
हरबीर का खींचा हुआ भागसू नाथ मंदिर परिसर का यह चित्र साभार. चित्र में वल्लभ डोभाल कुछ पढ़ रहे हैं.
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भागसूनाग
बहुत दूर दिखता है जल प्रपात
बहुत क्षीणकाय हो गया है जल प्रपात
बहुत ज्यादा लोगों से घिरा है जल प्रपात
फुहार इसकी आकाश में ही सूख-सूख जाती
झरती चांदी में स्नान की आदिम पुकार धरी की धरी रह जाती
भागसू के कुंड ने भी तरणताल का चोला पहन लिया है
मंदिर कसमसा रहा है
चंदा उगाही जोरों पर है
नए भवन में बिराजेंगे देवताओं के पत्थर
वल्लभ डोभाल अब तुम कहां रहते हो
नोयडा या धर्मशाला
जरा गिनो तो
छिले हुए पहाड़ की पसलियां ज्यादा हैं या
लुर-लुर फिरती टैक्सियां और ऑटो
पेड़ ज्यादा कटे या लेंटर पड़े ज्यादा
प्लास्टिक ज्यादा जमा हुआ या और भी कम हुआ पानी
बल्लभ डोभाल तुम कहोगे क्या हिसाब लगाने बैठ गए
फल फूल रहा है कारोबार
रोक कोई सकता नहीं
सुनो जी वल्लभ
मैं तो ढूंढ रहा हूं
अलग-थलग पड़ी हो
मिल जाए चट्टान कोई
बस थकान अपनी मिटा लूं
ज्यादा देर अब यहां रुका नहीं जाएगा॥
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इन छहों कविताओं में कुछ जगहों के नाम आए हैं -
हिमालय की पीर पंजाल शृंखला में साढ़े तेरह हजार फुट की उंचाई पर रोहतांग दर्रा लाहुल स्पीति को मनाली से जोड़ता है। ब्यास नदी का उद्गम यहीं से होता है। राल्हा पैदल यात्रा का एक पड़ाव है। सोलंग में स्कीइंग हाती है, वशिष्ठ में गर्म पानी के कुँड हैं, नग्गर में प्रसिद्ध रूसी चित्रकार निकोलिस रोरिक ने अपनी दुनिया बसाई है। मलाणा गांव प्रचीनतम लेकिन अब तक चला आ रहा लोकतंत्र लगभग दस हजार फुट उंचाई पर बसा है। जमलू यहां का देवता है और यहां पहुंचने का एक रास्ता चंद्रखणी दर्रा है। मणिकर्ण कभी उद्दाम रही लेकिन अब बिजली के लिए बांधों में बांधी जा रही पार्वती नदी के तट पर गर्म पानी के चश्मों का तीर्थ है। पतली कूल सैनी अशेष और स्नोवा बार्नो का इलाका है। समशी, भूंतर, औट, बजौरा कुल्लू और मंडी के बीच की जगहें हैं। ऐलोरा के कैलाश मंदिर की तरह शैल को काटकर बनाया गया मंदिर-समूह कांगड़ा घाटी में मसरूर में है। धर्मशाला में मेक्लोडगंज दलाई लामा के कारण लोकप्रिय हो गया है। और भागसूनाग में उत्तरोतर सूखता जाता एक जल प्रपात है। यहां कथाकार वल्लभ डोभाल भी डेरा डाले रहते हैं।
ये कविताएं समावर्तन के जनवरी अंक में भी पढ़ी जा सकती हैं.