Thursday, October 22, 2009

तदेउष रोज़ेविच की कविताएं

संक्षिप्‍त परिचय

1921 में जन्मे पोलिश कवि, नाटककार और उपन्यासकार तदेउष रोज़ेविच बहुमुखी प्रतिभा के विश्व के सर्वाधिक महत्वपूर्ण साहित्यकारों में से एक हैं। रोज़ेविच कविता और नाटक के क्षेत्र में आवांगार्द के भी अग्रदूत माने जाते हैं। वे एक ऐसे नवपर्वतक हैं जिनकी जड़ें रोमैंटिक परंपरा में मजबूती से जमी हैं। वे एक ऐसा स्वतंत्रचेता कलाकार हैं जो आम राय के दवाब में नहीं आता और जो राजनीति से भी परे रहता रहा है। वे नितांत एकाकी हैं, कला के प्रति उनका दृढ़ विश्वास ऐसा है कि यह जैसे आंतरिक ध्यानावस्था है, भीतरी सतता है और नैतिक संवेदनशीलता है।

रोज़ेविच दूसरे महायुद्ध में पोलैंड की सेना में एक सैनिक थे। उनका भाई भी सैनिक था। वह 1944 में नाज़ी यंत्रणा शिविरों में गोस्टापो द्वारा मारा गया। रोज़ेविच बच गए। बहुत से लोग यह सवाल पूछते हैं कि इन यंत्रणाओं (ऑश्विच) के बाद क्या कविता संभव है? रोज़ेविच ने इसका अपनी तरह से उत्तर दिया है। उनके मुताबिक कविता नई तरह का प्रतिबंधित किस्म का पद्य है। साहित्यिक पोलिश में इसे गद्यात्मकता का चौथा तरीका कहा जाता है। यह इनकी एंक्ज़ाइटी (1947) और अ रेड ग्लोब (1948) में मिलता है। हमारा बड़ा भाई नाम के कहानी संग्रह से, जो 1950 के बाद कई जिल्दों में छपे, पता चलता है कि उन्होंने दूसरे महायुद्ध के नतीजों को कभी स्वीकार नहीं किया। ये संग्रह उसी बड़े भाई को समर्पित हैं जो यातना शिविर में मारा गया था। रोज़ेविच ने मानवीय क्रूरता के समकालीन उदाहरणों को उजागर किया है। रोज़ेविच कविता में नए नए रूपों की तलाश करते रहे हैं। इन दिनों वे काव्यात्मक आत्मकथा लेखन में लगे हैं इसमें विमर्श की संभावना रहेगी और अस्तित्व पर भाष्य करते समय कला और जीवन की हदें आपस में विलीन हो जाएंगी। यह सब होगा, हालांकि कवि का यकीनी तौर पर मानना है कि इस तरह का भाष्य नामुमकिन है और कविता अभिव्यक्ति से परे का इलाका है। रोज़ेविच एक बेचैन कर देने वाले कवि हैं जो परिभाषाओं से बचते हैं और काव्यात्मक फंदों को खारिज करते हैं। उन्हें रहस्यवादी लेखक जैसा कुछ कहा जा सकता है। वे आवांगार्द के क्लासिक हैं, उत्तर-आधुनिकता के अगुआ हैं और भीतरी अनुभव के अन्वेषक हैं। वे एक ऐसे कवि हैं जिनके लंबे जीवन ने रहस्य के द्वार खोल दिए हैं।

यह परिचय इंटरनेट पर अंग्रेजी में उपलब्‍ध लेख के आधार पर लिखा है. कवि के चित्र भी इंटरनेट से साभार लिए हैं. इस चित्र में रोजेविच गुंटर ग्रास के साथ हैं. कविताओं का भी अंग्रेजी से अनुवाद किया है. और ये कविताएं कुछ वर्ष पहले विपाशा में छपी थीं.

Tuesday, October 20, 2009

तदेउष रोज़ेविच की कविताएं

यहां पर विश्‍वप्रसिद्ध कवि तदेउष रोजेविच का परिचय दूं , उससे पहले उनकी यह कविता पढ़ ली जाए. इससे बात जरा पूरी सी हो जाएगी. कवि यहां बुरे कवि का मजाक उड़ा रहा है, कि मृत्‍यु किसी बुरे कवि को महान कवि नहीं बना देगी. इस श्रृंखला की पांचवी कविता में भी कवि इस युक्ति का प्रयोग करता है जहां वो कहता है संसार के खात्मे के बाद / अपनी मौत के बाद / मैंने पाया खुद को जिंदगी की मझधार में / मैंने रचा खुद को / घड़ी जिंदगानी... इस तरह से दुनिया और जिंदगी को दूर से देखा जा रहा है. निरपेक्ष भाव से. हमारे यहां भी अनासक्ति और निर्लिप्‍तता की बात की जाती है. पर क्‍या अनासक्‍त होकर कविता लिखी जा सकती है? हां, क्‍यों नहीं. पहले के कवि कहते ही थे, बात को पकने दो. अनूभूति को अनुभव में बदलने दो. अनुभव हम से अलग एक पिंड ही तो होता है. खैर! आइए, ये कविता पढ़ते हैं - छोटी सी है.

8

प्रूफ

मृत्यु सुधारेगी नहीं

कविता की एक भी पंक्ति

वह कोई प्रूफ रीडर नहीं है

वह कोई सहानुभूतिशील

महिला संपादक नहीं है

एक बुरा रूपक अविनाशी होता है

घटिया कवि जो मर गया है

है एक घटिया मृत कवि

एक बोर मरने के बाद भी बोर करता है

बेवाकूफ कब्र के पार से भी

लगाए रखता है अपनी बकबक।

Friday, October 16, 2009

तदेउष रोज़ेविच की कविताएं

7
क्‍या किस्‍मत

क्या किस्मत है, चुनूं

रसभरियां जंगल में

मैंने सोचा

न है जंगल न रसभरियां

क्या किस्मत है, जा सोऊं

पेड़ की छांह तले

मैंने सोचा

पेड़ देते नहीं अब छाया

क्या किस्मत है, मैं हूं संग तुम्हारे

दिल धड़के मेरा

मैंने सोचा

आदमी के है नहीं दिल।

Thursday, October 15, 2009

तदेउष रोज़ेविच की कविताएं

6
रूपांतरण

मेरा छोटा बेटा आता है

कमरे में और कहता है

'तुम गिद्ध हो तो मैं चूहा '

मैं अपनी किताब फेंकता हूं परे

डैने और पंजे उग आते हैं मुझमें

उनकी अपशगुनी छाया

दीवारों पर दौड़ती है

मैं हूं गिद्ध वह है चूहा

'तुम हो भेड़िया मैं हूं बकरा '

मैंने मेज का चक्कर लगाया

और मै हो गया भेड़िया

खिड़की के पल्ले चमकते हैं

जैसे विषदंत

अंधेरे में

वह दौड़ता है मां की तरफ

निरापद

उसका सिर छुपा हुआ उसकी पोशाक की गर्माहट में

Wednesday, October 14, 2009

तदेउष रोज़ेविच की कविताएं

5
जिंदगी की मझधार में

संसार के खात्मे के बाद

अपनी मौत के बाद

मैंने पाया खुद को जिंदगी की मझधार में

मैंने रचा खुद को

घड़ी जिंदगानी

लोग मवेशी और धरती के नजारे

यह मेज है मैं कह रहा था

यह एक मेज है

मेज पर रखी है ब्रेड और छुरी

छुरी से ब्रेड काटी जाती है

लोग पोसते हैं खुद को ब्रेड से

आदमी से मुहब्बत करनी चाहिए

मैं रात दिन सीख रहा था

किससे मुहब्बत करनी चाहिए

मैंने जवाब दिया आदमी से

यह एक खिड़की है मैं कह रहा था

यह एक खिड़की है

खिड़की के पार एक बागीचा है

बागीचे में मुझे दिख रहा है एक सेब का पेड़

सेब का पेड़ फूलता है

फूल झर जाते हैं

फल आने लगते हैं

वे पकते हैं

मेरे पिता एक सेब तोड़ रहे हैं

वह आदमी जो तोड़ रहा है सेब

मेरा पिता है

मैं घर की देहलीज पर बैठा था

वह बूढ़ी औरत जो

बकरे को रस्सी से खींच रही है

ज्यादा जरूरी है

और ज्यादा कीमती

संसार के सातों आश्चर्यों से

जो कोई सोचता और महसूस करता है

कि वह नहीं है जरूरी

उस पर एक कौम के कत्ल का पाप है

यह आदमी है

यह पेड़ यह ब्रेड

लोग पोसते हैं खुद को

जिंदा रहने के लिए

मैं अपने आप में दोहरा रहा था

मानव जीवन जरूरी है

मानव जीवन का बड़ा महत्व है

जीवन का मूल्य

आदमी की बनाई चीजों से ज्यादा है

आदमी है एक महान खजाना

मैं दोहरा रहा था

एक जिद्द की तरह

यह पानी, मैं कह रहा था

मैं हाथ से लहरों को थपक रहा था

और नदी से बतिया रहा था

पानी, मैंने कहा

बढ़िया पानी

यह मैं हूं

आदमी ने जल से बात की

चांद से बात की

फूलों से बारिश से

उसने पृथ्वी से बात की

पंछियों से

आसमान से

आकाश मौन था

अगर उसने सुनी आवाज

जो प्रवाहित हुई

नदी से पानी से आकाश से

यह आवाज थी दूसरे आदमी की

Monday, October 12, 2009

तदेउष रोज़ेविच की कविताएं

4
एक मुलाकात

मैं उसे पहचान नहीं पाया

जब मैं यहां आया

हो सकता है यह भी हुआ हो

इन फूलों को सजाने में इतनी देर लगी

इस बेडौल गुलदान में

'मुझे इस तरह न देखो '

उसने कहा

मैंने छेड़ा कटे बालों को

अपने खुरदुरे हाथ से

'उन्होंने काट दिए मेरे बाल '

उसने कहा

'देखो उन्होंने मेरे साथ क्या कर डाला '

अब फिर से वह आसमानी रंग का झरना

फड़कने लगा है उसकी गर्दन की पारदर्शी

त्वचा के नीचे हमेशा की तरह

जब वह आंसू पी जाती है

वो इस तरह एकटक देख क्यों रही है

मुझे लगता है चले जाना चाहिए

मैं कुछ ज्यादा ही जोर से बोल देता हूं

और मैं निकल आता हूं

मेरे गले में एक थक्का है।

Saturday, October 10, 2009

तदेउष रोज़ेविच की कविताएं

3

हमें माफ करो

भूल जाओ हमें

हमारी पीढ़ी को भूल जाओ

इंसानों की तरह जीओ

बिसर जाओ हमें

हमने डाह की

पेड़ों और पत्थरों से

हम जले कुत्तों से

बल्कि बन जाऊं मैं चूहा

तब मैंने कहा उसे

मैं तो बल्कि रहूं ही न

और मैं जाऊं सो

और जागूं जब युद्ध हो चुका हो

वो बोली आंखें बंद किए किए

भूल जाओ हमें

मत पूछो हमारी जवानी के बारे में

हमें माफ करो।

Friday, October 9, 2009

तदेउष रोज़ेविच की कविताएं

2
एक आवाज

वे काट पीट डालते हैं वे यातना देते हैं एक दूसरे को

चुप्पियों से लफ्जों से

मानो कि एक और जीवन हो

जीने को

वे ऐसा करते हैं

मानो कि वे भूल गए हों

कि उनके शरीर

मर जाएंगे एक दिन

कि इंसान का अंतरमन

जरा से में टूट जाता है

एक दूसरे के लिए बेरहम

वे कमजोर हैं

पेड़ पौधों और जानवरों से

मारे जा सकते हैं एक शब्द से

एक मुस्कान से एक नजर से।

Thursday, October 8, 2009

तदेउष रोज़ेविच की कविताएं

1.बचा हुआ

मैं चौबीस का हूं

कसाईखाने में ले जाया गया

मैं बच गया

ये खोखले समानार्थी शब्द हैं

इंसान और जानवर

प्यार और नफरत

दोस्त और दुश्मन

अंधकार और प्रकाश

एक सा तरीका है इंसानों और जानवरों को मारने का

मैंने देखा है :

कटे पिटे लोगों से लदे ट्रकों के ट्रक

वे बचाए नहीं जाएंगे।

विचार महज शब्द हैं :

गुण और गुनाह

सच्च और झूठ

खूबसूरती और बदसूरती

हिम्मत और कायरता

गुण और गुनाह का वजन है बराबर

मैंने देखा है :

इंसान में जो था गुनहगार और गुणवान भी

मिले मुझे कई गुरू

जो मुझे फिर से देखने सुनने बोलने के काबिल बनाए

वस्तु और विचार को नाम दे फिर से

ज्योति से अंधेरा दूर करे

मैं चौबीस का हूं

कसाईखाने में ले जाया गया

मैं बच गया।

Tuesday, September 8, 2009

कविवर


मैं पहली पंक्ति लि‍खता हूं
और डर जाता हूं राजा के सिपाहियों से
पंक्ति को काट देता हूं

मैं दूसरी पंक्ति लिखता हूं
और डर जाता हूं गुरिल्‍ला बागियों से
पंक्ति को काट देता हूं

मैंने अपनी जान की खातिर
अपनी हजारों पंक्तियों की
इस तरह हत्‍या की है
उन पंक्तियों की रूहें
अक्‍सर मेरे चारों ओर मंडराती रहती हैं
और मुझसे कहती हैं : कविवर !
कवि हो या कविता के हत्‍यारे

सुना था इंसाफ करने वाले हुए कई इंसाफ के हत्‍यारे
धर्म के रखवाले भी सुना था कई हुए
खुद धर्म की पावन आत्‍मा की
हत्‍या करने वाले

सिर्फ यही सुनना बाकी था
और यह भी सुन लिया
कि हमारे वक्‍त में खौफ के मारे
कवि भी हो गए
कविता के हत्‍यारे.