Monday, February 4, 2013

रमाकांत स्‍मृति कहानी पुरस्‍कार



रमाकांत छठे दशक के महत्वपूर्ण कथाकारों में से एक हैं. दो दिसम्बर १९३१ को जन्मे इस कथाकार के चर्चित कहानी संग्रह हैं- कार्लो हब्शी का संदूक, जिन्दगी भर का झूठ, उसकी लड़ाई, एक विपरीत कथा और कोई और बात. रमाकांत के महत्वपूर्ण उपन्यास हैं जुलूस वाला आदमी, छोटे छोटे महायुद्ध,  उपसंस्कार, खोयी हुयी आवाज़, तीसरा देश, दरवाज़े पर आग, समाधान, टूटते जुड़ते स्वर, बिस्तर और आकाश. सोवियत भूमि के सम्पादक रहे रमाकांत को सोवियत लैंड नेहरू सम्मान तो मिला ही, नेल्सन मंडेला के भारत आने पर उनकी कहानी 'कार्लो हब्शी का संदूक' का भीष्म साहनी द्वारा किया गया अनुवाद उन्हें भेंट किया गया था. "क्रासाद" नामक पाक्षिक का सम्पादन और अपनी बेबाक टिप्पणियों के लिए चर्चित रमाकांत युवा रचनाकारों  को सदा प्रोत्साहित करते रहे. उनका निधन ६ दिसम्बर १९९१ को दिल्ली में हुआ.

रमाकांत जी की स्मृति में दिया जाने वाला रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार अब तक १५ कहानीकारों को प्रदान किया जा चुका है. पन्द्रहवें कथाकार हैं ओमा शर्मा. इसके निर्णायक हैं रंगकर्मी दिनेश खन्‍ना. कथादेश में प्रकाशित 'दुश्‍मन मेमना' 443 कहानियों में से चुनी गई है.  


वर्ष २०१३ के लिए २०१२ में प्रकाशित कहानियां विचारणीय होंगी. इस वर्ष के अंतिम निर्णायक हैं श्री विश्वनाथ त्रिपाठी. संस्तुति और कहानी की फोटोकॉपी १५ मई २०१३ तक भेजना ज़रूरी है. प्रविष्टि इस पते पर भेजी जाए -

महेश दर्पण
संयोजक, रमाकांत कहानी पुरस्‍कार,
सी - 3/51 सादतपुर, 
दिल्‍ली -110094

अब तक पुरस्कृत कथाकार
·         नीलिमा सिन्हा
·         कृपाशंकर
·         अजय प्रकाश
·         मुकेश वर्मा
·         नीलाक्षी सिंह
·         सूरजपाल चौहान
·         पूरन हार्डी
·         अरविन्द कुमार सिंह
·         नवीन नैथानी
·         योगेन्द्र आहूजा
·         उमाशंकर चौधरी
·         मुरारी शर्मा
·         दीपक श्रीवास्तव
·         आकांक्षा पारे काशिव









महेश दर्पण , संयोजक, रमाकांत कहानी पुरस्‍कार

Friday, February 1, 2013

दुश्मन मेमना

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रमाकांत स्‍मृति पुरस्‍कार शायद एकमात्र पुरस्‍कार है जो साल भर के दौरान छपी सिर्फ किसी एक कहानी पर दिया जाता है. पिछले साल का पुरस्‍कार ओमा शर्मा को दुश्‍मन मेमना कहानी पर मिला है. बदलते हुए समाज के रग-रेशे को खोलती यह कहानी आप यहां पढ़िए   
 

वह पूरे इत्मीनान से सोयी पड़ी है। बगल में दबोचे सॉफ्ट तकिए पर सिर बेढंगा पड़ा है। आसमान की तरफ किए अधखुले मुंह से आगे वाले दांतों की कतार झलक रही हैं। होंठ कुछ पपडा़ से गए हैं, सांस का कोई पता ठिकाना नहीं है। शरीर किसी खरगोश के बच्चे की तरह मासूमियत से निर्जीव पड़ा है। मुड़ी-तुडी़ चादर का दो तिहाई हिस्सा बिस्तर से नीचे लटका पड़ा है। सुबह के साढ़े ग्यारह बज रहे हैं। हर छुट्टी के दिन की तरह वह यूं सोयी पड़ी है जैसे उठना ही न हो। एक-दो बार मैंने दुलार से उसे ठेला भी है ... समीरा, बेटा समीरा, चलो उठो ... ब्रेक फास्ट इज़ रेडी ...। मगर उसके कानों पर जूँ नहीं रेंगी है। उसके मुड़े हुए घुटनों के दूसरी तरफ खुली त्रिकोणीय खाड़ी में किसी ठग की तरह अलसाए पड़े कास्पर (पग) ने जरूर आंखें खोली हैं मगर कुछ बेशर्मी उस पर भी चढ़ आयी है। बिगाड़ा भी उसी का है।
वैसे वह सोती हुई ही अच्छी लगती है। उठ कर कुछ न कुछ ऐसा-वैसा जरूर करेगी जिससे अपना जी जलेगा। नाश्ते में परांठे बने हों तो हबक देने की मुद्रा में यूँ ‘ऑक’ करेगी ... कि नाश्ते में परांठे कौन खाता है। दलिया; नो। पोहा; मुझे अच्छा नहीं लगता। सैण्डविच; रोज़ वही। उपमा; कुछ और नहीं है। मैगी; ओके।
‘‘मगर बेटा रोज वही नूडल्स“
‘‘तो ?’’
‘‘पेट खराब होता है’’
‘‘मेरा होगा ना’’
‘‘परेशानी तो हमें भी होगी’’
‘‘आपको क्यों होगी ?’’
‘‘कल आपको मायग्रेन हुआ था ना’’
‘‘तो ?’’
‘‘डॉक्टर ने मैदा, चॉकलेट, कॉफी के लिए मना किया है ना’’
‘‘मैंने कॉफी कहां पी है’’
‘‘नूडल्स तो मांग रही हो’’
‘‘मम्मा!’’ वह चीखी
‘‘इसमें मम्मा क्या करेगी’’
‘‘पापा, व्हाइ आर यू सो इर्रिटेटिंग’’
मैं इर्रिटेटिंग हूँ, यह बात अब मुझे परेशान नहीं करती है। नादान बच्चा है, उसकी बात का क्या। अकेला बच्चा है तो थोड़ा पैम्पर्ड है इसलिए और भी उसकी बातों का क्या।
वैसे उसकी बातें भी क्या खूब होती रही हैं। अभी तक।
हर चीज के बारे में जानना, हर बात के बारे में सवाल।
‘‘पापा हमारी स्किन के नीचे क्या होता है ?’’
‘‘खून’’
‘‘उसके नीचे ?’’
‘‘हड्डी’’
‘‘हड्डी माने ?’’
‘‘बोन’’
‘‘और बोन के नीचे ?’’
‘‘कुछ नहीं’’
‘‘स्किन को हटा देंगे तो क्या हो जाएगा ?’’
‘‘खून बहने लगेगा’’
‘‘खून खत्म हो जाएगा तो क्या होगा ?’’
‘‘आपको बोन दिख जाएगी’’
‘‘ उसको तो मैं खा जाऊंगी’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘कास्पर भी तो खाता है’’
‘‘वो तो डॉग है’’
‘‘पापा, वो डॉग नहीं है’’
‘‘अच्छा, तो क्या है’’
‘‘कास्पर’’
‘‘कास्पर तो नाम है, जानवर तो ...’’
‘‘ओ गॉड पापा, यू आर सो ... ’’
उसकी यही नॉनसेंस जिज्ञासाएं हर रात को सुलाए जाने से पूर्व अनिवार्य रूप से सुनाई जाने वाली कहानियों का पीछा करतीं। मुझे बस चरित्र पकड़ा दिए जाते - फॉक्स और मंकी; लैपर्ड, लायन और गोट; पैरट, कैट, एलिफैंट और भालू। भालू को छोड़कर सारे जानवरों को अंग्रेजी में ही पुकारे जाने की अपेक्षा और आदत। कहानी को कुछ मानदंडों पर खरा उतरना पड़ता। मसलन, उसके चरित्र कल्पना के स्तर पर कुछ भी उछल-कूद करें मगर वायवीय नहीं होने चाहिए, कथा जितना मर्जी मोड़-घुमाव खाए मगर एकसूत्रता होनी चाहिए, कहानी का गंतव्य चाहे न हो मगर मंतव्य होना चाहिए, वह रोचक होनी चाहिए और आख़िरी बात यह कि वह लम्बी तो होनी ही चाहिए।
आख़िरी शर्त पर तो मुझे हमेशा गच्चा खाने को मिलता जिसे जीत के उल्लास में उंघते हुए करवट बदल कर वह मुझे चलता कर देती।
मगर अब!
अब तो कितनी बदल गयी है। कितनी तो घुन्ना हो गयी है।
कोई बात कहो तो या तो सुनेगी नहीं या सुनेगी भी तो अनसुने ढंग से।
‘‘आज स्कूल में क्या हुआ बेटा ?’’मैं जबरन कुछ बर्फ पिघलाने की कोशिश में लगा हूं ।
‘‘कुछ नहीं’’ उसका रूखा दो टूक जवाब।
‘‘कुछ तो हुआ होगा बच्चे !’’
Mobile 1
‘‘अरे !, क्या होता ?’’
‘‘मिस बर्नीस की क्लास हुई थी ?’’
‘‘हां’’
‘‘और मिस बालापुरिया की ?’’
‘‘हां, हुई थी’’
‘‘क्या पढ़ाया उन्होंने ?’’
‘‘क्या पढ़ातीं ? वही अपना पोर्शन’’
‘‘निकिता आयी थी’’
‘‘आयी थी’’
‘‘और अनामिका’’
‘‘पापा, व्हाट डू यू वांट?’’ वह तंग आकर बोली।
‘‘जस्ट व्हाट्स हैपनिंग विद यू इन जनरल’’
‘‘नथिंग, ओके’’
‘‘आपके ग्रेड्स बहुत खराब हो रहे हैं बेटा’’
‘‘दैट्स व्हाट यू वांट टू टॉक ?’’
‘‘नो दैट इज ऑलसो समथिंग आई वांट टू टॉक’’
‘‘कितनी बार पापा ! कितनी बार !!’’
‘‘वो बात नहीं है, बात है कि तुम्हें हो क्या रहा है’’
‘‘नथिंग’’
‘‘तो फिर’’
‘‘आई डोन्ट नो’’
‘‘आई नो’’
और वह तमककर दूसरे कमरे में चली गयी-मम्मी से मेरी शिकायत करने। मम्मी समीरा से आजिज़ आ चुकी है मगर ऐसे मौंकों पर उसकी तरफदारी कर जाती है, मुख्यतः घर में शान्ति बनाए रखने की नीयत से वर्ना रिपोर्ट कार्ड या ओपन-डे के अलावा भी ऐसे नियमित मौके आते हैं जब उसे खून का घूँट पीकर रहना पड़ता है।
ट्यूटर के बावजूद पिछली बार मैथ्स में चालीस में से बारह लायी थी।
इस बार आठ हैं।
चलो, आगे मैथ्स नहीं करेगी।
ये आगे या अभी की बात नहीं है। जो क्लास में किया जा रहा है, किताब में है उसे पढ़ने-समझने की बात है।
ज्योग्राफी का भी वही हाल है।
क्या आठवीं की पढ़ाई इतनी मु्श्किल हो गयी है ?
आगे क्या करेगी ?
सबके बच्चे कुछ न कुछ कर लेते हैं, ये भी कर लेगी।
कैसे? सब इतना आसान है ?
इतना मत सोचा करो!
लड़की का पिता होकर मैं नहीं सोचूँगा तो कौन सोचेगा ? आगे कितना मुश्किल समय आने वाला है। अपने पैरों पर खड़े होने के लिए इसे कुछ तो करना पड़ेगा। हम हैं मगर हमेशा थोड़े रहेंगे। पता नहीं वे कौन माँ-बाप होते हैं जिनके बच्चे बोर्ड में टॉप करते हैं। आईआईटी-मेडिसन करते हैं। अखबारों में जिनके सचित्र गुणगान होते हैं। यहां तो पास होने के लाले पड़ते हैं ।
पास तो खैर हो जाती है।
हो जाती है, होम ट्यूशन्स के सहारे।
हमारे घरवालों को सरकारी स्कूल की फीस भारी लगती थी, यहाँ पब्लिक स्कूल में पढ़ते हुए होम ट्यूशन्स के बिना गुजारा नहीं।
तुम उसके मामले को अपनी तरह से क्यों देखते हो ? व्हाई शुड योर अपब्रिंगिंग कास्ट शैडो ऑन हर लाइफ ?
मुझे निःशंक झिड़क दिया जाता है।
मैं स्वयं उस तरफ जाना नहीं चाहता मगर जिस तरह चीजें बिगड़ रही हैं, रहा भी नहीं जाता। ठीक है कि उसे सुख-सुविधाएं नसीब हैं मगर बिगड़े तो नहीं। उस दिन कैमिस्ट्री की मिस रोडरिक्स ने बुलवा लिया। एक जमाना था जब यह उनकी फेवरेट हुआ करती थी। उस दिन तो काट खाने को आ रही थी।
‘‘होम वर्क तो दूर, जर्नल तक पूरा नहीं करती है। क्लास में समीकरण-संतुलन खत्म हो गया है और यह आयरन का सिंबल ‘आई’ बना देती है। फिर आयोडिन कहाँ जाएगी?’’
मुझे समझाते हुए ही मीरा समझदार और संयमी लगती है। जब खुद भुगतती है तो या तो उस पर हाथ उठा देती है या कुछ देर चीख-पुकार मचाकर मेरी नाकामी और तटस्थता को फसाद की जड़ करार देते हुए मुँह फुला लेती है। मैं तो रविवार के दिन बमुश्किल उसका कुछ देख पाता हूँ, रोजमर्रा में तो उसका काम मीरा ही संभालती है।
मगर मीरा भी कहाँ तक संभाले!
स्कूल तैयार होते समय रोज जू्ते और ज़ुर्राबों की खोज मचती है क्योंकि गए रोज स्कूल से लौटकर बिना फीते खोले जूतों को जो उतारा तो एक कहीं फेंका, दूसरा पता नहीं कहां। पानी की बोतल हर हफ्ते के हिसाब से छूटती है। डब्बावाला लगा रखा है कि बच्चे को ताजा़ खाना मिल जाए मगर उसकी भी कोई कदर नहीं। किताबों को तो कबाड़े की तरह रखती है। अपन सेकेन्ड-हैंड किताबों को भी अगले साल वालों को बढ़ा देते थे, ये नवम्बर-दिसम्बर तक नयी किताबों के चिथड़े उड़ा देती है जबकि उनके कवर बाजार से चढ़वाए जाते हैं। ये कौन सा ग्लोबलाइजेशन है कि हर निजी और मामूली चीज को आउटसोर्स कर दो - पहले बदलाव मगर बाद में एक मजबूरी के तहत !
वह सब भी ठीक है मगर बच्चा पढ़ तो ले! ये मैडम तो स्कूल से लौटकर घर में घुसी नहीं कि सीधे फेसबुक पर ऐसे टूटती है जैसे देर से पेशाब का दबाव लगा हो और घंटों उसी पर लगी रहेगी। तब न खाने-पीने की सुध रहती है और न सर्दी-गर्मी लगती है। लोगों के बच्चे होते हैं जो स्कूल से आते ही सब काम छोड़कर होमवर्क में जुट जाते हैं, टीवी तक नहीं देखते और एक हमारी है ...। जब खराब नम्बरों से ही डर नहीं तो होमवर्क की क्या बिसात! मैं तो बस सुनता रहता हूं कि इसके एक हजार से ज्यादा फेसबुक फ्रैंड्स हैं। एक दिन बिना लॉग आउट किए कंप्यूटर बन्द कर दिया होगा। मीरा ने जब उसे चालू किया तो पुराना एकाउंट रीस्टोर हो गया। क्या-क्या तो अजीबोगरीब फोटो डाल रखे हैं। टैक्नोलॉजी ने तीतर के हाथ बटेर पकड़ा दी है। पता नहीं कितने और कहाँ-कहाँ के तो लड़के दोस्त बना रखे हैं। इस उम्र के लड़के भेड़िए होते हैं इसलिए लड़कियों को ही संभल कर चलना होगा। मगर यह तो रत्ती भर नहीं सुनती है। मैं उसके पास जाकर बैठूँ भी तो खट से कंप्यूटर को मिनीमाइज कर देगी या एस्केप बटन दबा देगी। न बेस्ट का मतलब पता है, न फ्रैंड का मगर बेस्ट फ्रेंड दर्जन भर हैं। मैं कुछ समझाने-चेताने लग जाऊँ तो अपनी जरा सी ‘हो गया’ से मुझे झाड़ देगी। मुझे बहला-फुसलाकर एक ब्लैकबैरी हथिया लिया क्योंकि सभी फ्रैंड्स के पास वही है। मैंने सोचा इसके मन की मुराद पूरी हो जाएगी। अकेला बच्चा है, क्यों किसी चीज़ की कमी महसूस करे? आए दिन मोबाइलों के आकर्षक विज्ञापनों की कटिंग अपनी माँ को दिखाती थी। अक्सर मेरे मोबाइल को लेकर ही उलट-पुलट करती रहती थी, कुछ नहीं तो उस पर ‘ब्रिक्स’ या मेरे अजाने क्या-क्या गेम्स खेलती रहती। मगर आज तक हाथ मल रहा हूं। उसके मोबाइल पर हर दम तो अब पासवर्ड का ताला जड़ा होता है। इसी से पता चलता है कि जरूर कुछ भद्दी हरकतों में शामिल होगी। सब कुछ पाक-साफ होता तो पासवर्ड की या उसके लिए इतना पजैसिव होनी की जरूरत क्यों पड़ती?
उस दिन मैं ड्राइंगरूम में अकेला बैठा आइपीएल का मैच देख रहा था कि मीरा मेरे पास आयी और चुप रहने का इशारा करके हौले से बैडरूम में ले गयी। समीरा सो चुकी थी। आज गलती से उसका मोबाइल डाइनिंग टेबल पर छूट गया था। सोते वक्त भी अमूमन वह उसे अपने तकिए के नीचे रखती है। साइलेन्ट मोड में। मुझे या मीरा को अधिकार नहीं है कि मोबाइल जैसी उसकी पर्सनल चीजों के बारे में ताक-झांक या नुक्ताचीं करें। आखिर इससे हमको क्या वास्ता कि वह कब किससे क्या बात करती है? बीबीएम यानी ब्लैकबैरी मैसेन्जर सर्विस चालू करवा लिया है। जितने मर्जी मैसेज, फोटो या वीडियो भेजो। उस दिन के आए-गए सारे संदेश पढ़ने में आ गए। यकीन नहीं हुआ कि अपना बच्चा ऐसी भाषा लिखता है। एक लफ्ज़ की स्पैलिंग ठीक नहीं थी। वासप, लोल, बीटीडब्लू, ओएमजी, टीटीवाइएल और जेके की भरमार थी। मीरा ने बताया कि ये सब क्रमश: व्हाट्स अप, लाफ आउट लाउड, बाइ द वे, ओ माई गॉड, टॉक टू यू लेटर और जस्ट किडिंग के लघु रूप हैं। खैर यह सब तो चलो इस जैनरेशन की व्याकरण है मगर इसके अलावा जो लिखत-पढ़त थी उसे देखकर किसी को घटिया हिन्दी फिल्म के संवाद याद आ जाएं। पहले फरजा़न नाम का कोई लड़का रहा होगा जिसके साथ इसका नाम जुड़ा था। थोड़े दिन पहले उसे चलता कर दिया है। आजकल दो और पकड़ लिए हैं; साहिल और साराँश। फेसबुक की अपनी प्रोफाइल पिक्चर के बारे में उनसे जबरन टिप्पणियाँ मांगती हुई। आधी बातों के सूत्र तो चित्र-संकेतों (स्माइलीज़) में धंसे होते हैं तो वैसे ही कुछ पल्ले नहीं पड़ता। विषय के तौर पर हिन्दी--आवर मदर टंग, यू नो -- बहुत बोरियत भरी फालतू और मुश्किल लगती हो लेकिन संदेशों की अदला-बदली के बीचों-बीच उसकी चुनिंदा देसी गालियों का प्रयोग सारे करते हैं। जैसे यह कोई फैशन या जमानेसाज़ होने की बात हो।
एक बार की बात है जब नवी-मुम्बई के रास्ते शायद मानर्खुद में किसी जगह सुअरों को ढूंढ़-ढूंढ़कर कुछ खाते देखा था। बस शुरू हो गयी।
‘‘पापा, पिग्स क्या खाते हैं ?’’
‘‘पॉटी’’ मैंने एक नजर फिराकर स्टियरिंग पकड़े ही कहा।
‘‘छी! क्यों?’’ एसी गाड़ी में बैठे हुए ही उसने उल्टी करने की मुद्रा बनायी।
‘‘वो उनका खाना होती है ... उसमें उनको बदबू नहीं आती है’’
‘‘उस पॉटी को खाकर जो पॉटी करते हैं उसे भी खा जाते हैं’’
इस पुत्री-पिता संवाद की एकमात्र गवाह श्रीमती मीरा जोशी ने ऐन इस बिन्दु पर अपनी सख्त़ आपत्ती दर्ज़ करते हुए ‘स्टॉप इट’ कहा तो कुछ पलों के लिए उसका सवाल एक नाजा़यज सन्नाटे में टंगा रहा।
‘‘नहीं’’मैंने हौले से ‘ऑब्जैक्शन ओवररूल्ड’ की मुद्रा में जवाब दिया।सूचनाधिकार के युग में मैडम आप सवालों से बच नहीं सकते।
‘‘क्यों पापा ?’’
‘‘अरे, अपनी पॉटी कोई नहीं खाता। गूगल पर सर्च करके देखना - एनिमल्स हू ईट देअर ओन शिट- शायद होते भी हों ...’’ मैंने बात बिगड़ने से पहले बात को रफा-दफा किया।
कोई यकीन करेगा कि दो साल पहले तक ऐसी मासूम शरारती लड़की के भीतर अचानक क्या कचरा घुस गया है कि कुछ समझ में नहीं आ रहा है। कुछ बताती भी तो नहीं है ... जैसे हम इस लायक ही न हों। माँ-बाप अभी न रोकें तो पूरा बिगड़ने में कितनी देर लगती है? पता नहीं और बिगड़ने को क्या रह गया है। मोबाइल के म्यूजिक में फ्लोरिडा, ब्रूनो मार्स, एमेनिम, रिहाना, एनरिके, जस्टिन बीवर, एकॉन और पता नहीं किन-किन फिरंगी रैंक-चन्दों को भर रखा है। जब देखो तब ईयर-प्लग चढ़ाए रहती है। बेबी, टुनाइट आयम लविंग यू, लिप्स लाइक शुगर, डीजे गॉट अस फालिंग इन लव अगेन, इफ यू आर सेक्सी एण्ड यू नो क्लैप योर हैंड्स को सुनने का मतलब क्या है। ज़रा कुछ बोलो तो कहती है इससे एकाग्रता बढ़ती है। एक दिन मैंने घेर-घार के पूछ लिया तो कहती है इनका कोई मतलब नहीं है। ये तो म्यूजिक है। कोई भला आदमी बताए तो मुझे कि इसमें काहे का म्यूजिक है? सारे गानों में वही एक-सा हो-हल्ला। कोई अल्फ़ाज नहीं जो दिल पर ठहरे। कोई सुर नहीं, सब शोर ही शोर।
और देखो, फिर भी किस धड़ल्ले से कह देती है कि जब मुझे कुछ अता-पता ही नहीं है तो फिर मैं ऐसी इर्रिटेटिंग बातें क्यों करता हूं ?
सुबह की सैर पर रोज मिलने वाले एक परिचित बता रहे थे कि गए शुक्रवार की दोपहर को यह ‘ब्लू हैवन’ के लाउंज में किसी हम उम्र लड़के के साथ एक कोने में चाइनीज़ खा रही थी। मैंने घर पर पूछा तो मीरा ने बताया कि स्कूल से आने के बाद यह ‘क्रॉसवर्ड’ बुक स्टोर पर कुछ सहेलियों से मिलने की कहकर गयी थी। उसने वहाँ ड्रॉप भी किया था अब कहाँ ‘क्रॉसवर्ड’ और कहाँ ‘ब्लू हैवन’? जब घर से जाती है तो कतई नहीं चाहती कि हममें से कोई उसे फोन करे। करो तो अक्सर उठाएगी नहीं। बाद में मोबाइल के साइलेन्ट मोड या टैक्सी की खड़-खड़ का बहाना कर देगी।
अपनी तरफ से प्यार-पुचकार के खूब आजमाइश कर चुका हूं मगर नतीजा ? वही ढाक के तीन पात। उस रोज़ बेचैनी के कारण नींद खुल गयी। बिना रोशनी किए समीरा के कमरे की तरफ गया तो देखता हूं मैडम बीबीएम करने पर लगी हैं। रात के ढाई बजे! आग लग गई मेरे। रहा नहीं गया। बस हाथ उठने से रह गया। समझ में आ गया कि हम लोग के लाड़-प्यार का ही नतीजा है यह सब। पता नहीं रात में कब तक यह सब करती है तभी तो रोज़ सुबह उठने में आना-कानी करती है। बस, मैंने मोबाइल ले लिया। मगर इसकी हिमाकत तो देखो! कहती है मैं उसका मोबाइल नहीं देख सकता! क्यों ? टैल मी! व्हाट इज देअर इन दैट व्हिच आई- हर फादर- कैन नॉट सी ? मीरा बीच में आ गई सो उसे अपना कोड-लॉक डालने दिया। किस दबंगी से तो मुंह लग लेती है जबकि सेब काटने की अकल नहीं है। उस दिन काटा तो कलाई में चाकू घुसेड़ दिया।
मुझे एक डर यह भी लगता कि जिन लड़कों के साथ यह बीबीएम पर रहती है, उनसे कहीं स्कूल के बहाने मिलती-जुलती तो नहीं है ? इस उम्र का आकर्षण दिमाग खराब किए रहता है। मैंने कई दफा, स्कूल यूनिफॉर्म में, इसकी उम्र की लड़कियों को मरीन ड्राइव की पट्टी और आइनॉक्स के मॉर्निंग शोज़ से छूटते देखा है। कुछ समाजशास्त्री किस्म के लोग तो इन्हें ‘टीनेज कपल’ तक कहते हैं। इनके माँ-बाप यकीन करेंगे कि उनके पिद्दी से होनहार क्या गुल खिला रहे हैं ?सीक्रेट विडीओ कैमरे से रिकॉर्डिंग करके आए दिन एमएमएस सरक्युलेट होते रहते हैं। एक्सप्रैस में ही पिछले दिनों रिपोर्ट थी कि नवयुग पब्लिक स्कूल की वह लड़की जिसने नौवीं क्लास में लुढ़क जाने के बाद खुदकुशी कर ली थी, पोस्टमार्टम के बाद पता चला कि गर्भ से थी। वह भी तो अपने मां-बाप का इकलौती बच्ची थी। उसके मां-बाप ने भी हमारी तरह पैदाइश-परवरिश के चक्कर में डॉक्टरों की दौड़-धूप की होगी, बढिया से स्कूल में दाखिला दिलाने के लिए खूब ऊपर-नीचे हुए होंगे, स्कूल के ओपन डेज़ पर सब काम छोड़कर टाइगर मदर्स के बीच बारी आने पर क्लास टीचर के सामने किसी प्रविक्षार्थी की तरह डरे-सहमे पेश होते रहे होंगे, बुखार न उतरने या अज्ञात कारणों से पेचिस हो जाने पर दवाइयों के अलावा नजर उतारकर तसल्ली की सांस भरी होगी, मध्य रात्रि में उसके कमरे में हौले से रोशनी करके मच्छरों को चैक किया होगा...।
या फिर, इस दबड़ेनुमा फ्लैट में वे कभी सोच सकते थे कि वे कोई कुत्ता ( कास्पर को कुत्ता कहने में उन्हें समीरा के नाम का झटका लगा) भी पालना मंजूर होगा? जब कास्पर नहीं था, यानी तीन बरस पहले, तब हर गन्दे-शन्दे पिल्ले को खेलने के लिए उठा लाती। एक बादामी रंग की बिल्ली का छौना था जिसे उसकी मां ने छोड़ दिया था या छूट गया था। उसे हमारे घर में शरण मिली। मगर तीन रोज़ में ही जब उसने सोफे के ऊपर, टेबल के नीचे और फ्रिज के पिछवाड़े को तरोताजा होने का ज़रिया बनाया तो मैंने भी हाथ खड़े कर दिए। दो दिन तक तो वह छौना दिखता रहा --- कभी कार पार्किंग के पास तो कभी जैनसैट के पास । मगर तीसरे दिन वह नदारद था। किसी अभियान की तरह मुझे साथ लेकर उसकी ढुंढ़वायी मची।
‘‘छोड़ बेटा, लगता है उसे किसी जानवर ने मार खाया है’’कोशिश नाकाम रहने पर मैंने उसे समझाया।
‘‘पापा,क्या ऐसा नहीं हो सकता कि वह एक रात में वह पूरी बिल्ली बन गया हो? मैंने उसी कलर की बिल्ली बाजू वाली बिल्डिंग में देखी है’’
उसे किसी भी सूरत छौने का न होना या किसी जानवर द्वारा मार डालने का गल्प मंजूर नहीं था।
वो तो इतना छोटा था, उसे कोई क्यों मारेगा भला!
‘‘हां, यह तो हो सकता है। कई बार ऐसा हो जाता है। इस बार भी ऐसा ही हुआ है। अब घर चलें’’ मुझे भरसक उसके साथ होना पड़ा।
इसी कोमल दीवानगी को देखकर ही तो कास्पर को लाना पड़ा। नामकरण के लिए भी कुछ मशक्कत नहीं करनी पड़ी क्योंकि महीने भर के जीव को पहली बार गोदी में दुलारते हुए उसके मुंह से निकला था - पापा, काश इसके ‘पर’ होते, ये उड़ सकता! और नाम हो गया कास्पर !
गूगल के परोसे सारे फिरंग नाम धरे रह गए।
मगर क्या हुआ ?
सिर्फ पागलों की तरह खेलने-पुचकारने के लिए है कास्पर। एक भी दिन उसे रिलीव कराने नहीं ले जाती है। अखबार में अक्सर पढ़ता हूं कि पैट्स बहुत बढ़िया स्ट्रैस बस्टर होते हैं। ख़ाक होते हैं। मेरा तो स्ट्रैस बढ़ता ही जा रहा है। 

** **

शाम को घर लौटा तो मीरा का मुंह कुछ ज्यादा ही उतरा हुआ था। थोड़े बहुत मूड स्विंग्स तो उसे होते ही रहते हैं तो पहले तो मैं चुप लगा गया। एक चुप्पी लाख सुख की तर्ज़ पर। औरतें किस बात पर कैसे रिएक्ट कर जाएं कोई बता सकता है? मगर कुछ देर बाद उसने खुद ही आढ़े-टेढ़़े रास्ते पकड़ने शुरू कर दिए।
‘‘आज इसके स्कूल गयी थी’’ उसने यूँ कहा जैसे उस हवा के साथ अदावत हो जो मैं ढीठता से ले रहा था।
हवा में सन्नाटा था मगर यह सन्नाटा उस निस्तब्धता से हटकर था जो पति-पत्नी के खालिस अहमों की नीच टकराहट से किसी फांस की तरह रह-रहकर चुभता है। समीरा का अजीबो गरीब ढंग से फिसलता रवैया अब हम दोनों का, शुक्र है, साझा उद्यम-सा बन गया है।
अपने दफ्तर के काम की थकान की ओट में रहकर मैंने उसकी बात पर कुछ नहीं कहा तो उसने जोड़ा
‘‘गई नहीं, इसकी टीचर ने बुलाया था’’
उसके कहे के आगे पीछे एक बोझिल निर्वात तना खड़ा था।
‘‘क्या हुआ ? कोई खास बात ?”
किसी डराती आशंका से मुठभेड़ की तैयारी में मेरा लरजता आत्मविश्वास जाग्रत सा होने लगा।
‘‘इट्स गैटिंग डेन्जरस’’ उसकी भंगिमा पूर्ववत पथरीली थी।
‘‘व्हाट ? व्हाट हैपन्ड! क्या हुआ ?’’
‘‘इसने स्कूल में खुद को मारने की कोशिश की ...’’
‘‘अच्छा, कैसे?’’बढ़ती बदहवासी तले मेरा तेवर तटस्थ होने लगा।
‘‘पैन की नोंक चुभाकर ...’’
मेरे चेहरे से जब जिज्ञासा सूखकर बदरंग हो गयी तो उसने अलापना शुरू कर दिया ... इतनी तो अच्छी टीचर है वह इसकी ... कैमिस्ट्री की मिस उमा पॉल बर्नीस। यूपीबी। कुछ दिन पहले तक वह इसकी फेवरेट थी। अब इसकी दुश्मन हो गयी है। और होगी क्यों नहीं? दो-चार बिगड़ैल लड़कियों के साथ पीछे की सीटों पर बैठकर ये गन्दी-गन्दी पर्चियाँ पास करते थे। आज टीचर ने पकड़ लिया। सबसे ज्यादा इसकी लिखावट में मिलीं ! मैंने खुद अपनी आंखों से देखी हैं। टीचर का नाम ‘अगली पगली बिच’ कर रखा था। बतौज सजा़ इसे क्लास के बाहर पाँच मिनट खड़ा कर दिया। दो और लड़कियाँ थीं । कौन बर्दाश्त करता ? इसमें इसे बड़ी हेठी लगी। बस, अन्दर आने के बाद अपनी हथेली पंक्चर कर ली। डेस्क पर खून की धार गिरी तो हल्ला मचा। मिस बर्नीस घबरा गई और मुझे फोन करके बुलवाया। मैंने टीचर से माफी मांगी और रियायत मांगकर इसे घर ले आयी। घबरायी हुई थी या क्या मगर इसका शरीर तप रहा था सो मैंने एक क्रोशिन देकर सुला दिया। तब से ही सोई पड़ी है। तुम मत कुछ कहना।
अवसन्न सा होकर मैं मीरा को देखता हूं। उसके होंठ खुश्क हुए जा रहे थे। पिछले दिनों लगातार तनावग्रस्त रहने से उसके भीतर का सब कुछ निचुड़ सा गया है। कब से वह खुलकर नहीं हंसी होगी। कभी ये तो कभी वो, कोई न कोई पचड़ा लगा रहता है। इस हालत में वह बोतल से जल्दी जल्दी पानी के घूंट ऐसे निगलती है कि लगता है बोतल डरावनी हिचकियाँ ले रही है। एक बोझिल अवसाद किसी घुलनशील द्रव्य की तरह उसकी शिराओं में उतर गया लगता है। हम दोनों के बीच इन दिनों एक मृतप्राय निष्क्रियता घर किए बैठी रहती है।
मुझे पता है कि इस समय उसका मनोबल बढ़ाते हुए मैंने उसे सहला सा दिया तो वह ढहने लग पड़ेगी।
इसलिए ऊपरी तौर पर ही उकसाता हूं।
‘‘इन टीचर्स को तो बात का बतंगड़ करने में मज़ा आता है। मां-बाप की परेड निकालने में चुस्की लगती है। इसकी उम्र के सारे बच्चे शरारती होते हैं और जो नहीं होते है तो उन्हें डॉक्टर को दिखाना चाहिए। रैदर दैन बीइंग ए स्पोर्ट दे आर देअर ऑनली टू किल द फ्लैम-बॉएंस ऑफ चिल्ड्रन। और ये सब उस स्कूल का हाल है व्हिच इज़ सपोज्ड टू बी अमंग द बेस्ट इन मुम्बई। पिटी।
बाइ द वे, आज डिनर में क्या है ?’’
गृहस्थी का मेरा यह पंद्रह साल का अनुभव है कि खाने-पीने के स्तर पर उतरते ही बहुत सारे छुटपुट मसले अपने आप हवा हो जाते हैं।
मगर मेरे इस प्रोप-अप से वह किंचित और जड़वत हो जाती है और पास में रखी समीरा की नोटबुक का आखिरी पन्ना खोलकर मेरी तरफ बढ़ा देती है।
व्हाट !
सुसाइड नोट !!
एक सदमा किसी संगीन सा मुझमें खूब गया है।
आधा भरा हुआ पेज। उपनाम सहित ऊपर एक तरफ लिखा हुआ पूरा नाम। दूसरे कोने में साल सहित लिखी जन्मतिथि। उसके समांतर ठीक नीचे डेट ऑफ डैथ, जिसके सामने हाइफन लगाकर सिर्फ वर्ष लिखा है - वही जो चल रहा है। बस, ‘फैसले’ के दिन की तारीख भरी जानी है। दो-तीन जगह शब्दों की मामूली काटपीट वर्ना सब कुछ एक उम्दा कम्पोजीशन की तरह सोच समझकर लिखा गया पर्चाः
मैं जीना चाहती थी। मैंने कोशिश भी करी मगर मैं हार गई। क्या फायदा ऐसे जीकर जिसमें आप अपनी मर्जी से जी नहीं सकते। मेरे पापा को तो कभी मुझसे जादा मतलब रहा नहीं। मम्मी भी वैसी हो गई है। सेल्फ ऑबसैस्ड। दोनों को मेरी किसी खुसी से मतलब नहीं। मोबाइल तक छीन लिया। मैं दोस्तों के यहाँ स्लीप-ओवर के लिए नहीं जा सकती हूं। उन सबको कितनी फ्रीडम है। मुझे तो बस पढ़ाई-पढ़ाई करनी होती है। पढ़ाई से मुझे चिढ़ है। मगर किसी को उसकी परवा नहीं। मैं जानती हूं कि ये सब जान लेने की पूरी वजह नहीं है मगर मेरे पास जीने की भी तो वजह नहीं है। अनामिका, यू आर माई BFF। आई विल मिस कास्पर।
पढ़ते पढ़ते मेरे भीतर हाहाकार मचता एक दृश्य उभर रहा है ... पहले उसके कमरे के दरवाजे पर समीरा समीरा नाम की घनघोर तड़ातड़ थापें, फिर पूरी वहशत के साथ दरवाजे को धक्के से तोड़ना, बिस्तर के पास औंधी पड़ी कुर्सी, कमरे के बीचों बीच सीलिंग फैन से स्थिर लटका उसका कोमल बेजान शरीर, बेकाबू होकर सिर पटकती दहाड़ मारती मीरा, मिलने वालों का जमघट, ... पुलिस… पोस्टमार्टम ...
‘‘ड्राफ्टिंग तो अच्छी है ... कितनी कम गलती हैं’’
एक चुहुल के साथ जैसे मैं उस भयानक दुःस्वप्न से उबरने की चेष्टा करता हूं। सहारे के लिए मीरा की तरफ फीकी मुस्कान छोड़ता हूं मगर सब बेअसर।
उसकी आँखों में एक गहरा निष्ठुर अजनबीपन तिर आया है। जीवन के हासिल को जैसे कोई बेधमके चट कर गया हो। किसी पहाड़ी ढलान से उतरती गाड़ी के जैसे ब्रेक फेल हो गए हों और सामने एक डरावने, चिंघाड़ते अंधेरे के सिवा कुछ बचा ही न हो ...क्या कोई जीवन इतनी बेवजह,कोई चेतावनी या मौका दिये बगैर इतनी आसानी से नष्ट किया जा सकता है? और क्यों ...?
‘‘सारी टीचर्स और क्लास को इसने डिक्लेयर कर रखा है इसके बारे में ... ’’
वह अपनी मुदर्नी के भीतर से किसी कड़वे गिले की उल्टी करने को हो आई है।
मेरी बोलती बन्द है।
‘‘जिस रोज़ तुमने इसका मोबाइल लिया था उस रात भी इसने किचिन में कलाई काटने की कोशिश की थी जिसे सेब काटते वक्त लगे कट का नाम दे दिया ...’’
उसका अवसाद किसी आवेग मिश्रित उबाल की शक्ल लेने को है।
‘‘आई डोंट बिलीव दिस ... ऐसा कैसे हो सकता है ...’’
पहली दफा मैं मामले की संगीनियत महसूस कर रहा हूं ... सामने कोंचते मनहूस घिनौने तथ्यों के कारण भी और अपने यकीन के बेसहारा और तिलमिलाकर अपदस्थ होने के कारण भी।
‘‘हाथ कंगन को आरसी क्या’’ अधूरा मुहावरा कहकर वह मुझे सोती पड़ी समीरा के पास ले जाती है और हथेली को हौले से खोलकर वह बिन्दु दिखाती है जो एक बुजदिल कोशिश का सरासर प्रमाण है।
यानी उस नामालूम रोज़ - और आज नीमरोज़ - यह हुआ नहीं मगर बा-खूब हो सकता था कि आप अपने जीवन की चकरघिन्नी में शामिल होने के लिए आदतन अल्साए उठते और ‘ब्लैड टू डैथ’ जैसे डॉक्टरी निष्कर्ष तले जिन्दगी भर के लिए हाथ मलते रह जाते।
गॉश!
‘‘मैं पता करके एक काउंसलर से आज मिल भी आई। उसके मुताबिक मामला सीरियस है। हम कोई और चांस नहीं ले सकते हैं ...’’
यानी जो चीज पहले टल गयी, आज टल गई, वह हो सकता है कल न टल पाए!
मैं एक आवेग से भर उठता हूं।
‘‘कोई मुझे बताए तो सही कि हम क्या जुल्म करते हैं इस पर ! स्कूल के दिनों को छोड़ मैडम अपनी मर्जी से दोपहर तक उठती हैं। रात को सोने से पहले ब्रश करना आज तक गवारा नहीं हुआ है। नतीजा, हर महीने दाँतों में कोई न कोई कैविटी लगानी-बदलवानी पड़ती है। उठते ही नैट और फेसबुक। मोबाइल तक में फेसबुक एलर्ट्स हैं। पहले बास्केटबॉल या साइकिलिंग तो कर लेती थी लेकिन अब वह भी नहीं। गेम्स के नाम पर नैट या फिर रोडीज़। हर किताब और खाना बोरिंग लगता है। टॉयलेट जाने का कोई नियम-क्रम आज तक नहीं बना। मैं तो कहता हूं वह सब भी ठीक है। कर लो। मगर यह क्या कि स्कूल के जर्नल तक को पूरा करने की फुर्सत नहीं है आपको। फिसड्डी होते चलने जाने का अफसोस तो दूर, अहसास तक नहीं है। एक हमारा टाइम था जब हमारे बाप को ये तक पता नहीं होता था कि पढ़ कौन सी क्लास में रहे हैं ... सबजैक्ट्स क्या ले रखे हैं ...’’
‘‘सत्या, प्लीज। डोंट गैट इनटू दैट। तुम अपने टाइम से औरों को जज (मतलब हाँकने से है) नहीं कर सकते...’’
वह अपनी पस्त मानसिकता में रहते हुए भी एक परिचित गर्म नश्तर मेरे पनपते गुस्से पर रख देती है। वैसे सही बात तो यह है कि समीरा को लेकर जितनी दौड़-भाग, मेहनत-मशक्कत वह करती है, मैं नहीं। परिवार बड़ा था इसलिए बंटवारे में जो हिस्सा मिला उससे अपनी स्वतंत्र जिन्दगी नहीं चल सकती थी इसलिए अपना काम शुरू किया। काम एकदम नया। अनिलिस्टिड कंपनियों के शेयर बेचने का ... वे जो दसियों बरस से धन्धा तो कर रही हैं मगर जिनकी बेलैंस शीट को देखकर बैंकों और आम निवेशकों के मुंह में पानी नहीं आता है ... जो अपने ईवेंट मैनेजेर अफोर्ड नहीं कर सकती हैं ... कोई उड़ीसा में बॉक्साइट का उत्खनन करती है तो कोई उत्तरांचल में छोटे स्तर पर पन बिजली बना रही है। ज्यादातर कैश स्टार्व्ड इकाइयाँ। बड़ा काम नहीं है मगर आज बाँद्रा में सिर ढंकने को अपनी छत है। रात का खाना रोज़ घर पर होता है। किसके लिए किया यह सब? स्टेट बैंक की चाकरी में या तो मेनेजरी में फंसा रहता या आए रोज ‘रूरल’ कर रहा होता। मीरा क्या जानती नहीं है यह सब। बैंकों के डेबिट-क्रेडिट में चौदह साल खटाए हैं उसने। तीन साल पहले वी आर एस लिया ... कि समीरा पर पूरा ध्यान देगी। दिया भी खूब। कभी अलां-फलां कम्पाउंड की वेलेंसी निकालने का तरीका समझ-समझा रही है तो कभी फैक्टराइजेशन में जान झोंके पड़ी हैं; कभी ऑस्ट्रेलिया में होने वाली बारिश और मिट्टी के वर्गीकरण की सफाई कर रही है तो कभी सवाना की जलवायु को फींच रही होती है।
‘‘अपने टाइम से जज नहीं करूँ तो क्या इसके टाइम से जज करूँ ? गाँव देहात तक के बच्चे एक से एक इंजीनियरिंग-मैनेजमेंट में जा रहे हैं, बिना किसी खानदानी सहारे के नौजवान लड़की-लड़के एक-एक विचार को तकनीकी में पिरोकर नए-नए उद्यम खड़ा कर दे रहे हैं ... बिना मेहनत के हो रहा है यह सब ... बिल गेट्स और आइंसटीन की नजीरों से सांत्वना लेनी है तो बस यही कि उन्होंने भी अपने स्कूलों में कोई किला फतह नहीं किया ... हद है ...’’
‘‘सत्या लिसिन’’ जरा रूक वह फिर बोली ‘‘अभी यह सब कहने सोचने का वक्त नहीं है। अभी तो हमें बस यह देखना है कि कैसे यह रास्ते पर आ जाए ... आए रोज़ तरह-तरह की खबरें पढ़कर आजकल मेरा तो कलेजा बैठने लगा है’’
मुझे अपनी गलती का अहसास होता है।
कितने कम लफ्जों के सहारे दर्द और परवाह अपने गंतव्य पर जा लगते हैं!
कल-परसों ही तो खबर थी ... भारत में खुदकुशी करने वाले बच्चों-विद्यार्थियों की तादाद पिछले पाँच बरसों में दो गुनी हो गयी है। अकेली मुम्बई में हर वर्ष सौ से ज्यादा स्कूली बच्चे अपनी जान ले लेते हैं। किसी विषय या क्लास में नहीं हुए पास तो जीवन समाप्त! डेढ़ करोड़ की आबादी के महानगर में सौ की संख्या मायने न रखती हो मगर सोचो,सौ से ज्यादा परिवारों पर हर वर्ष क्या बीतती होगी? भोली,खिलखिलाती मासूम तस्वीरों के नीचे अखबार के श्रद्धांजली वाले पन्ने पर, कैसी टीस भरती, हाथ मलती ऋचाएं सिरायी जाती है! कैसे अनवर्त्य(इर्रिवरसिबल) ढंग से कुछ जिन्दगियाँ हमेशा के लिए बदल जाती हैं! आसमान तोड़ आर्तनादों को भी सांख्यकी कितनी अन्यमनस्कता से अनसुना रख छोड़ती है!
क्या हम भी उन्हीं में शामिल होने की कगार पर हैं?
मैं समीरा के पास जाकर हौले से लेट जाता हूं। कुछ बरस पहले उसे लुभाने का मेरे पास एक रामबाण था - उसकी कमर खुजला कर।
‘‘पापा खुजली नहीं हो रही थी ... आप करने लगे तो होने लगी। क्यों ?’’ किसी सुकून से लबरेज़ होकर वह कह उठती ।
‘‘ये पापा का जादू है’’
किसी अपने को सुख देना भी कितना सुख देता है।
‘‘बताओ ना पापा, क्यों ?’’
‘‘अरे तुम ‘टेल मी व्हाई’ में देख लेना .... इट्स पापाज़़ मैजिक ...’’
ऐसी कौतुक जीतें मुझे वास्तविक आह्लाद से भर जातीं।
मगर इन दिनों उसके ऊपर मनुहार का हाथ भी मैं तभी रख पाता हूं जब वह बेसुध सो रही हो वर्ना नीमहोशी में भी वह ‘‘पापा डोंट इर्रिटेट मी’’ की चीख से मुझे दफा़ कर देती है।
आज भी कर दिया।
मगर उसकी दुत्कार को जज्ब़ करने के मेरे नजरिए में फर्क़ था।
थोड़ी देर बाद वह उठती है और बिना कुछ बोले बाहर सोफे पर जाकर लेट जाती है।
मैं मीरा से उसकी पसन्द के सारे वाहियात खाने-नूडल्स-बर्गर वगैरा बनाने की ताकी़द करता हूं।
मीरा ने पहले ही पास्ता बना रखा है। 

** **

हम दोनों मनोचिकित्सक डॉक्टर अशोक बैंकर के केबिन के बाहर इन्तजार में बैठे हैं। समीरा केबिन के अन्दर है। हम तीनों को साथ अन्दर देखकर शायद वे भाँप गए थे कि मामला क्या है।क्या सचमुच?
‘‘समीरा ... आह, योर नेम इज सो लवली ... लाइक यू ... किसने रखा ?“ मुस्कान छिड़कते हुए वे चहके।
‘‘मम्मा ने’’ समीरा सकुचाते हुए फुसफुसाती है।
‘‘सिर्फ मम्मा ने ... पापा ने नहीं’’ जोश के साथ वे हाजिर जवाबी दिखाते हैं। अस्पताल में घुसने और एपॉइंटमेंट के बावजूद इन्तजार करने से आ चिपकी ऊबासी को उन्होंने मिलते ही झाड़-पोंछ़ दिया ... जैसे किसी छतनार वृक्ष के नीचे से गुजरते हुए भी ठंडक महसूस होती है। निमिष भर को मुझे इसकी पैदाइश के बाद का वह वक्त याद आता है जब हमने उन साझे मार्मिक पलों में अपने नामों, ‘सत्य’ और ‘मीरा’, की सहज संधि से इसका नाम ‘समीरा’ सृजित कर लिया था।
‘‘दूसरे का अब क्या नाम रखेंगे ?’’
मैंने मीरा की तरफ कौतुक प्रस्ताव रखा।
‘‘ना बाबा, ना। एक बच्चा बहुत है।’’
शायद सिजेरियन के टांके अभी हरे थे।
लेकिन समीरा के तीन बरस का होते-होते हमने तय कर लिया था कि दूसरा बच्चा नहीं करेंगे। जो है उसी को अपना सब कुछ देंगे।
उस फैसले पर कभी पुनर्विचार नहीं किया।
हां, कभी इन दिनों ये जरूर लगता है कि एक बच्चा ही दूसरे बच्चे की कंपनी होता है। एक भली चंगी बच्ची अचानक घुन्ना हो जाए, पढ़ाई-लिखाई पर तवज्जो़ देने की बजाय इन तथाकथित सोशल नैटवर्किंग साइट्स की गिरफ्त में पड़ जाए और माँ-बाप कुछ कहें तो सीधे खुदकुशी का रास्ता पकड़े तो इससे ज्यादा कम्युनिकेशन गैप और क्या होगा?
खैर, अब जो भी है, जैसा भी है, संभालना है।
एक अच्छे और नामी डॉक्टर की साख में खुशमिज़ाजी कम बड़ी भूमिका नहीं अदा करती होगी।
‘‘ओके। तो समीरा, मुझे वे तीन कारण बताओ ताकि मैं तुम्हारे मम्मी-पापा को शूट कर सकूं?’’ नाटकीय गम्भीरता से वे उससे पूछते हैं।साथ में तीन उंगलियों से संकेतार्थ पिस्तौल सी चलाते हैं।
समीरा समेत हम सबके चेहरे खिल उठते हैं।
‘‘तीन कारण, एक, दो और तीन। बताओ बताओ’’ पहले समीरा कुछ हंसकर रह गयी थी, जवाब नहीं दिया था इसलिए वे उससे बजिद उगलवाने सा लगे।
‘‘मेरा मोबाइल ले लिया’’
साहस और संजीदगी से वह पहला कारण बताती है।
‘‘ये एक हो गया। जोशीजी यह आपको नहीं करना चाहिए था। मोबाइल तो इन दिनों जरूरी खिलौना है।’’
शायद पेशेगत रणनीति के अन्तर्गत उन्होंने निशाना साधते हुए जोड़ा।
‘‘लिया नहीं डॉक साब, बस रात को अलग रखने को कहा है’’
मैं बड़े ताव से अपनी बात कहता हूं - जैसे कोई फै़मिली कोर्ट लगी हो।
‘‘मगर क्यों?’’ वे जोर देकर कहते हैं, मानो समीरा के पेरोकार हों।
समीरा के चेहरे पर एक मीठी जीत उभर आई है।
‘‘क्योंकि यह देर रात तक बीबीएम पर रहती है’’
‘‘ब्लैकबैरी है इसके पास ?“ वे थोड़ा चौंककर पूछते हैं। उसके विज्ञापन ‘‘इट्स नॉट ए फोन, इट्स व्हाट यू आर’’ का असर दिख रहा है।
‘‘क्या करते? इसकी जिद थी ... कि सारे फ्रैंड्स के पास है।’’
मेरी मजबूरी की अनसुना करते हुए वे फिर समीरा की तरफ हो लिए।
‘‘ये तो बड़ी अच्छी बात है। मैं भी बीबीएम पर हूं। इट्स ए ग्रेट फैसिलिटी। मैं तुम्हें अपना पिन दे दूंगा समीरा। विल यू बीबीएम मी ?’’
मित्र होते जा रहे डॉक्टर की बात का वह हामी में गर्दन हिलाकर जवाब देती है।
‘‘सो, दैट्स वन, समीरा ... टैल मी टू अदर रीजन्स टू शूट दैम...’'
इस पर समीरा की पुतलियाँ संकोच में हमारी तरफ घूमकर लौट जाती हैं।
डॉक्टर बैंकर ने बाका़यदा लक्ष्य किया।
‘‘मैं और समीरा जरा अकेले बतियाएंगे ... इफ यू डोंट माइंड ...’’ उन्होंने इरादतन हमें बाहर जाने का इशारा किया।
‘‘जरूर जरूर’’ कहकर मीरा और मैं बाहर आ गए।
बाहर डॉक्टर बैंकर से मिलने वाले मरीजों की अच्छी खासी कतार है। साइकैट्रिक वार्ड रूप-रस-गंध हर लिहाज से दूसरों से कितना अलग होता है। हमारे बाद नौ-दस लोग और होंगे। शाम के सात बज रहे हैं। चमकती आँखोंवाली जो अधेड़ औरत हमसे पहले अन्दर गयी थी - वही जो साथ आए पुरूष के साथ तगड़ी बहस करने में लगी थी - पूरे पौने घन्टे के बाद बाहर निकली। इस हिसाब से तो डॉक्टर को घर जाने में ग्यारह बजेंगे। इस इलाके में जल्दी नहीं चलेगी। एक चालीस छूती गृहस्थिन है, थोड़ी थुलथल, स्लीब-लैस में, खासी ग्लॉसी लिपिस्टिक पोते। चेहरे की हवाइयाँ सी उड़ी हुई एक आधुनिक सी युवती है - गोरी, पतली, थ्री-फोर्थ चिपकाए, कई जगह से कान छिदाए। एक अपेक्षाकृत निम्न मध्यवर्गीय जोड़ा है। इन्हें भी यहां आना पड़ गया? कतार में बच्चा सिर्फ एक और है, अपने पिता के साथ। होगा कोई चक्कर। पहले साइकैट्रिस्ट के पास जाने का मतलब था पागलपन का इलाज़ कराना। अब तो चीजें बदल रहीं हैं हालाँकि एक बेनाम पोशीदगी अभी भी खूब भटकती फिरती है। उस दिन कोई बता रहा था कि मेडिसन में इन दिनों साइकैट्री और न्यूरोलॉजी टॉप पर चल रही हैं। अमरीका में तो सबसे ज्यादा मांग इन्हीं लोगों की है।
‘‘तुमसे तो यह पहले काफी बातें कर लेती थी, अब नहीं करती है’’ मैं थोड़ा ऊंघते हुए मीरा की तरफ एक बात सी रखता हूं।
वह ‘हूं’ सा कुछ कहती है।
मतलब,किसी गैर-जरूरी से सवाल का क्या जवाब देना !
हो सकता है उस माहौल को देखकर उसके भीतर कोई उधेड़बुन शुरू हो गई हो।
‘‘टीचर्स को हमें पहले बताना चाहिए था। मुझे लगता है पेज-थ्री वाले परिवारों के बच्चों की संगत का असर है। अपने बिगड़ैल माँ-बाप की तरह वे भी बड़े ऐबखोर होते हैं…गंदगी को इतनी नज़दीकी से रोज़ जो देखते हैं…दोस्तों के बीच उनके बच्चे मॉं-बाप को ‘दैट वोमेन-दैट मैन’जैसा कहकर बात करते जरा़ नहीं हिचकते हैं…’’
वह फिर चुप रहती है।
अरे, ऐसा क्या हो गया अभी?
मक्खी मारता सा मैं अपनी नजर सामने टंगे टीवी पर लगाता हूं जिस पर सत्तर के दशक की कोई हिन्दी फिल्म चल रही है ... लाकेट, कार रेस, बेलबॉटम और मल्टी हीरो-हीरोइनें। एक अन्तराल के बाद स्मृति के रास्ते साधारण चीजें भी कैसा चुम्बकीय आकर्षण फेंकने लगती हैं। क्या इसी को साधारणता का रोमांस कहेंगे ... एक ऐसी साधारणता जिसमें ऐसी दुर्निवार जटिलताएं नदारद कि... अपने ज़रा से बच्चे से आप खुलकर बात तक न कर पाएं ... उसे लेकर आप सोचते रहते हैं, रणनीति बनाते हैं, परेशान होते रहते हैं मगर कर कुछ नहीं पा रहे होते हैं।उसकी हर नाकाबिले-बरदाश्त चीज़ को सहनीय मान लेते हैं…किसी अपने के साथ एक लाचार दूरी के निर्वात में फंसना कैसा दमघोंटू होता है!
कुछ देर बाद मुस्कराते हुए समीरा बाहर निकली और हमें अन्दर जाने का इशारा किया। दरवाजा भेड़कर संभलते हुए हम डॉक्टर के सामने बैठे और धड़कती उतावली में वस्तुस्थिति जाननी चाही।
‘‘इट्स प्रैटी बैड !’’उन्होंने खासे रूखेपन के साथ कोई तमाचा सा जड़ दिया।
‘‘पता नहीं डॉकसाब। दो साल पहले तक तो सब ठीक-ठाक था उसके बाद इसके रवैए में बहुत बदलाव आ गया...’’
‘‘अरे मैं कुछ पूछ रहा हूं और आप कुछ और बता रहे हैं’’ उन्होंने टोका।
लगा, जैसे ईशान अवस्थी (तारे जमीन पर) के पिता के बतौर में निकम सर से मुखातिब हो गया हूं।
‘‘ऐसा तो कुछ नहीं हुआ कि इसे वह सब करना पड़े जो यह करने की धमकी देती है’’ मीरा ने शाइस्तगी से बात जोड़ी।
‘‘देखिए मिसेज जोशी, यह तो सोचने -सोचने की बात है। जो बच्चे वैसा करते हैं, उनके माँ-बाप भी अपनी निगाह में वैसा कुछ नहीं करते-कहते कि बच्चे को वह कदम उठाना पड़े जो वह उठा लेता है ...’’
उनकी बात से हामी भरते हुए हम चुप बने रहे।
‘‘कल के अलावा पहले भी यह तीन बार कोशिश कर चुकी है’’
‘‘तीन !’’
हम दोनों विस्मय से काँप उठते हैं। एक संभावित त्रासदी से ज्यादा उसके जीवन से बेदखल और फिजू़ल होते अपने जीवन की त्रासदी से।दिन-रात उसकी खुशी के लिए खा़क होते हम जैसे कुछ नहीं…एक अनजान डॉक्टर ज्यादा भरोसेमंद हो गया। चलो,ये भी ठीक!
‘‘हाँ, तीन बार। लेकिन आप लोग उससे इस बाबत कोई बात नहीं करेंगे - अगर उसका भला चाहते हैं तो।‘’ उनके लहजे में संगीन हिदायत है। ‘तो’ को उन्होंने जोर देकर स्पष्ट किया।
‘‘नहीं करेंगे ... लेकिन डॉकसाब हम क्या करें ? पूरी छूट दे रखी है। शायद थोड़ी कम देते तो यह नौबत न आती। इंग्लिश म्यूजि़क, रोडीज़ और फेसबुक की यह ऐसी एडिक्ट हो गयी है कि पढ़ना-लिखना तो छोडिए़ खाना-पीना तक नैगलैक्ट करती है। एक बात नहीं सुनती’’
‘‘नथिंग अनयुज्अल इन दैट’’ वे किसी परमज्ञानी की तरह मेरा मंतव्य समझकर मुझे रोकते हैं और कहते हैं ‘‘टैक्नोलॉजी ने हमारे समाज में इन दिनों बड़ा तहस-नहस मचाया हुआ है। आप और हम इस संक्रामक बीमारी से बचे हुए हैं तो अपनी नाकाबलियत के कारण। ये लोग जिन्हें हम यंग अडल्ट्स कहते हैं, बहुत सक्षम हैं ... ये टैक्नोलॉजी की हर सम्भावनओं को छूना चाहते हैं ... बिना ये जाने-समझे कि उससे क्या होगा। आपकी बच्ची अलग नहीं है। मेरे पास आने वाले दस टीनेज़ पेशेन्ट्स में से आठ इसी से मिले-जुले होते हैं ... ’’
‘‘क्या करें डॉक्साब ? मिडिल क्लास लोग हैं हम ... लड़की का अपने पैरों पर खड़े होना कितना जरूरी है ...’’ एक तबील अनकही के बीच हाँफता सा मैं जैसे अपनी चिंताओं का अर्क उन्हें सौंपने लगता हूं।
‘‘नॉट टू वरी जोशी जी। ये बिल्कुल ठीक हो जाएगी। शी विल बी ऑलराइट शार्टली’’ हमें उबारते हुए वे अपने लैटर हैड पर फ्लूडैक (फ्लैक्सोटिन) का प्रैशक्रिप्शन लिखते हैं जिसे दोपहर खाने के बाद लेना है। थायोराइड सहित दो-चार टैस्ट कराने होंगे और एक काउंसलर, कोई तनाज़ पार्डीवाला, का मोबाइल नम्बर लिखते हैं। हमारे भीतर उगते शंकालु भावों को भाँपते हुए वे कहते हैं ... द सिरप इज जस्ट ए मूड एलिवेटर ... आजकल इस उम्र के बच्चों में विटामिन डी थ्री की कमी बहुत हो रही है ... टीवी-कंप्यूटर पर लगे रहने से…आई जस्ट वांट टू रूल आउट दैट ... पार्डीवाला बहुत अच्छी साइकोथेरेपिस्ट है। उन्होंने बताया कि वे समीरा के फेसबुक फ्रैंड बनने वाले हैं ... टू पीप इनटू हर रीयल माइंडसैट ... बीबीएम है ही ... ।
हमारा दिल अचानक आश्वस्त होने लगा है, मियां की जूती मियाँ के सिर वाले अन्दाज में। तभी उन्होंने बाहर बैठी समीरा को अन्दर बुलाया और बात का सन्दर्भ और लहजा बदल कर घोषणा सी करते बोले ‘‘एक्चुअली, समीरा बहुत टेलेंटिड लड़की है, और बेहद स्वीट भी “ उन्होंने अपनी बात यूं रखी मानो अभी तक की जा रही हमारी गुफ्तगू का वह लब्बोलुआब हो। मैं उनकी जादुई हौसला अफ़जाई का असर देख रहा हूं।
‘‘शी इज ए जैम डॉक्साब बट…’’ बैंकर की राय के समर्थन में परंतुक खोंपते ही मीरा का गला भर्रा उठा और फौरन से पेश्तर वह फफक भी पड़ी। मैं हक्का-बक्का था मगर समीरा ने लपककर उसे पकड़ लिया और कातर मासूमियत से धीमे से बोली ‘‘मम्मा, क्या हुआ?’’
गनीमत रही कि मीरा ने खुद को बिखरने नहीं दिया। 

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ये जो दुनिया है, वही जिसे हम रोज़ गाली देते हैं, दरअसल उतनी खराब है नहीं जितनी हम कभी सोचने लगते हैं। पता लगा कि पार्डीवाला और डॉक्टर बैंकर दोनों समीरा की फेसबुक पर हैं। आपस में बीबीएम करते रहते हैं। यानी वही सब जिसने एक बीमारी की तरह समीरा को घेर रखा था, उसके ओनों-कोनों में झांकने की पगडंडियाँ बने हुए हैं। किसी आम अविवाहित पारसी की तरह पार्डीवाला थोड़ी खब्ती लगती है लेकिन अपने काम में है बड़ी पेशेवर। पहले मीरा से एक के बाद एक ई-मेल लिखवाए, कुछ बिन्दुओं पर स्पष्टीकरण लिए। पूरी जन्मपत्री चाहिए थी उसे समीरा की ... कब कहाँ कैसे पैदा हुई, नॉर्मल या सिजेरियन, गर्भकाल कैसा था, समीरा की पसन्द-नापसन्द, एनी हिस्ट्री ऑफ डिप्रेशन इन फैमिली,परिवार में किसके साथ अटैच्ड है, दादा-दादी, नाना-नानी, बुआ-मौसी के साथ कितनी घुली-मिली है, एनी नोन एपिसोड ऑफ एब्यूज, दोस्त कौन हैं, उनके परिवार और मां-पिता की मुख्तसर जानकारी, हमारा किन लोगों के साथ उठना-बैठना रहता है, पिता के बिजनैस की स्थिति और उसमें आते उतार-चढ़ाव ...।यानी उसे एक से एक जरूरी-गैर-जरूरी तफसील चाहिए थी। कभी तो लगा कि तफसीलों के अंबार में कुछ इस्तेमाल भी होगा या यह सब उलझाने और टाइम-पास करने के लिए है। कहीं पढ़ा था मैंने कि समस्या के बारे में बोल-बतियाकर उससे आधी निजात तो आप वैसे ही पा लेते हैं।
यहां पता नहीं क्या चल रहा है ?
खैर, कर भी क्या सकते हैं!
पार्डीवाला खूब बहुरूपनी है। समीरा के साथ छह सात सेशन कर चुकी है। क्या होता है उन दोनों के बीच वह न समीरा हमें बताती है और न पार्डीवाला। समीरा उसके पास से लौटकर बड़ी खुशी दिखती है। बीबीएम से ही एपॉइन्टमैंट होता है और समीरा को वहाँ छुड़वा दिया जाता है। होमवर्क के तौर पर समीरा को ई-मेल भेजने होते हैं जिनकी विषय-वस्तु से हमें कोई सरोकार नहीं रखना होता है। यहाँ तक तो ठीक है मगर अब यही बात मीरा और पार्डीवाला के बीच चल रहे संचारण पर भी लागू होने लगी है। डॉ. बैंकर और पार्डीवाला समीरा से जुड़ी बातों को लेकर तब्सरा करते रहते हैं। आख़िर हम सबका मकसद तो वही है। समीरा की हालत में कथित तौर पर सुधार हो रहा है हालाँकि आदत से मजबूर मैं रात को उठकर समीरा के कमरे में झाँक लेता हूं कि ठीक-ठाक सो तो रही है या कुछ ... । वैसे इसके मायने क्या समझे जाएं कि मैं उसके साथ ज्यादा क्या, बिल्कुल भी टोका-टाकी न करूँ!
‘‘बिगड़ने दूं’’ तक का भी जवाब सपाट ‘‘हाँ’’ है।
मामला नाजुक है। सब्र से काम लेना पड़ेगा। 

** **

उतरती दोपहरी को कुछ अप्रवासी निवेशकों के साथ एक कंपनी की विस्तार योजनाओं पर मशवरा कर रहा था कि डॉक्टर बैंकर के फोन को देखकर चौंक पड़ा।
दो महीने के वकफे में मेरा फोन शायद उन्होंने पहली बार बजाया था।
‘‘सत्यपाल जी, आप शाम को छह बजे आ सकते हैं मेरे पास?’’ इधर-उधर की कोई बात किए बगैर उन्होंने पूछा।
‘‘जरूर डॉकसाब जरूर ... मगर आज छह बजे तो समीरा की डांस क्लास है’’
‘‘आई नो दैट। मगर सिर्फ आपको आना है। मीराजी की भी जरूरत नहीं है। ओके ।’’
डॉक्टरों की यह पेशेवर इन्सानियत वाली अदा मुझे अच्छी लगती है। उनके सुलूक में आपको कभी रूखेपन की बू आ सकती है मगर अमलन वे आपकी समस्या को संबोधित रहते हैं। यह नहीं कि किसी राहगीर की तरह ऊपर-ऊपर से हमदर्दी के आँसू बहा लो मगर करो कुछ नहीं और चलते बनो। कॉलिज में जब पढ़ता था तो इस थीम के आसपास किसी यूरोपियन लेखक की किताब भी पढ़ी थी। अब तो कंपनियों के ट्रायल बैलेंस और फायनैंशियल्स ही पढ़ता हूं। मुझे तो डॉक्टर बैंकर का काम बड़ा पसन्द है। समीरा भी उनके साथ ऐसी हिल-मिल गई है कि एक दिन अपनी मम्मी से पूछ रही थी कि साइकैट्रिस्ट बनने के लिए क्या करना पड़ता है। जब उसने बताया तो उसने कहा कि इससे अच्छा तो फिर कांउसलर बनना है - काम वही और मेहनत कम। जो भी है, कम से कम कुछ तो अब वह सोचने लगी है ... कि क्या करना है ... या यह कि कुछ करना भी चाहिए …वर्ना अभी तो हमें उसके बारे में सोचना तक गुनाह था। हमारी किसी भी सीख-तज़वीज़ पर जब देखो तब ‘चिल’ कहकर पल्लू झाड़ लेती है।
यही सब सोचते हुए जब डॉक्टर बैंकर के यहाँ पहुंचा तो सुखद आश्चर्य यही लगा कि ज्यादा भीड़ नहीं थी। उनकी रिसेप्शनिस्ट ने ‘अब’ और ‘अभी’ के बम्बइया गठजोड़ से बने ‘अबी’ का तड़का मारते हुए बताया कि डॉकसाब मुझे याद कर रहे थे।
उनके सामने पेश होते ही उनके मुस्कुराते चेहरे को देख मेरे भीतर किसी गुप्त ऊर्जा का संचरण हो गया।
‘‘कैसे हैं जोशी जी ?’’
प्लास्टिक की पतली सी फाइल में पाँच-सात कागजों को रखते हुए उन्होंने पूछा।
‘‘अच्छा हूं डॉक्साब’’
‘‘समीरा कैसी है ?’’
‘‘कहीं बेहतर ... वैसे आप ज्यादा जानते होंगे’’ मैं डरते-सकुचाते मामले को उन्हीं की तरफ बढा़ देता हूं।
‘‘आई थिंक शी इज़ रेस्पोंडिंग वैल ... बट व्हाट ए सेंसिटिव चाइल्ड शी इज़ ...’’
‘‘ ’’ मैं थोड़ा चकराया।
“दो साल पहले आपका बिजनेस कैसा चल रहा था मिस्टर जोशी?’’ वे सशंकित भाव से लफ्जों को चबा-चबाकर बोलने लगे।
‘‘ठीक ही था ... ग्लोबल मैल्टडाउन का दौर था सो थोड़ी मंदी तो सबकी तरह हमने भी झेली मगर टचवुड, ज्यादा कुछ नहीं हुआ ... ’’
‘‘हाँ, ज्यादा कुछ तो नहीं हुआ मगर जो हुआ वह क्या कम था ...’’
उनकी बातों के मानी कहाँ से कहाँ छलाँग मार गए। मैं जानता था वे मुझे कहाँ जीरो-इन कर रहे हैं।
उनके तौर-तरीके में एक गरिमापूर्ण मिलावट जरूर थी मगर इरादे में एक बेहिचक साफगोई भी थी।
मुझे कुछ कहते ही नहीं बन पड़ रहा था।
और वे आगे जरा भी कुरेदने की नीयत नहीं रखते थे।
उस लज्जास्पद खामोशी के बीच मुझे गहरी लम्बी सांस आयी तो मैंने उनसे एक घूंट पानी की दरकार की।
पानी निगला।
‘‘बट व्हाई ,जोशीजी? यू हैव सच ए ब्यूटीफुल फैमिली ... ’’
यह इंजेक्शन देने से पहले स्प्रिट लगाने से कुछ आगे की बात थी।
‘‘मीरा ने कुछ कहा आपसे ?’’
मेरा अविश्वास किसी टुच्चे गुनाह की तरह बगलें झांकने लगा।
‘‘बिल्कुल नहीं ... नॉट ए श्रेड’’ उन्होंने मुँह बिचकाकर कहा और फिर बोले “ ... और हां ... आइंदा यह मत समझिए कि वह छोटी बच्ची है ... मोबाइलों की कान-उमेठी करने में वह हम-आपसे कहीं आगे वाली जैनरेशन की है ...आपके उस चैप्टर ने उसे गहरे झिंझोडा़ है...’’
मैं उन्हें देखते हुए सुन रहा था या सुनते हुए देख रहा था, नहीं मालूम।
वे अन्तराल दे देकर बोल रहे थे।
मैं मंत्रविद्ध सा था…कि कोई दाग़ कहाँ जाकर इंतकाम ले बैठता है…।
‘‘हैट्स ऑफ टू दैट एंजल ... बहुत संभाला है उसने अपने आपको ...’’ वे चबाते-सोचते पता नहीं क्या-क्या कहे जा रहे थे।
जैसा उन्होंने तभी बताया कि शाम सात बजे उन्हें टीन-एज़ डिप्रेशन पर होने वाले एक सेमिनार में जाना था—कुछ नए नतीजों को संबंधित लोगों से साझा करने।
मुझे पस्त और बोझिल देख वे मेरे पास आए और किसी मसीहा की तरह कन्धे पर हाथ रखकर बोले ‘‘यू हैव कम आउट ऑफ इट ... दिस इज़ द बैस्ट पार्ट ऑफ इट। बट शी हैज नॉट !’’
उनके जाने के बाद मैंने गौर किया कि मेरे आस-पास कितना अंधेरा मंडरा चुका था।
उस पल मैंने एक मुलायम छौने का यकायक बिल्ली हो जाना महसूस किया ।
लुटा-निचुडा़-सा मैं गाड़ी में आ बैठा हूँ।स्टार्ट करने की ऊर्जा नहीं बची है।बस सोचे जा रहा हूँ कि ... बिल्ली को छौने की मुलायमियत कैसे लौटाई जा सकेगी ?
oma sharma 2
12A, सेन्ट्रल रेवेन्यु अपार्टमेंट्स, नारायण दाभोलकर रेड
ऑफ नेपियन सी रोड, मुम्बई - 400006
फोन – 098206 88610 / 099692 33710

Thursday, January 17, 2013

यादों की फिल्‍म के कुछ दृश्‍य




बचपन की कुछ घटनाएं, कुछ चित्र, कुछ आवाजें, कुछ गंधें मेरे दिमाग में अटकी हुई हैं। वे मेरे लिए हाड़-मांस और सांस की तरह सच हैं। असल में कितनी सच हैं, पता नहीं।  क्योंकि जैसे एक बार सुनी हुई बात को बाद में याद के सहारे दोहराया जाए तो उसमें कुछ हिस्सा कल्पना से जुड़ जाता है। जितनी बार हम याद करेंगे, उतनी ही बार वह बात या प्रसंग बदलता रहेगा या बढ़ता रहेगा। फिर भी हमें मजा आता है। यह हमारा सच होता है। ऐसे ही कुछ दृश्य मेरी याद में टंके हुए हैं।

बस छूट जाएगी            
यह 1965-66 की बात है। मैं तीसरी कक्षा में पढ़ता था। हमारे पिता कांगड़ा सेंट्रल कोआपरेटिव बैंक में थे। उनकी बदली केलंग हो गई। वे चले गए। हम हमीरपुर के अपने पुश्तैनी गांव दरवैली में ही रहे। फिर तय हुआ कि हम भी केलंग जाएंगे। मैं, मेरे बडे़ भाई और बीजी (माँ) बड़े मामा जी राल्हा तक छोड़ने आए। कांगड़ा में शायद बस बदली जानी थी। मैं और मां बस में बैठ गए। मामा और भाई शायद बस पर सामान चढ़ा रहे थे। बस स्टार्ट हो चुकी थी। बीच-बीच में हॉर्न बजाती थी। जैसे ही घर्र-घर्र की आवाज तेज होती और हॉर्न बजता, मेरी चीख निकल जाती। मुझे लगता बस चल पडे़गी। और न भाई आए न मामा। वे छूट जाएंगे। मैं रो-रोकर बेहाल हो रहा था। डर तो रहा ही था।

डर और चढ़ाई             
राल्हा में पता नहीं रात को रुके या नहीं, पर वहां घोडे़ बहुत थे। उनकी लीद की गंध भी बहुत थी। मढ़ी में रात काटी थी। हम लोग पैदल ही चल रहे थे। तब हमारे साथ पिता भी थे। मेरे ख्याल से पिता शुरु से ही साथ थे, पर मेरे स्मृति पटल पर वे राल्हा के बाद ही प्रवेश पाते हैं।

मेरे बडे़ भाई मुझसे सात वर्ष बडे़ हैं। मढी़ के बाद भी वे सबसे आगे-आगे चल रहे थे। बल्कि दूर निकल जाते थे। मैं और बीजी पीछे रह जाते थे। हम लोगों को लग रहा था जैसे हम माउंट एवरेस्ट चढ़ रहे हों। फिर हम लोग चलते-चलते थकने लगे। पर चले बिना गुजारा न था। तभी कोई जीप उस रास्ते से गुजरी। वह भी केलंग जा रही थी। उसमें मुझे और बीजी को लिफ्ट मिल गई। हम दोनों उसमें खोकसर तक गए। बीच में हम लोग ब्यास कुंड में रुके थे। यह याद नहीं है कि जीप उससे पहले मिली थी या बाद में। यह याद है कि दाईं तरफ खाई थी और बीच-बीच में उस तरफ से धुंध भी उठती थी। जब भाई अकेले आगे निकल जाते थे तो हमें डर लगता था कि अचानक बर्फवारी शुरु न हो जाए। तेज़ हवाएं न चलने लगें। ऐसा तो होता ही रहता था। तब कहते हैं आदमी गायब हो जाता था। मुझे क्या पता। यह बात जरुर बीजी ने मुझे बताई होगी। चढा़ई, ठंड और डर। इस रोमांच के बीच एक अजनबी जीप। इस जीप ने हमें खोकसर उतारा। जब पिता और भाई भी आ गए तो हम लोग वहां से बस में बैठ कर केलंग गए। उन दिनों ग्यारह सीटर बसें हुआ करती थीं।

बर्फ और रेडियो          
केलंग में हम लोग एक साल रहे। भाई नौंवी जमात में थे मैं तीसरी में। बीजी ने हम दोनों को काले पट्टू का कमीज और सफेद पट्टू का पजामा सिल दिया था। एक बार स्कूल की एक बहिन जी (टीचर) ने मुझे डांट दिया। मैंने घर शिकायत लगा दी। पिताजी उनसे लड़ने स्कूल पहुंच गए। हम लोग जिस मकान में रहते थे उसी के एक हिस्से में बैंक था। घर से बाहर निकलते तो दो चार कदम चलकर छत पर चढ़ जाते थे। यह कच्चा मकान था। बर्फ साफ करनी पड़ती थी। पर उससे पहले बर्फ हटाकर रास्ता साफ करना पड़ता था। मैं तो बर्फ से खेलता था और ठिठुरता रहता था। यह वही साल था जब लाल बहादुर शास्त्री ताशकंद गए थे और वहां उनकी मृत्यु हो गई थी। हमारे पास रेडियो नहीं था। (वैसे रेडियो तो हमारे घर तब आया जब मैं बी.ए. कर रहा था।) नीचे की मंजिल वालों के पास रेडियो था। फर्श लकडी़ का था। पिताजी फर्श पर कान लगा देते और खबरें सुनते।

तंदूर और कविता       
भाई को किसी फंक्शन में भंगडा़ करने का मौका मिला। उन्होंने वहां कविता भी सुनाई। मुझे भी कविता का जोश आया। कहते हैं। तंदूर के आगे बैठ कर मैं भी बोलने लगा। एक तंदूर है। आग जल रही है। बीजी रोटी बना रही हैं। वगैरह-वगैरह। और कि मैंने कहा यह मेरी कविता है। यह याद ऐसी है कि लगता तो है कि मेरी ही है। मुझे यह याद बडी़ प्रिय भी है। क्योंकि मैं सोचने लगता हूं कि मेरे अंदर कविता तभी बनने लगी थी। पर ध्यान से सोचता हूं तो लगता है यह दूसरों की स्मृति है। जिसे सुन-सुन कर मैंने अपना बना लिया है। पर जो भी हो है तो मजेदार। जब कविता लिखना शुरु ही किया था यानी आज से तीस साल पहले तो सोचता था भाई ने तो तुक वाली कविता सुनाई थी। और मैंने तंदूर के सामने आधुनिक कविता बनाई थी। (हालांकि था वो ब्योरा ही।) यह सोच कर मुझे खुद पर ही गर्व होता था।

शब्द और बांह का स्पर्श     
लेखन के प्रति प्रेम का एहसास मुझे बाद में हुआ था। यह कुल्लू के स्कूल की बात है। हम लोग कुछ साल कुल्लू भी रहे हैं। मैं तब आठवीं में था। दसवीं का सर्टीफिकेट कुल्लू स्कूल का है। ढालपुर के हाईर सकेंडरी स्कूल में एक दिन सुबह की सभा में एक टीचर ने स्कूल की पत्रिका दिखाई। उसमें लेख आदि थे। पूरा प्रसंग याद नहीं है। इतना याद है कि मेरे दिल में कुछ हुआ था। मुझे भी लिखना था। तब कुछ लिखा नहीं। लेकिन यह एहसास मेरे अंदर बना हुआ है। उस एहसास की छवि कभी नहीं धुलती। उन दिनों लिखने का सवाल भी नहीं उठ सकता था। मैं पढ़ने में फिसड्डी था। मटरगश्ती ज्यादा करता था। लड़कियों के पीछे घूमते थे हम लोग। पर इसी बीच एक कोमल याद एक लड़की की बांह को छूने की है। वह हमारी पडो़सिन ही थी। आसपास मंडराते तो रहते ही थे। यह घटना भी सुबह की एसेंबली की ही है। सभा खत्म होने पर कैसी भगदड़ मचती है, सब जानते हैं। उसी बीच कहीं मेरा हाथ उसकी बांह से छू गया। मैं तो जैसे निहाल हो गया। खुशी का ठिकाना नहीं रहा। यह बात मैंने आज तक किसी को बताई नहीं थी।

तो ये थे बचपन की यादों के कुछ दृश्य। जिनकी फिल्म मेरे भीतर अक्सर चल पड़ती है। और बडा़ मनोरंजन होता है।

यह संस्‍मरण कुछ बरस पहले निरंजन देव के कहने पर कुल्‍लू से प्रकाशित पत्रि‍का हिमतरू के लिए लिखे थे। 

Tuesday, January 1, 2013

चला गया आखिर साल दो हजार बारह

2012

साल का अंत आते आते सत्‍ता का चेहरा इतना पत्‍थर हो गया
कि पता नहीं वो पुलिस का था
पाषाण का था तराशा हुआ राजसी ठाठ में
लोग थे
और भी लोग थे
हाड़ मांस के जीते जागते
आक्रोश और क्रोध से भरे हुए
सत्‍ता ने बंद कर लिए अपने नेत्र जो वहां थे ही नहीं
द्वार भी जो दरअसल कभी बने ही नहीं
वहां दीवारें ही थीं पारदर्शी अपारदर्शी
लोग अपनी मांगें मनवाने निकले थे सड़क पर
आहत और आरक्‍त नेत्र शावकों की तरह  
उन्‍हें बुजुर्गों ने डिमांड चार्टर लिखने की सलाह दी
बच्‍चे अब हिज्‍जे जोड़ना चाहते हैं
जिसका एक सिरा प्राचीन सभ्‍यता‍ में नासूर सड़ा है
दूसरा ओर छोर पकड़ में आता नहीं
आता है अचानक इकतीस दिसंबर
और कानों में मानो कोई भंवरा गुनगुनाने लगता है
कि नए साल में चीजें बदल जाएंगी
इतने कठोर शैल समय में
इतनी भोली उम्‍मीद!

Sunday, December 9, 2012

कविता पर बहस जारी है

धीरोदात्त नायक की प्रतीक्षा करती और साथ ही 
उत्तेजक उत्तर-आधुनिकतावादी नारीवादी विमर्श करती पद्मिनी नायिका

कथादेश में पवन करण और अनामिका की कविताओं पर जारी बहस में कात्‍यायनी का लेख. 
इस बहस में आप पहले प्रभु जोशी का लेख पढ़ चुके हैं. 
 
रजा,  हाल में मुंबई में लगी प्रदर्शनी से

पवन करण और अनामिका की कविताओं का शालिनी माथुर ने जो कुशाग्र विश्लेषण प्रस्तुत किया, उस पर पहले ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं लगी। शालिनी की केन्द्रीय स्थापनाओं से मेरी पूरी सहमति थी। पर बहस के दौरान मूल मुद्दे को इधर-उधर खींचने-तानने-घसीटने से कुछ नये विवाद के मुद्दे उभरकर आये। उन पर अपने विचार रखने की ज़रूरत महसूस हुई।
 
पहली बात यह कि निर्वस्त्रता (जैसा कि शालिनी ने भी लिखा है) अपने आप में अश्लील या पोर्नोग्राफिक नहीं होती। यदि ऐसा होता तो पुनर्जागरण काल से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी तक की यूरोपीय चित्रकला की कई क्लासिकी कृतियाँ अश्लील मान ली जातीं। हाँ, कोर्णाक और खजुराहो की मैथुनरत युगलों और पशुओं तक से मैथुन की मूर्तियाँ भारतीय समाज के एक गतिरुद्ध और पतनोन्मुख समाज के अभिजनों-पुरोहितों की सांस्कृतिक सड़ान्ध की अभिव्यक्ति मात्र हैं। अर्चना वर्मा इन्हें 'इस बहुलताप्रेमी देश के समावेशी स्वभाव में विचित्र और विलक्षण आस्थाओं और अस्मिताओं के लिए भी जगह बना देने की पुरागत परम्परा' मानती हैं। उनके हिसाब से, तान्त्रिकों-वामाचारियों के विविध सम्प्रदाय धार्मिक आस्थाओं को रूपकों-प्रतीकों में ढालकर स्त्रियों के साथ (धार्मिक अनुष्ठान के नाम पर) जो कुछ करते थे, उन्हें भी 'विचित्र और विलक्षण आस्थाओं-अस्मिताओं का एक विशिष्ट गढ़न्त (Construct) मान लिया जाना चाहिए और उनका सहानुभूतिपूर्वक पाठ/पढ़न्त (Reading) होना चाहिए। ऐसा ही सती-प्रथा के साथ भी होना चाहिए।
 
उत्तार आधुनिकतावादी विमर्श (Discourse) प्रणाली की जिस त्रयी - लिखन्त, पढ़न्त, गढ़न्त (Text, reading and construct) को अर्चना वर्मा ने अपनी तर्क-प्रणाली का आधार बनाया है, उसकी सबसे बड़ी सहूलियत यह होती है कि उसका कोई सन्दर्भ-चौखटा (Frame of reference) होता ही नहीं। जो भी सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक गढ़न्त हैं, उनके कई लिखन्त और कई पढ़न्त हो सकते हैं। किसी एक अवस्थिति के सही या गलत होने का प्रश्न ही समाप्त हो जाता है। पक्षधरता या निर्णायकता का मुद्दा अप्रासंगिक हो जाता है। अनामिका ने शालिनी को यह नसीहत यूँ ही नहीं दी है कि आदमी को 'जजमेण्टल' होने से बचना चाहिए। पाठ की बहुस्वरीयता (Polyphony) की बात जब लुनाचार्स्‍की ने (दोस्तोयेव्स्की के सन्दर्भ में) और बख्तीन ने की थी तो उन्होंने रचनाकार को सुनिश्चित विचारधारात्मक अवस्थिति और सामाजिक पक्षधरता से मुक्त कत्तई नहीं किया था। अर्चना वर्मा लिखन्त, पढ़न्त, गढ़न्त की अवधारणाओं के मूल में भाषा में स्वभावत: निहित अर्थबहुलता और सन्दर्भ-सापेक्षता की चर्चा करते हुए रचनाकार को पूरी छूट देते हुए ज़िम्मेदारी मुख्यत: पाठक की पढ़न्त क्षमता पर डाल देती हैं जो उसकी भाषिक क्षमता, वैयक्तिक सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, वैचारिक प्रतिबद्धता आदि से तय होती है। उनका साफ-साफ कहना है : ''लिखन्त की विवक्षा और अर्थान्विति लेखक की मंशा से नियन्त्रित और अभिप्राय से संचालित न होकर पाठक की पढ़न्त क्षमता द्वारा कार्यान्वित होती है।'' बात यहाँ साफ हो गयी है। यानी असल बात यह है कि रचनाकार इस तर्क से दायित्वमुक्त हो जाता है और अपनी वैचारिक-सामाजिक अवस्थिति की किसी भी आलोचना के जोखिम से सुरक्षित हो जाता है। यह घिसे-पिटे उत्तर आधुनिकतावादी सिद्धान्त-चर्वण के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। आज हिन्दी की कई स्त्री चिन्तक और स्त्री कवि अपने कृतित्व में जो नारीवाद प्रस्तुत कर रही हैं वह गत शताब्दी के साठ के दशक के पश्चिमी नारीवाद के विविध सरणियों से सर्वथा भिन्न है। उस दौर के नारीवादी आन्दोलन के पास स्त्री-मुक्ति की कोई सांगोपांग परियोजना नहीं थी, उनकी विचारधारात्मक अन्तर्वस्तु मधयमवर्गीय अराजकतावादी थी और स्वरूप रैडिकल स्वत:स्फूर्त था। आगे चलकर अपनी तार्किक परिणति के तौर पर भले ही वह धारा विघटित हो गयी और कुछ हद तक प्रतिगामी निष्पत्तियों तक जा पहुँची, पर अपने समय में कई शीर्षस्थ नारीवादी सिद्धान्त-निरूपकों की उपस्थिति के साथ-साथ उस नारीवादी आन्दोलन का स्वरूप जनान्दोलनात्मक था। पूँजीवादी जनवाद के वैधिक दायरे के भीतर उसकी अपनी कुछ उपलब्धियाँ भी थीं।
 
आज स्थिति सर्वथा भिन्न है। स्त्री-मुक्ति और पुरुष वर्चस्व जैसे प्रश्न आज उत्तार-आधुनिकतावादी विमर्श के दायरे में सिमट कर रह गये हैं। उत्तर-आधुनिकतावादी दृष्टि के अनुसार दमन या उत्पीड़न, विमानवीकरण, वस्तुकरण या ऐसी कोई भी चीज़ एक वस्तुगत सामाजिक यथार्थ नहीं बल्कि एक वैचारिक समस्या है जिसका सम्बन्ध दार्शनिक द्वैतों से है और इन द्वैतों की व्याख्या में ही दमन-उत्पीड़न-वर्चस्व या ऐसी कोई स्थिति स्वीकार की जा सकती है। तात्पर्य यह है कि उत्तर-आधुनिकतावाद और उसकी सहोदरा ''उत्तर''-विचार सरणियाँ सभी विचारों, विश्वासों, व्यवहारों; संस्थाओं, घटनाओं-परिघटनाओं को वस्तुगत यथार्थ के बजाय एक पाठ या लिखन्त (text) मानती हैं और इसकी अर्थान्विति भी पूरी तरह से मनोगत होती है यानी प्रेक्षक/पाठक की स्थिति पर निर्भर होती है, जैसा कि अर्चना वर्मा कहती हैं, ''... लिखन्त पाठक के हाथों में आते ही अपने तात्कालिक सन्दर्भों से मुक्त होती और पढ़न्त-सापेक्ष बन जाती है, हालाँकि लिखन्त सापेक्षता से पूरी तरह से मुक्त नहीं होती।'' उत्तर-आधुनिकतावाद का जादुई तर्क 'सिग्निफायर' और 'सिग्निफायड' की अवस्थितियों को मनमाने ढंग से बदलता रहता है।

उत्तर-आधुनिकतावादी, उत्तर उपनिवेशवादी, 'सबआल्टर्न' इतिहासकार और अस्मितावादी राजनीति (Identity Politics) के एन.जी.ओ.-पन्थी ज्ञानधरीण ये सभी लोग प्रबोधन (Enlightenment), क्लासिकी जनवादी क्रान्तियों और समाजवादी क्रान्तियों के ''महाख्यानों'' (Metanarratives) और मानववाद, जनवाद, समाजवाद की अवधारणाओं-परियोजनाओं को एकलतावादी, अपचयनवादी (Reductionist) और वर्चस्ववादी (Hegemonist) मानकर खारिज करते हैं। इनका मानना है कि सत्ता विकेन्द्रित होकर हमारे जीवन के पोर-पोर में घुसी हुई है, आमजनों द्वारा आभ्यन्तरीकृत कर ली गयी है, अत: इसका प्रतिरोध असम्भव है। यथास्थिति की जड़ता की हर आलोचना एक नयी जड़ता को जन्म देती है और सत्ता का हर प्रतिरोध सत्ता के नये रूप को जन्म देता है। (अर्चना वर्मा शालिनी की आलोचना करते हुए जब कहती हैं कि पितृसत्ता के गढ़न्तों से लड़ते-लड़ते स्त्री विमर्श की अपनी अनेक निष्पत्तियाँ स्वयं न केवल एक गढ़न्त बल्कि जकड़न्त बन चुकी हैं तो इसके पीछे मूलत: यही तर्कप्रणाली सक्रिय होती है)। ऐसी स्थिति में उत्तर आधुनिक, उत्तर औपनिवेशिक और 'सब-आल्टर्न' विचार-सरणियाँ एकमात्र वैकल्पिक सम्भावना के तौर पर दलितों, स्त्रियों, आदिवासियों आदि की सत्ता से अनछुई-अप्रदूषित प्राक्-आधुनिक (Pre-modern) अस्मिताओं की तलाश करती हैं और उनकी स्वायत्ताता के 'स्पेस' को बचाने-बढ़ाने की कोशिश करती हैं। यह साहित्य और मानविकी के क्षेत्र में भी हो रहा है और राजनीति के क्षेत्र में भी। इसी दृष्टिकोण से प्रेरित इतिहासकार दीपेश चक्रवर्ती और समाजशास्त्री आशीष नन्दी 'कुलवधु' और 'गृहलक्ष्मी' जैसी 'सुन्दरता की अनपचेय (Irreducable) श्रेणियों'  के महिमामण्डन तक जा पहुँचते हैं। इसी दृष्टिकोण से प्रेरित अर्चना वर्मा 'रसराज शृंगार' की रीतिकालीन रसानुभूति को सकारात्मक बताती हैं और इस बात के लिए चिन्तित दीखती हैं कि आधुनिकता का पीछा करता हुआ भारत विचित्र और विलक्षण आस्थाओं-अस्मिताओं और पुरागत परम्पराओं से विच्छिन्न होता जा रहा है (इसमें लिंग-पूजा, योनि पूजा, पशुओं तक से सम्भोग के भित्ति-चित्रों के उत्कीर्णन आदि सभी शामिल हैं!)। अनामिका की कविताओं में और लेखन में स्त्री-मुक्ति के प्रश्न को सामाजिक-ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से विच्छिन्न कर स्त्री-देह की मुक्ति में (इसी में मन की मुक्ति भी है!) कीलित करने वाली पश्चिमी बुर्जुआ नारीवादी चिन्तन की एक उपधारा के साथ-साथ, लोक-परम्परा के नाम पर जो कुछ भी है; उसके प्रति जो अधिभूतवादी एवं अनालोचनात्मक स्वीकार-भाव है, उसे भी इसी नजरिए से समझा जा सकता है। यह संगमभूमि दरअसल उत्तर-आधुनिकतावाद की ज़मीन है जहाँ नारी मुक्ति देह-मुक्ति के रूप में और देह-मुक्ति 'देह के उत्सव' (राजेन्द्र यादव इसे यही नाम देंगे) के रूप में पवन करण और अनामिका अपनी-अपनी कविताओं में अंजाम दे रहे हैं।

बकौल अनामिका, उनकी कविता 'ब्रेस्ट' से जुड़ा सारा रूमान झाड़ते हुए यह भी बताना चाहती है कि स्त्री की अस्मिता किसी एक अंग में कीलित नहीं की जा सकती, पर ऐसा करते हुए वे स्त्री की अस्मिता व उससे जुड़े प्रश्नों को स्त्री-देह मात्र में कीलित कर देती हैं। ग्रेस निकोलस के संकलन 'फैट ब्लैक वुमन' से जो एक कविता उन्होंने उद्धृत की है वहाँ भी मोटी होने, अश्वेत होने और स्त्री होने से जुड़े तीन स्टीरियोटाइप्स को तोड़ने का जो तरीका कवि ने चुना है, वह भी व्यापक सामाजिक प्रश्नों को देह-मात्र में कीलित कर देने का ही तरीका है। कविता की स्त्री के दुद्धू उत्तेजक हैं। किसके लिए? निश्चय ही पुरुष के लिए! वह पुरुष से अपना जड़ीभूत सौन्दर्य-बोध बदलने का आग्रह करती है ताकि वह उसके तरबूज जैसे स्तनों, जुड़वाँ सील मछलियों जैसी जाँघों और उनके बीच जामुनी चेरी मुँह में दबाये झबरे कुत्ते को सराह सके और नाभि के नीचे नीलिमा में हहाते काले सागर में उतर सके। कविता न्यौता किसे दे रही है? क्या खुद को? नहीं, पुरुष को! अत: यह कविता भी समस्या का अपमानजनक अवमूल्यन करती है और सन्दर्भों से कटकर वस्तुगत तौर पर अश्लील बन ही जाती है। अनामिका भी इतना तो मानती ही हैं कि 'एकांगिता ही अश्लीलता है।'
 
करीब ढाई-तीन दशक पहले हिन्दी कविता में स्त्रियों के लिए करुणा की बाढ़-सी आ गयी थी। हिन्दी कवि दयनीय, मौन, उत्पीड़ित स्त्री के प्रति कुछ ज्यादा ही करुणार्द्र हो उठे थे। फिर स्त्री कविता का एक विद्रोही स्वर उभरा जिसका एक व्यापकतर सामाजिक परिप्रेक्ष्य था। उस समय भी ज्यादा हावी धारा कुलीन व्यक्तिवादी स्त्री-कविता की ही धारा थी। और अब यह एक दौर है जब पवन करण की चर्चित कविता जैसी हृदयहीन लम्पट-कामुक कविताएँ और अनामिका की चर्चित कविता जैसी कृत्रिम, 'सिंथेटिक' (प्रभु जोशी ने ठीक कहा है) विकृतमानस और संवेदनहीन कविताएँ लिखी जा रही हैं। पितृसत्ता का विरोध करते हुए स्त्री ने प्रकारान्तर से पितृसत्ता के ही गढ़न्तों को स्वीकार कर लिया है - अर्चना वर्मा की यह बात और कहीं लागू हो न हो, अनामिका की कविता पर तो ज़रूर लागू होती है।
 
हिन्दी कविता सामाजिक जीवन और संघर्षों के परिप्रेक्ष्य से आज असामान्य रूप से विमुख हुई है। स्त्री मुक्ति के प्रश्न को आम स्त्रियों के जीवन, वृहत्तार ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और सामाजिक मुक्ति की परियोजना से काटकर अभिजन समाज की स्त्रियों का निठल्ला विमर्श बना दिया गया है। इसका मूल कारण इतिहास का ठहराव और विपर्यय की लहर है। मज़े की बात यह है कि उत्तर-आधुनिकतावाद, उत्तर औपनिवेशिकता, उत्तर-मार्क्‍सवादी नारीवाद आदि का ज़माना यूरोप-अमेरिका में करीब डेढ़-दो दशक पहले ही बीतने लगा था। भारत में यह फैशन काफी देर से आया है, जैसा कि प्राय: होता है। पश्चिम के अकादमिक-सांस्कृतिक हलकों में इन दिनों ''मार्क्‍सवाद की वापसी'' का नारा देने का ज़माना है। फूको, देरिदा, ल्योतार, गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक, होमी भाभा आदि घिस चुके हैं। अब फिकरे और जुमले ज़िजेक़ और अलेन बेद्यू आदि से उधार लेने का ज़माना है।
 
अनामिका ने शालिनी को प्रेमचन्द की कहानी के पात्र 'बड़े भाई साहब' वाले भाव से नसीहत दी है। प्रेमचन्द के 'बड़े भाई साहब' नसीहत क्यों देते थे, वह जानती ही होंगी। हाँ, यह सम्भावना नहीं है कि कथा के अन्त में बड़े भाई साहब की तरह वे रूपान्तरित होकर सरल वेश में आ जायेंगी। नैतिकता का ठेका लेने, 'सेल्फरायटियसनेस' और 'जजमेण्टल' होने तथा ''प्रचण्ड मर्दवादी भाषा के तेवर'' में श्रेष्ठताबोधा से ग्रस्त होकर आलोचना करने की प्रवृत्ति को उन्होंने जब फासीवादी कहा है तो प्रकारान्तर से शालिनी को ही लक्षित किया है। पर स्वयं उनके लेख से ऊँचाई से 'सरमन' बोलने और नसीहत देने का जो तेवर है, कविता की समझ विकसित करने का जिस अन्दाज़ में दिया गया सुझाव है, उससे तो एक आहत फुफकार ही सुनायी देती है। जो तोहमतें वे शालिनी के आलेख पर लगाती हैं, वे ख़ुद उनपर ज्यादा सटीक ढंग से लागू होती हैं। दिलचस्प बात यह है कि शालिनी की मूल आपत्तियों और तर्कों में से उन्होंने एक को भी सीधे-सीधे नहीं छुआ है और बस दाँये-बाँये से निकल गयी हैं।
 
अनामिका के मर्दवाद-विरोध की ब्रह्मगाँठ तब खुल जाती है, जब एक नैतिक-बौद्धिक रूप से परिष्कृत आधुनिक स्त्री के अकेलेपन के लिए उन्हें ''रामगुप्तों से घिरी  ध्रुवस्वामिनी के अकेलेपन'' का रूपक सूझता है। यानी मर्दवाद (पुरुष वर्चस्ववाद) का सारतत्व यह है कि अपनी नामर्दगी को ढँकने के लिए कायर पुरुष अतिरिक्त आक्रमक और निर्दय आचरण करते हैं। फिर मर्दवाद का समाधान क्या है? यह कि पुरुष ''संकल्पपूर्वक अतिपुरुष के खाँचे से बाहर आकर सम्यक् पुरुष यानी प्रजातान्त्रिक/दोस्त पुरुष'' बने, ''ध्रुवस्वामिनी के योग्य चन्द्रगुप्त'' बने, ''पद्मिनी नायिका के योग्य धीरोदात्त/धीरललित/धीरप्रशान्त नायक'' बने। अनामिका जी, महाकाव्य काल के धीरोदात्त/धीरललित/धीरप्रशान्त नायक उदारचरित भले हों, पर स्त्री के प्रति प्रजातान्त्रिक रुख रखने वाले दोस्त पुरुष तो कत्तई नहीं होते थे। ध्रुवस्वामिनी का अपना व्यक्तित्व था और चन्द्रगुप्त एक जेनुइन प्रेमी और साहसी राजा था, पर आधुनिक स्त्री के स्वतन्त्र व्यक्तित्व और प्रजातान्त्रिक पुरुष व्यक्तित्व को उन दोनों पर आरोपित करना अतिबौद्धिकता के हास्यास्पद द्रविण प्राणायाम से अधिक कुछ भी नहीं है। आज के मूल्यों के सन्दर्भ-चौखटे से देखें तो धीरोदत्ता नायक अतिपुरुष के खाँचे में कैद होता था और पद्मिनी नायिका आचरण और सौन्दर्यबोध की दृष्टि से प्राचीन/मधयकालीन पुरुष वर्चस्ववादी कसौटियों पर खरी होती थी। यानी शब्दों में तो अनामिका पुरुष के अतिपुरुष होने का विरोध करती हैं, पर वास्तव में प्रतीक्षा उन्हें एक अतिपुरुष की ही है।
 
बात तब और स्पष्ट हो जाती है जब वे (''शालिनी बाबू'' ,''शालिनी भैया'' को सम्बोधित करते हुए) मानो दुनिया के सारे पुरुषों को चुनौती देती हैं कि ''कहाँ पैदा हुए हैं अभी वे मर्द जो स्त्री की यौनिकता जगा दें... पढ़ी-लिखी, चेतन, परिष्कृत मन वाली स्त्री की यौनिकता जगा पाना इतना आसान नहीं।'' अब यहाँ यौनिकता से तात्पर्य यदि 'सेक्सुअलिटी' से है, तो वह एक स्वायत्त-सकारात्मक प्रत्यय है, वह एक उन्नत स्त्री-चेतना में उपस्थित रहती है, उसे पुरुष द्वारा जगाने की ज़रूरत नहीं होती। यौनिकता से तात्पर्य यदि स्वस्थ यौनक्षुधा या स्वस्थ ऐन्द्रिक कामना से है, तो कहा जा सकता है कि एक स्वतन्त्र व्यक्तित्व और उन्नत चेतना वाली आधुनिक स्त्री इस मामले में समान सक्रिय पक्ष की भूमिका निभाती है। अनामिका के विचार से स्त्री शरीर पुपुही नहीं बल्कि गम्भीर राग-रागिनियों, श्रुतियों-अनुश्रुतियों से भरी हुई रुद्रवीणा है, लेकिन है वह एक वाद्ययन्त्र ही, जिसके अन्तर्संगीत को जगाने के लिए किसी धीरोदात्ता/धीरललित/धीरप्रशान्त नायक की ज़रूरत है। (यह 'साहब, बीवी और गुलाम' की नायिका की कामना लगती है न कि किसी आधुनिक स्वतन्त्र चेतस् स्त्री की)। धीरोदत्ता नायक के पुरातन खाँचे-साँचे वाले ऐसे किसी अतिपुरुष की प्रतीक्षा एक लोकतान्त्रिक सोच न होकर एक फासीवादी आत्मिक जगत और सौन्दर्यशास्त्र की अभिलाक्षणिकता है। यह फासीवादी विचारों से अनुकूलित एक मिथ्याभासी स्त्री-स्वातन्त्रय चेतना है। उत्तार-आधुनिकतावादी नारीवाद लोकजीवन की रागात्मक चाशनी में लिथड़ी प्राक्आधुनिक सोच-संस्कारों-विचारों-संस्थाओं को महिमामण्डित करने के साथ ही लोकतान्त्रिक मूल्यों-संस्कारों का विरोध करता ही है। साथ ही जेण्डर पर केन्द्रित हर विमर्श को व्यापक सामाजिक-ऐतिहासिक सन्दर्भों से काटकर वह देहकेन्द्रित, यौनकेन्द्रित, 'स्त्री बनाम मर्द' केन्द्रित बनाकर स्त्री मुक्ति के प्रश्न को परियोजना में रूपान्तरित करने की जगह विमर्श और मुहावरेबाजियों-जुमलेबाजियों तक सीमित कर देता है। कविता और विचार के क्षेत्र में विश्वविद्यालयों की अभिजन विदुषियाँ आजकल ऐसा धामाल खूब मचाये हुई हैं।
 
अनामिका को ताज्ज़ुब है कि शालिनी ने न जाने कहाँ ऐसी स्त्रियाँ देखी हैं जो बेधयानी का अभिनय करते हुए जानबूझकर सबके सामने पल्ला सरकाती हैं और धयान से चारों ओर देखती हैं कि सबने उसे धयान से देखा या नहीं। हमारे जैसे बन्द समाजों की घुटन में यह विमानवीकरण, विघटित स्त्री चेतना और रुग्णता खूब देखने को मिलती है स्त्रियों के एक हिस्से में। अनामिका को दिल्ली के मधयवर्गीय इलाकों में जाकर व्यापारियों और बाबुओं की, रूटीनी गार्हस्थ्य से बोर पत्नियों का पास-पड़ोस के ''भाई साहबों'' से व्यवहार पर गौर करना चाहिए, कलकत्ता के किराये के कमरों में रहने वाले छात्रों की बहुतायत वाले इलाकों में जाकर पास-पड़ोस की ''भाभी जी'' लोगों का उनके साथ व्यवहार देखना चाहिए, किसी तुक्कड़ी कवि सम्मेलन में गा-गाकर कविता सुनाने वाली किसी कवयित्री का मंच पर और मंच के पीछे व्यवहार देखना चाहिए। यही नहीं, साहित्य के मठाधीश कई नौकरशाहों की महफिलों और कुछ साहित्यिक पत्रिकाओं के दफ्तरों में भी ऐसे दृश्य देखने को मिल जायेंगे। कविता और कहानी में भी एक स्त्री जब कोई निमित्त तलाशकर, विद्रोह या त्रासदी के नाम पर या किसी अन्य बहाने से, स्त्री को अनावृत्त करती है तो रुग्‍ण  पुरुष मानस को गुदगुदाने (titillation) का ही काम करती है।
 
दूर की कौड़ी लाने के चक्कर में वकील कभी-कभी केस बिगाड़ने और मुवक्किल की फजीहत कराने का ही काम किया करते हैं। ऐसा ही आशुतोष कुमार ने किया है। सीढ़ी दर सीढ़ी तर्क करते हुए वे यहाँ जा पहुँचते हैं कि ज़रूरी नहीं कि पोर्नोग्राफी हर हाल में स्त्री के लिए अपमानजनक ही हो। सनी लियोन खुद मानती हैं कि पोर्नोग्राफी उनके लिए सृजनात्मकता की अभिव्यक्ति का एक खास तरीका है जिसे उन्होंने अपनी इच्छा से चुना है और इसपर उन्हें गर्व है। आशुतोष कुमार जी, पोर्नोग्राफी के बारे में 'वैल्यू जजमेण्ट' इस आधार पर नहीं लिया जा सकता कि सनी लियोन इसे सृजनात्मक अभिव्यक्ति का माधयम और अपना स्वतन्त्र निर्णय मानती हैं। पोर्न उद्योग और यूरोप के सेक्स उद्योग में लगी ज्यादातर स्त्रियाँ यही कहेंगी कि वे अपने स्वतन्त्र निर्णय से ऐसा कर रही हैं। पर वस्तुत: ऐसा है नहीं। इनके पीछे सैकड़ों परोक्ष रूप से आर्थिक-सामाजिक परिवेशिक दबाव काम करते हैं या फिर एक विघटित स्त्री चेतना काम करती है जो अलगाव और पूँजीवादी सांस्कृतिक अध:पतन का परिणाम होती है। यदि कुछ पुरुषों के लिए सनी लियोन कुत्सित उल्लास का रूपक या एक गाली का पर्याय बन चुकी है तो मात्र इसी से यह तय नहीं हो जाता कि हम सनी लियोन (निश्चय ही, उसके निर्णय की आज़ादी उसकी अपनी है, पर उसके निर्णय से असहमति की भी उतनी ही आज़ादी है) के कृत्य का औचित्य प्रतिपादन करने लगें। जहाँ तक सृजनात्मक अभिव्यक्ति का सवाल है, तो आशुतोष जी, पोर्न इण्डस्ट्री तो छोड़ ही दीजिए, हॉलीवुड-बॉलीवुड के कमर्शियल सिनेमा में भी अभिनेता की सृजनात्मक अभिव्यक्ति का 'स्पेस' बस नाम को या अपवादस्वरूप ही होता है। वहाँ कुछ है तो बस पैसे और स्टारडम की कुत्तादौड़ है, खोखलापन है, वैचारिक दिवालियापन है और घनघोर आत्मिक रिक्तता है। आशुतोष कुमार ने अपने लेख के अन्त में पोर्नोग्राफी के बारे में काफी कुछ ठीक-ठीक बातें लिखी हैं। यह सही है कि पोर्नोग्राफर स्त्री को केवल वस्तुकृत नहीं करता (क्योंकि वह कभी भी पूरी तरह से वस्तुकृत नहीं हो सकती)। कभी-कभी वह उसे पशुवत् 'ट्रीट' करके परपीड़क आनन्द लेता है, कभी गोपन को खोलने और निजी स्पेस में झाँकने की फन्तासी रचता है, कभी अपनी समस्त रुग्ण मर्दवादी फन्तासियों-अप्राकृतिक यौनाचार (अब यह मत कहियेगा कि अप्राकृतिक कुछ नहीं होता और यह भी एक पुरानी जड़ीभूत सोच है), सामूहिक यौनाचार, सार्वजनिक नग्नता, 'वाइफ-स्वैपिंग' आदि-आदि का शिकार बनाता है। यह भी सही है कि जैसे हर उत्पीड़क अन्दर से डरा होता है, उसी तरह पोर्नोग्राफर भी स्त्री की स्वतन्त्रता और यौनिकता से डरा होता है। विचित्र बात यह है कि पोर्नोग्राफी के बारे में आशुतोष कुमार ने जो विश्लेषण किया है, उसी के हिसाब से देखें तो भी पोर्नोग्राफी अपनी मूल प्रकृति से ही एक पुरुष वर्चस्ववादी स्त्री-विरोधी फासिस्ट उपकरण है। इसे कला-विधा भी नहीं कहा जा सकता। यह बस एक स्त्री विरोधी आक्रामक सांस्कृतिक औजार है।
 
बहस में कातर ढंग से अपने कम ज्ञान की दुहाई का दिखावा करते हुए एक बॉक्स की टिप्पणी के जरिए कवि मदन कश्यप का टपक पड़ना भी कुछ अजीब ही लगता है। निहायत अधिभूतवादी तरीके से वे ज्ञान और तर्क को संवेदना से अलगाते हैं और डराते हैं कि कविता को यदि अंक भौतिकी की तरह हल करना चाहेंगे तो पता नहीं निराला, शमशेर और मुक्तिबोध की कितनी कविताओं का क्या होगा? यानी कविता का विश्लेषण कविता की भाषा में होना चाहिए (बतर्ज़, 'सिर्फ अहसास है ये रूह से महसूस करो, प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो')। मदन कश्यप जी, कविता ही नहीं, शास्त्रीय संगीत के किसी पक्के राग या सिम्फष्नी का भी जब विश्लेषण किया जायेगा तो ठोस, वस्तुगत, विज्ञान की भाषा में ही किया जायेगा। विश्लेषण में काव्यात्मक अमूर्तन रचनाकार को पतली गली से निकल लेने का मौका देता है और आलोचक को यह अवसर देता है कि वह (i) रचनाकार का कोपभाजन न बने और (ii) अवसरानुसार, अपनी बात का मनमाना भाष्य कर सके और करवा सके। आप चिन्ता न करें, ठोस वस्तुपरक विश्लेषण से निराला, शमशेर, मुक्तिबोध का वस्तुपरक मूल्यांकन (जो प्राय: सकारात्मक ही होगा) ही होगा, कुछ बिगड़ेगा नहीं। पाब्लो नेरुदा की कविताओं को लेकर भी आप बेकार ही चिन्तित हैं। प्रश्न यहाँ काम-भावना और यौन-आधारित बिम्बों का नहीं है। इनसे किसी को आपत्ति नहीं है। शालिनी की मूल आपत्ति पर ग़ौर कीजिए। निर्वस्त्रता या यौन-सम्बन्ध का चित्रण अश्लील या पोर्नोग्राफिष्क हो, यह ज़रूरी नहीं है। अश्लील (Indecent), कामुक (sensual), ऐन्द्रिक (sensuous), कामोद्दीपक/रत्यात्मक (Erotic) और कामविकृति (Peruersity, perversion) में फर्क नहीं करेंगे तो कबाड़ा हो जायेगा। जो पोर्नोग्राफिक है वह अश्लील है, कामुक है और कामविकृत है। रत्यात्मक, स्थिति सापेक्षता के अनुसार, सकारात्मक भी हो सकता है, नकारात्मक भी। और जो ऐन्द्रिकता है, वह स्वस्थ सौन्दर्यात्मक-कालात्मक मूल्य है। पाब्लो नेरुदा की कविताओं में, ज्यादातर, (हमेशा नहीं) यौनिकता, स्त्री शरीर, सम्भोग आदि के इंगित या प्रसंग स्वस्थ ऐन्द्रिकता के रूप में आते हैं। और नेरुदा ही क्यों, होमर, अफलातून, होरेस, जुवेनाल और गोयठे से लेकर गेओर्ग वेयेर्त जैसे उन्नीसवीं शताब्दी के सर्वहारा कवि तक के कृतित्व में यह स्वस्थ ऐन्द्रिकता मौजूद है। वेयेर्त के बारे में फ्रेडरिक एंगेल्स के इस विचार पर ग़ौर कीजिए :
''जिस चीज़ में वेयेर्त आचार्य हैं, जिसमें वह हाइने से ऊपर थे (क्योंकि वे अधिक स्वस्थ और सच्चे थे) और जर्मन साहित्य में जिनका स्थान केवल गोयठे के एकदम बाद आता है, वह भी स्वाभाविक, स्वस्थ विषय-भोग तथा दैहिक वासना की अभिव्यक्ति A Sozial-demokrat के बहुत-से पाठक सहमे रह जायेंगे, अगर मैं Neue Rheinische Zeitung से कुछ व्यंग्य-लेख पुन: मुद्रित कर दूँ परन्तु मैं इसकी कल्पना तक नहीं कर सकता। परन्तु यह टीका किये बिना नहीं रह सकता कि जर्मन समाजवादियों के लिए वह वक्त आना चाहिए, जब उन्हें इस अन्तिम जर्मन कूपमण्डूकीय पूर्वाग्रह को खुलेआम एक ओर फेंक देना होगा। यह झूठी निम्न-बुर्जुआ लज्जा तो गुप्त अश्लीलता के लिए केवल पर्दे का काम देती है। उदाहरण के लिए, फ्रैलीग्राथ की कविताओं को पढ़ते समय सचमुच यह सोचा जा सकता है कि लोगों के पास यौनांग ही नहीं हैं। परन्तु चुपके से कोई मसालेदार चुटकुला सुनने में किसी और को इतना मज़ा नहीं आता था, जितना काव्य में इस घोर सतीत्वधर्मी फ्रैलीग्राथ को। अन्तत: समय आ गया है कि कम से कम जर्मन मज़दूर इसके बारे में, जो वे स्वयं दिन या रात को करते हैं, प्राकृतिक, अपरिहार्य तथा निरपवाद रूप से आनन्दयोग्य चीज़ों के बारे में उतनी ही स्पष्टता के साथ बातें करें, जितनी स्पष्टता के साथ रोमांसभाषी जनगण करते हैं, तथा होमर और अफलातून, होरेस तथा जुवेनाल, पुरानी इंजील तथा Neue Rheinische Zeitung ने की।''
(मार्क्‍स-एंगेल्स : 'साहित्य और कला'; राहुल फषउण्डेशन, पृ. 375)

पवन करण और अनामिका की कविताएँ स्वाभाविक-स्वस्थ ऐन्द्रिकता और नैसर्गिक काम भावना की कविताएँ नहीं हैं। ये यौन-उत्पीड़न की विद्रोही प्रतिक्रिया या स्त्री के वस्तुकरण के प्रतिरोध की कविताएँ नहीं है। ये मनोरोगी और कामविकृत कविताएँ हैं जो ब्रेस्ट कैंसर के बहाने ब्रेस्ट पर रुग्ण उद्दीपक विमर्श प्रस्तुत करती हैं। एक जगह मर्द के शहद के छत्तों दशहरी आमों की जोड़ी में से एक खो गया है, अमानत में खयानत हो गया है, दुखी क्षणों का शरण्य छिन गया है और स्त्री भी उदास है जिसके बारे में बातें सुनकर वह बौराती थी, आइने में जिसे देखकर झूमती थी और दोनों एक साथ अपने प्रेमी के मुँह में भर देने की सोचती थी, उसके देह से उनमें से एक के हट जाने से कितना कुछ हट गया है उनके बीच से। अन्त की कारुणिकता यदि मर्द-मानस पर चोट भी हो, तो भी यह तिनके की ओट बेकार है। पूरी कविता में प्याररत स्त्री भी अपने को लजीज़ गोश्त का टुकड़ा ही समझती रही है। और मूल बात है कैंसर जैसे प्रसंग में एक बेरहम कामुक अंग-वर्णन। और अनामिका की कविता में उन्नत पहाड़ों की गहरी गुफाओं में लगे जालों, पहाड़ों में छिपी मौत की चुहिया, सर्जरी के प्लेट में खुदे-फुदे नन्हें पहाड़ों से खिलन्दड़ा संवाद, दस बरस से पीछे पड़े बुलबुलों का फूटना, ब्लाउज़ के छिपे तकलीफषें के हीरों को निकाल बाहर करना यह सारा कुछ एक मनोरुग्ण प्रलाप-सा लगता है। दरअसल, एक जबर्दस्त साहसी नारीवादी कविता गढ़ने के चक्कर में अनामिका ने न सिर्फष् अन्तरविरोधी रूपकों-बिम्बों का जंगल खड़ा कर दिया है, बल्कि एक बेहद संवेदनहीन, असौन्दर्यात्मक, आत्मिक रूप से कंगाल 'सिंथेटिक' कविता बना डाली है। यहाँ भी उनका उत्तर-आधुनिक लोकवाद उपस्थित है। दूध भी वे दुनिया की सारी स्मृतियों को पिलाती हैं। स्मृतियाँ अतीत और परम्पराओं से जुड़ती हैं। कोई भविष्य-स्वप्न नहीं है उनके पास दूध पिलाने के लिए। राहत देने के लिए अन्तिम शरण्य फिर स्मृतियाँ ही हैं। इन कविताओं पर मेरी स्थिति कुल मिलाकर शालिनी माथुर, प्रभु जोशी, राहुल ब्रजमोहन और दरबारी लाल ('समयांतर', सितम्बर, 2012) के साथ है, हालाँकि मेरी और इन सभी टिप्पणीकारों की विचारधारात्मक अवस्थितियाँ अलग-अलग हैं।
 
इन कविताओं और इनके (विशेषकर वामपन्थी पैराकारों के) तर्कों-वितर्कों को आज के उस देशकाल के परिप्रेक्ष्य में रखकर देखा जाना चाहिए जब चतुर्दिक पुरोगामी प्रवृत्तियों पर प्रतिगामी प्रवृत्तियाँ हावी हैं, यथास्थिति का ठहराव सड़ान्ध पैदा कर रहा है, मुक्ति की हर परियोजना को वर्चस्वकारी यूटोपिया बताकर खारिज किया जा रहा है, साहित्य में वामपन्थ के दायरे में भी नवरूपवादी क्रीड़ा-किल्लोल हो रहे हैं, अस्मिताओं के स्वयंस्फूर्त संघर्षों का महिमामण्डन हो रहा है, सामाजिक-ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्यों को दृष्टिओझल किया जा रहा है, ''लोकवाद'' के नाम पर प्राक् आधुनिक व्यामोह परोसे जा रहे हैं, खाया-पिया-अघाया महानगरीय बौद्धिक समुदाय जनाकांक्षाओं के साथ ऐतिहासिक विश्वासघात कर चुका है, अकर्मक विमर्श और खिलन्दड़ा सृजन कर्म हो रहा है। ऐसे में, व्यापक स्त्री समुदाय के जीवन, संघर्ष और स्वप्नों से कोसों दूर ऐश्वर्य द्वीप की निवासिनी विश्वविद्यालयी विदुषियाँ स्त्री देह में स्त्री प्रश्न का कीलन कर रही हैं, पाखण्डपूर्ण बुद्धिविलास कर रही हैं और साथ ही, ''रसिक-जनों'' का काफी मनोरंजन भी कर रही हैं। और जहाँ तक आज के उदीयमान-प्रतिभावान, प्रशंसित-पुरस्कृत, ज्यादातर वामपन्थी (वैसे आजकल वाम दक्षिण में और दक्षिण वाम में प्रतिष्ठित हो रहा है) युवा कवियों का सवाल है; अपने जीवन और कृतित्व में स्त्री को लेकर वे कितने ''उग्र मुक्तिकामी'' और ''परम्पराभंजक'' हैं, यह हिन्दी साहित्य प्रदेश के सुधी नागरिकगण जानते ही होंगे।
katyayani
 
 
 
 



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