Wednesday, December 9, 2009

हिंदी का बुद्धिजीवी


लेखक संगठनों के पुनर्गठन का मसला
हिमाचल मित्र के इस संपादकीय के साथ
जोड़ कर देखा जाएगा
तो परिवर्तन की जरूरत और शिद्दत से महसूस होगी.


माहौल को गरियाना, राजनीति को लतियाना, युवा पीढ़ी पर बिगड़ जाने के फतवे जारी करना और फिर व्यवस्था के मत्थे दोष मढ़ देना एक फैशन है। हर कोई खुद को हर चीज का एक्सपर्ट समझता है इसलिए उसे लगता है हर मसले का समाधान उसके पास है। बिनमांगी सलाहों का जखीरा हर किसी के पास होता है जिसमें राजनेताओं को तड़ीपार करने से लेकर डिक्टेटरशिप लागू करने तक के अव्यवहारिक और विचारहीन फंडे कढ़ी में उबाल की तरह उफनते रहते हैं। इस तरह की चकल्लस में हमारे पुरुष ज्यादा लिप्त रहते हैं और घर-घर में चक्रवर्ती सम्राट बनके घूमते रहते हैं। महिलाएं चूंकि एक के बाद एक शिफ्ट में बेगार करती रहती हैं, इसलिए वे इस चर्चा-चर्वण में कम ही शामिल होती हैं। हम दूसरों से तो बहुत उम्मीद लगाए रखते हैं पर अपनी तरफ भूलकर भी नहीं देखते। समाज के प्रति हमारी क्या जिम्मेदारी है, इस पर लच्छेदार भाषण तो दे सकते हैं पर अमल करते वक्त हम कन्नी काट लेते हैं। कथनी करनी में समानता हमने महात्मा गांधी जैसे महात्माओं के लिए छोड़ दी है।
हरेक जन अपने आचार-व्यवहार से अपने समय की सभ्यता-संस्कृति की रचना करता है। अगर हम कहेंगे कुछ, और करेंगे कुछ, तो विचार-व्यवहार की यह फांक हमारी सामूहिक चेतना में भी फैलती जाएगी। यह ठीक है कि हरेक प्राणी अपने सर्वाइवल के लिए जीता है। लेकिन लाखों वर्षों की विकास यात्रा में हमने सामाजिकता के मूल्य भी तो विकसित किए हैं। वे हमारे खून में या कहें जीन्स में आ गए हैं, हमारे चित्त में बैठे हैं, हमारी चेतना को रोशन करते हैं। ऐसी विकासमान और आत्मिक धरोहर को धता बताकर अगर हम खुद से ही लिथड़े रहें, खुद को अपनी इंस्टिंक्ट्स के शिकंजे में फंसाए रखें, लेकिन सारी सदाशयता, परमार्थ और सामाजिक उत्‍तरदायित्व की उम्मीद दूसरे से करते रहें तो ऐसे दोफाड़ व्यक्तित्व को वैचारिक सिजोफ्रेनिया का शिकार ही कहा जाएगा। और खंडित व्यक्तित्व एक रोग होता है। इस पंगुता को हम अपनी सभ्यता-संस्कृति में संक्रमित करते जाते हैं।
यह भी ठीक है कि आदर्श समाज तो एक यूटोपिया है। लेकिन हर युग ने इस यूटोपिया को फलित करने के प्रयत्न तो किए ही हैं। सभ्यता-संस्कृति के निर्माण में यूं तो मजदूर, किसान, कारीगर, इंजीनियर, आर्कीटेक्ट, डॉक्टर, वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, राजनेता, बच्चे, बूढ़े, युवा, प्रौढ़, कन्या, युवती, माता, पिता, दादी, नानी सबका योगदान है। प्रकृति के प्रत्येक प्राणी से ही नहीं, जड़ वस्तु और मानव निर्मित वस्तु से भी हमारे रिश्ते इसके डीएनए के निर्माण में योगदान देते हैं। ये संबंध आपस में भीतर तक गुंथे हुए हैं। इतने गझिन कि हमें पता ही नहीं चलता कि हम क्या दे रहे हैं और बदले में क्या पा रहे हैं।
ऐसी जटिल संरचना के बीच रहते हुए बुद्धिजीवी वर्ग की भूमिका नि:संदेह महत्वपूर्ण हो जाती है। इनमें भी भाषा, साहित्य और कला के क्षेत्र में सक्रिय बुद्धिजीवियों का कार्यक्षेत्र बहुत जिम्मेदारी भरा है। लेखक, अध्यापक, पत्रकार, भाषा अधिकारी, सांस्कृतिक अधिकारी को कथनी-करनी में भेद करने की छूट किसी भी कीमत पर नहीं मिल सकती। लेखक कलाकार की कला-जन्य स्वायत्तता अपनी जगह है पर हम यह नहीं भूल सकते कि इन बुद्धिजीवियों के काम का संबंध आगे आने वाली कई पीढ़ियों से है। लेखक-कलाकार ज्ञान और संवेदना के औजार लेकर जीवन जगत की पुनर्रचना करता रहता है; अध्यापक अगली पीढ़ियों को जीना सिखाता है; पत्रकार के ऊपर सारे समाज को बाखबर और खबरदार रखने की जिम्मेदारी है; उनसे भी अहम भूमिका नौकरशाही के उन आला अफसरों की है जो केंद्र और राज्य सरकारों की सांस्कृतिक, भाषाई और शिक्षा संबंधी नीतियों और संस्थाओं के नियंता और संचालक हैं।

इसकी तुलना में आज के अदबी हालात देखकर आंखें फटी की फटी रह जाती हैं। तकरीबन हर लेखक परेशान है कि उसे उसकी प्रतिभा के बराबर महत्व नहीं मिलता। पुरस्कारों, फैलोशिपों, पदों और पीठों के आबंटन पर थुक्का-फजीहत चली रहती है। कभी किसी आयोजन पर विचारधारात्मक हमला होता है, तो कभी किसी लेखक या संगठन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगता है। एक कवि गाली-गलौच पर उतर आता है तो दूसरा हाथापाई करने से नहीं हिचकता। और हिंदी साहित्य की दुनिया अपनी लघु पत्रिकाओं में ललकारती रहती है। पाठकों की कमी मुंह बाए खड़ी एक सच्चाई है। अभी तक हम पुस्तक बिक्री का नेटवर्क ही खड़ा नहीं कर पाए हैं। उल्टे थोक खरीद के जमींदोज नाले का नेटवर्क ज्यादा पुख्ता हो गया है। यह किसका किया धरा है? बुद्धिजीवी का ही न। जो करना था वो नहीं किया, जो नहीं करना था वह करते चले आए। अगर साहित्य की पैठ व्यापक पाठक वर्ग तक हो तो लोकप्रियता के मानक बदल जाएंगे। किसी भी लेखक को पाठक लोकप्रिय बनाएंगे, पुरस्कार या मित्र-लेखक नहीं। पाठकों के कम होने के कारण लेखक वर्ग की एकाउंटेबिलिटी तय नहीं हो पाती।
भाषा से जुड़े तकरीबन सभी पेशे इसी के कारण स्वच्छंद और लगभग स्वेच्छाचारी हैं। अकादमिक जगत पर नजर डालिए तो निराशा घेरने लगती है। स्कूलों, कालेजों, विश्वविद्यालयों के पाठयक्रमों का मसला हो, पाठयपुस्तक उद्योग हो या उच्च स्तरीय शोध हो, खुला खेल फर्रुखाबादी चलता है। अकेले या गिरोहबंदी करके मनमानी की जाती है। तू मुझे पोस मैं तुझे पोसूं का खेल चलता है। अधिकार का दुरुपयोग करना मानो मौलिक अधिकार बन गया हो। चाहे कक्षा पांच का पाठ हो, चाहे एमफिल पीएचडी के शोध, भ्रष्ट भाषा के नमूने हर कहीं मिल जाएंगे। ऐसे ऐसे लेखकों पर शोध हुआ मिल जाएगा, जिन्हें सही भाषा लिखने का अभ्यास भी नहीं है। हमारे यहां तकरीबन तीन सौ विश्वविद्यालय हैं। यानी इतने ही हिंदी विभाग होंगे जहां शोध होता है। असल में शोध तो अनवरत चलती हुई फैक्ट्री है, जहां भारी संख्या में पुस्तकों, लेखकों और आलोचकों की कच्चे माल की तरह निरंतर खपत होती है। यहां अकादमिक अध्यापक, शोध निर्देशक और आलोचक स्वायत्त होकर काम करता है। वह क्या करता है, कैसे करता है, क्यों करता है, इसका लेखा जोखा करने वाला कोई नहीं। कमोबेश इसी रास्ते पर हमारा मीडिया चल रहा है। वह तो सत्ता के और भी करीब है। इसलिए मुंह जोर है। आज हर कोई प्रिंट और टीवी को पानी पी पी कर कोसता है। लेकिन मालिकों को छोड़ दें तो इन्हें चलाता कौन है? हिंदी के बुद्धिजीवी ही न? क्या वे इतने पंगु और मूढ़ हैं या भीरु और कायर हैं या मोटी तनख्वाहों और सुविधाओं के गुलाम हो गए हैं कि चलताऊ, भड़काऊ, उबाऊ खबरों से परे कुछ देख सोच ही नहीं पाते? एक एक करोड़ पाठक और आपको विश्लेषण के लिए अंग्रेजी की शरण में जाना पड़े? या कालम लेखक भी अनुवाद करके लाने पड़ें? हिंदी में कितने कालमिस्ट होंगे, जिनके शब्दों को नीति-निर्माता तवज्जो देते होंगे? टीवी पर तो खबरों तक को सनसनीखेज सीरियल बनाने में कोई कोर- कसर नहीं छोड़ी जाती। हमारा पत्रकार तबका हिंदी समाज को बौड़म, ठरकी और पतित ही मानता है इसलिए उसी तरह की लुगदी परोसता चला जा रहा है। आत्मान्वेषण तो छोड़िए, न तो कोई वाचडॉग इन मीडिया-मेधावियों पर नजर रखने को तैयार है और न ही कोई मीडिया संस्थान विचार-विश्लेषण करने को। हिंदी को राजभाषा बनाए जाने के कारण सरकारी हल्कों में हमें हिंदी अधिकारी मिला। यह एक विलक्षण अवसर था। हिंदी अधिकारी नौकरशाही और प्रशासन के मकड़जाल में सांस्कृतिक चेतना फैला सकता था। पर वह अंतर्विरोधों और हीनताग्रंथी में उलझ कर रह गया। नौकरशाही के जो अफसर भाषा-साहित्य-संस्कृति की नीतियां बनाने और उन्हें चलाने के लिए तैनात किए जाते हैं, वे ज्यादातर सत्ता के मुहरे बन कर ही रह जाते हैं।

जब मशाल लेकर चलने वाले ही दिशाहीन होकर लड़खड़ाने लगें, तो वे व्यापक हिंदी समाज पर उदासीनता, अपढ़ता, कूढ़मग्जी, संस्कारविहीनता आदि के दोष किस मुंह से मढ़ सकते हैं? यह दोषारोपण बंद होना चाहिए। सारे बुद्धिजीवी वर्ग को आत्मान्वेषण करना चाहिए; और ऐसा इंतजाम करना चाहिए जिसमें लेखक, अध्यापक, पत्रकार, संपादक और अधिकारी का सोशल ऑडिट हो। उसकी जिम्मेदारी तय हो और उसे जवाबतलब किया जाए। यह काम कैसे किया जाए कि रचनात्मक स्वायत्तता का हनन भी न हो और उच्छृंखल हरकतों की छूट भी न मिले, बल्कि जिम्मेदारी की चेतना का प्रसार हो, यह मिल बैठकर तय किया जाना चाहिए। लेकिन वाग्विलास से परे, चर्चा-चर्वण से हटकर, आंतरिक और अनिवार्य जरूरत के तहत, एक आत्मिक पुरुषार्थ और परमार्थ की तरह।
चित्रः प्रभु जोशी. खंडित करने के लिए क्षमा करेंगे. अंदर बाहर की कटी फटी चिडि़या तकलीफ देती है. जीवन जगत का सौंदर्य साथ रहने में ही है.

Tuesday, December 1, 2009

संगठन, लेखकों के कवच-कुंडल बनें


लेखन भले ही ऐकांतिक कार्य हो लेकिन उसकी एक महत्वपूर्ण सामाजिक भूमिका भी है। रचना का पाठक तक पहुंचना निश्चित रूप से एक सामाजिक गतिविधि है। आज हिंदी लेखक बहुत ज्यादा हाशिए पर आ गया है। उसकी प्रासंगिकता का भी संकट खड़ा हो रहा है, जबकि अगर आज की शब्दावली में लेखन एक प्रोफेशन भी है। शौकिया भी है और प्रतिबद्ध प्रोफेशन भी है। हर प्रोफेशन की एसोसिएशन होती है जो उनके हितों की रक्षा करती है। उनके लिए आचार संहिता बनाती है क्योंकि उसके सदस्य जिम्मेदारी का काम कर रहे होते हैं, जैसे प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया, मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया आदि। ये संस्थाएं अपने सदस्यों के हितों की रक्षा भी करती हैं और उनकी भूमिका पर नजर भी रखती हैं। विचार करने की बात है कि लेखक संघों को भी इसी तरह चुस्त-दुरुस्त होना चाहिए और वर्तमान कठिन समय में लेखक का कवच-कुंडल बन जाना चाहिए। अतः लेखक संघों की जरूरत बनी रहेगी। लेखक, पाठक, प्रकाशक, पुस्तक वितरण, पाठ्य पुस्तक, शोध, भाषा प्रचार-प्रसार, प्रौद्योगिकी जैसे हर मुद्दे पर सुविचारित और सामूहिक आधार पर काम करने की जरूरत है। संघ इस सब में महती भूमिका निभा सकते हैं। तीनों ही लेखक संगठनों की ओवरहालिंग की जरूरत है। इधर प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, जनसंस्कृति मंच के स्पष्टीकरण छपे हैं। अब इसके आगे जाने की जरूरत है। जरा सोचें कि लेखक संघों ने अब तक क्या क्या किया है और आगे क्या कैसे करना है।


सभी संघों के लिए किए जाने वाले कामों की एक सरसरी सूची प्रस्तावित की जा रही है। अनुरोध है कि संघों की प्रासंगिकता पर सुधी जन विचार करें:-
  • प्रत्येक संघ अपने अपने सदस्यों की सूची जारी करे।
  • आमदनी और खर्चे का हिसाब किताब सार्वजनिक किया जाए।
  • अपने काम में पारदर्शिता कायम रखी जाए।
  • युवा लेखकों को जोड़ा जाए।
  • संभावनाशील छात्र लेखकों के लिए कार्यक्रम और प्रतियोगिताएं की जाएं।
  • रस्मी गोष्ठियों से हटकर कार्यक्रमों में नवीनता लाई जाए।
  • गोष्ठियां और कार्यक्रम सिर्फ लेखकों के लिए ही नहीं, पाठकों के लिए भी किए जाएं।
  • पाठ्यक्रमों के निर्माण में हस्तक्षेप करें।
  • लेखकों को लेखकों के बीच ही नहीं, जनता के बीच भी ले जाएं।
  • संघ लघु पत्रिकाओं और पुस्तकों के वितरण में मदद करें।
  • लेखक-प्रकाशक रिश्तों को सुधारें और लेखक के हितों की रक्षा करें।
  • पाठ्यपुस्तक व्यवसाय की निगरानी करें।
  • हिंदी सेवी संस्थाओं की देखभाल/निगरानी करें।
  • लेखक सहायता कोष बनाएं।
  • संघों को सामंती और नौकरशाही वृत्तियों से मुक्त कराएं।
  • पहले लक्ष्य निर्धारित करें और उन्हें पूरा करें। अब आगे जाने की जरूरत है। जरा सोचें कि लेखक संघों ने अब तक क्या क्या किया है और आगे क्या कैसे करना है।

नई दुनिया 20 नवंबर, 2009

Thursday, November 26, 2009

26 11



आज मुंबई पर आतंकी हमले की बरसी है. जिनकी शहादत हुई उनके दुख पता नहीं हम कितने बांट पाएंगे. दूसरे तक पहुंच पाना ही कितना मु‍श्‍िकल हो रहा है. हर कोई अकेले अकेले कंटीली तारों में उलझा हुआ सा है. अंदर बाहर रस्‍मअदायगी बहुत है. पिछले साल हादसे के बाद कविता जैसा कुछ लिखा था. उसे आज फिर पढ़ने का मन है.


मुंबई मेरी जान
आज दूसरा दिन है. मुंबई आतंकवादियों के चंगुल में है। और मन बहुत उखड़ा हुआ है ।




यह शहर नहीं शरीर है मेरा
एक हिस्‍सा छलनी है
आपरेशन चल रहा है कब से
बेहोशी की दवा नहीं दी गई है मुझे
शहर चल रहा है
घाव जल रहा है
खुली आंख से देख रहा हूं सब कुछ
शहर तकलीफ में है
झेल रहा है





हट जाओ तमाशबीनो
अपने काम में लगो





यह कायर का वार है
मैंने इसे जंग नहीं माना है
जंग में मेरा यकीन भी नहीं
पर तुम्‍हें यकीन के मानी पता ही नहीं

Monday, November 23, 2009

हिमाचल मित्र का शरद अंक



हिमाचल मित्र का शरद छप गया है. इस अंक में हम आपके लिए लाए हैं लगभग पचास लेखकों और एक सौ सोलह पृष्‍ठों में महत्‍वपूर्ण और विवधितापूर्ण सामग्री. यदि आप इसे पढ़ना चाहते हैं तो कृपया अपना नाम पता हमें मेल कर दें, प्रतियां बच गईं तो आपको जरूर भेजेंगे.

आर्थिक मंदी पर तापोश चक्रवर्ती की लिखी आमुख कथा - हम तो डूबेंगे सनम तुम्हें भी ले डूबेंगे॥

हिंदी फिल्‍मों के नामी साउंड इंजीनियर कुलदीप सूद से बातचीत॥

रजनीश शर्मा बता रहे हैं राजनैतिक हलचल का राजरंग॥

लोक संस्कृति में - भिति चित्र : शम्मी शर्मा॥ हिमाचली लोकनाटय भगत : रमेश मस्ताना ॥ उंची हेक की कलाकार -निम्मो चौधरी : अशोक जेरथ॥ सोलन की धाम : खेमराज शर्मा॥ कांगड़ा सुहाग गीतों में नारी विमर्श : चंद्ररेखा ढडवाल॥

अनुगूंज - मनोज शर्मा॥

साहित्य - मेरी प्रिय कहानी : रेखा॥ टिप्पणी : निरंजन देव॥ बातचीत : मधुकर भारती॥

कविताएं - कुमार कृष्ण॥ ओम भारद्वाज॥ ओम भारती॥ अशोक जेरथ॥ विवेक शर्मा॥

लघुकथा - कृष्णचंद्र महादेविया॥ विचार मंथन - कुशल कुमार॥

पहाड़ी कलम में - लोक गीत॥ गल सुणा : अनूप सेठी॥ कवितां - रमेशचंद्र शाह॥ गौतम व्यथित॥अशोक दर्द॥

लघुकथा - भगवान देव चैतन्य॥ चाचू भतीजू : गप्पी डरैबर॥ पहाड़ी भाषा में शब्द वर्तनी की समस्या :मौलूराम ठाकुर॥

पर्यावरण - दौड़ो दौड़ो बच्चो! पहाड़ पर आग लगी : डॉ उरसेम लता॥ पहाड़ की बेटियां (कविता) सुरेश निशांत॥

आइना - नीलकंठ पराशर॥ अमन काचरू के लिए (कविता) : नवनीत शर्मा॥

करियर कैफे : पढ़ाई कानून की : सुदर्शन वात्स्यायन॥

भूगोल से आगे - पांडुलिपियों को बचाना जरूरी : रमेश चंद्रा॥ पांडुलिपियों का सर्वेक्षण : बी आर जसवाल॥

अनुवाद के अनुवाद की कहानी : डॉ नरेश॥ प्रेम कौन है और पवन कौन : पवनेंद्र पवन॥

हबीब तनवीर - पहली और आखिरी मुलाकात : अजय सकलानी॥ संजय भिसे॥ तैयब मेहता की याद॥

गेयटी थियेटर की नई पारी : भारती कुठियाला॥ श्रीनिवास श्रीकांत॥ त्रिलोक मेहरा॥ दयाल प्रसाद॥संवाद मित्र॥

यात्रा - हिमाचल दर्शन : शैलेश सिंह॥

आस्वाद और परख में - श्रीनिवास श्रीकांत की कविताओं पर नरेश चंद्रकर और जगन्नाथ पंडित॥ मोहन साहिल की कविताओं पर सुजाता॥ हरि मृदुल की कविताओं पर सतीश पांडेय॥ अकादमी की किताबों पर श्रीहर्ष तैलंग॥

Wednesday, November 18, 2009

भाषा को हमने जीवन में जगह नहीं दी






महाराष्ट्र की नवनिर्वाचित विधान सभा में शपथ लेने की भाषा के बारे में जो कुछ हुआ, वह भाषा विमर्श पर कुठाराघात ही है। महाराष्ट्र में हिंदी भाषा का विरोध पहले से एक राजनैतिक हथियार बना हुआ है। विधान सभा में हुई हाथापाई का मतलब है, यह हथियार और पैना हुआ है। इससे राजनीति तो पता नहीं कितनी सधेगी, लेकिन लोगों के दिलों पर जख्म ज्यादा गहरे लगेंगे। कहते हैं, दर्द चला जाता है जख्मों के निशान नहीं जाते। ये जख्म चोट, पीड़ा और अपमान को बार बार याद दिलाते रहेंगे।
इस मसले को इस नजर से देखे जाने की जरूरत है कि आज भारतीय भाषाएं कठिन दौर से गुजर रही हैं। चाहे मराठी हो चाहे हिंदी, या गुजराती हो या कन्नड़। परिवर्तन इतनी तेजी से और आक्रामकता से हो रहा है कि भाषाएं गैर जरूरी सामान की तरह पीछे छूटे जा रही हैं। जैसे किसी नौजवान को शहर में नौकरी मिल जाए तो मां उसे अचार, गुड़, कपड़े और मुसीबत के वक्त के लिए पैसे देगी। लेकिन नौजवान तो जीवन को नए सिरे से शुरू करना चाहता है। उसे सफल होना है। और वहां न घर के बने अचार की जगह है, न देसी गुड़ की। बाजार अपना जाल बिछा कर सरे आम बैठा हुआ है। नौजवान को उसमें फंसना ही है। वह भी खुशी-खुशी। वह मनभावन खाएगा, तनभावन पहनेगा। नई जगह, नई नौकरी, नए कारोबार में पुराना कुछ भी काम नहीं आने वाला। इस पुराने में भाषा भी है। अगर नौजवान सफल और ऊंची नौकरी पर है तो जाहिर है वह अंग्रेजी के हाई वे से होकर आया है। भारतीय भाषाओं की पगडंडियां अंग्रेजी के हाई वे के अगल बगल छोड़ने के बाद ओझल हो जाती हैं। जैसे वक्त के साथ मां बाप पुराने पड़ने लगते हैं, फिर थोड़े कम जरूरी होते जाते हैं, हमारी भाषाएं भी उसी तरह गैर जरूरी हो गई हैं।
इसका यह मतलब नहीं है कि जो लोग ऊंची नौकरियों पर नहीं हैं, या महानगरों में नहीं हैं, वे लोग अपनी भाषा को ज्यादा महत्व देते हैं। तरक्की हर कोई करना चाहता है। यह समझ लिया गया है कि तरक्की के लिए अंग्रेजी की जरूरत है। यह एक सामाजिक सच्चाई भी है। भारतीय भाषाएं बोलचाल में तो फलफूल रही हैं, पर ठीक ठाक नौकरी के लिए अंग्रेजी की ही जरूरत है। इससे यह कड़वी सच्चाई सामने आती है कि जब तक मुल्क गरीब रहेगा, गांव बचे रहेंगे, तब तक भारतीय भाषाएं और बोलियां बची रहेंगी। लेकिन तरक्की तो अनिवार्य प्रक्रिया है। भाषा को बचाने के लिए लोगों को सुख सुविधा से वंचित नहीं रखा जा सकता। यह अंतर्विरोध है, जिसकी तरफ बुध्दिजीवियों को ध्यान देना चाहिए। योजनाकार इस मुद्दे पर नहीं सोचते। राजनेता तो बिल्कुल ही नहीं। वे तो बल्कि जड़ों में मट्ठा डालने का काम कर डालते हैं।
इतने जटिल और कठिन समय में अस्मिता के नाम पे प्रदेश और भाषा को चंदन की तरह घिसकर तिलक किया जा रहा है। यह भावना में भिगोया हुआ तिलक नहीं है। यह कूटनीति के अम्ल में बुझा हुआ राजतिलक है। मनसे ने भाषा का राजतिलक लगाकर अपने रणबांकुरों को खुला छोड़ दिया है। यह हिंदी भाषी जनता के विरोध का ही दूसरा पहलू है। पहले गरीब उत्तर भारतीय हमले की जद में था। अब विशेषाधिकार प्राप्त क्षेत्र में हल्ला किया गया। अब हो यह रहा है कि चारों तरफ से तलवारें खिंच रही हैं। शपथ मानले पर मनसे बैकफुट पर आ गई तो उसने स्टेट बैंक में क्लर्कों की भर्ती की परीक्षा में मराठी मानुस का मुद्दा उठा लिया। वे परीक्षा रोकना चाहते थे। शिव सेना उनके विरोध में डट गई कि परीक्षा का होना जरूरी है। साफ है कि प्रदेश और भाषा की राजनीति हो रही है। सचिन तेंदुलकर ने मुंबई को भारत का बताया तो बाल ठाकरे उबल पड़े। उनकी पार्टी युवा वर्ग पर बगावत का आरोप भी लगा चुकी है। कुछ हफ्ते पहले उषा मंगेशकर ने भी एक टीवी प्रोग्राम में मराठी राग पर अच्छी लताड़ लगाई थी। लेकिन सत्तासीन कांग्रस और उसके सहयोगियों में बेहतर प्रबंधन की इच्छा नहीं दिखती है। ऐसे में सनसनी के भूखे मीडिया की मौज है।
मीडिया की तो अजीब हालत है। बिग बॉस में एक जेल बनाई गई है। वहां सजा देने का कोई मुद्दा नहीं मिला तो दो बार अंग्रेजी बोलने वालों को जेल की सजा सुनाई गई। एक आदमी को जिम्मेदारी दी गई कि कोई अंग्रेजी बोलता हुआ पाया जाए तो उसे जेल में डाल दो। भले ही यह खेल है लेकिन इतना हिंदी प्रेम! चैनल को पता है हिंदी से टीआरपी बढ़ेगी। इधर मनसे को पता है हुड़दंग करने से उसकी टीआरपी बढ़ेगी।
इन दोनों विपरीत स्थितियों में भाषा का खाना खराब हो रहा है। एक तो पहले ही हीनताग्रंथि की शिकार, ऊपर से इतनी थुक्का-फजीहत और मार-पीट। भाषा बेचारी को मुंह छिपाने को जगह नहीं मिलेगी। मनसे बोलेगी मराठी बोलो। अबू, लालू, पासवान, अमर सिंह बोलेंगे हिंदी बोलो। मीडिया मध्यस्थ बन रहा है। इस खींचतान में भाषाओं के ताने-बाने फटेंगे। मराठी के पक्ष में मनसे बाहुबल का प्रयोग कर रही है। शिव सेना रणनीतिक बयान देती है। महाराष्ट्र की कांग्रस और एनसीपी मुंह छिपाती है। इस मुद्दे का राजनैतिक लाभ हर कोई लेना चाहता है। हिंदी के पक्ष में लालू, मुलायम, पासवान वगैरह ही रह गए हैं। ये पिछड़ों के नेता हैं। कांग्रसियों में न हिम्मत है न इच्छा। असल में मनमोहनी सरकार में भाषा के लिए कोई जगह नहीं है। एक तो यह टेक्नोक्रेटों ब्यूरोक्रेटों जैसी सरकार है। नेता लोग पिछाड़ी बिठाए गए हैं। दूसरे विकास के जिस एजेंडे पर भारत अब तक चला है, उसमें भाषा को जगह है ही नहीं। नई आर्थिक नीति के बाद इस एजेंडे की रफ्तार बढ़ी ही है। इसलिए वे झगड़े में नहीं पड़ेंगे। भाषा संबंधी कानून भी जंग खाई मशीनों की तरह हैं। सिर्फ दिखाने के लिए, वे काम नहीं करते।
मसला हिंदी मराठी गुजराती बंगला का नहीं है। मसला यह है कि इन भाषाओं को हमने संस्कृति के हिस्से की तरह अपने जीवन में जगह नहीं दी। न हमने अपने बच्चों को किताबे पढ़ना सिखाया, न कलाओं का आस्वाद लेना। अलबत्ता, ऐतिहासिक स्मारकों में अपने नाम खोदने के लिए बच्चों के दिमाग में शरारत और हाथ में चाकू जरूर थमा दिया, जैसे बंदर के हाथ में उस्तरा। इसके अलावा जिस तरह भौगोलिक और सामाजिक दृष्टि से बेतरतीब विकास हुआ है, उसी तरह जीवन की भीतरी जरूरतों में भी बेतरतीबी और लापरवाही रही है। इससे सांस्कृतिक दिवालियापन बढ़ा ही है। भाषा, साहित्य, कला, जीवन मूल्यों के प्रति हमारी संवेदनाएं धीरे धीरे मरती गई हैं। नकलीपन हावी होता रहा है। अब इन मसलों को राजनैतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। यह उसी समाज के लक्षण हैं जिसकी आत्मा धीरे धीरे मर रही हो। जो भीतर से खोखला हो रहा हो। नकलीपन कब तक साथ देगा।
ऐसे में सकारात्मक काम करने की जरूरत हमेशा बनी रहेगी। बल्कि दिनों दिन बढ़ेगी ही। विधान सभा में जिस दिन हंगामा हुआ उसके अगले ही दिन मुझे एक कार्यक्रम में शामिल होने का मौका मिला। साने गुरूजी राष्ट्रीय स्मारक ट्रस्ट एक अनुवाद सुविधा केंद्र चलाता है। इसमें उदय प्रकाश के कहानी संग्रह अरेबा परेबा के मराठी अनुवाद के लिए जय प्रकाश सावंत को पुरस्कृत किया गया। एक तरफ राजनीति में भाषा को हथियार की तरह भांजा जा रहा था और दूसरी तरफ दोनों भाषाएं गले मिल रही थीं और पुरस्कृत हो रही थी। जहां तलवारों की सनसनी थी वहां मीडिया की भीड़ थी। और जहां भाषा मिलन हो रहा था, वहां थोड़े से लोग और मंद आवाज में बोलने वाले मीडिया कर्मी थे। इस तरह की विडंबनाएं सोचने पर मजबूर करती हैं। और बार बार भाषा को गंभीरता से लेने की जरूरत महसूस होती है।


इस लेख का एक पाठ अमर उजाला में छपा है.

Saturday, November 14, 2009

अनुवाद पुरस्‍कार


अभी कुछ दिन पहले उदय प्रकाश ने अपने ब्‍लाग पर खबर दी थी कि उनकी पुस्‍तक अरेबा परेबा के मराठी अनुवाद को पुरस्‍कार मिला है. अनुवादक जय प्रकाश सावंत को यह पुरस्‍कार देने का मौका मुझे मिला. अपने अग्रज साहित्‍यकार की पुस्‍तक के मराठी अनुवाद के पुरस्‍कार समारोह में इस तरह शामिल होना बड़ा शुभ रहा। यह नवंबर की 10 तारीख थी. शायद एक दिन पहले ही महाराष्‍ट्र वि‍धान सभा में हिंदी में शपथ लेने पर हाथापाई जैसी शर्मनाक घटना हो चुकी थी. उसी शहर में एक भाषा का दूसरी भगिनी भाषा में अनुवाद पुरस्‍कृत हो रहा था. और मैं इस सकारात्‍मक प्रतिपक्ष का प्रत‍िभागी रहा, इसका संतोष और गर्व है.

साने गुरूजी राष्‍ट्रीय स्‍मारक ट्रस्‍ट एक अनुवाद सुवि‍धा केंद्र चलाता है जहां रहकर अनुवाद कार्य किया जा सकता है. मेरे लिए यह जानकारी बड़ी आह्लादकारी थी. क्‍योंकि भारतीय भाषाओं में परस्‍पर अनुवाद की बहुत ज्‍यादा जरूरत है. और इस तरह की सुविधाएं हमारे देश में ज्‍यादा नहीं हैं। बल्कि अनुवाद को उतना सम्‍मान का दर्जा भी हासिल नहीं है. हिंदी में इस तरह के अनुवाद का शायद ही कोई केंद्र हो. अगर आपकी जानकारी में हो तो अवश्‍य बताएं.