Tuesday, January 10, 2012

समकालीन कविता



मुंबई के कुछ मित्रों ने चिंतनदिशा का प्रकाशन फिर से शुरू किया है. पिछले अंक में विजय बहादुर सिंह और विजय कुमार के बीच कविता की चिंताओं को लेकर हुआ पत्राचार छपा है. पहले पढि़ए विजय बहादुर जी का पत्र.


प्रिय विजय कुमारजी,
सप्रेम नमस्कार,
आज सुबह-सुबह कॉलोनी में श्रीहरि भटनागर अचानक प्रकट हुए और कवि नरेश सेक्सेना द्वारा संपादित 'रचना समय' का कविता-विशेषांक दे गए। हरि को चूंकि इस क्षेत्र की काफ़ी गहरी जानकारी है इसलिए अंक पहली ही निगाह में ख़ूबसूरत लगता है। अपने कथा-लेखन में वे जितने ऊबड-खाबड हैं, पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन में उतने ही सुरुचि संपन्न और निष्णात।
सबेरे के समय को मैं स्वाध्याय में ही गुजारता हूं। लिखना और सोचना भी। आज इसमें व्याघात पडा क्योंकि इस अंक को दरकिनार करना मेरे लिए संभव नहीं हो सका। यों श्री नरेश सक्सेना ने मुझसे भी सहयोग करने को कहा था पर तब मैं कोलकाता में वागर्थ के संपादन की जिम्मेदारियों से इतना वजन महसूस कर रहा था कि मेरे लिए समकालीन कविता पर कुछ सोचने और सोच कर लिखने का काम संभव नहीं था। 'समकालीन कविताएं भी अपनी शक्ल-सूरत में मुझे कभी-कभार ही खींच पाती हैं। मैं साथी लेखक अरविंदाक्षन से सहमत हूं कि 'कविता विशेषज्ञों की संपत्ति हो गई है'। वही लिख रहे हैं, वही पढ भी रहे हैं। और यह विशेषज्ञता इतनी निजी (कारोबार जैसी) हो चुकी है कि लिखने वाला लिख कर आत्ममुग्धता के नशे में चला जाता है। इसका एक बडा कारण यह कि उस जैसों की भी एक जमात है, उस जमात को भी इसका समर्थन चाहिए - परस्पर प्रशंसंति अहो रूपं अहो ध्वनि। संपादक-कवि नरेश सक्सेना ने विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को उध्दृत करते हुए लिखा है - 'कवि ही अपनी कविताएं पढते हैं। यह भयानक सच है।' इसके आगे मेरे अत्यंत प्रिय अरुण कमल का भी एक कथन नरेश भाई ने उध्दृत किया है - 'मेरा एक पश्चाताप यह है कि मैंने खराब कविताओं की तारीफ़ की।'
विशेषांक के संपादक की इन चिंताओं से होकर जब मैं श्री राजेंद्र यादव को संबोधित आपकी 1996 में लिखी चिट्ठी की ओर मुडा तो आपकी गद्य-भंगिमा और वैचारिक तेवर देख मुग्ध रह गया। आपकी सोच से सहमत होना एक स्वतंत्र सवाल है पर आपकी भाव-मुद्रा और शैली मुझे रसलीन करते रहे। यादवजी की कविताओं को लेकर आपकी जो तीखी प्रतिक्रिया है, वह तो उसे पूरे समय की कविता पर कमोबेश लागू की जा सकती है। मैं जब दुष्यंत रचनावली पर काम कर रहा था, उनकी दो-तीन सौ गीतात्मक कविताओं को देख हैरान होता रहा कि इस आदमी ने कविता के इन छंदों में कितनी उठक-बैठक की है। आज़ादी के आस-पास एक ओर पश्चिम से आनेवाले ज्ञान और साहित्य-चिंतन का ज़ोर हिंदी में दिखने लगा था। प्रगतिशील, प्रयोगशील प्रवृत्तियां अपनी जगह, पर इन्हें 'वाद' में बांधना, एक ख़ास प्रकार की विचारधारा और कला-दर्शन के हवाले करने का काम भी चल ही रहा था। मार्क्सवाद और अस्तित्ववाद का काम बख़ूबी कर ही रहे थे, डार्विन और फ्रायड के आक्रामक प्रभाव भी कुछ कम नहीं थे। अगर आप प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के तत्काल बाद साथ आए कवियों की कविताएं देखें तो वे और भी सतही स्थूल और बाढ ग्रस्त बरसाती नदियों के पानी की तरह उफनती मिलेंगी। ऐसे में उसी वक्त में भवानी मिश्र की सन्नाटा, सतपुडा के जंगल आदि कविताएं चमत्कृत करती हैं। भवानी मिश्र प्रगतिशील संघ से बाहर थे। कहें तो गांधी के साथ थे, सुभद्रा कुमारी चौहान, नवीन वग़ैरह के साथ थे। माखनलालजी इस समूह के नेता जैसे थे। मुक्तिबोध के शब्दों में 'माखनलाल स्कूल' के कवि तार-सप्तक जिसकी कविताएं सन् चालीस-बयालीस के आस-पास लिखी जा रही होंगी क्योंकि तैंतालीस तक तो ज़रूर उसकी पांडुलिपि बन ही गई होगी। अगर आप तार-सप्तक की उन कविताओं को देखें तो उनमें से कोई एक भी कविता लोक-हृदय पर अपनी छाप छोड नहीं पाई है। यहां तक कि मुक्तिबोध और अज्ञेय की भी। पर यह कविता भी अपनी सोच और भाव-भंगिमा में न तो मैथिलीशरण आदि की विरासत का विकास लगती है, न छायावादियों की। ऐसा होना भी क्यों चाहिए? पर ऐसी भी उसे क्यों होना चाहिए कि उसमें अपनी ज़मीनी गंध भी न हो।
यह तो आप मानते ही होंगे कि समस्त कला-व्यापार और साहित्य-सृजन सांस्कृतिक व्यापार माने जाते हैं। मेरी अपनी समझ से ये अपने-अपने रचना-क्षेत्र में उस लोक-चित्त को बार-बार खो जाने, पहचानने और रचने की कोशिशें करते हैं जो हजारों सभ्यताओं के दबावों और हमलों की आक्रामकता के बीच कहीं खोता चला गया और प्रत्यक्ष जीवन-परिदृश्य से प्राय: लुप्त-सा हो उठा। कवि या कलाकार का काम सभ्यता की कलम लगाना नहीं है, बल्कि मनुष्यता के मूल प्रस्थानों और उनसे जुत्रडे सपनों की याद दिलाना है। अफसोस की बात यह कि प्रगतिशील लेखक संघ और प्रयोगवाद ने उस दौर में यह संदेश देने की कोशिश की कि संस्कृति की भी कलम लगाई जा सकती है। यह कोशिश आधुनिकता और उत्तर आधुनिकता के नाम पर आज भी जारी है। मैं यह भी देखकर परेशान हो उठता हूं कि समकालीन कवि आलोचक - जिनमें आप भी शामिल हैं जब किसी सैध्दांतिक बात को कहने की कोशिश करते हैं तो उसी तरफ़ जाते हैं जिस तरह प्रगतिवादी, प्रयोगवादी, आधुनिकतावादी, उत्तर आधुनिकतावादी जाते देखे जाते हैं। यह एक ऐसा हवाई अखाडा है जिसमें हमारी कम से कम दो हजार साल की साहित्यिक विरासत और सृजनात्मक सिरे से अनुपस्थित है। इस प्रकार के लेखनचिंतन से यह संदेश जाता है कि रामायण, महाभारत, कालिदास, भवभूति, भारवि, वाणभट्ट आदि ने - जिनको भुला पाना इस देश के लोगों के लिए अब भी असंभव है - कभी कोई काव्य-चिंतन अथवा कला-चिंतन किया ही नहीं। ग़ौर करें तो कबीर, जायसी, तुलसी, घनानंद, केशवदास आदि ने भी काफ़ी मार्के का काव्य-चिंतन किया है पर आज जैसे अनेक प्रौढ और युवा-लेखकों के लेखन में इस परंपरा की कोई गंध तक नहीं मिलती। छायावादियों में प्रसाद ने अत्यंत गंभीर कला-चिंतन किया है अपनी किताब 'काव्य-कला तथा अन्य निबंध' में। आपको पढते हुए लगा कि यादवजी को आप यह बताना चाहते हैं कि विश्व-साहित्य के अध्ययन में आप उन पर या तो भारी पडते हैं या फिर कहीं से कम नहीं हैं। जिस 'फ्यूडल किस्म' का आरोप हम परस्पर लगाया करते हैं, उसकी सच्चाई यह है कि भारत का पूंजीवाद, समाजवाद, उत्तर यथार्थवाद और उत्तर बुध्दिवाद भी अभी इससे बरी नहीं है। होता तो पिछडा और दलित कार्ड खेलने वाले श्री राजेंद्र यादव लालू और मुलायम सिंह से इतना सगापन भला क्यों महसूस करते? क्यों हमारे कई मठाधीश वामपंथी अपनी बेटियों-बेटों के विवाह - यदि वे अप्रत्याशित ढंग से प्रेमग्रस्त हो विवाह न कर बैठे हों - अपनी ही बिरादरी के भीतर तलाशते हैं। उन्होंने कब यह सामाजिक नेतृत्व किया कि वे सैध्दांतिक तौर पर जातिवाद को तोडने के लिए इन योजनाओं की शुरुआत करें। तथापि श्री राजेंद्र यादव की बातें अपनी जगह। मैं जो आप से कहना चाह रहा हूं वो बातें कुछ दूसरी हैं।
आपको याद होगा, अपन एक शाम नवी मुंबई (वाशी) में बैठे थे और आपने समकालीन कविता के रेगिस्तान होते जाते चेहरे को लेकर अपनी चिंताएं व्यक्त की थीं। उस बैठक में आपने मुझसे यह आत्मीय अनुरोध भी किया था कि मैं आगे बढकर अपनी चुप्पी तोडूं और इस छत्ते में हाथ डालने का साहस करूं। एक पाठक और आलोचक के रूप में किसी की भी यह जिम्मेदारी हो सकती है कि वह अपनी चिंताओं को प्रकट करते हुए कुछ ऐसी सर्जनाओं कृतियों को रेखांकित करे जिससे समकालीनों को दिशाएं मिल सकें। अब मुझे लगता है कि नागार्जुन और भवानी प्रसाद जैसे कवियों को चुनना, उनके काव्य की प्रभाव-शक्तियों पर विचार करना, मेरे इसी उद्देश्य के अंतर्गत था। मोटे तौर पर ये दोनों कवि अलग-अलग दीखते हैं। एक साफ़-साफ़ मार्क्सवादी लगता है, दूसरा दो टूक गांधीवादी। पर आलोचक का काम यहीं ख़त्म नहीं हो जाता। उसका पहला काम तो कवि की अनुभव-दृष्टि से संवाद करना है। मुझे हमेशा लगा कि इन दोनों कवियों में परंपरागत सामूहिकता का बोध है और दोनों मार्क्स और गांधी के बावजूद अपनी उस ज़मीन पर हैं जिसे हम प्रेमचंद, प्रसाद-निराला आदि की 'ज़मीन' कह सकते हैं। यहां विचार तो हैं पर वे वादग्रस्तता से मुक्त हैं और कवि के अनुभव किसी भी दायरे को अपना पिंजडा बना कर रह लेने के अभिशाप से मुक्त हैं। फिर इन कवियों को पत्रढते हुए हमें बार-बार अनुभव होता है कि हम अपने आस-पास की उन सच्चाइयों से रू-ब-रू हो रहे हैं जो सिर्फ़ कवि-कल्पना या काव्य-कौशल की मनगत्रढंत सच्चाइयां नहीं हैं। ये विशाल और व्यापक राष्ट्रीय जीवन के गर्भ से उपजी हुई हैं। एक और बात जो मुझे इन दोनों के पास ले जाती है वह यह कि ये दोनों टिपिकल, मध्यवर्ग की हताशा और किंकर्तव्यमूढ मानसिकता के कवि नहीं है। उदासी, निराशा, क्षोभ और ग़ुस्सा इनमें भी कोई कम नहीं हैं पर ये रघुवीर सहाय की तरह लाचारी और हताशा का बोध नहीं कराते। नागार्जुन की 'मंत्र कविता' तो आपको याद ही होगी 'अंधेरी कविताएं' (1968) में भवानी भाई ने कुछेक पंक्तियां ऐसी लिखीं - 'फूल को बिखरा देने वाली हवा कौन कहता है चलनी नहीं चाहिए  समूचा जंगल जला देनेवाली आग कौन कहता है लगनी नहीं चाहिए। आगे वे लिखते हैं - शायद ऐसे ही कुछ शब्दों में अरसे से एक ऐसी हवा मुझमें चल रही है  एक ऐसी आग मुझमें जल रही है। मंत्र कविता भी इसी अवधि की रचना है।
दोनों कवियों में यह जो ऊष्मा और ताप है, वह मुझे रघुवीर सहाय जैसे लाचारी और हताशा का बोध करानेवाले कवि में अनुभव नहीं हुआ। रघुवीर सहाय को पढते हुए तबीयत बैठ-सी जाती है। अकेलेपन और लाचारी से पाठक भर उठता है।
कहना मैं यह चाहता हूं कि तार-सप्तक के राहगीरों की 'स्वतंत्रता' अपनी-अपनी राहों पर चलना - देश के लिए फायदेमंद उसी तरह नहीं हुआ जैसे कि प्रगतिवादियों का संकरे राजनीतिक प्रकोष्ठों में तब्दील हो जाना। अस्सी और नब्बे के दशक में आई कवि-पीढी स्वयं को बहुत अधिक पढी-लिखी समझने के दंभ से बीमार रही और है। अगर कई एक चर्चित कवियों के जीवन-प्रवाह का अध्ययन किया जाये तो नतीजे बहुत दुखदायी निकलेंगे कि उन्होंने कविता को किस तरह चतुर फार्मूलों का गुलाम बना डाला। उनकी कविता में व्यक्त अनुभवों का चरित्र बेहद अकादामिक शास्त्रीय किस्म का रहा जिसमें जीवन की वे पहचानें लगभग नदारद दिखीं जिन्हें इनसे अधिक वह पाठक जानता है जिसने कोई कविता नहीं लिखी। कविता और जीवन का यह भारी अंतराल इस समकालीन रचनात्मकता का सबसे दुखद पक्ष है। इस प्रतिबध्दतावाद पर सबसे बडा प्रश्नचिन्ह भी कि क्यों होरी-धनिया, घीसू-माधव या श्रध्दा-इडा जैसा कोई भी एक यथार्थवादी अथवा आदर्शवादी चरित्र यह नहीं पैदा कर पाया अब तक? आप सोचना कि ऐसे चरित्र किस साधना के बलबूते आकार ले पाते हैं? 'कुकुरमुत्ता' का विकास तो 'मंत्र कविता' में दिखता है पर 'मंत्र कविता' का विकास कहां गायब-सा हो गया है?
कविता, मेरी अपनी दृष्टि में कवि के आत्मा की अभिव्यक्ति है। कबीर हों या सूर-तुलसी, प्रसाद हों निराला, अज्ञेय, मुक्तिबोध अथवा नागार्जुन, या फिर उनके बाद के धूमिल, दुष्यंत आदि अपनी सर्जना के बहाने वे अपने सार्वभौमिक आत्म की अभिव्यक्ति करते हैं। तुलसीदास इसी को 'स्वान्त:सुखाय' कहते हैं। अधिकांशों ने कवि के इस कथन का जो अर्थ ग्रहण किया वह यांत्रिक मानस से किया। 'स्व' को उन्होंने कवि-व्यक्तित्व न मान कवि-इकाई मान लिया। न 'पर' के बारे में विचार किया, 'अपर' और परंपरा के बारे में। अज्ञेय जैसे कवियों के इस कथन पर भी उनका ध्यान नहीं गया जब उन्होंने कहा - 'यह मेरा, यह मैं स्वयंविसर्जित'। कविता ही क्यों, नाटक, गल्प, आख्यान, निबंध, संस्मरण आदि में सर्जक स्वयं को ही तो विसर्जित करता है। इसके बिना तो सर्जन संभव ही नहीं। सच तो यह कि स्वयं को 'दलित द्राक्षा' की तरह संपूर्णत: निचोत्रड दिए बिना यह सुकर्म सुकर्म बन नहीं पाता। याद करें तो मुक्तिबोध कहते हैं कि एक कविता लिखने में लगता है जैसे उनके देह का एक पौंड ख़ून सूख गया। यह ख़ून जैविक ही नहीं, दैविक या चेतनागत भी है।
विचार करने पर यह अंतर साफ़ हो जाता है कि बीसवीं सदी के चौथे-पांचवे दशक से जो कविता आती है, वह एक ख़ास तरह का लोकोध्दारक बाना पहने आती है या फिर आत्मविसर्जन के विरुध्द आत्मस्थापन का दावा लिए आती है। तार-सप्तक में भी जो कविगण हैं, नेमिचंद जैन, गिरजा कुमार माथुर, भारत भूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे, इनका कोई जिक्रकर्ता आज नहीं है। ये इतिहास के हिस्से हो चुके हैं। लोकस्मृति में इन्हें जगह नहीं मिल सकी। रामविलास शर्मा की प्रातिभा शक्ति कहीं और चमकी। बचे केवल दो - मुक्तिबोध और अज्ञेय। अज्ञेय पहले तो अपने औपन्यासिक गल्प और कथा-प्रतिभा के बल पर, बाद में तार-सप्तक की अपनी विवृत्ति या कहें चिंतन को लेकर चर्चित हुए। उनकी वे प्रयोगधर्मी कविताएं जिनमें उन्होंने उभरते और द्वीप बनते चले जाते मध्यवर्ग को प्रतिबिंबित किया, अब सिर्फ़ स्कूलों और कालेजों के अध्यापकों और उनके अंध-आज्ञाकारी छात्र-छात्राओं के काम आती हैं। साहित्य-समाज ने तो उत्तरवर्ती अज्ञेय को ही महत्व दिया जिसका एक बत्रडा कारण असाध्यवीणा और अगल-बगल की कविताएं हैं। विडंबना यह कि इन्हीं उत्तरवर्ती अज्ञेय को परवर्ती नई पीत्रढी के कवि समूह ने नकार दिया। अज्ञेय ज़रूर उसे 'हां तू आ...' तू-तू-आ संबोधित कर पुकारते रहे पर उसने उन्हें अस्त हो चुके सूर्य की तरह नकारने की सार्वजनिक घोषणा कर दी। इतिहास का चमत्कार कहिए या विडंबना कि जिन सप्तकवादी कवि को स्वच्छंदतावादी आलोचकों ने तार-सप्तक काल में नकार दिया था। 'आंगन के पार-द्वार' की कविताओं में वही अज्ञेय एक अपवाद और एक संभावना लगने लगे। 'असाध्यवीणा' की मूल चेतना 'आत्मस्थापन' की नहीं 'आत्म विसर्जन' की है। अज्ञेय ख़ुद कविता में यह कहते चले गए हैं कि यह न तो पांडित्य से सधती है न कौशल से। अहमन्यता से तो ख़ैर यह सधती ही नहीं है। जिन बत्रडे-बत्रडे कलावंतों की ओर अज्ञेय ने इशारा कर उन्हें 'हारे हुए सब' कहा, वे हमारे ज़माने में भी तो होंगे। हर ज़माने में रहते रहे हैं। तुलसी के काल में केशवदास थे। घनानंद के काल में भी रहे न होते तो उस मर्मवेधी विदग्ध कवि को यह क्यों कहना ज़रूरी लगता कि वे इस तरफ़ न आएं जो कविता को जानकारियों का खेल समझते हैं। या फिर एक यांत्रिक भाषा-कारोबार।
कविता जहां स्वयं को अन्य समस्त भाषा-व्यापार ऐक्टिविटी से अलग करती है, वह जगह कौन-सी है, इसे आप जैसे सुविज्ञ नहीं जानते होंगे, ऐसा कैसे कहा जा सकता है। वह जगह वही है जहां हृदय का मौन भी घूंघट डाल बैठा रहता है। यह कोई राजनीतिक या धार्मिक हदय नहीं होता। अर्थशास्त्रीय अथवा वैज्ञानिक भी नहीं। यह वह हृदय होता है जो जानकारियों के तमाम पाखंडपूर्ण स्तूपों को दरकिनार करता हुआ, उस विश्व-हृदय का हिस्सा होता है, जहां बुनियादी तौर पर तमाम तरह की पहचानें तिरोहित हो उठती हैं। धर्म, जाति, वर्ण, कुल यहां तक कि अन्य भी। यह कोई रहस्यवाद नहीं है, आप चाहें तो इसे छायावादी विश्वात्मवाद ज़रूर कह सकते हैं जहां चर-अचर, मनुष्य और मनुष्येतर का भेद बेमानी हो उठता है। 'असाध्यवीणा' हमारे अपने समय में इसे असाधारण ढंग से बोध कराती है। यह वही 'हृदय' है, जहां काव्य-विवेक धरा रह जाता है। कलावंतता पानी भरती है और लोक व्यवहार निपुणता सबसे घिनौनी बात लगने लगती है।
आप मुक्तिबोध की उन पंक्तियों की याद करें जिनमें वे अत्यंत क्षुब्ध, आत्म और कातर हो, ग्लानि से भरे हुए स्वयं से पूछते हैं - ओ मेरे सिध्दांतवादी मन! ओ मेरे आदर्शवादी मन। अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया? यह केवल कवि का आत्मप्रश्न क्यों माना जाये हमारा अपना भी क्यों नहीं? पर यह कौन कह सकता है? कौन स्वयं को कटघरे में खत्रडा करने के आत्मबल से संयुक्त है? आप तो कवियों की 'संगत' में रहने का दावा ही करते रहे हैं, कृपया ज़रूर सूचित करिएगा कि कितने इस 'आत्म' का साक्षात्कार कर सके हैं? मेरी अपनी समझ से तो वे सब एक प्रायोजित और प्रदत्त संसार में रहते रहे हैं बगैर किसी ईमानदार पूर्ण लगाव या संलिप्ति के। उनके ज्ञानात्मक संवेदनों में इस 'आत्म' की उपस्थिति कहां है? अगर होती तो निश्चय ही वे संवादरत कहीं-न-कहीं ज़रूर दिखते।
जिन दिनों मैं 'वागर्थ' का संपादन देख रहा था, मुझे कुवंरनायारण जी की एक कविता परेशान करने लगी थी। बाद में मैंने उसे पत्रिका के अंदरूनी मुखपृष्ठ पर नवंबर 2010 में छापा था, आप भी पत्रढें। थोत्रडा मन-बहलाव तो आप का भी होगा।
फोन की घंटी बजी
मैंने कहा - मैं नहीं हूं
    और करवट बदल कर सो गया।
दरवाज़े की घंटी बजी
मैंने कहा - मैं नहीं हूं
    और करवट बदल कर सो गया।
अलार्म की घंटी बजी
मैंने कहा - मैं नहीं हूं
    और करवट बदल कर सो गया।
एक दिन
मौत की घंटी बजी...
मैं हूं - मैं हूं - मैं हूं
    मौत ने कहा -
    करवट बदल कर सो जाओ।

कविता स्वयं हमें अपनी चपेट में लिए चली जाती है, हम अनजाने ही अपने क़रीब होते जाते हैं और हमारा वह 'आत्म' जिससे हम प्राय: मुंह छिपाए फिरते हैं, सहसा हमें घेर लेता है। हमारे प्रिय मित्र और काव्य-सखा स्वर्गीय विनय दुबे की एक और कविता मुझे याद आती है 'शायद' जो मेरी प्रिय कविताओं में से एक है। वे यह सवाल उठाते हैं कि यह जो स्वयं को बचाने की चतुराई है, यह हमारे समय के लोगों के 'आम चरित्र' का हिस्सा बन चुकी है। दुनियावी सफलताओं में जीने का हुनर। विनय दुबे की असली चिंता यह है कि यह तो आत्मघाती हुनर है। हर बात पर शायद कहना, जानते-बूझते हुए भी सत्य को नकारना, शायद की शैली को जीवन-शैली बना लेना, झूठ नहीं तो और क्या है? कविता के अंतिम टुकत्रडे बेहद वेधक हैं - लेकिन इतना समझ लो कि बचने  और शायद बचने में फर्क है  ...तुम शायद  नहीं भी बच सकते हो। 'उदय प्रकाश की कहानी' और अंत में प्रार्थना में यही तो दिखाया गया है कि जो सबसे ज्यादा असुविधाकारक सच है, मानवता के पक्ष में जानेवाला सबसे बत्रडा सच तो वही है। अपनी निष्ठाओं को जीवन-व्यवहार के स्तर पर उतारना। गालिब ने भी ऐसा एक शेर लिखते हुए सच्चे बिरहमन को काबे में जगह देने की सिफारिश की है।
हमारे समय के कवियों की दिक्कत ही यही है कि उनके विचार उनके जीवन-व्यवहारों और अनुभवों से कोई वास्ता जैसे नहीं रखते। वे आपस में भी भीतर ही भीतर एक दूसरे को नीचा दिखाना और पछात्रड डालना चाहते हैं। जिन प्रतिबध्दताओं की बात वे करते हैं वे सफलताओं के तात्कालिक गुणा-भाग से जुत्रडी हैं। आप अनुमति दें तो कहूं पाखंडी और बेईमान चरित्र वाले कवियों का एक समय जो ऐसे ही आलोचकों, आधुनिक दरबारों जैसी अकादमियों, संघों और संस्थाओं के बल पर फूल-फल रहे हैं। इनमें से कितने हैं जिन्होंने ठहर-सी गई कविता को एक कदम भी आगे बत्रढाया है? आधे से ज्यादा तो पश्चिम के नकलची हैं और बहुतेरे अंध प्रतिबध्दतावादी जिनकी पदावली में उनके कवि व्यक्तित्व की कोई झलक तक नहीं है। कई एक घुरंधर तो सिर्फ़ चोरी करते हैं। हिन्दी का वह पाठक-समाज जिसे अपने कवियों पर हमेशा भरोसा रहा है, उनके कथनों में क्यों यक़ीन नहीं करता? क्यों इन से घबराहट अनुभव करता है? क्यों इन सबकी कविता उसे अपने कवि अपनी भाषा की कविता नहीं लगती? क्यों इनके प्रति वह बेहद विमुख हो उठा है? आप ज़रूर इस पर सोचना चाहेंगे?
एक और बात जो हम आलोचकों को आपस में करनी है वह यह कि क्या कविता अब भी कोई कला-व्यापार है, अथवा नहीं? अगर नहीं तो फिर तो कोई बात नहीं, चाहे जैसे उठे-बैठे, यह उसका अपना मामला है। अगर है, तो फिर उसमें आनंद, उद्भावना, उत्प्रेरणा और मार्गदर्शन का कोई भाव है कि नहीं। अंतत: कवि, हमारे अपने ज़माने का कवि भी, कवि ही क्यों कहलाना चाहता है और इस मुगालते में रहता है कि भले ही वह वाल्मीकि, वेद व्यास, कालिदास, कबीर-तुलसी का वंशज न हो पर निराला आदि का तो है और इसीलिए उसका कद और आसन उन सारे बहुस्वीकृत, बहुप्रतिष्ठित लेखकों से बत्रडा है जो काव्येतर विधाओं में अपना महत्वपूर्ण ऐतिहासिक योगदान कर चुके हैं। उसके इस थोथे मुगालते के पीछे कौन-सी मानसिकता काम कर रही है? मेरी जिज्ञासा है कि आप मुझे यह ज़रूर समझाएं?
कविता अगर कला-व्यापार नहीं, मात्र बुध्दि-व्यापार है और स्वयं को अब एक शास्त्र में परिणत कर, ऐसा ज्ञान-दान कर रही है, जिससे हमारी आंख खुले और हम अपने वर्ग-शत्रु की पहचान कर लें तो मेरी दूसरी जिज्ञासा यह है कि 1935-36 से आज 2011 तक यह पहचान कितनी असरकारी हुई? हिन्दी कविता का पाठक समाज कितना वर्ग-संवेदी हुआ और कितना सांप्रदायिक, कितना जातिवादी, कितना जुझारू और कितना समझौतापरस्त? जब यह कविता मनोरंजन को भी नकार चुकी, विचार - सो भी इंजेक्टेड - के बल को ही सबसे बत्रडा काव्य-बल मानती रही तब वे विचार भी क्यों नहीं फले-फूले जिन्हें सिर पर उठाए यह चल रही थी? कहीं सचमुच यह सब कुछ लोगों का बैठे-बिठाए का गोरखधंधा था? स्वयं नरेश सक्सेना जैसे कवि को यह तीखा सच क्यों उगलना ज़रूरी जान पत्रडा कि वहीं दिल्ली में केदारनाथ सिंह और कुंवर नारायण जैसे कवियों की उपस्थिति महसूस नहीं की जाती। यह उन्होंने वसुधा को दिए गए एक साक्षात्कार में कहा।
एक और बात जो मैं आप से शेयर करना चाहता हूं वो यह कि हमारे इन कवियों की कविता में वे अनुगूंजें क्यों नदारद हैं, जो आम पाठकों की चेतना में अब भी बाकायदा मौजूद हैं और उसे जब-तब उसकी अस्मिताओं का बोध कराती हैं? क्यों वे सब भी प्रायोजित और प्रदत्त यथार्थ के सामने स्वयं को घरेलू नौकरों (यह आपका ही मुहावरा है) की तरह पेश करते हैं? यह दिमागी बंधुआगिरी या बंधुआपन क्यों? क्या दुनिया सचमुच उतनी ही है जितनी मार्क्स ने समझी है? क्या वह नहीं जो हम सबकी छाती पर चढी नग्न-नृत्य कर रही है? इससे निपटने का रास्ता क्या है? सभ्यता, धर्म, राजनीति और विज्ञान प्रौद्योगिकी क्या इस रास्ते का कोई अता-पता हमें दे रहे हैं? इस अद्भुत अपूर्व बौध्दिक विकास की ये चरम अतियां अगर हमें त्रस्त कर चुकी हैं तो कथित प्रतिबध्द कविता अब क्या करनेवाली है, कृपया बताइएगा? क्या वह भाववादी आदर्शवाद की ओर लौटेगी, जिसके वह हमेशा विरुध्द रही है। क्या वह पूंजीवाद और उत्तर पूंजीवाद के पांवों को पकत्रड गित्रडगित्रडाएगी? या फिर वह नए सिरे से आत्मशोधन की राह पकत्रड आत्म संस्कार की प्रक्रिया से रू-ब-रू होने का संकल्प लेगी? क्या करेगी?
अक्ल की उसकी खेती तो उसके लिए भी काम नहीं आई। आप जैसे उसके प्रिय संगतकार क्या उसे कोई और परार्मश देना चाहेंगे?
अफसोस! आपके साथी संपादकगण भी यही मान बैठे हैं कि मानव-संस्कृति के बीच दरार डालने का काम 'पूंजी' ने किया है। मैं इस सोच को ही मानव-पुरुषार्थ के संदर्भ में अपमानजनक मानता हूं। ऐसी सोच तब पैदा होती है जब हम यह मानकर चलने लगते हैं कि पदार्थ ही चेतना को जन्म देता है। मेरे जैसे लोग, जो सिरफिरेपन से ग्रस्त हैं - यह मानने पर राजी नहीं। मानव-पुरुषार्थ हमारे लिए सर्वोपरि है। ज्ञान, विज्ञान, धर्म और राजनीति सब उसी पुरुषार्थ की उपज हैं। पूंजी भी। क्या अब हमारा बौध्दिक पुरुषार्थ नि:शेष हो चुका? क्या हम अपनी ही सभ्यताओं से लत्रडने लायक नहीं बचे? तब वो पागल कबीर क्यों कहता फिरा - 'तू कहता कागद की लेखी मैं कहता आंखिन की देखी'। तुलसी ने क्यों लिखा - कि कोरे कागदों का सौंदर्य इसलिए बत्रढेगा क्योंकि इन पर मेरे कमाए हुए सच दर्ज हैं।
बंधुवर! क्या अब हम नए सिरे से अपना नया सच नहीं कमा सकते? क्या अपने कवि मित्रों से यह अनुरोध नहीं कर सकते कि वे अकादमिक यथार्थवाद से बाज आकर उस काव्य-यथार्थ से टकराएं जिसे मुक्तिबोध 'जीवनानुभव' कहते रहे हैं। मारिए गोली कथाकार संपादक राजेंद्र यादव को, याद करना ही हो तो उदय प्रकाश को याद कीजिए जिसे मंगल पांडे के कारतूस में वारेन हेस्टिंग्स के सांड की चर्बी की अनुगूंज सुनाई देती है। भारत को स्वाधीनता का एहसास कराना, उसका मूल्य बोध कराना हमारी सबसे बत्रडी चुनौती है।


   
सप्रेम
विजय बहादुर सिंह
29, निराला नगर, दुष्यंत कुमार मार्गभोपाल-462003
मो.: 09425030392

Friday, January 6, 2012

क्या करूं कोरा ही छोड़ जाऊं कागज?



क से लिखता हूं कव्वा कर्कश
क से कपोत छूट जाता है पंख फड़फड़ाता हुआ
लिखना चाहता हूं कला
कल बनकर उत्पादन करने लगती है
लिखता हूं कर्मठ पढ़ा जाता है कायर
डर जाता हूं लिखूंगा कायदा
अवतार लेगा उसमें से कातिल

कैसा है यह काल कैसी काल की रचना-विरचना
और कैसा मेरा काल का बोध
बटी हुई रस्सी की तरह
उलझते, छिटकते, टूटते-फूटते
पहचान बदलते चले जाते हैं
शब्द अर्थ विचार आचार और व्यवहार

क से खोलना चाहा अपने समय का खाता
क से ही शुरू हो गया क्लेश

क्या क्ष त्र ज्ञ तक पहुंचना होगा मुमकिन?

जब जुड़ेंगे स्वर व्यंजन
बनेंगे शब्द
फिर अर्थगर्भा शब्द
वाक्य और विचार
आचार और व्यवहार

तो किस किस तरह के खुलेंगे अर्थ
और कितना होगा अनर्थ

क्या करूं कोरा ही छोड़ जाऊं कागज?

(यह कविता वागर्थ के अक्‍तूबर 2011 अंक में छपी है) 

Sunday, December 11, 2011

ब्‍लॉग चर्चा




10 दिसंबर को यहां मुंबई के एक उपनगर कल्‍याण में एक कालेज में हिंदी ब्‍लॉगिंग पर एक सेमिनार में भाग लेने का मौका मिला। इसमें कई ब्‍लॉर आए थे। अकादमिक जगत के लागों के बीच यह चर्चा इस दृष्टि से अच्‍छी थी कि अगर हिंदी विभाग ब्‍लागिंग में रुचि लेने लग जाएं तो हिंदी ब्‍लागिंग को और आयाम मिलेंगे. इसमें मुझे भी अपनी बात रखने का मौका मिला. मैंने पावर प्रजेंटेशन बनाया था, उसी जानकारी को यहां दे रहा हूं. स्‍लाइड बनाने का फायदा यह होता है कि बात बिंदुवार चलती है. बहकने का खतरा नहीं रहता. वि‍षय को साहित्यिक ब्‍लागों तक केंद्रित रखा था.  

ब्‍लॉग का चरित्र

  •        रीयल टाइम में घटित होता है
  •        भौगोलिक सीमाओं से परे है
  •        जनतांत्रि‍क है
  •        स्‍वायत्‍त है
  •        क्षैतिज चलता है 
  •       इसलिए कोई छोटा बड़ा नहीं
  •        इसलिए छोटे बड़े की लिहाज नहीं
  •        इसलिए मुंहफट और मुंहजोर
  •        और कभी कभी बदतमीज भी हो जाता है
  •       सार्वजनिक अभिव्‍यक्ति का सहज सुलभ माध्‍यम
  •        चाहे जितने मर्जी ब्‍लॉग बनाओ
  •        अभी महंगा है
  •        मध्‍यवर्ग में पैठ बना रहा है
  •       उम्‍मीद करें यह मुफ्त ही बना रहे
  •        बेथाह मुनाफा कमाने वाली आई टी कंपनियों के जोर के बावजूद
  •        इसे मुफ्त कराने की मुहिम सफल हो
  •        ऐसी कामना करें 
  •       ढूंढने चलो तो हर दिन कोई नया ब्‍लॉग या पत्रि‍का मिल जाती है
  •        सामग्री की बमवारी है
  •        एग्रिगेटरों को देखिए  पल पल नई पोस्‍टें अवतरित होती हैं
  •       साहित्‍य में कुछ स्‍थापित लेखकों के ब्‍लॉग है
  •       कुछ युवा लेखकों के, और कुछ नव लेखकों के
  •       ज्‍यादातर अपनी रचनाएं लगाते हैं
  •        अपनी पसंद की दूसरे लेखकों की रचनाएं लगाते हैं.
  •        कुछ अपने ब्‍लाग पत्रि‍काओं की तरह पेश करते हैं
  •       कुछ ब्‍लॉगर सामूहिक रूप से ब्‍लॉग चलाते हैं
  •       इस तरह हरेक ब्‍लॉगर लेखक भी है संपादक भी
  •  यह एक महत्‍वपूर्ण बिंदु है क्‍योंकि संपादक
    •  कड़ाई बरतने वाला हो    क्‍या पोस्‍ट नहीं करना है
    •  सजग रहने वाला हो     क्‍या पोस्‍ट करना है
    • बहुपठित हो            पिष्‍टपेषण से बचेगा चुनिंदा सामग्री रखेगा
    • सौंदर्यबोध संपन्‍न हो     उसे शब्‍द रंग रेखा और स्‍पेस की समझ हो
       
सीमाएं
 
  •       अथाह भंडार है
  •        एग्रिगेटरों की भूमिका असंदिग्‍ध है
  •        कुछ और छलनियों की जरूरत है
  •        जैसे वि‍षय आधारित
  •        काल आधारित
  •        स्‍थान आधारित
  •        नाम आधारित 
  •       जो हैं वो लेखक हैं और स्‍वनामधन्‍य हैं
  •        क्‍वालिटी कंट्रोल नहीं है
  •        यह सोशल माडिया का चरित्र भी है
  •        संक्ष‍िप्‍त, तुरंत, उच्‍छृंखल, इसलिए
  •        गंभीरता और जिम्‍मेदारी की कमी
  •       और जिम्‍मेदारी के बिना साहित्‍य क्‍या होगा पता नहीं

अपेक्षाएं
 
  •       जितना है बेथाह है पर कम है
  •        और की जरूरत है
  •       अभी भी सर्च करते हैं तो हिंदी    साहित्‍य की सामग्री नहीं मिलती
  •        सतही चलताऊ माल मिलता है
  •        गहराई और विस्‍तार दोनों चाहिए
  •        टिप्‍पणी पाने के मोह से ऊपर उठना होगा
  •        टिप्‍पणी टीआरपी की तरह है
  •        क्‍लासीफाइड सर्च की सुविधा बने
  •        ज्‍यादातर ब्‍लॉगर युवा लेखक और पत्रकार हैं
  •        अब शिक्षक वर्ग आए
  •       शिक्षक वर्ग आएगा तो
  •        छात्र वर्ग आएगा
  •        प्रत्‍येक विभाग को कम से कम एक पीसी मिलना चाहिए
  •        प्रत्‍येक विभाग अपना ब्‍लॉग बनाए
  •        क्‍लासिक साहित्‍य को डाले
  •        कर्तव्‍य की तरह
  •       लिखें और लिखना सीखें
  •        हर लिखे शब्‍द को अपलोड करने का मोह त्‍यागें
  •        अपना श्रेष्‍ठ लेखन ही अपलोड करें
  •        अपनी भड़ास से ब्‍लॉग को न भरें 
इस सेमिनार मे विविध भारती के उद्घोषक यूनुस खान ने संगीत संबंधी ब्‍लागों की जानकारी दी. यूनुस खुद रेडियोनामा और रेडियोवाणी ब्‍लाग चलाते हैं. सेमिनार की बाकी जानकारी यहां पर मिलेगी.  

Saturday, November 12, 2011

काल को सम पर लाना

 



पिछले दिनों मुंबई में जहांगीर कला दीर्घा में संजय कुमार की 
चित्र एवं मूर्ति-शिल्प प्रदर्शनी लगी थी। संजय मूलतः इलाहाबाद के हैं और 
पिछले कई वर्षों से मंबई में रह कर स्वतंत्र रूप से काम कर रहे हैं।  
'टाइम्स ट्रांसमिशन' शीर्षक की इस प्रदर्शनी में समय को एक प्रभावशाली रूपक में ढाला गया है।

द अल्टीमेट रोटेशन
चित्रकला दीर्घाओं में जाना हमेशा ही अच्छा लगता है। इस बार काला घोड़ा स्थित जहांगीर आर्ट गैलरी में बापू की जयंती (2 अत्तूफ्बर 2011) के दिन जाने का मौका मिला। जहांगीर के मुख्य हॉल में तीन प्रदर्शनियां लगी थीं। हम शुरू में ही लगी संजय कुमार की प्रदर्शनी को ही किंचित रस लेकर देख पाए। किंचित इसलिए क्योंकि चित्र और शिल्पकृतियों को देखने भर से काम नहीं चलता। उनके अभिप्रायों तक पहुंचने के लिए, उन कला  रूपों का रसास्वादन करने के लिए काफी समय चाहिए। कई बार कोई कृति एक भेंट में पर्याप्त नहीं खुलती, उसके पास बार बार जाना पड़ता है। यह भी संभावना बनी रहती है कि हर भेंट में कृति का एक नया पाठ बने या पहले पाठ में परिवर्तन परिवर्धन हो। पर हमारी जीवन शैली ऐसी है कि समय की कमी प्रायः बनी रहती है। इस बार भी बस एक ही झलक हम ले पाए। पर इस  झलक का प्रभाव गहरा था। यहां संजय कुमार के तैल चित्र और फाइबर ग्लास में बने मूर्ति-शिल्प थे। लगभग इन सभी कृतियों में घड़ी का प्रयोग हुआ है। चित्रकार ने प्रदर्शनी की विवरण-पुस्तिका में काल को इस तरह देखा है

''समय सिर्फ रोजमर्रा के कामों को तरतीब देने की वस्तु मात्र नहीं है। समय भौतिक और पराभौतिक को जोड़ने वाली चेतना की अद्भुत ऊर्जा है। यह एक से दूसरे रूप में संचरित होने की अवस्था है, जीवन के विकास की एक प्रक्रिया है। यह एक सत्ता के भीतर से उद्भूत होती है। विविधता के बावजूद जीवन के चक्र को चलाए रखने के लिए दिमाग ऊर्जा को बचा लेता है। फिर वहां यही अस्तित्व का रूप ले लेता है।''
संजय ने काल की अपनी इस अवधारणा को चित्रों और मूर्ति-शिल्पों के माध्यम से रूपायित किया है। चित्रों में काले और नीले रंग की छटाओं के बीच मन भावन फीके सफेद रंग की अठखेलियां हैं। असल में हम सभी प्रदर्शनियों में चित्रों को एक बार देखते हैं, उसके बाद स्मृति में उन्हें बार बार देखते हैं। स्मृति में देखने में स्‍वैर-कल्पना (फैंटेसी) की भी पूरी संभावना रहती है। भीतर अलग ही तरह की रम्य-रचना होती रहती है। आधिक्य की तरफ झुकी हुई। 

द इनकारनेशन
यहां मूर्तियां फाइबर ग्लास की हैं पर धातु से बने होने का प्रभाव देती हैं। धूसर मिट्टी सा रंग और ऊपर से चमकीली तैलीय परत। देखने में भारीपन का एहसास होता है। 'द अल्टीमेट रोटेशन' में तीन मानव आकृतियां एक धुरी के गिर्द अधर में लटकी हुई हैं। मानों वे एक वृत्त में तैर रही हैं। उनकी नृत्य-निमग्न हुई सी भंगिमाएं हैं। सिर के ऊपर चपटा काल है, सपाट चंदोबे की तरह, घड़ी के  डायल की शक्ल में, जो इन्हें बांधे हुए है। यूं वे ठोस एंगलायरन की धुरी से भी बंधे हुए हैं जिस पर डायल खड़ा है। यह धुरी एक तरह से सहारा ही है। एक तरह से ये काल से बंधे हुए जीव हैं लेकिन उसके अधीन फैले दिक् में स्वतंत्र और निर्बंध भी हैं। यहां भौतिक बंधन के भीतर अभौतिक किस्म की मुक्ति है। हो सकता है यह वस्तुस्थिति न हो, केवल मानव मन की अवस्थिति हो, जिसकी थाह हम बार बार पाना चाहते हैं या जिस तक पहुंचना चाहते हैं। क्या यही आनंद है? 'द इनकारनेशन' में ईसा मसीह की देह छरहरी है। धड़ में तीन घडि़यां धंसाई गई हैं, गोल पुराने फैशन की, और रुकी हुई। चरणों में एक आवक्ष मूर्ति वंदना के भाव में बैठी हुई है। जिसका झुका हुआ सिर और कंधे ही दिखते हैं। विराटता के समक्ष समर्पण का भाव। ईसा गहन प्रशांति में डूबे हैं। विचार और आवेग से परे। तीन घडि़यों की तरह तीन लोक से परे यानी दिक् और काल के परे उनका अवतरण हो रहा है। काल से परे या कालहीनता के आकाश या अवकाश में ही प्रशांति संभव है? क्या यह प्रस्तुति इसी तरह के संकेत दे रही है? दो अन्य चित्र हैं 'ट्रांसफारमेशन' और 'साल्वेशन' शीर्षक के। इनमें भी घडि़यां हैं और उनमें कहीं मानव आकृतियां निकल रही हैं, कहीं घुस रही हैं और कहीं घुल-मिल रही हैं - मानो मनुष्य दिक् और काल में रूपांतरण की सतत प्रक्रिया से गुजर रहा है। 

टयूनिंग द टाइम
हॉल के एक कोने में एक बड़ा ही दिलचस्प मूर्तिशिल्प रखा था - 'टयूनिंग द टाइम'। क्या हम इसे 'काल का सुर मिलाना' कह सकते हैं! इस बिंब की व्यंजना गहरी है, और मूर्ति अद्भुत। यह एक दर्जी है जो पैर से चलने वाली सिलाई मशीन पर बैठा सिलाई कर रहा है। सिले जा रहे कपड़े की जगह उसके पास घड़ी है जिसका एक सिरा सिलाई मशीन की सुई और दंदे के बीच फंसा है। घड़ी यानी घड़ी का डायल जैसे कपड़े की तरह लचीला और सिलवट पड़ा है। बल्कि चमड़े की तरह मोटा और अकड़ा हुआ है पर धातु की तरह कड़ा नहीं दिख रहा है। जबकि कमाल का प्रभाव यह है कि सारा शिल्प धातु निर्मित ही लगता है।

इसे देखने पर एक अद्भुत रूपक की सृष्टि होती प्रतीत होती है। व्यक्ति वक्त की सिलाई कर रहा है। मानो वक्त इतना पुराना पड़ गया हो कि फट गया हो या उधड़ गया हो और कोई कारीगर उसे सिल रहा हो। पर मूर्तिकार ने इस काम को सिलाई करना न कह कर 'टयूनिंग करना' कहा है। काल को जोड़ने की क्रिया तो दो काल खंडों को जोड़ने की क्रिया होगी। यह टयूनिंग है। साज का सुर मिलाने जैसी। सामंजस्य पैदा करने की क्रिया। काल से सामंजस्य या संगति बिठाना या काल को सम पर लाना कितनी प्रासंगिक उक्ति है! 

दर्जी पूरी तरह अपने में तल्लीन है। एक हाथ सिलाई मशीन के हैंडल पर रुका हुआ है, मानो अभी चक्का चलने लगेगा। दूसरे हाथ ने घड़ी के चिथड़े को थाम रखा है। नीचे पैर भी दिख रहे हैं। सारा शरीर काम करने की लय में डूबा हुआ है। पूरा ध्यान काम पर लगा हुआ है। समय को मिलाने का काम निमग्न हो के ही किया जा सकता है। पीठ, गर्दन, सिर, आंखें झुकी हुई हैं। किसी शिल्पी की विनम्र और कर्मठ देह की तरह। और शिल्पी पूरी तन्मयता से काल की रचना विरचना संरचना में लगा है। यह मानवीय कृत्य की अद्भुत उठान है। 

यह प्रदर्शनी देख कर मन में अजब स्फूर्ति आई। कलाकार से मिल कर भी अच्छा लगा। ऊर्जा और उत्साह से भरपूर संजय कुमार अपने बारे में बताने लगते हैं -

'' बचपन से ही मुझे औपचारिक शिक्षा में कोई रुचि नहीं थी। इसलिए मैं कभी भी इसमें सफल नहीं रहा। मध्यमवर्गीय परिवार में जन्म लेने के कारण सभी मुझसे यह उम्मीद करते कि मैं पढ़ूं और जीविका का कोई अच्छा साधन ढूंढूं। मेरे पिता श्री रामेश्वर प्रसाद को साहित्य में गहरी रुचि थी। वे फिराक गोरखपुरी के शिष्य थे, धर्मवीर भारती और गोपेश्वर आदि के साथ परिमल में सक्रिय थे। कमलेश्वर उनके मित्र थे। उनके कारण मेरी कला को एक दिशा मिल सकी। टैगोर, टॉलस्टॉय, शरत, प्रेमचंद और बंकिंम चंद्र के बारे में उनसे सुनता तो मुझे एक अजीब सी खुशी मिलती। सबसे पहले उन्होंने मुझे वैन गॉग, गौगन, एल-ग्रेको और लियोनार्डो के विषय में बताया। शायद यही वह बिंदु था जब छवियां मेरे मन में अपना काल्पनिक रूप लेने लगी थीं। यह करीब 37-38 साल पहले की बात है। उस समय के रेखाचित्र और जलरंग देख कर शायद उन्हें लगा हो कि मैं इससे बेहतर और कुछ नहीं कर सकता। ढेर सारे चित्रों के साथ 1982 में जे जे स्कूल ऑफ आट्र्स में प्रवेश लेने के लिए पहली बार मुंबई आया लेकिन कुछ न हो सका। फिर दिल्ली और बाद में हार कर आगरा कालेज से एम ए की डिग्री लेकर थोडे़ दिन जीविका की तलाश में भटकता रहा। मेरे भाई चूंकि यहां (मुंबई में) थे इसलिए एक मॉरल सपोर्ट था जिसके सहारे मैं यहां तक कला यात्रा कर सका।
''जीवन से बड़ी कोई किताब नहीं और सबसे ज्यादा उसी को पढ़ने की कोशिश की। मेरा मानना है कि जो भी स्वाभाविक रूप से प्रेरित करे वही शक्तिशाली अभिव्यक्ति होती है, उसमें एक कलाकार की सोच और संकल्पना का समावेश होता है।''
कला वीथि की इस संक्षिप्त यात्रा के अंतिम पड़ाव पर संजय से विदा लेते समय उनसे अगली योजना के बारे में पूछा तो उनका कहना था कि अगला काम 'मेट्रो साउंड' नाम की एक शृंखला हो सकती है, जिसमें जीवन के आसपास की क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं का समावेश होगा।

Saturday, November 5, 2011