Saturday, September 24, 2011

पलायन के दौरे


अचानक स्लिप डिस्क वाली दर्द उभर आई है। जुकाम तीसरे दिन भी शांत नहीं हुआ। जिस कारण दफ्तर नहीं गया। सोचा। होम्योपैथी दवाएं पढ़ीं। अमरकांत का उपन्यास सूखा पत्ता पढ़ना शुरू किया। डायरी लिखते समय एक ख्याल हमेशा आता है कि अमूमन डायरी रात में लिखने की धारणा क्यों है? या यह सिर्फ मेरे मन में बैठी बात है या तमाम तमाम चीजों से सामना रात के निस्तब्ध अंधकार में ही संभव है। दिन का उजाला, हरकत, खलल चीजों को बेपर्दा देखने नहीं देते।

तीन एक दिन पहले सतना से कमला प्रसाद आए थे। अपने बेटे की स्लिप डिस्क के इलाज के सिलसिले में। शुक्रवार को विनोद श्रीवास्तव के दफ्तर में मिलना तय था। लेकिन पलायनवाद का ऐसा घनघोर दौरा पड़ा कि सारी बातें भूलकर घर आ घुसा। मन भारी बना रहा। सुमनिका को भी दुखी किया। पलायन की यह वृत्ति नई नहीं है। बहुत वर्ष पहले बंबई में एक संबंधी आंनद की शादी में गया था। थोड़ी देर वहां रह कर भाग खड़ा हुआ। खाना खाने की हिम्मत नहीं हुई। संजय खाती नवभारत टाइम्स में रात की पाली में था। उसके पास गया। कल्पना रेस्टोरेंट में हम दोनों ने खाना खाया।

इधर पढ़ने लिखने का काम संतोषजनक ढंग से न कर पाने के कारण उदासी स्थाई भाव बन गया है। इससे और ज्‍यादा गड़बड़ हो रही है। काला चिकना दलदल है। जो अपने भीतर खींचता ही जाता है। सुमनिका बराबर कोशिश करती रहती है। तरह तरह से। पर खुद से ही कुछ बन नहीं पाता।

कमला जी से शुक्रवार को न मिल पाने का अपराध बोध तब और बढ़ गया जब इतवार को उनका फोन आ गया कि आज (इतवार) रात वे वापिस जा रहे हैं। तभी तय कर लिया कि मैं और सुमनिका उनसे मिल के आएंगे। रमन जी से भी कहा। वे तैयार भी हुए, पर ऐन मौके पर ठिसर गए। वीटी तक जाते समय मैं और सुमनिका लोकल में इसी उदासी, नाकारापन के बारे में बात करते रहे। उसका मत है कि हमेशा नेगेटिव ही क्यों देखा जाए। और कुछ न कुछ अवश्य लिखते रहना चाहिए। कुछ दिन पहले तो वह मुझे पहाड़ी जीवन पर एक उपन्यासिका लिखने की सलाह दे रही थी। मैं इस बात से चिढ़ गया कि मैं तो कविता लिखना चाहता हूं। उपन्यास क्यों लिखूं? हालांकि यह एक और मूर्खतापूर्ण सोच है।

आचर्श्य है कि कमला जी से जो थोड़ी देर बात हुई, उसमें भी निष्कर्ष यही था, बल्कि उनकी सलाह थी कि लिखने का अभ्यास बंद नहीं करना चाहिए। कुछ न कुछ अवश्य लिखते रहना चाहिए।
27-7-98

Tuesday, September 13, 2011

हिंदी का जन्मदिन



बाल कवि बैरागी ने एक जगह कहा है, 'अकेली हिंदी ऐसी भाषा है, जिसके पास 14 सितंबर 1949 के कारण उसका जन्मदिन है, राजभाषा के तौर पर। ... किसी भी राजभाषा के पास अपना जन्मदिन नहीं है। यह इसे संविधान से मिला है।' जन्मदिन मनाना, एक भला विश्वास है। जन्मदिन मनाना और मगन रहना, यह भोला विश्वास है। बच्चे भी बारह चौदह की उमर तक आते आते इस पार्टीबाजी से आजिज आने लगते हैं। यूं शोशेबाजी और सत्ता का जलवा दिखाने के लिए भी इस खास दिन का इस्तेमाल होता है। ऐसे मामलों में उमर माने नहीं रखती। लेकिन आमतौर पर पचास पचपन की उमर कुछ कर दिखाने के लिए काफी होती है। सवाल यह है कि क्या हिंदी ने हर साल नियम से अपना जन्मदिन मनाते रहने के बावजूद कुछ हासिल किया है या सिर्फ इसकी पूजा अर्चना ही होती रही है।

इस सारे अनुष्ठान को पाखंड कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि यह तो श्राद्ध दिवस है। उन्हें यह तोहमत लगाने का बहाना इसलिए भी मिल जाता है क्योंकि 14 सितंबर पित्र पक्ष में आता है। असल में ऐसा कहना खीझ का इजहार है। जहां सारा साल सारा काम अंग्रेजी में होता हो और सिर्फ एक दिन हिंदी का गुणगान किया जाता हो, वहां सच्चाई का इस तरह प्रकट होना स्वाभाविक है।

हिंदी की स्थिति असल में ही बड़ी विचित्र है। ‘बेचारी’ विशेषण लगाए बिना कोई बात शुरू नहीं करता। गरियाए बिना खत्म नहीं करता। रचनात्मक हिंदी का परचम लहराने वाले सरकारी हिंदी की ऐसी तैसी करते रहते हैं। यह अनुवाद की नहीं भ्रष्ट अनुवाद की भाषा है। हिंदी की प्रकृति इसमें नहीं है। अपठनीय है। हिंदी का ही नुकसान कर रही है। इन बातों में बड़ी सच्चाई है। पर कुछ बातें इस निंदा जोश में छूट जाती हैं।

व्यवहार में सरकारी कामकाज की भाषा अभी भी अंग्रेजी है। कानूनी तौर पर अंग्रेजी के साथ हिंदी को चालू रखने की नीति बरकरार है। चूंकि काम अंग्रेजी के बिना नहीं चलता इसलिए कानूनी खानापूरी करने के लिए हिंदी अनुवाद किया जाता है। इस काम में भी कोताही होती रहती है। गंभीरता भी नहीं है। क्योंकि न करो तो भी फर्क नहीं पड़ता। जब संसदीय समिति वगैरह का दबाव पड़ता है तो हिंदी का गाना गा लिया जाता है। अगर पता चले कि कल से हिंदी का कानून खारिज हो रहा है, तो सरकारी हिंदी आज ही से बंद हो जाएगी। फिर जिन दफ्तरों के बोर्डों पर आज कम से कम नाम हिंदी में दिख जाता है, वह भी ओझल हो जाएगा। गाहे बगाहे जो फार्म हिंदी में मिल जाता है, वह भी अंग्रेजी में ही होगा। हिंदी भाषी प्रदेशों में जो लोग इसी दुरूह, कठिन, भ्रष्ट हिंदी का धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं, उन्हें भी अंग्रेजी की शरण में जाना पड़ेगा। भाषा के तौर पर वह अंग्रेजी कितनी सही होगी, अंदाज लगाया जा सकता है।

आज भी अगर हिंदी के कानून का पालन सही ढंग से होने लग जाए तो अगले दस वर्षों में हिंदी सब जगह दिखेगी ही नहीं, उसका रूप-स्वरूप भी सुधर जाएगा। अगर लिखने वाले पर यह दबाव रहे कि उसका लिखा पढ़ा जाएगा तो, या तो भाषा शुद्ध और समझ में आने लायक हो जाएगी या फिर उसका भ्रष्ट और अपठनीय रूप ही प्रचलन में आ जाएगा। कानून यह कहता है कि जिस दफ्तर में अस्सी फीसदी से ज्यादा लोगों को हिंदी आती हो, वहां चिट्ठी पतरी हिंदी में ही भेजी जाए। अंग्रेजी अनुवाद, न भेजा जाए, न किया जाए। जहां इससे कम लोग हिंदी जानने वाले हों, वहीं अंग्रेजी अनुवाद भेजा जाए। नुक्ते की बात है - हिंदी का अंग्रेजी अनुवाद। मतलब मूल चिट्ठी हिंदी में लिखी जाए। अगर खतो खिताबत मूल हिंदी में होने लग जाए तो भाषा की तासीर बची रह जाएगी। भले ही टूटी फूटी हो या मानक न हो। व्यवहार में होता इसके उलट है। मूल अंग्रेजी में लिखा जाता है। फिर उसका तर्जुमा होता है। जो खानापूरी के लिए होता है, पढ़े जाने के लिए नहीं। बहुत दफा तो सुना है तर्जुमे का तर्जुमा होता है। मानो किसी हिंदी भक्त ने हिंदी में चिट्ठी लिख दी। जब तक उसका अंग्रेजी में अनुवाद न हो जाए, उस पर कार्रवाई नहीं हो सकती। कार्रवाई, जाहिर है अंग्रेजी में होगी। उसका जवाब भी अंग्रेजी में बनेगा। पिर अगर कानून याद रह गया कि हिंदी में मिली चिट्ठी का जवाब हिंदी में जाएगा तो उसका हिंदी में अनुवाद होगा। इस कवायद में भाषा का कितना कचूमर निकलेगा, कोई क्या कह सकता है।

दफ्तरों में हिंदी के इम्तिहान भी पास कराए जाते हैं। इनके बारे में आम राय यह है कि इन्हें पुरस्कार पाने के लिए पास किया जाता है। हिंदी में काम करने के लिए नहीं। अगर स्कूल में हिंदी जरूरी तौर पर पढ़ाई जाए तो थोड़ी मदद मिलेगी। हालांकि जो पढ़ के आए होते हैं, वे भी धीरे धीरे भूल जाते हैं। क्योंकि भाई लोगों को कभी हिंदी में लिखने का मौका ही नहीं मिलता। और पढ़ने की फुर्सत किसे है। ऊपर से शान के भी खिलाफ है। अब इसकी काट यह है कि जब तक सारी पढ़ाई और ऊंची पढ़ाई का माध्यम हिंदी नहीं होता, हिंदी सही माने में लागू नहीं हो सकती। इस बारे में कोई बात नहीं करता। मसला ऐसा है कि सिर्फ हिंदी से भी काम नहीं चलेगा। सारी भारतीय भाषाओं को शिक्षा का माध्यम बनाया जाना चाहिए। अगर बिजनस, डाक्टरी, इंजीनियरी, कानून, विज्ञान, कामर्स वगैरह की पढ़ाई मनचाही भारतीय भाषा में होने लग जाए तब तो  नक्शा ही बदल जाए। लोकतंत्र बच जाए। विकास को नई दिशा मिले। ग्रामीण भारत का कायाकल्प हो जाए। भाषाओं को प्राणदान तो मिल ही जाएगा। अगर बच्चा अपनी भाषा में पढ़ाई करके नौकरी पा जाएगा तो समाज की नजर में भाषा का महत्व बढ़ जाएगा। वो जमाना बीत गया जब साहित्य के बल पर भाषाएं महान हुआ करती थीं। अब तो यही देखा जाता है कि भाषा में सूचना कौशल कितना है। तो बनाइए भाषा को वैसा। उस तरह की भाषा को स्वीकार करने वाला समाज भी तो बनाना पड़ेगा।

आंदोलन करके ऐसा हो जाए तो सर्वोत्तम। लेकिन आंदोलनों का जमाना भी क्षीण पड़ गया लगता है। अगर सरकार ही कुछ सख्त और ठोस कदम उठा ले तो शायद भाषा को कुछ विटामिन मिल जाएं। सरकारी नीति आंकड़ेबाजी के तिलिस्म से बरी हो जाए। हिंदी विभाग संस्कृति कर्मी की तरह काम करें। सिर्फ हिंदी में काम करना जरूरी हो जाए। लेकिन इच्छाशक्ति किसमें है? यह तो जागते में सपना देखने जैसा है।

Saturday, September 10, 2011

श्याम बेनेगल की चार फिल्में


इच्छा दब ही नहीं, शायद मर भी गई थी। एनसीपीए के फिल्म सेंटर की सदस्यता का नवीनीकरण तो करवा लिया था, पर देखने जाने की इच्छा नहीं होती थी। प्रभात चित्र मंडल की सदस्यता लेकर फिल्में देखने का ख्याल भी करने की हिम्मत नहीं होती थी। बचते चले जाने की मानसिकता बन गई थी।

इस बार श्याम बेनेगल की सारी फिल्में दिखाई जाने लगीं तो उत्सव के दूसरे दिन अचानक जोश आ गया और साल भर की सदस्यता ले ली। इतना ही नहीं, जुलाई महीने की चार फिल्में भी देख डालीं। यह अनुभव अच्छा रहा। फिल्में देखीं, चरणदास चोर, निशांत, मंथन और भूमिका।

श्याम बेनेगल अपने माध्यम के मास्टर हैं। हर फिल्म अपने आप में संपूर्ण है। उद्वेलित करती है। चरणदास चोर काफी हद तक हबीव तनवीर के नाटक पर आधारित है। संगीत वही है, कलाकार वहीं हैं। पर कल्पना की उड़ान नाटक से कहीं ज्‍यादा है। खूब खेलते हैं और मानव स्वभाव पर अनजाने में टिप्पणियां करते चले जाते हैं।

निशांत सामंती दरिंदगी को तहस नहस करने की शुरूआत करने की फिल्म है। नायक की पत्नी का जमींदार के बेटों द्वारा उठा लिया जाना, नायक की लाचारी और फिर धीरे धीरे शोषित लोगों को इकट्ठा करना और बदला लेना। हालांकि यह लगा कि पीड़ा, दुख-तकलीफ दरिंदगी का चित्रण जितना सघन और सजीव है, परिवर्तन की शक्तियों को इकट्ठा करने के प्रयासों का चित्रण संकेतात्मक है। उसकी तैयारी जो वास्तव में कहीं बहुत दुष्‍कर कार्य है, लगभग असाध्य, वह गुपचुप होता चला जाता है और एक छोटी सी क्रांति भी हो जाती है। संघर्ष की इस तैयारी की भीतरी दुनिया या नजदीक से, माइक्रोस्कोपिक स्टडी उसमें नहीं दिखती। 

मंथन सहकारिता आंदोलन पर बड़ी कलात्मक और श्रेष्ठ फिल्म है। इस तरह के राजनीतिक विषय पर एक कलाकृति तैयार करना एक बड़ी प्रतिभा के दर्शन करवा देता है। समाज की भीतरी तहें बहुत साफ हो के  सामने आती हैं।

भूमिका बहुत तनाव देने वाली फिल्म है। हमारे समाज में स्त्री कलाकारों की जो हालत रही है, पुरुष वर्चस्व में वे जिस तरह जकड़ी रहती हैं, उसका बहुत सटीक और मार्मिक चित्रण इसमें है। कला-संस्कृति समाज और स्त्री की व्याख्या संपूर्ण गंभीरता से की गई है। स्त्री को स्त्री होना ही नसीब नहीं है। वह अंत तक भटकती रहती है। उसकी किस्मत में अंतत: अकेलापन ही है।
22-7-98

Thursday, September 1, 2011

सहजता का अप्रतिम रूप



सुमनिका से आज बात होने लगी पाठकता के बारे में, कि कविता के पाठक कवि लेखक ही हैं। वह भी मित्र कवि लेखक। उसने कहा कि नहीं पाठक हैं। अध्यापन यानि छात्रों के अनुभव के आधार पर यह कि उन्हें उपन्यास कहानी की बजाये कविता अच्छी लगती है। हालांकि कविता पढ़ने के लिए ट्रेनिंग की जरूरत भी है। ये बात तो ठीक है, लेकिन मुझे यह लगता है कि कविता के पाठक नहीं हैं। हैं भी तो बहुत थोड़े।

सुमनिका से ऐसे मुद्दों पर बहस हो जाती है। मैं किसी बात का एक पक्ष रखता हूं, वह दूसरा पक्ष रखती है। और बात कुछ ऐसा मोड़ लेती है कि हम एक-दूसरे के विरोधी हो जाते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि मेरे किसी विचार पर अगर विरोध की इतने गुंजाइश है या सहमति से इतना दूर है तो मेरी तर्क पद्धति में कोई गड़बड़ है। इससे लगता है कि चीजें जिस तरह समझ में आ रही हैं या जो समझ उनके लिए बन रही है, वह गलत है। अब समझ का तर्क ही गलत है तो उस पर आगे कैसे बढ़ा जाए।

सुमनिका को भी विरोध की या असहमति की गुंजाइश दिखती होगी, तभी तो वह बहस करती है। हालांकि ये भी है कि चूंकि हम सहजता से बात कर लेते हैं तो वह बहस के मूड में आकर मेरे द्वारा रखे गए विचार के दूसरे पहलू खोजने लगती है। यह बात वह कहती भी है। यह सहजता का एक लक्षण भी है। दूसरे लोगों से बहस करते समय वह शिष्टाचार का ख्याल रखती है जिसके कारण मन की बात नहीं कह पाती। या हां में हां मिलाती जाती है।

तो क्या मैं यह चाहता हूं कि वह मेरे साथ भी हां में हां मिलाए। कतई नहीं। मैं चाहता हूं वह अंतर्मन से सहज रहे। जैसा उसे लगता है वैसा ही कहे। लेकिन ऐसा भी न हो जो बात कही गई है उसका प्रतिवाद ढूंढना ही है। तर्क तो असल में ऐसा सिक्का है जिसका दूसरा पहलू होगा ही होगा। लेकिन हमारा मकसद तो सच्चाई तक पहुंचना है। बहस में जीतना जिताना नहीं।

सुमनिका ने यह भी कहा कि पुरुष वृत्ति है कि मेरी बात मानी जाए। यह गलत है। मैं चेतन स्तर पर अपनी बात थोपने की बात सोच भी नहीं सकता। अवचेतन में कोई बात हावी रहती हो तो वह बस के बाहर होगी।

स्त्री-पुरुष के भेद से परे रहने की भरसक कोशिश करता हूं। जीन्स में व्याप्त पुरुष वृत्ति हावी होती होगी, तो उसके प्रति सचेत भी रहना चाहता हूं। इस बात का निर्णय वही कर सकती है। सुमनिका ही बता सकती है मैं कितना हावी होता हूं। शायद होता भी हूं। पुरुष होने के नाते भी। स्वभाव के नाते भी।

इन सारी बहस-मुबाहसों के होते हुए भी एक बात तय है कि हम बने हैं एक-दूसरे के लिए ही। दुनिया के, दुनिया के क्यों, दुनिया के परे के भी तमाम मुद्दों पर हमारी सोच एक सी ही है। मकसद एक है, सरोकार एक है। उसकी समझ पर मुझे गर्व है। भरोसा है। उसकी सादगी पर मैं न्यौछावर हूं। भलमनसाहत का उसका गुण, दिलेरी का उसका स्वभाव, पारदर्शिता से भरा पाक साफ स्फटिक मन उसकी ऐसी पूंजी है जो मुझे सराबोर करती है। प्यार से लबालब भरती है। यह अलग बात है कि उसे यह लगता रहता है कि मैं उससे प्यार नहीं करता। लेकिन ये विपरीत विचार शायद इसी नुक्ते का हिस्सा है कि पक्ष है तो प्रतिपक्ष रखा जाए। इस नुक्ते का भी अपना ही मजा है। सहजता का रूप भी अप्रतिम है। 

8-3-98

Sunday, August 28, 2011

कविता: कितनी मजबूरी, कितनी जरूरत

यह पूरा अंक यहां रखा है.

डायरी के कुछ अंश ऊना, हिमाचल प्रदेश से गुरमीत बेदी की पत्रि‍का पर्वत राग में छपे थे. 
उसके नए अंक की प्रतीक्षा है जो लीलाधर जगूड़ी पर केंद्रित है.  


इतने लंबे अर्से के बाद यहां होना बता देता है, जीवन के क्या हाल हैं। यूं सब ठीकठाक चल रहा है। साहित्य जीवन से गायब है। संग साथ भी वैसा नहीं है। पढ़ना यादा हो नहीं पाता। जो होता है वह यांत्रिक प्रकार का होता है। जीवन की चिंहुक बनाए रखने के लिए शायद मेहनत करनी पड़ती है। जीवन को बीच में धंसकर भोगना लेकिन फिर भी उससे मुक्त रहना। उसी तीसरी आंख से देख सकने की कूबत पैदा करना। और वही होता नहीं है। धंस गए तो धंस गए उसी मध्यम वर्गीय चहबचे में। उबरे रहे तो उखड़े रहे। बेमन अनमने हाशिए पर। जब तक धंसकर अलग नहीं होंगे, वह भी पूरी शिद्दत से, तो कविता कहां से होगी। कविता का छलावा होगा। पेशागत मजबूरी के तहत घसीटे गए शब्द होंगे। मुझे बार-बार लगता है कि कविता  को पेशागत मजबूरी की तरह नहीं लेना है। आंतरिक जरूरत ही इसकी होनी चाहिए। पेशागत मजबूरी का एक बड़ा जीवंत दृश्य है। उसे मजेदार नहीं कहना चाहिए। मजबूरी के सूखे हुए आंसू उसमें हैं। अभी कुछ दिन पहले हम लोग (मैं सुमनिका और बेटी अरुंधती..) धर्मशाला से लौट रहे थे। पठानकोट चक्की बैंक स्टेशन पर एक घंटा ट्रेन की प्रतीक्षा करनी थी। वहां तीन बालक नाच-गाना दिखाकर पैसा मांग रहे थे। पुलिस वाले कुर्सियां बिछाकर बैठे थे। सबसे बड़ा करीब 12 साल का बालक ढोलक बजाता और गाना गाता था। उसके दो भाई करीब 9 साल का और कोई 6 साल का नाच करते थे। पंजाबी लोक ताल के संस्कार में फिल्मी गाने ब्रेक नृत्य के साथ। छोटे-छोटे बालक कूल्हे बाहें गर्दन मटकाते थे। काठ की तरह देह को झटक देते थे। सोचते कुछ थेे, देखते कुछ थे, करते कुछ थे। टे्रन में भ्भी शायद जालंधर तक आए। उसी मुद्रा में गाते नाचते। इस बीच शायद उन्होंने 10-15 रुपए भीख की तरह पा भी लिए हों। सामाजिक तिरस्कार के शिकार। कुपोषण के शिकार। अपेक्षाकृत सरल साधन से पैसा बटोरने का इंतजाम करते हुए। सोचते तो शायद वे यही होंगे कि ट्रेन वालों को, पुलिस वालों को खुश रखा जाए। बेमन से कुल्हा या हाथ या गर्दन मटका के दर्शकों को खुश कर दो। एक-दो रुपया या अठन्नी, चवन्नी निकल आए। बाप या बड़े भाई या ठेकेदार को देने वाले पैसों से छुपाकर अपने लिए टॉफी, गोली खा ली जाए। बंद-छोले खा लिए जाएं ।

कुछ ऐसी ही पेशागत मजबूरी उस व्यक्ति की है जो कवि साहित्यकार बने रहना चाहता है। उसके लिए कुछ लिखतेs रहना चाहता है। दो तीन महीने में उसकी कविता कहीं दिख जाए। साल दो साल में संग्रह छप जाए। समीक्षा चर्चा होती रहे। सभा गोष्ठी में नाम ले लिया जाए या कविता वांचने का मौका मिल जाए।
सार यह कि जैनुइन या खरी कविता आज कितनी है और कहां है? कवि के पास जीवन धन कितना है? वह कैसे अपने को बनाए रखता है? अपने को कितना सघन और व्यापक बना पाता है? और अंतत: उसकी कविता पहुंचती कहां है? उसके पढ़ता कौन है? क्या वह अपना पेशा निभाता है? अपनी आंतरिक मजबूरी के तहत लिखता है? क्या वह स्वांत: सुखा; है? उसका समाज में क्या दखल है? कविता में आज कितनी ताकत बची है? उसका सरोकार क्या है? वगैरह-वगैरह..ये सवाल इतने जटिल और दुरुह हैं कि जवाब सूझते नहीं हैं। और जीवन सपाट और सतही और संवेदनहीन होता चला जाता है। इस शोक स्थिति का कोई अंत कहीं नजर नहीं आता।
11-06-97

Sunday, August 14, 2011

बरसात और छाता



पिछली बरसात में छाते पर चर्चा चली थी. इस बीच हमारे बड़े भाई तेज जी ने वो पोस्‍ट देखी और छाते पर यह टिप्‍पणी भेजी -

तुम्हारे ब्लाग में से मैंने "छाता" पढ़ा तो मुझे छत्तरोड़ू की बड़ी याद आई,  वो वचपन की सारी यादें... तुम्हें शायद याद होगा कि नहीं, ग्रामीण लोग "ऒड्डी" भी ओढ़ते थे जो बान्स की चपटियों से बुनी हुई होती थी. सिर के ऊपर बाला सिरा किश्‍तीनुमा और पीठ तक को ढकने बाला हिस्सा चपटा गोल-कट होता था...

छ्त्तरोड़ू

मैं बचपन की तुम्हें याद दिलाता,
गांव में नहीं दिखता था छाता.
(हर कोई नहीं रख पाता था छाता)
होता था तो बस इक "छत्तरोड़ू",
बान्स की डण्डी, ऊपर सूखा "पाता".
झर-झर बरखा औ धान बुआई,
धंसे कीच में सब ’काम्में’ भाई.
सिर पर ओढ़े बोरी का "ओह्डणू’,
कीच में कीच हुये ’अनदाता’.
हां, जिसके के पास होता था छाता,
वो तो  भई "बझिया" कहलाता.

नोट: (हमारे नानू को गांव बाले "बझिया" कहते थे.
क्योंकि उनके पास छाता हुआ करता था)

इस छाता चर्चा के साथ उन्‍होंने दो चित्र बनाकर भेजे, एक छतरोड़ू का जो ऊपर है और एक मुच्‍छड़ जो नीचे है. 

मुच्‍छड़ पर और काम

मुदित (भाई साहब का बेटा और मेरा भतीजा  जो बैंगलोर में है और रंग रेखा और संगीत का धनी है) को कहा कि इस मुच्‍छड़ पर काम करो. उसने उसका कायाकल्‍प कर दिया पर छाता गायब हो गया सिर्फ मुच्‍छड़ रह गया. मतलब अब बरसात बिना छतरोड़ू के ....


मुदित का और काम उसके ब्‍लाग the spare time stuff पर देखा जा सकता है. 

Saturday, August 6, 2011

सुर में आलाप

कवि सुंदर चंद ठाकुर नव भारत टाइम्‍स के मुंबई संस्‍करण के संपादक बने तो उन्‍होंने अखबार में साहित्‍य  कला के लिए थोड़ी जगह निकाली और पुस्‍तक समीक्षा का कालम भी शुरू किया. इसमें मुझे भी समीक्षा करने  का मौका मिला, हालांकि ऐसे कामों में मेरी ज्‍यादा हिम्‍मत नहीं पड़ती है. फिर भी...  
यहां एक और युवा कवि गीत चतुर्वेदी के संग्रह आलाप में गिरह पर संक्षेप में अपनी बात रख रहा हूं. 




 
मुंबई महानगर को भारत का एकमात्र कास्‍मोपोलेटिन शहर माना जाता है. ग्‍लैमरस, अत्‍याधुनिक और निस्‍पृह. हालांकि जो लोग यहां रहते हैं, वे इसके देसी रग-रेशे से वाकिफ हैं. इस वाकफियत का पता गीत चतुर्वेदी की एक कविता ‘जब जाऊंगा’ से लगता है. गीत मुंबई के हैं और वो इस कविता में घर को याद कर रहे हैं जिसमें पानी के लिए भटकते पिता हैं, मद्रासी पानवाला है, परदे के दरवाजे के पीछे सुबकी को छिपाती ब्‍याह दी गर्इ लड़कियां हैं. खंडहर, कटा पेड़, प्‍याऊ भी उनकी याद की पोटली में है. ये महानगर के किसी भीतरी कस्‍बे की यादें हैं. ऐसे कई कस्‍बे इस विराट महानगर में उपनगरों की तरह समाए हुए हैं. गीत उल्‍हासनगर में रहे हैं जहां सिंधी समुदाय का प्राधान्‍य है. सिंधियों के साथ विभाजन की त्रासदी जुड़ी हुई है. और इसी त्रासदी में से होती हुई गीत की कविता लंबी यात्राएं करती है. सभ्‍यता के विकास को खंगालते हुए वे बार-बार युद्ध स्‍थलों में जा पहुंचते हैं. ‘सभ्‍यता के खड़ंजे पर’ चल रहा मनुष्‍य एक कलाकार ही है जो सभ्‍यता की मरम्‍मत करने के लिए समय के आर पार तक की यात्रा कर डालना चाहता है. ‘डेटलाइन पानीपत’ कविता में वे पर्यटन स्‍थल में बदल चुके युद्ध के मैदान की घास, मिट्टी के भीतर घुसते हुए युद्धों और युद्धों के रूप को खंगालते हैं. आज तक चले आते सभ्‍यता के गुप्‍त युद्ध कौशलों को भी वे खोलते हैं. गीत की इस तरह की कविताओं में इतिहास और वर्तमान के बीच खूब आवाजाही है. कभी आवेग भरी, कभी दार्शनिक अंदाज में कभी खिलंदड़ी. ‘सिंधु लाइब्रेरी’ में इस उपमहाद्वीप की बेहद दुखती रग (भारत वि‍भाजन) का जिक्र तो है ही, युद्ध के बाद लुटे हुए नागरिकों की अपने जीवन को फिर से खड़े करने की जद्दोजहद भी है. हालांकि यह युद्ध नहीं था आजादी का छल था. सिंधी समुदाय की तकलीफ, किताबों का प्रेम और भूगोल का बदलना एक साथ इस वृत्‍तांत कविता में चलता रहता है. एक शोकगीत की तरह. विष्‍णु खरे ने अपने सोलह पेजी लेख में, जो इसी संग्रह के है, और भी कई बातों के साथ साथ यह ठीक ही नोटिस किया है कि इस कवि ने आजाद होते हिंदुस्‍तान को नहीं देखा, फिर भी उस त्रासदी को अपनी कविता में ढाला. यह शायद गीत के भीतर स्‍थानीयता की सांद्र उपस्थिति के कारण संभव हुआ है. यही नहीं, ‘लुक्‍खे’ जैसी देशज माहौल की कविता भी इसी धरती की देन है. इन वृत्‍तांत कविताओं में शिल्‍प की मांग के मुताबिक दृश्‍य प्राधान्‍य है, सुगठित चरित्र हैं, संवादात्‍मकता, इतिवृत्‍तात्‍मकता  और नाटकीयता है. इस वैविध्‍य के कारण शब्‍द बाहुल्‍य बाधक नहीं बनता. इसके अलावा ‘सिंधु लाइब्रेरी’ और ‘लुक्‍खे’ में करुणा की धारा बहती रहती है. इतिहास और सभ्‍यता की टोह लेने का काव्‍य-पुरुषार्थ नम आंख, झुके कंधों, हल्‍के पांव और नर्म उंगलियों के बिना संभव नहीं हो सकता. अलबत्‍ता ‘साइकिल के डंडे पर बैठी लड़की’ कविता समाज शास्‍त्रीय खोजबीन ज्‍यादा प्रतीत होती है, प्राण-प्रतिष्‍ठा युक्‍त कृति कम.

कवि का अपना छोटा शहर ‘अरब सागर’ जैसी कविता में महानगर की पूरी विराटता, विकरालता, पेचीदगी, निष्‍ठुरता के साथ विस्‍तार पाता है. ‘नरीमन पाइंट’ भी उसकी एक कड़ी ही है. उसमें भी एक कब्रगाह है जैसे अरब सागर के उदर में कई कुछ समाया हुआ है. अरब सागर और नरीमन पाइंट मिलकर महानगर के छाया रूपक की तरह एक समानांतर सृष्टि करते हैं. यहां भी उदासी और अवसाद है. कस्‍बे, शहर, महानगर, देश, महाद्वीप, वर्तमान, इतिहास में बेजोड़ (सीमलेस) ढंग से विचरण करने की कविता है ‘इतना तो नहीं’. यह बेजोड़पन गीत की कई कविताओं में है.

संग्रह में अलग अलग तरह की कई अन्‍य कविताओं के अलावा करीब ग्‍यारह कविताएं दूसरे कलाकारों कवियों, संगीत, चित्रकृतियों को याद करते हुए लिखी गई हैं. कई कविताएं उन सामान्‍य लोगों पर भी है जो कवि के प्रत्‍यक्ष परोक्ष संपर्क में आए. ‘कॉस्‍मैटिक सर्जरी’, ‘मेरे वक्‍त का एक अहम सवाल’, ‘कोई और सुर’, ‘आलाप में गिरह’ जैसी कविताओं में कवि, रचनाकार की कशमकश, द्वन्‍द्व, उहापोह से भी दो चार होता है. संग्रह का शीर्षक भले ही आलाप में गिरह हो पर गीत का काव्‍य सुर सधा हुआ है.            

 

गीत चतुर्वेदी आलाप में गिरह (कविता) राजकमल प्रकाशन, दिल्‍ली 110002 मूल्य रु. 195/-  पृष्ठ 159, वर्ष 2010