
Wednesday, August 4, 2010
तुम कौन सा लोक में है रे

Friday, July 30, 2010
खामोश! बारिश जारी है

जो भी मुंबई आता है उसे पहली ही बरसात में प्रेक्टिस हो जाती है कि अगर कहीं फंसे तो कई घंटों तक बुद्ध बनकर यथावत रहने के लिए तैयार रहो। जूते की दुकानों में अगर प्लास्टिक के जूते चप्पल इफरात में लटकते दिखनें लगें तो समझ जाइए बरसात आने वाली है। हर कोई अपने लिए एक जोड़ी चप्पल, जूता, सैंडल हर साल लेता है। न ले तो मेरे जैसा हाल हो जाए। पहली बरसात में चमड़े के जूते पहन कर सड़क पर उतर गया था। किंग्ज सल स्टेशन पहुंचे तो हार्बर लाइन बंद। माटुंगा रोड तक चल के जाना तय हुआ। एक साथी ने पहला काम किया, मुझे बरसाती पन्ही खिरदवाई। जूते की जोड़ी प्लास्टिक में लपेट कर बगल में खोंसी और पानी में खच्च-खच्च आवाज निकालते हुए चल पड़े। अंग्रेजी के जेड आकार का लोहे का लाल पुल पार करके वेस्टर्न लाइन के स्टेशन माटुंगा रोड पहुंचे। उन दिनों मैं आकाशवाणी में काम करता था। मुंबई में नया नया आया था। शहर अभी बेगाना और डरावना भी लगता था। डरपोक बच्चे की तरह किसी न किसी सहकर्मी की अंगुली पकड़ के चलता था। पहली बरसात में साथी के अलावा एक जोड़ी जूता भी हाथ में था। रेंगती हुई ट्रेन में महालक्ष्मी तक पहुंचे। उसके आगे पटड़ियां पानी में डूबी हुई थीं। टैक्सी ली। आठ बजे के चले हुए करीब बारह बजे दफ्तर पहुंचे। मैं देर से पहुंचने और नया अनुभव पाने से बड़ा खुश था।
एक बार आधी रात में बरसात में फंस गया। कवि विजय कुमार से शाम को सात बजे के करीब सायन स्टेशन पर मिला। ग्यारह बजे तक गप्पें मारते रहे। बारिश रुकी नहीं। फिर से दूसरे रेस्टोरेंट में बारह बजे तक बैठे रहे। उसके बाद लगा, अब तो चलना ही होगा। उन्हें स्टेशन पर छोड़ा। खुद एंटापहिल के लिए टैक्सी ली। जरा सी देर में टैक्सी वाले ने हाथ खड़े कर दिए। उतर कर पैदल चलना शुरू किया। कोलीवाड़ा हो के एंटापहिल के सैक्टर सात के लिए। घुटने-घुटने पानी में। आधी रात का वक्त। याद नहीं रास्ते में कोई मिला हो। गनीमत कि स्ट्रीट लाइट जल रही थी। करीब दो किलामीटर खुद को लकड़ी के ह्लाुंँदे की तरह ठेलते हुए घर पहुंचा। रात डेढ बजे।
पर सन् 2005 की बरसात तो एक हादसे की तरह घटी। उस दिन मैं अपने बड़े भाई भाभी और भतीजे को राजधानी एक्सप्रेस में बिठाने निकला था। टैक्सी ने एक किलोमीटर बाद ही हिम्मत हार दी। हम लोग जोगेश्वरी स्टेशन गए। उनके कपड़े के बैग वहीं पर भीग कर मन-मन भर के हो गए। लोकल ट्रेन में बैठ तो गए पर वो अंधेरी भी नहीं पहुंच सकी। अंधेरा होने लगा तो ट्रेन से कूदे और वापस जोगेश्वरी स्टेशन चल कर आ गए। वहां मेला लगा था। सामने सड़क पर खड़ी मोटरबाइक का सिर्फ हैंडल दिख रहा था। बड़ी देर बाद अक्ल आई कि पटड़ी-पटड़ी चलो, हमारा घर तो ट्रैक से सटा हुआ है। लोग चल ही रहे थे। हमने भी अटैची सिर पर लादे, बैग कंधे पर लटकाए और लौट चले। खुशकिस्मत थे, सही सलामत घर पहुंच गए। हमारी पड़ोसी की बेटी सांताक्रूज में अटक गई थी। वो अंधेरे में पैरों के चप्पू चलाते हुए गईं और जिगर के टुकड़े को ले के आईं। एक और पड़ौसी की पत्नी अगली सुबह घर पहुंची। अनगिनत लोग अगली सुबह ही घर पहुंच पाए। कुछ तो पहुंच ही नहीं पाए। हमारे इलाके में भैंसों के तबेले हैं। रात भर भैंसों के पगुराने की आवाजें आती रहीं। बेकली भरी। सुबह मेन रोड तक गए तो मंजर खौफजदा था। तबाही मची हुई थी। नाला कई कुछ बहा के ले गया था। भैंसों के फूले हुए शरीर छोड़ गया था। हारे हुए सिपाहियों की तरह लोग लौट रहे थे।
मुंबई जब भी किसी मुश्किल दौर से गुजरती है, उसकी चेतना जाग उठती है। इस बार भी लोगों ने लोगों की खूब मदद की थी। पानी, चाय, नाश्ता, सहारा, हिम्मत, शरण, जो जिसके बस में था, दिया। आज भी मन ही मन शायद हर कोई यह कामना करता है कि बरसात आए, झूम के आए पर उस तरह का कहर न बरपाए।
चित्र - हरबीर
इस टिप्पणी का संपादित अंश कादम्बिनी के जुलाई अंक में देखा जा सकता है.
Thursday, July 15, 2010
शिक्षा का अधिकार - उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद

Tuesday, July 13, 2010
नालेज वालेज

Friday, July 9, 2010
वर्षा अंक

आमुख कथा – शिक्षा का अधिकार - उज्जवल भविष्य की उम्मीद : शिरीश खरे॥
बातचीत - बांसुरी वादक राजेंद्र सिंह गुरंग॥
लोक संस्कृति - हिमाचली लोक साहित्य में मुक्तक गीत : कृष्ण चंद्र महादेविया॥ हिमाचली कोकिला - वर्षा कटोच॥ लाहौल स्पिति में विवाह समारोह के दौरान खान-पान : उरज्ञान छैरिंग मैलगपा॥
अनुगूंज – छत्तीसगढ़ की संस्कृति : शरद कोकास ॥
मेरी प्रिय कहानी – सतखसमी : सुंदर लोहिया॥ टिप्पणी : निरंजन देव॥ बातचीत : मुरारी शर्मा॥ कल्पना की उड़ान ने खिंचवाई रेखाएं : रत्नचंद रत्नेश॥ रमेश कुंतल मेघ के रेखांकन॥ कविताएं : जसवंत सिंह विरदी॥ कुलदीप शर्मा॥ भास्कर चौधरी॥ हंसराज भारती॥ सिद्धेश्वर सिंह॥ कहानी : बद्री सिंह भाटिया॥ परिचर्चा - साहित्यकार, साहित्य और समाज : एस.आर.हरनोट॥ सुरेश सेन निशांत॥ मुरारी शर्मा॥
विचार मंथन 1- कुछ भी (क्यों) नहीं देखा – केशव की कहानी: सुधीर भड़कमकर॥ केशव॥ निरंजन शर्मा॥ मधुकर भारती॥ विचार मंथन 2- पत्रिका की साज सज्जा: रेखा॥ हरि मृदुल॥ मनोज शर्मा॥
पहाड़ी कलम- पहाड़ी अनुवाद के साथ हिंदी कविता - स्थित प्रज्ञ : यश मालवीय॥ केशो ज्ञानी की कुंडलियां॥ पवनेंद्र पवन दे छंद॥ रेखा ढडवाल दे गीत॥ गल सुणा : अनूप सेठी॥ चाचू भतीजू: गप्पी डरैबर॥ वातायन खुले रखने होंगे (पहाड़ी भाषा पर चर्चा) : डॉ. गौतम व्यथित॥ डॉ. प्रत्यूष गुलेरी॥ कुछ समरूप बोलियां : केशवचंद्र॥
करियर कैफे- सुदर्शन वात्यायन॥
भूगोल से आगे- एक अनूठा विचार मंदिर : राजीव त्रिगर्ती॥ नूरपुर का नगीना : बी कृष्णा॥ पझोता आंदोलन : आचार्य ओमप्रकाश राही॥ छात्र समीक्षकों के बीच: मोहन साहिल॥
यात्रा- हिमाचल दर्शन : शैलेश सिंह॥
आस्वाद और परख- मनोज शर्मा की कविताओं पर तरसेम गुजराल॥ कैलाश आहलूवालिया की कहानियों पर महमूद अयूबी और डॉ. परेश॥ वेद राही के डोगरी हिंदी उपन्यास पर अग्निशेखर॥ केशव के अंग्रेजी उपन्यास पर ईषिता आर. गिरीश॥ रमेश उपाध्याय के निबंध पर डॉ. वत्सला शुक्ल॥
कला परिक्रमा में जे पी सिंघल और विजय शर्मा की चित्र प्रदर्शनी, रमा वैद्यनाथन के नृत्य, दयाल प्रसाद निर्देशित नाटक, मोहित चौहान की एलबम, सेतु और संबोधन पत्रिकाओं पर टिप्पणियां ॥ गतिविधि॥ वैवाहिकी॥
परिवर्तन की पदचाप : आर. बी. राणा॥
Thursday, July 1, 2010
भूख

Friday, June 25, 2010
बारिश का स्वागत

Thursday, June 24, 2010
बारिश का स्वागत
चित्र साभारSunday, June 20, 2010
बारिश का स्वागत
छरहरा छड़ डर पास न आता
ओढ़ो तो तन भीग न पाता
धूप में छाया भी दे जाता
क्यों सखी साजन? न सखी छाता
Thursday, June 17, 2010
बारिश का स्वागत

सिर पर धर लो तन भीग न पाता
हो जब धूप कड़ी तब छाया दे जाता
छरहरी छड़ी बने डर पास न आता
क्यों सखी साजन न सखी छाता
रेखांकन सुमनिका का और पंक्तियां अमीर खुसरो की याद में
Wednesday, June 2, 2010
कवि होना उतना ही कठिन है जितना एक अच्छा इन्सान होना

Monday, May 3, 2010
Monday, March 22, 2010
किंतु परंतु लेकिन फिर भी आओ साथी सपना देखें

नाटक दिल्ली के चांदनी चौक के बैजू खान और गौरेया की प्रेम कहानी है. बैजू के पिता मियां खान बैंड मास्टर हैं. गैरेया के पिता चिरौंजी लाल गुप्ता की परचून की दुकान है. बहुमुखी नामक सूत्रधार कहानी सुनाता है. सारा नाटक गीत-संगीत मय है.
पहले इस जोड़े का प्रेम घर की छत पर बनी दीवारों को फांद कर पनपता है. मियां खान और गुप्ता को लोग एक दूसरे का दुश्मन समझते हैं जबकि वे दोस्त हैं. उनका निष्कर्ष है कि बच्चों से जो काम कराना हो, उसके लिए मना करो. अगर वे खुद को एक दूसरे का दुश्मन न दिखाते तो समधी न बन पाते. लड़की को अपनी सोलह साल की उमर के सिवा और कुछ नहीं सूझता. बैजू यूं तो बैंड में झुनझुना बजाता है, पर उसमें कलाकर बनने की ललक है. जीवन के सुख दुख दिखाने के लिए बैजू को संघर्ष करते दिखाया गया है. वह दो असफल कलाकारों के हत्थे चढ़ जाता है और हार और तजुर्बा लेकर लौटता है. पहले ये दोनों इसे सबक सिखाते हैं और बाद में यह इन दोनों को अपना गुलाम बना लेता है. पहले जहां वह पहलवान से पिट कर भागता है, लौट कर पहलवान को पीट कर महबूबा को हासिल कर लेता है.

दर्शकों ने बहुत तालियां बजाईं. नाच गाने पर, चटपटे, कुरकुरे, खस्ता, सटीक-सटाक संवादों पर, नृत्य पर और मजाक मजाक में नृत्य की और अभिनय की टांग तोड़ने पर. निर्देशक ने तालियां बटोरने के लिए ये सब करतब किए थे. हल्के फुल्के खेल के लिए स्टैंडिंग ओवेशन. इतनी जोर से और इतनी देर तक कि अंत में अभिनेताओं के नाम भी सुनाई नहीं पड़े.
किंतु परंतु
साथी को सपना देखने के लिए बुलाया जा रहा है और सपना वही पुराना घिसा-पिटा प्रेमी प्रेमिका का मिलना, बिछुड़ना और अंत में फिर मिलना. यह जिंदगी में भी होता है पर बहुत अलग तरह से होता है. इस नाटक में जीवन का स्पर्श सिर्फ कुछ जगह दिखता है, जब दो असफल कलाकारों को अपहरण का सीन करने के लिए बुलाया जाता है. बाकी तो सब गुडी गुडी, नकली नकली, पर झिलमिलाता हुआ.
लेखक ने भाषा पर इतनी मेहनत की है पर दिशाहीन. कथ्य नजर ही नहीं आता. हिंदू मस्लिम विवाद से भी वो साफ बच गया है. इतनी भर टिप्पणी है कि अगर रिश्ता टूट गया तो लोग बखेड़ा खड़ा कर देंगे. हालांकि बीच-बीच में टिप्पणियां बड़ी प्रासंगिक और चुभती हुई हैं. भाषा में रवानी है, फूहड़ता नहीं है, द्विअर्थी नहीं है (जिसके शिकार नाटक वाले अक्सर हो जाते हैं), संवाद सटीक और चुस्त हैं. पर अफसोस! भाषा के ये जुगनू नाटक में कोई रोशनी पैदा नहीं करते. नाटक कुल मिलाकर हंसी खुशी भरा ड्रामा बन कर रह जाता है.

चूंकि नाटक गीत-संगीतमय है, इसलिए नृत्य उसका हिस्सा है. ऐसा लगता है कि नृत्य निर्देशक ने बड़ी मेहनत की है. किंतु आजकल के फिल्मी डांस का असर पूरी दृश्यावली को अपने प्रभाव में ले लेता है. यूं गाने कथा को आगे बढ़ाने वाले हैं, संगीत नाटक की तरह का ही है, ढोलक, तबला, डफ, पेटी और क्लेरनट के साथ. पर बीट और नाच पर टीवी का असर दिखता है, जहां नृत्य झटकेदार होता है, जहां ठुमके में लचक कम और झटका ज्यादा होता है. इससे नाटक अपनी पहचान खोता है. ऊपर से अभिनेताओं की देह जिम-पकी है, पसीना-पगी और धूप-जली नहीं है. उनके मैनरिज्म भी टीवी –फिल्मों वाले हैं. वैसे यह समस्या सिर्फ इसी ग्रुप की नहीं है. सबके यही हाल हैं. यहां पर ऐसा लगता है कि अब नाटक का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, टीवी फिल्म है इसलिए नाटक भी है.
इन सब के बीच चिरौंजी लाल गुप्ता का चेहरा मोहरा, कपड़ा लत्ता और अभिनय प्रामाणिक है. सूत्रधार का साथी गजब का अभिनेता है. उसमें लोच है, ऊर्जा है, ठहराव है और पकड़ भी है. वह बैंड मास्टर के क्लेरनट के सुर को मूर्त करता है. यह संकल्पना और इसका अभिनटन दोनों की बहुत अच्छे हैं, अनोखे भी.
असल में ऐसा लगता है कि अगर इस नाटक का शीर्षक कुछ और होता तो किंतु परंतु का सवाल खड़ा नहीं होता. शायद नाटक देखने ही न जाता. हम सपना देखने गए और मिला नाच-गाना. तो लगता है कि क्या अब हमारे रचनाकारों ने भी बड़े सपने देखने बंद कर दिए हैं ? रचनाकारों ही ने क्यों दर्शकों ने भी इस स्थिति को स्वीकार कर लिया है. वरना लगभग हाउसफुल और तालियों की छतफोड़ गड़गड़़ाहट क्यों होती ?
चित्र मुंबई थियेटर गाइड से साथार









