Tuesday, August 25, 2009

कमीने से उठते सवाल

जो सवाल सच का सामना धारावाहिक के बारे में उठ रहे थे, वे कमीने फिल्म के संदर्भ में और तीखे होकर चुभ रहे हैं। फिल्म में हिंसा का खेल है। जमकर। फोटोफिनिश। बेहद रीयलिस्टिक। शायद इसी वजह से विशाल भारद्वाज के प्रशंसक इसकी तुलना हॉलीवुड की फिल्मों से कर रहे हैं। और खुश हो रहे हैं। हिंसा? खालिस हिंसा। शरीर का कोई मोल नहीं। जिंदगी का कोई मानी नहीं। फोड़ के रख दो। सोचो मत। अंत में जब सारे खलनायक इकट्ठा होकर गोलीवारी करते हैं, तभी थोड़ा बहुत ड्रामा दिखता है। एक्शन या स्टंट फिल्मों में इसी तरह का ड्रामा और मेलोड्रामा दर्शक को कॉमिक रिलीफ देता है। लेकिन कमीने के प्रशंसकों को फिल्म का यह हिस्सा बेकार लगता है। ठकाठक मारकाट ने उनका मन मोह लिया है।

हमारे लिए यह विशाल भारद्वाज का सिनेमा से डिपार्चर है। उनके प्रशंसकों के लिए यह उनका मेनस्ट्रीम में आगमन है। यह विडंबना है। लेकिन सच है। हमने ब्लू अंब्रेला और मकड़ी का फिल्ममेकर खो दिया। शेक्सपीयर के ड्रामों की आधुनिक भारतीय समाजिक व्याख्या करने वाला रीयलिस्टिक फिल्ममेकर खो दिया।

मकबूल भी हिंसा में बुझी हुई फिल्म थी। अपराध और नाजायज रिश्तों का ड्रामा। ओमकारा में अपराध, हिंसा और नाजायज रिश्तों में राजनीति भी जुड़ गई। यह भी डिस्टर्बिंग फिल्म थी। इसमें एक तरह का भदेस और नंगापन था। दर्शक सहम जाता था। पर आखिर उसमें कहीं पे फिर भी ड्रामा बचा हुआ था। जहां आपको लगता था आप फिल्म देख रहे हैं।

कमीने में अलग तरह का यथार्थ है। भयावह। अपराध के कई स्तर हैं। चार्ली (शाहिद कपूर) रेसकोर्स का छुटभैया खिलाड़ी है। इसी धंधे के कई और खिलाड़ी हैं। एक एक सीढ़ी ऊपर के। नायिका का भाई मराठी दादा है। इसका मकसद अपराध से बरस्ता रीयल इस्टेट, राजनीति में जाने का है। फिर गर्द और तस्करी का अंतर्राष्ट्रीय जाल है। पुलिस के बड़े अधिकारी तस्करों के लिए काम कर रहे हैं। नायक डबल रोल में है। लाबारिस जुड़वां भाई। एक भाई अपराध की अंधी गली में गर्क हो रहा है। दूसरा तथाकथित सभ्य समाज में अपलिफ्ट होना चाहता है। लेकिन नायिका के फेर में अपराधियों के चंगुल में फंस जाता है। हर तीसरी एक्शन फिल्म में तकरीबन ऐसी ही कहानी तो होती है।

मतलब कहानी में कोई नयापन नहीं है। बस मारकाट, वीभत्स हंसी और निर्मम हत्याएं हैं। जबरदस्त तरीके से एडिट की हुई। ठकाठक। दर्शक को फुर्सत ही नहीं मिलती कि वह कुछ सोच पाए। या जो दृश्य उसकी आंखों के सामने आ रहे हैं उन्हें भीतर घुसने दे। यह फिल्म दर्शक को रिएक्ट करने की मोहलत ही नहीं देती।

दर्शक इससे डीसेंसीटाइज होता है। तभी तो पिटाई उसे गुदगुदाती है। किसी निहत्थे को मारे जाते देख उसकी हंसी फूटती है। गाली-गलौज, मारकुटाई और गोलीवारी में उसे मजा आता है। दर्शक इस तरह का मजा मेलोड्रैमेटिक एक्शन फिल्मों में भी लेता है। पर वहां मैलोड्रामा यथार्थ को थोड़ा मंद कर देता है। यह अतिनाटक कॉमिक रिलीफ में बदल जाता है। लेकिन हॉलीवुड चलन के फोटोफिनिश यथार्थ में कॉमिक रिलीफ की कोई जगह नहीं है। कैमरे, प्रकाश, ध्वनि प्रभाव की अत्याधुनिक तकनीकें इसे कंप्यूटराइज्ड प्रिसीजन (परिशुद्धता) देती हैं। इस तरह प्रौद्योगिकी फिल्म को मानवीय घटनाक्रम का अनुभव नहीं बनने देती। इसे रंगीन फोटोग्राफी की तरह निष्प्राण, अमानवीय और भयावह बना देती है। प्रौद्योगिकी फिल्म को इतना परफेक्ट बना दे रही है कि दर्शक उसे काल्पनिक दृश्यावली नहीं मान पाता। वह इस तरह के दृश्य देखने का आदी (एडिक्ट) होता जाता है। पैसा खर्च करके मल्टीप्लेक्स में जाता है। और एक तरह से इस परपीड़क आनंद का ग्राहक बनता है। फिल्म उद्योग में यह व्यापार खूब फल फूल रहा है। इसे सफलता माना जाता है। इसी सब परफेक्टनेस के बूते पर कहा जा रहा है कि यह हॉलीवुड से होड़ लेती बॉलीवुड की एक्शन फिल्म है। कि विशाल भारद्वाज पास हो गया।

पर हमें लग रहा है कि विशाल भारद्वाज फेल हो गया। क्या अब वह ब्लू अंब्रेला जैसी कोमल, अर्थवान और संवेदनशील फिल्म बनाएगा?

Friday, August 7, 2009

क्‍यों करें हम सच का सामना



इधर सच का सामना हुआ और उधर नैतिक पुलिस के कान खड़े हो गए। टेलिविजन को हर वक्त कुछ न कुछ नया करने की जरूरत बनी रहती है। कथा कहानी से अगला कदम था रीयल्टी शो। यानी असल जिंदगी में होता ड्रामा आपको ड्रांइग रूम में दिखाया जाए। फिर रीयल्टी शो में भी एकरसता आने लगी। यहां हर वक्त नई जमीन तोड़नी पड़ती है। इस काम में यूरोप अमरीका के लोग ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं। वे लोग नई जमीन तोड़ते हैं, हम उस पर फसल उगाते हैं। यह जमीन जांची परखी होती है क्योंकि वे उससे फायदा काट चुके होते हैं। हमारा टेलिविजन उन्हीं प्रोग्रामों की नकल करता है जो सफलता के झंडे गाड़ चुके हों। इसी सफलता का नया नमूना है सच का सामना। वैसे तो जंगल से मुझे बचाओ भी एक विदेशी रीएल्टी शो की नकल है, पर टीआरपी में सच का सामना बाजी मार ले गया है।

इस सीरियल का विषय ही ऐसा है कि टीआरपी बल्लियों उछलने लगी। यह भारत क्या दुनिया भर का पसंदीदा विषय है। सेक्स संबंधी किस्से। आदमी की सबसे आम कमजोरी। ऐसी कमजोरी जो राजा महाराजाओं को धराशाई कर देती है। हमारे समाज को तो सेक्स शब्द सुनते ही ठंडे पसीने आने लगते हैं। हिस्टीरिया हो जाता है। अभी तक खुले में सेक्स शब्द का इस्तेमाल हमें बुरा लगता है। दबे छुपे चाहे जो कर लो। खुले में पाक साफ बने रहो। और स्वीकार (कनफेस) तो कभी मत करो। यह विचित्र विरोधाभास है। यह उस समाज में होता है जहां सेक्स को देवता का सम्मान दिया जाता है। कामदेव। कामदेव शास्त्र और लोक दोनों जगह विद्यमान है। पुराने जमाने में काम-कला को शास्त्र का दर्जा दिया गया है। लेकिन अब तो हमारे ऊपर झूठ, फरेब और वर्जना के इतने तहदार पर्दे पड़े हैं कि हम करते सब कुछ हैं, उसे मानते बिल्कुल नहीं। यह अजीब छल छद्म भरा व्यवहार है।

इसका मतलब यह नहीं है कि सच का सामना सीरियल को सिर आंखों पर बिठा लिया जाए। इस सीरियल के अपने पेचो-खम हैं। इसका एक एक सवाल नशीली गोली का काम करता है। यह उसी रास्ते से निकला है जहां खली और उसके जालिम साथी एक दूसरे की हड्डी पसली तोड़ते हैं। यह रोडीज का ही भाई-बंध है जहां रफ-टफ धींगा मुश्ती के नाम पर जंगलीपन को ग्लैमरस बनाकर परोसा जाता है। यह सीरियल उन्हीं फिल्मों का विस्तार है जिनमें बलात्कार, हिंसा, नंगी देहें, सॉफ्ट पोर्नोग्राफी का कारोबार किया जाता है। यह उन्हीं कथा कहानियों का विस्तार है जहां आदमी के भीतर की बुराई को, धोखेबाजी को, जालसाजी को, कमीनगी को ग्लैमरस बनाकर बेचा जाता है। और जिन्हें हम सास बहू की कहानियां कहकर मजे से देखते हैं। ये सभी तरह के प्रोग्राम एक तरह का परपीड़क सुख (सैडिस्टिक प्लैजर) देते हैं। निंदा रस से भिगोते हैं। ताक झांक से गुदगुदाते हैं।

सच का सामना आदमी की वासना को, कमजोरी को, कमीनगी को, अपराध को कन्फैस कराता है। तथाकथित लाई डिटेक्टर विधि से, पहले प्रतिभागी से एकांत में सच उगलवाया जाता है। फिर अपने परिवार के सामने उससे सवाल पूछे जाते हैं। सवाल चोरी डकैती से जुड़े नहीं होते। उनमें चटपटापन नहीं है। ज्यादातर बैडरूम को ही उघाड़ा जाता है। टीआरपर उसी से बढ़ती है। जब यह पूछा जाता है कि क्या पति ने परस्त्री से संबंध बनाए? जवाब में वह न झूठ बोल सकता है न सच। यह दुविधा दर्शक को टीवी से चिपकाए रखती है। जब पत्नी से यह पूछा जाता है कि क्या वह परपुरुष से संबंध बनाने या उसे मारने की इच्छा रखती है? तो उसका यह मानसिक स्वैराचार या काल्पनिक अपराध उसे कटघरे में खड़ा कर देता है। मतलब अब इच्छा, वांछा, कामना भी उसे अपराधी घोषित करवा सकते हैं। मतलब मन के भीतर भी सेंध लगा दी गई है। मतलब इंसान का निजी कुछ रहा ही नहीं। यह ब्लैक कामेडी या काली कामदी समाज के दोगलेपन को उघाड़ने की मंशा से नहीं खेली जा रही है, बल्कि यह दर्शक को दूसरे के फटे में पैर फंसाकर सुख पाने के लिए पेश की जा रही है। और यह कपोल-कल्पना या गल्प-कहानी नहीं है। सोलहों आने सच है। हाड़ मांस के जीते जागते आदमी की इच्छा, कमीनापन या करतूत।

देश की सबसे बड़ी अदालत ने इसका प्रसारण रोकने से मना कर दिया। आदालत मॉरेल पुलिसिंग नहीं कर सकती। अब या तो राजनीति की रोटियां सेकने वाली पार्टियां सक्रिय होंगी या हो सकता है सरकार कोई अनसोचा अधसोचा फैसला थोपे। सवाल यह उठता है कि अगर अदालत ने प्रसारण रोकने से मना किया है तो क्या यह प्रोग्राम चलता रहना चाहिए? कानूनी मान्यता तो है पर क्या मनोविकृत्तियों के प्रसारण को मान्य किया जा सकता है? क्या यह रूझान ठीक है? क्या मन से खेलने का यह कारोबार ठीक है? इस पर सोच विचार करने की जरूरत है।

एक तरह से तो ठीक लगता है कि हमारे समाज में सच का सामना करने की हिम्मत होनी चाहिए। पर बात इतनी इकहरी नहीं है। यह किरण बेदी की कचहरी नहीं है जिसमें पति अपनी गलती मानते हैं और अगली कार्रवाई चलती है। यह गेम शो है। यह पैसे का खेल है। आदमी अपने अंधेरे कोनों को पब्लिक के सामने बिखेरता है और पैसे बटोरता है। एक बूढ़ा यह कुबूल करता है कि उसने अपनी बेटी से कम उम्र लड़की के साथ शारीरिक संबंध बनाए। उसका परिवार सामने बैठा है। कैमरा उनके हाव-भाव, अंदरूनी उथल-पुथल, उनकी शर्मिंदगी, उनकी बेचारगी को भी पकड़ रहा है। बंदे की फरेबी मासूम मुस्कान तो है ही। और सच कुबूल करने पर बूढ़ा इनाम पा रहा है। यह बूढ़ा असल में बताना यह चाहता है कि एक तो आपने अपनी कामेच्छा को बेलगाम छोड़ रखा है। फिर परिवार के सामने इस बात को कन्फैस करते हैं। फिर पैसा पाकर सब लोग इस कन्फैशन को सलिब्रेट करते हैं। अभी तो इस कार्यक्रम में असली सच सामने आ रहा है। आगे चलकर यह डाक्टर्ड सच भी हो सकता है। यानी प्रतिभागी तय कर लेंगे कि वे अमुक किस्म के सनसनीखेज सच घड़ेंगे और फिर कुबूल करेंगे और पैसा कमाएंगे।


यह सीरियल हमारी नकारात्मक प्रवृत्तियों को उभारने, बेचने, उस पर खुश होने और ईनाम पाने का जरिया बनता है। यह बच्चे को ऊंट से बांधकर दौड़ाने और उसे जख्मी होते देखने या मदमस्त बैल के सामने लाल कपड़ा लेकर फेंक दिए गए आदमी को चींथे जाने जैसा क्रूर खेल है। ये खेल खुले में होते हैं। और हम टीवी सीरियल में, खाना खाते हुए या शराब पीते हुए या बच्चों बूढ़ों के साथ बैठकर घर के अंदर गुम क्रूरता का खेल देखते हैं। क्या ऐसी हालत में हमें सम्य और सुसंस्कृत कहलाने का हक है?

अमर उजाला 3 अगस्‍त 2009 में प्रकाशित

रेखांकन - मुदित

Tuesday, July 21, 2009

कविता




कवि को देशनिकाला है

कुदरत ने बनाए मिट्टी पानी पेड़ और पहाड़
इंसान ने कथनी करनी का फैलाया जंजाल
कवि ने गाया कुदरत औ' इंसान का गान
दुख और राग रक्त में घुला
मिट्टी में सना

कवि ने छेड़ी जीवन की ऐसी खट मिट्ठी तान

सुनने वालों का दिल दहला जी पिघला
आंसू लुढ़के पत्थर हो गए
आह से निकली जलधार

जब जब गाया कवि ने जीवन का सच्चा गान

उसका रुदन उसका हास
उसकी घृणा उसकी प्रीत
कवि का जीना हुआ मुहाल

इंसान ने घड़ डाले चारण
आगे पीछे घूम विरुदावलियां गाने को
सच से बचने औ' सौ झूठ छिपाने को

आसान नहीं सच का गीत सुन पाना
अंतरमन तक छिल जाता है
जीवन के घमासान में भी कुछ कर जाता है

वो जिगरा कहां कि कोई आग में जले
वो हुलस कहां कि कोई चंदन मले

यहां कवि को देशनिकाला है.
यह भी सन् 2001 की ही कविता है और पिछले साल वागर्थ में छपी थी.

Friday, July 17, 2009

उदय प्रकाश के लिए







कवि की दुनिया

दुनिया में कवि से ज्यादा उजड्ड कोई नहीं
कवि से ज्यादा सभ्य कोई नहीं
तमाम दुनिया पानी भरती है कवि के आगे
इशारों पर नचाता फिरता है दिन रात
दुनिया की ऐसी तैसी करता रहता है कवि
दुनिया अपनी दुनिया में मगन हो दूसरी किसी दुनिया में निकल जाती
कवि एक एक डग से नापता एक एक लोक
कवि दुनिया की दुनिया और दूसरी अनेकानेक दुनियाओं में विचरता
अपनी एक दुनिया रच डालता रोज रोज
कोई देखे कवि की दुनिया से
कैसी दिखती है मेरी तुम्हारी दुनिया ª

यह कविता सन 2001 में लिखी थी और पिछले साल वागर्थ में छपी थी.

Friday, June 26, 2009

ईवेंट







चौबीीस जून को जगदंबा प्रसाद दीक्षित 75 वर्ष के हो गए. कुछ संस्‍थाओं ने उनका अमृत महोत्‍सव मनाया. बीस जून को जलेस ने हबीब तनवीर की स्‍मृति में गोष्‍ठी की. तेरह जून को धीरेंद्र अस्‍थाना के उपन्‍यास का लोकापर्ण हुआ. इससे पहले, अप्रैल अंत या मई आरंभ में हृदयेश मयंक की पुस्‍तक का लोकापर्ण था.

यानी गर्मियों की छुट्टियों में घर गए तो एक लोकापर्ण था. लौटे तो एक और था. मुंबई में लोकापर्ण का बोझा एक ट्रस्‍ट उठाता है. शर्त यह होती है कि पहली प्रति ट्रस्‍टी को भेंट की जाए. मंच पर.

यह एक ईवेंट है. या इसे साहित्यिक गोष्‍ठी कहा जाए? ईवेंट ही कहा जाएगा. जगदंबा दीक्षित जी की हरीक जयंती जिसे मराठी में अमृत महोत्‍सव कहते हैं भी तो एक ईवेंट ही है. यह एक ऐसा कार्यक्रम है जहां शुभकामनाओं का तांता लग जाता है. और बालक (बूढ़े भी तो बच्‍चे ही होते हैं) खुश होता रहता है. तृप्‍त. वैसे इस ईवेंट में दीक्षित जी अच्‍छा बोले.

दीक्षित जी वाम में भी उग्रवाम के पक्षधर रहे हैं. आजकल उग्रवाम का घमासान मचा हुआ है. और इधर हीरक जयंती की ईवेंट चल रही है.

महानगर के सांस्‍कृतिक जीवन के प्‍याज की तरह कई छिलके हैं. उनमें से एक छिलका इस तरह के ईवेंट आयोजन का है.

Tuesday, April 28, 2009

संपादकीय




हिमाचल मित्र के ग्रीष्‍म अंक 
का आवरण और व‍िषय-वस्‍तु आप देख चुके हैं. 
अब प्रस्‍तुत है संपादकीय

पिछले साल नवबंर महीने की छब्बीस तारीख इतिहास की उन तारीखों की तरह दर्ज हो गई जिनको याद करके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ये तारीखें ऐसे हादसों को याद दिलाती हैं जो समुदायों, धर्मों या देशों की आपसी घृणा से पैदा हुईं; अपराधी मनोवृत्ति के चलते सफल हुईं और तमाम तरह की दुरभिसंधियों के सर्पजाल में उलझकर राष्ट्रों की गलफांस बनीं। ये तारीखें कहीं की भी हो सकती हैं चाहे वे न्यूयार्क की हों या इंग्लैंड की हों, अयोध्या, गोधरा, मुंबई, मालेगांव या गुवाहाटी की हों;  हर बार घृणा, अपराध और साजिश ने साधारण मनुष्यों की जान ली है। हर बार सुरक्षा एजेंसियां नकारा साबित हुईं; राजनैतिक सत्ता संवेदनहीनता की पहले से बड़ी मिसाल बन कर साबित हुई; कूटनीति की निरीहता उजागर हुई; वैश्विक शक्तियों की सत्ता, साम्राज्य और विजेता के न्याय-विधान का शिकंजा पहले से ज्यादा मजबूत हुआ।

हर बार आम आदमी मारा गया। जो बच रहा, वह छला गया। उसे नागरिक होने की कीमत चुकाने के लिए अपनी सुरक्षा को दांव पर लगाना पड़ रहा है। उसे जान हथेली पर लेकर ही जीवन बिताना है, क्योंकि वह एक बार ट्रेन हमले में बच गया है, एक बार आतंकवादी विस्फोट में मरते-मरते बचा है। एक बार जातीय दंगों में झुलसने के बावजूद जीवित बच आया है। लेकिन कब तक? कोई नहीं जानता अगली बार के अटैक में किसकी बारी आएगी, सचमुच कोई नहीं जानता।

मौत जब इस तरह सम्मुख आ खड़ी हो, तभी व्यक्ति जागता है, क्योंकि जिंदा रहने के लिए उसके पास जान की बाजी लगा देने का ही विकल्प बाकी बचता है। इस बार मुंबई में हुए आतंकवादी हमलों के बाद एक बार को लगने लगा कि जन जागरण शुरु हो गया है। अब राष्ट्र जाग जाएगा। अब किसी चिड़िया को पर मारने तक की इजाजत नहीं दी जाएगी। अब सारे खोट खत्म हो जाएंगे, तमाम तरह की असमानताएं मिट जाएंगी। सब कुछ सुधर जाएगा। आम आदमी निर्भय हो कर जी सकेगा। बच्चों की किलकारी और मुस्कान कोई नहीं छीन पाएगा।

लेकिन जो हजारों मोमबत्तियां जलाई गईं; मीलों लंबी मानव श्रृंखलाएं बनीं; अखबारों का टनों कागज़ बहस के नाम पर रद्दी हुआ; आम आदमी के कई टीवी वर्ष वही सनसनीखेज तोहमतें सुनते हुए बीते और अरबों-खरबों टर्न-ओवर के बावजूद मंदी की मार झेलनी पड़ी; नतीजा हमेशा की तरह वही का वही - एक महाशून्य।

समाज का हर पुर्जा खुद को अपनी जगह फिट किए रहने की जुगाड़ में जुटा रहा और फिट-फाट बने रहने की फिराक में लगा रहा। यह भी नतीजा निकलता लगा कि चूंकि हमले की जद में पांच सितारा होटल आए थे, इसलिए उच्च-भ्रू समाज तिलमिला उठा था। हमले की जद में सीएसटी रेलवे स्टेशन भी आया था। बल्कि वहां ज्यादा जानें गई थीं। पर होटलों में मेहमान थे। स्टेशन पर मुसाफिर थे। जिनमें से बहुतों के नाम गांव का भी पता नहीं। थोड़े ही दिनों में बड़े लोगों के बिगुल से फटी हुई हवा निकलने लगी। जन जागरण की बहसों के दरम्यान हमारा जीवन-जगत पहले की ही चाल से चलता रहा। राजनेता आम चुनावों की तैयारी में मुख्यमंत्री बदलते रहे; नौकरशाही सारी व्यवस्था को ऑटो मोड पे छोड़कर मद-मस्त बनी रही; सरमाएदार सबको धमकाने में, व्यवसायी गोटी बिठाने में लगा रहा; घूसखोर ने घूस लेना नहीं छोड़ा, अपराधी ने अपराध;  ऐय्याश ने ऐय्याशी नहीं छोड़ी, वाग्विलासी ने बकबक। और हम ऐसे जन-जागरण की उम्मीद लगाए बैठे हैं कि दुनिया रातों-रात चकाचक स्वर्ग में बदल जाएगी।

इतना भोलापन मूर्खता से कम नहीं। हम सोचते हैं दूसरा बदले, हमें अपना चाल-चलन, सोच-विचार न बदलना पड़े। हमें  याद रखना होगा, समाज आत्मान्वेषण और आत्मालोचन के बिना पोखर की तरह हो जाते हैं, जहां के पानी में हरकत नहीं होती और वह सड़ जाता है। हमें खुद को बार-बार याद दिलाना होगा कि परिवर्तन की शुरुआत हमीं से होगी। हम दूसरों से जो अपेक्षा करते हैं, वैसा हमें कर के दिखाना होगा। हमें अपने-आप से, अपने परिवार से, अपनी कौम से, अपने समाज से, अपने राष्ट्र से और अपने विश्व से अपने रिश्तों की ओवरहालिंग करने की जरूरत है। अगर हम अपने कर्तव्यों के प्रति चौकन्ने बने रहें तो असुरक्षा का भय अपने आप मिट जाएगा। अगर हम पल-छिन खुद को याद दिलाते रहें कि हम सभ्य समाज के सचेतन अंग हैं, यह दुनिया हमी से बनी है, हम ही इसके रक्त मज्जा और अस्थियां हैं, हमी इसकी आत्मा और चेतना। तब जाकर शायद विचारधारा और सामाजिक जन जागरण या बाहरी तंत्र-विधान कुछ काम करना शुरू करें। शायद सर्वांगीण समाज सुधार एक तरह की चेतना-अवस्था को प्राप्त करना ही होता है। और उच्चतर मानवीय चेतना का स्वप्न भी शायद ऐसा ही है। इस स्वप्न का अगर कुछ हिस्सा भी पूरा हो जाए तो शायद रोजमर्रा की जिंदगी में कुछ चिहुंक भर जाए।

इस बार आमुख कथा चित्र दीर्घा में से निकली है और बातचीत राजनीति के गलियारे से। एक प्रखर युवा पत्रकार इस बार से एक स्तंभ लिखना शुरू कर रहे हैं। वे हर बार किसी जरूरी मुद्दे पर हमें आइना दिखाएंगे। पहाड़ी चित्र कला की जगह इस बार पूर्वी तिब्बत का 18वीं सदी का एक दुर्लभ थंकाचित्र। बाकी स्तंभ धीरे धीरे स्थिर हो रहे हैं, शायद पिछले अंक से एक कदम आगे।

कोशिश करने के बावजूद अंक में देरी हुई है। पिछले वर्षों में वसंत, वर्षा और शरद अंक निकल चुके हैं। गर्मियों में हिमाचल की ठंडी फुहार लेकर ग्रीष्म अंक पहली बार आ रहा है। उम्मीद है यह सभी को सराबोर करेगा।  



Tuesday, April 21, 2009

हिमाचल मित्र का ग्रीष्‍म अंक

हिमाचल मित्र का ग्रीष्‍म अंक छप गया है।
आप एक नजर इसमें शामिल सामग्री पर डालिए।
अगर उपयोगी लगे तो बताने की कृपा करें, संभव हुआ तो
अंक आपकी सेवा में प्रस्‍तुत किया जाए.


आमुख कथा - अतीत में खुलती खिड़कियां (एक दुर्लभ चित्र प्रदर्शनी का विवरण) : सुमनिका सेठी॥
गुणिया राम - संध्या शेवड़े॥
बातचीत - युवा सांसद अनुराग ठाकुर॥ राजरंग - आर के शर्मा॥
लोक संस्कृति - लोकगीतों में हिमाचल की सैर : केशव चंद्र॥ कांगड़ा कलम गुरू चंदूलाल रैना : सरोज परमार॥ चम्बा की धाराओं में गूंजता एक स्वर -राज प्रभाकर : अशोक जेरथ॥ ऊपरी शिमला की धाम : मोहन साहिल॥ मंच पर असाधारण थे मेरे गांव के साधारणजन : मुरारी शर्मा॥
अनुगूंज
- कुमार विनोद और मोहन साहिल॥
साहित्य - मेरी प्रिय कहानी : केशव॥ टिप्पणी : निरंजन देव॥ बातचीत : मधुकर भारती, रजनीश शर्मा॥ कहानी- मुलाकात : विनोद राही॥
कविताएं - श्रीनिवास श्रीकांत॥ मनोज शर्मा॥ आत्मारंजन॥ रामेश्वर द्विवेदी॥ विक्रम मुसाफिर॥
विचार मंथन - अपनी भाषा में निजता : वेद राही॥
पहाड़ी भाषा-यक्ष प्रश्न- अमर तनौत्रा॥ भगवान देव चैतन्य॥ देवराज संसालवी॥ कृष्णचंद्र महादेविया॥ दीवक वर्मा॥
पहाड़ी कलम - क्हाणी - बूहा करदा झम-झम : डॉ रजनीकांत॥
गल सुणा : अनूप सेठी॥ कवितां - कुंवर नारायण॥ डॉ पीऊष गुलेरी॥ भगवान देव चैतन्य॥ कांता शर्मा॥ चाचू भतीजू : गप्पी डरैबर॥ लबाण बोली का एक प्रसंग : केशव चंद्र॥
पर्यावरण - नीना चम्बियाल॥ आइना - नीलकंठ पराशर॥
करियर कैफे : क्या आप पत्रकार बनना चाहते हैं?: सुदर्शन वात्स्यायन॥
भूगोल से आगे - मारकुला देवी का मन्दिर : ओ सी हांडा॥ मेरी फिल्में : विवेक मोहन॥ कारागार में कार्यशाला : अमला राय॥ त्रिवेणी महादेव : राकेश शर्मा॥ संत कवि मिलारेपा और उनकी कविताएं : अजेय और विमल डे॥
यात्रा
- हिमाचल दर्शन : शैलेश सिंह॥
आस्वाद और परख - कविता का वैभव : ओम भारती॥ बांठड़ा : कैलाश आहलूवालिया॥ धूप सहेली : संगीता सहजवानी॥ सत्यानंद स्टोकस की जीवनी : माई हिमाचल॥ अतीत की अनुगूंज : रेखा डढवाल॥ विवेक मोहन के तीन वृत्त चित्र : अनूप सेठी॥
गतिविधि॥ वैवाहिकी॥
परिवर्तन की पदचाप : दिनेश शर्मा और कैलाश आहलूवालिया॥

Wednesday, February 25, 2009

दो कविताएं


अब दो कविताएं पढि़ए. ये भी उसी माहौल से निकली हैं, जहां से पिछला लेख निकला था। राकेश जी को लगा, लुधियाना शहर का ये चित्र कल्‍पना से लिखा है। ये कविताएं हमें यह समझने में मदद करेंगी कि अस्‍पतालों में आदमी के सामने कल्‍पना करने का अवकाश नहीं होता, अलबत्‍ता पल पल कलपना बदा होता है।

बेसुध औरत
बहुत रात गए एक औरत सुबकती है
जनरल वार्ड के एक बिस्तर पर
लगभग बेसुध पड़ी इस औरत को शायद एहसास हो कि रात है
बीमार और जीवन को किसी तरह बचा ले जाने की थकान ओढ़ कर लोग सो रहे हैं
औरत के सुबकने का भंवर लहराता हुआ बीमारों के सिर के ऊपर से गुजरता है
जनता-बाथरूमों वाले कोने से कपड़े पछीटने की आवाज आ रही है
बेसुध औरत का आदमी रोज रात ढाई बजे उठ कर कपड़े धोता है
सुबकी का भंवर कपड़े धोने की आवाज को अपने आगोश में लेते हुए
वार्ड के बिस्तरों के ऊपर छत को छूता हुआ अटका रहता है हल्की हवा की तरह
बेमालूम ढंग से यह हवा बाहर की हवा में घुल जाएगी

बेसुध औरत अपने आदमी की सारी थकान मिटा देना चाहती है
थपकियों से उनींदी लाल आंखों को कोहेनूर हीरे में बदलना चाहती है

उसे कुछ पता नहीं चलता
जब डॉक्टर राउंड लगा कर चला जाता है
नर्स देगी अब दवा
एक स्पर्श की चुभन से फूट पड़ती है रुलाई
फंसे हुए भारी गले की मोटी आवाज
वार्ड के बिस्तरों के ऊपर छत से टकराती
कई मील का चक्कर लगाती निढाल पड़ती जाती
बेसुध औरत के पिछले दिन धुले कपड़ों की सीलन में जज्ब होती

कल इन कपड़ों के साथ उसकी अपनी रुलाई भी चिपकेगी
बेसुध औरत के शरीर से
जैसे आज पहने उसके कपड़ों में उसके आदमी की रुलाई की एक परत जमी हुई है


बेसुध औरत का आदमी
डॉक्टर जब राउंड पर आता है
किसी बफादार कारिंदे की तरह हाथ जोड़े
चौथी पांचवीं सीढ़ी के मातहत अफसर की तरह
बड़े अफसर की हर हरकत पर निगाह बांधे
हर आवाज पर कान साधे
दहलीज के बाहर मुस्तैद कारकून
डॉक्टर के किसी कहे अनकहे आदेश के इंतजार में खड़ा
बेसुध औरत का आदमी

डॉक्टर कोई पर्ची देगा
और वह संजीवनी लाने उड़ चलेगा
बेसुध औरत का आदमी बाद में छोटे डॉक्टर या नर्स से भी पूछता है
धीमे सुर में तहजीब से
मेहतर से भी दरयाफ्त कर ही लेता है
कहीं डॉक्टर ने कोई दवा लिखी तो नहीं
जिसे लाने में या मंगवाने में या बताने में कोताही बरती जा रही हो

हड़बड़ाते हुए जाता है वार्ड के बाहर
सोचते हुए कुछ जरूरत न पड़ जाए बेसुध औरत को
बिना वक्त गंवाए खाना खा के दौड़ा चला आता है
वार्ड में किसी चमत्कार को घटित होते देखने की आशा में
बेसुध औरत का आदमी

रह रह कर कुछ चिटकने लगता है बेसुध औरत के आदमी के अंदर
वह तपाक से मदद का हाथ बढ़ा देता है पड़ोसी मरीज की तरफ

जब सब सो जाते हैं
वह खिड़की की जाली से आसमान ताकने लगता है
जाली के असंख्य चौकोर छेदों में से किसी एक में से
बाहर निकालना चाहता है वह अपनी नजर


Wednesday, February 11, 2009


यह चित्र हमारे प्रिय और प्रसिद्ध सौंदर्यबोधशास्‍त्री विद्वान रमेश कुंतल मेघ की पुस्‍तक साक्षी है सौंदर्य प्राश्निक का मुख पृष्‍ठ है। पुरुष और प्रकृति की यह कलाकृति डॉ मेघ की ही बनाई हुई है।
सम्‍पूर्ण सौंदर्य

रात दो बजे का वक्त है। पंजाब का एक खदबदाता हुआ शहर - लुधियाना। कहते हैं लुधियाना के लोग विदेश जा बसे हैं। यह एनआरआइयों का शहर है। चमक दमक और ठसक को देखकर लगता है वाकयी यह एनआरआइयों का ही शहर है। लेकिन जितने गए हैं उतने ही रह भी तो गए हैं। तभी तो गमकता है शहर। ये खुद गए हुए हैं। या इनके रिश्तेदार गए हुए हैं। या ये जाने वाले हैं। किसी न किसी तरीके से तार जुड़ी हुई है।

इस शहर में रात दो बजे का वक्त और एक बड़ा अस्पताल। भरा हुआ। शहर ही की तरह। दर्जन भर से ज्यादा वार्डों में से एक वार्ड पर नजर डालें। पचीस के करीब बिस्तर। सभी भरे हुए। खाली कोई नहीं। कोने वाली टयूब लाइट जल रही है। लोग सो रहे हैं। लोग ऊंघ रहे हैं। लोग हरकत में हैं। हर कोई अपने में और अपनों में।

एक बिस्तर से एक सरदार उठता है। एक हाथ में ड्रिप लगी है। दूसरे हाथ में बोतल। पाइप बिंधी हुई। उल्टा लटका के सरदारजी आराम से चल रहे हैं। जैसे स्टैंड साथ साथ चल रहा है। अविचल। निर्विकार। उन्हें शायद बाथरूम जाना है। नसों में लगातार जाते गुलूकोज की इस प्रक्रिया को उन्होंने ऐसे गले लगा लिया है जैसे मामूली पट्टी बंधी हो। साधारण आदमी हो तो सूई के नाम से ही दो मील दूर भाग जाए। और ये बहादुर गुलूकोज की बोतल अपने ही हाथ में उठाए घूम रहे हैं। उमर भी पकी हुई है। चिलगोजियां करने दिखाने बाली उमर नहीं। बालों का जूड़ा सिर पर बंधा है। जूड़ा क्या जूड़ू ही है। गंज तो सरदारों को भी पड़ता है।

किसी सरदार को इस हाल में देखने पर एक बारगी झटका लगता है। हालांकि बीमारी का शिकार तो सरदार भी होंगे ही। पर छवि कुछ मन में ऐसी बैठी है कि सरदार माने दिलदार। दिलवर। दिलकश। मस्ती, मजा, मजाक, मेहनत, मुहब्बत और मर्दानगी का नाम सरदार है। बहादुरी और ताकत का मानवीकरण। पारंपरिक लोक मानस और आधुनिक मीडिया ने इस रूप को गढ़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। ऐसी लाजबाव कौम के नायक को बीमार हालत में देखते ही जाति की सामूहिक छवि बिखरने लगती है।

अस्पताल के इसी वार्ड में शाम का वक्त है। सरदार जी तैयार हो रहे हैं। या कहना चाहिए सज संवर रहे हैं। बीमार आदमी भी तो सजता संवरता है। बल्कि इससे थोड़ी सफूर्ति ही पाता है। इस उपक्रम में सरदारनी जी मदद कर रही हैं। हाथ मुंह धो चुके हैं। कपड़े भी बदल लिए हैं। केश काढ़े जा रहे हैं। पकी उमर है। सरदारनी जी दारजी के बाल संवार रही हैं। लड़कियां चोटी करते समय बालों को पीछे पीठ की तरफ काढ़ती हैं। सरदार सिर झुका के आगे को बाल काढ़ते हैं। खुद ही काढ़ते हैं। पर यहां ये दारजी बीमार हैं। दारनी प्रेम से लगी हैं। बाल कम ही बचे हैं। नींबू बराबर जूड़ा बनता है। सरदारजी का इस तरह से झुका हुआ चेहरा, बालों के नन्हें से झरने से ढंका हुआ। सरदारनीजी के हाथों की हरकत। सरदारजी इस वक्त क्या सोच रहे होंगे।

बड़े भोले लगते हैं जब सरदार बाल काढ़ रहे होते हैं। तब क्या उनके अंदर की प्रकृति माता जागी होती है? क्या सरदार पुरुष और प्रकृति का पूर्ण समन्वित रूप हैं। बहादुर, दिलेर सरदार इतना कोमल और मनोरम भी है। रोज जिसके सिर में से झरना फूटता है। क्या सरदार अपने शीर्ष पर गंगा को धारे रहते हैं? क्या सरदार शिवजी के वंशज हैं?

पर यह तो सिख कौम की समूहिक छवि नहीं है। इस बारे में कौन जानता है। प्रकृति तो हरेक इंसान के भीतर छिपी बैठी होती ही है। कुछ प्रकट कुछ अप्रकट।

अहमदाबाद के शायर सुलतान अहमद से एक बार बात हो रही थी। दंगों में झुलस के आए थे। उन्होंने हमारी आंखें खोलीं कि जाति या कौम के नाम पर सरलीकरण नहीं करने चाहिए। उनकी बात सिर माथे पर। पर किसी इंसान के रूप सरूप और गतिविधि को देख कर उसके छुपे हुए आयाम दिखने लगें तो क्या करें। और अगर वे जाति की छवि के कंट्रास्ट में और चमकने लगें और व्यक्ति की खूबियां सामने आने लगें तो क्या करें।

Friday, January 9, 2009



उदासी के कारोबार



मुंबई के अखबार उर्दू टाइम्‍स ने हिंदी अखबार निकाला। उसके संपादक थे सुधांशु शेखर। वहां मैंने कुछ अर्सा अंतर्नाद, फिर बात बे बात कालम ल‍ि‍खा। उसी की एक कड़ी यह है




गुणीजन अकसर कहते हैं कि हमारा भारत वर्ष एक साथ कई सदियों में जीता है। एक तरफ अति आधुनिक ज्ञान विज्ञान है, तो दूसरी तरफ कबीलाई झाड़ फूंक, बलि और जादू टोना। एक तरफ सूचना क्रांति दुनिया को मुट्ठी में कर लेने को उद्धत है, तो दूसरी तरफ बस्तियों के बीच इतनी दूरी है कि बीमार अस्पताल तक पंहुचने से पहले दम तोड़ देता है। एक ओर नवीन है, तो दूसरे छोर पर प्राचीन है। समाज में। लोकाचार में। ये ओर छोर आदमी के भीतर भी हैं। रस्सी की तरह तने हुए। जाल की तरह बिछे हुए। एक ही वक्त में ग्लोबल गांव का शिकंजा कस रहा है और अंध विश्वासी टाइप की पुरानी परंपरा भी कुंडली मार के बैठी है। आदमी एक कदम आगे बढ़ाता है। एक कदम लड़खड़ाता है।

नई चीजों, नई तकनीक टेक्नोलोजी को हमारे लोग कई बार ऐसे नायाब तरीकों से इस्तेमाल करते हैं कि उसका रूप सरूप ही बदल जाता है। जैसे हलवाई अपनी भट्ठी के आगे बिजली का पंखा रख देगा। दो मिनट में कोयले दहकने लगते हैं। ट्रैक्टर ट्राली का तो किसान न जाने कितनी तरह से उपयोग कर डालते हैं। इससे काम तो आसान होता ही है, बाज दफे मनोरंजन भी होता है। इनमें मसखरी छुपी रहती है। एक ऑटो रिक्शा वाला अपना एक पैर आगे चल रहे ऑटो की पिछाड़ी पर टिकाए हुए है। मानो पैर में चुंबक है और अगला ऑटो पिछले ऑटो को खींच रहा है। लेकिन सच यह है कि पिछला ऑटो अगले ऑटो को धकेल रहा है। बहुत कम मेहनत से यह काम हो रहा है। ट्राली पकड़ कर चलने वाले साइकल सवार तो सबने देखे होंगे। कस्बों गांवों में अब यह दृश्य मनोरंजन भी पैदा नहीं करता। चाकू कैंची की धार तेज करने वाला साइकिल के कैरियर पर बैठकर पैडल चलाते हुए यह काम निबटाता है। उसकी यह घूमंतू फैक्ट्री हर गली मुहल्ले में सेवा देती है।

मेहनत, नया, पुराना और मशीन की यह कला काम को आसान और आरामदेह बनाती है। कई बार निठल्ला भी कर देती है। मेहनत से तो सुंदरता और जिंदादिली पैदा होती है, वह यहां गायब हो जाती है। माहौल भी बिगाड़ देती है। यह पचमेल सारी गतिविधि में से आत्मा को पछाड़ के फैंक देता है।

आपने देखा होगा, नीम हकीम जगह जगह घूमते रहते हैं। इनमें से कुछेक मर्दानगी की दवाएं बेचते हैं। शहर शहर घूमते हैं। एक जगह हफ्ता दस दिन तंबू तान के रहते हैं। फिर आगे बढ़ जाते हैं। ये लोग बीच बीच में मुंबई भी आते हैं। कई कोने ऐसे हैं, जहां इनकी पूछ है।

इस पेशे में पठान पहलवान टाइप आदमी मजमा लगाता था। चटपटे किस्से और नॉनवैजिटेरियन किस्म के चुटकुले सुनाता था। मर्दानगी को ललकारता था। पोषण के लिए दवा बेचता था। लोग इस मजमे को इस अंदाज से देखते थे कि कोई उन्हें पहचान न ले। पर वे दवा खरीद लें।

इधर ये पहलवान भी आरामतलब हो गए हैं। इतने कि लगता है पुश्तैनी धंधा ही चौपट कर देंगे। हालांकि एक तरह से अच्छा ही होगा। मर्दानगी के नाम पे आदमी बेवकूफ तो न बनेगा। खैर इस वक्त उनकी काहिली और आरामतलबी पर ही तव्वजो दें।

इन महानुभावों ने मजमा लगाने वाला अपना भाषण रिकार्ड करवा लिया। सोचा होगा जबान को आराम रहेगा। अब मजमेबाज ऊंघता रहता है। कैसेट बजता रहता है। इतनी एकरसता से बजता है कि मनहूसियत छाने लगती है। मजमा क्या खाक लगेगा! बदरंग हुए कपड़े पर उसका दवा दारू बिछा रहता है। जवानी का मारा क्या देखने वहां जाएगा! जिंदगी से हारा हुआ ही जाएगा। जो अवसाद से घिरा हो। जिसके पास कोई काम धंधा न हो। वक्त कटता न हो। काटने को दौड़ता हो। ऐसा ही थका हारा उसकी धूल खाती शीशियों को उलट पलट के देखेगा।

इन्हीं लोगों की एक दुकान हाल में दिख गई। मजमा जमीन पर नहीं था। एक पुरानी मेटाडोर सड़क किनारे खड़ी थी। ऊपर बैनर लगा था। खूब नीचे तक लटका हुआ। यह जानने के लिए कि मेटाडोर में क्या है, मुझे अपना सिर घुटनों तक झुकाना पड़ा। एक दरवाजा सा खुला हुआ था। दवाएं रखी हुई थीं। कैसेट बजे जा रही थी। आदमी का नामोनिशान नहीं था। ग्राहक के बारे में तो सोचना ही बेकार। तेज और शोरशराबे वाली ट्रैफिक से भरी सड़क के किनारे यह दुकान क्या सोच कर लगाई गई होगी। भीड़ के बीच में मुर्दनगी भरे कोने को साकार करती हुई। मर्दानगी की दवा बेचते हुए।

ताज्जुव है कि कोई ग्राहक वहां दिखता नहीं है। लेकिन व्यापारी को कहीं तो ग्राहक मिलते होंगे। तभी तो वह मेटाडोर खरीद पाया है। वरना टेंट से गठड़ी पर आता। यह तो तंबू से टेंपू की तरफ बढ़ा है। वह शायद अवसाद, उजाड़ और मुर्दनगी के बीच भी धंधा कर लेता है।

Saturday, December 6, 2008

कविता:किसी दिन अचानक

किसी दिन अचानक

सुबह, शाम या रात में

आंखों के सामने आ खड़ा हो आसमान

भुरभुरी धुंध, बादल पहाड़ी पर चढ़ आएं

स्लेट की छतों को ढक लें धीरे धीरे

चीड़ की नुकीली पत्तियां एक एक बूंद को थामे रहें

किसी दिन अचानक

सुबह, शाम या रात में

खिड़की ज़रा सा पर्दे को हिलाकर

कुर्सी पर आ बिराजे

आंखों के सामने आसमान

व्यस्त लोगों के कंधे झकझोर के पूछूं

देखा तुमने दूधिया था आसमान

बूंद दो बूंद गिरेंगी

कम हो जाए बंबई में गर्मी शायद

ट्रेनें तो पर चल रही हैं नियमित

चिकनी ढीठ अरब की खाड़ी

जाओ तुम भी लादो उतारो जहाज़

छाती पर व्यापारियों का बोझ ढोना ही बदा है

मुझे तो छुट्टी दे दो आज

आसमान से संवाद कर लूं

आविदा परवीन को सुन लूं

धुंध के रेशों से सवा दो अक्षर की कहानी बुन लूं

विजय कुमार की कविताएं पढ़ लूं

अदृश्य हो जाएंगी सूखी पत्तियां

Friday, November 28, 2008

मुंबई मेरी जान


मुंबई मेरी जान
आज दूसरा दिन है. मुंबई आतंकवादियों के चंगुल में है। और मन बहुत उखड़ा हुआ है



यह शहर नहीं शरीर है मेरा
एक हिस्‍सा छलनी है
आपरेशन चल रहा है कब से
बेहोशी की दवा नहीं दी गई है मुझे
शहर चल रहा है
घाव जल रहा है
खुली आंख से देख रहा हूं सब कुछ
शहर तकलीफ में है
झेल रहा है




हट जाओ तमाशबीनो
अपने काम में लगो




यह कायर का वार है
मैंने इसे जंग नहीं माना है
जंग में मेरा यकीन भी नहीं
पर तुम्‍हें यकीन के मानी पता ही नहीं

Monday, November 24, 2008

कविता

राम शिला की प्रार्थना
(एक कांगड़ी लोकगाथा, जिसमें बहू को दीवार में चिनवा कर
बलि देने का करुण वर्णन है, की शैली में)


अगल भी चिनना बगल भी चिनना
उस माँ को लेना संभाल
जिसका लाल कटा दंगे में


अगल भी चिनना बगल भी चिनना
उस बहू का करना ख्याल
जिसका कंत मरा दंगे में


अगल भी चिनना बगल भी चिनना
उस बाल को लेना पाल
जिसकी माँ न बाप बचा दंगे में


अगल भी चिनना बगल भी चिनना
नहीं मन साफ तो कुछ नहीं माफ
चाहे जितने मंदिर लो चिनवा।

रचनाकालः2002 और दैनिक जागरण में प्रकाशित 2008

Tuesday, November 18, 2008

हजामत

सैलून की कुर्सी पर बैठे हुए

कान के पीछे उस्तरा चला तो सिहरन हुई

आइने में देखा बाबा ने

साठ-पैंसठ साल पहले भी

कान के पीछे गुदगुदी हुई थी

पिता ने कंधे से थाम लिया था

आइने में देखा बाबा ने

पीछे बैंच पर अधेड़ बेटा पत्रिकाएँ पलटता हुआ बैठा है

चालीस साल पहले यह भी उस्तरे की सरसराहट से बिदका था

बाबा ने देखा आइने में

इकतालीस साल पहले जब पत्नी को पहली बार

ब्याह के बाद गाँव में घास की गड्डी उठाकर लाते देखा था

हरी कोमल झालर मुँह को छूकर गुज़री थी

जैसे नाई ने पानी का फुहारा छोड़ा हो अचानक

तीस साल पहले जब बेटी विदा हुई थी

उसने कूक मारी थी जोर से आँखें भर आईं थीं

और नाई ने पौंछ दीं रौंएदार तौलिए से

पाँच साल पहले पत्नी की देह को आग दी

आँखें सूखी रहीं, गर्दन भीग गई थी

जैसे बालों के टुकड़े चिपके हुए चुभने लगे हैं

बाबा के हाथ नहीं पँहुचे गर्दन तक आँखों पर या कान के पीछे

बेटा पत्रिका में खोया हुआ है

आइने में दुगनी दूर दिखता है

नाई कम्बख़्त देर बहुत लगाता है

हड़बड़ा कर आख़री बार आइने को देखा बाबा ने

उठते हुए सीढ़ी से उतरते वक़्त बेटे ने कंधे को हौले से थामा

बाबा ने खुली हवा में साँस ली

आसमान जरा धुंधला था

आइने बड़ा भरमाते हैं

उस्तरा भी कहाँ से कहाँ चला जाता है

साठ पैंसठ साल से हर बार बाबा सोचते हैं

इस बार दिल जकड़ के जाऊंगा नाई के पास

पाँच के हों या पिचहत्तर बरस के बाबा

बड़ा दुष्कर है हजामत बनवाना

Sunday, November 16, 2008

कबाड़

उन्होंने बहुत सी चीज़ें बनाईं

और उनका उपयोग सिखाया

उन्होंने बहुत सी और चीज़ें बनाईं दिलफरेब और उनका उपभोग सिखाया

उन्होंने हमारा तन मन धन ढाला अपने सांचों में

और हमने लुटाया सर्वस्व

जो हमारे घरों में और समाया हमारे भीतर

जाने किस कूबत से हमने

उसे कबाड़ की तरह फेंकना सीखा

कबाड़ी उसे बेच आए मेहनताना लेकर

उन्होंने उसे फिर फिर दिया नया रूप रंग गंध और स्वाद

हमने फिर फिर लुटाया सर्वस्व

और फिर फिर फेंका कबाड़

इस कारोबार ने दुनिया को फाड़ा भीतर से फांक फांक

बाहर से सिल दिया गेंद की तरह

ठसाठस कबाड़ भरा विस्फोटक है

अंतरिक्ष में लटका हुआ पृथ्वी का नीला संतरा


जूते

कई हज़ार साल पहले जब एक दिन

किसी ने खाल खींची होगी इंसान की

उसके कुछ ही दिन बाद जूता पहना होगा

धरती की नंगी पीठ पर जूतों के निशान मिलते हैं

नुची हुई देह नीचे दबी होगी

धरती हरियाली का लेप लगाती है

जूते आसमान पाताल खोज आए

जूते की गंध दिमाग तक चढ़ आई है

कई हज़ार साल हो गए

नंगे पैर से टोह नहीं ली किसी ने धरती की