Monday, October 12, 2009

तदेउष रोज़ेविच की कविताएं

4
एक मुलाकात

मैं उसे पहचान नहीं पाया

जब मैं यहां आया

हो सकता है यह भी हुआ हो

इन फूलों को सजाने में इतनी देर लगी

इस बेडौल गुलदान में

'मुझे इस तरह न देखो '

उसने कहा

मैंने छेड़ा कटे बालों को

अपने खुरदुरे हाथ से

'उन्होंने काट दिए मेरे बाल '

उसने कहा

'देखो उन्होंने मेरे साथ क्या कर डाला '

अब फिर से वह आसमानी रंग का झरना

फड़कने लगा है उसकी गर्दन की पारदर्शी

त्वचा के नीचे हमेशा की तरह

जब वह आंसू पी जाती है

वो इस तरह एकटक देख क्यों रही है

मुझे लगता है चले जाना चाहिए

मैं कुछ ज्यादा ही जोर से बोल देता हूं

और मैं निकल आता हूं

मेरे गले में एक थक्का है।

Saturday, October 10, 2009

तदेउष रोज़ेविच की कविताएं

3

हमें माफ करो

भूल जाओ हमें

हमारी पीढ़ी को भूल जाओ

इंसानों की तरह जीओ

बिसर जाओ हमें

हमने डाह की

पेड़ों और पत्थरों से

हम जले कुत्तों से

बल्कि बन जाऊं मैं चूहा

तब मैंने कहा उसे

मैं तो बल्कि रहूं ही न

और मैं जाऊं सो

और जागूं जब युद्ध हो चुका हो

वो बोली आंखें बंद किए किए

भूल जाओ हमें

मत पूछो हमारी जवानी के बारे में

हमें माफ करो।

Friday, October 9, 2009

तदेउष रोज़ेविच की कविताएं

2
एक आवाज

वे काट पीट डालते हैं वे यातना देते हैं एक दूसरे को

चुप्पियों से लफ्जों से

मानो कि एक और जीवन हो

जीने को

वे ऐसा करते हैं

मानो कि वे भूल गए हों

कि उनके शरीर

मर जाएंगे एक दिन

कि इंसान का अंतरमन

जरा से में टूट जाता है

एक दूसरे के लिए बेरहम

वे कमजोर हैं

पेड़ पौधों और जानवरों से

मारे जा सकते हैं एक शब्द से

एक मुस्कान से एक नजर से।

Thursday, October 8, 2009

तदेउष रोज़ेविच की कविताएं

1.बचा हुआ

मैं चौबीस का हूं

कसाईखाने में ले जाया गया

मैं बच गया

ये खोखले समानार्थी शब्द हैं

इंसान और जानवर

प्यार और नफरत

दोस्त और दुश्मन

अंधकार और प्रकाश

एक सा तरीका है इंसानों और जानवरों को मारने का

मैंने देखा है :

कटे पिटे लोगों से लदे ट्रकों के ट्रक

वे बचाए नहीं जाएंगे।

विचार महज शब्द हैं :

गुण और गुनाह

सच्च और झूठ

खूबसूरती और बदसूरती

हिम्मत और कायरता

गुण और गुनाह का वजन है बराबर

मैंने देखा है :

इंसान में जो था गुनहगार और गुणवान भी

मिले मुझे कई गुरू

जो मुझे फिर से देखने सुनने बोलने के काबिल बनाए

वस्तु और विचार को नाम दे फिर से

ज्योति से अंधेरा दूर करे

मैं चौबीस का हूं

कसाईखाने में ले जाया गया

मैं बच गया।

Tuesday, September 8, 2009

कविवर


मैं पहली पंक्ति लि‍खता हूं
और डर जाता हूं राजा के सिपाहियों से
पंक्ति को काट देता हूं

मैं दूसरी पंक्ति लिखता हूं
और डर जाता हूं गुरिल्‍ला बागियों से
पंक्ति को काट देता हूं

मैंने अपनी जान की खातिर
अपनी हजारों पंक्तियों की
इस तरह हत्‍या की है
उन पंक्तियों की रूहें
अक्‍सर मेरे चारों ओर मंडराती रहती हैं
और मुझसे कहती हैं : कविवर !
कवि हो या कविता के हत्‍यारे

सुना था इंसाफ करने वाले हुए कई इंसाफ के हत्‍यारे
धर्म के रखवाले भी सुना था कई हुए
खुद धर्म की पावन आत्‍मा की
हत्‍या करने वाले

सिर्फ यही सुनना बाकी था
और यह भी सुन लिया
कि हमारे वक्‍त में खौफ के मारे
कवि भी हो गए
कविता के हत्‍यारे.

Tuesday, August 25, 2009

कमीने से उठते सवाल

जो सवाल सच का सामना धारावाहिक के बारे में उठ रहे थे, वे कमीने फिल्म के संदर्भ में और तीखे होकर चुभ रहे हैं। फिल्म में हिंसा का खेल है। जमकर। फोटोफिनिश। बेहद रीयलिस्टिक। शायद इसी वजह से विशाल भारद्वाज के प्रशंसक इसकी तुलना हॉलीवुड की फिल्मों से कर रहे हैं। और खुश हो रहे हैं। हिंसा? खालिस हिंसा। शरीर का कोई मोल नहीं। जिंदगी का कोई मानी नहीं। फोड़ के रख दो। सोचो मत। अंत में जब सारे खलनायक इकट्ठा होकर गोलीवारी करते हैं, तभी थोड़ा बहुत ड्रामा दिखता है। एक्शन या स्टंट फिल्मों में इसी तरह का ड्रामा और मेलोड्रामा दर्शक को कॉमिक रिलीफ देता है। लेकिन कमीने के प्रशंसकों को फिल्म का यह हिस्सा बेकार लगता है। ठकाठक मारकाट ने उनका मन मोह लिया है।

हमारे लिए यह विशाल भारद्वाज का सिनेमा से डिपार्चर है। उनके प्रशंसकों के लिए यह उनका मेनस्ट्रीम में आगमन है। यह विडंबना है। लेकिन सच है। हमने ब्लू अंब्रेला और मकड़ी का फिल्ममेकर खो दिया। शेक्सपीयर के ड्रामों की आधुनिक भारतीय समाजिक व्याख्या करने वाला रीयलिस्टिक फिल्ममेकर खो दिया।

मकबूल भी हिंसा में बुझी हुई फिल्म थी। अपराध और नाजायज रिश्तों का ड्रामा। ओमकारा में अपराध, हिंसा और नाजायज रिश्तों में राजनीति भी जुड़ गई। यह भी डिस्टर्बिंग फिल्म थी। इसमें एक तरह का भदेस और नंगापन था। दर्शक सहम जाता था। पर आखिर उसमें कहीं पे फिर भी ड्रामा बचा हुआ था। जहां आपको लगता था आप फिल्म देख रहे हैं।

कमीने में अलग तरह का यथार्थ है। भयावह। अपराध के कई स्तर हैं। चार्ली (शाहिद कपूर) रेसकोर्स का छुटभैया खिलाड़ी है। इसी धंधे के कई और खिलाड़ी हैं। एक एक सीढ़ी ऊपर के। नायिका का भाई मराठी दादा है। इसका मकसद अपराध से बरस्ता रीयल इस्टेट, राजनीति में जाने का है। फिर गर्द और तस्करी का अंतर्राष्ट्रीय जाल है। पुलिस के बड़े अधिकारी तस्करों के लिए काम कर रहे हैं। नायक डबल रोल में है। लाबारिस जुड़वां भाई। एक भाई अपराध की अंधी गली में गर्क हो रहा है। दूसरा तथाकथित सभ्य समाज में अपलिफ्ट होना चाहता है। लेकिन नायिका के फेर में अपराधियों के चंगुल में फंस जाता है। हर तीसरी एक्शन फिल्म में तकरीबन ऐसी ही कहानी तो होती है।

मतलब कहानी में कोई नयापन नहीं है। बस मारकाट, वीभत्स हंसी और निर्मम हत्याएं हैं। जबरदस्त तरीके से एडिट की हुई। ठकाठक। दर्शक को फुर्सत ही नहीं मिलती कि वह कुछ सोच पाए। या जो दृश्य उसकी आंखों के सामने आ रहे हैं उन्हें भीतर घुसने दे। यह फिल्म दर्शक को रिएक्ट करने की मोहलत ही नहीं देती।

दर्शक इससे डीसेंसीटाइज होता है। तभी तो पिटाई उसे गुदगुदाती है। किसी निहत्थे को मारे जाते देख उसकी हंसी फूटती है। गाली-गलौज, मारकुटाई और गोलीवारी में उसे मजा आता है। दर्शक इस तरह का मजा मेलोड्रैमेटिक एक्शन फिल्मों में भी लेता है। पर वहां मैलोड्रामा यथार्थ को थोड़ा मंद कर देता है। यह अतिनाटक कॉमिक रिलीफ में बदल जाता है। लेकिन हॉलीवुड चलन के फोटोफिनिश यथार्थ में कॉमिक रिलीफ की कोई जगह नहीं है। कैमरे, प्रकाश, ध्वनि प्रभाव की अत्याधुनिक तकनीकें इसे कंप्यूटराइज्ड प्रिसीजन (परिशुद्धता) देती हैं। इस तरह प्रौद्योगिकी फिल्म को मानवीय घटनाक्रम का अनुभव नहीं बनने देती। इसे रंगीन फोटोग्राफी की तरह निष्प्राण, अमानवीय और भयावह बना देती है। प्रौद्योगिकी फिल्म को इतना परफेक्ट बना दे रही है कि दर्शक उसे काल्पनिक दृश्यावली नहीं मान पाता। वह इस तरह के दृश्य देखने का आदी (एडिक्ट) होता जाता है। पैसा खर्च करके मल्टीप्लेक्स में जाता है। और एक तरह से इस परपीड़क आनंद का ग्राहक बनता है। फिल्म उद्योग में यह व्यापार खूब फल फूल रहा है। इसे सफलता माना जाता है। इसी सब परफेक्टनेस के बूते पर कहा जा रहा है कि यह हॉलीवुड से होड़ लेती बॉलीवुड की एक्शन फिल्म है। कि विशाल भारद्वाज पास हो गया।

पर हमें लग रहा है कि विशाल भारद्वाज फेल हो गया। क्या अब वह ब्लू अंब्रेला जैसी कोमल, अर्थवान और संवेदनशील फिल्म बनाएगा?

Friday, August 7, 2009

क्‍यों करें हम सच का सामना



इधर सच का सामना हुआ और उधर नैतिक पुलिस के कान खड़े हो गए। टेलिविजन को हर वक्त कुछ न कुछ नया करने की जरूरत बनी रहती है। कथा कहानी से अगला कदम था रीयल्टी शो। यानी असल जिंदगी में होता ड्रामा आपको ड्रांइग रूम में दिखाया जाए। फिर रीयल्टी शो में भी एकरसता आने लगी। यहां हर वक्त नई जमीन तोड़नी पड़ती है। इस काम में यूरोप अमरीका के लोग ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं। वे लोग नई जमीन तोड़ते हैं, हम उस पर फसल उगाते हैं। यह जमीन जांची परखी होती है क्योंकि वे उससे फायदा काट चुके होते हैं। हमारा टेलिविजन उन्हीं प्रोग्रामों की नकल करता है जो सफलता के झंडे गाड़ चुके हों। इसी सफलता का नया नमूना है सच का सामना। वैसे तो जंगल से मुझे बचाओ भी एक विदेशी रीएल्टी शो की नकल है, पर टीआरपी में सच का सामना बाजी मार ले गया है।

इस सीरियल का विषय ही ऐसा है कि टीआरपी बल्लियों उछलने लगी। यह भारत क्या दुनिया भर का पसंदीदा विषय है। सेक्स संबंधी किस्से। आदमी की सबसे आम कमजोरी। ऐसी कमजोरी जो राजा महाराजाओं को धराशाई कर देती है। हमारे समाज को तो सेक्स शब्द सुनते ही ठंडे पसीने आने लगते हैं। हिस्टीरिया हो जाता है। अभी तक खुले में सेक्स शब्द का इस्तेमाल हमें बुरा लगता है। दबे छुपे चाहे जो कर लो। खुले में पाक साफ बने रहो। और स्वीकार (कनफेस) तो कभी मत करो। यह विचित्र विरोधाभास है। यह उस समाज में होता है जहां सेक्स को देवता का सम्मान दिया जाता है। कामदेव। कामदेव शास्त्र और लोक दोनों जगह विद्यमान है। पुराने जमाने में काम-कला को शास्त्र का दर्जा दिया गया है। लेकिन अब तो हमारे ऊपर झूठ, फरेब और वर्जना के इतने तहदार पर्दे पड़े हैं कि हम करते सब कुछ हैं, उसे मानते बिल्कुल नहीं। यह अजीब छल छद्म भरा व्यवहार है।

इसका मतलब यह नहीं है कि सच का सामना सीरियल को सिर आंखों पर बिठा लिया जाए। इस सीरियल के अपने पेचो-खम हैं। इसका एक एक सवाल नशीली गोली का काम करता है। यह उसी रास्ते से निकला है जहां खली और उसके जालिम साथी एक दूसरे की हड्डी पसली तोड़ते हैं। यह रोडीज का ही भाई-बंध है जहां रफ-टफ धींगा मुश्ती के नाम पर जंगलीपन को ग्लैमरस बनाकर परोसा जाता है। यह सीरियल उन्हीं फिल्मों का विस्तार है जिनमें बलात्कार, हिंसा, नंगी देहें, सॉफ्ट पोर्नोग्राफी का कारोबार किया जाता है। यह उन्हीं कथा कहानियों का विस्तार है जहां आदमी के भीतर की बुराई को, धोखेबाजी को, जालसाजी को, कमीनगी को ग्लैमरस बनाकर बेचा जाता है। और जिन्हें हम सास बहू की कहानियां कहकर मजे से देखते हैं। ये सभी तरह के प्रोग्राम एक तरह का परपीड़क सुख (सैडिस्टिक प्लैजर) देते हैं। निंदा रस से भिगोते हैं। ताक झांक से गुदगुदाते हैं।

सच का सामना आदमी की वासना को, कमजोरी को, कमीनगी को, अपराध को कन्फैस कराता है। तथाकथित लाई डिटेक्टर विधि से, पहले प्रतिभागी से एकांत में सच उगलवाया जाता है। फिर अपने परिवार के सामने उससे सवाल पूछे जाते हैं। सवाल चोरी डकैती से जुड़े नहीं होते। उनमें चटपटापन नहीं है। ज्यादातर बैडरूम को ही उघाड़ा जाता है। टीआरपर उसी से बढ़ती है। जब यह पूछा जाता है कि क्या पति ने परस्त्री से संबंध बनाए? जवाब में वह न झूठ बोल सकता है न सच। यह दुविधा दर्शक को टीवी से चिपकाए रखती है। जब पत्नी से यह पूछा जाता है कि क्या वह परपुरुष से संबंध बनाने या उसे मारने की इच्छा रखती है? तो उसका यह मानसिक स्वैराचार या काल्पनिक अपराध उसे कटघरे में खड़ा कर देता है। मतलब अब इच्छा, वांछा, कामना भी उसे अपराधी घोषित करवा सकते हैं। मतलब मन के भीतर भी सेंध लगा दी गई है। मतलब इंसान का निजी कुछ रहा ही नहीं। यह ब्लैक कामेडी या काली कामदी समाज के दोगलेपन को उघाड़ने की मंशा से नहीं खेली जा रही है, बल्कि यह दर्शक को दूसरे के फटे में पैर फंसाकर सुख पाने के लिए पेश की जा रही है। और यह कपोल-कल्पना या गल्प-कहानी नहीं है। सोलहों आने सच है। हाड़ मांस के जीते जागते आदमी की इच्छा, कमीनापन या करतूत।

देश की सबसे बड़ी अदालत ने इसका प्रसारण रोकने से मना कर दिया। आदालत मॉरेल पुलिसिंग नहीं कर सकती। अब या तो राजनीति की रोटियां सेकने वाली पार्टियां सक्रिय होंगी या हो सकता है सरकार कोई अनसोचा अधसोचा फैसला थोपे। सवाल यह उठता है कि अगर अदालत ने प्रसारण रोकने से मना किया है तो क्या यह प्रोग्राम चलता रहना चाहिए? कानूनी मान्यता तो है पर क्या मनोविकृत्तियों के प्रसारण को मान्य किया जा सकता है? क्या यह रूझान ठीक है? क्या मन से खेलने का यह कारोबार ठीक है? इस पर सोच विचार करने की जरूरत है।

एक तरह से तो ठीक लगता है कि हमारे समाज में सच का सामना करने की हिम्मत होनी चाहिए। पर बात इतनी इकहरी नहीं है। यह किरण बेदी की कचहरी नहीं है जिसमें पति अपनी गलती मानते हैं और अगली कार्रवाई चलती है। यह गेम शो है। यह पैसे का खेल है। आदमी अपने अंधेरे कोनों को पब्लिक के सामने बिखेरता है और पैसे बटोरता है। एक बूढ़ा यह कुबूल करता है कि उसने अपनी बेटी से कम उम्र लड़की के साथ शारीरिक संबंध बनाए। उसका परिवार सामने बैठा है। कैमरा उनके हाव-भाव, अंदरूनी उथल-पुथल, उनकी शर्मिंदगी, उनकी बेचारगी को भी पकड़ रहा है। बंदे की फरेबी मासूम मुस्कान तो है ही। और सच कुबूल करने पर बूढ़ा इनाम पा रहा है। यह बूढ़ा असल में बताना यह चाहता है कि एक तो आपने अपनी कामेच्छा को बेलगाम छोड़ रखा है। फिर परिवार के सामने इस बात को कन्फैस करते हैं। फिर पैसा पाकर सब लोग इस कन्फैशन को सलिब्रेट करते हैं। अभी तो इस कार्यक्रम में असली सच सामने आ रहा है। आगे चलकर यह डाक्टर्ड सच भी हो सकता है। यानी प्रतिभागी तय कर लेंगे कि वे अमुक किस्म के सनसनीखेज सच घड़ेंगे और फिर कुबूल करेंगे और पैसा कमाएंगे।


यह सीरियल हमारी नकारात्मक प्रवृत्तियों को उभारने, बेचने, उस पर खुश होने और ईनाम पाने का जरिया बनता है। यह बच्चे को ऊंट से बांधकर दौड़ाने और उसे जख्मी होते देखने या मदमस्त बैल के सामने लाल कपड़ा लेकर फेंक दिए गए आदमी को चींथे जाने जैसा क्रूर खेल है। ये खेल खुले में होते हैं। और हम टीवी सीरियल में, खाना खाते हुए या शराब पीते हुए या बच्चों बूढ़ों के साथ बैठकर घर के अंदर गुम क्रूरता का खेल देखते हैं। क्या ऐसी हालत में हमें सम्य और सुसंस्कृत कहलाने का हक है?

अमर उजाला 3 अगस्‍त 2009 में प्रकाशित

रेखांकन - मुदित

Tuesday, July 21, 2009

कविता




कवि को देशनिकाला है

कुदरत ने बनाए मिट्टी पानी पेड़ और पहाड़
इंसान ने कथनी करनी का फैलाया जंजाल
कवि ने गाया कुदरत औ' इंसान का गान
दुख और राग रक्त में घुला
मिट्टी में सना

कवि ने छेड़ी जीवन की ऐसी खट मिट्ठी तान

सुनने वालों का दिल दहला जी पिघला
आंसू लुढ़के पत्थर हो गए
आह से निकली जलधार

जब जब गाया कवि ने जीवन का सच्चा गान

उसका रुदन उसका हास
उसकी घृणा उसकी प्रीत
कवि का जीना हुआ मुहाल

इंसान ने घड़ डाले चारण
आगे पीछे घूम विरुदावलियां गाने को
सच से बचने औ' सौ झूठ छिपाने को

आसान नहीं सच का गीत सुन पाना
अंतरमन तक छिल जाता है
जीवन के घमासान में भी कुछ कर जाता है

वो जिगरा कहां कि कोई आग में जले
वो हुलस कहां कि कोई चंदन मले

यहां कवि को देशनिकाला है.
यह भी सन् 2001 की ही कविता है और पिछले साल वागर्थ में छपी थी.

Friday, July 17, 2009

उदय प्रकाश के लिए







कवि की दुनिया

दुनिया में कवि से ज्यादा उजड्ड कोई नहीं
कवि से ज्यादा सभ्य कोई नहीं
तमाम दुनिया पानी भरती है कवि के आगे
इशारों पर नचाता फिरता है दिन रात
दुनिया की ऐसी तैसी करता रहता है कवि
दुनिया अपनी दुनिया में मगन हो दूसरी किसी दुनिया में निकल जाती
कवि एक एक डग से नापता एक एक लोक
कवि दुनिया की दुनिया और दूसरी अनेकानेक दुनियाओं में विचरता
अपनी एक दुनिया रच डालता रोज रोज
कोई देखे कवि की दुनिया से
कैसी दिखती है मेरी तुम्हारी दुनिया ª

यह कविता सन 2001 में लिखी थी और पिछले साल वागर्थ में छपी थी.

Friday, June 26, 2009

ईवेंट







चौबीीस जून को जगदंबा प्रसाद दीक्षित 75 वर्ष के हो गए. कुछ संस्‍थाओं ने उनका अमृत महोत्‍सव मनाया. बीस जून को जलेस ने हबीब तनवीर की स्‍मृति में गोष्‍ठी की. तेरह जून को धीरेंद्र अस्‍थाना के उपन्‍यास का लोकापर्ण हुआ. इससे पहले, अप्रैल अंत या मई आरंभ में हृदयेश मयंक की पुस्‍तक का लोकापर्ण था.

यानी गर्मियों की छुट्टियों में घर गए तो एक लोकापर्ण था. लौटे तो एक और था. मुंबई में लोकापर्ण का बोझा एक ट्रस्‍ट उठाता है. शर्त यह होती है कि पहली प्रति ट्रस्‍टी को भेंट की जाए. मंच पर.

यह एक ईवेंट है. या इसे साहित्यिक गोष्‍ठी कहा जाए? ईवेंट ही कहा जाएगा. जगदंबा दीक्षित जी की हरीक जयंती जिसे मराठी में अमृत महोत्‍सव कहते हैं भी तो एक ईवेंट ही है. यह एक ऐसा कार्यक्रम है जहां शुभकामनाओं का तांता लग जाता है. और बालक (बूढ़े भी तो बच्‍चे ही होते हैं) खुश होता रहता है. तृप्‍त. वैसे इस ईवेंट में दीक्षित जी अच्‍छा बोले.

दीक्षित जी वाम में भी उग्रवाम के पक्षधर रहे हैं. आजकल उग्रवाम का घमासान मचा हुआ है. और इधर हीरक जयंती की ईवेंट चल रही है.

महानगर के सांस्‍कृतिक जीवन के प्‍याज की तरह कई छिलके हैं. उनमें से एक छिलका इस तरह के ईवेंट आयोजन का है.

Tuesday, April 28, 2009

संपादकीय




हिमाचल मित्र के ग्रीष्‍म अंक 
का आवरण और व‍िषय-वस्‍तु आप देख चुके हैं. 
अब प्रस्‍तुत है संपादकीय

पिछले साल नवबंर महीने की छब्बीस तारीख इतिहास की उन तारीखों की तरह दर्ज हो गई जिनको याद करके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ये तारीखें ऐसे हादसों को याद दिलाती हैं जो समुदायों, धर्मों या देशों की आपसी घृणा से पैदा हुईं; अपराधी मनोवृत्ति के चलते सफल हुईं और तमाम तरह की दुरभिसंधियों के सर्पजाल में उलझकर राष्ट्रों की गलफांस बनीं। ये तारीखें कहीं की भी हो सकती हैं चाहे वे न्यूयार्क की हों या इंग्लैंड की हों, अयोध्या, गोधरा, मुंबई, मालेगांव या गुवाहाटी की हों;  हर बार घृणा, अपराध और साजिश ने साधारण मनुष्यों की जान ली है। हर बार सुरक्षा एजेंसियां नकारा साबित हुईं; राजनैतिक सत्ता संवेदनहीनता की पहले से बड़ी मिसाल बन कर साबित हुई; कूटनीति की निरीहता उजागर हुई; वैश्विक शक्तियों की सत्ता, साम्राज्य और विजेता के न्याय-विधान का शिकंजा पहले से ज्यादा मजबूत हुआ।

हर बार आम आदमी मारा गया। जो बच रहा, वह छला गया। उसे नागरिक होने की कीमत चुकाने के लिए अपनी सुरक्षा को दांव पर लगाना पड़ रहा है। उसे जान हथेली पर लेकर ही जीवन बिताना है, क्योंकि वह एक बार ट्रेन हमले में बच गया है, एक बार आतंकवादी विस्फोट में मरते-मरते बचा है। एक बार जातीय दंगों में झुलसने के बावजूद जीवित बच आया है। लेकिन कब तक? कोई नहीं जानता अगली बार के अटैक में किसकी बारी आएगी, सचमुच कोई नहीं जानता।

मौत जब इस तरह सम्मुख आ खड़ी हो, तभी व्यक्ति जागता है, क्योंकि जिंदा रहने के लिए उसके पास जान की बाजी लगा देने का ही विकल्प बाकी बचता है। इस बार मुंबई में हुए आतंकवादी हमलों के बाद एक बार को लगने लगा कि जन जागरण शुरु हो गया है। अब राष्ट्र जाग जाएगा। अब किसी चिड़िया को पर मारने तक की इजाजत नहीं दी जाएगी। अब सारे खोट खत्म हो जाएंगे, तमाम तरह की असमानताएं मिट जाएंगी। सब कुछ सुधर जाएगा। आम आदमी निर्भय हो कर जी सकेगा। बच्चों की किलकारी और मुस्कान कोई नहीं छीन पाएगा।

लेकिन जो हजारों मोमबत्तियां जलाई गईं; मीलों लंबी मानव श्रृंखलाएं बनीं; अखबारों का टनों कागज़ बहस के नाम पर रद्दी हुआ; आम आदमी के कई टीवी वर्ष वही सनसनीखेज तोहमतें सुनते हुए बीते और अरबों-खरबों टर्न-ओवर के बावजूद मंदी की मार झेलनी पड़ी; नतीजा हमेशा की तरह वही का वही - एक महाशून्य।

समाज का हर पुर्जा खुद को अपनी जगह फिट किए रहने की जुगाड़ में जुटा रहा और फिट-फाट बने रहने की फिराक में लगा रहा। यह भी नतीजा निकलता लगा कि चूंकि हमले की जद में पांच सितारा होटल आए थे, इसलिए उच्च-भ्रू समाज तिलमिला उठा था। हमले की जद में सीएसटी रेलवे स्टेशन भी आया था। बल्कि वहां ज्यादा जानें गई थीं। पर होटलों में मेहमान थे। स्टेशन पर मुसाफिर थे। जिनमें से बहुतों के नाम गांव का भी पता नहीं। थोड़े ही दिनों में बड़े लोगों के बिगुल से फटी हुई हवा निकलने लगी। जन जागरण की बहसों के दरम्यान हमारा जीवन-जगत पहले की ही चाल से चलता रहा। राजनेता आम चुनावों की तैयारी में मुख्यमंत्री बदलते रहे; नौकरशाही सारी व्यवस्था को ऑटो मोड पे छोड़कर मद-मस्त बनी रही; सरमाएदार सबको धमकाने में, व्यवसायी गोटी बिठाने में लगा रहा; घूसखोर ने घूस लेना नहीं छोड़ा, अपराधी ने अपराध;  ऐय्याश ने ऐय्याशी नहीं छोड़ी, वाग्विलासी ने बकबक। और हम ऐसे जन-जागरण की उम्मीद लगाए बैठे हैं कि दुनिया रातों-रात चकाचक स्वर्ग में बदल जाएगी।

इतना भोलापन मूर्खता से कम नहीं। हम सोचते हैं दूसरा बदले, हमें अपना चाल-चलन, सोच-विचार न बदलना पड़े। हमें  याद रखना होगा, समाज आत्मान्वेषण और आत्मालोचन के बिना पोखर की तरह हो जाते हैं, जहां के पानी में हरकत नहीं होती और वह सड़ जाता है। हमें खुद को बार-बार याद दिलाना होगा कि परिवर्तन की शुरुआत हमीं से होगी। हम दूसरों से जो अपेक्षा करते हैं, वैसा हमें कर के दिखाना होगा। हमें अपने-आप से, अपने परिवार से, अपनी कौम से, अपने समाज से, अपने राष्ट्र से और अपने विश्व से अपने रिश्तों की ओवरहालिंग करने की जरूरत है। अगर हम अपने कर्तव्यों के प्रति चौकन्ने बने रहें तो असुरक्षा का भय अपने आप मिट जाएगा। अगर हम पल-छिन खुद को याद दिलाते रहें कि हम सभ्य समाज के सचेतन अंग हैं, यह दुनिया हमी से बनी है, हम ही इसके रक्त मज्जा और अस्थियां हैं, हमी इसकी आत्मा और चेतना। तब जाकर शायद विचारधारा और सामाजिक जन जागरण या बाहरी तंत्र-विधान कुछ काम करना शुरू करें। शायद सर्वांगीण समाज सुधार एक तरह की चेतना-अवस्था को प्राप्त करना ही होता है। और उच्चतर मानवीय चेतना का स्वप्न भी शायद ऐसा ही है। इस स्वप्न का अगर कुछ हिस्सा भी पूरा हो जाए तो शायद रोजमर्रा की जिंदगी में कुछ चिहुंक भर जाए।

इस बार आमुख कथा चित्र दीर्घा में से निकली है और बातचीत राजनीति के गलियारे से। एक प्रखर युवा पत्रकार इस बार से एक स्तंभ लिखना शुरू कर रहे हैं। वे हर बार किसी जरूरी मुद्दे पर हमें आइना दिखाएंगे। पहाड़ी चित्र कला की जगह इस बार पूर्वी तिब्बत का 18वीं सदी का एक दुर्लभ थंकाचित्र। बाकी स्तंभ धीरे धीरे स्थिर हो रहे हैं, शायद पिछले अंक से एक कदम आगे।

कोशिश करने के बावजूद अंक में देरी हुई है। पिछले वर्षों में वसंत, वर्षा और शरद अंक निकल चुके हैं। गर्मियों में हिमाचल की ठंडी फुहार लेकर ग्रीष्म अंक पहली बार आ रहा है। उम्मीद है यह सभी को सराबोर करेगा।  



Tuesday, April 21, 2009

हिमाचल मित्र का ग्रीष्‍म अंक

हिमाचल मित्र का ग्रीष्‍म अंक छप गया है।
आप एक नजर इसमें शामिल सामग्री पर डालिए।
अगर उपयोगी लगे तो बताने की कृपा करें, संभव हुआ तो
अंक आपकी सेवा में प्रस्‍तुत किया जाए.


आमुख कथा - अतीत में खुलती खिड़कियां (एक दुर्लभ चित्र प्रदर्शनी का विवरण) : सुमनिका सेठी॥
गुणिया राम - संध्या शेवड़े॥
बातचीत - युवा सांसद अनुराग ठाकुर॥ राजरंग - आर के शर्मा॥
लोक संस्कृति - लोकगीतों में हिमाचल की सैर : केशव चंद्र॥ कांगड़ा कलम गुरू चंदूलाल रैना : सरोज परमार॥ चम्बा की धाराओं में गूंजता एक स्वर -राज प्रभाकर : अशोक जेरथ॥ ऊपरी शिमला की धाम : मोहन साहिल॥ मंच पर असाधारण थे मेरे गांव के साधारणजन : मुरारी शर्मा॥
अनुगूंज
- कुमार विनोद और मोहन साहिल॥
साहित्य - मेरी प्रिय कहानी : केशव॥ टिप्पणी : निरंजन देव॥ बातचीत : मधुकर भारती, रजनीश शर्मा॥ कहानी- मुलाकात : विनोद राही॥
कविताएं - श्रीनिवास श्रीकांत॥ मनोज शर्मा॥ आत्मारंजन॥ रामेश्वर द्विवेदी॥ विक्रम मुसाफिर॥
विचार मंथन - अपनी भाषा में निजता : वेद राही॥
पहाड़ी भाषा-यक्ष प्रश्न- अमर तनौत्रा॥ भगवान देव चैतन्य॥ देवराज संसालवी॥ कृष्णचंद्र महादेविया॥ दीवक वर्मा॥
पहाड़ी कलम - क्हाणी - बूहा करदा झम-झम : डॉ रजनीकांत॥
गल सुणा : अनूप सेठी॥ कवितां - कुंवर नारायण॥ डॉ पीऊष गुलेरी॥ भगवान देव चैतन्य॥ कांता शर्मा॥ चाचू भतीजू : गप्पी डरैबर॥ लबाण बोली का एक प्रसंग : केशव चंद्र॥
पर्यावरण - नीना चम्बियाल॥ आइना - नीलकंठ पराशर॥
करियर कैफे : क्या आप पत्रकार बनना चाहते हैं?: सुदर्शन वात्स्यायन॥
भूगोल से आगे - मारकुला देवी का मन्दिर : ओ सी हांडा॥ मेरी फिल्में : विवेक मोहन॥ कारागार में कार्यशाला : अमला राय॥ त्रिवेणी महादेव : राकेश शर्मा॥ संत कवि मिलारेपा और उनकी कविताएं : अजेय और विमल डे॥
यात्रा
- हिमाचल दर्शन : शैलेश सिंह॥
आस्वाद और परख - कविता का वैभव : ओम भारती॥ बांठड़ा : कैलाश आहलूवालिया॥ धूप सहेली : संगीता सहजवानी॥ सत्यानंद स्टोकस की जीवनी : माई हिमाचल॥ अतीत की अनुगूंज : रेखा डढवाल॥ विवेक मोहन के तीन वृत्त चित्र : अनूप सेठी॥
गतिविधि॥ वैवाहिकी॥
परिवर्तन की पदचाप : दिनेश शर्मा और कैलाश आहलूवालिया॥