Friday, September 7, 2012

कविता का कहीं कोई मगध तो नहीं ?



इधर हिंदी साहित्‍य जगत में बात-बात में बहसें क्‍या उठ खड़ी हो जा रही हैं, मानो पानी को उबाल कर गाढ़ा करने का खेल चल रहा हो. पत्रि‍काओं के चूल्‍हे पर जहां पतीलियों में पानी चढ़ाया जाता है, वहां इंटरनेट का पंखा आग को हवा देने की ड्यूटी संभाल लेता है. सब जानते हैं पानी गाढ़ा नही होता, अलबत्‍ता सूखने लगता है. और जो इस उबाल-कर्म के नजदीक जाता है, वह हाथ मुंह पर फफोले ले कर लौटता है. लेकिन दो अंक पहले कथादेश में दो कविताओं की व्‍याख्‍याओं का जो बीड़ा शलिनी माथुर ने उठाया, उससे लगा था कि इस पर आगे गंभीरता से चर्चा होगी. लेकिन जिस तरह शालिनी को साहित्‍य-बाहर का व्‍यक्ति और साहित्‍य की समझ न रखने वाला सिद्ध करने की कोशिशें की गई हैं, उससे हिंदी साहित्‍य कर्मियों की अलोकतां‍त्रि‍क मनःस्थिति और भय-भीरुता का ही परिचय मिलता है. इस बहस में हस्‍तक्षेप करते हुए कथाकार चित्रकार प्रभु जोशी ने कथादेश के ताजा अंक में विस्‍तृत टिप्‍पणी की है. इस टिप्‍पणी का अविकल पाठ यहां दिया जा रहा है. इससे हमें अपने समकालीन साहित्‍यकार और साहित्‍य की नब्‍ज पकड़ने में मदद मिलेगी.



‘कथादेश‘ के ताजा अंक को देखकर यह सुखद विस्मय हुआ कि मूलतः कहानी पर केन्द्रित एक पत्रिका ने अपने पृष्ठों पर कविता को लेकर, इस उत्तर-औपनिवेशिक समय में, सर्वथा नये कोण से एक ऐसी बहस को जन्म दे दिया है, जिसे जरूरी तौर पर किसी कविता-केन्द्रित पत्रिका से बहुत पहले उठना चाहिए था। कदाचित् यह वहां इसलिए सम्भव नहीं हो सका, चूंकि एक लम्बे कालखण्ड से वहां से बहस विदा हो चुकी है। और अब बहस इस पर भी नहीं होती कि बहस क्यों नहीं हो रही है ? दरअस्ल, यह क्षम्य है क्योंकि उनकी किंचित् अपरिहार्य-सी विवशताएं हैं। मसलन, सम्प्रति वे एक दूसरे की कविता के ‘श्रेष्ठ’ और ‘श्रेष्ठतर’ बताने और सिद्ध करने की परिश्रम-साध्य तार्किक युक्तियों को आविष्कृत करने में लगे हुए हैं। नतीजतन उनके पास अवकाश का ही सबसे बड़ा अभाव है। वे यदा-कदा अपनी उन एक-सी जान पड़ने वाली पत्रिकाओं के पृष्ठों पर , परस्पर एक दूसरे से मिथ्या-असहमति प्रकट करते रहते हैं, जबकि अप्रत्यक्ष रूप से वे एक दूसरे से पूरी तरह सहमत हैं। वस्तुतः वहां उन सब के बीच एक अप्रकट समन्वय है। एक ऐसा मतैक्य है, जिसके पार्श्व में हितों की अखण्ड सूत्रबद्धता है। वे मोलियर के पात्रों की तरह एक दूसरे को बधाइयां देते हुए बरामद किये जा सकते हैं।

बहरहाल कहना न होगा कि उनके बीच मूल-समस्या ‘महानता‘ के निर्धारण की है। सबके अपने-अपने महान् हैं, और गाहे-ब-गाहे जिनका प्रायोजित ‘महा-मस्तकाभिषेक’ चलता रहता है। सबके अपने-अपने कवि ’कुलश्रेष्ठ‘ हैं तथा यह चेतावनी जारी कर दी गई है कि उनके ‘रचे हुए‘ की ‘मौलिकता‘ और ‘महानता‘ के प्रति सभी प्रकार की आशंकाओं को पूर्णतः स्वाहा करने के बाद ही कोई उनकी कविता के निकट आये। संदिग्धों का प्रवेश निषिद्ध है। यह आकस्मिक नहीं कि, कविता के कुछेक ’कुलशील‘ तो ऐसे भी हैं, जो ऐसे अप्रत्याशित खतरे का पूर्वानुमान लगा कर अपने काव्य-कुटुम्ब के सदस्यों की कविता के विषय में होठों को ‘अद्भुत’ शब्द से ही खोलते हैं। और यदि उनके लिए इस शब्द को प्रतिबंधित कर दिया जाये तो वे हमेशा के लिए गूंगे ही हो जायें। वे ‘वाक् अनाथ‘ हो जायें।

यह अब कतई विस्मय की बात नहीं कि कविता के क्षेत्र में ‘प्रतिमान‘ शब्द को अब पूरी तरह लज्जास्पद बना दिया गया है। और ‘आलोचना-दृष्टि‘ के सन्दर्भ में विचारधारा की बात करने वालों को मुनादी के शिल्प में ताकीद कर दी गई है कि वे इस शब्द से एक किस्म की ‘हाइजेनिक-डिस्टेंस‘ बनाकर रखें। यह अवश्यम्भावी है, ताकि आप ‘समझ की असाध्य रूग्णता‘ के शिकार होने से बचे रह सकें।......कहना न होगा कि अब उस ‘काल‘ की तो कभी की अन्त्येष्टि हो चुकी है, जिसमें कभी कविता के नये पुराने ’प्रतिमानों’ की कागारौल मची रहती थी। अब ‘प्रतिमान‘ नहीं बस ‘पैराडाइम‘ हैं, जो साहित्य में पूर्व ‘प्रतिमानों’ की मरणासन्नता की सर्वज्ञात सूचना है। ‘पैराडाइम‘ सुविधाजनक प्रविधि से ‘दायें या ‘बायें’ शिफ्ट होता रहता है। हालांकि, एक ‘विचारधारा‘ के पराभव के पश्चात् बायीं तरफ शिफ्ट होने में किंचित् अड़चनें उठ आती हैं। अतः अब किसी भी कोण के शिफ्ट को अनिवार्यतः बायां ही मान लिये जाने का अभूतपूर्व और अघोषित प्रस्ताव है। और, अब वामांगियों को विषयवस्तु बनाकर तो जो कुछ भी रचा जायेगा, वह स्तुत्य ही होगा। चूंकि यह ’दबी हुई अस्मिताओं‘ का उदयकाल है। कुल मिलाकर निश्चय ही ‘घनमंथन’ की इस परिस्थिति की निर्मिति में वामालोचना की वयोवृद्धता ने भी काफी हद तक गौरतलब इमदाद की है। फिर नव-उदारवाद के आगमन के साथ ही उन्हें अनिश्चितकाल के लिये अवकाश पर भी भेज दिया गया है। उनकी ज्वाइनिंग की सम्भावना ही अत्यन्त क्षीण हो चली है।

बहरहाल, ‘कथादेश‘ के दो अंकों में कदाचित् साहित्य में पहली दफा ‘‘कविता और पोर्नोग्राफी’’ के अप्रत्यक्ष गठजोड़ पर हो रही इस तरह की जिरह को पढ़कर मुझे साठ के दशक की यूरो-अमेरिकी गर्ली-मेगजींस का स्मरण हो आया, जिनमें पोर्न-इंडस्ट्री की पूंजी लगी हुई थी। यह प्रिण्ट में पोर्न को पर्याप्त प्रविष्टि दिलाने का ही सुविचारित उपक्रम था, ताकि उसे एक यथेष्ट कानून-सम्मत हैसियत हासिल हो सके।

उन महिला पत्रिकाओं में उनके सम्पादकीय एकांश के कर्मचारी ही हर अंक में नित नये नामों से चिट्ठियां लिखा करते थे। पत्र-सम्पादक नामक स्तंभ में वे स्वयं ही स्त्रियां बनकर अपनी यौन-संबंधी समस्याओं के विषय में विस्तार से निर्भीक भाषा में लिखते थे कि उनके ‘स्तन‘ का आकार या कुचाग्रों का रंग ऐसा-वैसा होता जा रहा है। योनि-संकुचन में अप्रत्याशित शिथिलता बढ़ गयी है....भगोष्ठों की कोई शल्य-क्रिया सम्भव है...संसर्ग में आनन्द का चरमोत्कर्ष चला गया है.....‘बताइये मैं क्या करूं?‘ बाद में वे ही ऐसे प्रश्नों के सन्दर्भ में ’विज्ञान का मुखौटा’ लगाकर मिथ्या-गंभीरता के साथ उत्तर तैयार कर के छापते थे, जो उत्तरोत्तर, भाषा के ‘सेन्सुअस-इडियम‘ से अलंकृत किये जाने लगे कि जिसके चलते स्त्रियों से ज्यादा पुरुष पाठकों के ’यौनिक-आनंद‘ का पाठ-विस्तार होने लगा। रति रोगों की समस्या के समाधान के बहाने, धीरे-धीरे इन पत्रिकाओं में सेक्स को इतना ‘ट्रांसपेरेण्ट‘ बनाया जाने लगा कि हिन्दी के हमारे ‘खुला खेल फरूक्काबादी‘ वाले जुमले का सफल चरितार्थ होने लगा। अब युवतियां पुरुष मित्रों से अपने संसर्ग की इच्छा समस्या और सलाह को समूचे सांस्कृतिक संकोच को तोड़कर रखने लगी। और जब आर्गेज्म को लेकर समस्याएं रखी जाने लगीं तो थोड़े ही वक्त में वे पत्रिकाएं लगभग ‘सॉफ्ट पोर्न’ की रूप-सज्जा में आ गयीं और उन्होंने बिक्री के मार-तमाम अकल्पित कीर्तिमान बनाने शुरू कर दिये। युवतियों से कहीं ज्यादा वे युवकों की प्रिय पत्रिका बनने लगीं।....... बहरहाल, दुर्भाग्यवश प्रिण्ट में हमारे यहां स्त्री-यौनिकता का ऐसा सार्वदेशीय खुलापन हासिल करने में मार-तमाम कई अड़चने थीं, लेकिन भला हो कि भारत में एड्स का छींका सौभाग्यवश अमेरिका के ‘सेण्टर फॉर डिसीज कण्ट्रोल’ की कृपा से ऐसा टूटा कि हम बहुत जल्दी उन तमाम गर्ली-मेगजींस को पछाड़ने की हैसियत में आ गये। ‘नाको‘ के कण्डोम-प्रमोशन कार्यक्रम ने इस उपलब्धि में आशाजनक अभिवृद्धि की। ये माध्यमिक शाला के बच्चों तक में ज्ञानार्जनार्थ वितरित किये गये। केले पर कण्डोम चढ़ा कर किये गये डिमांस्ट्रेशन ने किशोरवय के लिये नयी स्वाद निर्मिति की। बिल क्लिण्टन के भारत आगमन पर बैंगलोर में कण्डोम के विराट स्वागत द्वार बनाये गये। टेलिजेनिक पिता विज्ञापनों में अपने सुपुत्र को एड्स नामक महारोग से बचाने के लिये उसकी जीन्स की जेब में चुपचाप कण्डोम रखकर अपनी ‘विज्ञानवादी सांस्कृतिक भूमिका’ में आ गया। बदचलनी बदलकर उत्तर-आधुनिक जीवनशैली कहलाने लगी। मांए सैक्सी कहला कर दर्पवती होने लगीं। वस्त्र देह पर गनीमत होने लगे। फैशन ने भारतीय स्त्री की देह का नया लोकार्पण किया। प्रोढ़ाओं का यौनिक-निजता को ढांपते रहने वाला पल्ला उड़ा और युवतियों के लिये ’डॉगी-फक‘ की फैण्टसी फार्म करने वाली जीन्स की ‘बैक-फिटिंग’ आने लगी। फैशन-टेक्नोलाजी ने युवतियों की जीन्स की सिलाई और आर्गेज्म में अन्तर-सम्बन्ध आविष्कृत किया। यह पोर्न इंडस्ट्री के भारत में प्रवेश पूर्व ‘संकीर्ण-सांस्कृतिक-पुलिया’ की प्रशस्तीकरण-प्रक्रिया थी। क्योंकि, जितनी विदेशी पूंजी के लिए हमने अपनी अर्थ-व्यवस्था के दरवाजे खोले, उससे कई गुना राजस्व चीन अमेरिका से सेक्सटॉयज के व्यापार से अर्जित कर लेता है। एक हम हैं कि इस क्षेत्र में ठिठके और ठहरे हुए हैं। फिर हमारे यहां सेक्स-वर्जनाओं की बहुत सारी बाधाएं हैं। वे स्पीड ब्रेकर्स हैं। यदि इसे एक गतिमान समाज बनाना है तो उनकी ‘सिद्धान्तिकी‘ बताती है कि ‘सामाजिक आघात‘ ही ‘सामाजिक विकास’ है। भारत को इस दिशा में शीघ्र ही कार्यवाही करना है। कहना न होगा कि बाजार के वर्चस्व के बढ़ने के साथ ही यह सम्भव भी होने लगा है। सांस्कृतिक संकोच की विदाई बेला का पूर्वरंग है।

जब भाई आशुतोष कुमार ने अपने आलेख में पोर्नोग्राफिक होने के लांछन से इरादतन बदनाम की जा रही हिन्दी की श्रेष्ठतम कविताएं उद्धृत कीं तो सचमुच ही मैंने उन्हें पहली बार अविकल रूप में पढ़ा। और पाया कि हिन्दी में कैंसर एक नयी ‘काव्य-युक्ति’ बनकर ऐन्द्रिकता से निर्विघ्न क्रीड़ा के लिए ‘‘उपर्युक्त नई और निर्द्वन्द संकोचहीनता’’ के साथ मनोवांछित स्पेस निर्मित करने में सफलतापूर्वक इमदाद कर रहा है। यह रोग और कविता के मध्य नया सहकार है जो कविता की दुनिया को पहली बार इस सूत्र से सेन्सुअसली सम्पन्न और समृद्ध बना रहा है ।

बहरहाल अब हम ‘स्तन‘ नामक कविता के आन्तरिक स्थापत्य को देखें तो वहां, उसकी आरंभिक चालीस पंक्तियां प्रकारान्तर से ‘प्लेजर विथ बेबी बूब्स‘ के ऐन्द्रिक कौशल का ही वितान रचती है। अतः ‘स्तन‘ कविता की संरचना के बारे में यदि मैं अपनी स्थानीय मालवी बोली में बताऊं तो कहना होगा, ‘ये तो मांड्या में टिपकी धर देणे का काम है।‘ अर्थात् आप मांडना तो अपनी मन-मर्जी का जैसा चाहे वैसा बनाइये बस उसके अंत में कहीं ‘टिपकी‘ (बिन्दी) लगा दीजिये। यह आपके किये धरे को ‘अनालोच्य‘ बनाने की चतुराई होगी। यह आपके ’चित्रावण’ को लेकर उठ सकने वाली किसी भी किस्म की आपत्तियों को छीन लेगी। इसलिए कविता में अपनी आरंभिक-संरचना में कवि कुचों से पूर्वरंग की तरह कितनी ही किस्म की ‘कुचमात‘ करता रहे और चाहे कविश्रेष्ठ के लिये यही कविता का आत्यन्तिक अभीष्ट भी हो, लेकिन अंत में करूणा का तिनके की आड़ की तरह उपयोग कर लीजिए। यह आलोचना के खतरे से परिचित होना तथा संभावना को सफलता से दुहना होगा। यह आपत्ति उठाने के लिए मुंहतोड़ उत्तर का आधार होगा। वह आलोचना की आवाजाही पर रोक लगा देगा। क्योंकि ’करूणा का आचमन‘ अवशिष्ट की भी शुद्धि करके उसे स्वीकार्य बना देगा। दरअस्ल, कविता में यह अपनी ’चतुराई पर आश्वस्त‘ कवि का स्वयम् को जरूरत से ज्यादा मेधाग्रस्त समझ लेने का संकट है।

दूसरी कविता ‘ब्रेस्टकेंसर‘ है। दोनों ही कविताओं में ‘दुद्धुओं‘ से ‘भाषा से भाषा में पैदा किये जाने वाले खेल’ में स्वयम् को पारंगत समझने वाले कवि का युक्ति-प्रदर्शन है। शायद, इसे ही विटगेंस्टाइन ने ‘भाषा के छुट्टी पर जाने से पैदा हुई मौज‘ कहा है। यहां कविता में मौज ही प्रतिपाद्य है। नतीजन यहां ध्यान देने की एक महत्वपूर्ण बात और भी है। देखें कि दोनों ही सर्जक अतिरिक्त रूप से सतर्क हैं कि वहां कहीं शिशु न आ धमके। क्योंकि कविता में आते ही वह कमबख्त दुधमुंहा उसकी ‘अमानत’ होने के दावे को खारिज कर देगा, क्योंकि ‘जैविक-रूप’ से तो वे उसकी ही अमानतें हैं। उन पर उसका ‘बॉयोलॉजिकल-पजेशन‘ है। उसके जीवन-मरण का प्रश्न जुड़ा है, उनसे। वह अपनी अबोधता के सहारे सस्पेन्शन ऑफ सेक्चुअल्टी की अवांछनीय-स्थिति निर्मित कर देगा। कविता में व्यर्थ ही ‘यौनिकता‘ और ‘मातृत्व’ का द्वैत खड़ा कर देगा। क्योंकि अभी तक संसार में कहीं भी ऐसी स्त्री का बिम्ब नहीं है। न किसी चित्रकृति में न ही किसी कविता में। जिसमें ‘मैथुन और मातृत्व‘ एक साथ रख दिये गये हों। यहां तक कि कोई महान् पोर्नोग्राफर भी ऐसा धृष्टतम दुस्साहस नहीं कर पाया है कि वह बच्चे को स्तनपान कराती स्त्री को सम्भोगरत चित्रित कर दे। न कहो ‘सृजनात्मक-स्वायत्तता’ को ‘वर्जनाहीन ध्रुवान्त‘ तक ले जाने का जो नया स्त्रैण-शौर्य ऐसी कविता में देह के जिस चातुर्य के साथ दिगम्बरत्व का दिग्दर्शन करा रहा है वह कुछ भी करवा सकता है। यह हिन्दी के किसी प्रतिभाग्रस्त कवि के लिये दुःसाध्य तो कतई नहीं है। बहरहाल, स्त्री, स्तनों के साथ वहां कविता से धात्री के रूप में तयशुदा ढंग से विस्थापित कर दी गई है। वह बहिष्कृत है। केवल कुचवती है; जो स्त्री को केवल शिश्न-कीलित ऑब्जेक्ट में अवघटित कर देती है।

कविद्वय बखूबी यह जानते हैं कि वस्तुतः बच्चा अपनी अबोधता में ही इतना दुष्ट है कि वह कविता में दाखिल होते ही कविता के निर्धारित स्थापत्य को ध्वस्त कर देगा। वह कविता में स्पन्दित ऐन्द्रिकता को दन्तविहीन होकर भी दंश लगा देगा। कविता नीली पड़ जायेगी। ब्लू हो जायेगी। उसकी किलकारी से कविता कामाश्रयी होने की रंजकता से हाथ धो बैठेगी। यौनानंद का नियोजित ‘उपादानी वृत्त’ टूट जायेगा। वह ‘रमणीत्व‘ की ऐन्द्रिकता से पैदा होने वाले ‘सुख मे प्रवंचना‘ खड़ी कर देगा। इसलिए स्पष्टतः दोनों बच्चे को बहिष्कृत कर के रखते हैं। वह कविता-बदर है। इससे स्पष्टतः प्रतिपादित होता है कि कविद्वय की कविता का अभीष्ट भिन्न नहीं है। अलबत्ता, दूसरे नम्बर की कविता पहले नम्बर की कविता को चुनौती देती है,। जैसे कहती है, ‘‘यह विषय स्त्री का है, कवि बाबू! अतः देखो, एक नयी स्त्रैण युक्ति से ऐसे विषय पर कविता की चमकीली गढ़न्त कैसे संभव होती है। आओ , मैं बताती हूं।’’ इस कविता में पवन करण की कविता को पीछे छोड़ने का सृजन-संकल्प है। यह कविता नहीं है, बल्कि पुरूषवादी नहले पर , स्त्री-वादी दहला मारने देने की तसल्ली है।

पहली कविता की अपेक्षा यहां इस कविता में सर्जक के पास अपने ‘स्त्री-वर्चस्व’ की निर्भीकता भी है। वह निर्द्वन्द्व होकर कुचों से क्रीड़ा रचती है। यह ‘माय वैजाइना माय रूल‘ की पोर्नोग्राफिक मुनादी का वक्ष के इलाके में कवि द्वारा प्रदर्शित नया साहस है . जिसके चलते स्त्री की यौनिक-निजता का पोर्न-उद्योग के व्यापक हित में लोकार्पण कराना संभव हुआ था। पहली कविता में तो मात्र एक को ही खो देने का हादसा था। यहां एक के बजाय दोनों को खो देने से कवि के लिये कविता में ‘क्रीड़ा का वृत्त’ वृहद् होने की गुंजाइशें बनीं। विषय विस्तार के लिये क्षेत्रफल दुगुना सुलभ हुआ। यह मेसेक्टटॉमी पर एकाग्र कविता है। यहां मेरा मन्तव्य दोनों कविताओं के बीच तुलना करने का कतई नहीं है। ‘श्रेष्ठ’ और ‘श्रेष्ठतर‘ के पंगे का प्रश्न मेरे लिये सर्वथा निर्मूल है। यह कवि बिरादरी के कौटुम्बिक कलह का आन्तरिक प्रकरण है। पर दूसरी कविता में स्त्री में रजोनिवृत्ति के बाद सेक्स को लेकर जो खिलन्दड़पन अपने पूर्ण प्राकट्य पर होता है, उसका भी यथोचित योगदान है। घरों में हमें रजोनिवृत्‍त प्रौढ़ा चाचियों मासियों व बुआओं की नवोढ़ाओं से होने वाली चुहल में इसके स्पष्ट दर्शन मिलते हैं।

बहरहाल यहां तुलनाएं सिर्फ उनके मंसूबों की हैं, जो कि अपनी प्रकृति में ‘रचना‘ के सृजन-साम्य‘ के लिये दोनों सर्जकों को पूर्णतः वशीभूत कर के रखते हैं। क्योंकि दोनों ही कवि ‘गोपन’ को खोलने की ‘थ्रिल’ को करूणा के कतरों से छुपाने का स्वांग रचते हुए , उन्हें खोलकर उनसे खेलने को ही अपना ’काव्याभीष्ट‘ बनाते हैं। वही उनका और कविता के लिये अलभ्य प्रतिपाद्य है। यहां नवगीतकार नईम की बात याद आ रही है, जिसमें वे गोश्तखोरी की ओर संकेत करते हुए कहते हैं, ‘ईद-बकरीद तो बस बहाना है।’ यह वैसा ही चातुर्य है, जो करूणा का कारोबार करते हुए फिल्मों के पेशेवर लोग दृष्य-भाषा के माध्यम से दर्शक की ‘यौनेत्तजना’ से इस तरह खेलते हैं कि दृष्य से आंख से ज्यादा अन्तर्वस्त्र भींग उठें।

निश्चय ही ऐसे में टिप्पणीकर्ता शालिनी माथुर ने इसमें चतुराई से छुपा ली गई ‘पोर्नोग्राफिक-नीयत’ को पढ़ लिया। उसके पाठ को महान् रचनाओं पर ‘पोर्नो‘ होने के लांछन लगाना मानते हुए कविता बिरादरी के पारखियों का एक समूह सहसा तमतमा उठा। दरअसल एक , पोर्नोग्राफर शब्द के सहारे चित्रात्मक ढंग से ‘मिथ्या-यौन तुष्टि’ की तरफ ले जाता है। जबकि, ‘विजुअल-लैंग्विज‘ का पोर्नोग्राफर धीरे-धीरे स्त्री को राजी करता है, स्वयं को खोलने के लिए। वह स्वयं को खोलती है और बाद इसके, खुद से खुलकर खेलने लगती है। अपनी यौनिकता भर से नहीं, यौनांगों से खेलते हुए वह ‘अन्य’ को ‘आनन्द’ का उपभोक्ता बना लेती है। जो फ्रेम और टेक्स्ट से बाहर है। उसमें पीड़ा और प्रश्नों से भरा कोई सांस्कृतिक संकोच नहीं होता। उसका खिलन्दड़ापन ही माल का सौंदर्यीकरण है। वह जितना खेल के वृत्त का विस्तार करेगी, उतना ही उसके उपभोक्ता की तसल्ली का दायरा वृहद बनता जायेगा। यह ‘ब्रेस्ट कैंसर’ के लेबल के साथ ‘वुमन-सेक्सुअल्टी’ की सेंसुअसनेस की पण्य-उद्देश्य के लिये की गई प्रीतिकर पैकेजिंग है। इन बातों को ध्यान में रखकर देखें तो लगता है, यहां कविता से मंजा हुआ चातुर्य झलकता है। इस कविता का कवि कुचों को उम्र के दस वर्षों में ले जाता है। पहाड़ों पर चढ़ता है। दूध की नदियां बहाता है। पहाड़ खोद कर अपने शब्दों के शिकन्जे से चुहिया को पकड़ कर लाता है। ज्वैलथीफ के फिल्मी-स्मगलर की तर्ज पर वहां से हीरे निकालता है-- यानी एक शब्द की छाया से दूसरे शब्द की तरफ फलांगते हुए , कई-कई तरह से ‘दुद्धुओं’ से पर्याप्त दिलेरी के साथ खेलता है। वह ‘पुरूष-कवि’ को अपनी असली औकात बताता भी चलता है कि ‘ अब ठीक से अपने दीदे खोल कर देख ले ‘कवि-पुंगव’ वह अमानत और मिल्कियत पुरूष की नहीं हम स्त्रियों की है कवि भैया ! इसलिये देखो मेरा कवि उसका कैसे काव्य-दोहन करता है। वह कभी उन्हें एब्सट्रैक्ट में ले जाता है फिर कंक्रीट में ले आता है। मुहावरे के परम्परागत अर्थ की छांह में छुपता है और फिर अर्थ से बाहर निकल कर ‘अनर्थ को निचोड़ कर अलभ्य आनंद’ पैदा करता है। यह शब्द में सेक्सुअल की सोलो पर्फार्मेंस है। एक ‘इमेजिनेटिव सिन्थेसिस’ से ‘भाषान्ध’ बनाने की अचूक तकनीक है।

हमारे समीक्षकों का वृद्ध-वृन्द जो अपनी तकनीक-विरक्त दयनीयता को ‘‘स्वयं के भीतर बचा कर रख ली गई मनुष्यता’’ के रूप में विज्ञापित करता है। वे नहीं जानते कि ये ‘मौलिकता’ की कथित ‘मार्मिकता’ से भरी कविताएं सिर्फ सिन्थेटिक कविताएं हैं-जो साइबर स्पेस को खंगालते रहने की अभ्यस्तता से बहुतेरी गढ़ी जा सकती हैं। इस खदान से कविता के कई चमकीले हीरे जवाहरात निकाल कर उसकी द्युति से हिन्दी आलोचना के अधिपतियों को अभिभूत करते हुए ‘भाषान्ध’ बनाया जा सकता है। आप गूगल का आश्रय लेकर ‘ब्रेस्ट केंसर’ को लेकर लिखी गयी कविताओं की राई ढूंढने जायेंगे तो वह आपके कम्प्यूटर के डेस्कटॉप पर राइयों का पहाड़ लगा देगा। आप अपने माउस की मदद से उस पहाड़ में से अपनी कविता के काम की चुहिया निकाल लीजिये। निश्चय ही कवि होने की अर्हता वाले के पास भाषा की इतनी पूंजी तो होनी ही चाहिये कि आप चुटकी भर ‘रसना‘ से बारह गिलास बना लें।......वहां एक नहीं दोनों स्तनों की शल्यक्रिया से की जाने वाली ‘बाई-लेटरल मेसटक्टॉमी’ पर अलग से कविताएं भरी पड़ी हैं, जिनका किसी भी साहित्यिक दृष्टि से कोई काव्य-मूल्य नहीं है। वहां ‘गेट-वेल‘ पोएट्री है, जो रस्मी तौर पर रोगियों के बीच नर्सों और शुभाकांक्षी-समूहों द्वारा अस्पताल के वोर्डों में वितरित की जाती हैं, ताकि उनकी जिजीविषा और आत्मबल बढ़े। वे रोगी के लिए की जाने वाली लैंग्विज-थैरेपी का हिस्सा हें। वहां हर किस्म की व्याधियों पर लिखी गई कविताओं का जखीरा भरा पड़ा है, जिसको उठाकर कोई ‘चतुर कविताभ्यासी‘ अन्य रोगों पर हिन्दी के वृद्ध समीक्षकों को चमत्कृत कर डालने वाली कविताएं थमा कर , महानता की कतार में खड़े होने के लिए, उनके हाथों से इतिहास के दरवाजे का गेटपास छीन सकता है। ‘वी ऑर क्रैक्ड पॉट्स‘ रजस्वला होने के साथ स्त्री से जुड़ जाने वाले नियमित रक्तस्राव को लेकर तंजिया कविताएं हैं। रजोनिवृत्ति पर भी मसखरी करती कई कविताएं हैं। और तो और आप मासिक धर्म के रक्त से सने सेनेट्री नेपकिन को लेकर कविता और पेण्टिंग्स दोनों ही बरामद कर सकते हैं। पेण्टिंग में कैनवास पर अचानक कर दी गई मूर्खता जैसा भी सौन्दर्य नहीं है। वहां ‘दुद्धू‘ और ‘पद्दू‘ पर भी पोएट्री है। हिप-फोरम में समलैंगिक-समुदाय में कई अज्ञातकुलशील कवि हैं। नॉन-डिस्क्रिप्ट पोएट। बहरहाल कई कई तरह की बीमारियों की सनसनी और सच्चाई से लथपथ ऐसी कई संभावनाशील कविताएं और कवि वहां हचर-हचर कर रहे हैं। सड़ांध में स्वाद निर्माण करने की व्यंजन विधि में निष्णात हिन्दी के कुछ अतिरिक्त प्रतिभाग्रस्त कवि वहां से वांछित रोग की सामग्री उठायें और उसमें अपने पास से ‘मिथ्या-भावमयता‘ भर कर कई ताजा ‘भरवाँ‘ कविताएं बना सकते हैं। वे गर्मागर्म भी रहेंगीं और आस्वाद के स्तर पर आलोचक के मुखारविन्द से विशेषणों को लार की तरह लगातार टपकायेंगी।

कहने की जरूरत नहीं कि ऐसी तमाम चमकीली कविताएं किसी दिन मौलिकता के संदर्भ में ‘विश्वास को इरादतन मुअत्तल‘ करने का काम करेंगी। यदि ऐसी ‘सिन्थेटिक’ कविताओं की फसल को आलोचना की टेढ़ी नजरों से बचाने के लिए कोई भाषा के कांटेदार तर्कों की बागड़ करेगा तो वह स्वयं संदिग्ध हो जायेगा। यह गंजे के सिर पर टोपी का इंतजाम की कोशिश कही जायेगी। एक फ्रेंच कहावत है ‘ डोंट ट्राय टू कीप द कैप्स ऑन बाल्ड हेड‘।

यहां मैं साठ के दशक का स्मरण करना चाहता हूं, जब योरप में आमतौर पर और अमेरिका में खासतौर पर ‘कल के विरूद्ध बिना किसी कल‘ वाली पीढ़ी ‘विचारहीनता के विचार‘ की सुरंग में फंस चुकी थी। वह उस वक्त की अंधी कोख से जन्मी थी, ‘एण्ट्री-पोयट्री‘ जिसके विकृत अनुकरण में हिन्दी में ‘अकविता-आंदोलन‘ खड़ा हो गया था। तब कविता स्त्री की जांघ में पीप और मवाद ढूंढ रही थी। कवि सड़क पर चलती हर स्त्री को छेद की तरह देख रहा था। मरे हुए बत्तखों की सी लटकती छातियों पर हस्तमैथुन से वीर्याभिषेक कर रहा था। उस समय की अमेरिकी ‘एण्टी-पोएट्री‘ में ‘ब्लैक-पोएट्री‘ नाम की कविता का फैलाया हुआ ‘घृणा का समाजशास्त्र‘ अपने कपड़े उतार रहा था। नग्नता और फूहड़ता विकृति का नया कीर्तिमान बन रही थी। वह सर्जन नहीं उत्सर्जन था। साथ ही साथ अकहानियों की धमचक भी शुरू हो गई थी। जिसमें समुद्र तट की रेत में श्वेत-स्त्री के साथ संभोग करते हुए, पात्र को ‘वह अमेरिका की ले रहा है‘, जैसा शौर्यानुभव हो रहा था। शायद तभी धर्मवीर भारती ने ‘चिकनी सतहें बहते आन्दोलन’ तथा कमलेश्वर ने ‘ऐय्याश प्रेतों का विद्रोह‘ नामक लेख बहुत आक्रामकता के साथ लिखे थे। लेकिन यहां हिन्दी आलोचना के सामाजिक विवेक की सराहना की जाना चाहिए कि उसने ‘बेहतर के लिए मेहतर‘ की भूमिका निभाई और नाबदान को समय रहते निर्ममता के साथ साफ कर दिया था। ‘विजप’ ( गंगाप्रसाद विमल , जगदीष चतुर्वेदी और श्‍याम परमार ) की उस कवि-त्रयी की उन रचनाओं का आज कोई अता-पता नहीं है। वक्त के गन्दे नाले में बह कर जाने कहां चलीं गईं। लोगों को सिर्फ राजकमल चौधरी की ‘‘मुक्ति-प्रसंग’’ भर की स्मृति है। चन्द्रकान्त देवताले आदि भी जल्दी ही अलग हो गये थे - और स्वयं को व्यापक सामाजिक-आर्थिक परिप्रेक्ष्य से जोड़कर आज अपने समय के एक महत्वपूर्ण कवि होने का सम्मान अर्जित किये हुए हैं।

इसकी वजह यही थी कि आलोचना के पास तब व्यापक सामाजिक-आर्थिक संदर्भों में सृजन को नाथने का विचारधारा से उर्जस्वित प्रतिबद्ध संकल्प था। कुछ निश्चित प्रतिमान थे। लगता है दुर्भाग्यवश वैसी साहसिक आलोचना अब नहीं रह गयी है। अब वह ललाटों पर लाल टीका लगाने की लपक से भर चुकी है। नयी ‘दमित अस्मिताओं की अभिव्यक्ति के नाम पर आ रही ऐसी फूहड़ता के बारे में कुछ भी बोलते हुए आलोचना की अब घिग्घी बंध जाती है। आलोचना गोलमोल भाषा में अपना छद्म-वक्तव्य देकर बच निकलती है। या फिर मारे डर के वह उल्टे उनकी आरतियों और स्तुतिगान की तैयारियों में जुट जाती है।

दरअसल सृजनात्मकता के क्षेत्र में ऐसी दारूण वैचारिक दयनीयता इसलिए भी आ गयी है कि वामपंथ के पराभव के पश्चात के इस उत्तरआधुनिक दौर ने आलोचकों के हाथों से वे उपकरण छीन कर घूरे पर फेंक दिये हैं, जिनसे वे ’सृजन‘ को कठोरता के साथ कसौटी पर रखते थे। तब वे समूचे सृजन क्षेत्र को विचार से दहकते सवालों को नोंक पर रखते हुए पूछते थे ‘‘कविश्री तुम्हारे पैमाने और प्रतिमान क्या हैं ?’’ पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ?’’ लेकिन, बकौल नोम चोमस्की ‘अब राजनीति एक बड़ा निवेश हो गयी है और हरेक की जेब में अब अपने-अपने सुभीते और साइज का जनतंत्र है। अब मार्केट-फ्रेण्डली फ्रीडम का फण्डा है। चयन को ही सृजन की स्वतंत्रता’ की तरह बताया जा रहा है। इसलिए कविता व्यापक जन-संदर्भों के सवालों से मुक्त हो गयी है। नतीजतन कवि तथा कविता में ‘कैरियरिज्म‘ ने ‘विषय वैचित्र्य’ की अनियन्त्रित लिप्सा भर दी है। वह वहां जाना चाहता है, जहां कभी कोई गया नहीं और कोई जाएगा भी नहीं। यह संस्कृत के ‘अगम्यागमन’ का ही संकल्प है। वही अब नया ‘काव्याभीष्ट‘ है। फिर भारत जैसे अत्यन्त जटिलता से अंतरग्रथित समाज में सामाजिक-सांस्कृतिक निषेधों को तोड़े जाने से जो ‘थ्रिल‘ बनती है, वह अब बहुत बिकाऊ सिद्ध हो रही है। भारतीय अंग्रेजी में ऐसे लेखन को लगे हाथ प्रकाशक सर पर उठाने के लिए आगे आ जाता है। अतः ‘इनसेस्ट‘ अर्थात् रक्त-संबंधियों से सेक्स का चित्रण बहुत सेलेबल है। याद करिए कि कैसे ‘ब्लू-बेडस्प्रेड के प्रकाशन का सौदा पिकाडोर से तत्काल सत्तर लाख में हो गया। क्योंकि वह सहोदरा से सेक्स को चित्रित करता था। न कहो किसी दिन हिन्दी में कोई प्रतिभात्रस्त ‘भगिनीभोक्ता’ जैसा चरित्र गढ़ कर चमत्कार करने वाले सर्जक के रूप में प्रकट हो जाये। यदि ऐसे साहित्य को हिन्दी में अनूदित कर दिया जाये तो उसकी औकात उस पल्प-लिट्रेचर की रह जायेगी जो रेलों तथा छात्रावासों में पढ़ने के बाद कूड़े में अपनी जगह पाती हैं। हकीकत ये है कि अब ’फैशन‘ और ’उपभोग‘ साहित्य में शिफ्ट हो गया है। यह निश्चय ही ‘विचारहीनता के विचार’ की सर्वग्रासी अवस्था है। बहरहाल ऐसे समय ‘विचार’ की बात करने का अर्थ ‘दिगम्बरों’ के मुहल्ले में लॉण्ड्री खोलने की जिद करना है। नंगा नहाने पर क्या निचोड़ेगा..?

कुछ वर्षों से ‘माय मॉम्स लवर‘, ‘माय मॉम्स न्यू ब्वाय फ्रेण्ड‘, ‘डोण्ट टेल इट टू मॉम‘ शीर्षकों वाली कविताओं और कहानियों ने साइबर-बिजनेस में करोड़ों की संख्या में ‘हिट्स‘ दीं। अब तो इन टाइटिल के वीडियो आ गये हैं और उनकी क्लिप्स को अपने ब्लैक-बेरी के जरिये मित्रों को भेजना युवा पीढ़ी का नया उत्तर-आधुनिक सांस्कृतिक-आदान-प्रदान है। ‘सविता भाभी’ की अपने प्रेमियों के साथ सेक्स-कथा ग्राफिक्स और एनीमेशन में खासा व्यवसाय कर चुकी है। यदि हिन्दी का कोई कवि ऐसे विषयों को कविता में शामिल करके अपनी प्रतिभा के विस्फोट का चमत्कार पैदा करने लगे और हम उसकी प्रेरणा के मुख्य स्रोतों से अनभिज्ञ हैं तो यह हमारी आलोचना की सूचना सम्पन्नता नहीं बल्कि दरिद्रता का प्रमाणीकरण है। यह सामाजिक संदर्भों के इलाके का नया अंधत्व है, जिन्हें चमत्कार की चौंध ने ‘फोटोफोबिया’ पैदा कर दिया है। उनसे ऐसी चमक में विकृतियों की शक्लों की शिनाख्त नहीं हो पा रही है। यह उनके द्वारा गन्धाते गोबर में गालिब का दिग्दर्शन कर लिया जाना है ।

अब अंत में थोड़ी बातें ‘ब्रेस्ट कैंसर‘ नामक कविता की। रचयिता विदुषी अनामिका की प्रति-टिप्पणी को लेकर। टिप्पणी पढ़कर लगा कि उनमें भरपूर कवि-चातुर्य तो है , लेकिन टिप्पणी की भाषा में कुछ अतिरिक्त चतुराई है। वे टिप्पणी के आरंभ में पहले ही अंग्रेजी की छतरी तान कर रख देती हैं। बीच टिप्पणी में डराने के लिए एक अश्वेत कवयित्री की कविता का बिजूका भी गाड़ देती हैं। जैसे वह कोई कविता न होकर धमकी हो कि अभी ऐसा सृजन-वैराट्य तो मैंने प्रदर्शित ही नहीं किया है शालिनी बाबू..।। लेकिन अब बिजूकों के दिन लद गये। वीरेन्द्र कुमार बर्नवाल और रमेश दवे जिन्होंने सबसे ज्यादा अफ्रीकी तथा ब्लैक लिट्रेचर खंगाला है , वे बता सकते हैं कि वहां की हालत क्या है। रोजन कॉज ने ब्लैक कविता में जहां-तहां छितरायी हुई इस तरह की फूहड़ता की पर्याप्त निर्ममता से सफाई की है। नेट-युग में अब ऐसे बिजूकों से शायद ही हिन्दी का कोई प्रबुद्ध पाठक डरता हो। बहरहाल, वे शालिनी माथुर की टिप्पणी से जागृत अपने क्रोध की ‘धधक‘ को कोमल के कौशल‘ से ‘केमोफ्लैज’ करती हुई , बाहर से बहुत विनम्र जान पड़ती हैं, लेकिन जिस तरह शुरू में ही बहनापे को छोड़ कर , प्रेमचन्द के भाई साहब में काया प्रवेश करते ही , उनके भीतर की उस ज्ञान-वर्चस्व प्रदर्शन की लालसा लगे हाथ लपक कर बाहर आ गयी, वे अपनी सहोदरा की विवेचनात्मक टिप्पणी को ‘कोसने और कलपने‘ का पर्याय बता कर उसे खारिज करने का अप्रकट उपक्रम करती हैं। फिर कविता के स्वभाव को स्त्री का स्वभाव का पर्याय बताने लगती हैं। हालांकि कविता का अगर यही स्वभाव है, तो उन कविताओं का क्या होगा, जो गरेबान पकड़ कर सच को उगलवाने के लिए आगे आती रही है ? खैर ऐसे में मुझे सहसा भोपाल स्कूल की समीक्षा-भाषा के स्वांग की याद हो आयी। जहां स्वामीनाथन की कलाकृति या कृष्णबलदेव वैद की कहानियों पर बातें शुरू करते हुए कहा जाता था ‘उनकी कृति का कहें कि प्रकारान्तर से क्वचित् यह स्वभाव ही रहा आया है कि वे पाठक से सहसा सम्वाद के लिए तैयार ही नहीं होतीं। अपितु वह उसकी तरफ इरादतन अपनी पीठ फेरे रहती हैं। उन्हें शनैः शनैः राजी करना होता है।‘ ज्ञान चतुर्वेदी ने इस चतुराई पर अपनी निर्मल विनोदी टिप्पणी में कहा ‘क्या ये यह कहना चाहते हैं कि इनकी कृतियों को औरतों की तरह पटाने की जरूरत होती है ? यानी पाठकजी आयें फिर कविताजी की पीठ पर हाथ फेरें। गुदगुदी करने लगें। तब न कहो कविता जी बुरा ही मान जाएं। तब क्या होगा ? ..........बहरहाल, गनीमत थी कि वे अपनी में टिप्पणी मिथिला तक ही गई और खजुराहो या अजंता-एलोरा की गुफाओं में नहीं घुसीं। वर्ना जब भी हमारे यहां यौनिकता के फूहड़पन पर किसी भी किस्म की टिप्पणी की जाती है, तो विद्वज्जन तर्काकाश में उड़ कर तुरत वहां पहुंच जाते हैं। ऐसी लम्बी दौड़ के बिना वे विचार को वार्म अप नहीं कर पाते। और फिर उनकी ही छतों और शिखरों पर चढ़ कर टीवी एंकर्स की तरह बोलने लगते हैं-- ‘‘ये देखिये..यहां पत्थरों में मूर्तियों के स्तन भारी हैं , इनके नितम्ब भी भारी हैं और ये सम्भोगरत भी हैं........अब आप ही बताइये कि क्या ये अश्लील हैं ? पर किससे कहें कि खजुराहों के पहाडों में से चुहिया निकालना मुश्किल है।

आगे देखें... वे दृष्टि में मर्दवाद के महीन लांछन के लिए टिप्पणीकार को ‘शालिनी बाबू’ भी कहती हैं। उन्हें अपनी कविता पर मंडराते संकट से ईसा का क्रूसीफिकेशन भी याद हो आया। यहां तक कि लगे हाथ फासीवाद तक भी याद आ गया। टक्कर के पुरूष और स्त्री की यौनिकता जगा पाने की जैविक चुनौतियों के पार्श्व में खड़े ‘आर्गेज्म’ को भी वे टिप्पणी में ले आयीं है। पोर्न का सारा व्यवसाय ही ‘आर्गेज्म’ को रचने या आविष्कृत करने की प्रविधि पर ही टिका है । कहना ना होगा कि किसी दिन ऐसे ही ‘पवन-वेग’ से भरा कविता के महाभारत का कोई नया ‘करण’ अतिरिक्त-प्रशंसा का शिकार‘ हिन्दी कविता का धरोष्ण अपनी बाजारीकृत दिव्यता के साथ इस विषय पर अनामिका और पवन को पछाड़ता हुआ दृष्य में अपना कीर्ति कलश स्थापित कर सकता है।

कुल मिलाकर कविता की इन विदुषी की प्रति-टिप्पणी पढ़कर लगा कि उनके भीतर क्रोध का छुपा हुआ तारत्व तो इतना है कि यदि उनके पास भाषा का कोई बघनखा होता तो वे चतुराई से ऐसी टिप्पणी का पेट चीर कर उसकी अंतड़ियां निकाल कर बाहर कर देतीं।

मुझे उनकी ऐसी चतुराई देखकर संयोगवश हमारे गांव में हर वर्ष दीवाली के समय आने वाला एक अत्यन्त दक्ष तमाशबीन याद आता है, जिसको सामने जमीन पर रखा गया सिक्का उठाना होता था तो वह पहले उस सिक्के के चारों ओर दौड़-दौड़ कर बनेठी घुमाता। फिर हवा में कोड़ा घुमाकर खुद की पीठ पर भी मार लेता। बाद इसके उस सिक्के के ऊपर से चारों दिशा में से पचीसों गुलांटियां लगाता रहता और थक कर अंत में उस सिक्के को उठाता था। कुल मिलाकर, वह इन करतबों के प्रदर्शन से दर्शकों में यह बोध पैदा करने की जुगत भिड़ाया करता था कि कितने-कितने जतन के बाद पहुंच पाया है - वो सिक्के के पास। यह संघर्ष का हासिल है। भोपाल में अशोक-युग के ‘पूर्वग्रह‘ में कविताओं की समीक्षा की यही प्रविधि होती थी। इस प्रविधि के अनुकरण से हिन्दी में कई प्रतिभाग्रस्त समीक्षक पैदा हुए जिन्होंने कई तिलों में ‘ताड़त्व’ और वामनों में ’विराटत्व’ भरने की कोशिशें कीं। वहां समीक्षा भाषा में गंभीरता का ‘उर्ध्व-उत्कीर्णन‘ होता था। कविता ‘प्रश्नकीलन‘ करती रहती थी। आलोचना में शब्दाम्बर की इस वृत्ति पर ज्ञान चतुर्वेदी ने एक टिप्पणी भी लिखी थी-‘प्रश्नकीलन से उत्पन्न अर्थ-सीलन।’ जिससे कविता की कठिनता की विवेचना के लिए और और कठिन भाषा में लिखी जा रही समीक्षा-भाषा पर उपालम्भ था। उसमें एक पंक्ति थी कि ‘‘ कहीं ऐसा तो नहीं कि गोरखपुर का कल्याण अपने नये गेट-अप में भारत-भवन से निकलने लगा हो और मैं गलती से वही उठा लाया होउं ? ’’

दरअस्ल, यह भाषा की चतुराई की सतही इलेक्ट्रोप्लेटिंग है। यह ऐसी कलई है, जो पढ़ते ही खुल जाती है। मुझे काव्य-विदुषी अनामिका की कविता तथा टिप्पणी के तिलस्म को देख कर भवानीप्रसाद मिश्र की एक काव्य पंक्ति याद आ गयी--‘‘चतुर मुझे कुछ नहीं भाया , ना स्त्री ना कविता।’’ चतुराई निश्चय ही आपके चिंतन और अभिव्यक्ति दोनों को ही संदिग्ध बनाती है। एक कवि को अपनी कविता पर स्वयम् ही स्वस्थ-संदेह करना आना चाहिये कि क्या रुग्णता पर लिखी ऐसी सिन्थेटिक कविता मृत्यु के भय या विभीषिका के विरुद्ध खड़ी रह सकती है ? ‘हलो! कैसी रही ?‘ की मसखरी से क्या मृत्यु से निबटा जा सकता है..? अगर उनकी समझ ऐसी है तो निश्चय ही वे पाठकीय विवेक का गलत आकलन कर रही हैं।

हालांकि, जीवन में अपनी रचनात्मकता के बीच हर बड़ा रचनाकार, एक बार ‘ईश्वर‘, ‘समय‘ और ‘मृत्यु‘ से भिड़े बगैर नहीं रहता । अलबत्ता ये कि कोई भी इन तीनों से भिड़े बिना बड़ा सर्जक भी नही हो पाता है। जी हां न वह न उसकी रचना। क्योंकि ये तीनों प्रश्न शताब्दियों से कला और साहित्य क्षेत्र के रचनाकर्म के लिए चुनौती की तरह बने रहे हैं। यदि इन दो कवियों की कविता इतनी बड़ी है तो फिर इस बात का कैसा डर कि मात्र एक टिप्पणी के उनके विरोध में प्रकाशन से इतनी थरथरा गयीं कि उस कविता को बचाने के लिए हांक लगानी पड़े और वो लोग आपातकालीन सहायता के लिए दौड़ पड़े जो इन दो कविताओं की रक्षा के प्रश्न से ‘कीलित’ हैं।

बहरहाल जरा गौर से देखें तो यह प्रकरण वस्तुतः पोर्न के आक्षेप से बचने भर की हलातोल नहीं है। इसे लोक-विवेक से जांचें तो समस्या बुढ़िया के मरने के अफसोस की नहीं बल्कि चिन्ता तो यह है कि मौत ने घर देख लिया है। इसलिये काव्य-कुटुम्ब की घबड़ाहट अनुचित तो कतई नहीं है। उन्हें डर है कि ऐसी नागिन सी दंश मारती ‘शालिनी-भैया मार्का’ आलोचना का कैंसर अन्य कविताओं के भीतर भी वायरस की तरह घुस जायेगा। तब तो ऐसी ‘कैंसर-कीलित’ कविताओं की उत्तरजीविता ही संदिग्ध हो जायेगी। बहरहाल जो कविता ऐसी टिप्पणी के खिलाफ नहीं लड़ सकी तो वह कैंसर के खिलाफ कैसे और कितनी दूर तक लड़ पायेगी ?
हैलन गार्डनर ने कहीं लिखा था ‘सच्चा समालोचक कभी कवि पर छत्र लगाकर नहीं चलता।‘ लेकिन यहां तो समालोचक छत्र ही नहीं, रक्षा-पाठ व उसका पारायण करता हुआ अंगरक्षक बन जाता है। कवि पर पुरस्कारों की बौछारें भी कर दी जाती है। इससे कविताओं को आलोचना का अभयदान प्राप्त हो जाता है। वे कविता के कवच-कुण्डल बन जाते हैं। जबकि, हकीकतन, जो प्रसंशाएं कवि को बिलकुल आरंभ में मिल जाती हैं, वे बाद में उसके साथ बहुत बुरी तरह से पेश आती हैं। यह नहीं भूलना चाहिए।
सृजन के क्षेत्र में एक बात यह भी है, जिसे नहीं भुलाया जाना चाहिए कि ‘महानों‘ के रचे हुए में भी बहुत कूड़ा होता है। प्रेमचन्द ने कोई चार सौ कहानियां लिखीं हैं, लेकिन आज चर्चा में वे बस दस-पन्द्रह ही आती हैं। पिकासो का सारा ‘रचा हुआ‘ महान् नहीं है और ना ही हुसैन का। उनका बहुत सारा ऐसा है, जिसका दर्जा ‘कलर्ड गारबेज‘ से ज्यादा नहीं है। हर ‘रचा‘ या ‘लिखा‘ हुआ कृति का दर्जा या ‘कृति‘ का सम्मान हासिल नहीं कर सकता। बर्गसाँ ने रचनात्मकता के क्षेत्र में सर्जक के आत्म की परिपक्वता के स्तर के संदर्भ में कहा था ‘टू चेंज मीन्स टू मैच्योर एण्ड टू मैच्योर मींस टू क्रिएट एण्ड रिजेक्ट अवर ओन सेल्फ। सो टू से दि प्रॉसेस आव क्रिएशन इज इनेविटेबली अ प्रॉसेस ऑफ रिजेक्शन टू।‘

बहरहाल, यदि आपने सृजनात्मकता के इलाके में उतरने के बाद स्वयं के रचे हुए को रद्द करने का वस्तुगत विवेक अर्जित नहीं किया तो वक्त की छलनी खुद उसे छान कर घूरे पर फेंक देगी। गांधी के आत्म विवेक ने तो सैकड़ों बार अपनी धारणाओं को डिस-ओन कर दिया था। क्या हम ऐसी कविता को छाती से चिपकाये रखेंगें..? स्तनों के कट जाने से प्रसन्नता व्यक्त करने वाले कवि के भीतर यह कैसी अपरिभाषित सी आसक्ति है..? कविता को छाती से चिपकाये रखने की..?
अंत में पता नहीं भाई आशुतोष कुमार इस सारी बहस में सनी लियोन को क्यों ले आये? साहित्य के बाणभट्टों के समक्ष सिने जगत के महेश भट्टों की-सी आर्थिक विवशताएं थोड़े ही हैं कि वे सनी लियोन का ‘प्रतिष्ठा-मूल्य बनाये। ‘जिस्म-दो‘ में भट्ट की पूंजी लगी हुई है, अतः पोर्न इंडस्ट्री की इस ‘‘भग-वती’’ की आरती अर्चना उनके लिए जरूरी है, लेकिन हिन्दी जगत के सर्जनात्मक लोगों का ऐसा कोई पूंजी आधारित प्रोजेक्ट नहीं, जिसके चलते वे पोर्न का ‘प्रतिष्ठा-मूल्य’ बढ़ाने के लिए आगे आयें। आशुतोष भाई आपकी ऐसी कोशिशों से मुझे लग रहा है कि कहीं पवन करण प्रेरणा ग्रहण करके ‘ प्रिय पोर्न-पुत्री के नाम पिता का पत्र ’ शीर्षक से कविता लिखने न बैठ जायें। क्योंकि ‘सिन्थेटिक कविता’ नेट-प्रसूत होतीं हैं। वे तुरन्त ही कवि की गोद में चढ़ने के लिये मचल उठतीं हैं।

बहरहाल, विचार के कुरूक्षेत्र में न अस्त्र की जरूरत पड़ती है, न शस्त्र की। विचार स्वयं में ही अस्त्र भी है और शस्त्र भी है। विचार से ‘मगध’ डरता है हस्तिनापुर डरता है, ऐसी सूचना श्रीकान्त वर्मा की कविताओं से बरामद हुई थीं। लेकिन ‘सृजनात्मकता’ भी विचार से डरने लगे, यह ज्यादा विचारणीय है। ये खतरनाक संकेत हैं उसके सल्तनत के-से बरताव के। बहरहाल दिल्ली में कविता का कहीं कोई ‘मगध’ तो नहीं बनने लगा है.......?

Saturday, August 18, 2012

कचरा मसीन

Cow by sidharth1 सिद्धार्थ की गाय

मेरी पिराबलम बोले तो मालूम क्या है? मैं हर टैम फील करती है कि आदमी लोक की बस्‍ती में रहती है तो आदमी लोक का हेल्‍प करने का. आदमी लोक के वास्‍ते कुछ करने का. मैं एक बात बोलती है, ध्‍यान से सुन. एक रोज मैं मेरो को बोली. रोज पेपर खाती है, आज पेपरशन करेगी. पेट का अंतड़ी का रस्‍सी के माफक गांठ बंधने लगा पर मैं पेपरशन का शपथ लिया तो लिया. शाम के टैम कू अपना पड़ोसी लंगड़ा कुत्रा लोफरगिरी करके वापस आया तो पूछा, काय मौशी, कसी तू? मैं बोली, मैं आज पेपरशन करती है. धरती माता के वास्‍ते, परावरण के वास्‍ते. वो पूछा, पेपरशन बोले तो ? अरे अनशन समझता न तू? अन्‍न धान्‍य नहीं खाने का. वैसे ई पेपरशन मंझे पेपर नई खाने का. परावरण के वास्‍ते पेपर बचाने का. कूतरा हसने लगा. काय मौशी जंतर मंतर पर जाएगी, के रामलीला मैदान में बैठेगी. तेरा भी खोपड़ी उल्‍टा घूम गएला है. आज पेपरशन करती है कल को पाल्‍टी बना के लैक्‍शन लड़ेंगी क्‍या. अपनी औकात में रहने का बुड्ढी. तू तेरा काम कर, जास्‍ती भेजा लगाने का नई. तू जितना जासती पेपर खा सकती है, खा जाने का. ओ पेपरशन आदमी लोक के वास्‍ते है मंझे उनको बोलते पेपर कम बापरो पेड़ कम काटो. जानवर लोक को पेपर जासती वापरना मांगता. तू जितना जास्‍ती खा सकती है, खा डाल, पेपर-शेपर, प्‍लास्टिक-फ्लास्टिक, जितना जास्‍ती खा सकती है खा डाल. और पचा डाल. कुछ तो कचरा कम होएंगा. आदमी लोका का पाप कम होता दिखेंगा. कुतरे का बात से मेरा आंख खुल गया. कभी कभी अक्‍खा जिंदगी हम लोक कोई काम करते रहते है, पर एंड में जा के मालूम गिरता है हमने गलत जिंदगी बिता दिया. फिर सुरू से सुरू करने का टैम नई मिलता रे. मेरे को टैम से समझ में आया, मेरा काम कचरा साफ करने का है. उसके बाद से मैं कचरा मसीन बन गई ली.

Friday, June 29, 2012

अबे! ओ!! कवि!!!

Achhi kavita likh 0612
तू लिक्‍ख
कागज को घोच मत
अच्‍छी कविता लिक्‍ख

Saturday, June 16, 2012

समकालीन कविता

samkalin kavita1
चिंतनदिशा में समकालीन कविता पर विजय बहादुर सिंह और विजय कुमार की चिट्ठियां आप पढ़ चुके हैं. फिर अगले अंक में उन चिट्ठियों पर विजेंद्र और जीवन सिंह की प्रतिक्रिया भी पढ़ चुके हैं. चिंतनदिशा के ताजा अंक में राधेश्‍याम उपाध्‍याय, महेश पुनेठा, सुलतान अहमद और मेरी प्रतिक्रियाएं छपी हैं. इन्‍हें बारी बारी से यहां रख रहा हूं. इस क्रम में राधेश्‍याम उपाध्‍याय, महेश पुनेठा और सुलतान अहमद की प्रतिक्रिया आप पढ़ चुके हैं. अब यह रही मेरी टिप्‍पणी.
 

समकालीन कविता पर यहां अभी तक हुई बातचीत में हमेशा की तरह विचारधारात्मक सरणियां बनाने की कोशिश हुई है। इसमें खींचतान भी हुई है। आलोचक का वस्तुनिष्ठ होना ज़रूरी होता है। अक्सर निजी पसंद और आग्रह सीमा बन जाते हैं। इसलिए निष्कर्षों में झोल आ जाता है।
विजय बहादुर जी के परंपरा या भारतीयता खोजने के आग्रह सिद्धांत रूप में ठीक हो सकते हैं पर आधुनिक विचार को विदेशी कह कर दर किनार कैसे किया जा सकता है? वे अपनी पसंद के कुछ ही कवियों के नाम लेते हैं। नागार्जुन उनकी चर्चा के केंद्र में हैं। नागार्जुन विजेंद्र जी की चर्चा के भी केंद्र में हैं। लेकिन उनकी अवधारणात्मक लाइन विचारधारात्मक लाइन में चली जाती है, जो आगे क्रांतिकामी लाइन पकड़ लेती है और विजय कुमार जी की बातों, निष्पत्तियों और आशंकाओं को काटती चली जाती है। विजेंद्र जी के लिए अस्तित्ववाद वर्ज्य है, कविता में आता अवसाद और निराशा के भाव भी। क्या हम इस तरह यथार्थ से आंखें मूंदे रह सकते हैं या अपनी सुविधा से यथार्थ दर्शन कर सकते हैं? हमारे देखते देखते मार्क्सवादी पार्टियां किस तरह अप्रासंगिक हुई हैं, पहले उन्होंने सांस्कृतिक क्षेत्र में काम नहीं किया और इधर नक्सलबात्रडी ने जनता के बीच अपनी और फजीहत करवा ली है, इतर जनांदोलनों की शक्ति भी क्षीण हुई है। चाहे पानी, बांध और जंगल का मसला हो, या शासकीय हिंसा का, जनआंदोलनों को एनजीओ ने ग्रस लिया है। अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद तो सिविल सोसाइटी शब्द ने आंदोलनों की साख को ही संदेह के घेरे में ला पटका है। संघर्ष और जनांदोलन और परिवर्तन की नई जमीन तोड़नी पडे़गी, नए औजारों के साथ। पता नहीं विजेंद्र जी और जीवन सिंह जी के फार्मुलेशन कितने काम आएंगे। यहां पुराना सवाल फिर सामने आ जाता है कि क्या कविता को मात्र विचारधारात्मक औजार तक सीमित किया जा सकता है?
हमें यह भी सोचना होगा कि बदलते हुए समय में क्या लोक का चेहरा और चित्त वैसा ही है? ऊपर से नब्बे के बाद, और नई आर्थिक नीति के बाद लोक की कैसी फजीहत हुई है? जो बदसूरत, बदरंग, बेढंगा शहरीकरण हुआ है, विस्थापन हुआ है, उसमें से लोक का किस तरह का चेहरा निकल के आ रहा है? शहर तो शहर आज गांव का क्या हाल है? बाज़ार, इंटरनेट, केबल, टैक्सी, लोक को क्या से क्या बना रहा है? गांव ही क्यों, शहरी निम्नमध्य वर्ग की क्या हालत है? यह लोक त्रिलोचन, नागार्जुन, केदार, विजेंद्र, बद्री, देवी, एकांत या चेतनक्रांति, किसके लोक में दिखता है? किसी एक के या हरेक की अलग छटा है?
ऐसे में क्या हम मान सकते हैं कि रघुवीर सहाय प्रासंगिक नहीं थे या नहीं रहे? क्या रघुवीर सहाय मुक्तिबोध की अगली कड़ी नहीं हैं?
आज हमारे समय का सौंदर्यदृष्टि विहीन, आपाधापी से भरा, रौंदते चले जाने को उद्धत (या विवश) और तथाकथित सैटल होते जाने को आतुर, उखड़ा हुआ, जो भद्दा रूप है, मूल्य-हीनता के लिए विकलता-विहीनता, अतीत के प्रति उदासीनता, अवसाद के उजाड़ वाला जो व्यक्ति के भीतर का खालीपन है क्या उसे रघुवीर सहाय के बहाने शहर और नागार्जुन के बहाने गांव में बांटने से काम चल जाएगा। क्या चंद्रकांत देवताले, जगूड़ी, विष्णु खरे की कविता समकालीनता को समझने में कोई मदद नहीं करती?
यहां पर यह सवाल इस तरह भी उठता है कि समाज में व्याप्त बहुलता, बहुआयामी यथार्थ और पेचीदगी के बिना बात कैसे हो सकती है? क्या उसे आधुनिकता या आधुनिकतावाद कह कर खारिज किया जा सकता है? आधुनिकता ही क्यों (चाहे वह आधी अधूरी हो और हमारे जीवन में बलात् प्रविष्ट हुई हो), क्या आज उत्तरआधुनिकता की पदचाप भी सुनाई नहीं पड़ती, जो जीवन को और अधिक जटिल बना रही है?
विजय कुमार जिन चिंताओं, दुश्चिंताओं की बात उठाते हैं, उनके बिना कविता की बात पूरी होती नहीं लगती। लेकिन उनकी भी निजी पसंद साथ साथ काम करती रहती है। प्राय: उनकी अपेक्षाओं पर कविता खरी नहीं उतर पाती। ख़ास तौर से मंगलेश, असद, राजेश जोशी, नरेंद्र जैन के बाद के कवि उन्हें ख़ास प्रभावित नहीं कर पाते। इसकी वजह शायद यह है कि वे समय को जिस तरह देखते हैं, कविता उन्हें उस तरह देखती प्रतीत नहीं होती। वे समकाल को अपने हिसाब से खोलते हैं, जिससे हमें बेशक एक तरह की अंतदृर्ष्टि मिलती है।
इस नजरिए से देखने पर एक बात सामने आती है, जो हमें यह देखने के लिए उकसाती है कि हमारी कविता इस वक्त कहां खड़ी है? वह कितनी श्रेष्ठ है और कितनी साधारण? विष्णु खरे कुछ वर्ष पहले तक हिंदी कविता को विश्व कविता के समकक्ष रखते थे। लेकिन इधर भारतभूषण अग्रवाल सम्मान प्राप्त कई कवियों में उन्हें वैसी श्रेष्ठता और श्रेष्ठता की निरंतरता नज़र नहीं आई। मतलब कविता से विजेंद की एक अलग तरह की मांग है, विजय कुमार की अलग तरह की, और विष्णु खरे की और भी अलग तरह की। यानी जो आलोचक को चाहिए वह कविता में नहीं है। तो क्या समकालीन कविता बेकार है? या जो कविता में है उसे आलोचक देख नहीं रहा? जैसा कि अशोक कुमार पांडे की टिप्पणी है कि पहले कविता तो पढ़ लो। इसका मतलब है कि असंतोष की जड़ इस बात में भी है कि क्या कविता सनातन होती है या वह युग सापेक्ष भी होती है? या सनातन और युग सापेक्ष के बीच कहीं संतुलन साधना ज़रूरी होता है?
समकालीन कविता की परख करने के लिए कुछ और बाहरी यानी संरचनागत बातों को भी ध्यान में रखना होगा -
  • आज कविता बहुतायत में लिखी जा रही है। उसमें विविधता कितनी है, एकरूपता कितनी?
  • आज एक साथ कई पीढ़‍ियां सक्रिय हैं। क्या सबकी कविता एक जैसी है?
  • आज हिंदी कविता का भौगोलिक विस्तार भी अभूतपूर्व है, रोहतांग पार के लाहौल से उत्तर पूर्व तक, कोलकाता से गुजरात, महाराष्ट्र तक। किसान कवि तो ढूंढने पर मिलता है पर दलितों और जनजातियों के प्रतिनिधि मिल जाते हैं। कवयित्रियों की संख्या में भी उत्साहवर्धक इजाफा हुआ है। इधर विदेश में भी कविता लिखी जा रही है। इस बहुविध विस्तार वाली कविता का मिजाज क्या है?
  • पाठक समाज में कविता की पैठ कितनी है? कविता में समाज है पर क्या समाज में भी कविता है? या कविता सिर्फ़ कवियों के लिए है, जैसे बहुत सी लघु पत्रिकाएं सिर्फ़ लेखकों के लिए हैं।
और अंत में, क्या हम सिर्फ़ कविता के कथ्य के आधार पर ही बात करेंगे या पूरे सौंदर्यबोध की तरफ भी ध्यान देंगे? जहां कविता को एक सम्पूर्ण कलाकृति की तरह परखा जाएगा - जिसमें कथ्य अपने आप आ जाएगा, हम कविता को सिर्फ़ समाजार्थिक-शास्त्रीय वस्तु समझने की लंगड़ी चाल हीं चलते रहेंगे।
anup sethi
अनूप सेठी
मो.: 09820696684

Thursday, June 14, 2012

समकालीन कविता

 chintan disha cov 6-7 small
 

चिंतनदिशा में समकालीन कविता पर विजय बहादुर सिंह और विजय कुमार की चिट्ठियां आप पढ़ चुके हैं. फिर अगले अंक में उन चिट्ठियों पर विजेंद्र और जीवन सिंह की प्रतिक्रिया भी पढ़ चुके हैं. चिंतनदिशा के ताजा अंक में राधेश्‍याम उपाध्‍याय, महेश पुनेठा, सुलतान अहमद और मेरी प्रतिक्रियाएं छपी हैं. इन्‍हें बारी बारी से यहां रख रहा हूं. इस क्रम में राधेश्‍याम उपाध्‍याय और महेश पुनेठा की प्रतिक्रिया आप पढ़ चुके हैं. आइए अब देखें सुलतान अहमद क्‍या कहते हैं.

 
प्रिय भाई शैलेश सिंह,
पाँच तारीख़ को जब आपका फोन आया, तब मैं रास्ते में था। 'चिंतन दिशा' पर बात करने का बिल्कुल मन नहीं था, फिर भी कुछ बातें हो ही गयीं। उन बातों को आगे न बढ़ाया जाय, तो ये बुज़दिली ही कहलायेगी। शुरूआत ऐसी बात से करूँगा, जिसका फोन पर बिल्कुल ज़िक्र नहीं आया था।
सबसे पहले तो 'चिंतन दिशा' के चौथे अंक में भाई श्री विजयकुमार की विजय का डंका चाहे जितना बजा हो, 'चिंतन दिशा' के चिंतन की चिंदियाँ उड़कर रह गयी हैं। ऐसी कौन-सी क्रांति अटकी जा रही थी कि एक ही अंक में उनकी लिखी हुई आलोचना, उनका ख़त और उन्हीं के द्वारा लिया हुआ इंटरव्यू दे देना निहायत ज़रूरी हो गया? एक अंक में एक ही लेखक की कई चीज़ें देने का मतलब तो यही निकलता है कि चीज़ें मिल नहीं पा रही हैं और किसी तरह पत्रिका का पेट पाला जा रहा है। और ऐसा भी नहीं है कि चीज़ें मिल नहीं पा रही हैं। आप लोग उन्हें अटकाते भी ख़ूब रहते हैं।
विजयकुमार और विजयबहादुर सिंह ने बातें तो बहुत सारी कीं, लेकिन मुद्दे चार ही उभरे -- कवियों के 'नाम' यानी उनकी देवमाला, 'छंद', 'सपाटपन' और अंत में 'विचारधारा'।
विजयकुमार कहते हैं, 'सभाओं और गोष्ठियों में आज एक भक्ति-रस की धारा बहती रहती है। बल्कि यह सही मायने में भक्ति और श्रद्धा भी नहीं उसका एक 'मेलोड्रामा' है। शिखर आलोचक सुबह-शाम प्रवचन की मुद्रा में अपने पिट्ठुओं को आस्मान पर चढ़ाते रहते हैं। भक्तगण श्रद्धा विगलित होने का नाटक करते हुए उनकी धोती पकड़कर भवसागर पार कर जाना चाहते हैं। गुरु जितने चतुर, चेले उनसे ज्यादा चतुर। कहाँ हैं बहसें?'
'शिखर आलोचक' के बिंब में फ़िट करने के लिए मैंने कई आलोचकों, मसलन परमानंद श्रीवास्तव, अशोक वाजपेयी, विष्णु खरे और नंदकिशोर नवल वग़ैरह पर नज़र डाली, मगर हाथ में नामवर सिंह ही आये। मुश्किल तो ये हुई कि उनके पिट्ठुओं में विजयकुमार के द्वारा प्रशंसा के लिए पेश की गयी फ़ेहरिस्त के ही कई कवि नज़र आने लगे। इसके बाद मैं ये सोचने लगा कि आख़िर विजयकुमार ने नामवर सिंह का नाम क्यों नहीं लिया? नाम लेने में ख़तरा है कि 'शिखर आलोचक' कभी भी उनका नाम नहीं लेंगे। नाम न लेने पर ये लुभावनी संभावना तो बनी ही रहती है कि हो सकता है कभी वो उन्हें भी 'आस्मान पर' चढ़ा दें। यहाँ फ़िक्र फ़ेहरिस्त की ही ज्यादा नज़र आयी, किसी मुद्दे या विचारधारा की नहीं। फ़ेहरिस्त की फ़िक्र भी हमारे समय का एक नागवार लक्षण है।
आगे विजयकुमार कहते हैं, 'आपकी इस बात से एक हद तक सहमत हुआ जा सकता है कि वर्तमान में समकालीन कविता की कुछ रूढ़‍ियाँ बन गयी हैं। हमें पता नहीं कि कवियों की एक छोटी-सी बिरादरी के बाहर वास्तविक रसिक कितने हैं!' इस सिलसिले में विजयबहादुर सिंह की बात से 'समकालीन हिंदी कविता' की किन्हीं रूढ़‍ियों का तो पता नहीं चलता, उसमें उनकी इस तरह की अरुचि का ज़रूर पता चलता है, 'समकालीन कविताएं भी अपनी शक्ल-सूरत में मुझे कभी-कभार ही खींच पाती हैं।' उनकी तान टूटती है छंद पर। कहते हैं, 'मैं जब दुष्यंत रचनावली पर काम कर रहा था, उनकी दो-तीन सौ गीतात्मक कविताओं को देख हैरान होता रहा कि इस आदमी ने कविता के इन छंदों में कितनी उठक-बैठक की है।' विजयबहादुर सिंह मुग्ध भाव से दुष्यंत की आरती ही उतारते रहे, मानो ये काम हिंदी में कम हुआ हो। उन्होंने तटस्थ मूल्यांकन के मक़सद से ये देखने की कोशिश नहीं की कि दुष्यंत इस 'उठक-बैठक' में कैसी-कैसी ग़लतियाँ करते रहे। आप देख ही रहे होंगे कि इन ग़लतियों का कितना बुरा असर 'समकालीन हिंदी कविता' के उस हिस्से पर पड़ा, जो दुष्यंतकुमार जैसी लोकप्रियता की लालच में बिना किसी दायित्व-बोध के अंधाधुंध ग़ज़लें कहता और वैसी ही बल्कि उनसे भी बढ़चढ़ कर ग़लतियाँ करता चला जा रहा है। आलोचकों के पास ऐसी नज़र तो होनी ही चाहिए कि वो इन ग़लतियों को देखकर दिखा सकें। चलिए, हम दुष्यंत के सबसे लोकप्रिय संग्रह 'साये में धूप' से इस तरह की ग़लतियों के कुछ नमूने देखते हैं। सबसे पहले छंद के लिए --
मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग,
चुप कैसे रहूँ,
हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम
एक बयान है।
0 0 0
उनको क्या मालूम विरूपित
इस सिकता पर क्या बीती,
वे आये तो यहाँ
शंख-सीपियाँ उठाने आयेंगे।
क़ाफ़िये की ख़ामी के लिए ये देखें कि उन्होंने 'भूख है तो सबा कर, रोटी नहीं तो क्या हुआ, आजकल दिल्ली में है ज़ेर-ए-बहस ये मुद्दआ।' मत्लेवाली ग़ज़ल में ये शे'र भी डाल रक्खा है, 'क्या वजह है प्यास ज्यादा तेज़ लगती है यहाँ, लोग कहते हैं कि पहले इस जगह पर था कुऑं।'
इसी तरह की दूसरी ख़ामी पर नज़र डालने के लिए देखें कि 'आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख, घर अंधेरा देख तू, आकाश के तारे न देख।' मत्लेवाली ग़ज़ल में ये शे'र डाल रक्खा है, 'एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ, आज अपने बाज़ुओं को देख, पतवारें न देख।'
रदीफ़ की ख़ामी के लिए उनका ये मत्ला देखें, 'पक गयी हैं आदतें, बातों से सर होंगी नहीं, कोई हंगामा करो, ऐसे गुज़र होगी नहीं।
दुष्यंत के यहाँ छंद की दुर्दशा की चिंता शायद विजयबहादुर सिंह ने इसलिए नहीं की कि कहाँ कोई 'समकालीन हिंदी कवि' इसे समझता है! लगता है आजकल की छंदों में लिखी जा रही चीज़ें इन तक पहुँचती नहीं या आम लोगों की तरह वो भी यही समझते हैं कि 'समकालीन हिंदी कवि' तो उसी मूर्ख को कहा जाता है, जिसे छंद आता ही नहीं। मज़े की बात ये है कि आजकल के 'कविता के जनपद' में इस तरह की मूर्खता पर गर्व करने का रिवाज बडे़ पैमाने पर मक़बूल हो चला है। 'समकालीन हिंदी कविता' के पहले के आधुनिक कवियों नागार्जुन, भवानीप्रसाद मिश्र, रघुवीर सहाय, मुक्तिबोध, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल और शमशेर बहादुर सिंह को छोड़ दिया जाय तो विजयकुमार की फ़ेहरिस्त में एक भी ऐसा नाम नहीं आता, जिसने कभी ये ग़लतफ़हमी पैदा होने दी हो कि देखो ये भी छंद को गंभीरता से लेता है। अपनी इस फ़ेहरिस्त को छंदों से पाक रखने के लिए ही शायद वो दुष्यंत का नाम लेने से ही कतरा जाते हैं। वो नामों की तमाम दाख़िल-ख़ारिज और मर्तबे की उलट-फेर के बावजूद 'समकालीन हिंदी कविता' की प्रचलित या कह लें रूढ़ फ़ेहरिस्त का ही अनुसरण करते हैं। वो इस 'देवमाला' में उन्हीं को शामिल करते हैं, जो अक्सर 'छंदहीन' कविताएं ही लिखते हैं। इनमें से एकाध ऐसे भी हैं जो कभी-कभी छंद पर हाथ मार तो ज़रूर देते हैं, मगर इसपर लजा भी जाते होंगे। विजयकुमार चाहे जितनी 'कविता की संगत' करते हों, क्या दुष्यंत की ग़ज़लों की संगत उनसे हो पायेगी? छंद में लिखनेवाले बाद के कवियों को तो जाने ही दें। क्या वो रूप की अपनी रूढ़ रुचि को रवादार बना पायेंगे?
रही बात 'सभ्यता-समीक्षा' की तो जो बातें छंदहीन कविताएं कहती हैं, उसी तरह की बाते ग़ज़लें भी कहती हैं, दोहे और गीत भी कह जाते हैं। ग़ज़लों, गीतों और दोहो में कमज़ोरियाँ ज्यादा हो सकती हैं, लेकिन छुआछूत की भावना छंदहीन कविताओं के कवियों में कहीं ज्यादा पायी जाती है। अरुण कमल, राजेश जोशी, देवीप्रसाद मिश्र वग़ैरह की चर्चा करने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन हरजीत सिंह, नूर मुहम्मद 'नूर' और ज्ञानप्रकाश विवेक वग़ैरह की ग़ज़लों और अब्दुल बिस्मिल्लाह के दोहों की चर्चा करने से 'आधुनिक प्रगतिशीलता' की इज्ज़त लुट जायेगी, ऐसा सोचने में एक जड़ पूर्वग्रह के सिवा शायद ही कोई और तत्व हो। इनकी चर्चा कीजिए। ज़रूरत पडे़ तो कसकर खिंचायी भी कर दीजिए। आप सोच रहे होंगे कि जब छंदवाले रूपों का समर्थन ही करना था, तो विजयबहादुर सिंह ने जब दुष्यंतकुमार की तारीफ़ की तो मैंने उनकी हाँ में हाँ क्यों नहीं मिलायी? इसलिए कि वो 'समकालीन हिंदी कविता' के किसी भी रूप का ठीक से मूल्यांकन किये बिना उसपर दुष्यंतकुमार के छंदों की मक़बूलियत की नाजायज़ धौंस जमा रहे थे।
देवमाला की बात अधूरी ही रह गयी। उससे जुड़ी एक मज़ेदार बात भी सुन लें। छायावाद के बाद की आधुनिक हिंदी कविता की देवमाला का ब्राहृा अज्ञेय को कहा जा सकता है। इनके तीन सप्तकों में शामिल अधिकांश कवि ही चर्चा के केंद्र में रहे। मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय, केदारनाथ सिंह और विजयदेव नारायण साही वग़ैरह की चर्चा करके नामवर सिंह ने सिर्फ़ अज्ञेय की देवमाला का अनुगमन भर किया था।
अज्ञेय की देवमाला के बाहर के कवि नागार्जुन, त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल चर्चा में तब आये जब 'समकालीन हिंदी कविता' के कवियों को अपनी कमज़ोरियों को ढँकने और परंपरा द्वारा पुष्ट दिखाने के लिए यानी एक तरह की क्षतिपूर्ति के लिए कुछ नामों की ज़रूरत पड़ी। मुक्तिबोध, शमशेर और रघुवीर सहाय तो उन्हें अज्ञेय की देवमाला में से ही मिल गये। इन 'समकालीन कवियों' की बहुत बड़ी कमज़ोरी है कि अक्सर ये छंद में नहीं लिख पाते। ये कोई बहुत बड़ा दोष नहीं है। दोष है इसके प्रति उनकी भयानक उपेक्षा में। लगता है कि ये सब इसी में ख़ुश हैं कि वो न सही उनके पुरोधा नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध, शमशेर और रघुवीर सहाय तो छंद में लिख गये हैं। इनके पुरखों ने घी खाया था तो ये अपना हाथ सुँघाते रहते हैं। ये ख़ुद घी खा लेंगे तो क्या होगा? ये सोचिए तो बड़ा मज़ा आयेगा। अगर विजयकुमार इन्हें छोड़कर छंदों में लिखी जा रही चीज़ों की चर्चा करने लग जायेंगे तो वो फ़ौरन इनकी 'संगत' छोड़कर भाग खडे़ होंगे। अपने साथ चर्चा के चमकदार केंद्रों की सुविधाएं भी गठिया ले जायेंगे।
इसी से जुड़ी एक और मज़ेदार बात बताने से रह गयी कि 'तीसरा सप्तक' तक तो अज्ञेय द्वारा बनायी गयी देवमाला ख़ूब चली, लेकिन उन्होंने जब 'चौथा सप्तक' के रूप में 'समकालीन हिंदी कविता' की देवमाला बनायी तो वो बुरी तरह से 'फ्लॉप' साबित हुए। उसका एक भी कवि ठीक से चर्चा के केंद्र में नहीं आ पाया। अब तक लगातार ये संकट बना हुआ है कि 'समकालीन हिंदी कविता' की देवमाला न ठीक से आकार ले पा रही है, न उसे आम स्वीकृति मिल पा रही है। उसकी तरह-तरह की फ़ेहरिस्तें ज़रूर बनती-बिगड़ती रहती हैं।
छंद की ही तरह कविता के शिल्प से संबंधित एक और तत्व है तहदारी। इसका उलटा है सपाटपन। इस का ज़िक्र विजय बहादुर सिंह ने तो नहीं, विजयकुमार ने ज़रूर किया है, मगर इसका इस्तेमाल उन्होंने किसी को हलाल करने और किसी की आरती उतारने भर के लिए किया है, मूल्यांकन के लिए नहीं।
जब विजयबहादुर सिंह बताते हैं, 'रघुवीर सहाय को पढ़ते हुए तबीयत बैठ-सी जाती है। बेहद अकेलेपन और लाचारी से पाठक भर जाता है।' तब उनका मतलब था कि उनकी ही तबीयत बैठ जाती है, वे ही अकेलेपन और लाचारी से भर जाते हैं। ठीक ऐसा ही मामला विजयकुमार के साथ भी पेश आता है। जब वो बताते हैं, 'ये अपने-अपने इंप्रेशन हैं। इंप्रेशन भर। वे अंतिम सत्य नहीं कहलाते।' फिर अंतिम सत्य बतलाते हुए वो कहते हैं, 'आपको भवानीप्रसाद मिश्र पसंद हैं, किसी अन्य को उनमें कुछेक कविताओं को छोड़कर बेहद सपाटपन भी नज़र आ सकता है।' तो उनका मतलब था कि उन्हें ही भवानीप्रसाद मिश्र में बेहद सपाटपन नज़र आता है। दोनों के द्वारा 'पाठक' और 'किसी' को घसीटने से सिर्फ़ बात की धार ही कुछ कम हुई है। और कुछ तो हासिल नहीं हुआ। इस सपाटपन का मसला कविता के रूप से जुड़ा हुआ है। दोनों ही आलोचक इससे भागते हुए नज़र आते हैं। विजयबहादुर सिंह ये नहीं बताते कि रघुवीर सहाय की कविताएं अपने रूप की वजह से उनकी तबीयत बैठा देती हैं कि अपनी विचारधारा की वजह से। ग़ौर से देखा जाय तो रघुवीर सहाय के यहाँ इन दोनों मामलों में तरह-तरह के झोल दिखायी पड़ सकते हैं। मिसाल के लिए 'रामदास' कविता में रामदास के द्वारा अपनी हत्या की नियति को बिना चीख़े-चिल्लाये परमहंस की तरह ठंडी उदासी से स्वीकार कर लेने में आज के सामाजिक यथार्थ को नज़रअंदाज़ करने और उसपर नक़ली क़िस्म के आभिजात्य को थोपने की विचारधारात्मक भूल है। रहा रूप, तो उनकी कविताओं के अख़बारी अंदाज़ के उबाऊपन पर तो बहुत सारी बातें हो सकती हैं।
इन कमज़ोरियों के बावजूद रघुवीर सहाय 'समकालीन हिंदी कविता' के लिए मैथिलीशरण गुप्त से ज्यादा महत्वपूर्ण बने रहेंगे। लगता है 'मैथिलीशरण आदि की विरासत' की चिंता में डूबे विजयबहादुर सिंह 'राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है, कोई कवि बन जाय सहज संभाव्य है।' सुनकर गद्गद् ही हो जाते होंगे। ऐसी भाववादी कविताओं के आदी आलोचक का रघुवीर सहाय से नाउम्मीद हो जाना स्वाभाविक ही है; क्योंकि वो तो इस तरह की कविताएं भी लिखते हैं, 'पढ़‍िए गीता बनिए सीता फिर इन सबमें लगा पलीता किसी मूर्ख की हो परिणीता निज घर-बार बसाइए।' (प्रतिनिधि कविताएं - रघुवीर सहाय, पृ. 28)
विजयकुमार कहते हैं, 'नागार्जुन की कविता को यदि आप कहते हैं कि वह 'विशाल और व्यापक राष्ट्रीय जीवन के गर्भ से उपजी हुई है।' तो लगभग यही राय कोई दूसरा आदमी मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय, चंद्रकांत देवताले, अरुण कमल और नरेंद्र जैन की कविताओं के बारे में व्यक्त कर सकता है।' इस तरह की आरती उतारने में विजयकुमार को ये याद नहीं रह जाता कि चाहे लोग बोलने से कितना भी कतराते हों, लेकिन नागार्जुन के यहाँ सपाट कविताओं की बहुत बड़ी तादाद मौजूद है। लेकिन इससे उनका महत्व कम नहीं हो जाता। सपाटपन तो सभी तरह के कवियों में पाया जा सकता है, यहाँ तक कि मुक्तिबोध में भी। मिसाल के लिए उनकी 'ओ चीन के किसानो!' की ये पंक्तियाँ 'सपाटपन' की मिसाल नहीं तो और क्या हैं-
'ओ चीन के किसानो! खेतों में काम के संग गीतों में तान के संग उड़ते हो तुम गगन में द्युतिमान देवता-से' (मुक्तिबोध रचनावली - 1, पृ. 386)
नरेंद्र जैन ने तो जैसे 'सपाटपन' की मिसाल पेश करने के लिए ही ये पंक्तियाँ लिखी थीं --
'धर्मनिरपेक्षता हमारे यहाँ राजनैतिक, सांप्रदायिक कुचक्र का मोहक नाम है' (पहल - 37, कविता विशेषांक, पृ. 185)
इन सबकी आरती उतारने में इस तरह की ख़ामियों को नज़रअंदाज़ कर देना किसी भी तरह मुनासिब नहीं कहा जायेगा। ख़ामियाँ अगर दिखती हैं तो उन्हें दिखाने में हरज क्या है? इससे आरती उतारने का मज़ा कुछ किरकिरा ज़रूर हो जाता है, मगर कविताओं के सृजन और मूल्यांकन को ताक़त ज़रूर मिलती है।
ऐसा नहीं कि इन दोनों आलोचकों ने सिर्फ़ कविता के रूप से ही संबंधित बातें ही की हैं; एक ने छंद पर ज़ोर दिया तो दूसरे ने 'सपाटपन' पर। विचारधारा से संबंधित बातें भी उन्होंने की हैं। 'तार सप्तक' की आलोचना करते हुए विजयबहादुर सिंह ने कहा है, 'अगर आप 'तार सप्तक' की उन कविताओं को देखें तो उनमें से कोई एक भी कविता लोक-हृदय पर अपनी छाप छोड़ नहीं पायी है। यहाँ तक कि मुक्तिबोध और अज्ञेय की भी।'
इस कथन का तेवर तो ऐसा लगा कि जैसे अब ये उन दोनों की तमाम कमज़ोरियाँ उजागर करके धर देंगे। मगर हुआ उलटा। वो तो इन दोनों की कविताएं उद्धृतत कर लगे उनकी व्याख्या करने। यानी 'तार सप्तक' ने लोक-हृदय पर कोई छाप न छोड़ी हो, लेकिन ऐसे कवि ज़रूर दिये, जिनकी कविताओं की व्याख्या में विजयबहादुर सिंह भी मगन हो गये। विजयकुमार की 'संगत' में रहनेवाले कवियों को हलाल करने के लिए वो मुक्तिबोध को इस तरह याद करते हैं, 'आप मुक्तिबोध की उन पंक्तियों की याद करें जिनमें वे अत्यंत क्षुब्ध, आत्म और कातर हो ग्लानि से भरे हुए स्वयं से पूछते हैं -- 'ओ मेरे सिद्धांतवादी मन! ओ मेरे आदर्शवादी मन! अब तक क्या किया जीवन क्या जिया?' यह केवल कवि का आत्मप्रन क्यों माना जाय? हमारा अपना भी क्यों नहीं? पर यह कौन कह सकता है? कौन स्वयं को कटघरे में खड़ा करने के आत्मबल से संयुक्त है? आप तो कवियों की 'संगत' में रहने का दावा ही करते रहे हैं, कृपया ज़रूर सूचित करिएगा कि कितने इस 'आत्म' का साक्षात्कार कर सके हैं? मेरी अपनी समझ से तो वे सब एक प्रायोजित और प्रदत्त संसार में रहते रहे हैं बग़ैर किसी ईमानदार पूर्ण लगाव या संलिप्ति के। उनके ज्ञानात्मक संवेदनों में इस 'आत्म' की उपस्थिति कहाँ है? अगर होती तो निश्चय ही वे संवादरत कहीं-न-कहीं ज़रूर दिखते।' विजयबहादुर सिंह के हिसाब से जिन मुक्तिबोध की 'एक भी कविता लोक-हृदय पर अपनी छाप नहीं छोड़ पायी है।' उनकी जगह उनके मुताबिक लोक-हृदय पर छाप छोड़नेवाले कवियों मैथिलीशरण गुप्त, भवानीप्रसाद मिश्र, माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्राकुमारी चौहान, बालकृष्ण शर्मा 'नवीन', जैसे कवियों की कविताओं में से ऐसा सवाल उठाने की कोशिश वो करते तो ये भी पता चलता कि हरदम लोक-हृदय के पीछे पडे़ रहने के क्या ख़तरे हो सकते हैं! ऐसे में लोक-हृदय से जुड़के जी तो जुड़ा जाता है, लेकिन सच्चाई कहीं पीछे छूट जाती है यानी गैलीलियो जैसे आदमी को नज़रबंदी में अंधा होकर रह जाना पड़ता है।
मुक्तिबोध की दुन्यावी मसलों से घिरी हुई कविता ' अंधेरे में' की पंक्तियाँ उद्धृत करने के बाद वो 'तार सप्तक' के ही दूसरे कवि अज्ञेय की भाववादी कविता 'असाध्य वीणा' की प्रशंसा में तो एकदम मगन होकर कह उठते हैं, 'यह कोई रहस्यवाद नहीं है, आप चाहें तो इसे छायावादी विदात्मवाद ज़रूर कह सकते है, जहाँ चर-अचर, मनुष्य और मनुष्येतर का भेद बेमानी हो उठता है।' ऐसे में वर्गों के भेद का तो और भी अर्थ नहीं रह जायेगा। लेकिन 'भाववादियों' को भी भौतिक समस्याएं सताती हैं यानी 'आग सबको जलाती है' (मोचीराम, संसद से सड़क तक - धूमिल, पृ. 40) तब उन्हें लिखना पड़ता है, 'बह चुकीं बहकी हवाएं चेत की कट गयीं पूलें हमारे खेत की कोठरी में लौ बढ़ाकर दीप की गिन रहा होगा महाजन सेंत की।' (सदानीरा - 1, अज्ञेय, पृ. 264) यहाँ किसान और महाजन का भेद भुलाया नहीं जा पाता।
'तार सप्तक' के सिलसिले में विजय बहादुर सिंह कहते हैं, 'पर यह कविता भी अपनी सोच और भाव-भंगिमा में न तो मैथिलीशरण आदि की विरासत का विकास लगती है, न छायावादियों की।' छायावाद, प्रगतिवाद और प्रयोगवाद के हंगामी झगड़ों को भुलाकर अब तो उनकी एकता को क़बूल कर लेना चाहिए। सुमित्रानंदन पंत तक ने इसे क़ुबूल कर लिया था, 'छायावाद वस्तुत: नवीन युग के काव्य का एक व्यापक संचरण था, जिसे प्रगतिवादी तथा नयी कवितावादी भी अभिव्यक्ति देते रहे हैं।' (छायावाद : पुनर्मूल्यांकन - सुमित्रानंदन पंत, पृ. 102) मुक्तिबोध छायावाद की 'प्रगतिवादी शाखा' से किस बुरी तरह प्रभावित थे, इसे साबित करने के लिए ही जैसे 'तार सप्तक' की उनकी कविता 'पूँजीवादी समाज के प्रति' लिखी गयी थी। अज्ञेय पर तो छायावाद से प्रभावित होने का इल्ज़ाम लगाया ही जाता रहा है। 'तार सप्तक' की योजना की बारीकियों में न जायें तो भी प्रगतिवाद और प्रयोगवाद की एकता उतनी इससे नहीं साबित होती कि उसमें मुक्तिबोध शामिल थे, जितनी इससे कि 'तार सप्तक' के लिए अज्ञेय ने रामविलास शर्मा को आमंत्रित किया था। विचारधारा से ही संबंधित एक और बात पर भी ग़ौर करना ज़रूरी है। अपनी उदारता दिखाने में जिसपर विजयकुमार का ध्यान नहीं गया। वो ख़ुद एक तरफ़ कुछ कवियों को पढ़ने से परहेज़ करते हैं तो दूसरी तरफ़ रवादारी की नसीहत देते हुए कहते है, 'कवियों के अपने-अपने व्यक्तित्व और अनुभव संसार होते हैं। एक का आधार लेकर दूसरे को पछाड़ना मैं समझता हूँ कि एकांगी दृष्टिकोण है। कोई भी एक रचनाकार किसी भी दौर में यह नहीं कह सकता कि सत्य की संपूर्ण अभिव्यक्ति सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरे पास है। यदि ऐसा होता तो हम तुलसी के साथ सूर को न पढ़ रहे होते। सिर्फ़ कबीर से काम चल जाता, मीरा को पढ़ने की आवश्यकता न रहती।'
समस्या मध्यकाल के इन कवियों को पढ़ने या न पढ़ने की नहीं है। किसी-न-किसी तरह इन्हें तो सभी कवि कुछ-न-कुछ पढ़ ही लेते हैं। समस्या तो है 'समकालीन हिंदी कविता' में से कुछ को 'पढ़ने' कुछ को 'न पढ़ने' और कुछ से 'परहेज़ करने' की। सच तो ये है कि 'शिखर आलोचक' ही नहीं विजयकुमार भी अच्छा-ख़ासा परहेज़ बरतते हैं। इस समस्या से सीधे-सीधे सामना न करने की नीयत से ही शायद उन्होंने तुलसी, सूर, कबीर और मीरा को अपनी बातों में शामिल कर लिया है। बात निकल ही आयी है तो ये कहना भी ज़रूरी है कि इन कवियों पर मुग्ध होने भर से काम नहीं चलेगा। पढ़ना तो इन्हें सावधानी से ही पडे़गा। कौन नहीं जानता कि ये सारे-के-सारे कवि भाववादी पटरी के हैं। उनकी कविताओं में आ गये मानवीय जीवन के प्रसंगों से आज के कवि चाहे जितना लाभ उठा लें, उनकी भक्ति-भावना से आज की भयावह सभ्यता की समीक्षा में कोई सहायता नहीं ली जा सकती, उसे बदलना तो दूर की बात है। वही 'आज की सभ्यता' जिसका विजयकुमार ने इतना अख़बारी और जोशीला वर्णन किया कि ख़ुद सकुचाकर बोल उठे, 'मैं यह मानकर चल रहा हूँ, जब मैं यह सब लिख रहा हूँ तो आप कम-से-कम इसे 'साहित्येतर' विषय या 'सुपरफ़ीशयल' विवेचना के खाते में नहीं डाल देंगे।'
यहाँ कहना ये है कि उदारतावाद भर के चलते उन कवियों को याद करने से काम नहीं चलेगा। उन्हें उस तीखे 'इतिहास-बोध' के नज़रिये से देखने की ज़रूरत पडे़गी, जिससे देखते हुए मुक्तिबोध इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे, 'एक बार भक्ति-आन्दोलन में ब्राह्मणों का प्रभाव जम जाने पर वर्णाश्रम धर्म की पुनर्विजय की घोषणा में कोई देर नहीं थी। ये घोषणा तुलसीदासजी ने की थी। निर्गुण मत में निम्नजातीय धार्मिक जनवाद का पूरा ज़ोर था, उसका क्रान्तिकारी सन्देश था। कृष्णभक्ति में वह बिल्कुल कम हो गया, किन्तु फिर भी निम्नजातीय प्रभाव अभी भी पर्याप्त था। तुलसीदास ने भी निम्नजातीय भक्ति स्वीकार की, किन्तु उसको अपना सामाजिक दायरा बतला दिया। निर्गुण मतवाद के जनोन्मुख रूप और उसकी क्रान्तिकारी जातिवाद-विरोधी भूमिका के विरुद्ध तुलसीदास जी ने पुराण-मतवादी स्वरूप प्रस्तुत किया। (मुक्तिबोध रचनावली : 5 पेज 291)
कुल मिलाकर विजयकुमार और विजयबहादुर सिंह दोनों की पहली चिंता अपने प्रिय कवियों की देवमाला स्वीकृत कराने की ही प्रतीत हुई, उनका मूल्यांकन करने-कराने की नहीं। दूसरी चिंता में ज़रूर दोनों में फ़र्क़ है। जहाँ विजयबहादुर सिंह इसपर ख़ुश होते हुए दिखायी देते हैं, वहीं विजयकुमार इसपर दुखी होते हुए नज़र आते हैं कि तमाम चर्चाओं के बावजूद ये देव अलोकप्रिय ही बने रह जाते हैं। इनकी अलोकप्रियता के भीतरी और गहरे कारणों में उतरने की ज़हमत दोनों ही नहीं उठाते।
समझ में नहीं आता कि 'समकालीन हिंदी कविता' का 'छंदहीन हिस्सा' चर्चा का आख़िर कितना भुक्खड़ है कि 'शिखर आलोचक' से लेकर विजयकुमार तक सभी की चर्चाएं खाकर भी उसका पेट एकदम पिचका ही रहता है कि उसे देखकर दया आती है और विजयकुमार को कहना पड़ता है, 'समकालीन कविता से मेरे असंतोष कम नहीं हैं और यदा-कदा मैंने लिखित रूप में व्यक्त भी किया है। पर समूची समकालीन कविता को एक सिरे से नकार देने की यह स्थिति मुझे अंग्रेज़ी के उस मुहावरे की याद दिलाती है कि 'कुछ लोग बच्चे को नहलाने के बाद टब के पानी के साथ बच्चे को भी फेंक आते हैं।' ख़ैर - -! मैं इतना ही कहूँगा कि मेरे लिए आज भी तमाम साथी रचनाकारों को एक गहरी सहानुभूति और तटस्थता के साथ पढ़ना, उनके अच्छ-बुरे पहलुओं को समझना, उसके अंतर्विरोधों को पकड़ना एक प्रकार से अपने समय को समझना है।'
अफ़सोस कि विजयकुमार इतने पूर्वग्रह से भरे हुए हैं कि उनके 'साथी रचनाकारों' की तादाद बहुत कम है। भले उन्होंने कहा हो, 'नाम गिनाना मेरा उद्देश्‍य नहीं है।' लेकिन काम उन्होंने यही किया है। पूर्वग्रह तो उनके इतने सख्त हैं कि उनकी फ़ेहरिस्त में 'समकालीन हिंदी कविता' के वो ही कवि समा पाते हैं, जो अक्सर 'छंदहीन' कविताएं ही लिखते हैं और उन्हें ही 'मुक्तछंद' में लिखा समझते हैं। उन कवियों में से भी वो उन्हें छोड़ देते हैं, जो उनकी 'संगत' में नहीं रह पाते। उन कवियों से तो वो सख्त परहेज़ बरतते हैं, जो छंद में लिखते हैं। हिंसा के जिन मसलों के लिए उन्होंने अरुण कमल या बद्रीनारायण की कविताओं को याद किया, उनसे कम मार्मिक चित्र ग़ज़लों, गीतो या दोहों में नहीं पाये जाते। इसे जानने के लिए तो उन्हें पढ़ना पडे़गा। उनके मूल्यांकन की बात आयी तो उनकी ख़ामियों-ख़ूबियों को दिखाने के लिए छंद का अनुशासन भी सीखना पडे़गा और वो 'सिलहली गैल' ऐसी है कि उसमें पाँव रपट जाने का डर लगातार बना रहेगा। ये तो बडे़ झंझट का काम है। इससे तो यही अच्छा है कि हम हों, 'छंदहीन कविताएं' हों, समाजशास्त्र की अख़बारी सूचनाएं हों और दोस्तों की ऐसी चमकदार पत्रिकाएं हों, जिनमें हमारी लिखी चर्चाएं छप जाया करें।
मेरी इन बातों पर कहीं 'आपसी सहमति का 'गुडी-गुडी' संसार' असर तो नहीं डाल गया या मैं कहीं 'समूची समकालीन कविता को एक सिरे से नकार' तो नहीं गया?











मो.: 09979451243

Monday, June 11, 2012

समकालीन कविता

chintan disha cov 6-7 small
 

चिंतनदिशा में समकालीन कविता पर विजय बहादुर सिंह और विजय कुमार की चिट्ठियां आप पढ़ चुके हैं. फिर अगले अंक में उन चिट्ठियों पर विजेंद्र और जीवन सिंह की प्रतिक्रिया भी पढ़ चुके हैं. चिंतनदिशा के ताजा अंक में राधेश्‍याम उपाध्‍याय, महेश पुनेठा, सुलतान अहमद और मेरी प्रतिक्रियाएं छपी हैं. इन्‍हें बारी बारी से यहां रखने का इरादा है. इस क्रम में राधेश्‍याम उपाध्‍याय की प्रतिक्रिया आप पढ़ चुके. आइए अब पढ़ें महेश पुनेठा के विचार.

 
अभी तक 'चितंन दिशा' देखने का सुअवसर तो नहीं मिला लेकिन 'समकालीन कविता' को लेकर इसके अलग-अलग अंकों में छपे बहुचर्चित पत्रों को अनूप सेठी जी के ब्लाग में पढ़ा। चारों पत्र बहुत महत्वपूर्ण एवं विचारोत्तेजक हैं। अपनी-अपनी बातों को दमदार तरीके से रखते हैं। समकालीन कविता पर एक गंभीर बहस को आगे बढ़ाते हैं। विजय बहादुर सिंह जी के पत्र में जहाँ परम्परा के प्रति अधिक आग्रह दिखाई देता है तो विजय कुमार जी के पत्र में आधुनिकता के प्रति। विजेन्द्र जी और जीवन सिंह जी ने इन दोनों अतिवादों से बचते हुए परंपरा और आधुनिकता को द्वंद्वात्मक रूप से देखने की बात कही है। पहले दो पत्रों में कविता पर अधिक बात हुई है तो बाद के दो पत्रों में कविता के साथ-साथ कवि कर्म और कवि-दायित्व को भी बहस के केंद्र में लाया गया है, मुझे लगता है जो किसी भी काल की रचनाधर्मिता के सही मूल्यांकन के लिए ज़रूरी भी है। हिंदी में बहुत कम कवि-आलोचक हैं जो कवि-दायित्व पर इतना जोर देते हैं। इस तरह बाद के दो पत्रों में अधिक संतुलित, व्यावहारिक और व्यापक दृष्टिकोण अपनाया गया है। कविवर विजेंद्र जी ने बहुत सारे प्रश्न खडे़ कर बहस को नया आयाम प्रदान किया है। आशा है जिन पर आगे सुधी आलोचकगण अपना पक्ष प्रस्तुत करेंगे। ताकि समकालीन कविता की एक मुक्कमल तस्वीर सामने आ पाए।
विजेंद्र जी ने अपने पत्र में आलोचक द्वय की मान्यताओं पर अपनी सहमति-असहमति दर्ज करते हुए तीन बिंदुओं पर अपनी बात को विशेष रूप से केंद्रित किया है - कवि की पक्षधरता, परम्परा का ज्ञान और लोक से उसका जुड़ाव। ये तीनों बिंदु एक दूसरे से जुडे़ हुए हैं। कविता में पक्षधरता का सवाल बहुत ज़रूरी सवाल है। कला पर थोड़ा समझौता हो सकता है पर पक्षधरता पर नहीं। यह पहली शर्त है। ऐसी कविता का कोई मूल्य नहीं जो अतीतगामी, प्रतिगामी और यथास्थितिकामी हो। पक्षधरता का ही सवाल है जो कविता प्रयोजन से जुड़ा है। कविता वाग्विलास या मनोरंजन का साधन नहीं है बल्कि परिवर्तन का औजार है। अकल्याणकारी को नष्ट करना कविता का प्रयोजन है। आपकी कविता इस प्रयोजन को पूरा करती है या नहीं, यह आपके पक्ष को बताता है। बिना इस पक्षधरता के कवि कर्म की कोई महत्ता नहीं। यही कवि की प्रतिबद्धता है। विजेंद्र जी बिल्कुल सही कहते हैं कि प्रतिबद्धता एक रचनात्मक अनुशासन है। इनमें विकार या विकृतियाँ तभी आती हैं जब रचनाकार अपने आचरण से गिरता है। वास्तव में कविता का काम मात्र यथास्थिति का चित्रण या उद्घाटन करना नहीं बल्कि विकल्प प्रस्तुत करना भी है। विकल्प ही बताता है कि कवि किसके पक्ष में खड़ा है। इससे कवि और कविता का कद तय होता है। 'भक्त कवियों' की कविता 'रीत कवियों' की कविता से बड़ी अपने पक्ष को लेकर ही सिद्ध होती है। लोर्का, पाब्लो नेरूदा, वाल्ट हिटमन, ब्रेख्त, नाजिम हिकमत, सारोवीवा, कार्देनाल से लेकर निराला, नागार्जुन, त्रिलोचन, केदार, मुक्तिबोध, गोरख पांडे, पाश, फैज, गिर्दा, अदम गोंडवी तक की कविता अपनी पक्षधरता से ही महत्वपूर्ण है। इनका पक्ष शोषित-पीडि़त किंतु संघर्षशील जनता का पक्ष है। ये सभी कवि जीवन और कविता दोनों मोर्चों पर बराबर सक्रिय रहे। इन कवियों ने संघर्षशील लोक से एकात्म होकर उसके मुक्ति संग्राम को आगे बढ़ाया। सर्वहारा के उत्पीड़कों तथा दमनकारियों का विरोध किया। इनकी कविता 'आत्माभिव्यक्ति' के संकीर्ण दायरों को तोड़कर जनता से एकात्म होती है। इसीलिए बुर्जुआ मन इनकी संघर्षधर्मी कविता से डरता है। उसे इनकी कविता में अपने विनाश के बीज अंकुरित होते दिखाई देते हैं। इसके लिए जीवन में अच्छा मनुष्य होना ज़रूरी है। विजेंद्र जी की इस बात से मेरी पूरी सहमति है कि जीवन में गिरा हुआ मनुष्य एक बड़ा कवि या समीक्षक नहीं हो सकता है। एक बेहतर इंसान होना रचना कर्म की पूर्वशर्त है। हमारा पक्ष इसको निर्धारित करता है। यदि हम मनुष्यता के पक्ष में है तो यह हमारे बेहतर इसांन होने का प्रमाण है।
हमारी पक्षधरता को परम्परा का ज्ञान बल प्रदान करता है। परंपरा की जितनी अच्छी द्वंद्वात्मक समझ कवि को होगी वह उतनी अधिक मजबूती के साथ अपने पक्ष को लेकर खड़ा रह सकता है क्योंकि अपनी परंपरा और इतिहास का गहरा ज्ञान वर्तमान का सही विश्लेषण करने का विवेक प्रदान करता है। जैसा कि टेरी ईगल्टन ने भी कहा है, ''जो कला अपने दौर की महत्वपूर्ण गतिविधियों से अपने को काट लेती है और जिसने स्वयं को इतिहास से अलग कर लिया है वह अपना महत्व खो देती है।'' इतिहास और परम्परा ज्ञान से ही उन शक्तियों की सही-सही पहचान हो सकती है जो इतिहास और समाज को गति प्रदान करने वाले हैं। बदलाव के कारक हैं। मुक्ति-संग्राम को अग्रसर करने वाले हैं। साथ ही परंपरा का ज्ञान उसको नवीकृत कर विकसित करने में सहायक होता है। विजेन्द्र जी का यह कहना तर्कसंगत है कि परंपरा और इतिहास से हम यही तो सीखते हैं कि कठिन दौर में रहकर भी मनुष्य ने अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष किया है। वही इस दुनिया को रूपांतरित कर स्वयं भी बदला। वह आज भी जिंदा है। यह अहसास आगे लड़ने का साहस भी प्रदान करता है। जीवन सिंह जी का यह कहना मुझे उचित लगा कि परंपरा और नवीनता में हर युग में तनावपूर्ण सामंजस्य का रिश्ता होना चाहिए। जिस तरह परंपरा और रूढि़ के बीच अंतर करने की आवश्यकता है उसी तरह आधुनिकता और औपनिवेशिक आधुनिकता के बीच भी। न हर पुराना त्याज्य है और न हर नया ग्राह्य।
परंपरा के ज्ञान के लिए जहाँ एक ओर हमें विश्व क्लैसिक्स का अध्ययन करना ज़रूरी है वहीं दूसरी ओर लोक और उसके जीवन से जुड़ाव उससे भी अधिक ज़रूरी है। तभी उससे एकात्म होना संभव है। यहाँ लोक से मेरा आशय जैसा कि विजेन्द्र जी भी अपने पत्र में स्पष्ट करते हैं-लोक सर्वहारा के रूप में ऐसी वैश्विक शक्ति है जो दमन और शोषण के विरुद्ध खड़ी होती है। जीवन में धँस कर ही जीवन की गति को हम अधिक अच्छी तरह से पकड़ सकते हैं। एक कवि का जीवन से जीवंत संबंध होना बहुत ज़रूरी है। तभी वह जीवन को अधिक गहराई, प्रमाणिकता, मानवीयता और ऐतिहासिक संवेदना के साथ समझ और चित्रित कर सकता है। ऊपर हमने जिन कवियों का नामोल्लेख किया है उनकी कविता की ताजगी और श्रेष्ठता का एक कारण अपने जन-जनपद के समाज और प्रकृति से उनका सीधा, सक्रिय एवं गहरा संबंध रहा। इसीलिए विजेंद्र जी एक कवि के लिए लोक से जुड़ना अनिवार्य बताते हैं। उनकी दृढ़ एवं स्पष्ट मान्यता है कि लोक से जितनी दूर जाएंगे हम उतने ही असहाय, संशकित, डरे हुए, दिशाहीन महसूस करेंगे। आज के लोक से कटे मध्यवर्गीय कवियों में यह बात हमें दिखाई भी देती है। यही वजह है कि 'आज की अधिकांश कविताओं में श्रमिक, छोटे भूमिहीन किसान, बुनकर तथा कठिन श्रम में लगे लोगों के चित्र गायब हैं। उनकी तीखी अंतर्विरोधी स्थितियों के प्रसंग लगभग लुप्त हैं।'
ढुलमुल पक्षधरता, परंपरा-ज्ञान और लोक-संपृक्ति के अभाव के चलते आज की अधिकांश कविता में वाग्मिता और चमत्कार की प्रवृत्ति बढ़ी है और जीवन के चित्र गायब हुए हैं। बुनियादी जीवन-चिंताओं और क्रियाशील जीवनानुभवों की रिक्ति के चलते ही कविता अमूर्तन, काव्य-चमत्कृति, जादुई कौशल का शिकार होती है। जीवन सिंह जी के इस मत से मेरी बहुत अधिक सहमति बनती है। उनका यह मानना सही है कि- ''आधुनिकतावादी वितान के नीचे काम करने वाले कवियों ने कविता को समकानीन कला-समृद्धि प्रदान की है।'' जबकि ज़रूरत है जीवन समृद्धि प्रदान करने की। साहित्य-चिंता की अपेक्षा जीवन-चिंता को अधिक प्राथमिकता देने की। मनुष्यता विरोधी प्रवृत्तियों के खिलाफ खडे़ होने की। इसके लिए 'नागार्जुन और मुक्तिबोध जैसे कवियों की तरह समयबद्ध विचार की जटिल और सहज प्रक्रियाओं के साथ जीवनानुभवों का एक समावेशी कोश मौजूद होना ज़रूरी है।' उन्होंने 'शक्ति संरचना' का जो सवाल उठाया है वह भी विचारणीय है। शक्ति संरचना केवल राजनीतिक-सत्ता स्तरों तक ही सीमित नहीं है बल्कि जीवन के हर स्तर पर उसे देखा और महसूस किया जा सकता है। साहित्य-संगीत-कला-संस्कृति के क्षेत्र भी उससे अछूते नहीं है। यदि गौर से देखा जाय तो यह संसार छोटी-छोटी सत्ताओं का एक संजाल है जो मिलकर एक बड़ी सत्ता का निर्माण करता है। ये छोटी-छोटी सत्ताएं राजनीतिक-सत्ता को मजबूत करने का काम करती हैं। इनके बीच अन्यान्योश्रित संबंध है। इस शक्ति संरचना को एक समकालीन कवि के लिए समझना ज़रूरी है।
वास्तव में यह विडंबना है ''कि जिस कविता जगत के पास नागार्जुन और मुक्तिबोध सरीखे दो बडे़ प्रेरक प्रकाश पुंज मौजूद हैं। वह अपनी भविष्य गति के लिए रघुवीर सहाय सरीखे महत्वपूर्ण किंतु अनिर्णय के कवि को सिर चढ़ाए घूम रहा है।''(जीवन सिंह) यहाँ यह विचार करने की आवश्यकता है कि आख़िर ऐसा क्यों किया जाता है? इसके पीछे किसके और कौनसे हित छुपे रहते हैं? हमें नहीं भूलना चाहिए कि यह एक सुनियोजित राजनीति के चलते होता है। इसको भी कहीं न कहीं शक्ति संरचना के परिप्रेक्ष्य में देखने की ज़रूरत है। इसके पीछे भी कहीं न कहीं जीवन-चिंता और पक्षधरता के सवाल मुख्य हैं।
मुझे लगता है आज की कविता पर कोई भी बात तब तक पूरी नहीं होगी जब तक उक्त बिंदुओं के आलोक में आज की कविता और कवि-कर्म को नहीं देखा जाता है। किसी भी दौर की कविता और कवि का सही-सही मूल्यांकन 'एक पंक्तीय आलोचकीय वक्तव्य' से नहीं किया जा सकता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि खराब कविता के लिए खराब आलोचना भी बराबर की जिम्मेदार है। एक अच्छे आलोचक को अपने आलोचकीय दायित्व का बोध होना चाहिए। आलोचना किसी व्यक्तिगत आग्रह या पूर्वाग्रह के चलते नहीं होनी चाहिए। अभी इतना ही अधिक फिर कभी।
Mahesh Chandra punetha 2










महेश पुनेठा
मो.: 09411707470

Friday, June 8, 2012

समकालीन कविता


चिंतनदिशा में समकालीन कविता पर विजय बहादुर सिंह और विजय कुमार की चिट्ठियां आप पढ़ चुके हैं. फिर अगले अंक में उन चिट्ठियों पर विजेंद्र और जीवन सिंह की प्रतिक्रिया भी पढ़ चुके हैं. चिंतनदिशा के ताजा अंक में राधेश्‍याम उपाध्‍याय, महेश पुनेठा, सुलतान अहमद और मेरी प्रतिक्रियाएं छपी हैं. इन्‍हें बारी बारी से यहां रखने का इरादा है. आइए पहले राधेश्‍याम उपाध्‍याय की प्रतिक्रिया पढ़ें.


चिंतन-दिशा में आपने विजय बहादुर सिंह तथा विजय कुमार के बीच हुए निजी पत्राचार को प्रकाशित कर एक अच्छी पहल की थी। उम्मीद यह थी कि दोनों के बीच हुआ यह पत्र-व्यवहार हिंदी की समकालीन कविता पर एक सार्थक बहस को जन्म देगा और कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर केंद्रित होकर यह बहस आगे बढ़ेगी, पर अक्टूबर-दिसंबर 2011 के अंक में वरिष्ठ कवि विजेंद्र जी के पत्र ने सब गुड़ गोबर कर दिया। अपने पत्र में विजेंद्र जी अनावश्यक रूप से आक्रामक, बौखलाए हुए से तथा उपदेशक की मुद्रा में लगते हैं। इतना ही नहीं, कवियों को लेकर वे जिस तरह की गुटबाजी करने में लगे हुए हैं, वह उनकी संकीर्ण दृष्टि का परिचायक तो है ही, आज की कविता पर हो रही एक महत्वपूर्ण बहस को दिग्भ्रमित करने का प्रयास भी है समकालीन कविता के परिदृश्य में रघुवीर सहाय, केदारनाथ सिंह तथा कुंवर नारायण का अवदान महत्वपूर्ण माना गया है। हिंदी जगत में ये नाम समादृत रहे हैं। बिना मार्क्सवाद का ढोल पीटे भी ये कवि दूसरे किसी कवि से कम लोकतांत्रिक तथा प्रगतिशील नहीं हैं। विजेंद्र जी यदि इनके महत्व को नकारते हैं तो, इनका तो कुछ भी नहीं बिगड़ता, पर विजेंद्रजी की निजी कुंठाएं ही ज़ाहिर होती हैं। विजेंद्र जी के भीतर की फांस तब और ज़ाहिर हो जाती है जब वे अपने साथ के कवियों राजकमल चौधरी, धूमिल, जगूड़ी, विनोद कुमार शुक्ल, अशोक वाजपेयी, ॠतुराज, विष्णु खरे तथा भगवत रावत जैसे महत्वपूर्ण कवियों को तो छोड़ देते हैं, पर कुमारेंद्र पारसनाथ सिंह या शलभ श्री रामसिंह जैसे कवियों को याद करने लगते हैं। उनकी यह कोशिश लगभग अप्रासंगिक हो चुके कवियों को प्रासंगिक नहीं बना देती। इसके लिए जो आवश्यक औजार चाहिए, वे भी नहीं हैं उनके पास। इसके अलावा आज जो कविता लिखी जा रही है, उसमें कुछ नाम तो ऐसे हैं जिनके बिना समकालीन कविता की कोई भी चर्चा अधूरी है। जैसे राजेश जोशी, अरुण कमल, मंगलेश डबराल या नरेश सक्सेना की कविताओं को व्यापक स्तर पर सराहना मिली है। इन्होंने अस्सी के दशक के बाद की धारा को बदला है, लेकिन विजेंद्रजी जानबूझकर इन नामों की तरफ से आंखें फेर लेते हैं। हद तो तब हो जाती है जब वे अपने ही द्वारा संपादित पत्रिका 'कृति ओर' में अपने कुछ 'टहलुआ' किस्म के आलोचकों से निरंतर अपना ही प्रशस्तिगान करवाते रहते हैं। इसमें उन्हें न तो कोई संकोच होता है और न कोई ग्लानि होती है। यानी एक तो करेला, ऊपर से नीम चढ़ा, लेकिन ऐसी तमाम कोशिशें भी उन्हें आज की कविता के लिए प्रासंगिक नहीं बना पातीं। समय निर्मम होता है। वह ऐसी सारी आत्ममुग्धताओं तथा उठापटक को ठिकाने लगाकर आगे बढ़ जाता है। रचनाशीलता की बहती धारा में आप कहीं पीछे छूट जाते हैं।

बहरहाल विजेंद्रजी की सोच और उनकी रचनात्मकता को लेकर आपत्तियां कहीं इससे भी अधिक गंभीर हैं और वे ज्यादा बड़े मुद्दों को उठाती हैं। समकालीन कविता में विजेंद्र जैसे लोग जिस तरह की बहसें चलाते हैं, उनके अंतर्विरोधों पर बात करना भी ज़रूरी है। इसीलिए यह पत्र लिखने के लिए विवश भी हुआ हूं। बड़ा मुद्दा यह है कि विजेंद्र जी आधुनिकता का अर्थ औपनिवेशिक चेतना से जोड़कर किसी अमूर्त 'भारतीयता' की खोह में घुस जाना चाहते हैं। कोई भी विचारवान व्यक्ति यह जानता है कि भारतीयता की कोई सरल और एकपक्षीय अवधारणा नहीं बनाई जा सकती। भारतीयता में अनेक देश, काल तथा संस्कृतियां एक साथ उपस्थित हैं। पिछले हजार वर्षों में भारतीयता का रूप विभिन्न धर्मों, संप्रदायों, संस्कृतियों, परपंराओं जीवन-शैलियों तथा चेतनाओं के आपसी समागम से बना है। यह निरंतर बनता और बदलता रहा है। भारतीयता की किसी एकल या अमूर्त अवधारणा को बनाना कठमुल्ले किस्म की सांप्रदायिक शक्तियों और सांस्कृतिक पुन्तरूत्थानवाद की तरफ चले जाना है। भारतीयता और लोकजीवन या 'लोक संस्कृति' की भी कोई काल निरपेक्ष, इतिहास-निरपेक्ष या स्वायत्त अवधारणा नहीं बनाई जा सकती। आज निरंतरता और परिवर्तन की जटिल अंत: क्रियाओं को समझने की ज़रूरत है। इन्हीं के द्वारा हम अपनी समकालीनता को परिभाषित कर सकते हैं। एक 'भारत' के भीतर कई भारत हैं। एक 'लोक' के भीतर कई तरह के 'लोक' हैं। एक 'समय' के भीतर कई तरह के समय हैं। लोक की जीवन स्थितियां हमारे समूचे इतिहास में परिवर्तनशील रही हैं, लेकिन आज भूमंडलीकरण या वैश्वीकरण के दबावों में इस 'लोकजीवन' को समझना ज्यादा कठिन और चुनौतीपूर्ण हो गया है। नए सूचना समाज, टेक्‍नोलॉजी, औद्योगिक उत्पादन, बाज़ार की ताकतों तथा पूंजी के आबाध प्रसार ने हमारे चारों तरफ परिवर्तनों की गति को बहुत अधिक तेज़ कर दिया है और ये परिवर्तन बहुआयामी हैं। इन परिवर्तनों तथा मनुष्य जीवन पर उनके प्रभावों-परिणामों को जो कि भूमंडलीकरण की प्रक्रिया की ही परिणति है, किसी एक जगह पर केंद्रित करना तक कठिन हो गया है। जीवन का कोई क्षेत्र आज ऐसा नहीं है जो इन परिवर्तनों से अछूता रह गया हो।

विजेंद्रजी जैसे लोगों के लोकजीवन की अवधारणा बहुत यांत्रिक तथा जड़ाऊ किस्म की है, जबकि डॉ. रामविलास शर्मा, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, मुक्तिबोध, नागार्जुन, रेणु, हरिशंकर परसाई या श्रीलाल शुक्ल जैसे रचनाकारों ने लगातार लोकजीवन, समाज, राजनीति, परंपरा, मूल्य दृष्टि, सामूहिक अवचेतन, रहन-सहन, परिवेश तथा पर्यावरण की अवधारणाओं पर पड़ रहे दबावों को व्याख्यायित करते हुए 'भारतीयता' की खोज की है। लोकजीवन का जो लालित्य नागार्जुन की कविताओं में है या श्रम का जैसा सौंदर्य केदारनाथ अग्रवाल रचते हैं, क्या वैसा कुछ भी विजेंद्र जी के पास है? उन रचनाकारों के यहां लोकजीवन स्वायत्त, अमूर्त, अवैज्ञानिक, समाज निरपेक्ष तथा इतिहास विहीन नहीं है, लेकिन विजेंद्रजी लोकजीवन और लोक संस्कृति की अमूर्त बातें ही करते रहते हैं। वे 'लोक-लोक-लोक-लोक' इस तरह से करते रहते हैं जैसे साहित्य में कबड्डी खेल रहे हों और दूसरे पाले में घुसकर उन्हें चित कर देना चाहते हों। सवाल तो यह है कि पहले का कवि जब कहता था कि 'अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है क्यों न इसे सबका मन चाहे' तो क्या वही स्थिति आज भी है? विजेंद्रजी जिस 'चैत की लाल टहनी', 'उठे गूमड़ नीले' तथा 'कठफोड़वा पक्षी' को अपनी कविता में लाते हैं, क्या वह इतिहास निरपेक्ष हो सकता है? यह उनका कैसा 'लोक' है जिसमें अपने समय की स्थितियों का कोई दबाव ही नहीं है। उत्तर प्रदेश के ग्रामांचल से मेरा गहरा संबंध रहा है। गांवों के जीवन की परंपरागत लय, सादगी, सरलता, निष्कपटता, आत्मनिर्भरता, उच्च जीवन मूल्यों से जुड़ाव भाई चारे, स्नेह, आपसी सौहार्द तथा सामूहिक सह अस्तित्व की स्थितियों पर मंडराते संकट को मैं देख रहा हूं। मूल्य विहीन राजनीति, स्वार्थ, तिकड़मबाजी, क्षुद्र महत्वाकांक्षाओं, स्पर्धा, जातिवाद तथा संगठित अपराध ने ग्रामीण समाज को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। क्या यह हमारे समय का बड़ा संक्रमण नहीं है? विशाल बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नज़र भारत के ग्रामीण बाज़ार पर है। विजेंद्रजी बताएं कि वह परंपरागत लोकजीवन अब कहां रह गया है? गांवों में रोजगार नहीं है। भूमंडलीकरण के इस दौर में ग्रामीण विकास पर खर्च होने वाली राशि में भारी कटौती और विकास की बदलती परिभाषाओं ने किस कदर उथल-पुथल मचा रखी है। गाय-बैल, खेती के काम आने वाले उपकरणों, कारीगरों, परंपरागत काम-धंधों तथा आत्मनिर्भरता के तमाम स्रोतों का कितनी तेज़ी से क्षरण हो रहा है। कुएं, ताल-तलैया , पोखर, नदियों, अमराई चौपाल से जुड़े वे संस्कार अब बीते जमाने की बातें हो रही हैं। कृषि का वह आत्मनिर्भर ढांचा बदल रहा है। वहीं कारपोरेट कंपनियों की घुसपैठ, उर्वरक, कीटनाशक दवाओं, सिंचाई की आधुनिक मशीनों, निर्माण सामग्री, टेलीविजन, मोबाइल, बैंकों की निवेश योजनाओं के बड़े-बडे़ पोस्टर, शीतल पेय, टूथपेस्ट, चाय-काफ़ी, मोटर साइकिलों के विज्ञापन तो आज गांवों में देख ही रहे हैं। अब शीघ्र ही बीयरबारों हेयर ड्रेसिंग सैलूनों, ब्यूटी पार्लरों तथा साइबर कैफे की मौजूदगी भी संभव है। बाज़ार खोलने के बाद कृषि तंत्र को खोलने की तैयारी भी हो रही है!

इस दृश्य के साथ यह कौन सा समय गांवों में आ रहा है? क्या इसकी व्याख्या लोकजीवन की कविता लिखने वाले ये लोग करेंगे? गांव में अब कितना गांव बचा है? अब तो आपसी विवाद चौपाल पर नहीं, पुलिस थानों तथा कचहरियों में निपटाए जाते हैं। जिला अदालतों में चले जाइए, गांवों के लोग वकीलों के पास बैठे मिलेंगे। छोटे-छोटे विवाद, मारपीट के मुकदमों से लेकर धोखाधड़ी, खून-खराबे तथा कत्ल के किस्से जैसे अब रोजमर्रा की बातें हैं। ग्राम केंद्रित विकास विकेंद्रीकरण, आत्मनिर्भरता तथा आमजन की सहभागिता वाला वह सपना कहां तिरोहित हो गया है? बडे़-बडे़ पूंजीपति, कारपोरेट घराने साम्राज्यवाद के दलाल हमारे लोक जीवन तथा लोक संस्कृति के सौदागर बन गए हैं। भू-माफियाओं का उदय, लाखों किसानों की आत्महत्याएं, विशेष आर्थिक क्षेत्रों तथा राजमार्गों के निर्माण, छोटे-छोटे किसानों की ज़मीनों का छीना जाना, जंगलों तथा पहाड़ों से आदिवासियों का खदेडा़ जाना, चारागाहों पर पूंजी का कब्जा और पर्यावरण का विनाश, क्या इस नई औपनिवेशिक दासता को हमारी लोकसंस्कृति की ये तथाकथित अलम्वरदार अपनी कविता में कुछ भी महसूस कर पा रहे हैं। कहां है भारत का यह बदलता गांव और उसका लोकजीवन इनकी कविता में? 'भारतीयता' और 'लोक संस्कृति' का राग अलापने वाले इन बौद्धिकों के कविता-विमर्श में विस्थापन का वह दर्द क्यों नहीं उभरता जो आज भारत का आम किसान और आदिवासी भोग रहा है।

आज की कविता में शहरी जीवन के यथार्थ को पश्चिमी औपनिवेशिक मानसिकता कह देने से पहले यदि विजेंद्रजी गांवों से विस्थापित हो रहे किसानों को रेल के डिब्बे में खचाखच भरे आदिवासियों, पलायन कर रहे खेतिहर मजदूरों को बडे़-बडे़ शहरों के सीमांत पर फैलती झुग्गी झोपड़‍ियों को, गंदी बस्तियों के जीवन को एक बार देख लेते तो उन्हें समझ में आ जाता कि आज के भारतीय ग्राम जीवन का वास्तविक यथार्थ क्या है? मैं उन्हें मुंबई में असल्फा, धारावी, गोवंडी तथा कुरार गांव की धूल सनी बस्तियों में घूमने के लिए आमंत्रित करता हूं। वे लोकसंस्कृति के अपने शीश महल से बाहर निकलकर समकालीन समय को देखें तो उन्हें समझ में आ जाएगा कि किसानों, खेतिहर मजदूरों और आदिवासियों के जीवन में किस तरह का रूपांतरण हुआ है और हो रहा है। हो सकता है कि उन्हें यह बदलता हुआ यथार्थ कुछ समझ में आने लगे और वे एक बेहतर कविता की ओर अग्रसर हों। वे इस ओर ज़रूर देखें कि वास्तव में श्रमजीवी जनता के जीवन में रोजमर्रा की आपाधापी के बीच कितने सूर, तुलसी और मीरा बन पा रहे हैं और उनकी झुग्गी-झोपड़‍ियों में शाहरुख खान, सलमान खान, करीना कपूर, बिपाशा बसु तथा कैटरीना कैफ आकर बस गए हैं। बड़ी-बड़ी किताबी बातें करने से कुछ नहीं होता। वे देखें कि गांवों में किस तरह अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों की बाढ़ आई हुई है। वे इस बदलते यथार्थ को देखें और आज के लोकजीवन को समझने की कोशिश करें। शाश्वत किस्म का लोकजीवन तो कालीदास की कविता में भी आ चुका है और उनसे ज्यादा प्रकृति-चित्रण करना किसके बूते का है! अपने पूर्वग्रहों तथा यांत्रिक समझ से थोड़ा बाहर निकलने पर इस संक्रमणशील समय को अधिक समझा जा सकता है और अपने लिए एक नई ऊर्जा भी प्राप्त की जा सकती है।

अच्छी बात तो यह है कि हिंदी की समकालीन कविता में आज इस बात की अभिव्यक्ति अनेक प्रकार से हो रही है कि केंद्रीकृत विकास पूंजीवाद का सबसे बड़ा रोग है। विजेंद्रजी जैसे हमारे कुछ अग्रज कवियों को भले ही गांव की समकालीन स्थितियों तथा बनवासियों की समस्याओं का कोई अंदाजा न हो, पर हिंदी कविता इस संक्रमणशील वर्तमान की अनेक प्रकार से व्याख्या कर रही है। नंदीग्राम, सिंगुर से लेकर भट्टा पारसौल तथा नियमगिरी की पहाड़‍ियों तक लड़ते हुए किसान और आदिवासियों के साथ जो नया यथार्थ उभर रहा है, वह बहुत सारे युवा कवियों के यहां अभिव्यक्ति पा रहा है। खाप पंचायत, लड़कियों की भ्रूण हत्या, भूमि अधिग्रहण, ग्रामीण बेरोजगारी, बड़ी-बड़ी बांध योजनाओं के कारण विस्थापित होते किसानों और डूब क्षेत्र में आने वाले गांवों पर इधर अनेक कविताएं आई हैं। यही हमारी वास्तविक समकालीनता है। डॉ. रामविलास शर्मा की आड़ में अपनी कविता की कमजोरियों को छिपाने की कोशिश करने वाले कुछ लोग काश रामविलाजी के कविता संबंधी कथन की गहराई को समझ पाते। 'वसुधा' के ताजे अंक में स्व. रामविलास से हुई सुधीर रंजन सिंह की बातचीत पढ़ें। रामविलास जी स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि 'राजनीतिक कविता केवल विचारों की कविता नहीं होती, विचारों के साथ जब तक भावशक्ति नहीं होगी तब तक राजनीतिक कविता प्रभावशाली नहीं होगी। भावशक्ति के बिना विचार शक्ति अधूरी है। विचार में जान होनी चाहिए। ताकत होनी चाहिए- उधार लिए विचार से काम नहीं चलेगा।

इसी तरह मुक्तिबोध ने भी बहुत पहले साहित्य में 'जड़ीभूत सौंदर्याभिरुचि' के खतरे का सवाल उठाया था। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया था कि मार्क्सवाद की किताबों की बातें करने से वर्ग चरित्र नहीं बदल जाता। आपको 'संवेदनात्मक ज्ञान' और ज्ञानात्मक 'संवेदन' की लड़ाई लड़नी होगी। एक बहुत बड़ी लड़ाई अपने भीतर के बने दिमाग़ और उसके यथास्थितिवाद में है। इसी बात को आगे बढ़ाते हुए रघुवीर सहाय ने कहा था-
टूट रे मेरे मन टूट
एक बार टूट
अच्छी तरह से टूट
यह जो रचनाकार का आत्म संघर्ष है, अपनी ही गढ़ी हुई मूरत को तोड़ने का साहस- वह एक दिन की चीज़ नहीं, वह तो रोज-रोज की लड़ाई है। रघुवीर सहाय ने ही कहा था-' पावों में यह कील जो रोज-रोज गड़ती है रोज इस दर्द को समझना पड़ता है।' तीस पैंतीस वर्षों में और भी कितना कुछ बदल गया है।

कविता में 21वीं सदी की लड़ाइयां और भी जटिल हैं। आज लोक संस्कृति बनाम नगर संस्कृति या मुख्य धारा बनाम आंचलिकता की सारी बहसें कृत्रिम और बेमानी हो चुकी हैं। गांव हो या शहर आम आदमी हर जगह परेशान है और अपनी जड़ों से बेदखल हो रहा है। उसका यह विस्थापन जितना भौतिक है, उतना ही आत्मिक भी है। विकास के तमाम रोज़ रोज़ गढे़ जाते मिथकों तथा वस्तुओं के उपभोग के भीतर छिपी अन्याय, हिंसा शोषण, बदहाली तथा उन्मूलन की नंगी सच्चाइयों को समझना ज़रूरी है। ठीक है कि मनुष्य जब तक ज़िंदा है, स्वप्न देखेगा और संघर्ष भी करेगा, पर उसका यह स्वप्न देखना और उसकी यह जिजीविषा बहुत कठिन किस्म की चीज़ है। उसे बहुत सरलीकृत रूप में कविता में रुपायित करना खेल नहीं है, जैसा कि हमारे ऐसे कुछ कवियों ने समझ रखा है। मनुष्य की जिजीविषा उसके संकटों के बीच से ही परिभाषित होगी। आप संकटों की चर्चा ही नहीं करेंगे तो जिजीविषा को कैसे रचेंगे? यह असल में तो कुछ ऐसा होना चाहिए जो जितना हृदय विदारक हो, उतना ही आस्था जगाने वाले भी हो। इस द्वंद्वात्मकता को हासिल किए बिना कोई भी असाधारण रचना संभव नहीं है। खोखले आशावाद तथा लोक संस्कृति की ठहरी हुई अवधारणा और सतही ऐश्वर्य गायन से कुछ नहीं होता। इस तरह तो लोक संस्कृति को भी पंच सितारा होटल या शॉपिंग माल में बिकने वाली एक वस्तु में बदल दिया जाता है। आज की कविता का सामना सत्ता की उस संस्कृति से है जहां व्यवस्था हर विपत्ति को एक सामान्य स्थिति बना देती है। सारी नृशंशता रोजमर्रा के एक अनुभव में बदल जाती हैं। उनके एक तरफ फासिस्ट राजनीति है और दूसरी तरफ कवि का एक मध्यमवर्गीय सुविधापरस्त, सुखी, प्रसन्न संसार है। धूमिल ने कभी क्या इसी पूंजीवादी मानसिकता की ओर तो इशारा नहीं किया था-
यद्यपि यह सही है कि मैं
कोई ठंडा आदमी नहीं हूं
मुझमें भी आग... है
मगर वह
भभककर बाहर नहीं आती
क्योंकि उसके चारों तरफ
चक्कर काटता हुआ
एक पूंजीवादी दिमाग़ है
जो परिवर्तन तो चाहता है
मगर आहिस्सा आहिस्ता
कुछ इस तरह कि चीज़ों की
शालीनता बनी रहे
कुछ इस तरह कि कांख भी दबी रहे
और विरोध में उठे हुए हाथ की
मुट्ठी भी तनी रहे
और यही वजह कि बात
फैसले के हद तक
आते-आते रुक जाती है
क्योकि हर बार
चंद टुच्ची सुविधाओं की
लालच के सामने
अभियोग की भाषा चुक जाती है।

अंत में मैं विजेंद्र जी से सिर्फ़ इतना ही निवेदन करना चाहता हूं कि बंधुवर, हम कविता के चाहे जितने खांचे बना लें, पर हमारा पाठक उसकी चिंता नहीं करता। वह तो कविता में सिर्फ़ एक सिर्फ़ एक गहरा मर्मस्पर्शी अनुभव ढूंढता है। यदि यह अनुभव उसे मिलता है तो वह आपको स्वीकार करता है और यदि आप मर्मस्पर्शी कविता नहीं रच पाते हैं तो चाहे जितनी बड़ी-बड़ी बातें कर लें, चाहे जितने सिद्धांतों तथा विचारधाराओं का घटाटोप खड़ा कर लें, वह सब बेकार है। अनुभूति और 'संवेदनात्मक ज्ञान य ज्ञानात्मक संवेदन' के बिना ये सारे 'स्कूल' दुकानदारी में बदल जाते हैं। आप 'लोक संस्कृति' की भी दुकानदारी कर सकते हैं और नागर संस्कृति की भी, लेकिन इसके परे मनुष्य का जीवन बहुत विराट है। उसमें हर तरह के रंग की ज़रूरत है। हमें जितनी नागार्जुन की ज़रूरत है, उतनी ही शमशेर की भी। जितनी अज्ञेय की ज़रूरत है, उतनी ही मुक्तिबोध की भी। हर अच्छी कविता चाहे जिस ज़मीन से उठी हो, पाठकों द्वारा सराही ही जाएगी।

रघुवीर सहाय बनाम नागार्जुन या केदारनाथ सिंह बनाम पारसनाथ सिंह जैसी तमाम बहसें नकली बहसें है। ये आलोचकों की ख़ास तरह के धंधे हैं। और साहित्य के सट्टा बाज़ार में उनका कोई भरोसा नहीं होता। हमारा आलोचक कल तक मुक्तिबोध को बड़ा कवि बता रहा था आज अचानक अज्ञेय जन्मसदी में अज्ञेय को बड़ा कवि बता रहा है यह बौद्धिक कलाबाजी नहीं तो और क्या है। कविता अच्छी है तो चिंता नहीं कि वह गांव के पोखर पर है या शहर के ट्रैफिक सिग्नल पर। अच्छी नहीं तो तमाम विषयवस्तु और सारी कवियों से यह वसुंधरा पटी रहती है।

विजेंद्रजी के इस निरर्थक और वाग्जाल से भरे पत्र के बाद मैं संपादक जी से उम्मीद करता हूं कि आगे कुछ ऐसी प्रतिक्रियाएं देंगे जो समकालीन कविता की हमारी समझ को आगे बढ़ा सके।
Radheshyam Upadhyaya
 
 
 
 
 
 





राधेश्याम उपाध्याय 
मो.: 09969382160