Sunday, August 28, 2011

कविता: कितनी मजबूरी, कितनी जरूरत

यह पूरा अंक यहां रखा है.

डायरी के कुछ अंश ऊना, हिमाचल प्रदेश से गुरमीत बेदी की पत्रि‍का पर्वत राग में छपे थे. 
उसके नए अंक की प्रतीक्षा है जो लीलाधर जगूड़ी पर केंद्रित है.  


इतने लंबे अर्से के बाद यहां होना बता देता है, जीवन के क्या हाल हैं। यूं सब ठीकठाक चल रहा है। साहित्य जीवन से गायब है। संग साथ भी वैसा नहीं है। पढ़ना यादा हो नहीं पाता। जो होता है वह यांत्रिक प्रकार का होता है। जीवन की चिंहुक बनाए रखने के लिए शायद मेहनत करनी पड़ती है। जीवन को बीच में धंसकर भोगना लेकिन फिर भी उससे मुक्त रहना। उसी तीसरी आंख से देख सकने की कूबत पैदा करना। और वही होता नहीं है। धंस गए तो धंस गए उसी मध्यम वर्गीय चहबचे में। उबरे रहे तो उखड़े रहे। बेमन अनमने हाशिए पर। जब तक धंसकर अलग नहीं होंगे, वह भी पूरी शिद्दत से, तो कविता कहां से होगी। कविता का छलावा होगा। पेशागत मजबूरी के तहत घसीटे गए शब्द होंगे। मुझे बार-बार लगता है कि कविता  को पेशागत मजबूरी की तरह नहीं लेना है। आंतरिक जरूरत ही इसकी होनी चाहिए। पेशागत मजबूरी का एक बड़ा जीवंत दृश्य है। उसे मजेदार नहीं कहना चाहिए। मजबूरी के सूखे हुए आंसू उसमें हैं। अभी कुछ दिन पहले हम लोग (मैं सुमनिका और बेटी अरुंधती..) धर्मशाला से लौट रहे थे। पठानकोट चक्की बैंक स्टेशन पर एक घंटा ट्रेन की प्रतीक्षा करनी थी। वहां तीन बालक नाच-गाना दिखाकर पैसा मांग रहे थे। पुलिस वाले कुर्सियां बिछाकर बैठे थे। सबसे बड़ा करीब 12 साल का बालक ढोलक बजाता और गाना गाता था। उसके दो भाई करीब 9 साल का और कोई 6 साल का नाच करते थे। पंजाबी लोक ताल के संस्कार में फिल्मी गाने ब्रेक नृत्य के साथ। छोटे-छोटे बालक कूल्हे बाहें गर्दन मटकाते थे। काठ की तरह देह को झटक देते थे। सोचते कुछ थेे, देखते कुछ थे, करते कुछ थे। टे्रन में भ्भी शायद जालंधर तक आए। उसी मुद्रा में गाते नाचते। इस बीच शायद उन्होंने 10-15 रुपए भीख की तरह पा भी लिए हों। सामाजिक तिरस्कार के शिकार। कुपोषण के शिकार। अपेक्षाकृत सरल साधन से पैसा बटोरने का इंतजाम करते हुए। सोचते तो शायद वे यही होंगे कि ट्रेन वालों को, पुलिस वालों को खुश रखा जाए। बेमन से कुल्हा या हाथ या गर्दन मटका के दर्शकों को खुश कर दो। एक-दो रुपया या अठन्नी, चवन्नी निकल आए। बाप या बड़े भाई या ठेकेदार को देने वाले पैसों से छुपाकर अपने लिए टॉफी, गोली खा ली जाए। बंद-छोले खा लिए जाएं ।

कुछ ऐसी ही पेशागत मजबूरी उस व्यक्ति की है जो कवि साहित्यकार बने रहना चाहता है। उसके लिए कुछ लिखतेs रहना चाहता है। दो तीन महीने में उसकी कविता कहीं दिख जाए। साल दो साल में संग्रह छप जाए। समीक्षा चर्चा होती रहे। सभा गोष्ठी में नाम ले लिया जाए या कविता वांचने का मौका मिल जाए।
सार यह कि जैनुइन या खरी कविता आज कितनी है और कहां है? कवि के पास जीवन धन कितना है? वह कैसे अपने को बनाए रखता है? अपने को कितना सघन और व्यापक बना पाता है? और अंतत: उसकी कविता पहुंचती कहां है? उसके पढ़ता कौन है? क्या वह अपना पेशा निभाता है? अपनी आंतरिक मजबूरी के तहत लिखता है? क्या वह स्वांत: सुखा; है? उसका समाज में क्या दखल है? कविता में आज कितनी ताकत बची है? उसका सरोकार क्या है? वगैरह-वगैरह..ये सवाल इतने जटिल और दुरुह हैं कि जवाब सूझते नहीं हैं। और जीवन सपाट और सतही और संवेदनहीन होता चला जाता है। इस शोक स्थिति का कोई अंत कहीं नजर नहीं आता।
11-06-97

Sunday, August 14, 2011

बरसात और छाता



पिछली बरसात में छाते पर चर्चा चली थी. इस बीच हमारे बड़े भाई तेज जी ने वो पोस्‍ट देखी और छाते पर यह टिप्‍पणी भेजी -

तुम्हारे ब्लाग में से मैंने "छाता" पढ़ा तो मुझे छत्तरोड़ू की बड़ी याद आई,  वो वचपन की सारी यादें... तुम्हें शायद याद होगा कि नहीं, ग्रामीण लोग "ऒड्डी" भी ओढ़ते थे जो बान्स की चपटियों से बुनी हुई होती थी. सिर के ऊपर बाला सिरा किश्‍तीनुमा और पीठ तक को ढकने बाला हिस्सा चपटा गोल-कट होता था...

छ्त्तरोड़ू

मैं बचपन की तुम्हें याद दिलाता,
गांव में नहीं दिखता था छाता.
(हर कोई नहीं रख पाता था छाता)
होता था तो बस इक "छत्तरोड़ू",
बान्स की डण्डी, ऊपर सूखा "पाता".
झर-झर बरखा औ धान बुआई,
धंसे कीच में सब काम्मेंभाई.
सिर पर ओढ़े बोरी का "ओह्डणू’,
कीच में कीच हुये अनदाता’.
हां, जिसके के पास होता था छाता,
वो तो  भई "बझिया" कहलाता.

नोट: (हमारे नानू को गांव बाले "बझिया" कहते थे.
क्योंकि उनके पास छाता हुआ करता था)

इस छाता चर्चा के साथ उन्‍होंने दो चित्र बनाकर भेजे, एक छतरोड़ू का जो ऊपर है और एक मुच्‍छड़ जो नीचे है. 

मुच्‍छड़ पर और काम

मुदित (भाई साहब का बेटा और मेरा भतीजा  जो बैंगलोर में है और रंग रेखा और संगीत का धनी है) को कहा कि इस मुच्‍छड़ पर काम करो. उसने उसका कायाकल्‍प कर दिया पर छाता गायब हो गया सिर्फ मुच्‍छड़ रह गया. मतलब अब बरसात बिना छतरोड़ू के ....


मुदित का और काम उसके ब्‍लाग the spare time stuff पर देखा जा सकता है. 

Saturday, August 6, 2011

सुर में आलाप

कवि सुंदर चंद ठाकुर नव भारत टाइम्‍स के मुंबई संस्‍करण के संपादक बने तो उन्‍होंने अखबार में साहित्‍य  कला के लिए थोड़ी जगह निकाली और पुस्‍तक समीक्षा का कालम भी शुरू किया. इसमें मुझे भी समीक्षा करने  का मौका मिला, हालांकि ऐसे कामों में मेरी ज्‍यादा हिम्‍मत नहीं पड़ती है. फिर भी...  
यहां एक और युवा कवि गीत चतुर्वेदी के संग्रह आलाप में गिरह पर संक्षेप में अपनी बात रख रहा हूं. 




 
मुंबई महानगर को भारत का एकमात्र कास्‍मोपोलेटिन शहर माना जाता है. ग्‍लैमरस, अत्‍याधुनिक और निस्‍पृह. हालांकि जो लोग यहां रहते हैं, वे इसके देसी रग-रेशे से वाकिफ हैं. इस वाकफियत का पता गीत चतुर्वेदी की एक कविता ‘जब जाऊंगा’ से लगता है. गीत मुंबई के हैं और वो इस कविता में घर को याद कर रहे हैं जिसमें पानी के लिए भटकते पिता हैं, मद्रासी पानवाला है, परदे के दरवाजे के पीछे सुबकी को छिपाती ब्‍याह दी गर्इ लड़कियां हैं. खंडहर, कटा पेड़, प्‍याऊ भी उनकी याद की पोटली में है. ये महानगर के किसी भीतरी कस्‍बे की यादें हैं. ऐसे कई कस्‍बे इस विराट महानगर में उपनगरों की तरह समाए हुए हैं. गीत उल्‍हासनगर में रहे हैं जहां सिंधी समुदाय का प्राधान्‍य है. सिंधियों के साथ विभाजन की त्रासदी जुड़ी हुई है. और इसी त्रासदी में से होती हुई गीत की कविता लंबी यात्राएं करती है. सभ्‍यता के विकास को खंगालते हुए वे बार-बार युद्ध स्‍थलों में जा पहुंचते हैं. ‘सभ्‍यता के खड़ंजे पर’ चल रहा मनुष्‍य एक कलाकार ही है जो सभ्‍यता की मरम्‍मत करने के लिए समय के आर पार तक की यात्रा कर डालना चाहता है. ‘डेटलाइन पानीपत’ कविता में वे पर्यटन स्‍थल में बदल चुके युद्ध के मैदान की घास, मिट्टी के भीतर घुसते हुए युद्धों और युद्धों के रूप को खंगालते हैं. आज तक चले आते सभ्‍यता के गुप्‍त युद्ध कौशलों को भी वे खोलते हैं. गीत की इस तरह की कविताओं में इतिहास और वर्तमान के बीच खूब आवाजाही है. कभी आवेग भरी, कभी दार्शनिक अंदाज में कभी खिलंदड़ी. ‘सिंधु लाइब्रेरी’ में इस उपमहाद्वीप की बेहद दुखती रग (भारत वि‍भाजन) का जिक्र तो है ही, युद्ध के बाद लुटे हुए नागरिकों की अपने जीवन को फिर से खड़े करने की जद्दोजहद भी है. हालांकि यह युद्ध नहीं था आजादी का छल था. सिंधी समुदाय की तकलीफ, किताबों का प्रेम और भूगोल का बदलना एक साथ इस वृत्‍तांत कविता में चलता रहता है. एक शोकगीत की तरह. विष्‍णु खरे ने अपने सोलह पेजी लेख में, जो इसी संग्रह के है, और भी कई बातों के साथ साथ यह ठीक ही नोटिस किया है कि इस कवि ने आजाद होते हिंदुस्‍तान को नहीं देखा, फिर भी उस त्रासदी को अपनी कविता में ढाला. यह शायद गीत के भीतर स्‍थानीयता की सांद्र उपस्थिति के कारण संभव हुआ है. यही नहीं, ‘लुक्‍खे’ जैसी देशज माहौल की कविता भी इसी धरती की देन है. इन वृत्‍तांत कविताओं में शिल्‍प की मांग के मुताबिक दृश्‍य प्राधान्‍य है, सुगठित चरित्र हैं, संवादात्‍मकता, इतिवृत्‍तात्‍मकता  और नाटकीयता है. इस वैविध्‍य के कारण शब्‍द बाहुल्‍य बाधक नहीं बनता. इसके अलावा ‘सिंधु लाइब्रेरी’ और ‘लुक्‍खे’ में करुणा की धारा बहती रहती है. इतिहास और सभ्‍यता की टोह लेने का काव्‍य-पुरुषार्थ नम आंख, झुके कंधों, हल्‍के पांव और नर्म उंगलियों के बिना संभव नहीं हो सकता. अलबत्‍ता ‘साइकिल के डंडे पर बैठी लड़की’ कविता समाज शास्‍त्रीय खोजबीन ज्‍यादा प्रतीत होती है, प्राण-प्रतिष्‍ठा युक्‍त कृति कम.

कवि का अपना छोटा शहर ‘अरब सागर’ जैसी कविता में महानगर की पूरी विराटता, विकरालता, पेचीदगी, निष्‍ठुरता के साथ विस्‍तार पाता है. ‘नरीमन पाइंट’ भी उसकी एक कड़ी ही है. उसमें भी एक कब्रगाह है जैसे अरब सागर के उदर में कई कुछ समाया हुआ है. अरब सागर और नरीमन पाइंट मिलकर महानगर के छाया रूपक की तरह एक समानांतर सृष्टि करते हैं. यहां भी उदासी और अवसाद है. कस्‍बे, शहर, महानगर, देश, महाद्वीप, वर्तमान, इतिहास में बेजोड़ (सीमलेस) ढंग से विचरण करने की कविता है ‘इतना तो नहीं’. यह बेजोड़पन गीत की कई कविताओं में है.

संग्रह में अलग अलग तरह की कई अन्‍य कविताओं के अलावा करीब ग्‍यारह कविताएं दूसरे कलाकारों कवियों, संगीत, चित्रकृतियों को याद करते हुए लिखी गई हैं. कई कविताएं उन सामान्‍य लोगों पर भी है जो कवि के प्रत्‍यक्ष परोक्ष संपर्क में आए. ‘कॉस्‍मैटिक सर्जरी’, ‘मेरे वक्‍त का एक अहम सवाल’, ‘कोई और सुर’, ‘आलाप में गिरह’ जैसी कविताओं में कवि, रचनाकार की कशमकश, द्वन्‍द्व, उहापोह से भी दो चार होता है. संग्रह का शीर्षक भले ही आलाप में गिरह हो पर गीत का काव्‍य सुर सधा हुआ है.            

 

गीत चतुर्वेदी आलाप में गिरह (कविता) राजकमल प्रकाशन, दिल्‍ली 110002 मूल्य रु. 195/-  पृष्ठ 159, वर्ष 2010



Saturday, July 9, 2011

तिब्‍बती कविता

धर्मशाला, मेक्‍लोडगंज में दलाई लामा और तिब्‍बती रहते हैं. वहीं हैं कवि लासंग शेरिंग. एक दोस्‍त ने उनसे मुलाकात कराई, मैक्‍लोडगंज में ही, जहां शेरिंग बुक वर्म नाम का किताबों की दुकान चलाते हैं. इनका एक संग्रह है टुमारो एंड अदर पोइम्‍स, जो अब आउट आफ प्रिंट हो गया है. उनहोनें अपनी चार कविताओं के कार्ड बना रखे हैं. आप इन्‍हें बुक मार्क भी कह सकते हैं. इनकी ये चार कविताएं यहां जस की तस






गड़बड़

लेबल ठीक करते करते न जाने क्‍या गड़बड़ हो गई कि दो पुरानी टिपपणियां सबसे ऊपर आकर चिपक गईं. इन्‍हें अपनी जगह वापस कैसे रखते हैं, यह समझ नहीं आ रहा, इसलिए क्षमा करें. अगर आप इन्‍हें पहले पढ़ चुके हैं तो कृपया नजरअंदाज़ कर दें और न पढ़ा हो तो पढ़कर कृतार्थ करें.

सरदार







रात दो बजे का वक्त है। पंजाब का एक खदबदाता हुआ शहर - लुधियाना। कहते हैं लुधियाना के लोग विदेश जा बसे हैं। यह एनआरआइयों का शहर है। चमक दमक और ठसक को देखकर लगता है वाकयी यह एनआरआइयों का ही शहर है। लेकिन जितने गए हैं उतने ही रह भी तो गए हैं। तभी तो गमकता है शहर। ये खुद गए हुए हैं। या इनके रिश्तेदार गए हुए हैं। या ये जाने वाले हैं। किसी किसी तरीके से तार जुड़ी हुई है।
इस शहर में रात दो बजे का वक्त और एक बड़ा अस्पताल। भरा हुआ। शहर ही की तरह। दर्जन भर से ज्यादा वार्डों में से एक वार्ड पर नजर डालें। पचीस के करीब बिस्तर। सभी भरे हुए। खाली कोई नहीं। कोने वाली टयूब लाइट जल रही है। लोग सो रहे हैं। लोग ऊंघ रहे हैं। लोग हरकत में हैं। हर कोई अपने में और अपनों में।
एक बिस्तर से एक सरदार उठता है। एक हाथ में ड्रिप लगी है। दूसरे हाथ में बोतल। पाइप बिंधी हुई। उल्टा लटका के सरदारजी आराम से चल रहे हैं। जैसे स्टैंड साथ साथ चल रहा है। अविचल। निर्विकार। उन्हें शायद बाथरूम जाना है। नसों में लगातार जाते गुलूकोज की इस प्रक्रिया को उन्होंने ऐसे गले लगा लिया है जैसे मामूली पट्टी बंधी हो। साधारण आदमी हो तो सूई के नाम से ही दो मील दूर भाग जाए। और ये बहादुर गुलूकोज की बोतल अपने ही हाथ में उठाए घूम रहे हैं। उमर भी पकी हुई है। चिलगोजियां करने दिखाने बाली उमर नहीं। बालों का जूड़ा सिर पर बंधा है। जूड़ा क्या जूड़ू ही है। गंज तो सरदारों को भी पड़ता है।
किसी सरदार को इस हाल में देखने पर एक बारगी झटका लगता है। हालांकि बीमारी का शिकार तो सरदार भी होंगे ही। पर छवि कुछ मन में ऐसी बैठी है कि सरदार माने दिलदार। दिलवर। दिलकश। मस्ती, मजा, मजाक, मेहनत, मुहब्बत और मर्दानगी का नाम सरदार है। बहादुरी और ताकत का मानवीकरण। पारंपरिक लोक मानस और आधुनिक मीडिया ने इस रूप को गढ़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। ऐसी लाजबाव कौम के नायक को बीमार हालत में देखते ही जाति की सामूहिक छवि बिखरने लगती है।
अस्पताल के इसी वार्ड में शाम का वक्त है। सरदार जी तैयार हो रहे हैं। या कहना चाहिए सज संवर रहे हैं। बीमार आदमी भी तो सजता संवरता है। बल्कि इससे थोड़ी सफूर्ति ही पाता है। इस उपक्रम में सरदारनी जी मदद कर रही हैं। हाथ मुंह धो चुके हैं। कपड़े भी बदल लिए हैं। केश काढ़े जा रहे हैं। पकी उमर है। सरदारनी जी दारजी के बाल संवार रही हैं। लड़कियां चोटी करते समय बालों को पीछे पीठ की तरफ काढ़ती हैं। सरदार सिर झुका के आगे को बाल काढ़ते हैं। खुद ही काढ़ते हैं। पर यहां ये दारजी बीमार हैं। दारनी प्रेम से लगी हैं। बाल कम ही बचे हैं। नींबू बराबर जूड़ा बनता है। सरदारजी का इस तरह से झुका हुआ चेहरा, बालों के नन्हें से झरने से ढंका हुआ। सरदारनीजी के हाथों की हरकत। सरदारजी इस वक्त क्या सोच रहे होंगे।
बड़े भोले लगते हैं जब सरदार बाल काढ़ रहे होते हैं। तब क्या उनके अंदर की प्रकृति माता जागी होती है? क्या सरदार पुरुष और प्रकृति का पूर्ण समन्वित रूप हैं। बहादुर, दिलेर सरदार इतना कोमल और मनोरम भी है। रोज जिसके सिर में से झरना फूटता है। क्या सरदार अपने शीर्ष पर गंगा को धारे रहते हैं? क्या सरदार शिवजी के वंशज हैं?
पर यह तो सिख कौम की समूहिक छवि नहीं है। इस बारे में कौन जानता है। प्रकृति तो हरेक इंसान के भीतर छिपी बैठी होती ही है। कुछ प्रकट कुछ अप्रकट।
अहमदाबाद के शायर सुलतान अहमद से एक बार बात हो रही थी। दंगों में झुलस के आए थे। उन्होंने हमारी आंखें खोलीं कि जाति या कौम के नाम पर सरलीकरण नहीं करने चाहिए। उनकी बात सिर माथे पर। पर किसी इंसान के रूप सरूप और गतिविधि को देख कर उसके छुपे हुए आयाम दिखने लगें तो क्या करें। और अगर वे जाति की छवि के कंट्रास्ट में और चमकने लगें और व्यक्ति की खूबियां सामने आने लगें तो क्या करें।

बाबूजी, संभलना



जमाना बदलता है तो उसकी चाल ढाल भी बदलती है। रंग ढंग भी बदलते हैं। क्या चाल ढाल और रंग ढंग से ही जमाने की पहचान होती है? पूरे तौर पर न होती हो, नब्ज तो पकड़ में आ ही जाती है। बाबू की पहचान हुआ करती थी कमीज, धोती या पाजामा, जूता और टोपी। टटपूंजिया बाबू होगा तो सब्जी तरकारी ढोता दिखेगा। ए के हंगल
फिल्मों में कुछ इसी तरह चलते दिख जाते थे। सिर पर काली टोपी भी होती थी। यह मुंशी, बाबू, मास्टर, मुनीम का मिलाजुला रूप था। एक जमाने में इन महाशयों के परिधान में छतरी या छड़ी भी जुड़ी रहती थी। अशोक कुमार भी ऐसी भूमिकाओं में दिख जाते हैं। ये अपने जमाने के पढ़े लिखे नौजवान होते थे। तकरीबन
दसवीं पास। लेकिन पाएदार। उर्दूदां। अंग्रेजी के जानकार और मिसिल के माहिर। दीन दुनिया की खबर रखने वाले। जात बिरादरी,
कुनबे, कस्बे की ऊंच नीच की परवाह करने वाले। सद्गृहस्थ। आम तौर पर पत्नीव्रता। घर के मुखिया और दफतर की धुरी। निश्चिंत, संतुष्ट और दाल रोटी खाने वाले परोपकारी जीव। इनमें से बीए पास कोई नसीब वाला ही होता था। वह टाई पहनता था। उसका ठसका जरा फ किस्म का होता था।

अगले दौर में बीए पास मध्यवर्गीय बाबू की शक्ल अमोल पालेकर से मिलती है। अब तक पजामे की जगह पेंट आ गई है। कोट उतर चुका है। नौकरी के लिए इंटरव्यू के वक्त टाई की जरूरत महसूस होती है। धांसूपन दिखाना हो तो कोट पहनना पड़ेगा। जुल्फें लंबी हो गई हैं। कलमें भी कान तक नीचे उतर आई हैं। ये नौकरीपेशा नौजवान सफेद और सूफियाना पट्टीदार कमीजों से आगे निकलकर चारखानेदार और रंग बिरंगी शर्ट पे आ गए हैं। पेंट की जेबें अगल बगल से हटकर आगे आ गई हैं। प्लीट खत्म हो गए। मतलब पैंट अब झोला टाइप नहीं रही। चुस्त दुरुस्त हो गई। इससे बाबू की अदा में थोड़ी ठसक, थोड़ी धज आ गई। इस बाबू की उम्र भी थोड़ी कम हो गई। पहले बाबू पचास में होता था। यह चालीस के अंदर ही है। इस बाबू का ग्रेजुएट होना आम बात थी। मतलब तरक्की की एक सीढ़ी पार कर ली गई थी। पिछले दसेक सालों में इस मध्यवर्गीय बाबू की छवि में और चुस्ती आई है। उम्र और भी कम हुई है। वह बाबू की तुलना में अफसर भी बड़ा बन गया है। पुराने बाबू पैदल मार्च करते थे। छाता या छड़ी ले के ब्लैक एंड व्हाइट जमाने के उम्रदराज बाबू। फिर साइकिल रिक्शा आया। बाद में वे बस में लपकते हुए नौकरी पे जाने लगे। माने सिटी बस चलने लगी। तरक्की की सीढ़ियां चढ़ता बाबू अब गाड़ी चला के आता है। थोड़ा कमतर होगा तो स्कूटर। अच्छी कंपनी होगी तो कार। कारों में कार मारुति। मध्यवर्ग का ब्रांड इसी से बनता है। नए जमाने का यह बाबू कोट पहने होगा, टाई गांठे होगा। हाथ में उसके ब्रीफकेस होगा। टकटकाटक चलेगा। स्मार्ट ब्वाय। यह बाबू पोस्टग्रेजुएट है।
बाबुओं की ये छवियां निरंतर बदलती चली गई हैं। और अब तो आलम यह है कि जहां बाबू बबुआइन दोनों नौकरीपेशा होंगे, उनकी सम्मिलित स्मार्टनेस आसमान छूने लगेगी। यह एक बड़ी छलांग है। जो बबुआइन एक जमाने में खाने का डिब्बा बांध के देती थी। मुन्ने की नाक अपनी चुन्नी से साफ करती थी। माइके से भाई के आने का इंतजार करती थी। वह बबुआइन अब स्मार्ट गर्ल में तब्दील हो गई है। कैरियर बनाने की धुन उसे भी सवार होने लगी है। इस जोड़े की शक्लोसूरत ही नहीं, शगल, तहजीब, तासीर और सपने भी बदल चुके हैं। यह देश में ही रहने वाला एनआरआई है। ये अमूमन बड़े शहरों के बड़े बाबुओं की अगली पीढ़ी है। ये इंजीनियर, डाक्टर और ऊपर से एमबीए हैं। पासपोर्ट, वीसा हमेशा इनकी जेब में रहता है। प्रोफैशनल संसार में पैसे के लिए कहीं भी कूद जाते हैं। मोटी तनखाहें पाते हैं। दुनिया भर के लोन ले डालते हैं। बाल पकने या झड़ने तक संपत्ति खड़ी कर लेते हैं। यह सयानापन तीस की उमर पार करते करते आ जाता है। इनमें से जो जितना घाघ होगा, वह उतना ही ऊपर उठेगा। जो जितना लद्दू होगा, वह वहीं का वहीं पड़ा रहेगा। बीबी बच्चों की तीमारदारी करते हुए जीवन बिताएगा।
शाहरुख खान, सलमान खान वगैरह इन तेज तर्रार नवबाबुओं का पोर्टेट बनाते हैं। ध्यान रखिए, इस दौर तक आते आते बाबू की उम्र और कम हो गई है। बाबू शब्द भी नए अवतार पर फिट नहीं बैठता। एक्जिक्यूटिव शब्द इस छवि को झेल लेता था लेकिन इधर दुनिया इतनी तेजी से बदली है कि एक्जिक्यूटिव आजकल का ग्लैमरस नाम है। ये तो प्रेसिडेंट वगैरह होते हैं। अजीब है कि हिंदुस्तान का तो एक ही प्रसिडेंट है लेकिन एक एक कंपनी में दर्जनों प्रेसिडेंट हो सकते हैं। बला के स्मार्ट इस बाबू की उम्र कम हो गई है तो शिक्षा पहले की तुलना में कहीं ज्यादा बढ़ गई है। पैसा बेथाह आ गया है। देश दुनिया से दूरी भी उसी अनुपात में बढ़ गई है। यह बाबू लैप टॉप ले के मोबाइल हुआ फिरता है।
ईमेल के जरिए दुनिया से जुड़ा है। इससे कोई पूछे, भैये 'स्वदेस' में यह ईमेल जाती कहां कहां है?

भेड़ चाल तो हमेशा से चलती आई है। नकलचियों की कमी नहीं होती। तमाम शहर और कस्बे इसी तरह के प्रयोगों के लिए बने हैं। छोटे शहरों और कस्बों के लड़कों को ऐसी टकाटक जिंदगी तो नसीब नहीं होती, वे उसकी खराब जराक्स कापी टाइप जिंदगी जरूर बनाते रहते हैं। सपने नकल के देखते हैं। जिंदगी के धक्के असल के खाते हैं। जब उनके बाल बच्चे उनके कंधे बराबर बड़े हो जाते हैं, तो वे जवानी की अपनी हरकतों पर खिसियाने लगते हैं। वे समझने लग जाते हैं कि अब बच्चों की बारी आ गई है। उनके लिए जगह खाली कर देने में ही भलाई है।

Saturday, June 18, 2011

साहित्‍य के सामने नई चुनौतियां




पिछले दिनों रेडियो चीन से एक बातचीत दो भागों में प्रसारित हुई. बातचीत साहित्‍य, सूचना क्रांति और पाठक पर केंद्रित थी. यह नीचे दिए लिंक पर सुनी जा सकती है. चित्र मुंबई के कालेजी छात्रों के लिए शुरू की गई कविता कहानी प्रतियोगिता समारोह के हैं.


बातचीत भाग एक 



बातचीत भाग दो