Wednesday, August 4, 2010

तुम कौन सा लोक में है रे

मेरी पिराबलम बोले तो मालूम क्या है? कागज बहोत खाया तो मतलब उसमें बी अखबार ई च बहोत होता है। अखबार तो नाम ही है कि A to Z खबर ही खबर रहेंगा। उसकू अंदर में भी अच्छा खबर तो मिलता नहीं है। सब बुरा ही च बुरा खबर रहता है। एक बार मालूम है, इस दुनिया का सारा अखबार को न एक आदमी मंगल ग्रह पर ले के गया। तो मालूम है मंगल वाले ने जभी पढ़ा न वो अखबार को, तो वो लोग डर गए सब के सब। बोले तो, खबर है सरकार की मक्‍कारी का। जिसको ये लोग लिखते है लाचारी। बम फटने का। विस्फोटक मिलने का। एक्सीडेंट का। जान से मार देने का। बहू को जला देने का। लड़की लोग का इज्जत लूटने का। वो क्‍या बोलता है आनर किलिंग का। चोरी चपाड़ी तो छोड़ ई च दो। बाढ़ और सूखे का खबर तो होना ही होना। मतलब कुदरत का लाफा तो मंगल ग्रह पर भी लगता है। बोले तो भूकंप आता है, सुनामी आता है, बाढ़ आता है। पर आदमी का भेजा से निकला क्राइम। बाप रे बाप! मंगल वाले का हवा ई च निकल गया। वो बोला अरे बाप!! ये पृथ्वी लोक में आदमी रहते हैं कि राकशस रहते हैं। वो डर गया रे!! और पृथ्वी पर आ के घर बनाने का आइडिया ही उन लोग ने छोड़ दिया। बोले हम इदर ई च ठीक है। लाल रंग के हैं तो क्या हुआ। यह हरा और नीला रंग का पृथ्वी तो बम का माफिक है रे बाप!!!

Friday, July 30, 2010

खामोश! बारि‍श जारी है



जो भी मुंबई आता है उसे पहली ही बरसात में प्रेक्टिस हो जाती है कि अगर कहीं फंसे तो कई घंटों तक बुद्ध बनकर यथावत रहने के लिए तैयार रहो। जूते की दुकानों में अगर प्लास्टिक के जूते चप्पल इफरात में लटकते दिखनें लगें तो समझ जाइए बरसात आने वाली है। हर कोई अपने लिए एक जोड़ी चप्पल, जूता, सैंडल हर साल लेता है। न ले तो मेरे जैसा हाल हो जाए। पहली बरसात में चमड़े के जूते पहन कर सड़क पर उतर गया था। किंग्ज सल स्टेशन पहुंचे तो हार्बर लाइन बंद। माटुंगा रोड तक चल के जाना तय हुआ। एक साथी ने पहला काम किया, मुझे बरसाती पन्ही खिरदवाई। जूते की जोड़ी प्लास्टिक में लपेट कर बगल में खोंसी और पानी में खच्च-खच्च आवाज निकालते हुए चल पड़े। अंग्रेजी के जेड आकार का लोहे का लाल पुल पार करके वेस्टर्न लाइन के स्टेशन माटुंगा रोड पहुंचे। उन दिनों मैं आकाशवाणी में काम करता था। मुंबई में नया नया आया था। शहर अभी बेगाना और डरावना भी लगता था। डरपोक बच्चे की तरह किसी न किसी सहकर्मी की अंगुली पकड़ के चलता था। पहली बरसात में साथी के अलावा एक जोड़ी जूता भी हाथ में था। रेंगती हुई ट्रेन में महालक्ष्मी तक पहुंचे। उसके आगे पटड़ियां पानी में डूबी हुई थीं। टैक्सी ली। आठ बजे के चले हुए करीब बारह बजे दफ्तर पहुंचे। मैं देर से पहुंचने और नया अनुभव पाने से बड़ा खुश था।

एक बार आधी रात में बरसात में फंस गया। कवि विजय कुमार से शाम को सात बजे के करीब सायन स्टेशन पर मिला। ग्यारह बजे तक गप्पें मारते रहे। बारिश रुकी नहीं। फिर से दूसरे रेस्टोरेंट में बारह बजे तक बैठे रहे। उसके बाद लगा, अब तो चलना ही होगा। उन्हें स्टेशन पर छोड़ा। खुद एंटापहिल के लिए टैक्सी ली। जरा सी देर में टैक्सी वाले ने हाथ खड़े कर दिए। उतर कर पैदल चलना शुरू किया। कोलीवाड़ा हो के एंटापहिल के सैक्टर सात के लिए। घुटने-घुटने पानी में। आधी रात का वक्त। याद नहीं रास्ते में कोई मिला हो। गनीमत कि स्ट्रीट लाइट जल रही थी। करीब दो किलामीटर खुद को लकड़ी के ह्लाुंँदे की तरह ठेलते हुए घर पहुंचा। रात डेढ बजे।

पर सन् 2005 की बरसात तो एक हादसे की तरह घटी। उस दिन मैं अपने बड़े भाई भाभी और भतीजे को राजधानी एक्सप्रेस में बिठाने निकला था। टैक्सी ने एक किलोमीटर बाद ही हिम्मत हार दी। हम लोग जोगेश्वरी स्टेशन गए। उनके कपड़े के बैग वहीं पर भीग कर मन-मन भर के हो गए। लोकल ट्रेन में बैठ तो गए पर वो अंधेरी भी नहीं पहुंच सकी। अंधेरा होने लगा तो ट्रेन से कूदे और वापस जोगेश्वरी स्टेशन चल कर आ गए। वहां मेला लगा था। सामने सड़क पर खड़ी मोटरबाइक का सिर्फ हैंडल दिख रहा था। बड़ी देर बाद अक्ल आई कि पटड़ी-पटड़ी चलो, हमारा घर तो ट्रैक से सटा हुआ है। लोग चल ही रहे थे। हमने भी अटैची सिर पर लादे, बैग कंधे पर लटकाए और लौट चले। खुशकिस्मत थे, सही सलामत घर पहुंच गए। हमारी पड़ोसी की बेटी सांताक्रूज में अटक गई थी। वो अंधेरे में पैरों के चप्पू चलाते हुए गईं और जिगर के टुकड़े को ले के आईं। एक और पड़ौसी की पत्नी अगली सुबह घर पहुंची। अनगिनत लोग अगली सुबह ही घर पहुंच पाए। कुछ तो पहुंच ही नहीं पाए। हमारे इलाके में भैंसों के तबेले हैं। रात भर भैंसों के पगुराने की आवाजें आती रहीं। बेकली भरी। सुबह मेन रोड तक गए तो मंजर खौफजदा था। तबाही मची हुई थी। नाला कई कुछ बहा के ले गया था। भैंसों के फूले हुए शरीर छोड़ गया था। हारे हुए सिपाहियों की तरह लोग लौट रहे थे।

मुंबई जब भी किसी मुश्किल दौर से गुजरती है, उसकी चेतना जाग उठती है। इस बार भी लोगों ने लोगों की खूब मदद की थी। पानी, चाय, नाश्ता, सहारा, हिम्मत, शरण, जो जिसके बस में था, दिया। आज भी मन ही मन शायद हर कोई यह कामना करता है कि बरसात आए, झूम के आए पर उस तरह का कहर न बरपाए।

चित्र - हरबीर

इस टिप्‍पणी का संपादित अंश कादम्बिनी के जुलाई अंक में देखा जा सकता है.

Thursday, July 15, 2010

शिक्षा का अधिकार - उज्‍ज्‍वल भविष्‍य की उम्‍मीद


सूचना के अधिकार के बाद शिक्षा का अधिकार भी हमारे बुनियादी हकों में शामिल हो गया। महिला आरक्षण विधेयक भी कानून बनने की प्रक्रिया में है। ये ऐतिहासिक निर्णय हैं जो आने वाले समय की दिशा और दशा तय करेंगे। इन्हें हमारे सामाजिक जीवन की एक नई सकारात्मक शरुआत भी माना जा सकता है। ऊपरी तौर पर यह मामूली से निर्णय लगते हैं लेकिन सूचना के अधिकार की ही मिसाल लें तो यह एक ऐसा शक्तिशाली हथियार साबित हो सकता है जिसके बल पर सत्ता के लौह द्वार को खोलना भले ही संभव न हो, पर उसे जालीदार तो बनाया ही जा सकता है। शर्त यही है कि इस कानून का गलत इस्तेमाल करके इसे काउंटर-प्रोडक्टिव न बना दिया जाए।
जहां तक शिक्षा की बात है, शिक्षा इन्सान की कैमिस्ट्री ही बदल देती है। जीवन तो कुदरत से मिल जाता है पर जीवन जीने का सलीका शिक्षा देती है। यह हमारा दुर्भाग्य रहा है कि आज तक शिक्षा सबके लिए समान स्तर पर उपलब्ध नहीं रही। इसका व्यापक जन हित में उपयोग नहीं हो पाया। विशेषाधिकार के तौर पर दुरुपयोग ज्यादा किया गया। ऐसे में शिक्षा का यह बुनियादी अधिकार हमारी विकासयात्रा में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।
हमारे देश में जब आधुनिक शिक्षा व्यवस्था गांव-गांव में दस्तक दे रही थी, उसी समय उच्च-भ्रू लोगों के लिए अंग्रेजी पब्लिक स्कूलों की संस्कृति भी अपनी जड़ें जमा रही थी। आखिर अंग्रेज और उनके हाकिम यह कैसे बर्दाश्त कर सकते थे कि भारतीय देहाती और गंवारों के बच्चे उनके बच्चों की बराबरी करें। इसलिए दो तरह की शिक्षा व्यवस्था बनायी गयी जो आज तक अपने दोनों उद्देश्यों को पूरा कर रही है। एक तो यह कि आभिजात्य वर्ग की ऐंठन बरकरार रहे। उसकी संतानें नौकरों की संतानों की छूत से दूर रहें। दूसरे, पीढ़ी दर पीढ़ी मालिकों की संतानें मालिक, और नौकरों की संतानें नौकर बनती रहें। आजादी के बाद जैसे-जैसे मध्य वर्ग अमीर होता गया, अंग्रेजी पब्लिक स्कूलों की संस्कृति सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को तोड़ती गयी। और आज यह मरणासन्न अवस्था में है। इसके बरक्स देश के हर गली-कूचे में आपके बजट की शिक्षा की दुकान उपलब्ध है। ऐसे में शिक्षा के मौलिक अधिकार का कानून शायद सरकारी स्कूलों के लिए संजीवनी का काम कर जाए।
दरअसल होना तो यह चाहिए कि शिक्षा के अधिकार के साथ-साथ शिक्षा में बराबरी की बात की जाए। एक जैसी शिक्षा ही समतामूलक समाज का आधार रख सकती है। आज भी एक तरफ टाट-पट्टी पर और पेड़ के नीचे चलती वर्नाकुलर (देसी भाषाओं के लिए औवनिवेशिक गाली) यानी देसी भाषाओं की पाठशालाएं हैं जो बच्चों के साथ खिलवाड़ के सिवा शायद ही कुछ करतीं हों। दूसरी तरफ विदेशी बोर्डों के पांच सितारा स्कूल हैं जो विदेश जाने के एक्सक्लूसिव हाई-वे का काम करने वाले हैं। शिक्षा के सांस्कृतिक पहलू पर नजर डालें तो भारतीय शिक्षा का लार्ड मैकाले का प्रयोग पूरी तरह से सफल रहा है। उनकी शिक्षा व्यवस्था ने हमारे भीतर की भारतीयता का अंग्रेजीकरण कर दिया है। अब तो हमारी सारी सांस्कृतिक और भाषाई विरासत संकट में है। इस महादेश की बहुसंख्या खेतीबाड़ी पर निर्भर रही है। काश! हमारी शिक्षा दस हजार साल पुराने इस पारंपरिक पेशे को इज्जत से देखने का संस्कार दे पाती। शिक्षा ने अपने ही समाज को अपनी ही नजरों से गिराने का गुनाह किया है और बाबूगिरी की झूठी अकड़ सिखाई है। हमें ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनानी होगी, जो आधुनिक शिक्षा संदर्भों का भारतीयकरण करते हुए उन्हें हमारी शिक्षा और जनजीवन का हिस्सा बनाए।
शिक्षा के कानून को लागू करने के लिए भौतिक संसाधनों की जितनी जरूरत है, शिक्षा के सच्चे अर्थों की तलाश और उन पर अमल करने की उससे कहीं ज्यादा जरूरत है। सरकारी, गैर सरकारी और निजी क्षेत्र को मिलकर यह भगीरथ प्रयास करना होगा। जहां जहां, जो जो एजेंसी अच्छा काम कर रही है, उसके लिए और ज्यादा काम करने का माहौल मुहैया कराना होगा। आने वाले दशकों में भारत की युवा जनसंख्या विश्व में सबसे ज्यादा होने वाली है। युवा वर्ग को शिक्षा से ही सशक्त बनाया जा सकता है। अखिल समाज को अपने बच्चों को सुशिक्षित और चेतनासंपन्न व्यक्ति बनाने का संकल्प लेना होगा।
पिछले दिनों प्रेमकुमार धूमल के नेतृत्व में हिमाचल प्रदेश विधानसभा ने पहाड़ी भाषा को आठवीं अनुसूची हेतु अनुमोदित करने का प्रस्ताव बहुमत से पारित कर दिया (हालांकि विपक्ष उस समय सदन में मौजूद नहीं था)। प्रदेश के लिए यह एक ऐतिहासिक कदम है। देर आयद् दुरुस्त आयद्। पहाड़ी में लिखित साहित्य कम है पर वाचिक परंपरा का खजाना भरा हुआ है। उसे अक्षुण्ण रखने की जिम्मेदारी हम सब पर है। अब प्रदेश की सरकार और जनता को अगली रूपरेखा बना लेनी होगी। हमारा प्रस्ताव है कि इसे पहाड़ी ही कहा जाए। जम्मू में डोगरी है, उत्तराखंड में गढ़वाली कुमांउनी। पहाड़ी हिमाचल की ही है। दूसरे, जितना जल्दी हो, विश्वविद्यालय में पहाड़ी भाषा अध्ययन केंद्र बनाया जाए। तीसरे, भाषा संस्कृति अकादमी को सरकारी चंगुल से मुक्त करके नवजीवन प्रदान किया जाए। हिमभारती को नियमित और मासिक पत्रिका बनाकर पेशेवर हाथों में सौंपा जाए। युवा महोत्सवों और फैस्टिवलों में पहाड़ी भाषा को जगह दी जाए। रचनात्मक साहित्य के लेखन, प्रकाशन और विपणन की व्यावहारिक कार्य योजना बनाई जाए और लागू की जाए।
इस अंक में शिक्षा का अधिकार कानून पर आमुख कथा के साथ साथ हिमाचल के गुणी बांसुरीवादक राजेंद्र सिंह गुरंग से बातचीत है। यह बातचीत भी शिक्षा के सच्चे, गहन और वृहद् अर्थों को उद्भासित करती है। मेरी प्रिय कहानी में सुंदर लोहिया को प्रस्तुत करते हुए हमें प्रसन्नता है। साहित्यकार और कार्यकर्ता के तौर पर लोहिया युवा पीढ़ी के आदर्श हैं। विख्यात आलोचक चिंतक रमेश कुंतल मेघ के रेखांकन छापना हमारे लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं है। ये रेखांकन साठ वर्ष पूर्व उनकी युवावस्था के भावालोड़न हैं। आवरण को देश के विख्यात चित्रकार जे पी सिंघल की कृति से सजाने का सुअवसर पाना तो मानो सोने पे सुहागा है। आवरण के भीतरी पन्ने पर रंगीन चित्र विजय शर्मा की पहाड़ी कलम का कमाल है। इस बार कला-साहित्य के कुछ आयोजनों को कला-परिक्रमा में दिया जा रहा है। प्रदर्शनधर्मी कलाओं को हम समादृत करना चाहते हैं। विचार मंथन में केशव की कहानी पर और रेखा के पत्र के बहाने से पत्रिका में चित्रों पर विचार-विमर्श है। कुछ स्तंभ इस बार छूट गए हैं। अंक भी देरी से आ रहा है। इसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।

Tuesday, July 13, 2010

नालेज वालेज

मेरी पिराबलम बोले तो मालूम क्या है? मैंने इतना कागज खा ले लिया है न कि मेरे को नॉलेज बहोत हो गएला है। जो कागज मैं खाती है न, वो कोरा नई होता है। कोरा कागज तो पैसा दे के मिलता है। जो कागज छपेला होता है वो ई च रद्दी में बिकता है। उसमें नॉलेज की बात रहता है पन रद्दी में जाता है। मेरे को जादातर वो ई कागज मिलता है खाने को। और छपेला कागज दिमाग में जमा होता है रे। बोले तो कागज तो पेट में जाता है, गू बनने को। पन उसका छपेला अक्षर का दिमाग में दही बन जाता है। जब ये दही जादा हो जाता है न तो मेरा मुसीबत!! बाप रे बाप!!! तबी मेरे को कुछ लेक्चर देना ही मांगता। नहीं बोलेगी तो बिमार पड़ जाएगी। अभी सड़क पर बिमार गाई पड़ी रहेगी तो अच्छा लगेगा क्या? सारा ट्रैफिक रुक जाएंगा। लोग मजाक बनाएंगा। इस वास्‍ते, शहर की इज्जत के वास्ते मैं बिमार नहीं पड़ती। खड़ी रहती है अक्खा टाइम।

Friday, July 9, 2010

वर्षा अंक




हिमाचल मित्र का वर्षा अंक देर से ही सही (हर बार की तरह), आ गया है. करीब पैंतालीस लेखकों की रचनाओं और जे पी सिंघल, विजय शर्मा के चित्र और रमेश कुंतल मेघ के रेखाचित्रों से सजे 108 पृष्‍ठों के इस अंक की विषय सूची यहां दी जा रही है. अगर व‍िषय सूची देखकरआपको इसे पढ़ने का मन करे तो हमें अपना पता यहां ईमेल करें - himachalmittra@gmail.com हम आपको अंक भेज देंगे.

आमुख कथा – शिक्षा का अधिकार - उज्जवल भविष्य की उम्मीद : शिरीश खरे॥

बातचीत - बांसुरी वादक राजेंद्र सिंह गुरंग॥

लोक संस्कृति - हिमाचली लोक साहित्य में मुक्तक गीत : कृष्ण चंद्र महादेविया॥ हिमाचली कोकिला - वर्षा कटोच॥ लाहौल स्पिति में विवाह समारोह के दौरान खान-पान : उरज्ञान छैरिंग मैलगपा॥

अनुगूंज – छत्‍तीसगढ़ की संस्‍कृति : शरद कोकास ॥

मेरी प्रिय कहानी – सतखसमी : सुंदर लोहिया॥ टिप्पणी : निरंजन देव॥ बातचीत : मुरारी शर्मा॥ कल्पना की उड़ान ने खिंचवाई रेखाएं : रत्नचंद रत्नेश॥ रमेश कुंतल मेघ के रेखांकन॥ कविताएं : जसवंत सिंह विरदी॥ कुलदीप शर्मा॥ भास्कर चौधरी॥ हंसराज भारती॥ सिद्धेश्वर सिंह॥ कहानी : बद्री सिंह भाटिया॥ परिचर्चा - साहित्यकार, साहित्य और समाज : एस.आर.हरनोट॥ सुरेश सेन निशांत॥ मुरारी शर्मा॥

विचार मंथन 1- कुछ भी (क्यों) नहीं देखा – केशव की कहानी: सुधीर भड़कमकर॥ केशव॥ निरंजन शर्मा॥ मधुकर भारती॥ विचार मंथन 2- पत्रिका की साज सज्जा: रेखा॥ हरि मृदुल॥ मनोज शर्मा॥

पहाड़ी कलम- पहाड़ी अनुवाद के साथ हिंदी कविता - स्थित प्रज्ञ : यश मालवीय॥ केशो ज्ञानी की कुंडलियां॥ पवनेंद्र पवन दे छंद॥ रेखा ढडवाल दे गीत॥ गल सुणा : अनूप सेठी॥ चाचू भतीजू: गप्पी डरैबर॥ वातायन खुले रखने होंगे (पहाड़ी भाषा पर चर्चा) : डॉ. गौतम व्यथित॥ डॉ. प्रत्यूष गुलेरी॥ कुछ समरूप बोलियां : केशवचंद्र॥

करियर कैफे- सुदर्शन वात्यायन॥

भूगोल से आगे- एक अनूठा विचार मंदिर : राजीव त्रिगर्ती॥ नूरपुर का नगीना : बी कृष्णा॥ पझोता आंदोलन : आचार्य ओमप्रकाश राही॥ छात्र समीक्षकों के बीच: मोहन साहिल॥

यात्रा- हिमाचल दर्शन : शैलेश सिंह॥

आस्वाद और परख- मनोज शर्मा की कविताओं पर तरसेम गुजराल॥ कैलाश आहलूवालिया की कहानियों पर महमूद अयूबी और डॉ. परेश॥ वेद राही के डोगरी हिंदी उपन्यास पर अग्निशेखर॥ केशव के अंग्रेजी उपन्यास पर ईषिता आर. गिरीश॥ रमेश उपाध्याय के निबंध पर डॉ. वत्सला शुक्ल॥

कला परिक्रमा में जे पी सिंघल और विजय शर्मा की चित्र प्रदर्शनी, रमा वैद्यनाथन के नृत्‍य, दयाल प्रसाद निर्देशित नाटक, मोहित चौहान की एलबम, सेतु और संबोधन पत्रि‍काओं पर टिप्‍पणियां ॥ गतिविधि॥ वैवाहिकी॥

परिवर्तन की पदचाप : आर. बी. राणा॥

Thursday, July 1, 2010

भूख

मेरी पिराबलम बोले तो मालूम क्या है? अक्खा दिन मेरे कू कागज खाना पड़ता है। काए कू ? बोले तो सड़क पर घास नहीं उगता है न। इसी के वास्‍ते। अब तुम यह पूछेगा कि कागज जास्ती खाती है कि पिलास्टिक, तो बताना जरा मुसकिल गिरेगा। वो इस वास्‍ते कि जभी भूख लगी हो तभी जो भी मिल जाए, खाना ई च पड़ता है। तू बोल, दिल पे हाथ रख के बोल, भूख लगने पर खाता है कि खाने का टेम हो गएला है, इसके वास्ते खाता है। दूसरा बात भी है रे। भूख लगने पर तेरे पास चॉइस है क्या? यह खाएंगा वो नहीं खाएंगा? कि खाना ई च नईं है? बहोत लोक है हमारे महान मुलुक में, जिनको एक टैम भी खाना नसीब नहीं होता। पर जाने दे। मैं तो गाई माई है। हज्‍जार साल से सब लोक मेरी पूजा करते। मैं ई कागज और पिलास्टिक खाती है तो दूसरे के बारे में क्या बोलेगी।

Friday, June 25, 2010

बारिश का स्‍वागत


एक और कोशिश

गोवर्धन अंगुली पर धारा, पांचाली का चीर बढ़ा आता
मात पिता, गुरू, बंधु, सखा आशीष, ज्ञान, प्रेम मिल जाता
बुद्ध, मार्क्‍स, गांधी का साया सिर पर, जीवन राह दिखाता
क्‍यों सखी साजन, न सखी यह अति सुंदर तम-हर छाता

Thursday, June 24, 2010

बारिश का स्‍वागत

चित्र साभार


मुंबई में अंबर बरस रहा है मजे से. निचले इलाकों में पानी भी भर रहा है, आटो टेक्‍सी वाले भी एक डेढ दिन रूठे रहे. पर सारी जनता मस्‍त है. सामान्‍य स्‍थिति होती तो अब तक चिल्‍ल पौं मच गई होती. पिछले साल की कम बारिश और उसके बाद पानी की कम आपूर्ति से सब सहम गए हैं. आखिर पानी की कुछ तो वकत पड़ी. इसी ख्‍याल से यहां छाते और बारिश की बात की थी. अमीर खुसरो को याद करते हुए. गजल गो द्विजेंद्र द्विज ने उस बात को अपने अंदाज में रखा. अब देखिए बर्फ के प्रदेश लाहुल स्पिति से संजीदा युवा कवि अजेय ने यही ख्‍याल अपने अंदाज में रखा है.

सर धर लो तन भीग न पाता
कड़ी धूप में छांह दे जाता
छड़ी बने डर पास न आता
क्‍यों सखी साजन, न सखी छाता

Sunday, June 20, 2010

बारिश का स्‍वागत

भाई द्विजेंद्र द्विज ने छाते की महिमा जरा दूसरे ढंग से गाई है. जरा देखिए तो -

छरहरा छड़ डर पास न आता
ओढ़ो तो तन भीग न पाता
धूप में छाया भी दे जाता
क्यों सखी साजन? न सखी छाता

Thursday, June 17, 2010

बारिश का स्‍वागत




सिर पर धर लो तन भीग न पाता

हो जब धूप कड़ी तब छाया दे जाता

छरहरी छड़ी बने डर पास न आता

क्‍यों सखी साजन न सखी छाता


रेखांकन सुमनिका का और पंक्तियां अमीर खुसरो की याद में


Wednesday, June 2, 2010

कवि होना उतना ही कठिन है जितना एक अच्छा इन्सान होना




कवि मोहन साहिल की शिमला से करीब चालीस किलोमीटर दूर ठियोग कस्‍बे में चाय की दुकान है. पिछले दिनों कुल्‍लू में एक सेमिनार हुआ जिसमें एस आर हरनोट, अजेय, सुरेश सेन निशांत, मोहन साहिल, ईषिता गिरीश आदि की रचनाओं पर डिग्री कालेज के छात्र-छात्राओं ने परचे पढ़े. इस प्रोग्राम में छात्र ही समीक्षक थे. हिमाचल मित्र के लिए मोहन साहिल ने इसकी रिपोर्ट लिखी. इस रिपोर्ट में कवि और कविता के बारे में मोहन के विचार भी थे. लगा कि इन बातों को यहां भी रखा जाना चाहिए. यह एक ठेठ पहाड़ी कस्‍बे में छोटी सी चाय की दुकान चलाने वाले कवि के विचार हैं. कवि का पेशा बताने का मकसद यह कि आलकल ज्‍यादातर कवि बाबू किस्‍म की छोटी बड़ी नौकरियों में हैं. हिमाचल के दो और कवि अजेय और सुरेश सेन निशांत भी इधर सबका ध्‍यान खींच रहे हैं. वे भी सरकारी नौकरी में हैं. ऐसे में मोहन के विचारों को पढ़ना दिलचस्‍प है.

कवि भी एक साधारण इन्सान है जो रोजमर्रा की उन सभी बातों का सामना करता है जो बाकी सभी लोग करते हैं। मगर कवि होना उतना ही कठिन है जितना एक अच्छा इन्सान होना। कवि का एक अपना संसार है जिसमें वह अपना न्यायाधीश स्वयं है। कवि अपनी गलतियों की सजा स्वयं को देता है। दोबारा गलती न करने की कसम खाता है। कवि के मन-मस्तिष्क में एक युद्ध सदा चलता रहता है। इस युद्ध में वह कई बार घायल होता है मगर स्वयं को मरने नहीं देता। क्योंकि वह उपचार भी जानता है। बाहरी तौर पर लगता है कि एक कवि अभावों, उदासी तथा बेचैनी का शिकार है मगर यह स्थिति एक मधुमक्खी के छत्ते की तरह है जिसके भीतर लगातार शहद बन रहा है। यह शहद कविताओं के रूप में लगातार टपकता रहता है और कवि मन अपने आसपास के हर अच्छे-बुरे अनुभवों का पराग एकत्र करता रहता है। अच्छी कविता की रचना के लिए स्वयं को अच्छा बनाए रखना बड़ी चुनौती है और इसके लिए वह सब खोना पड़ सकता है जो आम व्यक्ति पाना चाहता है। दुनिया के बहाव के साथ चल पाना और सब कुछ होते रहने देना कवि को मन्जूर नहीं। कवि की पीड़ा, उसका आन्तरिक संघर्ष, समाज तथा धरती के हर जीव, निर्जीव के लिए उसकी संवेदनाएं ही उसकी पूंजी है। यह पूंजी खो न जाए यही कवि का सबसे बड़ा भय है। यह भय आज के दौर में और भी ज्यादा है क्योंकि इसी पूंजी को बचाना मुश्किल हो रहा है। अगर यह पूंजी है तो कविता स्वयं आती है। कवि एक नट की तरह है जिसका हर कदम रस्सी पर सही पड़ना चाहिए। अगर वह ऊंचाई से एक बार गिरता है तो उसके भीतर की सब कोमलताएं मर सकती हैं। कवि क्या काम करता है कहां रहता है यह सब बेमानी है। असली संसार उसके भीतर है जिसे कोई नहीं छू सकता, न नष्ट कर सकता है। इस संसार को कवि स्वयं ही चाहे तो उजाड़ ले।

Monday, March 22, 2010

किंतु परंतु लेकिन फिर भी आओ साथी सपना देखें



पृथ्‍वी थियेटर में कल शाम (21 मार्च 6 बजे का शो) एक नाटक देखा, आओ साथी सपना देखें. दो साल पहले पृथ्‍वी फैस्‍टीवल में जब यह पहली बार खेला गया था, तो देखना था पर छूट गया. कल मौका मिला. वह भी बच्‍चों के साथ. दस, चौदह और सत्रह साल के तीन बच्‍चे हमारे साथ थे. मजे की बात है के तीनों बच्‍चों को नाटक अव्‍छा लगा. सुमनिका को भी पसंद आया. मुझे हमेशा की तरह किंतु परंतु का सामना करना पड़ा.

नाटक दिल्‍ली के चांदनी चौक के बैजू खान और गौरेया की प्रेम कहानी है. बैजू के पिता मियां खान बैंड मास्‍टर हैं. गैरेया के पिता चिरौंजी लाल गुप्‍ता की परचून की दुकान है. बहुमुखी नामक सूत्रधार कहानी सुनाता है. सारा नाटक गीत-संगीत मय है.

पहले इस जोड़े का प्रेम घर की छत पर बनी दीवारों को फांद कर पनपता है. मियां खान और गुप्‍ता को लोग एक दूसरे का दुश्‍मन समझते हैं जबकि वे दोस्‍त हैं. उनका निष्‍कर्ष है कि बच्‍चों से जो काम कराना हो, उसके लिए मना करो. अगर वे खुद को एक दूसरे का दुश्‍मन न दिखाते तो समधी न बन पाते. लड़की को अपनी सोलह साल की उमर के सिवा और कुछ नहीं सूझता. बैजू यूं तो बैंड में झुनझुना बजाता है, पर उसमें कलाकर बनने की ललक है. जीवन के सुख दुख दिखाने के लिए बैजू को संघर्ष करते दि‍खाया गया है. वह दो असफल कलाकारों के हत्‍थे चढ़ जाता है और हार और तजुर्बा लेकर लौटता है. पहले ये दोनों इसे सबक सि‍खाते हैं और बाद में यह इन दोनों को अपना गुलाम बना लेता है. पहले जहां वह पहलवान से पिट कर भागता है, लौट कर पहलवान को पीट कर महबूबा को हासिल कर लेता है.


दर्शकों ने बहुत तालियां बजाईं. नाच गाने पर, चटपटे, कुरकुरे, खस्‍ता, सटीक-सटाक संवादों पर, नृत्‍य पर और मजाक मजाक में नृत्‍य की और अभिनय की टांग तोड़ने पर. निर्देशक ने तालियां बटोरने के लिए ये सब करतब किए थे. हल्‍के फुल्‍के खेल के लिए स्‍टैंडिंग ओवेशन. इतनी जोर से और इतनी देर तक कि अंत में अभिनेताओं के नाम भी सुनाई नहीं पड़े.


किंतु परंतु

साथी को सपना देखने के लिए बुलाया जा रहा है और सपना वही पुराना घिसा-पिटा प्रेमी प्रेमिका का मिलना, बिछुड़ना और अंत में फिर मिलना. यह जिंदगी में भी होता है पर बहुत अलग तरह से होता है. इस नाटक में जीवन का स्‍पर्श सिर्फ कुछ जगह दि‍खता है, जब दो असफल कलाकारों को अपहरण का सीन करने के‍ लिए बुलाया जाता है. बाकी तो सब गुडी गुडी, नकली नकली, पर झिलमिलाता हुआ.

लेखक ने भाषा पर इतनी मेहनत की है पर दि‍शाहीन. कथ्‍य नजर ही नहीं आता. हिंदू मस्लिम विवाद से भी वो साफ बच गया है. इतनी भर टिप्‍पणी है कि अगर रिश्‍ता टूट गया तो लोग बखेड़ा खड़ा कर देंगे. हालांकि बीच-बीच में टिप्‍पणियां बड़ी प्रासंगिक और चुभती हुई हैं. भाषा में रवानी है, फूहड़ता नहीं है, द्विअर्थी नहीं है (जिसके शिकार नाटक वाले अक्‍सर हो जाते हैं), संवाद सटीक और चुस्‍त हैं. पर अफसोस! भाषा के ये जुगनू नाटक में कोई रोशनी पैदा नहीं करते. नाटक कुल मिलाकर हंसी खुशी भरा ड्रामा बन कर रह जाता है.

चूंकि नाटक गीत-संगीतमय है, इसलिए नृत्‍य उसका हिस्‍सा है. ऐसा लगता है कि नृत्‍य निर्देशक ने बड़ी मेहनत की है. किंतु आजकल के फिल्‍मी डांस का असर पूरी दृश्‍यावली को अपने प्रभाव में ले लेता है. यूं गाने कथा को आगे बढ़ाने वाले हैं, संगीत नाटक की तरह का ही है, ढोलक, तबला, डफ, पेटी और क्‍लेरनट के साथ. पर बीट और नाच पर टीवी का असर दिखता है, जहां नृत्‍य झटकेदार होता है, जहां ठुमके में लचक कम और झटका ज्‍यादा होता है. इससे नाटक अपनी पहचान खोता है. ऊपर से अभिनेताओं की देह जिम-पकी है, पसीना-पगी और धूप-जली नहीं है. उनके मैनरिज्‍म भी टीवी –फिल्‍मों वाले हैं. वैसे यह समस्‍या सिर्फ इसी ग्रुप की नहीं है. सबके यही हाल हैं. यहां पर ऐसा लगता है कि अब नाटक का स्‍वतंत्र अस्तित्‍व नहीं है, टीवी फिल्‍म है इसलिए नाटक भी है.

इन सब के बीच चिरौंजी लाल गुप्‍ता का चेहरा मोहरा, कपड़ा लत्‍ता और अभिनय प्रामाणिक है. सूत्रधार का साथी गजब का अभिनेता है. उसमें लोच है, ऊर्जा है, ठहराव है और पकड़ भी है. वह बैंड मास्‍टर के क्‍लेरनट के सुर को मूर्त करता है. यह संकल्‍पना और इसका अभिनटन दोनों की बहुत अच्‍छे हैं, अनोखे भी.

असल में ऐसा लगता है कि अगर इस नाटक का शीर्षक कुछ और होता तो किंतु परंतु का सवाल खड़ा नहीं होता. शायद नाटक देखने ही न जाता. ह‍म सपना देखने गए और मिला नाच-गाना. तो लगता है कि क्‍या अब हमारे रचनाकारों ने भी बड़े सपने देखने बंद कर दिए हैं ? रचनाकारों ही ने क्‍यों दर्शकों ने भी इस स्थिति को स्‍वीकार कर लिया है. वरना लगभग हाउसफुल और तालियों की छतफोड़ गड़गड़़ाहट क्‍यों होती ?

चित्र मुंबई थियेटर गाइड से साथार