Sunday, April 1, 2018

गांधीगिरी



लगे रहो मुन्‍ना भाई फिल्‍म 2006 में आई थी। उसके बाद गांधीवाद को गांधीगिरी नाम मिला और उछाल में भी रहा। यह भी लगा कि सामाजिक आंदोलनों की शुरुआत फिल्‍मों से भी हो सकती है। 
लेकिन जल्‍दी ही इस अवधारणा की हवा निकल गई। 
12 साल बाद इस समीक्षा पर नजर डाली जाए तो महसूस होता है कि माहौल काफी बदल गया है। 
गांधी कहीं गहरे भारतीय चित्‍त में तो बैठा प्रतीत होता है 
लेकिन इस समय गांधी विरोध की हवा फैलाने की कोशिशें भी लगातार हो रही हैं।




लगे रहो मुन्ना भाई गांधीगिरी के लिए चर्चा में आ गई है। फिल्में आम तौर पर नौजवानों को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। क्योंकि सबसे ज्यादा दर्शक इसी वर्ग से मिलता है। फिल्म का हिट होना या पिट जाना युवावर्ग की पसंद से ही तय होता है। गांधीवाद जैसे पिटे हुए विचार को इस फिल्म ने हिट बना दिया है। गांधीवाद की अंहिसा और असहयोग अचानक परिवर्तन के हथियार बन गए हैं। पिछले कुछ बरसों में ये हथियार म्यूजियम में रख दिए गए थे। खादी, चरखा, सत्य, अहिंसा असहयोग आदि  किताबी किस्म की बातें हो चुकी थीं। इनका मजाक उड़ाया जाता था।  प्रदर्शनी लगाई जाती थी। इन्हें राजनीति में इस्तेमाल किया जाता था।

गांधीगिरी शब्द को दादागिरी के वरक्स खड़ा करने से मानो गांधीवाद को नवजीवन मिल गया है। वह भी फिल्म जैसे लोकप्रिय माध्यम के जरिए। फिल्म में गांधीगिरी संजय दत्त करता है, जिसका अपना एक पेचीदा इतिहास है। पिता अभिनेता के साथ साथ सच्ची किस्म का नेता रहा है। खुद संजू बाबा टाडा में हथियार रखने का आरोपी रहा है, अपनी लतों के कारण भी खबरों में रहा है। पर इसके साथ साथ संजय दत्त लोकप्रिय स्टार भी बना हुआ है। मुन्ना भाई एमबीबीएस ने इस गांधीगिरी की जैसे नींव रख दी थी। उस फिल्म में मानववाद की एक धारा बहती रहती है, जो नौकरशाही और निर्मम मेडिकल साइंस की कली खोलती है, रिश्तों को और प्रेम को महत्व देती है। समाज के प्रति समभाव भी उसमें बना रहता है। यह सब मसाला फिल्मों के स्टाइल में होता है।  अपने मानववाद के कारण ही शायद यह फिल्म हिट हुई थी।

लगे रहो मुन्ना भाई में गांधीवाद पर अमल करके दिखा दिया गया है। इससे भ्रष्टाचार का सामना किया जाता है, सच्चाई का महत्व पता चलता है। हृदय परिवर्तन भी हो जाता है। यह अलग बात है कि फिल्म इन सिद्धांतों का प्रयोग अपनी सुविधा से करती है। जैसे नायक का गांधी से परिचय ही प्रेमिका से मिलने की जुगत भिड़ाने के लिए होता है। गांधी से जुड़े सवालों का जवाब देने के लिए भाड़े के प्रोफैसरों को लाने वाला सीन काफी विडम्बनापूर्ण है, लेकिन सच्चा है। मजेदार बात यह है कि इस गांधीगिरी का प्रयोग मुंबई का एक भाई कर रहा है जिसका पेशा दादागिरी करना है। यह भाई धीरे-धीरे गांधी के प्रभाव में आता जाता है।

नौजवान पीढ़ी को लगता है कि इस अस्त्र का इस्तेमाल किया जा सकता है। सत्य, शांति, अहिंसा, असहयोग वगैरह उसे अचानक आकर्षक औजार लगने लगे हैं।

इसी तरह रंग दे बसंती भी नौजवान पीढ़ी में खासी लोकप्रिय हुई है। वह फिल्म इसके बिल्कुल उलट है। वह आजादी के क्रांतिकारियों को याद करती है। उस समय और इस समय की जक्स्टापोजीशन उस फिल्म को मार्मिक और प्रामाणिक बनाती है। वह नौजवान पीढ़ी के सरोकारों को छूती है। पर हिंसा का रास्ता चुनती है। गुस्सा तो आज हर कहीं उबल ही रहा है। आंदोलनों की कमी गुस्से को दिशा नहीं दे पाती। मध्यवर्ग की बेहतर बनने की दौड़ और होड़ उसे अपने से बाहर सोचने नहीं देती। जीवन में शाùर्टकट उसे और भी आत्म केंद्रित और हड़बड़िया बनाते हैं। सब कुछ बहुत जल्दी और ज्यादा मिल जाए। अगर गृहस्थी चला रहे बाप और पढ़ाई कर रहे बेटे दोनों के मकसद इसी तरह के हों तो बड़े सपने नहीं देखे जा सकते। गुस्सा रोजमर्रा के जीवन से है, मतलब प्रशासन, सिस्टम, सरकार आदि के खोट  नजर आते हैं। निजी तरक्की में जब ये चीजें बाधा बनती हैं, तभी आदमी को गुस्सा आता है। मिलों के बंद होने पर, किसानों के आत्महत्या करने पर, सूखे बाढ़ से होने वाली तबाही पर, कालाहांडी पर गुस्सा नहीं आता। भुक्तभोगी को गुस्सा आता है, पर वो बेबसी में बदल जाता है। हमारे समय में एम्पेथी या समानुभूति के जज्बे को पाला मार गया है।  मुन्नाभाई को गांधीगिरी की जरूरत अपनी प्रेमिका को पाने के लिए पड़ती है। रंग दे बसंती में क्रांति अपने मित्र की दुर्घटना में हुई मृत्यु के बाद जन्म लेती है।

इन दोनों फिल्मों में मीडिया की विशेष भूमिका है। खास तौर से रेडियो का इस्तेमाल पुनर्जागरण की तरह होता है। परिवर्तन की दुंधुवी एफएम रेडियो से बजती है। ध्यान देने की बात है कि यह माध्यम खालिस युवा वर्ग का है। मुन्ना गांधीगिरी के नुस्खे रेडियो पर सुनाता है। जनता मानो आपस में जुड़ जाती है। रंग दे बसंती में भी सारा देश रेडियो से चिपक जाता है और क्रांतिकारियों से सवाल जवाब करता है। मीडिया का प्रयोग यह दिल है हिंदुस्तानी और नायक जैसी फिल्मों में पहले भी हुआ है लेकिन उनके पास विचारधारा नहीं थी। यहां गांधीवाद और इन्कलाब की जांची परखी विचारधाराएं नए अवतार में सामने आती हैं।

 ये फिल्में विरोध को एक रूप देने लगी हैं। मुन्नाभाई की सफलता के बाद गांधीगिरी को बढ़ावा देने के लिए कई मंच सामने आने लगे हैं। इंटरनेट पर भी इस विचार को फैलाया जा रहा है। कुछ युवकों ने एक थप्पड़ खाकर दूसरा गाल आगे करने के नुस्खे आजमाने शुरु कर दिए हैं। जैसे, प्रसिद्ध हास्य कलाकार राजू श्रीवास्तव कहता है कि मजाक - मजाक में बहुत लोग आ गए, मजाक मजाक में गांधी बापू फिर से लोकप्रिय हो गए।


गांधी के इस अवतार से यह भी पता चलता है कि विरोध के हमारे तरीके पुराने पड़ चुके हैं। जुलूस, हड़ताल, पोस्टर, जैसे माध्यम अब नकारा साबित हो जाते हैं। बदलते वक्त के साथ लोग विरोध और प्रतिरोध के नए नए तरीके तलाश कर रहे हैं। जैसे आंदोलनों की बागडोर अब लगभग एनजीओं के हाथ में चली गई है। अब इसका जज्बा बदल गया है। असल में अब दुनिया भी बदल गई है। दुश्मन भी पहले से कहीं ज्यादा जटिल, कुटिल, खल और कामी हो गया है। वह लुभाता भी है, भुनाता भी है और विषदंत  भी गड़ाता है। गांधी का नया अवतार मध्यमवर्ग को एक नए, लुभावने लेकिन कारगर हथियार के रूप मे वरदान की तरह मिला है। भले ही छोटी छोटी निजी  लड़ाइयों के लिए ही सही, उस सिंगल हड्डी आदमी की कीमत पहचानी तो जाने लगी है।  

Wednesday, March 21, 2018

सुरजीत पातर की कविताएं

                                                      असगर वजाहत



पंजाबी कवि सुरजीत पातर साहब की इन कविताओं का अनुवाद शायद बीस से ज्‍यादा ही पुराना है। 
पिछले दिनों कवि अजेय ने व्‍ट्सऐप पर पातर साहब की कविता सझा की तो मुझे भी अपने अनुवादों की याद आई। ढूंढ़ने पर पोर्टेबल टाइपराइटर पर टाइप किए हुए जर्द पन्‍ने मिल गए। मतलब ये कंप्‍यूटर पर टाइप करना शुरू करने से पहले के हैं। ये तब पत्रिकाओं में छपे भी थे। पर वो अंक मेरे पास नहीं हैं। कहां छपेयह भी याद नहीं है। तब पातर साहब को खत भी लिखा था, पर उनका जवाब नहीं आया। पता नहीं खत उन्‍हें मिला भी या नहीं। अब इन कविताओं का फिर से आनंद लिया जाए। खुशी की बात यह भी है कि  असगर वजाहत साहब ने इन कविताओं के साथ अपने चित्र यहां लगाने की इजाजत मुझे दे दी है।  
आज बारहवीं कविता के साथ यह शृंखला पूरी हुई।




12
मैं रात का आख़िरी टापू

मैं रात का आखरी टापू
झर रहा हूं विलाप कर रहा हूं
मैं मारे गए वक़्तों का आखरी टुकड़ा हूं
ज़ख्‍मी हूं
अपनी वाणी के जंगल में
छुपा कर आ रहा हूं
तमाम मरे हुए पितरों के नाखून
मेरी छाती में धंसे हुए हैं
जरा देखो तो सही
मरे हुए को भी जिंदा रहने की कितनी लालसा है ।

Tuesday, March 20, 2018

सुरजीत पातर की कविताएं

                                                        असगर वजाहत



पंजाबी कवि सुरजीत पातर साहब की इन कविताओं का अनुवाद शायद बीस से ज्‍यादा ही पुराना है। 
पिछले दिनों कवि अजेय ने व्‍ट्सऐप पर पातर साहब की कविता सझा की तो मुझे भी अपने अनुवादों की याद आई। ढूंढ़ने पर पोर्टेबल टाइपराइटर पर टाइप किए हुए जर्द पन्‍ने मिल गए। मतलब ये कंप्‍यूटर पर टाइप करना शुरू करने से पहले के हैं। ये तब पत्रिकाओं में छपे भी थे। पर वो अंक मेरे पास नहीं हैं। कहां छपे,यह भी याद नहीं है। तब पातर साहब को खत भी लिखा था, पर उनका जवाब नहीं आया। पता नहीं खत उन्‍हें मिला भी या नहीं। अब इन कविताओं का फिर से आनंद लिया जाए। खुशी की बात यह भी है कि  असगर वजाहत साहब ने इन कविताओं के साथ अपने चित्र यहां लगाने की इजाजत मुझे दे दी है।  




11
चौक शहीदां में उसका आखिरी भाषण

यारो चलो अब इस चौक को अब छोड़ दें
अब यह चौक चौराहा ना रहा

था, जब सब कुछ जीवित था
जब नींदों में पत्थर चिने जाते थे
पुत्र नहीं
जब घना अंधेरा था
कुछ अता पता लगता न था
अंधेरे में तीर किधर से आता है
किसका तीर
कोई चिरंजीव लुढ़क जाता है
तीर पर हर एक, किस्मत ही लिखा था
उंगलियों के निशानों को पढ़ना आता न था
तब यह चौक चौराहा था

तब अगर बुत बनके आप इस जगह
उमर भर भी सोचते रहते
कि जाएं किस तरफ
तो भी होते पूजनीय

या जिस भी राह जी चाहे चल पड़ते
एक ही जैसे मासूम होते

अब मासूमियत क्या है
साइड पोज़ है कबूतर का
या बुत की पथराई हुई मुस्कुराहट है
शहर को चोर लोरी सुना रहे हैं
छलावा फूल बन हुआ है
या लोमड़ी को चुपाव चिह्नमिल गया है

अब मासूमियत क्‍या है
अब तो पता है कि पेउ़ हर तरकश
साहिबां ने नहीं वक्‍त ने टांगा था
अब तो पता है कि हवा को भी हाथ उग आते हैं
अगर कंगन सोने का हो
अब तो पता है कि आत्‍मा भी मांस खाती है
अब तो पता है कि खुश्‍बू के भी दांत होते हैं
अब तो पता है शगुनों वाली रात को
मां बेटे को कत्‍ल किसने किया
और कातिल के पदचिह्न किधर जाते हैं 
अब यह चौक चौराहा ना रहा

चलो इस चौक को छोड़ किसी चौराहे पर जाएं
वहां जाकर फिर दुविधा में पड़ें
यह दुविधा में पड़ना वापस कोख में पड़ना है

तुम्हें मैं क्या बताऊं बेशकीमती दोस्तो

तुम तो जानते हो
जिस चौक में
अपने हस्‍सास हंसमुख हमउम्रों का लहू बह जाए
वह चौक चौराहा नहीं रहता

जिन चौकों में हमउम्रों का लहू अभी बह रहा है
वो आगे हैं ।

Monday, March 19, 2018

सुरजीत पातर की कविताएं

                                                       असगर वजाहत

पंजाबी कवि सुरजीत पातर साहब की इन कविताओं का अनुवाद शायद बीस से ज्‍यादा ही पुराना है। 

पिछले दिनों कवि अजेय ने व्‍ट्सऐप पर पातर साहब की कविता सझा की तो मुझे भी अपने अनुवादों की याद आई। ढूंढ़ने पर पोर्टेबल टाइपराइटर पर टाइप किए हुए जर्द पन्‍ने मिल गए। मतलब ये कंप्‍यूटर पर टाइप करना शुरू करने से पहले के हैं। ये तब पत्रिकाओं में छपे भी थे। पर वो अंक मेरे पास नहीं हैं। कहां छपे,यह भी याद नहीं है। तब पातर साहब को खत भी लिखा था, पर उनका जवाब नहीं आया। पता नहीं खत उन्‍हें मिला भी या नहीं। अब इन कविताओं का फिर से आनंद लिया जाए। खुशी की बात यह भी है कि  असगर वजाहत साहब ने इन कविताओं के साथ अपने चित्र यहां लगाने की इजाजत मुझे दे दी है।  


10
वह दिन

वह दिन जो अब कहीं मिले
मैं उसकी सफेद हंस जैसी ज़ख्‍मी देह पर
मरहम लगा दूं
पर दिन कोई घर से रूठ के गया जन तो नहीं
जो कभी कहीं दिख जाए कभी कहीं
और फिर किसी शाम
वो फटेहाल घर लौट आए
या किसी स्टेशन पर गाड़ी का इंतजार करता मिल जाए

दिन कोई घर से रूठ कर गए जन तो नहीं
दिन तो हमारे हाथों मरे हुओं के
कराहते प्रेत हैं
जिनके ज़ख्‍मों तक आप हमारे हाथ नहीं पहुंचते ।

Sunday, March 18, 2018

सुरजीत पातर की कविताएं

                                                                     असगर वजाहत



पंजाबी कवि सुरजीत पातर साहब की इन कविताओं का अनुवाद शायद बीस से ज्‍यादा ही पुराना है। 
पिछले दिनों कवि अजेय ने व्‍ट्सऐप पर पातर साहब की कविता सझा की तो मुझे भी अपने अनुवादों की याद आई। ढूंढ़ने पर पोर्टेबल टाइपराइटर पर टाइप किए हुए जर्द पन्‍ने मिल गए। मतलब ये कंप्‍यूटर पर टाइप करना शुरू करने से पहले के हैं। ये तब पत्रिकाओं में छपे भी थे। पर वो अंक मेरे पास नहीं हैं। कहां छपे,यह भी याद नहीं है। तब पातर साहब को खत भी लिखा था, पर उनका जवाब नहीं आया। पता नहीं खत उन्‍हें मिला भी या नहीं। अब इन कविताओं का फिर से आनंद लिया जाए। खुशी की बात यह भी है कि  असगर वजाहत साहब ने इन कविताओं के साथ अपने चित्र यहां लगाने की इजाजत मुझे दे दी है।  




9
डर

बन रहे हैं इंसानों से फिर पत्थर
फिर मिट्टी
फिर पानी
बन रहे हैं पंक्तियों से फिर शब्द
शब्दों से
चीखें
चिंघाड़ें

धरती घूम रही है डरी हुई

पेड़ों को मिट्टी को खा रही
पानी अपने सोतों की तरफ मुड़ रहे हैं
पलट रहे हैं पीछे को फूल

फेंक कर यह साज़
यह पावन किताबें
यह प्यारे मुखड़े
दौड़ पड़ेंगे सिर्फ एक जान लेकर

बन रहे हैं इंसानों से सिर्फ जानें

Saturday, March 17, 2018

सुरजीत पातर की कविताएं

                                                           असगर वजाहत


पंजाबी कवि सुरजीत पातर साहब की इन कविताओं का अनुवाद शायद बीस से ज्‍यादा ही पुराना है। 

पिछले दिनों कवि अजेय ने व्‍ट्सऐप पर पातर साहब की कविता सझा की तो मुझे भी अपने अनुवादों की याद आई। ढूंढ़ने पर पोर्टेबल टाइपराइटर पर टाइप किए हुए जर्द पन्‍ने मिल गए। मतलब ये कंप्‍यूटर पर टाइप करना शुरू करने से पहले के हैं। ये तब पत्रिकाओं में छपे भी थे। पर वो अंक मेरे पास नहीं हैं। कहां छपे,यह भी याद नहीं है। तब पातर साहब को खत भी लिखा था, पर उनका जवाब नहीं आया। पता नहीं खत उन्‍हें मिला भी या नहीं। अब इन कविताओं का फिर से आनंद लिया जाए। खुशी की बात यह भी है कि  असगर वजाहत साहब ने इन कविताओं के साथ अपने चित्र यहां लगाने की इजाजत मुझे दे दी है।  


8
दो पेड़ों की गुफ्तगू

मेरी सूली बनाओगे
या रबाब
जनाब
या मैं यूं ही खड़ा रहूं सारी उमर
करता रहूं पत्तों और
मौसमों का हिसाब किताब
जनाब
कोई जवाब

मुझे क्या पता - मुझे क्या खबर
मैं तो खुद हूं तेरे जैसा दरख्‍त
तू ऐसा कर
आज की अखबार देख

अखबार में कुछ नहीं
झड़े हुए पत्ते हैं

तो फिर कोई किताब देख
किताबों में बीज हैं

तो फिर सोच

सोच को काट खाया गया है
दांतों के निशान हैं
राहगीरों की राह है
या मेरे नाखून
जो मैंने बचने के लिए
धरती के सीने में घोंपे

सोच सोच और सोच

सोच में कैद है

सोच में खौफ है
लगता है धरती के साथ बंधा हुआ हूं

जा फिर टूट जा

टूट कर क्या होगा
रूख नहीं तो राख सही
राह नहीं तो रेत सही
रेत नहीं तो भाप सही

अच्छा फिर चुप कर
मैं कहां बोलता हूं
यह तो मेरे पत्ते हैं
हवा में डोल रहे।

Friday, March 16, 2018

सुरजीत पातर की कविताएं

                                                                 असगर वजाहत


पंजाबी कवि सुरजीत पातर साहब की इन कविताओं का अनुवाद शायद बीस से ज्‍यादा ही पुराना है। 

पिछले दिनों कवि अजेय ने व्‍ट्सऐप पर पातर साहब की कविता सझा की तो मुझे भी अपने अनुवादों की याद आई। ढूंढ़ने पर पोर्टेबल टाइपराइटर पर टाइप किए हुए जर्द पन्‍ने मिल गए। मतलब ये कंप्‍यूटर पर टाइप करना शुरू करने से पहले के हैं। ये तब पत्रिकाओं में छपे भी थे। पर वो अंक मेरे पास नहीं हैं। कहां छपे,यह भी याद नहीं है। तब पातर साहब को खत भी लिखा था, पर उनका जवाब नहीं आया। पता नहीं खत उन्‍हें मिला भी या नहीं। अब इन कविताओं का फिर से आनंद लिया जाए। खुशी की बात यह भी है कि  असगर वजाहत साहब ने इन कविताओं के साथ अपने चित्र यहां लगाने की इजाजत मुझे दे दी है।  


7
घर्र घर्र  

मैं छतरी बराबर आकाश हूं गूंजता हुआ
हवा की सां सां का पंजाबी में अनुवाद करता
अजीबोगरीब दरख़्त हूं
हजारों रंग बिरंगे जुमलों से बिंधा हुआ
नन्हां सा भीष्म पितामह हूं
मैं आपके प्रश्नों का क्या उत्तर दूं ?

महात्मा बुद्ध और गुरु गोविंद सिंह
परमो धर्म अहिंसा और बेदाग चमकती तलवार की
मुलाकात के वैन्‍यू के लिए मैं बहुत गलत शहर हूं

मेरे लिए तो बीवी की गलबहियां भी कटघरा हैं
क्लासरूम का लेक्चर स्टैंड भी
और चौराहे की रेलिंग भी
मैं आपके प्रश्नों का क्या उत्‍तर दूं ?

मुझ में से नेहरू भी बोलता है माओ भी
कृष्ण भी बोलता है कामू भी
वॉयस ऑफ अमेरिका भी बीबीसी भी
मुझ में से बहुत कुछ बोलता है
नहीं बोलता तो बस मैं ही नहीं बोलता हूं

मैं आठ बैंड का शक्तिशाली बुद्धिजीवी
मेरी नसों की घर्र घर्र शायद मेरी है
मेरी हड्डियों का ताप संताप शायद मौलिक है

वर्षों में मेरा इतिहास बहुत लंबा है
कर्मों में बहुत छोटा

जब मां को खून की जरूरत थी
मैं किताब बन गया
जब पिता को छड़ी चाहिए थी
मैं बिजली सा चमका और बोला :

कपिलवस्तु के शुद्धोधन का ध्यान करो
मच्छीबाड़े की तरफ देखो
गीता पढ़ी है तो विचार भी करो
कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा...
ऐसा ही बहुत कुछ जो मेरी समझ से भी परे था

रास्ते में फरार दोस्त मिले
उन्होंने पूछा :
हमारे साथ सलीब तक चलेगा -
कातिलों के कत्‍ल को अहिंसा समझेगा ?  
गुमनाम पेड़ पर उल्टा लटक के
मसीही अंदाज में
सरकंडे को भाषण देगा ?

जवाब में मेरे अंदर
कई तस्वीरें उलझ गईं
मैं कई दर्शनों का कोलाज सा बन गया
और आजकल कहता फिरता हूं :

सही दुश्मन की तलाश करो
संसार को जीतने वाला हर कोई औरंगजेब नहीं होता

जंगल सूख रहे हैं
बांसुरी पर मल्हार बजाओ

प्रेत बंदूकों से नहीं मरते

मेरी हर कविता प्रेतों को मारने का मंत्र है
मसलन वह भी
जिसमें मोहब्बत कहती है :
मैं घटनाग्रस्‍त गाड़ी का अगला स्टेशन हूं
रेगिस्तान पर बना पुल हूं
मैं मर चुके बच्चे के तुतलाते तलवे पर
लंबी उम्र की रेखा हूं
मैं मरी हुई औरत की रिकॉर्ड की हुई हंसती
आवाज हूं
अब हम कल मिलेंगे।