Saturday, February 11, 2012

समकालीन कविता


  

  आप डॉ. विजय बहादुर सिंह और विजय कुमार के बीच समकालीन कविता पर हुए पत्राचार को पढ़ चुके हैं जो मूलतः चिंतनदिशा में छपा था. अब नए अंक में कवि संपादक विजेंद्र और जीवन सिंह की प्रतिक्रियाएं छपी हैं। पहले पढि़ए विजेंद्र की प्रतिक्रिया। पोस्‍ट लंबी है, धैर्य से ही पढ़नी होगी

   पिछले दिनों एक किताब पढी। नाम है, 'समकालीन कविता : प्रश्न और जिज्ञासायें 'लोकमित्र प्रकाशन, दिल्ली, 2011। इसके लेखक हैं, प्रख्यात मार्क्सवादी चिंतक तथा समीक्षक आनंद प्रकाश। जब दिल्ली से जयपुर लौटा तो 'चिंतन दिशा' का अंक चार मिला। इस अंक में समकालीन कविता को लेकर विजय बहादुर सिंह तथा विजयकुमार के दो पत्र बहस के लिये दिये गये हैं। यहाँ अपनी बात कहने से पहले मैं दो बातें साफ करना चाहूंगा। एक तो वैचारिक प्रतिबद्धता को पूर्वाग्रह या दुराग्रह न माना जाये। दूसरे, अपनी बात को पुष्ट करने के लिये मैं उपर्युक्त अत्यंत प्रामाणिक, महत्वपूर्ण तथा आंख खोलने वाली पुस्तक का उपयोग करने की अनुमति चाहूँगा।


उक्त दोनों पत्रों में समकालीन कविता के बारे में आधी अधूरी चिंताओं को पढने के बाद मुझे बडी निराशा हुई। दोनों पत्र हमें ले कहीं नहीं जाते। बल्कि विरोधाभासी कथनों तथा तर्कविहीन स्थापनाओं के बीहड में छोडते हैं। कविता का सामान्य पाठक भी यह समझ लेगा कि दोनों ने समकालीन कविता को ढंग से या तो पढा ही नहीं या जानबूझ कर उसके महत्वपूर्ण हिस्से को छोड दिया है। विजयबहादुर सिंह को मैं एक प्रतिष्ठित मार्क्सवादी समीक्षक की तरह ससम्मान देखता रहा हूँ। उनके पत्र में जिस तरह कुछ बातों को बडी बेचैनी से उठाया गया है वे उनके 'स्वपक्ष त्याग', तथा तर्कहीन विचार की ओर संकेत करती हैं। अगर ऐसा है तो जनवादी समीक्षा के लिये यह अपूर्णीय क्षति है। मेरे लिये दुर्भाग्य। वह एक गंभीर जनवादी समीक्षक रहे हैं। यह सब कैसे हुआ, क्यों हुआ, कब हुआ, इसके ब्यौरे में जाने का फिलहाल कोई औचित्य नहीं है। विजयकुमार का पत्र विजयबहादुर सिंह के उन बुनियादी सवालों से कतराता लगता है जिन्हें उन्होंने बडी तल्खी और गंभीरता से उठाया है। दूसरे, विजयकुमार के पत्र में, जैसा उनके लेखन में अक्सर होता है, आधुनिकतावादी उबाऊ शब्दाडंबर ज्यादा है। पुष्ट वैचारिक सहज साफसुथरा विश्लेषण कम। दूसरे, जहाँ तहाँ तथ्यपरक तर्क न होने की वजह से बातें अराजकता की स्थिति तक को छूती लगती हैं।


दोनों पत्र लेखकों में परस्पर मतभेदों के बावजूद कुछ ऐसा साम्य है जिन पर आगे बात होनी चाहिये। मसलन, 'समकालीनता' की तर्कपूर्ण अवधारणा को लेकर दोनों पत्रों में कोई सोच नहीं है। यह मान लिया गया है कि जो कोई भी - जैसा भी - आज लिख-पढ रहा है, वह 'समकालीन' है। मैंने इस बात को पहले भी कई बार उठाया है कि एक समय में लिखने वाले सभी कवि समकालीन नहीं होते। आख़िर क्यों हमने 'नई कविता' से पीछा छुडाने को 'समकालीन कविता' कहना आरंभ किया। कोई नया जिज्ञासु पाठक यह सवाल हमसे कर सकता है। हमें इसका सामना भी करना होगा। यहाँ मुझे प्रख्यात हिंदी समीक्षक डा. रेवतीरमण की बहुचर्चित तथा बहुश्रुत पुस्तक, 'कविता में समकाल', 1999, विदिशा, का ध्यान आता है। इस पुस्तक में निराला, मुक्तिबोध, शमशेर, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन, विजेंद्र, केदारनाथ सिंह और शलभ श्रीराम सिंह आदि की कविताओं पर विस्तृत आलेख हैं। इस किताब की कमजोरी है कि केदारनाथ सिंह की जगह कुमारेंद्र तथा कुमार विकल, चंद्रकांत देवताले आदि पर आलेख होने चाहिये थे। इन कवियों के बिना समकालीन कविता का मानचित्र लगभग अधूरा ही रहेगा । मैंने एक बार रेवती बाबू से यह बात पूछी तो उन्होंने प्रकाशक की तरफ से पृष्ठ संख्या की सीमा को कारक बताया। ख़ैर, इस पुस्तक की भूमिका में रेवती बाबू ने समकालीनता को 'आधुनिक और प्रगतिशील प्राण तत्वों' से समायोजित माना है। उन्होंने समकालीनता के नवीनतम आंदोलन को 'रीतिवादी कला मूल्यों' के विरोध में खडा बताया है। दूसरे, ज्यादा अहम बात है कि इस आंदोलन में 'सर्वहारा संस्कृति' का प्रस्ताव है। इस संदर्भ में उन्होंने नागार्जुन की कुछ पंक्तियाँ दी हैं -'इतर साधारण जनों से अलहदा हो कर रहो मत कलाधर या रचयिता होना नहीं पर्याप्त पक्षधर की भूमिका धारण करो विजयिनी जनवाहिनी का पक्षधर होना पडेगा'। इस तर्क से समकालीनता उतनी व्यापक नहीं है कि हम हर किसी कवि को समकालीन कहने लगें। विजयबहादुर सिंह को जिस 'पक्षधरता' से इतनी असहमति है वह नागार्जुन की इन पंक्तियों पर भी ध्यान दें। दूसरे, समकालीनता का गहरा रिश्ता हमारे मुक्तिसंग्राम की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से भी है। हमने विश्वविजयी अंग्रेजों से कुर्बानियों भरा संघर्ष करके मुक्ति पाई है। 1857 की क्रांति साम्राज्यवाद तथा सामंतवाद को निर्मूल करने वाली विश्व की अनन्य क्रांति हैं। डा. रामविलास शर्मा जैसे मनीषी चिंतक तथा समीक्षक ने इसे बीसवी सदी की, 'नई जनवादी क्रांतियों की लंबी अपूर्ण श्रृंखला की पहली महत्वपूर्ण कडी' माना है। यानि इतनी महत्वपूर्ण क्रांति अभी अपूर्ण है। क्रांतियाँ एक साथ पूर्ण होती भी नहीं। इसीलिये लेनिन ने 'क्रांति को सतत प्रक्रिया' कहा है। ध्यान यह भी रहे कि किसी क्रांति को उसकी तर्क परिणति तक पहँचाने के लिये क्रांति से पहले - उसके दौरान तथा उसके बाद भी हमें अटूट संघर्ष करना पडता है। मेरे विचार से समकालीनता तथा समकालीन कविता को सारत: समझने के लिये भारतीय द्वंद्वमय इतिहास की यह पृष्ठभूमि बहुत ज़रूरी है। अन्यथा समकालीनता के बारे में अनेक विभ्रम बने रहेंगे जैसा कि इन दोनों पत्रों से लगता है। मेरे लिये समकालीन कवि वही है जो हर स्तर पर मुक्तिसंग्राम की इस अधूरी छूटी प्रक्रिया को जनता से एकात्म हो अग्रसर कर रहा है। दूसरे शब्दों में जो उन ऐतिहासिक शक्तियों को बल दे रहा है जो इसे सामाजिक गति की के साथ अग्रसर करने में जी-जान से लगी हैं। इसके लिये संघर्षशील लोक से कवि को एकात्म होना पहली शर्त है - कवि नागार्जुन जिसे ''विजयिनी जनवाहिनी'' का पक्षधर होना कहते हैं। दूसरे, समकालीनता सिर्फ़ समय से नहीं, बल्कि वह कवि की विश्वदृष्टि - विजन - से परखी जाती है। हमारे जैसे वर्ग विभाजित समाज में आज अनेक अतीतगामी कवि हैं। प्रतिगामी कवि हैं। यथास्थितिकामी कवि भी बहुत हैं। जाने कितने हैं जो जनता से दूर ही नहीं, उससे नफ़रत भी करते हैं। हम उन्हें किस तर्क से समकालीन कहेंगें। सवाल होगा कि एक ही समय में लिखने वालों को फिर क्या कहें। वे 'सहकालिक' या 'तत्कालिक' हो सकते हैं। इसीसे जुडा सवाल 'आधुनिकता' का भी है। 


इन पत्रों में जिस आधुनिकता का भवावेशपूर्ण संदर्भ है वह 'औपनिवेशिक आधुनिकता' है। भारतीय नहीं। विजयकुमार जिसे 'दुश्वार' स्थिति कहकर हमें डरा रहे हैं मैं यहाँ एक सवाल आप सबके सामने रखना चाहँगा। डा. रामविलास शर्मा, प्रोफैसर चंद्रबली सिंह, शिवकुमार मिश्र, कमलाप्रसाद, आनंदप्रकाश, रेवतीरमण, जीवन सिंह, रमाकांत शर्मा आदि जैसे जनवादी समीक्षकों ने उस 'दुश्वार' स्थिति से अपने को कैसे उवारे रखा। क्या वे आधुनिक नहीं हैं। उनकी आधुनिकता और अज्ञेय आदि की आधुनिकता में क्या कोई फर्क है। हमारी आधुनिकता हमें सर्वहारा के उत्पीडकों तथा दमनकारियों का विरोध करने की ताकत देती है। अज्ञेय की आधुनिकता हमें अजनबी, अतीतोन्मुख तथा रहस्यकामी बनाती है। यही वजह है कि अज्ञेय की 'असाध्यवीणा' एक समकालीन कृति बनने में विफल रही हैं। भारतेंदु की देसी आधुनिकता ने उन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य का निर्माता बनाया है। वहाँ है 'सच्ची राष्ट्रीयता', उच्चकोटि का देश प्रेम, गहरा स्वदेसीपन। वे अवध के 'किसानों से एकात्म' हो सकते थे। इसीलिये वह आज समकालीन हैं। आधुनिक भी। अगर भारतीय आधुनिकता को और सुदृढ तथा व्यापक आधार देना है तो हम उसे 'कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणा पत्र' से जोड सकते हैं। यहाँ पहली बार इतिहास को द्वंद्वमय दृष्टि से परख सर्वहारा को विश्व चिंतन के केंद्र में लाया गया है। इसकी सारी मान्यतायें हमें अपनी अधूरी छूटी क्रांति प्रक्रिया को आगे बढाने में बहुत सहायक हैं। हमारे यहाँ के प्रगतिशील आंदोलन पर उसका गहरा प्रभाव है। इस बिंदु से एक नई जनवादी संस्कृति का उदय होता है जिसे विजयबहादुर सिंह 'संस्कृति की कलम लगाना' कहते हैं। संस्कृतियों का विकास इकहरेपन तथा एकांत में न होकर सामाजिक व्यवहार में व्याप्त विश्वचेतना के छोर से जुडकर होता है। तुलसी, सूर, मीरा, कबीर, जायसी आदि से हम प्रगतिशील होकर ही जुडते हैं। विजयकुमार इस आधुनिकता से इतने आक्रांत क्यों हैं। क्योंकि औपनिवेशिक आधुनिकता की 'ज़मीन' उन्होंने वहीं से उठाई है। पहले मैं उन बडे समीक्षकों के बारे में बता चुका हँ कि वे सब इस 'कुत्सित आधुनिकता' को दरकिनार करके भी बडे, समकालीन आधुनिक तथा सार्थक आलोचक बने रहे। जबकि किसी आधुनिकतावादी आलोचक ने अभी उस सीमा तक अपनी पहचान भी नहीं बनाई। हाँ मुझे याद आया महाकवि निराला ने 'कुकुरमुत्ता' में इसी नस्ल के आधुनिक कवियों को 'दुम हिलाने वाला टैरियर' यानि 'टिर्री कुत्ता' तक कहा है -'चली गोली आगे जैसे डिक्टेटर बहार उसके पीछे जैसे भुक्खड फ़ालोवर उसके पीछे दुम हिलाता टैरियरआधुनिक पोयेट' ध्यान रहे महाकवि इसी 'औपनिवेशिक आधुनिकता' को लताड रहे हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो वह आधुनिक अंग्रेजी कविता के पिता कहे जाने वाले कवि एलियट को यह नही कहते, 'कहीं का रोडा, कहीं का पत्थर' टी.एस. एलीयट ने जैसे दे मारा पढने वालों ने भी जिगर पर रख कर हाथ, कहा, लिख दिया जहाँ सारा' इस आधुनिकता से बचने को ही शायद उन्होंने कहा था -'जनता जातीय वेश की हो' मैं इसमें जोडना चाहूँगा कि हिंदी कविता तथा आलोचना भी जातीय वेश की हों। समकालीनता और आधुनिकता का उचित अर्थ न समझने के कारण विजयबहादुर सिंह जैसे परिपक्व आलोचक कुँवरनारायण की बहुत ही कमजोर कविता को समकालीन कविता का नमूना बनाकर पेश करते हैं। कविता है - 'फोन की घंटी बजी मैं ने कहा, मैं नहीं हूँ..। एक दिन मौत की घंटी बजी मैं हूँ, में हूँ, मैं हूँ  मौत ने कहाकरवट बदलकर सो जा' इस कविता में ऐसी क्या ख़ास बात है जो उन्हें इतना परेशान करती रही। शब्दों की खटर पटर से एक ख़ास किस्म का 'चमत्कार' पैदा किया गया है। सघन ऐंद्रियबोध की जगह 'वाग्मिता' है। ऐसी वाग्मिता केदारनाथ सिंह आदि कवियों में भी ख़ूब है। मध्यवर्गीय मिजाज के पेशेवर आलोचक ऐसी कविताओं में काफ्का का हारर या कामू की आत्मपीडा खोज कर आंनदित होते हैं। यहाँ सवाल हो सकता है कि इतने पहले प्रेमचंद की ऐसी क्या विवशता थी जो उन्होंने होरी जैसे अति सामान्य जन को अपने महाकाव्ययी उपन्यास 'गोदान' में प्रतिष्ठित किया। या निराला जैसे छायावादी कवि ने मँहगू, झींगुर, बिल्लेसुर बकरिहा जैसे अति सामान्य चरित्र क्यों रचे। क्योंकि ये दोनों महान लेखक समकालीनता की छाया प्रतीतियों का भेदन कर सार तत्व तक जा रहे थे। यही वजह है कि वे हमारी अधूरी छूटी क्रांति की प्रक्रिया को अग्रसर करते हैं। नागार्जुन, केदार बाबू, त्रिलोचन तथा मुक्तिबोध उसे आगे बढाते हैं। इनकी परंपरा के कवि आज भी उस प्रक्रिया को अग्रसर करने में लगे हैं। मजे की बात यह कि आधुनिकतावादी समीक्षक सुरक्षा कवच की तरह प्रेमचंद या निराला का नाम तो लेते हैं पर उनके लोकधर्मी विजन से कतराते हैं। विजयबहादुर सिंह को, मुझे आश्चर्य है, होरी, घीसू, धनिया जैसे चरित्र आज की कविता में दिखाई नहीं देते। जबकि आज की कविता में 'मुर्दा सीने वाला' चरित्र भी जीवंत हुआ है। डा. रेवतीरमण के अनुसार 'प्रबंध कविता में इससे पहले ऐसे चरित्र के बारे में शायद ही किसी ने सोचा हो।' ऐसे आदमकद तथा चतुर्आयामी बीसिओं चरित्र समकालीन हिंदी कविता में रचे गये हैं। नागार्जुन और भवानी प्रसाद मिश्र को एक साथ रखना उचित नहीं हैं। भवानी प्रसाद मिश्र छायावाद से प्रेरित विचारहीन कविता के कवि हैं। विजयबहादुर सिंह ने उनकी पंक्तियाँ दी हैं - 'समूचा जंगल जला देने वाली आग, कौन कहता है लगनी नहीं चाहिये' पूरे जंगल को जला डालना किस के विनाश का संकेत है। यह एक तर्कहीन कथन है सतपुडा के घने जंगलों में इतनी आसक्ति। फिर पूरे जंगल को जला डालने का भावावेश। यह तो विचारहीन अराजकता की स्थिति है। इसीलिये मैंने ऐसी कविता को 'विचारहीन' कहा है। यह संवेदना का पहला स्तर है जो न तर्कयुक्त है न बुद्धिसंगत। सिर्फ़ प्रतिक्रिया है दिशाहीन। हर चीज का विनाश....। क्या गांधीवाद यही है। दोनों पत्रों में इतिहास को अमूर्त रूप में प्रस्तुत किया है। विजयकुमार बार बार 'इतिहासबोध' की बात तो करते हैं पर वह इतिहास में निहित उस वर्गसंघर्ष के सच को नहीं कहते जिससे सामाजिक गतिकी अग्रसर होती है। यह इतिहासबोध वैसा ही अमूर्त है जैसा एलियट को 'अतीत के अतीतत्व' का बोध। विजयबहादुर सिंह इतिहास की जगह 'आत्मा' की बात ज्यादा करते हैं। उन्होंने कविता को 'आत्माभिव्यक्ति' बता कर कविता के प्रयोजन तथा स्वभाव का सवाल उठाया है। विजयकुमार इस सवाल का सीधा सामना नहीं कर पाते। खासतौर पर भारत भवन स्कूल की छाया में पले सभी कलावादी कविता को 'आत्माभिव्यक्ति' कहते हैं। वहां उनके लिये 'आत्मसाक्षात्कार' भी हैं। मैं जहाँ तक समझ पाया हूँ भारतीय महान कलैसिक्स तथा काव्यशास्त्र की आचार्य परंपरा ऐसा नहीं मानती। यह फिर उपर्युक्त आधुनिकता का ही अवशेष है जिसमें अस्तित्ववादी दर्शन की छाया झलकती है। हमारे यहाँ प्रकृति तथा जगत को ही अक्षत काव्य माना है - 'देवस्य पश्य काव्यं न ममार न जीर्यति' यही नहीं विश्व के प्रथम कला चिंतक महीदास (1000 ई. पूर्व) तो कवि कर्म को ही 'शिल्प' यानि कलापरक कर्म कहते हैं। 'शिल्पानि छंदोमयं' यहाँ कहीं 'आत्माभिव्यक्ति' के संकेत नहीं है। दूसरे, हमारे यहाँ कवि द्वारा इस संसार को अपने अनुसार 'रूपांतरित' करने पर जोर है। कहा है, 'अपारे काव्य संसारे कविरेक: प्रजापति  यथास्मै रोचते विश्वं तथेदं परिवर्तते' यहाँ दो बातों पर बल है। कवि का कथ्य - संसार अपार है। दूसरे, उसे अपनी विधायिनी कल्पना द्वारा कवि अपने अनुसार रूपांतरति करता है। इसी को अरस्तू 'वस्तु का पुनस्सृजन' कहते हैं। आज के सँदर्भ में प्रमुख बात है कवि कर्म का रूपांतरित होते इस संसार की आंतरिक प्रक्रिया से जुडना। ध्यान दीजिये यदि कविता हमारी आत्मा की अभिव्यक्ति ही होती तो आचार्य मम्मट इसके अनेक प्रयोजनों में से 'शिवेतर क्षतये' प्रयोजन को इतना महत्व क्यों देते। इससे यह भी लगता है कि हमारे यहाँ कविता को जनविरोधी होने से बचाया गया है। समकालीन कविता के संदर्भ में आनंद प्रकाश का यह कथन ध्यान देने योग्य है। 'आज की कविता को आत्माभिव्यक्ति के संकुचित दायरे से मुक्त होना है' हम इस पर सोचें, क्या भाव तथा विचार के स्तर पर कविता एक अस्त्र का काम नहीं करती। मम्मट ने कविता को अस्त्र मानकर ही 'शिवेतर क्षतये'' उसका प्रयोजन बताया होगा। मैंने अरस्तू से लेकर एफ.आर. लीविस तक के किसी अंग्रेजी काव्यशास्त्री को इतना विशेष काव्य प्रयोजन बताते नहीं जाना। ज़रा सोचें कि यदि 'रामायण' से 'युद्धकाण्ड' तथा 'रामचरितमानस' से 'लंका काण्ड' हटा दें तो दोनों ही अमर कृतियाँ निष्प्रयोजन लगेगी। यहाँ जीवन का महासंघर्ष ही नहीं, विकल्प भी लक्षित हैं। महाभारत में अद्यांत संघर्ष ही प्रमुख है। आत्माभिव्यक्ति में संघर्ष नहीं पलायन ही मूर्त होता है। तुलसी का 'स्वांत: सुखाय' कहना आत्माभिव्यक्ति का संकेत न होकर कविता से रचनात्मक निर्लिप्त संतोष प्राप्त करने भर से है। शिवेतर क्षतये के लिये संघर्ष हमारी ॠचाओं में भी हैं। ध्यान देने की बात है कि निराला 'राम की शक्ति पूजा' में शिवेतर क्षतये का ही काव्य तर्क दे रहे हैं। 'अन्याय जिधर, है शक्ति उधर' इस से चिंतित होकर वह शक्ति की मौलिक कल्पना करते हैं। यह शक्ति लोकतंत्र में उभरती नई जनशक्ति ही है। नागार्जुन, केदार बाबू, मुक्तिबोध तथा त्रिलोचन इसी लोक - संघर्षधर्मी कविता को विकसित कर रहे हैं। बाद में यह परंपरा कुमारेंद्र, कुमाल विकल, शलभ श्रीराम सिंह, वेणुगोपाल, चंद्रकांत देवताले, ज्ञानेंद्रपति तथा मदन कश्यप आदि में नया रूप लेती गई हैं। दूर दराज के जनपदों में युवा कवि लोकधर्मी परंपरा को अच्छा रूप देने में लगे हैं। यह हमारी वही लंबी काव्य परंपरा है जहाँ कविता आत्माभिव्यक्ति के संकीर्ण दायरे को तोड जनता से एकात्म होती है। बुर्जुआ मन इस संघर्षधर्मी कविता से डरता है। उसे ऐसी कविता में अपने विनाश के बीज अंकुरित होते दिखते हैं। इसीलिये वह सत्ता में रहकर अपनी रक्षा के लिये आत्मनिष्ठ कवियों तथा समीक्षकों का एक सांस्कृतिक सुरक्षा कवच रच लेता है।


विजयबहादुर सिंह ने 'परंपरागत सामूहिकता' का बोध कह कर समकालीन कविता के संदर्भ में परंपरा का बहुत ही सार्थक सवाल खडा किया हैं। विजयकुमार ने सवाल के जवाब में जो बौखलाहट व्यक्त की है उससे परंपरा का सत्य तथा महत्व कम नहीं होता। विजयकुमार ने परंपरा को 'ठहरी' और 'यांत्रिक' अवधारणा से अभिहित कर सवाल किया है। उनके कहे वह हमें आज क्या किसी भी तरह 'राहत' दे सकती हैं। अब तक जो बातें कही गई हैं भारतीय काव्य के बारे में वे हमारे विदग्ध आधुनिक मन को क्या राहत देने वाली नहीं हैं। भारतीय काव्य परंपरा हमारी जातीय अस्मिता तथा जनता के संघर्ष को अटूट बनाये रखने के लिये हमें एक अचूक अस्त्र सौंप रही हैं। दूसरे, योरुप के 'गले कचरे' से हमें भार मुक्त करने के लिये नये मौलिक चिंतन की उर्वर चित्त भूमि प्रदान कर रही है। ध्यान रहे परंपरा कभी 'यांत्रिक' या 'ठहरी' चीज नहीं है जैसा विजयकुमार सोचते हैं। परंपरा कहते ही उसे हैं जो सतत प्रवाहित तथा विकासशील है। परंपरा के संदर्भ में डा. रामविलास शर्मा के इस कथन पर भी विचार करें - 'जो महत्व ऐतिहासिक भैतिकवाद के लिये इतिहास का है वही आलेचना के लिये साहित्य की परंपरा का। इतिहास के ज्ञान से ही ऐतिहासिक भैतिकवाद का विकास होता है। साहित्य की परंपरा के ज्ञान से ही 'प्रगतिशील आलोचना' का विकास होता है। काश विजयकुमार ने अपने या अंग्रेजी के क्लैसिक्स को एकाग्र होकर गहराई से जाना - समझा होता, तो कदाचित् वह परंपरा के बारे में इतनी सतही बात न कहते। अतीत के गर्भ से वर्तमान का अंकुरण होता है। ठीक वैसे ही परंपरा से ही समकालीनता जन्मती है। इसे अन्यथा न लिया जाये - परंपरा के सम्यक् ज्ञान तथा गहन अध्ययन - चिंतन के बिना कोई कवि या समीक्षक सार्थक या बडा बन पायेगा, मुझे संदेह है। एक बडा लेखक अपनी परंपरा को पढता - समझता ही नहीं है, वह उसे नवीकृत कर विकसित भी करता है। मैं विजयबहादुर सिंह की इस बात से सहमत हूँ कि 'ऐसा भी उसे - कविता को - क्यों होना चाहिये कि उसमें अपनी ज़मीनी गंध न हो'। हिंदी में ज़मीनी गंध वाली कविता की लंबी परंपरा है। पर आज वह अधिसंख्य कविता से क्यों गायब है। यह चिंता का विषय है। ज़मीनी गंध कविता में ही नहीं हमारी आलोचना में भी प्रेय होगी। आचार्य शुक्ल अपनी धरती को कभी नहीं छोडते। अपनी जातीयता को भी। डा. रामविलास शर्मा अपने वैसवाडे को कभी नहीं भूलते। कम ही सही आज ऐसे कवि तथ समीक्षक हैं जो अपनी धरती तथा अपनी जनता से एकात्म हैं। उनमें 'ज़मीनी गंध' भी प्रचुर है। आख़िर क्या वजह है कि हम अपनी ज़मीन, जनता तथा भाषा से कटे हुये हैं। इसकी वजह मैं पहले बता चुका हूँ : औपनिवेशिक आधुनिकता के अनर्गल बोझ से दबे होना। लोक से दूरी। अपनी लोक भाषाओं का तिरस्कार। समकालीनता की तरह लोक के बारे में भी अनेक भ्रम हैं। कुलीन चित्त के लोग लोक को मनोरंजन की चीज मान कर उसमें रस लेते हैं। आदिवासियों तथा गाँव वालों की कला, रीतिरिवाज, उनके उत्सव, वेश भूषा, अंधविश्वास, उनके टोटके आदि ही उनको लोक हैं। पर वे लोक के जातीय संघर्ष को ऑंख ओट किये रहते हैं। दूसरे, लोक को गाँव और शहर में विभाजित करके देखते हैं। लोक सर्वहारा के रूप में ऐसी वैश्विक शक्ति है जो दमन और शोषण के विरुद्ध खडी होती है। ध्यान दें भारतीय मुक्तिसंग्राम में कितने आदिवासियों ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष में कुर्बानियाँ दी हैं। बिरसा मुण्डा, तिलका माँझी, केरल किसानों का संघर्ष, जगदलपुर के विप्लवी आदिवासी - आदि। क्या हम इनके संघर्ष और कुर्बानियों को विस्मृत कर पायेंगें। आज भी उनकी संघर्षशील चेतना हमारी समकालीनता तथा आधुनिकता का जैविक हिस्सा हैं। बुर्जुआ मन इसे अंदर से नफरत करता है। आचार्य भरत से लेकर आज तक लोक परंपरा अटूट है। समकालीन कविता में जहाँ यह अनुपस्थित है वह अपाहिज लगती है। कमजोर है। उसमें इकहरापन आया है। ज़मीनी रंग लुप्त हुआ है। क्या बिना लोक के हम व्यापक तथा बडे सामाजिक सरोकारों की कविता रच पायेंगे। कविता में न तो पूर्णत: 'आत्मविसर्जन' होता है न 'आत्मस्थापन'। जैसा विजयबहादुर सिंह मानते हैं। मैं सामाजिक यथार्थपरक कविता की बात कर रहा हूँ। जैसे पहले कहा जा चुका है वस्तु के पुनस्सृजन की संश्लिष्ट प्रक्रिया के दौरान ही हम कविता में अपनी निजता का रंग घोल देते हैं। इसे ही हम वस्तु को आत्मपरक बनाना भी कहते हैं। वस्तु को आत्मपरक बनाके ही हम उसका रूपांतरण कर पाते हैं। इसी को आनंदवर्धन ने -'यथास्मै रोचते विश्वं तथेदं परिवर्तते' कहा है।


विजयबहादुर सिंह ने 'पाखण्डी', 'बेईमान', 'चोर' तथा 'नकलची' कवि तथा समीक्षकों से ठीक ही नाराजगी व्यक्त की है। पर एक दिन समय ऐसे लोगों को फटक कर कूडेदान की ओर फैंक देता है। मेरा यकीन है कि जीवन में गिरा हुआ मनुष्य एक बडा कवि या समीक्षक नहीं हो सकता है। एक बेहतर इन्सान होना रचना कर्म की पूर्व शर्त है। पर बेहतर इन्सान इस दुनिया में आज भी बचे हैं। कैसा ही विकट समय हो वे बचे रहेंगे। उसी अनुपात में ईमानदार उत्कृष्ट कवि होंगे। समीक्षक भी। हमें निराश होने की कोई वजह नहीं लगती है। दोनों पत्रों में ऐसी चिंतायें नहीं हैं जिससे हम इक्कीसवी सदी के कवि तथा उसके कविकर्म की भूमिका को समझ सकें। विजयबहादुर सिंह ने 'प्रतिबद्धता'' तथा 'प्रगतिशीलता' दोनों को लताडा है। मेरे खयाल से यदि हमने रचना कर्म जनता के पक्ष में साधना के स्तर पर लिया है तो ये दोनों बातें हमारे लिये कोई व्यवधान नहीं बन सकतीं। यदि कवि या समीक्षक सिर्फ़ पेशेवर होकर मात्र यश: कामी होते हैं तो उन्हें उक्त बातों की ज़रूरत ही नहीं होती। प्रगतिशीलता एक बहुत बडी वैज्ञानिक जीवन दृष्टि है। प्रेमचंद ने इसे हर लेखक के लिये अनिवार्य शर्त माना है। प्रतिबद्धता एक रचनात्मक अनुशासन है। इन चीजों में विकार या विकृतियाँ तभी आती हैं जब रचनाकार अपने आचरण से गिरता है। या उसमें रचनाकर्म साधने की क्षमता नहीं होती। सामाजिक रूपांतरण से जुडा कोई सार्थक कवि बुनियादी सामाजिक तथा राजनीतिक मान्यताओं पर समझौतावादी दृष्टि नहीं अपनायेगा। दूसरे छोर पर विजयकुमार ने 'भय', 'असुरक्षा', 'आशंका', 'दुस्स्वप्न', 'बाबलापन' - 'उत्ताप' तथा 'जीवन मृत्यु' के मिलन बिंदु आदि बातें कहकर एक ऐसा भय दिखाया है जिस से मनुष्य का सर्व विनाश ही जैसे एक विकल्प बचा है। यह पतनशील अस्तित्ववाद के ही अवशेष हैं जो कुलीन मन में बार बार उभरते दिखते हैं। या फिर काफ्का से किराये पर ली हुई्र वह भाषा है जो लोक से कटा हुआ हर लेखक बोलने को मजबूर है। कहने को काफ्का बुर्जुआ विरोधी था। पर उसे हर समय दुनिया का सर्वनाश दिखाई देता था। वह सोचता था समाज का पतन हो चुका है। दुनिया का विनाश अचूक है। महाप्रलय सन्निकट है। मनुष्य उसे लिसलिसे कैंकडे दिखने लगे थे। उसके अनुसार विश्व की सभ्यता को नष्ट होना ही है। हिंदी में ऐसे लेखकों की कमी नहीं जो दिखने में जनवादी, सोच में पतनशील आधुनिकतावादी हैं। मनुष्य जाति की सृजनशील क्षमताओं में जब यकीन ढहने लगे तो जानो हम स्वयं भी अंदर से छीज चुके हैं। हमारी रचनात्मक ऊर्जा चुक गई है। गोर्की भी पैट्रोग्राड में छीजते-बुझते बुद्धिजीवियों के बीच बैठ कर एक बार बहुत निराश हुये थे। तब लेनिन ने उन्हें रूसी देहातों में जाकर बनते - बिगडते रूस को देखने की सलाह दी थी। ऐसे अवसादग्रस्त विचार बुर्जुआ सत्ता को ही बल देते हैं। बाइबिल में एक जगह कहा है कि 'उनके ऑंखें हैं, पर देखते नहीं। उनके कान हैं पर सुनते नहीं'। न सुनने न देखने का यह समय ऐसा ही है। जिन आंखों को समकालीन कविता का चेहरा 'रेगिस्तान' नजर आता है, उन्हें वहाँ का 'नख्लिस्तान' क्यों नहीं दिखाई देता। परंपरा और इतिहास से हम यही तो सीखते हैं कि कठिन से कठिन दौर में रहकर भी मनुष्य ने अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष किया है। वही इस दुनिया को रूपांतरित कर स्वयं भी बदला है। वह आज भी जिंदा है। उसका संघर्ष हमें पाँच सितारा होटिलों में बैठकर दिखाई नहीं देता। लोक से जितनी दूर जायेंगे हम उतने ही असहाय, सशंकित, डरे हुये, उत्तप्त, दिशाहीन महसूस करेंगे। विकल्पहीनता का बडा संकट क्या लेखक को ही नहीं सुलझाना पडेगा। ग्रेनाइट ऍंधेरे में भी प्रकाश की धारियाँ होती हैं। यह समय काफ्का के 'हारर' तथा कामू की 'आत्मपीडा' से मुक्त होने का भी है। 


समकालीन कविता के संदर्भ में एक सवाल गाँव और शहर को लेकर भी उठाया गया है। पूंजी केंद्रित समाज में बुर्जुआ बडी चतुराई से दो काम करता है। एक तो गाँव और शहर का अलगाव। दूसरे, दिमागी तथा जिस्मानी श्रम में विभाजन। मार्क्स ने इसे 'मैटाबोलिक रिफ्ट' की संज्ञा दी है। यह रिफ्ट मनुष्य मनुष्य के बीच ही नहीं बल्कि मनुष्य और प्रकृति के बीच भी पैदा हो जाता है। इसीलिये मार्क्स ने किसी भी बुनियादी परिवर्तन के लिये शहर तथा गाँव के बीच इस रिफ्ट को मिटाना ज़रूरी बताया है। इसे मार्क्स ने 'बुर्जुआ सभ्यता' से उत्पन्न 'अलगाव की प्रकृति' भी कहा है। यह बात मैं इसलिये कह रहा हूँ क्योंकि औपनिवेशिक आधुनिकतावादी कवियों तथा समीक्षकों ने इस 'रिफ्ट' को चौडा करने में बडी सक्रियता दिखाई है। यही वजह है कि मध्यवर्गीय बुर्जुआ मिजाज से लिखी समीक्षायें लोकधर्मी कविताओं को हेय समझती हैं लोकधर्मी समीक्षा को स्थूल। यह सही है कि गाँव से लोग शहर को पलायन कर रहे हैं। यह हमारी उदार आर्थिकी का त्रासद परिणाम है। गाँव वालों से यदि पूछो तो वे शहर आना अपनी मजबूरी बताते हैं। पूँजी सत्ता इसी तरह जन को विभाजित कर उन्हें शोषण की चक्की में पीसती रहती है। आज के कवि को ध्यान देना होगा कि भारत की वह जनशक्ति आज भी जनपदों में सुरक्षित है जिससे सत्ता काँपती है। यदि गाँव को शहर की तरह संपन्न तथा आत्म निर्भर बना दिया जाये तो क्या यह पलायन रुक नहीं सकता। विश्वबैंक यही तो चाहता है। जितनी ज्यादा गाँव और शहर में 'दरार' बढेगी देश कमजोर होगा। जितना देश कमजोर होगा वह साम्राज्यवादी देश पर निर्भर करेगा। हम उसके उपनिवेश बने रहेंगे। चीन ने पिछले दशक में अपने गामों की स्थिति बहुत बेहतर की है। 21 नौंबर, 2011 के 'द हिंदू' अख़बार के अनुसार चीन 70 मिलियन गाँव के गरीब लोगों का उद्धार कर चुका है। गाँव के गरीबों का अनुपात 2000 में 94,22 मिलियन था। 2010 में वह 26,88 मिलियन रह गया है। क्या भारत उदार आर्थिकी से मुक्त होकर ऐसा नहीं कर सकता। इसी संदर्भ में विजयकुमार ने चेतना के 'पदार्थीकरण' (कमौडिटीफिकेशन) की बात कही है। यह जड तथा यांत्रिक भैतिकवाद है। चेतना का कमोडिटीफिकेशन कह कर उन्होंने संकेत दिया है कि चेतना में सापेक्ष स्वायत्तता नहीं होती। इसीलिये वह कहते हैं कि 'नारकीय झौंपड पट्टियों' में रहकर आदमी की संवेदना मर जाती है। वे चेतना शून्य होने लगते हैं। विजयबहादुर सिंह की बात पर व्यंग्य करते हुये यह भी कहा है कि उनमें कितने 'तुलसीदास, कबीर, केशव, या सूर' बचे रह गये हैं। पहली बात यह कि चेतना बाहरी चीजों से प्रभावित होकर वह अपनी सापेक्ष स्वायत्त्तता सदा बनाये रखती है। यदि गरीबों के मन में उक्त महाकवि पहले से घुल-मिल गये हैं तो वे हर हालत में उनके चित्त में बने रहकर उन्हें ताकत देंगे। गहरे से गहरे त्रास में रहकर भी वे हँसते हैं। गाते हैं। पूजा प्रार्थनायें भी करते हैं। श्रमकि संगठनों में रहकर अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध के लिये खडे भी होते हैं पर हम उन्हें देख नहीं पाते। देख कर भी उनकी उपेक्षा करते हैं। यहाँ यह सवाल करना चाहता हूँ क्या वजह है कि आज की अधिकांश कविता में श्रमिक, छोटे भूमिहीन किसान, बुनकर, तथा कठिन श्रम में लगे लोगों के क्रियाशील चित्र गायब हैं। उनकी तीखी अंतर्विरोधी स्थितियों के प्रसंग लगभग लुप्त हैं। समकालीन कविता के कथ्य में उनका जीवन क्यों वर्जित है। इस देश का तीन चौथाई यथार्थ उनके जीवन से जुडा है। क्या यह उसी परंपरा की तो त्रासदी नहीं जिसे आनंद प्रकाश ने ऐसी 'आत्मकेंद्रित कविता' कहा है जिसे न अपने 'समय से ख़तरा' है, 'न तंत्र से' और न 'सत्तारूढ सामाजिक ताकतों' से। उनका 'व्याकरण ही व्यवसाय का व्याकरण' है। 'पुरस्कार, प्रतिष्ठा और महत्व को समर्पित इस काव्य रचना का चरित्र तब अचानक ही स्पष्ट होता है, जब हम उसे सत्तर की कविता के समक्ष रखते हैं'। पृ. 172


हाँ बात 'नारकीय झोपडपट्टियो' में चेतना के बने रहने की थी। इस प्रसंग में मुझे नाजिम हिकमत की एक कविता याद आती है - 'भूख हडताल का पाँचवा दिन'। नाजिम काल कोठरी में अपनी फाँसी लगने की बाट जोह रहे हैं। फिर भी जीजीविषा से प्रेरित कविता फूटती है - 'बंधुओ, मेरा मरने का इरादा नहीं  किंतु यदि मेरी मृत्यु होकर ही रही  तो भी तुम्हारे बीच जीता ही रहूँगा  अरागाँ के गीतों में जिऊँगा ...। पिकासो के श्वेत कपोतों में जिऊँगा  रोब्सन के गीतों में जिऊँगा  और सबसे अधिक  सबसे अच्छी तरह  मारसोई बंदरगाह के मजदूरों के बीच ....। मृत्यु के प्रसंग में पहले हम कुँवरनारायण की कविता देख चुके हैं। वहाँ मृत्यु 'करवट' ले के सो जाने को कहती है। नाजिम की मृत्यु का अर्थ हजारों लोगों की साँसों में जीकर अमरता का गान है। पहला कवि आधुनिक बुर्जुआ है। वह सिर्फ़ अपने बारे में सोचता है। दूसरा समकालीन है जो सर्वहारा के संघर्ष को समर्पित है। मृत्यु के सामने खडे रहने पर भी चेतना जड कहाँ हुई। दोनों में फर्क साफ है। इसीलिये मैंने कहा है कि एक समय में रहने वाले सभी कवि समकालीन नहीं होते। जबकि हमारे बीच न होने वाले कवि हमसे एकात्म हो जाते हैं।


विजयबहादुर सिंह ने एक बहुत ही बुनियादी दार्शनिक सवाल उठाया है। चेतना का 'कमोडिटीफिकेशन' करने वालों को इस सवाल से क्यों कतराना चाहिये। विजयबहादुर सिंह उन भाववादियों के तर्क को मानते हैं जिनको चेतना 'सर्वस्वायत्त' है। उसका जन्म पदार्थ से नहीं होता। सुकरात से लेकर आज तक यह विवाद का विषय रहा है। चारवाक को छोड हमारे यहाँ के भाववादी दर्शन भी कुछ कुछ ऐसा ही सोचते हैं। पर आज उन्नत विज्ञान इसे नहीं मानता। उसके अनुसार पदार्थ आद्य है। वह पहले जड से विकसित होकर जैविक बना है। जैविक पदार्थ के अत्यंत विकसित तथा सूक्ष्म रूप को ही चेतना माना है। चेतना के बिना पदार्थ ने लंबी यात्रा तय की है। पर चेतना बिना पदार्थ के कहाँ रह पाती है। क्या आज यह सच नहीं कि कोई भी चित्त की क्रिया किसी ख़ास पार्थिव क्रिया से ही पैदा होती है। विजयबहादुर सिंह ने 'अकादमिक यथार्थ' से बचकर 'काव्य यथार्थ' पर आने की बात भी कही है। संकेत है कि काव्य यथार्थ वह जिसे मुक्तिबोध 'जीवनानुभव' कहते हैं। अकादमिक यथार्थ का नाम मैंने नहीं सुना। शायद उनका अभिप्राय जनवादी या सामाजिक अथवा आलोचनात्मक यथार्थ से हो। कोई भी काव्य - यथार्थ क्या बिना सामाजिक यथार्थ के संभव है। विजयबहादुर सिंह शायद यह मानते हैं कि जनवादी प्रतिबद्ध कवियों में कविता कम, यथार्थ ज्यादा होता है। क्या यह सच है। क्या वह भी 'प्यौर पोइट्री' की बात तो नहीं कर रहे। इसमें संदेह नहीं कि यथार्थ कहने के साथ हम कविता को न खो दें। पर क्या निरे जीवनानुभव से सार्थक कविता संभव हैं। कोई अनुभव दिशाहीन प्रतिक्रिया ही होगी जब तक हम उसे तर्क संगत बनाके बुद्धिगत संवेदना में न बदल दें। अनुभववाद हमें दिशाहीन अराजकता की ओर भी ले जा सकता है। दूसरे, हमारे अनुभव का आधार वस्तुजगत ही तो है। काव्य यथार्थ कह कर भी हम सामाजिक यथार्थ से मुक्ति नहीं पा सकते। हाँ, मुक्तिबोध ने यह भी कहा है - 'शोषण की अति मात्रा  स्वार्थो की सुख यात्रा जब जब संपन्न हुई  आत्मा से अर्थ गया  मर गई सभ्यता' - यहाँ अकादमिक यथार्थ और काव्य यथार्थ को कैसे अलगायेंगे। मेरे खयाल से कविता से सामाजिक यथार्थ भूसे से दानों की तरह काव्य यथार्थ से अलग नहीं फटका जा सकता। 


विजयकुमार ने नागार्जुन की कविता के बारे में बडी 'गोलमोल' बातें इस ढंग से कही हैं जैसे उनकी कविता बडी 'सतही' और 'तात्कालिक' हो। उनके अनुसार उसमें 'समसामयिकता' है। 'तात्कालिकता' है ...। तमात संदर्भों में उनकी कविता संवेदना 'दाग धब्बों' में 'सनी लिथडी' है। क्या इन बातों से नागार्जुन काव्य की उस शक्ति का एहसास होता है जो सर्वहारा के पक्ष में खडी होकर क्रूर होती जाती सत्ता को ललकारती है। जो साम्राज्यवाद का तीखे प्रहारों से सीधा प्रतिरोध करती है। जिस कविता से एकदम बिल्कुल नया लोकधर्मी सौंदर्यशास्त्र पैदा हो रहा है। बुर्जुआ पतनशील संस्कृति के समानांतर उसके द्वारा बहुत ज़रूरी जनवादी संस्कृति रची जा रही है। यानि नागार्जृन की कविता अधूरी छूटी मुक्तिसंग्राम की क्रांति प्रक्रिया को अग्रसर करने में अग्रगण्य है। जो बातें विजयकुमार ने गिनाई हैं वे उनकी कविता की छाया प्रतीति मात्र हैं सार तत्व नहीं। विजयकुमार की बातों से सामान्य पाठक दिग्भ्रमित होगा। उनके यहाँ विपरीत स्थितियों का 'जक्स्टापोज'- सन्निधान - भी नहीं है जैसा विजयकुमार मानते हैं। बल्कि गहरे अंतर्विरोधों की तीखी टक्करें या भिडंत है। और नागार्जुन की कविता के संदर्भ में विजयकुमार के लिये यह 'अशुद्ध' कविता क्या चीज है, सामान्य पाठक जानना चाहेगा। जिस किसी ने अंग्रेजी साहित्य तथा उसका काव्यशास्त्र व्यवस्थित ढंग से पढा होगा वह जानेगा कि इस शब्द की पृष्ठभूमि क्या है। 'नई समीक्षा' के दौर में 'द ब्लूम्सबरी परंपरा' के नाम से सौंदर्य-कलावादी एक प्रवृत्ति प्रमुख हुई। इसका सार था 'कला कला के लिये'। यानि कला का अनुभव अन्य सभी अनुभवों से भिन्न - विरल होता है। उसकी कलापरकता को जानने के लिये कोई भी सामाजिक प्रसंग असंगत है। इस प्रवृत्ति से जन्मी कविता को कहा गया 'प्यौर पोइट्री'। इससे भिन्न यथार्थपरक कविता को तिरस्कृत करने के लिया कहा गया 'इम्प्यौर पोइट्री'। हिंदी के पेशेवर समीक्षकों ने इन शब्दों का क्रमश : भौंडा अनुवाद किया 'शुद्ध कविता' और 'अशुद्ध कविता'। किसी ने कहा 'उजली कविता' और 'मैली कविता''। यह और भी हास्यास्पद है। सामान्य पाठक इन शब्दों से व्यक्त कविता के स्वभाव को नहीं समझता। हमारे लिये फौरन समझ में आने वाली ये क्रमश: 'कलापरक' और 'यथार्थ परक' कविताये हैं। नागार्जुन की गहन यथार्थपरक कविता को 'अशुद्ध' कविता कहना उसका तिरस्कार है। बुर्जुआ आधुनिकों का यही 'भाषा छल' है जिस से वे कुलीन बुद्धिजीवियों का साहित्यिक मनोरंजन कराते रहते हैं। जैसे अशेक बाजपेयी त्रिलोचन को 'माया' का कवि कहते हैं। शमशेर को कहेंगे 'लीला' का कवि। मुक्तिबोध को स्वप्नों - फैंटसी - का कवि। हमें इस भाषा छल के पीछे छिपी साहित्यिक रणनीति को समझना चाहिये। समय पर इस प्रवृत्ति का विरोध ज़रूरी है।


विजयबहादुर सिंह ने रघुवीर सहाय की कविता को उचित ही 'लाचारी', 'हताशा', 'अकेलेपन' से उबाने वाली कविता कहा है। हमारे समय के साधक समीक्षक आनंद प्रकाश ने उसे 'पराजय', 'नकार', 'सोच का निषेध' तथा समाज से अलग रहकर अकेले ही संघर्ष करने की स्थिति में 'अनर्गल' कविता तक कहा है। क्या ऐसे कवि को हम उसकी पीढी का 'सर्वाधिक महत्वपूर्ण' कवि कहना चाहेंगे। नागार्जुन के संदर्भ में विजयकुमार ने विभ्रम फैलाने वाली एक और बात कही है। आठवें दशक के कवियों की 'रचनाशीलता' ने नागार्जुन, त्रिलोचन तथा केदार बाबू जैसे 'पूर्व उपेक्षित' कवियों को पुन: 'प्रासंगिक' बनाया। उनकी 'उपेक्षा का दौर' खत्म हुआ। कोई भी सवाल कर सकता है कि आख़िर 'सत्तर' के महत्वपूर्ण दशक' का क्या हुआ। दूसरे, क्या उपर्युक्त कवि सत्तर के दशक से बहुत पहले ही प्रतिष्ठित नहीं हो चुके थे। क्या उन्हें इस तरह उपेक्षित कहना 'नई कविता के प्रतिमान' में कही गई बात की नकल नहीं है। इन बातों पर ध्यान दिया जाये। बल्कि सच तो यह है कि आठवें दशक की तथाकथित रचनाशीलता उक्त बडे कवियों के प्रकाश में दिखने योग्य बन पाई थी। आनंद प्रकाश ने सत्तर के दशक पर अपने 50 पृष्ठीय अध्याय में कुछ उन पेशेवर आलोचकों को उत्तर दिया जो उसे गर्त में छिपाये रहे थे। वह नाकामयाब कोशिश आज भी जारी है। आनंद प्रकाश को इस दशक के प्रारंभ में 'नागार्जुन, केदार तथा त्रिलोचन' के नाम याद आते हैं। बाद मे शमशेर का नाम भी जुड जाता है। इस दशक के दूसरे दौर के कवियों में कुमारेंद्र, श्रीराम तिवारी, विजेंद्र, कुमार विकल, शलभ श्रीराम सिंह आदि की कविता का व्यापक विश्लेषण यहाँ है। उनके लिये सत्तर की कविता में 'फार्म' और 'कथ्य' दोनों ही 'महत्वपूर्ण' तथा 'समस्यामूलक' हैं। यही नहीं बल्कि ये कवि 'अपनी पहचान साठ के दशक' में ही बना चुके थे। अस्सी तथा नब्बे के दशक में जिस 'नई रचनाशीलता' की बात विजयकुमार करते हैं उसे आनंद प्रकाश ने 'शासकीय कला मूल्यों वाली कविता' कहा है। यह भी कहा है कि उसका व्याकरण भी 'व्यवसाय का व्याकरण' है। पुरस्कार, प्रतिष्ठा, और महत्व को समर्पित इस काव्य रचना का चरित्र तब और ही स्पष्ट हो जाता है, जब हम उसे 'सत्तर की कविता के समक्ष' रखते हैं। पृ. 172


दोनों पत्रों में बहुत सी बातें कही गई हैं जिन पर बात-चीत हो सकती है। मैं ने सिर्फ़ कुछेक ऐसी बुनियादी बातों की ओर संकेत किया है जो समकालीन कविता की बहस को और आगे बढा सके। इसके साथ हमें इक्कीसवीं सदी में कवि कर्म तथा कवि दायित्व के बारे में नये सिरे से सोचने को प्रेरित भी करें। क्या कवि इसी तरह लोक विमुख अ-राजनीतिक कविता लिख कर संतुष्ट होते रहेगें। क्या वे मध्यवर्गीय अनुभव परिसीमा का अतिक्रम कर उस संघर्षशील लोक के करीब नहीं जायेंगे जो राष्ट्रीय निर्माण में अपने को खपा रहा है। साहित्य संगठनों की भूमिका क्यों निस्तेज़ हो रही है। जन पक्षधर पत्रिकायें क्यों नहीं आगे आकर वस्तुस्थिति में असरदार हस्तक्षेप करें। हम अपनी इतनी समृद्ध विरासत के प्रति क्यों उदासीन है। कब तक औपनिवेशिक आधुनिकता के दास बने रहकर हम अपनी भाषा, संस्कृति देश तथा जनपदों को भूले रहेंगे। क्या जनता तथा स्वाधीनता के लिये संकट समाप्त हो चुका है। पूँजीवाद से समतामूलक समाज में संक्रमण के लिये कठिनाइयाँ अधिक होती हैं। संक्रमण की इस प्रक्रिया को अग्रसर करने के लिये क्या कवियों की भी कोई भूमिका हो सकती है। उसके लिये जनता से कैसे एकात्म हुआ जा सकता है। लोक या सर्वहारा का चरित्र वैश्विक है। क्या हम इसे जनवादी संस्कृति का अर्जित ज़रूरी मूल्य न समझें। खप पंचायत तथा गगनचुंबी भवन क्रमश: क्या सामंती तथा पूँजीवादी व्यवस्थाओं के प्रतीक चिह्न नहीं हैं। इनके पीछे सक्रिय ताकतों से मुठभेड के लिये हम अपनी कविता को कैसे तैयार करें। मेरे खयाल से श्रमियों, मझोले किसानों, भूमिहीन खेतिहरों तथा अन्य कठोर काम में नधे लोगों की संगठित ताकत ही रक्तपायी लोगों से मुक्त करा सकती है। हम विचार करें इस बडी संश्लिष्ट प्रक्रिया में कवि की भागीदारी कविता के माध्यम से कैसे संभव है। क्या बुनियादी तथा ज़मीनी आंदोलनों के बिना समझे हम तथाकथित बुर्जुआ उच्च चिंतन या उच्च कुलीन संस्कृति को समझ - समझा पायेंगे। कृतियाँ क्या स्वत: स्वयं-भू होती है। जिन कृतियों की जडें लोक में गहरी नहीं हैं क्या वे समाज में स्थित विद्रूपताओं से विमुख नहीं हो जातीं। क्या ऐसी लोक असमपृक्त कृतियाँ हमारे चित्त को रिक्त नहीं बना देती। आज के कवि पर बाहरी दबाव कितने ज्यादा हैं। विजयकुमार जिसे 'दुश्वार' स्थिति मानने को अभिशप्त दिखते हैं। पर वह यह क्यों नहीं बताते कि सारी भयावह स्थितियों के बावजुद विश्व में पूँजीवाद तथा साम्राज्यवाद के विरुद्ध प्रतिरोध बढ रहा है। उनके अवसाद में जैसे रघुवीर सहाय का मन मुखर होने लगता है - 'होगा ही अत्याचार और होता ही रहेगा  हारे हैं हार भी रहे हैं हम बार बार और यह स्वीकार करना कि हारे हैं  ताकत नहीं दे रहा' आनंद प्रकाश ने रघुवीर सहाय के इस अवसादी राग को 'अज्ञेय के साथ साथ चलना' बताया है। क्या इस 'दुश्वार' स्थिति से उवरने के लिये भारतीय तथा विश्व की जनता सघर्ष नहीं कर रही। बिल्कुल पडौस के देश नेपाल मे नया सूर्योदय देखकर संघर्षशील जनता में कवि का भरोसा बढ रहा है। इन बातों पर बिना गंभीरता से सोचे हमारी बहसें पेशेवर आलोचकों का वाग्विलास ही होगी। अति प्रिय कवि नाजिम की इन पंक्तियों से अपनी बात खत्म करता हूँ - 'सिर्फ़ इसलिये कि तुमने अपनी उम्मीदें नहीं छोडी दुनिया की, मुल्क की, आदमी की बेहतरी कीइस तरह कुछ भी असंभव नहीं  बिता देना - यह बात संभव हैहाँ शर्त यह है कि छाती की बाँयी ओर वह कीमती हीरा है -  वह कीमती हीरा - चमकता रहे'
 

 








विजेंद्र 
मो.: 9928242515

Wednesday, January 25, 2012

मैं अनुभव और भाषा का आजाद गुलाम हूं



हाल में पर्वत राग का लीलाधर जगूड़ी अंक छपा है. उसमें जगूड़ी जी ने अपने और अपनी कविताई के बारे में लिखा है. आप भी पढि़ए.


मेरा जन्म 1 जुलाई, 1940 के सोमवार को साढ़े नौ बजे सुबह हुआ। मुझे कैसा लगा, नहीं मालूम, पर अपने आज के अनुभव से जानता हूं कि मां और पिता जी को बहुत अच्छा लगा होगा। संभवत: उन्होंने भेली फाड़कर बांटी होगी। तब पहाड़ पर मिठाइयां और चीनी दुर्लभ वस्तुओं में होती थीं, सिर्फ मेरठ, मुज्‍जफरनगर और देहरादून से गुड़ की भेलियां ही आदमियों और खच्चरों की पीठ पर पहाड़ चढ़ पाती थीं। पहाड़ी गन्ना सिर्फ कोदे के डंठलों को कहते थे जिसे जानवर ज्‍यादा पसंद करते थे। आज भी कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में कोदे को पहाड़ी गन्ना बनाने पर कोई शोध नहीं हुआ है। मेरी बहुत दिनों से यह मांग रहीं है....? मैं जितनी विकट परिस्थितियों में पैदा हुआ, युवा होते ही मुझे वे विषमताएं बड़ी काव्यात्मक लगने लगीं। गांवों में सुने हुए बचपन के लोकगीत और स्कूल में पढ़ी हुई कविताओं से बार-बार एक आवेग सा मन में पैदा होता था कि मैं भी ऐसा कुछ लिख बोल सकता हूं, या कि मैं इसे कुछ अपने ढंग से अपनी स्थितियों के बीच कहूं तो कैसे कहूंगा ? संभवत: इसी अनुकरणप्रियता की जद्दोजेहद में मेरे प्रारंभिक कवि का जन्म हुआ। जाहिर है कि यह एक तरह से दूसरा जन्म था। युवा होते ही मुझे जयशंकर प्रसाद, अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध', मैथिलीशण गुप्त, सुमित्रा नंदन पंत, निराला और दिनकर ने बहुत प्रभावित किया। वाक्देवी के विपुल संसार में कविता के परिसर की ओर ले जाने वाले पुराने जोगी दरअसल पुराने कवि ही होते हैं। नये कवि का पहला जन्म पुराने कवियों के वैचारिक आशयों से होता है। बाद में लगभग 21-22 वर्ष की उम्र में मैं अज्ञेय, मुक्तिबोध, नरेश मेहता, शमशेर बहादुर सिंह, विजयदेव नारायण साही, कुंवर नारायण, शंभुनाथ सिंह, केदारनाथ सिंह आदि स्थापित कवियों की रचनाओं से प्रभावित हुआ। यानी कि 1960 के बाद मैं तेजी से अपने लिए अपना कोई ढंग और अपना कोई रास्ता तलाशने में लग गया। युवा कवियों में राजकमल चौधरी और धूमिल मुझ से उम्र, अनुभव और अध्ययन में बड़े थे। उनसे भी प्रभावित हुआ। अपने को दुनिया से संलग्‍न करते हुए कविता की अभिव्यक्ति में अलग करते चलने का संघर्ष आज भी जारी है।

कविता में इतिहास का होते हुए भी अपने समय का होना पड़ता है। जो अपने समय का नहीं वह इतिहास का भी नहीं हो सकता। कुछ लोग समय को अपने इतिहास से अलग इकाई समझते हैं लेकिन मैं समझता हूं कि सारे काल इतिहास के बस्ते में ठूंसे हुए हैं। सारा इतिहास अपने समय का वर्तमान रहा हुआ होता है। इसलिए वर्तमान ही है जो रोज इतिहास में दैनिक इतिहास होकर दाखिल हो रहा है। जो अपने समय का होता है, इस तरह वह इतिहास का हो जाता है। इतिहास के लिए जो इतिहास में घुसे हुए रहते हैं वे कविता क्षेत्र में अपने होने के इतिहास से वंचित हो जाते हैं। कहीं एक जगह जमा वर्तमान ही अतीत बन जाता है।

मैं काशी (बनारस) और उत्तरकाशी का विशेष मुरीद हूं कि उनकी प्रकृति और जीवन पद्धति ने मुझे कविता की ओर अधिकतम संलग्‍न किया। धूमिल और काशीनाथ सिंह मेरे अग्रज हैं पर उन्हीं के आस-पास मेरी भी शुरूआत हुई है, यह सौभाग्य समझता हूं। निराला निवेश में आयोजित एक गोष्ठी में डॉ0 बच्चन सिंह ने धूमिल से कहा था कि तुम जगूड़ी के प्रभाव से बचो, हम लोगों ने इस उक्ति का उस दिन खूब मजा लिया था। उसी तरह की व्यक्तिगत खुशी उस दिन भी हुई थी जब इमरजेंसी के दिनों में 'भेद' कविता 'आलोचना' के लिए स्वीकार करते हुए डॉ0 नामवर सिंह ने कहा था कि -'बाबू रघुवीर सहाय अब क्या खाकर कविता लिखेंगे'। उसके बाद रघुवीर सहाय ने एक से एक उम्‍दा कविताएं लिखीं। लेकिन दिल बहलाने को गालिब ये याल अच्छा है। रघुवीर सहाय से आज भी बहुत कुछ सीखा जाना चाहिए। हर कवि, अभिव्यक्ति के किसी न किसी अंग का पूरक होता है। अच्छी कविता और अच्छे कवियों की सोहबत व्यक्तित्व में तब्दीलियां लाती है। सोच और शब्दावली में फर्क पड़ता है। लेकिन उसके बाद एक ऐसी स्थिति आती है कि खुद को सब घेरों से बाहर करने की इच्छा होती है। प्रचलन से चिढ़ होने लगती है। परिवर्तन में पर परा की शाश्वतता दिखने लगती है। बदलाव और अभिव्यक्ति एक नया उपार्जन मांगने लगते हैं। कुछ लोग केवल कौशल, कुछ कौशल व कथ्य दोनों स्तरों पर संकट का अनुभव करते हैं। प्रतिष्ठित और प्रचलित दोनों के विरूद्ध अपना रास्ता निकालना हर बार चुनौतियों भरा होता है।

व्याधि और उपाधि की लालसा की तरह कविता भी परिवर्तन की आकांक्षा का पीछा नहीं छोड़ती। कवि के पास अच्छे लोगों के अलावा बुरे लोगों के बीच रहने के भी अच्छे खासे अनुभव होने चाहिएं। बुराइयों को जाने बगैर अच्छाइयों की पहचान और उनका पोषण संभव नहीं। कवि को गर्हित, निकृष्ट, वर्जित और निषिद्ध का भी पीछा करना चाहिए। कवि की संवेदना को अनुभव सिद्ध होना आवश्यक है वरना बिना कीमत चुकाये मुफत की कविताई यशस्वी नहीं हो सकती। कवि को दुश्चरित्रों, दुश्शीलों, पतितों, अटकों, भटकों और अपराधियों तक के प्रति मानवीय जिम्‍मेदारी और करुणा से भरा हुआ होना चाहिए। रवि की तरह कवि को भी सब जगह बिना घृणा के जाने, रहने और सहने का तजुर्बा और साहस होना चाहिए। लाचारी और मजबूरीवश ऐसा होना कवि की अयोग्यता है। सोच समझकर, जानबूझकर, जिज्ञासु भाव से ऐसा हो तो वह अपने कवि के निर्माण में बेहतर सहायक हो सकता है। चीजें स्वभावत: सब अच्छी नहीं होती, उन्हें अच्छा बनाना पड़ता है। यह तभी संभव है जब सबसे पहले अपनी खराबी और कमजोरी का बोध हो। साहित्य की जटिलता, ढांचे और प्रभाव दोनों स्तरों पर शुरू से ही मौजूद रही है, इसीलिए खासकर कविता की समझदारी के लिए अपने भीतर 'शीघ्र बोध' भी पैदा करने का ज्ञानात्मक अभ्‍यास विकसित करना पड़ता है। सरलीकरण और अतिरंजना से तभी छुटकारा पाया जा सकता है।

मैंने पहले कवि होने के बारे में नहीं सोचा था लेकिन मेरी परिस्थितियों ने मुझे इतना विपत्तिग्रस्त और अकेला बनाये रखा कि मुझे अपने चुप्पेपन में शब्दों और ध्वनियों के अर्थ समझने और बरतने की तलब सी हो गयी। अकेलापन साहित्य में व्यक्ति की मानसिक मरम्‍मत करता है। मेरे मन में अपार असफलताओं और असुरक्षाओं ने डेरा जमा लिया था। अगर मैं साहित्य के संपर्क में न आता तो मैं संभवत: एक अपराधी हो जाता। साहित्य ने और कुछ किया हो या न किया हो, कम से कम मुझे अपराधी होने से रोका है। मैंने खुद धोखे खाये, अन्याय झेले, उनका प्रतिकार किया मगर हर जगह मैं उन्हें न्याय में नहीं बदलवा पाया। साहित्य अच्छे आदमी का निर्माण संभवत: इसी तरह करता है कि वह अपने से जुड़ने वाले को अन्यायी, अपराधी और निरर्थक ईष्याओं का पात्र नहीं बनने देता। जो हों या होते होंगे वे कवि तो कतई नहीं हो सकते। मैं खुद को कवि होने का प्रमाणपत्र नहीं दे रहा हूं लेकिन मैं खुद को कविता से अलग भी नहीं कर सकता। न मैं बिना किसी भाषा के कविता की कल्पना कर सकता हूं।

मैं दृश्यों और आंतरिक अनुभवों को भी भाषा में सोचता हूं। भाषा के बिना मैं रंगों और आकृतियों के बारे में भी नहीं सोच सकता। मैं अनुभव और भाषा का आजाद गुलाम हूं। मैं पहले नये विचार का पीछा करता हूं और उसे अपने अनुरूप बनाने की कोशिश करता हूं अन्यथा वह अगर कोई नया रास्ता मुझे दिखाता है तो उसी पर चलकर मैं उसकी उपयोगिता के बारे में सोचता रहता हूं। मैंने बहुत सी कविताएं नींद में सपना देखते हुए सोची हैं और तुरंत जगकर उन्हें लिखा भी है। किसी मौके पर मैं बताऊंगा कि कौन-कौन सी कविताएं मैंने सपने में सोची और बोली हैं। मैं अपनी कविताएं उस तरह कण्ठस्थ ज्‍यादा दिन नहीं रख पाता हूं जिस तरह कुछ कवि सम्‍मेलनी कवि अपनी कविताओं को रट्टा मारकर याद रखते हैं। उनके साथ सुविधा यह है कि उन्हें वे ही कविताएं सुनानी हैं जो उन्हें अपने जीवन काल में सुनाते-सुनाते रट गयी हैं। मैं खुद को भुला देने के लिए फिर एक नयी कविता रचता हूं और फिर उससे आगे किसी और नयी कविता की ओर बढ़ जाता हूं। मैंने अब तक क्या-क्या सोचा, किया और लिखा, उसे याद रखता हूं पर दोहराता नहीं हूं । अगला जन्म अगर होता है तो मैं उसमें भी कवि होना चाहूंगा, सबसे बेहतर कवि।

लीलाधर जगूड़ी 











Saturday, January 14, 2012

समकालीन कविता


जैसा कि आप जानते हैं मुंबई के कुछ मित्रों ने चिंतनदिशा का प्रकाशन फिर से शुरू किया है. इसके पिछले अंक में विजय बहादुर सिंह और विजय कुमार के बीच कविता की चिंताओं को लेकर हुआ पत्राचार छपा है. पिछली पोस्‍ट में आपने विजय बहादुर का पत्र पढ़ा.अब पेश है विजय कुमार का पत्र

 
माननीय डॉक्टर विजय बहादुरजी,
आपके 157 और 317 के संयुक्त पत्र का उत्तर उसी समय मैंने आपको दे दिया था जो काफ़ी हडबडी में दिया गया उत्तर था। इसलिए जब भाई हृदयेश मयंक ने आपके इस पत्र और उस मेरे जवाब को 'चिंतन दिशा' में प्रकाशित करने की इच्छा प्रगट की तो मुझे यह आवश्यक लगा कि मैं अपने उस जवाब को थोडा व्यवस्थित करने के बाद ही छपवाऊं। उत्तर तो शायद यह भी व्यवस्थित नहीं है, पर कुछ मुद्दे ऐसे हैं जो चर्चा का एक ठोस आधार बना सकें तो अच्छा है। आपने ही कहा था कि हमारे इस पत्राचार का उद्देश्य एक दूसरे पर कुछ निजी तौर पर साबित करने के बजाय समकालीन समय में लिखी जा रही कविता पर कुछ चर्चा बिंदुओं को रेखांकित करनेवाला होना चाहिए। यह पत्र विशुद्धद उसी उद्देश्य से लिखा गया है।
आपने अपने पत्र में जिन मुद्दों को उठाया है, पत्र पतढते ही मैं समझ गया था कि मैं तो उस पत्र में महज एक निमित्त हूं, आपके निशाने पर कौन लोग हैं यह स्पष्ट था। पर पहले यह बात स्पष्ट कर दूं कि श्री राजेंद्र यादव के नाम 'रचना समय' के कविता विशेषांक में जो मेरा पत्र छपा है, वह बरसों से मेरे रद्दी काग़ज़ों में पडा हुआ था। हल्के-फुल्के अंदाज़ में लिखे गये उस पत्र को छपवाना उचित था या नहीं, यह मैं नहीं जानता पर अब जब छप गया तो छप गया। मुझे लगता है कि उसमें कुछ बातें हैं जिन पर कायदे से बहस हो सकती है। हिन्दी का हमारा यह वर्तमान दृश्य शायद अब संवाद-उन्मुख नहीं है। बहसें होती नहीं हैं। ज्यादातर तो एक आपसी सहमति का 'गुडी गुडी' संसार फैला हुआ है। फारसी की कहावत है कि 'मन तुरा हाजी ब गुयम, तू मरा हाजी ब गो'। (अर्थात् मैं तुझे हाजी कहता हूं, तू मुझे हाजी कह दे। और पता चला कि दोनों में से कोई हज करके नहीं आया है।) सभाओं और गोष्ठियों में आज एक भक्ति-रस की धारा बहती रहती है। बल्कि वह सही मायने में भक्ति और श्रद्धा भी नहीं, उसका एक 'मेलोड्रामा' है। शिखर आलोचक सुबह-शाम प्रवचन की मुद्रा में अपने पिट्ठुओं को आसमान पर चढाते रहते हैं। भक्तगण श्रद्धा विगलित होने का नाटक करते हुए उनकी धोती पकडकर भवसागर पार कर जाना चाहते हैं। गुरु जितने चतुर, चेले उनसे ज्यादा चतुर। कहां हैं बहसें? प्रश्नाकुलता का वह ताप जो अभी तीस-चालीस साल पहले तक दृश्य में बना रहता था, वह अब नज़र नहीं आता।
आपकी इस बात से एक हद तक सहमत हुआ जा सकता है कि वर्तमान में समकालीन कविता की कुछ रुढि़यां बन गयी हैं। हमें पता नहीं कि कवियों की एक छोटी-सी बिरादरी के बाहर कविता के वास्तविक रसिक कितने हैं! पर इस मुद्दे पर आपके पत्र में एक भयावह सरलीकरण भी दिखाई पडता है। मैं आपकी अनेक बातों से सहमत होते हुए भी आपसे असहमत भी हूं। और यह अच्छा ही है कि आपके सुर में सुर मिलाने के बजाये अपनी कुछ बातें आपके सामने रखूं। आपके पत्र को ध्यान से पढने के बाद कई एक बातें ऐसी लगी हैं, जहां यह लगता है कि आप समकालीन कविता से असहमत तो हैं पर साथ ही एक बडी हद तक अपने बहुत सारे पूर्वाग्रह लेकर भी चल रहे हैं। आज की कविता का दायरा यदि इसलिए सीमित है कि वह पाठकों के हृदय के तारों को झंकृत नहीं कर पा रही तो यह एक बडा मुद्दा है। इसके अनेक पहलू हैं और उन पर गंभीरता से बात होनी चाहिए। कविता और पाठक के बीच की दूरी का मसला जितना साहित्यिक प्रतिभा की श्रेष्ठता या हीनता का है, उतना ही आधुनिक समाज की संरचना, संप्रेषण के साधनों की वर्तमान स्थिति, हिन्दी भाषी समाज के सांस्कृतिक हालात और सर्जनात्मक भाषा के सम्मुख उपस्थित तमाम तरह के संकटों का भी है। कम से कम ऐसा मैं तो मानता हूं और आगे भी इस पर अपनी बात को जारी रखना चाहता हूं। कवियों के आचरण में कथनी करनी के अंतर या उनके आपसी राग-द्वेष या उनकी सफलताकामी क्षुद्र दुनिया पर आपकी टिप्पणियां भी अपनी जगह पर सही हो सकती हैं पर वह एक बडी चर्चा का छोटा-सा हिस्सा मात्र है। आप हिन्दी कविता के पिछले कुछ दशकों की स्थिति से बेशक बहुत असंतुष्ट हो सकते हैं और आपको अपनी राय रखने का पूरा अधिकार भी है पर अजीब तब लगता है जब आप इस सारी स्थिति को 'विशुद्ध साहित्य' के दायरे में रखकर ही सोचना विचारना चाहते हैं। इसीलिए तो कहीं आप एक झटके में पूरी प्रगतिशील या प्रयोगवादी कविता को नकार दे रहे हैं। कहीं समूची आधुनिकतावादी और तथाकथित उत्तर आधुनिकतावादी बहसों के बारे में ये निष्कर्ष निकाल ले रहे हैं कि इनमें हमारी दो हजार साल की साहित्यिक विरासत और सृजनात्मक सिरे से अनुपस्थित है और कहीं आप पश्चिम से संपर्क से नाक-भौं सिकोडते हुए किसी 'आदर्श भारतीयता' की शरण में चले जाना चाहते हैं। नागार्जुन और भवानीप्रसाद मिश्र आपके पसंद के कवि हैं और आप कहते हैं कि ''नागार्जुन और भवानीप्रसाद मिश्र में तो परंपरागत सामूहिकता का बोध है और इनके यहां विचार हैं पर वे वादग्रस्तता से मुक्त हैं। इन्हें पढते हुए बार-बार अनुभव होता है कि हम अपने आस-पास की उन सच्चाइयों से रूबरू हो रहे हैं जो सिर्फ़ कवि-कल्पना या काव्य कौशल की मनगंढत सच्चाइयां नहीं है। ये विशाल और व्यापक राष्ट्रीय जीवन के गर्भ से उपजी हुई है।'' इसी संदर्भ में आप आगे कहते हैं कि ''रघुबीर सहाय को पढते हुए तबियत बैठ-सी जाती है। बेहद अकेलेपन और लाचारी से पाठक भर उठता है।'' ये अपने अपने इंप्रेशन हैं। इंप्रेशन भर। ये अंतिम सत्य नहीं कहलाते। आपको भवानी प्रसाद मिश्र पसंद हैं, किसी अन्य को उनमें कुछेक कविताओं को छोडकर बेहद सपाटपन भी नज़र आ सकता है। नागार्जुन की कविता को यदि आप कहते हैं कि वह 'विशाल और व्यापक राष्ट्रीय जीवन के गर्भ से उपजी हुई है' तो लगभग यही राय कोई दूसरा आदमी मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय, चंद्रकांत देवताले, अरुण कमल, राजेश जोशी और नरेंद्र जैन की कविताओं के बारे में व्यक्त कर सकता है। बल्कि मुक्तिबोध और रघुबीर सहाय के यहां वह सब देख सकता है जो नागार्जुन, त्रिलोचन या भवानी प्रसाद के यहां सिरे से अनुपस्थित है। कवियों के अपने-अपने व्यक्तित्व और अनुभव संसार होते हैं। एक का आधार लेकर दूसरे को पछाडना मैं समझता हूं कि एकांगी दृष्टिकोण है। कोई भी एक रचनाकार किसी भी दौर में यह नहीं कह सकता कि सत्य की संपूर्ण अभिव्यक्ति सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरे पास है। यदि ऐसा होता तो हम तुलसी के साथ सूर को न पढ रहे होते। सिर्फ़ कबीर से काम चल जाता, मीरा को पढने की आवश्यकता न रहती। माफ कीजिएगा डाक्टर साहब मुझे आपका दृष्टिकोण बहुत कुछ एकांगी लग रहा है और किसी हद तक दुराग्रही भी। वह सही तरीके की 'साहित्यिक पॉलिमिक्स' का आभास भी नहीं दे रहा।
समकालीन कविता पर आपसे चर्चा करते हुए मैं अपनी स्थिति को स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि यह सब लिखते हुए न तो मैं स्वयं को इस कविता का कोई प्रवक्ता या पैरोकार मान रहा हूं न उसकी कतिपय सीमाओं के बचाव में खडा होना चाहता हूं। मेरी वैसी क्षमता भी नहीं है। आज लिखी जा रही कविता और कवियों की तमाम सीमाओं को मैं गिना सकता हूं और बाज वक्त मेरा बहुत आलोचनात्मक रवैया भी रहा है पर साथ ही मैं यह भी मानता हूं कि हर युग में कविता ही क्यों, हर कला की हर सर्जनात्मक अभिव्यक्ति का मसला सर्जक के व्यक्तित्व की संरचना से जुडा रहता है। समय के बहुत सारे अंतर्विरोध सर्जक के व्यक्तित्व में होते हैं। हर कला का एक स्वप्न होता है कि वह मनुष्य के मन की किसी आदिम पवित्रता को संजोए पर अपने इस उपक्रम में उसकी राह तो अपने समय के इतिहास के तमाम भूलभुलैया से होकर ही है। रवींद्र नाथ टेगौर की पंक्तियां याद आती हैं कि ''साहित्य पर विचार करते समय दो चीज़ें देखनी होती हैं। पहली विश्व पर साहित्यकार के हृदय का अधिकार कितना है; दूसरी, उसका कितना अंश स्थायी आकार में व्यक्त हुआ है। यह जो मनुष्य का संसार है यही हम सबके हृदय-हृदय में बसता आ रहा है, यह प्रवाह पुरातन है और नित्य नूतन भी।'' कला में अपने समय के इतिहास बोध और एक सनातन पवित्रता के द्वंद्व को रवींद्र ने कितने अच्छे ढंग से व्यक्त किया है। मूल बात यही है कि साहित्य में जिस सनातन को हम रचना चाहते हैं वह हर बार बाहर के विश्व से ही विविध रसों, रंगों, सांचों में तैयार होता रहता है। हम बिना इतिहास के उस झंझावात से गुज़रे उस शाश्वत मूल्यवत्ता को कैसे हासिल कर सकते हैं। भक्तिकाल हो या रीतिकाल, प्रगतिवाद हो या प्रयोगवाद, आधुनिकता का बोध हो या उत्तर आधुनिक विमर्श - हर समय, झंझावात है।
आचार्य शुक्ल ने जब यह कहा था कि सभ्यता का ज्यों-ज्यों विकास होता जायेगा, कवि-कर्म उतना ही कठिन होता जायेगा और कविता की आवश्यकता भी उतनी ही बढती जायेगी तो एक प्रकार से वे इतिहास और सनातन दोनों की इस द्वंद्वात्मकता को ही सामने रख रहे थे। हम टेक्‍नोलोजी, बाज़ार, पूंजी, संचार और उपभोग की दुनिया में चाहे जितने धंसे हुए हों, पर प्रकृति का कोई अनुपम दृश्य, चांदनी रात की कोई नीरव शांति, नदी के कल कल बहते पानी की आवाज़, वृक्ष का झूमना या हवा का हल्के से देह को स्पर्श करना यह सब क्यों आज भी हमारे अंतर्मन को उसी तरह से सहसा मुक्त कर देते हैं? क्यों वह क्षण कविता का क्षण लगने लगता है? लेकिन यहीं आचार्य शुक्ल की वह बात ध्यान में आती हैं कि द्वंद्वात्मकता के बिना किसी चीज़ का कोई अर्थ नहीं है। हमारे चारों ओर घिराव और फंसाव हैं, इसीलिए अवकाश के क्षण मोहक लगते हैं। घुटन है तभी तो हवा का स्पर्श कोई मायने रखता है। मैं बस यही कहना चाहता हूं कि कला में 'आत्म के जिस साक्षात्कार' की बात आप अपने पत्र में कर रहे हैं वह इतिहास के तमाम दाग-धब्बों, कल्मष, अंतर्विरोधों, पाखंड और आडंबरों की भूल-भुलैया से गुज़र कर ही है। 'आत्म का साक्षात्कार' कोई 'फास्ट फूड' या 'रेडीमेड वस्त्र' नहीं है जिसे लपक कर हासिल कर लिया जाये। आप जब नागार्जुन की कविता में मनुष्य की जिजीविषा और बुनियादी रोमान का हवाला देते हैं तो मेरे सरीखे पाठक के लिए वह सबकुछ इसलिए मायने रखता है कि कवि अपनी समसामयिकता और तात्कालिकता, स्थितियों-प्रसंगों की समयबध्दता, क्षणिकता, क्षणभगुंरता, क्षुद्रता और साधारणता से गुज़रते हुए ही वहां तक पहुंच रहा है। उसकी कविता में विपरीत स्थितियों का 'जस्टापोजीशन' ही उसे एक बडा कवि बनाते हैं। चारों ओर के तमाम संदर्भों में उसकी संवेदना का सने होना, उसके दाग-धब्बे, उसका लिथडना, उसकी यह 'अशुध्दता' ही उसका मूल्य है। उसका यह स्वर-वह जैसे कि हर स्थिति में बध्द है और साथ ही उसका अतिक्रमण भी कर देना चाहता है। यह अतिक्रमण उसका रोमान है। और यदि आप एक बार इस बात को स्वीकार कर लेते हैं तो आगे दलील यह है कि नागार्जुन के इस ॠण को स्वीकार करते हुए भी अगली पीढी का कवि अपने ढंग से अपना वस्तुजगत और अपना रोमान 'डिस्कवर' करेगा। वह नागार्जुन से प्रभावित होते हुए भी उनका 'कॉपी कैट मॉडेल' नहीं हो सकता, न उसे होना चाहिए। उसे अपने तरीके से अपने इतिहास को पाना होगा। बल्कि एक नया कवि का रचना जगत सहसा पुराने के सृजन को एक नया अर्थ भी देगा। आख़िर यह कैसे हुआ कि आठवें दशक में जब युवा कवियों की एक नयी रचनाशीलता सामने आयी तो उनकी समवेत उपस्थिति ने समूचे परिदृश्य को बदल दिया। जिस प्रगतिशील कविता की परंपरा से ये जुडे, उस जुडाव ने ही आठवें दशक में नागार्जुन, केदार, त्रिलोचन को पुन:प्रांसगिक बनाया, उनकी उपेक्षा का दौर ख़त्म हुआ। मुक्तिबोध और शमशेर को एक नये तरीके से समझाने की कोशिशें हुईं। वह सब जो ओझल था, अचानक नयी और युवा रचनाशीलता के संदर्भ में केंद्र में आ गया। इस बात को रेखांकित किया जाना चाहिए कि पीढि़यों के इस अंर्तसंबंध की अभिक्रियाएं दोनों ओर से चलती हैं। इलियट ने तो इस बात को बहुत अच्छे ढंग से प्रतिपादित किया है। और यहीं आकर मैं आपसे यह ज़िरह करना चाहता हूं कि -
जब इतिहास बोध की बात हम करते हैं, 'अशुद्ध्‍ा' कविता की बात करते हैं, समसामयिकता की बात करते हैं तो कविता की कोई भी अवधारणा अमूर्त, समाज निरपेक्ष, ठहरी हुई और 'यूनीफार्म' कैसे हो सकती है। जो किसी पुरखे ने लिखा, ठीक वही आज का युवक क्यों दोहरायेगा? एक दौर था जब एक पीढी ने अपना इतिहास बोध दो महायुद्धों के बीच के घटनाक्रमों से, राष्ट्रीय चेतना के उभार से, असहयोग आंदोलन, जलियांवाल बाग हत्याकांड, खिलाफ़त आंदोलन, तिलक की मृत्यु, भगतसिंह की फांसी, सांप्रदायिकता के उभार, विभाजन, परंपरा और आधुनिकता की बहसों और एक नये राष्ट्र के निर्माण के सपनों से पाया था। बीसवीं सदी बीत गयी। इसकी विराट उपलब्धियों और चिंताजनक असफलताओं का एक बोझ हम सब पर है। हमारे समय के अंतर्विरोध बहुत अलग तरह के हैं। एक तरफ़ टेक्‍नोलॉजी का इतना विकास और दूसरी तरफ़ जाति, धर्म, संप्रदाय और वर्ण की और भी सख्त होती जाती घेराबंदियां। चारों तरफ़ जानकारियों का इतना विशाल कूडेदान और अपने ही 'स्व' की कोई स्मृति नहीं। पूंजी, उपभोग और उन्माद की संस्कृति का आज मनुष्य के मनोजगत पर जितना नियंत्रण हो चुका है, क्या वह पिछले किसी भी दौर में था? समय की ऐसी तेज़ रफ्तार और मनुष्य का एक भयावह रूप से विस्थापित और स्मृतिविहीन अस्तित्व। क्या हम कभी इस पर विस्तार से बात नहीं करना चाहेंगे? सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक घेरेबंदियों का यह दौर और इस सबके बीच मध्यवर्ग से आता हुआ हमारा यह लेखक और कवि। आप ने अपने पत्र में टिपिकल मध्यवर्ग की हताश और किंकर्तव्यविमूढ मानसिकता का संदर्भ उठाया है। क्या यह मसला हमारी आधुनिकता के सारे झमेले से जुडा हुआ नहीं है? क्या इस पर आज बहुत 'डिस्पेशनेट' होकर एक बडे संदर्भ में बात करने की आवश्यकता नहीं है। हां, यह सच है कि हम एक हद तक आज पश्चिम से आक्रांत है, क्योंकि आधुनिकता बोध की वह ज़मीन ही हमने वहां से उठायी है। और यह एक ऐसी दुश्वार स्थिति है, जिसमें न हमारा पुराना जातीय बोध अक्षुण्ण रह गया है, न हम पश्चिमी आधुनिकता के वास्तविक लाभों को प्राप्त कर पाये हैं। बीसवीं सदी में एशियाई देशों, अफ्रीका, लातीनी अमरीका - क्या सभी जगह पर यह दुश्वारी नहीं है। अभी कल मैं चीन में खुली अर्थव्यवस्था के अंतर्विरोधों पर बना एक मार्मिक वृत-चित्र देख रहा था। बाज़ार अर्थव्यवस्था में वहां नगरों का भीषण गति से विकास हो रहा है और पीछे छूट गये गांवों का उजाड जीवन और अशक्त और लाचार लोगों की बदहाली। वह आधुनिकता का तलघर है। यह फ़िल्म हाशिये के अस्तित्व की कथा को कहती है। लंदन स्कूल ऑफ इकॉनामिक्स की चीनी छात्रा डॉ. ली पिंग किन ने यह वृत-चित्र बनाया है। तो यह एक नयी पीढी की सृजनात्मकता है, जो पुरानों के संसार से बहुत दूर चली आयी है। (आशा है इस उदाहरण के लिए आप मुझे पश्चिम से प्रभावित होने के सतही और हास्यास्पद आरोप से मुक्त रखेंगे।) शायद आपको जानकारी हो कि अभी चंद दिनों पहले विश्व बैंक की 'वर्ल्ड डेवलपमेंट रिपोर्ट 2009' में आयी है, जिसमें खुलेआम इस बात की वकालत की गयी है कि आबादी के गांवों से शहरों की ओर पलायन को बढावा दिया जाना चाहिए इसी से विकासशील देशों की ग़रीबी दूर होगी। यह रिपोर्ट कहती है कि देश के सभी हिस्सों में एक समान आर्थिक गतिविधियों का विस्तार करने के बजाय औद्योगिक शहरों के संकुलों को महत्व देना चाहिए। बाज़ार अर्थव्यवस्था पर केंद्रित हमारे देश की आगामी वर्षों की सोशियॉलॉजी क्या होगी, इसे हम समझ सकते हैं। ग्लोबलाइजेशन का अलग-अलग लोगों के लिए आज अलग-अलग अर्थ बन रहा है। ग़रीब और पिछडे हुए देशों के छोटे किसानों और ग्रामीण जनता के लिए भूमंडलीकरण का अर्थ वही नहीं है जो इन देशों के शासक वर्ग और नीति निर्माताओं के लिए। जो किसान कल तक अपनी और अपने परिवार की रोटी के लिए आत्म निर्भर था, वह अब बाहरी स्रोतों पर निर्भर हो गया है। भारत की ग्रामीण जनता का अपने जीवन पर अब कोई अख्तियार नहीं रहा। देश में हजारों किसान अब तक आत्महत्या कर चुके हैं। लाखों किसान अब विवश होकर मजदूरी करने शहरों की तरफ़ भाग रहे हैं। 90 के दशक में वैश्विक पूंजी, प्रत्यक्ष वित्त निवेश, मेगा प्रोजेक्टों, कारपोरेट कृषि, खुदरा व्यापार के क्षेत्र में बत्रडे औद्योगिक घरानों की घुसपैठ और उपभोगमूलक संस्कृति का सबसे बडा हमला हमारे ग्रामीण समाज और परंपरागत जीवन-स्रोतों पर हुआ है। निर्यात को बढावा देने के लिए देश में विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) बनाये जा रहे हैं। यह वही ज़मीन है जो किसानों से छीन कर बडे-बडे उद्योगपतियों और बहुराष्ट्रीय निगमों को दी जा रही है। विस्थापन हमारे समय का सबसे बडा सच बन रहा है। क्या यह अनुभव क्षेत्र हमसे पिछली पीढी के पास था? हम किस परंपरा की बात कर रहे हैं? गांवों से उजडकर शहर की नारकीय झोपडपट्टियों में मनुष्य से एक दर्जा नीचे का जीवन बिताने वाले उस किसान के भीतर अब कितने तुलसीदास, कबीर, केशव या सूर बचे रह गये हैं? जीवंत मनुष्य की चेतना का बाज़ार जितनी तेज़ी से 'पदार्थीकरण' (कमोडीफिकेशन) कर रहा है उस सच को क्या कहेंगे आप? पिछली पीढी के किस कवि ने इस भयावह स्थिति को देखा था? किसी भी समाज में जीवनयापन की प्रणालियां विभिन्न घटकों के आपसी तालमेल से बनी होती हैं, जिनमें भौतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक सभी परिवेश एक दूसरे में घुले-मिले रहते हैं। हम साहित्य में परंपरा की जिस ठहरी और यांत्रिक अवधारणा के गीत गाते रहते हैं, क्या वह किसी भी तरह से हमें कोई राहत दे सकती है? मैं यह मानकर चल रहा हूं जब मैं यह सब लिख रहा हूं तो आप कम से कम इसे 'साहित्येतर' विषय या 'सुपरफीशियल' विवेचना के खाते में नहीं डाल देंगे। नागार्जुन की कविता में साधारण मनुष्य के चारों ओर के अमानवीय संसार और उसकी विडंबनाओं का जो चित्रण है, अरुण कमल उससे प्रेरित होते हुए भी आज उससे कितना आगे आ चुके हैं यह जानने में मेरी दिलचस्पी है। और जब मैं यह जानने की कोशिश करता हूं तो आज के रचनाकार का परिवेश और उसमें उसकी सृजनात्मक मुश्किलें, उसकी चुनौतियों पर बात करना मेरे लिए ज्यादा अनिवार्य हो जाता है। नागार्जुन या मुक्तिबोध या भवानीप्रसाद मिश्र मेरे लिए ठहरी हुई अवधारणाओं की तरह नहीं है कि मैं उनकी रचनाशीलता में निहित अंतर्धाराओं के विकास को अगली पीत्रढी में न खोजूं। आपने बडी आसानी से रघुवीर सहाय को ख़ारिज़ कर दिया है। काश! आप इस विवेचना में जाते कि शक्ति-संरचना और साधारण मनुष्य के जटिल संबंधों पर अमानवीयकरण की प्रक्रिया और उसके विभिन्न शेड्स पर जितना काम अकेले रघुवीर सहाय ने किया है, वह क्यों सहज ही उन्हें उस पीढी का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कवि बना देता है। किसी की कविता पढकर ऐसी प्रतिक्रिया देना कि उससे मेरे भीतर हताशा जागी या मेरा दिल बैठ गया एक लगभग हस्यास्पद प्रतिक्रिया है। शक्ति संरचना और साधारण मनुष्य के जटिल संबंधों की इसी समझ को जो रघुवीर सहाय ने हिन्दी कविता को दी, विनोद कुमार शुक्ल, विष्णु खरे, चंद्रकांत देवताले, लीलाधर जगूत्रडी, नरेश सक्सेना, भगवत रावत, ॠतुराज, राजेश जोशी, अरुण कमल, नरेंद्र जैन, विष्णु नागर, कुमार अंबुज, देवीप्रसाद मिश्र, आशुतोष दुबे या मोहन कुमार डहेरिया जैसे तमाम बाद के कवि अपनी रचनाओं में उसे आगे बत्रढाते हैं। और भी नाम हैं। नाम गिनाना मेरा उद्देश्य नहीं है। हमें उस विकास-यात्रा को देखना होगा, न कि हमारी विवेचना का विषय यह होना चाहिए कि ये कवि कितने 'पांखडी और बेइमान हैं, कितने सफलताओं के तात्कालिक गुणा-भाग से जुडे हुए हैं, कितने पश्चिम के नकलची हैं और अंध प्रतिबध्दतावादी हैं। आदि-आदि।'
समकालीन कवियों के ये ही सारे गुण-धर्म तो आप अपने पत्र में गिनवा रहे हैं। अच्छा है! पर काश आप इसके साथ यह भी बताते कि इन पिछले तमाम वर्षों में एक मध्यवर्गीय रचनाकार के विघटन की भीषण स्थितियां क्या रही हैं और समकालीन कविता किस हद तक बाहर से लादी जा रही छद्म चेतना के रूपों को अनावृत कर सकी है, उसकी प्रविधियां क्या रही हैं, उसका संघर्ष क्या रहा है। मुक्तिबोध ने एक समय 'अंधेरे में' कविता में शहर के माफिया डोमाजी उस्ताद के रात के अंधेरे में निकले जुलूस में शहर के बुध्दिजीवियों, कवियों, कलाकारों, चिंतकों को चुपचाप शामिल होते देखा था। पचास बरस बाद आज कवि देखता है कि ये बुध्दिजीवी, कवि, कलाकार, चिंतक अब खुले आम दिन के उजाल में माफियाओं के साथ मंच शेयर कर रहे हैं। पुरस्कार ले रहे हैं, अभिनंदन करवा रहे हैं, यात्राएं कर रहे हैं, वज़ीफे पा रहे हैं। पर यही अंतिम सच नहीं है। इसी सबके बीच कोई कवि यह भी तो लिख रहा है कि ''जो हत्यारों के इस जुलूस में शामिल नहीं होंगे वे मारे जायेंगे। सबसे बडा अपराध है इस वक्त निरपराधी होना।'' आप बताइये कि 'अंधेरे में' कविता से 'जो मारे जायेंगे' कविता तक की संवेदना-यात्रा रचनाकार की किस सोशियॉलाजी की यात्रा है और रचनाकार के मन पर किस तरह के दबाव हैं। जिस दौर में मनुष्य की नियति को बदलनेवाले विराट स्वप्नों और यूटोपिया को अप्रासंगिक कहा जा रहा हो, मनुष्य का विचार जगत स्वयं बाज़ार में बिकनेवाली एक जिंस बन गया हो और विचार का मतलब केवल सूचनाएं रह गया हो तब वर्चस्व की इस संस्कृति से रचना में मुठभेड की नयी सच्चाइयां क्या बिल्कुल गैर-हाजिर हैं? आपने अरुण कमल की कविता 'जिसने ख़ून होते देखा' पढी है? आम आदमी के चारों तरफ़ हिंसा का जो संसार बुन दिया गया है उसमें अपनी सारी निरूपायता के बावजूद उसमें बचे रहने की जो इच्छा शक्ति है, जो 'सर्वाइवल इंस्टिंक्ट है उसे कितने अभूतपूर्व ढंग से यह कविता उजागर करती है। जो बाहरी तौर पर कुछ भी अलग दिखाई नहीं देता उसी के बीच आख़िर किस तरह कोमलता का कोई चिह्न छिपा रहता है, कैसे आदमी अपने को बचाने के 'मैकेनिज्म' को ईजाद करता है यह कविता हमें उस अनुभव से दो-चार कराती है। क्या यह कविता नागार्जुन की कविता 'मंत्र' के बहुत आगे की कविता नहीं है? कवि यहां यथार्थ के सिर्फ़ ब्यौरे नहीं दे रहा है वहां यथार्थ की कतली है और उसके दूसरी तरफ़ गुंफित है सारे संकेत सूत्र। जो जितना व्यक्त है, उतना ही अव्यक्त है। यह कविता हमारी बदलती दुनिया की कविता है। यूटोपिया और सपनों के ध्वंस के बाद की दुनिया की कविता, जिसमें लोगों के जीने के प्रोसेस को दिखाया गया। हादसों, अपघातों, आशंकाओं और घिरावों के बीच जीते हुए लोगों की सांसों को - उसकी आवाज़ों को आप यहां सुन सकते हैं। आपको कविता में और कैसी मार्मिकता चाहिए? क्या कोई इससे इंकार कर सकता है कि 'चंपा काले अक्षर नहीं चीह्नती' के बाद 'सीलमपुर की लडकियां' जैसी कविता जब लिखी जाती है तो युवा कवि का संसार अपने पूर्वज के संसार और उसके यथार्थ बोध से बहुत आगे निकल आया है? 30-40 वर्षों में हुए बदलाव को समझने के बाद ही ऐसी कविता लिखी जा सकती है। बद्रीनारायण के कविता संग्रह 'खुदाई में हिंसा' में तमाम ऐसी कविताएं हैं जहां कोई मूलभूत सपना एक ऐसी काव्यात्मक इंटेसिटी बन कर प्रकट हो रहा है जिसे तमाम तरह के अंतर्विरोध घेरे हुए हैं। यहां अप्रचलित मिथकीय आख्यानों के पुनर्पाठ की कोशिश को नहीं, बल्कि ऐसी जातियों और मानव समूहों के आख्यानों और जन-इतिहास के चरित्रों को कविता में लाया गया है जो उत्पादन की गतिविधियों से जुत्रडे होने के बावजूद समाज की परिधि पर नारकीय जीवन जीने को अभिशप्त हैं। मोहन कुमार डहेरिया जैसे एक युवा कवि की रचनाएं जिनमें स्त्री-पुरुष संबंधों के अनेक निहितार्थ बहुत समसामयिकता के साथ प्रकट हुए हैं। भय, असुरक्षा, आशंकाओं और दु:स्वप्नों से घिरा एक वर्तमान जिसमें रहकर अब भी कोमलता, उम्मीद, लगाव, उत्ताप, समर्पण और करुणा के रंगों को सजाने की कोशिश है वहां। एक ऐसी दुनिया जिसमें कोई आश्वासन नहीं, कोई सुरक्षा नहीं, वहां सिर्फ़ एक बावला मन है, एक उत्ताप है और जीवन-मृत्यु के मिलन बिंदु है।
पत्र काफ़ी लंबा हो गया है। आपके पत्र में जो बातें आयी हैं, उनसे असहमत होने और एक बुनियादी ज़िरह में उतरने के और भी तमाम मुद्दे हैं। आधुनिकता और परंपरा की बहस, पश्चिम से प्रभावित होने या न होने का मुद्दा, संप्रेषण की समस्याएं - इन तमाम चीज़ों पर विस्तार से बात होनी चाहिए। पत्र में बातें बहुत सीमित हो जाती हैं। आपका पत्र पाने के बाद तात्कालिक रूप से जो मैंने अपना पत्र आपको लिखा था, उसे लेकर मैं संतुष्ट नहीं था। तभी उसका जवाब देते हुए मुझे यह पत्र दोबारा लिखना पत्रडा है, हालांकि सच तो यह है कि संतुष्ट मैं अपने इस पत्र से भी नहीं हूं। लगता है कि बातें जिस तरह से उठानी चाहिए थीं, वैसा नहीं हो पाया है।
समकालीन कविता से मेरे अपने असंतोष कम नहीं हैं और यदा-कदा मैंने उन्हें लिखित रूप में भी व्यक्त भी किया है। पर समूची समकालीन कविता को एक सिरे से नकार देने की यह स्थिति मुझे अंग्रेजी के उस मुहावरे की याद दिलाती है कि ''कुछ लोग बच्चे को नहलाने के बाद टब के पानी के साथ बच्चे को भी फेंक आते हैं।'' ख़ैर...! मैं इतना ही कहूंगा कि मेरे लिए आज भी तमाम साथी रचनाकारों को एक गहरी सहानुभूति और तटस्थता के साथ पत्रढना, उनके अच्छे-बुरे पहलुओं को समझना, उनके अंतर्विरोधों को पकडना एक प्रकार से अपने समय को समझना है। इसके अलावा और कोई राह है भी कहां? जो है उससे बेहतर चाहिए पर साथ ही जो है उसी की तो 'संगत' करनी होगी। यही 'समकालीन कविता के रेगिस्तान होते जाते चेहरे' को लेकर मेरी चिंताएं और मेरी पक्षधरता है। अपनी पीढी के बहुत सारे कवियों से मेरे प्रशंसा और आलोचना के द्वंद्वात्मक संबंध रहे हैं और कवियों से नहीं, उनकी कविता से इस 'संगत' को मैं आज भी अपने लिए बहुत महत्वपूर्ण मानता हूं।
अंत में, यही कहूंगा कि आप वरिष्ठ हैं, अधिक जानकार हैं। मैं अपनी समझ की सीमाओं के कारण यदि कुछ आप्रांसगिक कह गया हूं तो उसे बिसार देंगे। मेरे लिए यह महत्वपूर्ण है कि मैं आपका सम्मान करते हुए भी जहां भी ज़रूरी हो आपसे पूरी तरह असहमत रहूं। यह इजाज़त तो आपको मुझे देनी ही पत्रडेगी।
आपने इतना लंबा पत्र मुझे लिखा उसके लिए आभारी हूं।
सादर,
विजय कुमार