प्रकटीकरण भी यह मोहलत नहीं देता कि परिदृश्य में लगातार हो रहे गुणात्मक बदलाव को अनदेखा कर दिया जाए। परिवेश से प्रतिकृत होना और अनिवार्यत: उसे एक राजनीतिक मुहावरे में व्यक्त करना, इस तरह से देखें तो कवि की विवशता भी है। यह अनायास नहीं है कि 'आज का समर्थ कवि दैनन्दिन जीवन में घटते बहुत साधारण-से प्रतीत होते प्रसंगों, घटनाओं और दृश्यों के प्रति असाधारण रूप से सजग हो गया है।' 22 इस सजगता का एक स्पष्ट राजनैतिक परिप्रेक्ष्य है, जिसकी वजह से कवि 'बहुत तात्कालिक सन्दर्भों को एक गतिशील इतिहास-बोध से और इतिहास की द्वन्द्वात्मक समझ को दैनन्दिन जीवन के सामान्य ब्यौरों में रूपायित करने में सफल हुआ है।' 23 इधर यह भी देखा गया है कि राजनीति ने क्रमश: समाज में निर्णायक केन्द्रीयता हासिल कर ली है और वह प्रभुत्व का सबसे प्रभावी उपकरण बन गया है। समूची समाजनीति अब राजनीति के इर्द-गिर्द घूमने लगी है। सामाजिक यथार्थ के समकालीन विन्यास में राजनीति की उपस्थिति लगभग सर्वव्यापी क़िस्म की है। इसलिए यथार्थ के किसी भी तरह के साक्षात्कार के प्रयत्नों के दौरान उससे बच निकलना मुमकिन नहीं रह गया। ऐसी स्थिति में आज की कविता अपने समाज-बोध के भीतर राजनीतिक संवेदना को उसका ऑर्गेनिक हिस्सा बनाकर अंगीकार करती है। यह राजनीतिक संवेदना स्पष्टत: राजसत्ता की ओर लक्ष्यीभूत विभिन्न राजनैतिक संगठनों की विचार-प्रणालियों में संगठिन न होकर व्यापक मानवीय पक्षधरता को चरितार्थ करती है। इसलिए वह राजनैतिक दलों का उपांग नहीं, उनकी वैचारिक दृष्टि को प्रश्नांकित करता नैतिक विवेक है। ऐसा न होता, तो प्रत्येक दल की विचारधारा के अनुरूप कविता के अलग-अलग राजनैतिक संस्करण होते। यह साफ़ देखा जा सकता है कि बीसवीं सदी के अन्तिम दशक में हिन्दुत्व की प्रभावी राजनैतिक उपस्थिति और सत्ता पर वर्चस्व के बावजूद उसका कोई काव्य-संस्करण विकसित नहीं हो सका, उल्टे हिन्दी कविता निरन्तर उसका प्रतिपक्ष बनकर खड़ी हुई है। हिन्दू अस्मिता के राजनीतिक दबाव को झटक देने में कविता यदि क़ामयाब हुई है, तो निस्संदेह इसलिए कि धर्म को अस्मिता की राजनीति का आधार बनाने की कोशिशों के विरोध की एक परम्परा बन चुकी है, भक्ति काव्य भी अन्तत: धर्म की राजनीति के निषेध के प्रयत्नों में विकसित हुआ है, इसलिए एक ओर वह साम्प्रदायिक सौहाद्र पर बल देता है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक श्रेणीक्रम में निचले पायदान पर पड़े दलित वंचित वर्ग की आकांक्षाओं को उसने स्वर दिया। यही उसकी राजनीति भी थी। इस अघोषित राजनीति के तहत ही कबीर ने पण्डितों-मौलवियों के पाखण्ड पर प्रहार किया तथा वंचितों का पक्ष लिया या मीरा और अंडाल ने भारतीय स्त्री के जीवन में पुरुष-वर्चस्व और उससे प्रेरित सांस्कृतिक जगत् की अनुभव-संरचनाओं की पुनर्रचना की।
वंचित-दलित और स्त्री के आत्मबोध का भक्तिकालीन विमर्श वस्तुत: सामाजिक सन्तुलन की तलाश मध्ययुगीन प्रयत्नों का हिस्सा था। भारतीय समाज की विडम्बना यह है कि आधुनिकता के बुनियादी वैचारिक गठन में इस सन्तुलन की आकांक्षा समतामूलक समाज के आदर्श की मौजूदगी के बावजूद व्यवहार के धरातल पर आधुनिक जीवन में चरितार्थ न हो पायी। इस आकांक्षा ने दलित और स्त्री के अन्तर्जगत् में आख़िरकार एक ऐसी उथल-पुथल पैदा कर दी कि एक ख़ास क़िस्म की अस्मितामूलक राजनीति में ही उसकी ध्वनियाँ खुल सकती थीं। इस राजनीति से हिन्दी कविता भी अछूती नहीं है। उसमें निस्संदेह स्त्री की मानवीय उपस्थिति का स्पेस बढ़ा है, यद्यपि ठीक तरह से वह अस्मिता-विमर्श का रूप नहीं ले पाया है और उसका प्राकटय दरअसल उसकी सुकोमल और रागात्मक छवि में ही ज्यादातर हुआ है, लेकिन दलित राजनीति तो बाक़ायदा हिन्दी कविता में अपनी स्वतंत्र हैसियत और पृथक उपस्थिति की माँग कर रही है और हिन्दी साहित्य के सम्पूर्ण कार्यकलाप को वर्णवादी घोषित कर चुकी है। दलित कविता की पृथक श्रेणी आज समकालीन कविता में भले ही न बन पायी हो, लेकिन उसका दबाव परिदृश्य में सक्रिय है, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता। यह कौन नहीं जानता कि विकेन्द्रवाद और अस्मिता-बोध उत्तर आधुनिक राजनीति का एजेण्डा है। दलित और स्त्री के आत्मबोध को भी इसी सन्दर्भ में देखा जाता है। इसलिए अचरज नहीं कि 'कोई माने या न माने' हम पसन्द करें या न करें, एक उत्तर आधुनिक एजेण्डा चुपचाप हमारी कविता में आ गया है।' 24 'समकालीन कविता में केवल दलित और स्त्री की दस्तक को नहीं बल्कि प्रकृति की मन:स्थिति को भी उत्तर आधुनिक एजेण्डा, पर्यावरणवाद के रूप में देखा जा रहा है।' 25 कहना न होगा कि अति सरलीकृत निष्कर्ष होने पर भी इससे इतना तो अवश्य प्रमाणित होता है कि समकालीन कविता गहरे राजनैतिक आशयों की कविता है। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि 'उसकी राजनैतिक चेतना केवल कुछ सिम्बल्स तक सीमित न होकर जीवन की जटिल प्रक्रियाओं को एक ऐतिहासिक बोध से सम्पन्न करने में है।' 26 कविता की सार्थकता इसी में है कि उसकी राजनीति का आधार उसका नैतिक उद्वेग और मानवीय संवेदनशीलता हो। अस्मिता-विमर्श के प्रति हिन्दी कविता की हिचकिचाहट, कहने की ज़रूरत नहीं कि, उसके नैतिक उद्वेग की ही अभिव्यक्ति है। दलित कविता और नारीवादी कविता का अपनी स्वतंत्र पहचान क़ायम करने का आग्रह तो है, लेकिन हिन्दी में एक पृथक साहित्यिक कोटि के रूप में उन्हें मान्यता नहीं मिल पाई है। ज़ाहिर है दलित या नारीवादी राजनीति की समाज में उपस्थिति को ज्ञापित करने में ही तथाकथित दलित या नारीवादी कविता की सार्थकता चुक जाती है।
दरअसल, आधुनिकोत्तर वैश्वीकृत यथार्थ का दबाव आज के जीवन और राजनीति में स्वाभाविक तौर पर सक्रिय है। दलित-स्त्री-पर्यावरण की राजनीति इसी का परिणाम है। इस राजनीति की उपस्थिति न सिर्फ़ संगठित राजनीति या बौध्दिक विमर्श में परिलक्षित होती है, बल्कि सामाजिक जीवन के विभिन्न हलक़ों में भी इसका अनुभव किया जा सकता है। समकालीन कविता की राजनैतिक संवेदना पर भी इसका प्रभाव सहज रूप में प्रकट हुआ है। यह प्रभाव दो तरह से सक्रिय है। एक स्तर पर दलित, स्त्री या पर्यावरण के सामाजिक आन्दोलनों की प्रच्छिया के रूप में और दूसरे स्तर पर कविता-संवेदना की नैसगिंक समग्रता में समाहित होकर। सामाजिक आन्दोलनों के प्रभाववश कविता में विसित हुई राजनीतिक संवेदना ठीक उसी तरह से स्वायत्त पहचान के आग्रह के साथ सक्रिय है, जिस तरह वह स्वयं सामाजिक जीवन में अर्थात् अस्मिता की राजनीति के रूप में चरितार्थ होती है। जिन कवियों में वह अस्मितावाद की चेतना से मुक्त होकर काव्यानुभव के भीतर समाविष्ट (इंटिग्रेटेड) रूप में प्रकट होती है, उनके यहाँ वह आन्दोलनधर्मी तेवर से अलग और जीवनानुभव का अटूट हिस्सा जान पड़ती है। समकालीन कविता में ज्यादातर वह जीवनानुभव और काव्यानुभव की अखण्डता में प्रकट हुई है। यही वज़ह है कि हिन्दी कविता में दलित-संवेदना, स्त्री-संवेदना या पर्यावरण-संवेदना के स्वायत्त परिसर निर्मित नहीं हो सके हैं, लेकिन आज कविता दलित, स्त्री या पर्यावरण के प्रश्नों के प्रति पूर्णत: सजग है। कहा जा सकता है कि ये प्रश्न कविता के भीतर महज़ सामाजिक राजनीति के प्रश्न न होकर कवि के अनुभव-संसार में उपजे अनिवार्य प्रश्न हैं। वे समकालीन मनुष्य के जीने का स्वाभाविक सन्दर्भ हैं। समकालीन कविता उन्हें इसी रूप में देखती है।
आधुनिकोत्तर विकेन्द्रवादी राजनीति और उनके अस्मितापरक एजेण्डा से अलग समकालीन कविता की राजनीतिक संवेदना आधुनिकोत्तर यथार्थ को यथासम्भव समग्रता में पहचानने के सर्जनात्मक उद्यम में साकार होती है। इस रूप में सामाजिक वास्तविकता को देखने-समझने का अर्थ स्पष्ट तौर पर उत्तर-पूँजी के प्रपंचों को पहचानने का प्रयत्न करना है। हिन्दी के अनेक कवि अपने इर्द-गिर्द की दुनिया में बनतीं-बिगड़तीं सच्चाइयों को इसी रूप में देखने का जतन करते हैं। मंगलेश डबराल, राजेश जोशी, अरुण कमल, ज्ञानेन्द्रपति, पंकज सिंह, मनमोहन, राजेन्द्र शर्मा, आलोक धन्वा, उदय प्रकाश, विजयकुमार आदि वरिष्ठ कवियों से लेकर स्वप्निल श्रीवास्तव, कुमार अम्बुज, नवल शुक्ल, देवीप्रसाद मिश्र, संजय चतुर्वेदी, अष्टभुजा शुक्ल, निर्मला गर्ग, अनामिका, बद्रीनारायण, नीलेश रघुवंशी, एकान्त श्रीवास्तव, निलय उपाध्याय, आशुतोष दुबे, हेमन्त कुकरेती, संजय कुन्दन, प्रेमरंजन अनिमेष आदि तथा बिल्कुल नये कवियों में कुमार वीरेन्द्र, हरेप्रकाश उपाध्याय, रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति आदि के यहाँ उत्तर-पूँजी के उत्पातों के बहुविध साक्ष्य के रूप में कविता का यथार्थ प्रतिफलित हुआ है। इन कवियों के अनुभव की दुनिया अपने समूचे रोज़मर्रापन के बावजूद अन्तत: सामाजिक यथार्थ के उन प्रारूपों से निर्मित हुई है, जिन्हें देश में उदारीकरण के अर्थशास्त्र ने पिछले डेढ़-दो दशक में निर्मित किया है। ज़ाहिर है, दो टूक कहने की विवशता हो, तो कहना होगा कि समकालीन कविता की राजनीति वृहत् पूँजी, सूक्ष्म प्रौद्योगिकी और वैश्वीकृत बाज़ार का बुनियादी परिप्रेक्ष्य निर्मित करता है। इसकी पहचान आज की कविता की प्रतिश्रुति है। हिन्दी कवियों ने वैश्वीकरण के सामाजिक प्रतिफलन का आख्यान रचा है। इसलिए नये यथार्थ की धमक जहाँ भी पहुँची है, कविता वहाँ तक गयी है। गुजरात का नरसंहार हो या नंदीग्राम की हिंसा, आज की कविता उसकी पृष्ठभूमि में सक्रिय पूँजी की नृंशस लीला को देखने की चेष्टा करती है।
वैश्वीकरण किस क़दर कविता के एजेण्डे में शामिल है और किस तरह वह कवि की चिन्ता के केन्द्र में है - इसे समझने के लिए कवि ज्ञानेन्द्रपति की कविताओं और उनके कविता-सम्बन्धी विचारों की पड़ताल, बानगी के तौर पर की जा सकती है।
नयी सदी की शुरुआत के साथ ही ज्ञानेन्द्रपति का कविता-संग्रह 'गंगातट' प्रकाशित हुआ। नये यथार्थ को समझने की दृष्टि से यह महत्त्वपूर्ण संग्रह है, जो आज की कविता की राजनीति और उसके जीवन-परिप्रेक्ष्य की भी सटीक व्याख्या करता है। इस संग्रह की कविताओं में ज्ञानेन्द्रपति बनारस और गंगा को परम्परा और संस्कृति के आलोक में देखते-बूझते हुए नव-औपनिवेशिक यथार्थ के संक्रमण के मार्मिक दृश्य रचते हैं। वे एक पौराणिक नगरी के मिथकीय-धार्मिक परिवेश को नये यथार्थ के आलोक में पुनर्सृजित करते हैं। 'गंगातट के अनेक दृश्यों में प्रकृति और परम्परा के सुदीर्घ सह-अस्तित्व के बीच या उसके बरक्स आधुनिक संरचनाओं की अतिक्रामक और विकराल उपस्थिति दिखाई देती है। यह संस्कृति और सभ्यता की अन्तर्विरुध्द उपस्थिति है, जिसने हमारे समय को एक कठिन संकट के मुहाने पर ला खड़ा किया है। ज्ञानेन्द्रपति के काव्य-बोध में इस संकट की अचूक पहचान है।'
गंगा के तट से जीवन को देखने का उपक्रम ज्ञानेन्द्रपति के लिए महज एक सौन्दर्यात्मक पोज़ीशन लेने का सूचक नहीं है, बल्कि उनके काव्य-बोध 'गंगातट' कवि के नैतिक पोज़ीशन का व्यंजक बन जाता है। ज्ञानेन्द्रपति अक्सर तट के 'इस पार और उस पार' जैसी शब्दावली में, अपने देखे हुए का ब्यौरा देते हैं। इस पार यानी अवार तट पर गंगा की 'संस्कृति' है और उस पार 'सभ्यता' की आधुनिक संरचनाएँ। इस पार गंगा का अविरल प्रवाह है, जीवन के जीवन्त स्मृति-बिम्ब हैं और उस पार साम्राज्यवादी पूँजी की लीला। इस पार लोकजीवन है और उस पार बहुमंज़िली इमारतें, पंचतारा होटल, धुऑं उगलतीं चिमनियाँ या टी.वी. का एंटीना। यह 'गंगातट' की कविताओं में बार-बार प्रकट होता दृश्य है। नदी की प्रशान्त धारा से परे दूर तट पर किसी आधुनिक संरचना की उपस्थिति के जरिये ज्ञानेन्द्रपति जैसे एक सभ्यता-विडम्बना को साकार करते हैं। इस तरह गंगा के सनातन प्रवाह के बरक्स ऊँची इमारत या चिमनी की निपट सामायिक उपस्थिति को वे भारत के 'पुराणाधुनिक' की विडम्बना बना देते हैं। कहना नहीं होगा कि 'पुराणाधुनिक' का यह विमर्श आधुनिक भारतीय-सभ्यता का केन्द्रीय विमर्श है, जिससे गुज़रना आधुनिकता की देहरी पर खड़े एक पुरातन राष्ट्र की नियति है। इस मायने में 'गंगातट' की कविताएँ एक गहरा सभ्यता-विमर्श निर्मित करती हैं।
इस विमर्श में कवि का पक्ष 'इस पार' का पक्ष है, जबकि 'उस पार' सभ्यता-संक्रमण के दृश्य हैं। नदी के प्रवाह को सभ्यता के रूपक की तरह देखने पर 'इस पार' और 'उस पार' के अर्थ-संकेत पूरब और पश्चिम के द्वैत को यानी पूरब की निरीह वध्यता और पश्चिम की औपनिवेशिक आक्रमकता को प्रकट करने लगते हैं। बीच में बहती इतिहास-चेतना की अथक धारा है। पश्चिम के संक्रमण को लेकर उन्नीसवीं सदी के नवजागरण से लेकर अब तक जो विमर्श हुए हैं, उनके सूत्र जोड़कर देखें, तो ज्ञानेन्द्रपति सर्वथा नया और ठेठ समकालीन विमर्श रचते हैं। वे पूरबवाद (ओरिएण्टलिज्म) के शिकार अनेक लेखकों की तरह महान भारतीय परम्परा का गुणगान नहीं करते, न ही परम्परा के भीतर किसी निरापद शरण्य की तलाश करते हैं। इससे उलट वे पश्चिम की पहचान का ठोस रूप, निहायत समकालीन रूप तलाशते हैं और उसका खुला प्रतिवाद करते हैं। यही वजह है कि वे पश्चिम को किसी र्अमूत्त विचार की तरह देखने की बजाय सीधे 'साम्राज्ञी पूँजीवाद' के रूप में पहचानते हैं। इसलिए 'गंगातट' की कुछ कविताओं में 'पश्चिम की तकनीक़ी उतरन', 'साम्राज्ञी पूँजीवाद का दैत्य चुरूट', 'पूँजी का डायन नाच' जैसी अकाव्यात्मक शब्दावली का प्रयोग मिलता है। ज्ञानेन्द्रपति के लिए साबुन 'इज़ारेदार पूँजीवाद की बिटिया' है, कारख़ाने की चिमनी, 'पूँजीवाद के दैत्य-मुँह में दबा चुरूट' है। पोलिथिन उन्हें 'पूँजीवाद की त्वचा' और डिश एंटिना 'समृध्दि की सभ्यता के शुभंकर स्मृति चिह्न' की तरह जान पड़ते हैं। ये सब नयी पश्चिमी सभ्यता के प्रतीक-चिह्न हैं। ज्ञानेन्द्रपति इसी सभ्यता का पाठ रचते हैं, जिसके केन्द्र में औद्योगिकीकरण और बाज़ारवाद है।
दरअसल, 'गंगातट' का दृश्य कविता में एक रूपक बन जाता है - सभ्यता का रूपक, जिसमें ठेठ स्थानीय अनुभव वैश्विक अर्थ-विस्तार प्राप्त करता है। ज्ञानेन्द्रपति ने एक साक्षात्कार में अपनी कविता की जनपदीयता के सन्दर्भ में कहा भी है - 'वैश्विक परिवर्तनों को स्थानिक धरातल पर ही ज्यादा ठीक से चीन्हा जा सकता है।' आज की कविता में स्थानीय और निजी अनुभवों के साक्ष्य से पूँजी की महत्त्वाकांक्षा से उत्पन्न सामाजिक खलबली को चित्रित करने के अनेक प्रयत्न देखे जा सकते हैं। ज़ाहिर है, कविता यथास्थिति के विरुध्द एक हस्तक्षेप के तौर पर लिखी जा रही है, कहीं स्पष्ट पक्षधर-विवेक के साथ या फिर कहीं बौध्दिक-वैचारिक स्तर पर उपजे असन्तोष की प्रतिक्रिया में।
ज़ाहिर है, ज्ञानेन्द्रपति एक सुचिन्तित समाज-सजगता और वर्गीय पक्षधरता के साथ कवि-कर्म करते हैं। उनकी पीढ़ी के अनेक कवियों और कनिष्ठ कवियों के यहाँ भी ऐसी सजगता और पक्षधरता मिलती है। दरअसल, पिछली सदी के सातवें-आठवें दशक में हिन्दी कविता में अराजक विद्रोह और उसके बरक्स उग्र राजनीतिक अतिवाद का पर्यावसान नवें दशक की फूल-पत्ती-मिट्टी-आकाश वाली ग़ैर-राजनीतिक-सी प्रतीत होने वाली कविता में जब हुआ था, तो कवियों का कुछ इस तरह से राजनीतिक-वैचारिक प्रशिक्षण हो चुका था कि विद्रोही राजनीति का न सिर्फ़ मुखौटा उतर चला था, बल्कि उसके उत्तप्त भँपोरे धीरे-धीरे एक आत्मीय संसार की रागात्मकता के ताप में विसर्जित हो गये। नवें दशक की नव-प्रगतिवादी कविता मुद्राविहीन और संयत वैचारिक उद्वेग की कविता थी। वैचारिक उदग्रता का स्थान उसमें गहरी जीवनासक्ति और ऐन्द्रिकता ने ले लिया था। ज्ञानेन्द्रपति, राजेश जोशी, अरुण कमल, उदय प्रकाश आदि का काव्य-संसार उस दौर में संवेदनात्मक उत्ताप से भरा हुआ और एक हद तक ग़ैर-राजनीतिक जान पड़ता था, लेकिन उनके वैचारिक सर्जनात्मक प्रशिक्षण ने उन्हें संयत और मुद्राविहीन कविता लिखने में समर्थ बनाया था। वास्तविकता यह थी कि चिड़िया, फूल, पत्ती जैसे रूमानी संवेदना वाले काव्य-उपकरणों का प्रयोग करते हुए वे गहरी मानवीय जिजीविषा और संघर्ष की कविता लिख रहे थे। इस कविता की राजनीति खुले तौर पर प्रगतिवाद की राजनीति अर्थात् वामजनवादी राजनीति थी। ज्ञानेन्द्रपति और अन्य कवियों की सजगता और पक्षधरता को इसी सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए। बाद के दौर में भी इन कवियों में राजनैतिक चेतना की दृष्टि से किसी तरह का विचलन या वैचारिक स्खलन दिखाई नहीं देता; बल्कि सच तो यह है कि उनकी प्रगतिवादी चेतना का प्रभाव कुमार अम्बुज, एकान्त श्रीवास्तव, देवीप्रसाद मिश्र जैसे कनिष्ठ कवियों पर भी पड़ा। 1980 के बाद की काव्य-पीढ़ी अपनी पुख्ता राजनीतिक चेतना के लिए पूर्ववर्ती पीढ़ियों की कृतज्ञ है। कहना नहीं होगा कि इसी दौर में प्रगतिशील चेतना हिन्दी कविता का स्थायी काव्य-संस्कार बन गई। 1990 के दशक में यथार्थ-बोध, वर्गीय-दृष्टि, वर्गापसरण, प्रतिबध्दता, जन-सम्बध्दता जैसी शब्दावली में यदि कविता को समझने की चेष्टाएँ सहसा काव्य-विमर्श के केन्द्र में आ गई थीं, तो कहना न होगा कि यह कवियों और बुध्दिजीवियों पर वाम-राजनीति के प्रभाव का प्रमाण था।
सोवियत संघ के पराभव के बाद इस राजनीति की विश्वसनीयता तो कमज़ोर नहीं हुई, लेकिन उस पर टिकी हुई आस्था सहसा एक पल के लिए डिगती ज़रूर लगी। नतीजतन कविता को लेकर संवाद और विमर्श की शब्दावली बदलती दिखाई दी। वर्ग-चेतना का स्थान एक स्तर पर मध्यवर्गीय नागरिक-चेतना ने ले लिया, तो दूसरे स्तर पर लोक-चेतना की प्रतिष्ठा हुई। कविता में जीवन-संघर्ष या जन-संघर्ष को चित्रित करने के बजाय उत्तर-सोवियत परिस्थितियों में यथार्थ को भलीभाँति जानने-समझने पर बल दिया जाने लगा। यथार्थ को जानने-समझने की ज़रूरत इसलिए भी बढ़ गई थी कि इसी दौर में उदारीकरण और वैश्वीकरण की शक्तियाँ हमारे समाज में दाख़िल हुईं और उन्होंने यथार्थ का अन्यथाकरण- उसमें तोड़फोड़ करना शुरू कर दिया। अब प्रतिबध्दता की बनिस्बत समाज-सजगता बड़ा काव्य-मूल्य बन गई। संघर्ष की जगह अब समाज-प्रेक्षण महत्त्वपूर्ण था। यह समस्या सिर्फ़ कवियों की नहीं, सजग बुध्दिजीवियों और समाज-वैज्ञानिकों की भी थी। शायद यही वज़ह है कि स्वतंत्र भारत में सामाजिक परिवर्तन के सवालों पर विचार करते हुए समाजशास्त्री पूरनचन्द्र जोशी मार्क्स के सुविख्यात कथन 'दार्शनिकों ने अब तक दुनिया को समझने की चेष्टा की है, ज़रूरत है इस दुनिया को बदलने की' को नये सन्दर्भों में संशोधित करने की आवश्यकता बताते हुए कहते हैं-'आज के सन्दर्भ में हमें कहना होगा, क्रान्तिकारी अभी तक इस दुनिया को बदलने की कोशिश ही करते आये हैं, ज़रूरत है, पहले इसे समझने की।' कविता भी दुनिया को बदलने की क्रान्तिकारी मुद्रा को शीतयुध्द की समाप्ति के साथ ही त्याग कर, उसे और उसके मायावी चरित्र को समझने की चेष्टा में लिखी जा रही है। नवें दशक विश्व-राजनीति में ही नहीं, हिन्दी कविता में भी संक्रमणकाल है, जिसके गुज़रने के बाद एकध्रुवीय हो चली दुनिया में शक्ति-विमर्श एक नये ढंग के साम्राज्यवाद के पक्ष में सक्रिय हुआ और हिन्दी कविता इसके फलस्वरूप भारतीय समाज में यथार्थ के नये विन्यास को समझने की कोशिश में पहले की तुलना में कुछ अधिक ऐन्द्रिक और विवरणमूलक, कुछ अधिक विचारशील और चिन्ताकुल जान पड़ी। इन परिस्थितियों में कविता का कार्यभार बदला हुआ था। यथार्थ को समझने का कार्यभार, सौन्दर्यात्मक और वैचारिक दोनों स्तरों पर, यदि आज की कविता को साथ-साथ निभाना था, तो ज़ाहिर है उसके सामने कलात्मक और समाजशास्त्रीय मोर्चों पर एक साथ सक्रिय रहने की चुनौती थी। अन्तिम दशक में जनसंचार क्रान्ति के प्रभावों की समाज की भीतरी सतहों तक पहुँच हो जाने के कारण एक कला-माध्यम के रूप में उसे एक तीसरी चुनौती का सामना भी करना पड़ रहा था, क्योंकि संचार-माध्यम समाज की सतह पर पड़े यथार्थ को कविता की तुलना में अधिक आकर्षक बनाकर पेश करने में सक्षम थे।
इन चुनौतियों का सीधा असर कविता की राजनीतिक संवेदना पर पड़ा। वह सामाजिक विज्ञानों का विकल्प नहीं है, लेकिन सामाजिक यथार्थ को सूचना और विवरण के स्तर पर ग्रहण करने की विवशता के कारण कवि उसे समाजशास्त्रीय तरीक़े से बरत रहे थे। पिछली सदी के अन्तिम दशक से लेकर नयी सदी के प्रारम्भिक दशक में लिखी गईं कविताओं को ग़ौर से देखें, तो एक तथ्य सहज ही ध्यान में आता है। इस दौर की बहुत-सारी कविताओं में प्राय: यथार्थ के ठण्डे, तटस्थ ब्यौरे मिलते हैं। कवि जैसे निस्संग भाव से वास्तविकता का बखान करता है। आठवें-नवें दशक में कवि की प्रकट-प्रत्यक्ष पक्षधरता, जो कविता की सतह पर उतराती दीखती थी, अब कहीं अन्तर्भुक्त हो चली और एक ठण्डे नैतिक आवेग में काव्यानुभूति का अपसरण होता जान पड़ता है। सामाजिक न्याय के प्रश्नों पर अथवा साम्प्रदायिक फासीवाद के उभार पर लिखी गईं कविताओं में ज़रूर यह नैतिक विकलता तीव्र आवेग के साथ उठती है, लेकिन जिस अर्थ में नव-प्रगतिवाद के दौर में यानी नवें दशक में पक्षधरता और वर्ग-बोध के साथ काव्यानुभव आकार लेता था, आज की कविता में उसका अभाव साफ़ नज़र आता है। तात्पर्य यह कि विचारधारा और प्रतिबध्दता के सवाल को पूरी तरह ख़ारिज भले ही न कर दिया गया हो, उसे गौण मुद्दा समझकर किनारे अवश्य कर दिया गया है। कहा जा सकता है कि यथार्थ बदलने के साथ कविता के सरोकार भी बदले हैं। 1980 के दशक में कविता के भीतर जो स्वप्नलोक पल रहा था, वह लगभग तिरोहित हो चला है। नयी सदी की तमाम रंगीनी और चकाचौंध के बावजूद ऐसा जान पड़ता है कि कविता एक दु:स्वप्न का पीछा कर रही है। वह गहरे अवसाद की सृष्टि रचती है।
सम्भवत: इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखकर कवि कुमार अम्बुज चिन्तित हैं, जो विचारधारा के खुले आग्रह के साथ कवि-कर्म करते हैं। आज की कविता से उनकी शिकायत है कि उसकी 'संरचना में से प्रति संसार की कल्पना, बेहतर दुनिया का प्रस्ताव और वैचारिक पक्षधरता के खनिज कम होते जा रहे हैं। ज़ाहिर है कि उसके राजनैतिक स्वरूप और राजनैतिक समझ की प्रखरता में कमी आ रही है। भाषा और बिम्बों को विचार का संवाहक अस्त्र बनाये जाने की जगह, उनका उपयोग किसी विचारहीनता को ओझल रखने में किया जा रहा है।' 27 कुमार अम्बुज हिन्दी की प्रगतिशील काव्य-परम्परा को उसकी गहरी समाज-सम्पृक्तता और वैचारिक प्रतिबध्दता के कारण सम्मान और गौरव के साथ देखते हैं। इसलिए आज की कविता में आ रहे विचलन से विचलित हैं। इस सिलसिले में वे पूँजीवाद के समकालीन दौर को रेखांकित करते हैं- ''क्या यह सर्वग्रासी पूँजीवाद के प्रभाव का परिणाम है कि उसने अपने 'चुपचाप और मनुष्य-विरोधी संस्कृति के तरीक़ों से' प्रतिरोध कर सकने वाली तमाम कलाओं की जगह मनोरंजनधर्मी कलाओं को रख दिया है? हम यह भी जानते हैं कि कविता प्रतिरोध का सांस्कृतिक औज़ार है, लेकिन इधर ऐसा प्रतीत हो रहा है मानों अब वह न केवल हाशिये पर है, बल्कि हाशिये पर बने रहने का उत्सव भी मना रही है। और अब तो उसकी सक्षमता पर ही प्रश्न है। उसकी व निर्बल चीख़, उसकी वह करुण पुकार और वह प्रतिरोधात्मक इन्कार और वह कामना, जो मनुष्य के पक्ष में द्युति की तरह चमकती रही, वह अब जैसे किसी असहायता में बदलती दिखती है। इन सरोकारों से दूर होते जाना भी तो असहायता की दिखा में गमन ही है। कई बार सूचना मिलती है कि कवि मार्क्सवादी है, लेकिन उसकी कविता इस बात की पुष्टि नहीं करती।'' 28 कुमार अम्बुज की यह शिकायत कविता के भीतर आत्मपरीक्षण की आवश्यकता को रेखांकित करती है। ऐसी शिकायत अन्य कवि भी जब तब करते रहते हैं, लेकिन स्वयं कविता के भीतर आत्मपरीक्षण के प्रमाण प्राय: दिखाई नहीं देते। ऐसा नहीं है कि बीती सदी के आठवें-नवें दशक के पक्षधर उत्साह के साथ लिखी गई कविता की स्मृतियों से आज की कविता पूर्णत: मुक्त हो गई हो, लेकिन इस उत्साह का रणनीतिक रूपान्तरण बड़े पैमाने पर हुआ है और एक क़िस्म की तटस्थ जागरूकता के साथ कविता लिखी जा रही है।
यह तटस्थ जागरूकता पूर्ववर्ती कविता की प्रखर राजनैतिक चेतना का स्थानापन्न मालूम पड़ती है। यह वैश्वीकरण के प्रतिरोध के दृश्य सँजोती है, लेकिन प्राय: एक सुरक्षित दूरी के साथ, जहाँ से कवि की नैतिक प्रतिबध्दता दिखाई देती है और राजनैतिक पक्षधरता धुँधली पड़ जाती है। वैश्वीकरण के प्रतिरोध की राजनीति भी, यही वज़ह है कि आज की कविता में बहुत हद तक निरापद क़िस्म की राजनीति है, वह बौध्दिक स्तर पर अपनी चमक दिखाकर दृश्य में चकाचौंध पैदा करने का भ्रम रचती है। वह जन-आन्दोलनों की राजनीति नहीं, बल्कि एक स्तर पर स्वयंसेवी संगठनों और वर्ल्ड सोशल फ़ोरम की राजनीति-सरीखी है।
कहने की आवश्यकता नहीं है कि नई सदी में कविता की राजनैतिक संवेदना में आई यह तब्दीली उसके सौन्दर्यशास्त्र, इधर हुए बदलाव से अभिन्न नहीं है। पिछली सदी के उत्तरार्ध्द में काव्यशास्त्र के केन्द्र से धीरे-धीरे सौन्दर्य और आनन्द का काव्य-मूल्य के रूप में अपसरण होना अनायास नहीं था। जनजीवन से कविता ज्यों-ज्यों सम्पृक्त होती गई, 'सौन्दर्य' की जगह 'संघर्ष' की प्रतिष्ठा हुई। नयी सदी में सौन्दर्य और संघर्ष, दोनों का काव्य-मूल्य चुक गया जान पड़ता है। आज ज्यादातर कविता एक ख़ास तरह की बौध्दिक उत्तेजना पैदा करने की कोशिश में लिखी जा रही है। यही वज़ह है कि उसे पक्षधर-प्रतिबध्द राजनैतिक चेतना की कमी खलती नहीं। वैश्वीकरण के विरोध का झण्डा उठाये रखकर वह स्पष्ट राजनैतिक प्रतिबध्दता के जोखिम से बचने का रास्ता भी ढूँढ़ लेती है। ऐसी कविता, जैसा कि स्वयं अनेक कवि अनुभव करते हैं, अगर वैश्वीकरण के निज़ाम को 'सूट' करती है, तो उसकी राजनीति को एक चालाक राजनैतिक मुद्रा के अलावा और क्या कहा जा सकता है?
सन्दर्भ-
1. धूमिल, संसद से सड़क तक, 2. मुक्तिबोध, भूल ग़लती, प्रतिनिधि कविताएँ, सं.-अशोक वाजपेयी, राजकमल प्रकाशन, पृ.-154, 3. विनोदकुमार शुक्ल, रायपुर-बिलासपुर संभाग, सम्भावना प्रकाशन, 4. सोमदत्त, क़िस्से अरबों हैं, जयश्री प्रकाशन, पृ.- 33, 5. केदारनाथ सिंह, ज़मीन पक रही है, पृ.-66, प्रकाशन संस्थान, 6. ऐसी कविताएँ केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन ने खूब लिखी थीं। उदाहरण के लिए केदारनाथ अग्रवाल की कविता 'अमरीका से' (कहें केदार खरी-खरी, पृ.-86) या 'वायस ऑव अमरीका' को सुनकर (पूर्वोक्त, पृ.-82) आदि, 7. विजय कुमार, राजेश जोशी का साक्षात्कार, पहल-61, पृ.-86, 8. वसुधा 24-25, म.प्र. प्रगतिशील लेखक संघ, पृ.-111, 9. राजेन्द्र शर्मा, वसुधा-31, पृ.-27, 10. राजेश जोशी, पहल-61 में विजय कुमार से साक्षात्कार, पृ.-86, 11. नंदकिशोर नवल, साक्षात्कार, वर्तमान साहित्य कवितांक, पृ.-329, 12. राजेश जोशी, पहल-61 में विजय कुमार से साक्षात्कार, पृ.-87, 13. बद्रीनारायण, वसुधा-31, पृ.-47. 14. उदाहरण के लिए 'अक्षर पर्व' (सं.-ललित सुरजन) ने विष्णु खरे द्वारा संकलित लगभग 50 कविताएँ अपने वार्षिकांक-2002 में प्रकाशित कीं, 15. हंस, मई-2002, सं.-राजेन्द्र यादव, पृ.-15, 16. 'गुजरात 2002' शीर्षक कविता, हंस के पूर्वोक्त अंक (पृ.-15-17) में प्रकाशित हुई, 17. पहल-70, सं.-ज्ञानरंजन, पृ.-74, 18. गुजरात 2002, कात्यायनी, हंस, सं.-राजेन्द्र यादव, मई-2002, पृ.-15, 19. उपरोक्त, पृ.-17, 20. असद जैदी, 'हिन्दी कविता अयोध्या के बाद', संकलन (दो खण्ड) का सम्पादकीय वक्तव्य, 21. संजय कुन्दन, व्यावहारिक बुध्दि (कविता), आलोचना, सहस्त्राब्दी अंक-7-8. (अक्टूबर, 2001-मार्च, 2002), पृ. - 100, 22. विजय कुमार, कविता की संगत (आधार प्रकाशन), पृ. - 17, 23. विजय कुमार, पूर्वोक्त, 24. सत्यपाल सहगल, चन्द बातें, उद्भावना-47-48, सं. - अजेय कुमार, कवितांक, अक्टूबर, 97-मार्च 98, पृ.-4, 25. पूर्वोक्त, पृ.-4, 26. विजय कुमार, कविता की संगत, आधार प्रकाशन, पृ.-16, 27. कुमार अम्बुज, वसुधा-70 में प्रकाशित टिप्पणी, पृ.-17, 28. पूर्वोक्त, पृ.-18. 




Friday, June 21, 2013

शिव कुमार मिश्र चले गए




SDC17105-1 
SDC17077-1



SDC17075-1  

SDC17084-1
 SDC17077-1

 SDC17085-1  SDC17101-1
 SDC17102-1
 SDC17103-1
 SDC17104-1
 SDC17089-1

शिव कुमार जी से अंतिम भेंट मार्च महीने में जनवादी लेखक संघ की राम विलास शर्मा पर हुई गोष्‍ठी‍ में हुई. कमजोर थे पर अपने व्‍याख्‍यान में हमेशा की तरह करीब घंटा भर तो समा बांधा ही. ये चित्र उसी दिन के हैं.
उनके पास आनंद जाने की बात भी बात ही रह गई. आज मित्र लोग अंत्‍येष्टि में गए हैं, मैं रह गया.