Saturday, June 18, 2011

साहित्‍य के सामने नई चुनौतियां




पिछले दिनों रेडियो चीन से एक बातचीत दो भागों में प्रसारित हुई. बातचीत साहित्‍य, सूचना क्रांति और पाठक पर केंद्रित थी. यह नीचे दिए लिंक पर सुनी जा सकती है. चित्र मुंबई के कालेजी छात्रों के लिए शुरू की गई कविता कहानी प्रतियोगिता समारोह के हैं.


बातचीत भाग एक 



बातचीत भाग दो 

Friday, May 27, 2011

आधुनिक भारतीय कविता




पिछले दिनों प्रसिद्ध मलयाली कवि के सच्चिदानंदन का आधुनिक भारतीय कविता पर एक व्‍याख्‍यान सुनने का मौका मिला. मैंने उस व्‍याख्‍यान के प्रमुख बिंदु नोट करने की कोशिश की. कुछ नोट हुए, कुछ छूट गए. फिर भी इन विचार बिंदुओं पर एक सरसरी नज़र डालने से भारतीय कविता की एक तस्‍वीर तो उभर ही आती है. और ज्‍यादा न सही, कविता की प्रवृत्तियों की एक झलक तो मिल ही जाती है. यह प्रवृत्तियां सामाजिक परिवर्तनों-आंदोलनों के बरक्‍स चलती रही हैं. इस तरह सामाजिक परिवर्तनों और उनमें बौद्धिक हस्‍तक्षेप की झलक भी मिल जाती है. यहां सच्चिदानंदन की बातों को विचार बिंदुओं (बुलेट्स) की तरह ही रख रहा हूं. यह एक तरह का प्रयोग है. हो सकता है कुछ बातें अत्‍यधिक अमूर्त और असंबद्ध लगें. पर व्‍यापक परिप्रेक्ष्‍य में विचार करने पर वे आपस में जुड़ जाएंगी, ऐसा विश्‍वास है. हो सकता है मुझे ऐसा इसलिए लग रहा हो क्‍योंकि मैंने पूरा भाषण सुना है. पर सुधी जन अपनी अपनी समझ से इन बिंदुओं के बीच के रिक्‍त स्‍थानों को भर भी तो सकेंगे. जब हम इन विचारों की व्‍याख्‍या करने लगेंगे तो एक तो अमूर्तता कम होगी और परस्‍पर संबंद्ध भी बैठने लगेगा. 

एक बिंदु है आधुनिकता और दूसरा है लोकतांत्रीकरण (यानी व्‍यापक, सामूहिक और सामाजिक दृष्टिकोण).

आधुनिकता –
  • रैडिकल
  • इसने रोमांटिक ईडियम को बदल दिया
  • नया परिप्रेक्ष्‍य - शहरीकरण. ग्रामीण जीवन का अवसान. शहरों की ओर पलायन. जड़ों से अलगाव.
  • गांधीवादी मूल्‍यों का क्षरण.
  • एक नया दिक् और काल जहां मनुष्‍य एक सूक्ष्‍म प्राणी बन कर रह गया है
  • असुरक्षा बोध जैसे मनुष्‍य किसी भंवर में फंस गया हो
  • यह नई कविता मराठी कवि मर्ढेकर से आरंभ होती है
  • इस पर बॉद्लेयर का प्रभाव है
  • यू. अनंतमूर्ति ने एक काव्‍य संग्रह संकलित किया था वि‍भाव निसर्ग. यह टैगोर सिंडरम से विद्रोह का प्रदर्शन था यानी रोमैंटिसिज्‍म को अलविदा.
  • विश्‍वास, प्रकृति, जन, ईश्‍वर से दूरी.
  • संदेह करना.
  • पैट्रीसाइड यानी पितरों-पूर्वजों को मार देना यानी पूर्ववर्तियों से मुक्ति. बकौल पणिकर – पिछली पीढ़ी का नकार.
  • और इस तरह भारतीय मिथकों की पुनर्व्‍याख्‍या. आधुनिक संदर्भ में जो प्रगतिशील और पारंपरिक दोनों ही तरह की रही है.
लोकतांत्रीकरण
  • श्रामणिक (कर्मकार) परंपरा. ब्राह्मणि‍क परंपरा . जनजातीय मौखिक परंपरा
  • उच्‍च आधुनिकता – व्‍यक्तिवादी. सामाजिक सरोकारों से परे. (अस्तित्‍ववाद)
  • जनोन्‍मुखता का उभार  
  • जागरण काल. दलित आंदोलन. राष्‍ट्रव्‍यापी हड़तालें. नक्‍सलवाड़ी. पर्यावरण के प्रति जागरूकता की शुरुआत.
  • एकध्रुवीय विश्‍व का प्रभाव (सोवियत संघ का विघटन)
  • बाजार, बाजारवाद का उभार
  • मानकीकरण
  • हिंदू राष्‍ट्र – विविधताओं के विपरीत
  • आजादी- बाजार केंद्रित – वस्‍तु और ब्रांड के चुनाव की आजादी
  • प्रगतिशील आधुनिकतावादी रुझान
  • माओवादी, गांधीवादी, लोहियावादी सभी असंतुष्‍ट
  • अभिव्‍यक्ति की जटिलता
  • आत्‍मनिरीक्षण
  • सरोकार
  • सबाल्‍टर्न (हाशिए की) कविता
दलित कविता
  • कन्‍नड़ में बंद्यु कविता
  • मराठी में दलित कविता. उत्‍पीड़न और दमन की अभिव्‍यक्ति
  • नई भाषा में
  • दलित महिला कविता
  • पित्रसत्‍ताक भाषा यानी पुरुष प्रधान भाषा का सामना
  • नेटिविस्‍ट आंदोलन
  • सांस्‍कृतिक उपनिवेशीकरण को खत्‍म करना
  • धर्म संस्‍कृति‍ भाषा की पुनर्खोज . आदान प्रदान के लिए. प्रभुत्‍व जमाने के लिए नहीं .
  • बहुलतावाद का उत्‍सव
  • एकरूपता और सतहीपन से विद्रोह
  • कोई फादर फिगर्स नहीं

एक और बात. सच्चिदानंदन ने यह भाषण नई मुंबई के केरली समाज केंद्र में दिया था, पूरी तैयारी के साथ. श्रोता थे मुंबई में रह रहे मलयाली. किसी हिंदी भाषी समाज में इस तरह के साहित्यिक कार्यक्रम की कल्‍पना आसानी से नहीं की जा सकती.    

   

Sunday, May 8, 2011

टाइप राइटर



इधर खबर है कि टाइपराइटर बनना बंद हो गया है. हालंकि होमिओपैथी दवा की दुकानों में आज भी दवा का लेवल पोर्टेबल टाइपराइटर पर टाइप कर के शीशी पर चिपकया जाता है.  वे अंग्रेज़ी की मशीनें हैं. हिंदी तो शायद सरकारी  दफ्तरों और कचहरियों में ही टाइप होती रही है. अभी भी होती है. कम्प्यूटर सब जगह अभी कहां पहुंचा है. 

लेखकों में मोहन राकेश ने अपने नाटक टाइप मशीन पर लिखे हैं.  ज्ञानरंजन जी के पत्र  टाइप किये हुए आते थे. चंडीगढ़ से कैलाश अह्लूवालिया के पत्र आज भी  लाल काले टाइप में आते हैं. 

मैंने यह टाइपराइटर आकाशवाणी में नौकरी पाने के कुछ  समय बाद लिया था. जो  थोड़ा बहुत लिखा, वह  इसी पर टाइप  किया.  कम्प्यूटर आने के बाद  टाइपराइटर अल्मारी के  ऊपर चला गया. अब  तो .....









Thursday, April 14, 2011

हिमाचल मित्र ग्रीष्म 2011


आज हिमाचल मित्र का ग्रीष्म अंक आ गया.

Wednesday, January 26, 2011

एक ही पहचान है



यह कविता ओम अवस्‍थी  की है. उनकी यह कविता आभार सहित प्रस्‍तुत कर रहा हूं. बी ए में धर्मशाला में और फिर एम फिल में अमृतसर में  उनसे पढ़ने का सौभाग्‍य मिला है. इनकी तरह के बहुत कम अध्‍यापक मिले हैं. आचार विचार से आधुनिक, प्रगत‍िशील, स्‍पष्‍ट, खरे. समकालीन साहित्‍य और नाटक का संस्‍कार देने में उनका योगदान है. अवस्‍थी जी हिंदी के ऐसे प्रोफैसर रहे हैं जो हिंदी वालों जैसे नहीं लगा करते थे. उन दिनों (1975-78) धर्मशाला कालेज में एक अलग ही माहौल था. अवस्‍थी जी के साथ साथ रमेश रवि का भी अपार स्‍नेह हमें मिला है. धर्मशाला से ऐसे जुड़े कि रिटायर होकर वहीं जा बसे हैं. एक जमाने बाद मिली उनकी यह कविता, वही धार लिए हुए, जिसके बारे में अजेय ने कबाड़खाना में ठीक ही कहा है कि कविता की खोई हुई लय इसमें मिलती है. उन्‍हीं नए-नए से रचनात्‍मक दिनों की याद में  ..        


    (26 जनवरी पर)

    अब नहीं मिलते कहीं भी
          पिघलते-से लोग --
          धड़कनों की थाप पर वे थिरकते-से लोग --
          वे खुले-से लोग, रसभोक्ता-से लोग --
          ख़ुशबुओं के पारखी वे कुशल गंधी लोग
          जो समन्वित चेतना से अति सहज ही
          कन्याकुमारी के नवोदित सूर्य-थालों में
          सूँघते थे काश्मीरी गंध केशर की ,
          और कस्तूरी-मृगों के दूर पर्वत-प्रान्तरों से
          देख लेते थे बँधा रामेश्वरम पर पुल 1
          क्या फलक था ! क्या परख थी !! क्या नज़र थी !!!  
          फ़ासलों को भाव-यानों से सहज में पाट लेते थे ,
          कि हर अलगाव को वे
          सोच के  व्यवहार से ही काट देते थे 1
          सच, नहीं मिलते हमें वे लोग, वे पुलों-से लोग;
          जी, बहुत नायाब हैं वे विश्व-दर्शक लोग,
          राष्ट्रचिन्तक, राष्ट्रजीवी लोग –
          राष्ट्र था पहचान जिन की ,
          और जिन से राष्ट्र पहचाना गया 1

          अर्थ-खोजी उन रसज्ञों की जगह अब
          एक सड़िय़ल बेसरोकारी
          महज़ आलोचना में बोलती है,
          स्वार्थ से सब नापती है, अहम् से सब तोलती है ;
          गोदरा से, अवधपुर से, गुलमरग से, मुम्बई से,
          जहां से भी छिद्र मिलता है, वहीं से
          रोज़ कोई ज़हर जल में घोलती है 1
          पोथियों के , जातियों के , बोलियों के नाम पर वह
          नफ़रतों को पालती है,  आफ़तों को खोलती है 1

          बंधुओ ! अंदाज़ उस का फ़लसफ़ाना है,
          तर्क घटिया बूर्जवाना है,
          कर्म छद्मों से भरा है, क़ातिलाना है,
          चलन उस का भीड़ को पीछे चलाना है,
          आदमी को रेत कर के शहर को मरुथल बनाना है 1
          वह तमिस्रा को हमारे सूर्य-मुखियों पर
          स्वयं ही तानती है ,
          और फिर ख़बरें बनाती
          कि उन्हें अंधा बनाया जा रहा है 1

          तुम मगर उस के इरादों को कभी फलने न देना ,
          इन विषैली आँधियों को बेधड़क चलने न देना ;
          क्योंकि तुम इन से बड़े हो ,
          क्योंकि तुम इन से लड़े हो ,
          क्योंकि तुम टोपी नहीं  हो ,
          क्योंकि तुम कुल्ला नहीं हो ,
          तुम महज़ वोटर नहीं हो
          और कठमुल्ला नहीं हो 1

          बस तुम्हारी एक ही पहचान है –
          और वह व्यापक वतन है , जो कि शतरंगा वतन है ,
          उस वतन के एक गोशे में सुनहरा गाँव है
          वह तुम्हारा गाँव है, वह हमारा गाँव है ,
          गाँव में पोखर किनारे पितर-पीपल है
          जो तुम्हारी आत्मा को उस समूची आत्मा से जोड़ता है 1
         उस समूची आत्मा की एक ही प्रतिबद्धता है ;
         और वह हर ज़हर को धिक्कारना है ,
         और वह अन्याय को ललकारना है 1

         तुम जहां भी हो तुम्हें ट्रैक्टर चलाना है,
         तुम्हें  खेती उगाना है ,
         फिर पसीने से नवांकुर सीँचना है 1


Sunday, January 16, 2011

संगोष्ठियों का आयोजन



सोफिया कालेज के अंग्रेजी और हिंदी विभाग ने मिल कर रहस्‍य काव्‍य और सामाजिक रूपांतरण पर दो दिन की गोष्‍ठी 14 और 15 जनवरी को की. इसमें अकादमिक पर्चों के साथ साथ फिल्‍म, नृत्‍य और संगीत को भी शामिल किया गया. जैसे अक्‍का महादेवी पर डाकुमेंटरी दिखाई गई. आंदेल के पदों पर भरतनाट्यम् हुआ. ललद्यद पर पर्चे के बाद उनके वाखों की ऑडियो प्रस्‍तुति हुई. व्‍याख्‍यानों में जहां कबीर सूर तुलसी मीरा पर बात हुई, वहीं सूफी परंपरा और बुल्‍लेशाह, ललद्यद, अक्‍का, आंदेल के बारे में भी जानने को मिला. कुछ इसाई संतों पर भी प्रकाश डाला गया. चर्चाएं रहस्‍य, भक्ति और उसके सामाजिक पहलुओं पर हुईं. 
       
इसमें आयोजन से जुड़ी हुई कुछ बातें ध्‍यान खींचती हैं. हरेक सत्र में सभापति का काम प्रश्‍न-उत्‍तर करवाना मात्र होता था. वह अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य नहीं देता था. शायद इसीलिए उन्‍हें वयोवृद्धों को अध्‍यक्ष बनाने की जरूरत न‍हीं पड़ती थी. इससे समय की बचत हुई और श्रोता उक ही तरह की बातों को दुबारा सुनने से बच गए.

दूसरे, सारे कार्यक्रम में छात्राओं की भूमिका जबरदस्‍त थी, वालंटीयर के रूप में, अतिथियों को गेट पर रिसीव करे हाल में बिठाने तक, मंच पर वक्‍ताओं को स्‍मृतिचिह्न देने में और हाल में प्रश्‍न पूछने वालों के पास माइक ले जाने में वगैरह.

तीसरे, समय की पाबंदी. व्‍याख्‍यान के पच्‍चीस मिनट होने पर सभापति घंटी बजा देता था और वक्‍ता अपनी बात का समाहार करने को बाध्‍य हो जाता था.

यह जानकारी इसलिए दे रहा हूं क्‍योंकि हिंदी के सेमिनारों में प्रायः इस तरह का अनुशासन नहीं दिखता. अगर हिंदी के सेमिनार भी इसी तरह चुस्‍त-दुरुस्‍त और चाक-चौबंद होने लग जाएं तो कितना अच्‍छा हो. 
       

Friday, December 3, 2010

बदलते समय को समझना जरूरी


पिछले साल कवि राजेश जोशी मुंबई आए तो जनवादी लेखक संघ ने मुंबई के एक उपनगर मीरा   रोड में एक गोष्ठी आयोजित की। इसमें राजेश जोशी ने क़रीब घंटाभर अपनी कवितों  का पाठ किया और उसके बाद साथियों ने उनसे बातचीत की। प्रस्तुत है राजेश जोशी से उसी बातचीत के कुछ अंश। अब पढि़ए अंतिम किस्‍त - 



शैलेश सिंह: आज अंग्रेजी का इतना दबदबा है कि हिंदी, दूसरी भारतीय भाषाओं पर स्थानीय बोलियों पर बहुत दबाव है। दूसरी तरफ़ बोलियों को मान्यता देने-दिलवाने के प्रयत्न भी चल रहे हैं। यह जो गड्ड मड्ड सी स्थिति है, इससे क्या दिशा निकलती लगती है। राष्ट्रीयताएं मुकम्मल होंगी या छितरेंगी। साथ ही अगर क्षेत्रीयता का उभार आ रहा है, तो आगे क्या होगा?
राजेश जोशी: मुझे लगता है सबसे बड़ी बेईमानी हिंदी वालों ने की। आप सोचिए, जब त्रिभाषा फार्मूला आया तो पूरे हिंदी क्षेत्र ने संस्कृत को तीसरी भाषा के रूप में चुना। उसने किसी प्रांतीय भाषा के साथ अपना संबंध नहीं बनाया। मान लीजिए आपके यहां दस हजार स्कूल हैं। आप तय करते कि इनमें अनुसूचित भाषाओं में से बांग्ला, मराठी, कन्नड़, तेलुगू, तमिल, उर्दू, सिंधी आदि पढ़ाई जाएगी, तो यह स्थिति नहीं बनती। आपने एक मृत भाषा को, क्लासिक भाषा को चुना। उसे विशेष विषय लेकर सीखा जा सकता था, पर अपने क्षेत्रीय भाषा को नहीं घुसने दिया। इसलिए अगर दूसरे क्षेत्रों के लोग आपसे घृणा करते हैं, आपकी भाषा का विरोध करते हैं तो वे ऐसा करेंगे ही, क्योंकि आपने एक तरह का हिंदी साम्राज्य क़ायम करने की कोशिश की। यह एक तरह का हिंदी साम्राज्यवाद है और इसका विरोध होगा। क्योंकि अगर आपने दूसरे को स्वीकार नहीं किया तो यह मत मानिए कि दूसरे हमें हमेशा स्वीकार करेंगे। ऐसा बिल्कुल संभव नहीं है।
            यही आपने बोलियों के साथ किया। जब तक यह दिखाने के लिए जरूरी था कि हिंदी एक क्लासिकल भाषा है, तब तक बोलियों का साहित्य आपके लिए आपकी परंपरा था. अवधी में लिखते हुए भी तुलसी, सधुक्कड़ी में लिखते हुए भी कबीर आपकी परंपरा हैं। इसके बाद क्या हुआ? क्या इसके बाद एकाएक इन बोलियों में लिखने वाले ख़त्म हो गए?
            हिंदी में आने के बाद आपने इन्हें त्याग दिया कि हमें न तो ब्रज में लिखने वालों की जरूरत है, न अवधी की, न किसी दूसरी बोली में लिखने वाले की जरूरत है। अब हर भाषा के साथ अपने व्यवहार का खामियाजा भुगतिए।
            राजनीति ने भी ग़लत किया। छत्तीसगढ़ बना तो कहा जाने लगा, सबसे बढ़िया छत्तीसगढ़ी है। हिंदी को हटाओ, छत्तीसगढ़ी लाओ। यह तो होगा। सभी बोलियों में लिखने वालों को अपने परिवार का हिस्सा बनाइए, तभी तो वे आपको स्वीकार करेंगे। यह हम लोगों की ग़लती है, हिंदी साहित्य, हिंदी आलोचना की ग़लती है। मुझे लगता है, जब तक राजनीतिक रूप से इसे ठीक नहीं किया जाता, तब तक समस्या नहीं सुलझेगी।
मुख्तार खान: वर्तमान में हिंदी किसी भी जगह की बोली नहीं है। या तो ब्रज है, अवधी है, बुंदेलखंडी है वग़ैरह -
राजेश जोशी: मैं कोई भाषाविद् नहीं हूं पर देखिए, हिंदी एक प्रोसैस में बनी। आजादी की लड़ाई के दौर में जब नया नया समीकरण भी हो रहा था, तब हिंदी के विकास के बारे में कहा जाता है कि गांव से आने जाने वाले लोगों को बातचीत का एक कॉमन ढंग चाहिए था, इस प्र्ाक्रिया में बनी। आजादी की लड़ाई के लिए भी एक कॉमन भाषा चाहिए थी। तो मेरठ के आसपास बोली जाने वाली बोली आज की हिंदी बनी। यह किसी जनपद की भाषा नहीं थी। प्रक्रिया  में बनी भाषा थी। लोग कहते हैं हिंदी संस्कृत की बेटी हैं। लेकिन हिंदी का संस्कृत से कोई ताल्लुक नहीं है। संस्कृत में बिना सहायक क्रिया के वाक्य बनता है, जैसा कि मराठी और बांग्ला में बनता है। हिंदी में बिना सहायक क्रिया के वाक्य बनाके दिखाइए। उर्दू में नहीं बनता। उर्दू और हिंदी तो व्याकरण की दृष्टि से आसपास की भाषाएं है। ये तो जनपदीय बोलियों से ही विकसित हुईं। इसीलिए हिंदी को कोई अपना नहीं मान पाता। जैसे ब्रज का, मालवा का आदमी अपनी बोली को अपना मानता है। उस तरह से हिंदी किसी की पसर्नल बोली नहीं है। पर अब वो एक बहुत बड़े समुदाय की, साम्राज्य की भाषा बन चुकी है। वह संपर्क भाषा है और उसे स्वीकार करने के अलावा कोई चारा नहीं है।

यह बातचीत मुंबई से प्रकाशित त्रैमासिक चिंतनद‍िशा में छपी है.