Friday, August 5, 2016

पुरस्‍कृत कविता

कल भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार शुभम् श्री की 'पाेएट्री मैनेजमेंट' कविता  को देने की घोषण्‍ाा हुई और जैसा अक्‍सर होता है, सोशल मीडिया पर अच्‍छे-बुरे, सही-गलत की बहस छिड़ गई। पहली प्रतिक्रिया में मुझे लगा कि कविता की गिरी हुई सामाजिक स्‍िथति को कविता के केंद्र में लाकर कविता का दायरा संकुचित कर दिया गया है, यह क्‍या बात बनी। एक तो वैसे ही कविता समाज के हाशिए पर पड़ी है और जब उसी सीमित समाज यानी कवि या कविता पर कविता लिखी जाती है तो ऐसा लगता है कवि अपना ही रोना रो रहा है। हालांकि बहुत लोगों ने इस विषय पर कविताएं लिखी हैं, मैंने भी लिखी हैं। फिर भी यह एक संकरी गली लगती है। एक पत्रकार मित्र ने टिप्‍पणी भी मांगी पर मुझे इस तरह की बहस में पड़ने का मन नहीं करता। हम लोग रचना को सराहने या खारिज करने की रस्‍साकशी में पड़ जाते हैं। कल से सोशल मीडिया में यही अखाड़ेबाजी चल रही है। इसमें ज्‍यादातर लेखक ही शामिल हैं। पाठक तो प्रतिक्रिया देते दिखते नहीं। इसका मतलब लेखकाें का कवि, कविता, पुरस्‍कार, पुरस्‍कारपाता, पुरस्‍कारदाता, संस्‍था आदि से भरोसा उठ चुका है। उन्‍हें हर चीज जुगाड़, सेटिंग, ढकाेंसला आदि लगती प्रतीत होती है। ऐसे भी होंगे जिन्‍हें ऐसा न लगता हो, पर उनकी उपस्‍थिति नेपथ्‍य में रह जाती है। 

इस अखाड़ेबाजी की प्रेरणा से कविताकोश पर और समालाेचन समूह पर शुभम् श्री की कुछ और कविताएं पढ़ीं। आश्‍वस्‍त हुआ। भाषा में एक तेज-तर्रारी, और खिलंदड़ापन है। कथ्‍य और कहन में चौंकाऊभाव इफरात में है। शब्‍द बहुत हैं, उन पर काबू कम है। तोड़-फोड़ का मोह सा है। कविताएं मंचों के लिए उपयुक्‍त हैं। यह  खामी नहीं है, पाठक तक पहुंचने का एक सशक्‍त माध्‍यम है। नई पीढ़ी के पाठक तक पहुंचने वाली भाषा है। यह एक बड़ी खूबी है। 

शाम को घर में मैंने सुमनिका (मेरी पत्‍नी, हिंदी की प्राेफेसर, सौंदर्यशास्‍त्र की अध्‍येता) और अरुंधती (मेरी बेटी, जिसने हाल ही में अंग्रेजी साहित्‍य में एमए किया है) से चर्चा की। हम तीनों ही कविता प्रेमी तो हैं ही। उन दोनों को कविता पढ़ कर सुनाई। बुखार और ब्रेकअप वाली भी। दोनों को ही कविताएं पसंद आईं। चर्चा चर्वण हुआ। मेरे किंतु परंतु को बगलें ही झांकनी पड़ीं।

Sunday, April 17, 2016

तर्पण

छायांकन: अरुधती


भृकुटियां तनी रहीं सोच की प्रत्‍यंचा पर सालों साल
फसल कटे खेतों के खूंटों पर चलना होता था

जब झुके कंधे तुम्‍हारे
खिलने लगीं करुण मुस्‍कान की कोमल कलियां
पराभव की प्रज्ञा में झुकी जातीं शस्‍य वनस्‍पतियां 
ओ पिता!

अभी उस दिन बटन बंद कॉलर में शर्मा जी
अपने में मगन बैठे आकर सामने सिर झुकाए
लगा बुदबुदाएंगे अभी गायत्री मंत्र ओंठ तुम्‍हारे
ओ पिता!!

एक समय तुमने कंधे पर उठाया
एक समय मैंने कंधे पर लटकाया
बीच के तमाम साल क्‍यों गूंजती रही
केवल प्रत्‍यंचा की टंकार
कितना ज्‍यादा खुद को माना
कितना कम तुमको जाना
             ओ पिता!!!

गेहूं

छायांकन: अरुधती

मुझे बोरी में मत भरो लोको
बाजार में लुटेरों सटोरियों के हाथ बिकने से बचा लो
खाए अघाए का कौर बनने को
सरकारी गोदामों में सड़ने को
मजबूर मत करो भाइयो

उससे अच्छा है खेत में ही खाद बन गलूं
ओ लोको बोरियों में मत भरो मुझे

कोई जांबाज बचा नहीं
बेजान की जान बचाए
बच जाए दाना
भूखे के मुंह दाना जाए

रोको लोको रोको
इस धर्मी कर्मी दुनिया में सरेआम
मौत को गले लगाता मारा जाता
मेरा जीवनदाता
              रोको लोको कोई रोको लोको 

रोजनामचा

छायांकन: अरुधती

मैं 365 दिन वही करता हूं जो
उसके अगले दिन करता हूं
मुझे मालूम है कि मैं 365 दिन वही करता हूं और
मुझे 365 दिन यही करना है
वही वही नई बार करता हूं
हर बार वही वही नई बार करता हूं
कई कई बार नई नई बार करता हूं
नए को हर बार की तरह
हर बार को नए की तरह करता हूं
वार को पखवाड़े पखवाड़े को महीने महीने को साल साल को दशक दशक को सम्वत् की तरह
सम्वत् को सांस की तरह भरता हूं
फांस की तरह गड़ता हूं सांस सांस
फांस फांस सांस फांस
न अखरता हूं न अटकता हूं
भटकने का तो यहां कोई सवाल ही नहीं
अजी यहां तो सवाल का ही कोई सवाल नहीं
उस तरह देखें तो यहां ऐसा कुछ नहीं
जो लाजवाब नहीं
, मेरे पास लाल रंग का कोई रुमाल नहीं
न मैं गोर्वाचोव हूं जिसने  फाड़ दिया था
न वो बच्चा हूं जिसके पास था
और कि जो 365 दिन की  रेल को रोक दे
कोई खटका नहीं झटका नहीं
कभी कहीं अटका नहीं
ऐसी बेजोड़ है 365 दिन की
अनंत सुमिरनी
घिस घिस के चमकती
कहीं कोई जोड़ नहीं
न सिर न सिरफिरा
बस गोल गोल फिरा फिरा मारा मारा फिरा
और फिर यहीं कहीं कहीं नहीं गिरा
गिरा गिरा गिरा  

Sunday, October 4, 2015

जुगाली उर्फ गऊ चिंतन

जीते जी मरण




मेरा भेजा फिर गएला है मेरे बाप। मेरे कू किधर का नईं छोड़ा ए लोग। मयैं बौह्त अकेली रह गई रे। मेरी पुच्‍छल पकड़ के सुर्ग जाने की बात करते, पन मयैं किधर जाऊं ? दिल्‍ली के पछुआड़े के एक गांव में मेरे ऊपर ऐसा जुर्म कर डाला! मेरा नाम ले के एक भला माणुस मार डाला। कौन दरिंदा किया एह्?  है कोई बोलने वाला? है कोई मुंह खोलने वाला?  कि खाली पीली मजमा ई देखने का है? मैं तो बोलती तुम सब जन हत्‍यारे है। बोलती है मयै, सब लोग। जो हत्‍या कर के भाग गए, वो भी और जो देख के चुप बैठे, वो भी। कनून की रखवाली करने वाले भी और कनून को तोड़ने वाले भी। अपना बनाया कनून तो तोड़ा ई, इन्‍सानियत के कनून का भी तुम लोग धज्‍जी उड़ा दिया। मेरा मुंह काला कर दिया रे तुम लोग। चले जाओ सब लोग इदर से। मेरे कू अकेला छोड़ दो। मेरे कू रोने दो रे। काए को मयै गऊ माता बन के पैदा हुई रे। काय कू।      

Thursday, May 7, 2015

आप सब की साक्षी में मैं उपस्‍थित हूं यहां पर

मधुकर भारती का यह कैरीकेचर कोई बीस एक साल पुराना है, सादे कागज पर पेन से फोटो देखकर बनाया था।

पिछले दिनों हिमाचल प्रदेश के एक बेहद जमीनी कवि, आलोचक और आयोजनकर्ता मधुकर भरती का हृदयाघात से अकाल देहावसान हो गया। मधुकर भरती सत्‍ता, शोहरत, सफलता के प्रति हमेशा  उदासीन रहे और साहित्‍य के प्रति बेहद उत्‍साही। मधुकर युवा संस्‍कृति कर्मियों के चहेते थे। उन्‍होंने साहित्‍यकारों की एक पूरी पीढ़ी तैयार की। सर्जक नामक पत्रिका और सांस्‍कृतिक संस्‍था के माध्‍यम से हिमाचल प्रदेश के एक गुमनाम कस्‍बे  ठियोग को वे साहित्‍यिक मानचित्र पर ले आए। बहुत सी याद के साथ यह स्‍मृति लेख जो किंचित संपादित रूप में आज दैनिक जागरण के हिमाचल संस्‍करण में छपा है।




आज जब लिखने बैठा हूं तो मन परसों जैसा नहीं है। थोड़ा स्‍थिर है। परसों सुबह सुबह सोलन से अजेय ने फोन पर बुरी खबर सुनाई कि मधुकर भारती नहीं रहे। मैं जब यह बात सुमनिका को बताने लगा तो जोर से रुलाई फूट गई। फिर कई मित्रों को फोन किए। जब भी बात करता, मन कच्‍चा हुआ जा रहा था। भावना का यह बांध पता नहीं कब से रुका पड़ा था, जो अजेय के फोन से ढह गया। मधुकर के न रहने की खबर ने मुझे तरल बना दिया था। डांवाडोल। इसी फरवरी में माँ गुजरीं, तब भी मैं खुद को कड़ा किए रहा। लेकिन उस दिन मधुकर का जिक्र भर जैसे पानी की सतह को दोलाएमान किए दे रहा था।

ऐसा क्‍या था मधुकर भारती में जो मुझे भावुक बनाए दे रहा था  असल में मधुकर मेरे लेखन के शुरुआती दौर में मुझे मिला था। मैं तब धर्मशाला कालेज में पढ़ रहा था। एक बार शायद हिमप्रस्‍थ में मेरी कविता छपी। लोअर शाम नगर धर्मशाला का पता देख कर उसने मुझे ढूंढ़ निकाला। शायद एक साझे दोस्‍त जोगिंदर के जरिए जो मेरा सहपाठी था और कचहरी अड्डे पर अपने पिता की पान की दुकान पर बैठता था। सिगरेट और साहित्‍य का शौकीन मधुकर उस दुकान पर आता था। पता चला कि वह मेरे पड़ोस में ही डेरा ले कर रहता है। मुझे और क्‍या चाहिए था। जैसे भूखे को रोटी। मधुकर तब भी परिपक्‍व ही था। उसने मुझे कभी यह एहसास नहीं होने दिया कि मैं नौसिखिया हूं।

यूं नौसिखियों के साथ मधुकर की जिंदगी भर गहरी छनती रही। इसका सबसे बड़ा उदाहरण ठियोग नामक शहर और सर्जक नामक संस्‍था है। नौकरी करते करते मधुकर एक तरह से ठियोग में ही जम गया। वहां पर नए लेखकों को ढूंढ़ा और अपने काफिले में शामिल किया। इस काम में प्रोत्‍साहित करने या अगुआई करने जैसी सत्‍ताधारियों की शब्‍दावली मधुकर की नहीं थी। वह तो हमराही बना लेता था। मोहन साहिल, प्रकाश बादल, ओम भारद्वाज, सुरेश शांडिल्‍य, सुनील ग्रोवर, अश्‍विनी रमेश, रत्‍न निर्झर जैस और भी कई लोग मधुकरमय हो गए। ठियोग में ही सर्जक का जन्‍म हुआ। पत्रिका के रूप में तो ज्‍यादा अंक नहीं निकल पाए, पर साहित्‍यिक सांस्‍कृतिक आयोजनों में सर्जक खूब सक्रिय और सफल रहा।

गौरतलब है कि ठियोग हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला के पिछवाड़े का शहर है। सारे सूबे में साहित्‍यिक गतिविधि ज्‍यादातर शिमला और मंडी में ही चलती है। शिमला को सत्‍ता के नजदीक होने का लाभ भी मिल जाता है। मधुकर ने सत्‍ता की बैसाखियों के बिना जमीनी ढंग से सर्जक को खड़ा किया। एक साहित्‍यिक केंद्र के रूप में ठियोग इसी खूबी के कारण जाना जाएगा। यह खूबी है, सत्‍ता से निर्लिप्‍त रह कर, सत्‍ता के नाक के नीचे निर्ब्‍याज काम करना।
सत्‍ता से निर्लिप्‍त रहना और निर्ब्‍याज कर्मरत रहना मधुकर का स्‍वभाव था। वह चाहता तो शिमला में बस सकता था। शाही गलियारों में घूम सकता था। चौधराहट कर सकता था। लेकिन रिटायर होने के बाद भी उसने ठियोग में डेरा रखा। रहता वो अपने गांव रावग में ही था। गांव में लिखने पढ़ने का माहौल नहीं बन पा रहा था। पर वो साहित्‍यिक दुनिया के संपर्क में रहता था। मुंबई के कुशल कुमार ने व्‍ट्स ऐप पर पहाड़ी पंची नाम का ग्रुप बना रखा है। अन्‍य लेखकों कलाकारों के साथ साथ मधुकर भी उसका सदस्‍य था। कुछ दिन पहले फोन पर बात हुई तो उसने बताया कि कमेंट भले ही नहीं करता हूं पर पढ़ता सारे संदेश हूं।

हिमाचल मित्र के दौर में भी मधुकर का शुरू से आखिर तक सक्रिय और भरोसेमंद सहयोग रहा। पत्रिका मुंबई से छपती थी और अधिकांश सामग्री हिमाचल से जुटाई जाती थी। उन दिनों योजनाएं बनाने और उन्‍हें पूरा करने के सिलसिले में मधुकर से फोन पर लंबी चर्चाएं होती थीं। पहाड़ी भाषा पर बीज वक्‍तव्‍य मधुकर भारती का ही था जो हिमाचल मित्र के दूसरे अंक में छपा। दस यक्ष प्रश्‍नों के साथ यह बहस अगले कई अंकों तक चली। बाद में मेरी प्रिय कहानी स्‍तंभ में हरनोट, केशव और रेखा के साथ बातचीत मधुकर ने ही की। मधुकर बिना तैयारी के बातचीत के लिए तैयार नहीं होते थे। इसलिए किताबें जुटाने का काम करना पड़ता था। वे लेखक को पूरा पढ़ते, उसके बाद ही बातचीत की तारीख तय होती।

लिखने पढ़ने की मधुकर की लंबी योजनाएं थीं। ठियोग में डेरा रखने का एक मकसद यह भी था। कविता संग्रह तैयार करना भी इस योजना में शामिल था। हालांकि कागजों के पुलिंदों में अपनी कविताएं ढूंढ़ना एक भारी काम था। उसने अपने समकालीन कवियों पर आलोचनात्‍मक काम करने का मंसूबा भी बांध रखा था। कुछ कवियों पर उसने पत्र पत्रिकाओं में लिखा था। पर इधर एक दशक के दौरान छपे कविता संग्रहों पर विधिवत् लिखने की अपनी इच्‍छा उसने व्‍यक्‍त की थी। कोई शक नहीं कि जितना अच्‍छा वह कवि था, आलोचक भी उतना ही समर्थ था।

भावना-प्रवण गर्मजोशी मधुकर के स्‍वभाव में थी। पर वह भावुकता या भाववाद में नहीं बहता था। विचारों में वह दक्षिणपंथी तो नहीं था, वाम का घोषित पक्षधर भी नहीं था। जीवन अनुभवों के ताप ने जो 'जीवन द्रव्‍य' उसके अंदर भरा था, वह किसी वाम से कम नहीं था। बल्कि उसे हम देसी सांस्‍कृतिक वाम कह सकते हैं। मधुकर का सामाजिक और वैचारिक वयक्‍तित्‍व सेल्‍फ मेड था। वह स्‍वतंत्र-चेता था, पिछलग्‍गू नहीं। वह धौंस जमाने में यकीन नहीं रखता था, लेकिन पिलपिला कतई नहीं था। उसमें कन्‍विक्‍शन था, हेकड़ी नहीं। विनम्रता और दृढ़ता। खुलापन और स्‍वीकार। उसके इसी विलक्षण और पारदर्शी स्‍वभाव ने उसे युवा संस्‍कृतिकर्मियों का चहेता बना रखा था।

मधुकर भारती उम्र, अनुभव, और दृष्‍टि में मुझसे बड़ा था। पर मेरे प्रति उसका व्‍यवहार हमेशा आत्‍मीय मित्रवत् रहा। मैंने कभी उससे 'तू' कह कर बात नहीं की। उसके चले जाने के बाद उसकी याद में यह लिखने बैठा तो न जाने क्‍यों और कैसे वो मेरे बराबरी के धरातल पर उतर आया। और यह सारी बात 'तू-तू' कह कर ही लिखी गई। भीतर झांक कर देखता हूं तो उसके जाने का खालीपन रह रह कर महसूस होता है। ऐसा लगता है जैसे मेरा ही एक अंश मुझसे जुदा हो गया है। उसकी एक कविता है 'विचित्र अनुभव', जिसमें वह दृश्‍यों को फ्रीज होते हुए देखता है, वैसे ही जैसे उसके साथ बिताए हुए हमारे अनगिनत पल प्रशीतित समय यानी फ्रीज्‍ड टाइम में बदल गए हैं। जैसे कोई बीते हुए समय को पत्‍थर पर उकेर कर अनंत काल के लिए धरोहर में तब्‍दील कर देता है।

इस हृदयालाप से सड़क पर जैसे
सब कुछ थम सा गया है, हवा बंद है
अतिचैतन्‍य के इस निष्‍ठुर क्षण में
शाखाएं और पत्‍ते जम से गए हैं
पक्षियों की चोंचें अवाक और पंख बंद हो गए हैं
मिट्टी की सुगंध हो गई है पानी जैसी रंगहीन
चपर-शपर और शंग-पंग पर सर्वत्र
ओढ़ा दी गई है एक असाधारण चुप्‍पी
जैसे मैंने अपने को बिल्‍कुल खाली कर दिया है
या मैं एक बहुत बड़े खालीपन में हूं
या बहुत बड़ा खालीपन मेरे अंदर भर गया है
या मैं स्‍वयं ही एक बहुत बड़ा खालीपन हूं
इस विचित्र अनुभव के बावजूद
आप सब की साक्षी में मैं उपस्‍थित हूं यहां पर
ठीक इसी समय चुप्‍पी तोड़ता हुआ ....

Saturday, March 28, 2015

परमिंदरजीत



अक्खर के संपादक और पंजाबी कवि परमिंदरजीत और बाबा के नाम 
यह कविता 2008 में लिखी थी। 
तब भी मुलाकात नहीं हो पाई थी। 
उसके बाद कभी भी नहीं। 
और अब वो चला ही गया। 


अमृतसर में चौक हुसैनपुरा में
कारीगरों वाली एक गली में
त्रिकाल वेला में
मकैनिक कालिख धो रहे हैं मिट्टी के तेल में
घर जाना है हाथ पैर मनुक्खों जैसे लगें

इसी गली में
शब्दों के दो कारीगर
लगे हुए अंक दर अंक अक्खर की तैयारी में
निकले हैं दिन भर माथापच्ची करने के बाद
चिट्टे कागजों पर रोशनाई चमकेगी
कविताओं को मिलेगा नौजीवन
काव रसिकों को रस
कवियों को यश

कारीगर पुर्जे खोलते हैं
कवि के हरफ बोलते हैं
कवि निहारते लोहे का अंजर-पंजर
कारीगर भौंचक्क देख
कागजों पर लफ्ज-लकीरें
चलता आता साझा कारोबार
कारीगरों वाली गली में

त्रिकाल वेला में
खड़े हुए गली के मुहाने पर दोनों शब्दकार
खोए हुए दिखते हैं बातों में इतने
भूले भटके कोई पूछ ले उनसे उनका ही पता
लौटा दें कह के
त्रिकाल वेला है
कोई है नहीं ठिकाने में

थोड़ा ऊबे थोड़ा डूबे शब्दों  के आर पार
साइकिल थामे एक जिंदगानी हंडा ले जाएगा
दूसरा  मोटर साइकिल की पीठ पर चढ़कर
भीड़-भड़क्के को फांद जाएगा
अमृतसर में चौक हुसैनपुरा में
                                                साइकिल थामे एक जिंदगानी हंडा ले जाएगा
दूसरा  मोटर साइकिल की पीठ पर चढ़कर
भीड़-भड़क्के को फांद जाएगा
अमृतसर में चौक हुसैनपुरा में 

Saturday, November 29, 2014

जूते

नई पीढ़ी में ऐसे भी लोग हैं जो हिंदी साहित्‍य को प्रौद्योगिकी के सहयोग से व्‍यापक पाठक वर्ग तक ले जाना चाहते हैं। इन्‍हीं में से एक युवा फिल्‍मकार मनीष गुप्‍ता हैं जो हिन्‍दी कविता की छोटी-छोटी वीडियो फिल्‍मों की एक श्रृंखला यूट्यूब के लिए बना रहे हैं। अभी यह शुरुआत है। वे हिंदी कविता का पूरा परिदृश्‍य यहां रख देना चाहते हैं। यह एक महत्‍वाकांक्षी योजना है। मौजूदा साहित्‍यिक संसार में तो और भी ज्‍यादा। इस श्रृंखला में उन्‍होंने हाल में मेरी जूते कविता रखी है। इसका लिंक नीचे दिया गया है। इसी लिंक पर यूट्यूब में हिंदी कविता चैनल का लिंक भी आपको मिल जाएगा, जहां आप और भी कविताओं का आनंद ले सकते हैं। 


Thursday, October 30, 2014

कुत्ताघर

                                                           कागज पर पेंसिल : मुदित सेठी 


यह कहानी 1989 में वर्तमान साहित्‍य में छपी थी।  और यह तब की मुंबई में कुत्‍ता पकड़ने के सच्‍चे करतबों का लगभग आंखों देखा हाल ही है। कुत्‍ते का यह रेखांकन  कला के धनी मुदित ने खास तौर से इसी कहानी के लिए हाल ही में बनाया है।  

भोंसले खुश है कि उसे कुत्तों को पकड़ने का काम मिल गया है। यूं काम बहुत झंझट का है। एक-एक कुत्ता पकड़ने के लिए कुत्ते की तरह ही भागना पड़ना है। उसने कहीं सूंघ लिया कि उसे पकड़ने के लिए आदमी आया है तो गए काम से। ऐसे भागेगा जैसे किसी दुश्मन ने हमला बोल दिया हो। ये कुत्ते आदमी को दोस्त नहीं समझते। आदमी भी तो उन्हें फालतू जानवर ही मानता है। दोस्त कुत्ते दूसरे होते हैं, जिनके गले में पट्टे बांधे जाते है। पालतू होने के बाद ही वे आदमी के दोस्त बनते होंगे।
भोंसले को पालतू नहीं फालतू कुत्तों को पकड़ने का काम मिला है। म्यूनिसिपैलिटी का दिहाड़ीदार मजदूर इस झंझट भरे काम से खुश हो तो हैरानी की कोई बात नहीं है। उसने इस बार इंतजाम पक्का कर लिया है। कुछ दिनों का यह झंझट जिंदगी भर के लिए चैन में बदल सकता है अगर किस्मत रूपी इन कुत्तों ने उसका साथ दे दिया।
बरसात में सीवरेज का काम बंद हो गया था और भोंसले को खाने के तकरीबन लाले ही पड़ गए थे। उसने हारकर बाबू के आगे हाथ जोड़े, दे दो कुत्ते पकड़ने का काम ही दे दो साब। भला हुआ कि जब मिन्नत कर रहा था, वार्ड आफिसर उधर से गुजरा। अफसर अपने इलाके के आवारा कुत्तों से परेशान था। लोगों की शिकायतें भी सुन चुका था। भोंसले ने बिना मौका  चूके अपनी सामर्थ्य दांव पर लगा दी - साब मैं आपके इलाके को चकाचक साफ कर दूंगा। पर एक विनती है साब, दस सालों से डेली पर मजूरी करता हूं, मेरे को परमानेंट कर दो। एक-एक कुत्ते को पकड़ कर ले आऊंगा। उसने सिफारिश करने के लिए बाबू की ओर ताका  था। बाबू ने पीठ पर थपकी देकर पुष्टि कर दी - पुराना आदमी है साहिब, ईमानदार है। ठीक है रख लो, अफसर मूड में था, हिदायत देकर चला गया।  
सारी रात भोंसले ठीक है रख लो का मतलब निकालता रहा। उसके दिल दिमाग ने कोई दूसरा मतलब निकाला ही नहीं, सिवा इसके कि वह अब कमेटी का पक्का मुलाजिम हो जाएगा। इसी जोश में बड़े सवेरे उठकर घर से निकल आया।
आठ बजे सालुंके ड्राइवर को कुत्ता-गाड़ी के साथ मिलना था, भोंसले साढ़े सात बजे ही पहुंच गया। आधे घंटे तक इंतजार करना उसे मुश्किल नहीं लगा। वह  परमानेंट होने के बाद अपनी जिंदगी बदल जाने के सपने देखता रहा। सपने पूरे होने के बीच बस कुछ एक कुत्ते हैं जिन्हें अगर वो पकड़ ले तो मानो जिंदगी को पकड़ लेगा। चार दिन की मजदूरी और पांच दिन भूख के नहीं देखने पड़ेंगे। कुछ सालों में खोली खरीद लेगा, बच्चों को स्कूल भेजेगा, और भी कई कुछ.....।
सालुंके ने गाड़ी में से ही आवाज देकर भोंसले को बुलाया। उसकी खुशियों की गाड़ी उसके सामने है। वह ड्राइवर के साथ वाली सीट पर आ बैठा। कुत्तागाड़ी यानि सलेटी रंग का टेंपो, पिछले हिस्से को लोहे के सरियों से पिंजरे की शक्ल में बदल दिया गया है। पीछे दरवाजा है जो हर हरकत के साथ खड़खड़ करता है।
करीब बीस मिनट चलने के बाद मुख्य सड़क से अंदर जाकर नाके पर टेंपो रुका। मन में काम करने की मुस्तैदी और आंखों में संकल्प की चमक लिए भोंसले छलांग मार कर उतरा। गाड़ी में से एक बोरा भी उसने निकाला, जिसके मुंह पर करीब दस फुट लंबी रस्सी बंधी है। उसने मुंह के अंदर हाथ डालकर एक नजर भर झांकी लिया, ठीक है। वह अपने अभियान पर चलने के लिए तैयार होने लगा। चूना तंबाकू मलते हुए आंखें इधर-उधर दौड़ती रहीं, पेड़ के नीचे, घूरे के ढेर के आसपास, टूटी हुई दीवार के साथ। सब सूना था। टेंपो का एक चक्कर लगाया। तंबाकू गाल के अंदर स्थापित किया। ड्राइवर ने हाथ  बढ़ाकर उससे तंबाकू की डिब्बी ली। भोंसले बोला, लगता है सब साले टेंपो की आवाज पहचानते हैं, पर कम से कम दस तो जमा करवाना ही  पड़ेगा, क्यों सालुंके? और वह किनारे के फुटपाथ पर आकर बैठ गया। ड्राइवर खिड़की खोलकर बैठा था - दस क्यों बीस करो।
-पन इदर तो कोई नजर ई च नई आता।
-तुम्हारे पास चल के आएगा क्या, हम छुट्टा घूमता है हमकू ले चलो सेठ। सालुंके ने थूक निगल कर दांत भी दिखा दिए।
-चलके हमकू ई च जाना पड़ेगा, सालुंके सेठ, पन जाएं किदर को।
भोंसले उठ खड़ा हुआ। पैंट झाड़ी बोरा उठाया और चलने लगा।
इस इलाके में चार मंजिल से ऊंचे मकान नहीं है। हाउसिंग बोर्ड की इमारतें करीब दस साल पहले बनी थीं। शक्ल से ही सरकारी लगती हैं, वो भी बीस साल पुरानी। दीवारों पर जगह जगह काई के चकत्ते, कोनों पर उखड़े हुए पलस्तर, इमारतों के आगे पीछे घिसे हुए पैदल रास्ते, बीच-बीच में गंदे पानी के छपड़े। कुछ लोगों ने बाड़ लगाकर सब्जी वगैर भी लगा रखी है। छोटी सड़क अंदर जाती है और आगे तीन चार बहुमंजिला इमारतें बनी हैं। डील-डौल और चमक-दमक से ही पता  चल जाता है रख-रखाव पर पूरा ध्यान दिया जाता है। वैसे भी तीन चार साल पहले ही इस धरती पर आकर खड़ी हुई हैं। नामी गिरामी बिल्डरों को चैक के अलावा हाथों हाथ दिए पैसे का दमखम बनावट में झलक जाता है। नवधनाढ्यों पर चर्बी, खुमारी और मुस्कान की पर्तों की तरह। सड़क आगे समुद्र की तरफ खुल जाती है। भोंसले का साहब इन्हीं इमारतों के एक फ्लैट मे रहता है। भोंसले को वहां नहीं जाना है। वहां आवारा नहीं पट्टेदार पालतू कुत्ते रहते हैं। उसे बिना पट्टे के जाहिल कुत्ते पकड़ने हैं जो धरती पर भार बने हुए हैं जिनका कोई मालिक नहीं है। जिनका आदि, अंत पता नहीं है। वे तो बस होते हैं और होते रहते हैं और कभी खत्म नहीं होते।
मकानों के आगे झाड़ झंखाड़ में कुछ नहीं है। वह पिछवाड़े की ओर बढ़ता है। एक टहलती हुई कुतिया उसे नजर आती है। वह ठिठक जाता है। उंगलियां बोरे के रस्से को कस के पकड़ लेती हैं, बाँहों की नसें तन जाती हैं, पैर चौड़े होकर जम जाते हैं, जीभ ओठों से बाहर निकल आती है और दांत उसे दबा लेते हैं। ध्यान केंद्रित करने के लिए जीभ को बाना भोंसले की स्वाभाविक क्रिया है। उसकी नजर कुतिया पर टिकी हुई है। उसकी हरकतों के साथ-साथ पुतलियां हिल रही हैं। झपाक से बोरे को फेंकता है। भोंसले के मुंह से आवाज निकलती है.... वऊ..ऊ..ऊ और बोरा सीधा कुतिया के मुंह पर गिरता है। कुतिया के अगले पांव बोरे के अंदर फिसल जाते हैं। कुतिया के मुंह से भी वऊ..ऊऊ..ऊऊ की आवाज निकलती है, बहुत जल्दी डूब भी जाती है। भोंसले सधे हाथों से रस्सी खींच लेता है। बोरे का मुंह बंद हो गया है। बोरा फुदक रहा है। अंदर से बुड़-बुड़ , भौंकने रोने जैसी सम्मिलित आवाजें आ रही हैं।
---जै बिट्ठला, बोहनी हो गई फस्सकलास। ए सालुंके, गेट कू खोल। विजय भाव से चहकता भोंसले दूर से ही ड्रायवर को आदेश देता है। बोरे को पिंजरे में आकर खोलता है।
भोंसले अबकी दूसरे मकानों की तरफ बढ़ता है। एक कुत्ते पर नजर पड़ते ही जोश में पीछे भागता है। वह आगे को झुककर  जिस तरह भागता है और सूखे हुए टखने जल्दी-जल्दी उठते हैं तो कुल दृश्य तो सुंदर नहीं ही बनता ऐसे ही लगता है जैसे एक कुत्ता दूसरे के पीछे भाग रहा है। इस भागमभाग में कुत्ता शायद अपने दुश्मन को भांप गया है। भोंसले ने निशाना साधा पर बोरे का मुंह कुत्ते की पूंछ छू कर फिसल गया। कुत्ता डर के मारे बंद सीढ़ियों की तरफ भागा। भोंसले जान गया अब आ गई मौत, साला समझदार होता तो खुले में भागता। एक बार फिर बोरा हवा में उछला पर कुत्ते की बजाय सीढ़ी के थम्मे में जा फंसा। कुत्ता हवा के लपाटे से ही चिचिया पड़ा। भोंसले बोरे को छुड़ाने के लिए आगे बढ़ा, घबराया हुआ कुत्ता बाहर की ओर भागा, गोली की तरह, भोंसले की टांग को छू गया। छूने से और घबराया और फिसल गया। उधर कुत्ते की छुअन से भोंसले की टांग उछल पड़ी छलांग सी लगी और गिरते-गिरते बचा। हाथ में बोरे की रस्सी फंसी थी थम्मे से खिची हुई। कुत्ता अब तक संभल चुका था और चंपत हो गया। भोंसले के मुंह से बुड़-बुड़ आवाज निकलने लगी, धड़कन तेज हो गई। वह बोरे को छुड़ाने लगा- साला किस्मत वाला निकला। अब कोई फायदा नहीं उसके पीछे जाने में।
कुत्तों में सहयोगी भावना कितनी होती है पता नहीं पर भोंसले को यकीन है अगर ये और कुत्तों से जा मिला तो सबके सब भोंकने लग पड़ेंगे या उस प्राईवेट कालोनी में जा घुसेंगे जहां भोंसले का जाना वर्जित है। इसलिए वह कुत्ते से पहले बाकियों पर धावा बोल देना चाहता है।
लगभग दौड़ते हुए दूसरे मकान के पिछवाड़े गया। वहां पहुंचते ही पांच पिल्ले मिल गए। उन्हें कभी भी उठाया जा सकता है पर अब वो मौका चूकना नहीं चाहता। इन पर बोरा क्यों फेंकना, मरे चूहों की तरह पूंछ से पकड़ कर बोरे में भर लिया और लाकर गाड़ी में छोड़ दिया। ले मौसी तेरी औलाद। मरने से पहले औलाद को प्यार कर ले। क्या याद रखेगी भोंसले ने पकड़ा तो बच्चे-च्चे भी साथ लाकर दिए।
कूं कूं करते पिल्ले कुतिया से जा चिपकते हैं। कुतिया भूल जाती है कि वह पिंजरे में है। वह पिल्लों को अपने जिस्म से खेलने देती है।
सालुंके ड्राइवर ने भोंसले की हौसला आफजाई की- सारे खानदान को ही पकड़ लाया भोंसले?
-खानदान कभी खतम होगा साला इनका। कहकर भोंसले आगे बढ़ गया।
अब की वो बोरे को घसीटता हुआ गाड़ी तक लाया। उसके अन्दर बंद कुत्ता अपने पैरों से बोरे को रोकने की बेकार कोशिश कर रहा था। अचानक घिसटता हुआ बोरा रुक गया। रास्ते के गङ्ढे में पंजा फंसाने में कुत्ता सफल हो गया। थोड़ी देर के लिए जैसे दो पत्थरों के बीच एक रस्सी तन गई। एक तरफ बोरे में कुत्ते की पीठ और पिछला हिस्सा उभरा हुआ गोल पत्थर की तरह, दूसरी तरफ भोंसले की दोहरी होती पीठ। दोनों ने अपनी-अपनी दिशा में जोर लगा रखा है। बोरे के अन्दर से कुत्ते ने भयंकर भौंक लगाई। भौंक गुम गूंज सी लंबी खिंच गई। उधर भोंसले ने भी हांक लगाई हो.....सालुंके। घरघराती सी गंभीर ध्वनि सालुंके बनते-बनते पतली और लंबी हो गई। झटका सा लगा और बोरा भोंसले के पास आ गिरा। जमा दीं उसने तीन चार लातें। ले कर याद अपने बाप को, बचाएगा तेरे कू आ के।
ड्राइवर समझ गया कुत्ता आसानी से गाड़ी के अन्दर नहीं जाएगा। फट्ट से पिंजरे का दरवाजा आधा सा खोल के खड़ा हो गया। भोंसले ने बोरे का मुंह दरवाजे में ठूंसा, रस्सा ढीला किया और सालुंके ने पीछे से लात जमा दी। एक चीख पिंजरे के अगले हिस्से तक बह गई। खट्ट से दरवाजा बंद हो गया। यह कुत्ता काफी बड़ा था। कुतिया पर झपट पड़ा। पिल्ले चिल्लाने लगे। भोंसले वापिस मकानों की तरफ चला गया। सालुंके सीखचों से कुत्ता कौतुक देखने लगा।
करीब डेढ़ घंटे में पांच कुत्ते पकड़ लिए गए। अगर भोंसले ने शाम को यानी दोपहर बाद छुट्टी करनी है तो पांच और लाने होंगे। सूरज खूब गरम हो रहा है। भोंसले की बाहों पर पसीना चमक रहा है। बदन पर कसी हुई कमीज चिपक रही है। भूख कुनमुनाने लगी है, पर साथ लाए हुए डिब्बे को अभी नहीं खाया जा सकता क्योंकि वो अपनी खोली में साढ़े आठ के बाद ही पहुंच पाएगा इसलिए खाना एक बजे से पहले खाने का सवाल ही नहीं उठता। वह गाड़ी के पास जाकर तंबाकू मलने लगता है। पर कुत्तों की गुर्राहट उसे अच्छी नहीं लग रही। न जाने क्यों ये आवाजें सुनकर उसका गला भी अपने आप गुर्राने लग जाता है। पेड़ के नीचे जाकर सुस्ताना चाहता है कि तभी मरियल सा एक कुत्ता नजर आ जाता है। तंबाकू मुंह में रख वो उसकी ओर लपक लेता है।
कुत्ते को गाड़ी में छोड़ने के बाद भोंसले फिर अपने शिकार बेचैनी से ढूंढ़ने लगा। तभी उसे भूरे रंग का वह कुत्ता दिखा जो उसकी गिरफ्त से भाग निकला था।
भोंसले की जीभ बाहर निकल आई और दांत ने उसे जकड़ लिया। वह सरपट भाग रहा है। कुत्ता शायद पदचाप पहचान लेता है। भोंसले को दो तीन मकानों के चक्कर लगवा देता है और उसके बाद छकाते हुए प्राइवेट कालोनी में ले जाता है। एक बिल्डिंग की बेसमेंट के खंभों में कुत्ता चक्कर लगवाए जा रहा है।
भोंसले को अपनी नाकामी और कुत्ते की चालाकी पर बेहद गुस्सा आ रहा है। उसकी आंखों में जुगनू चमकने लगते हैं। वो बेतहाशा दौड़ रहा है। जीभ दांतों के चंगुल में है। नाक से हुं-हुं की आवाज निकल रही है। उसे तल्ख रोशनी में भूरे रंग का कुत्ता दिख रहा है जो उसके आगे-आगे दौड़ रहा है। भोंसले के सम्मान का सवाल है, कुत्ते से वो हारेगा नहीं। हाथ की रस्सी यंत्रवत् कसी हुई है और खुलकर उछलने के लिए मौके की तलाश में है। बेसमेंट के खंभे घूमे जा रहे हैं, घूमे जा रहे हैं।
तभी सीढ़ियों से भूरे रंग का एक लकदक साफ चिट्टा कुत्ता जमीन सूंघते हुए नीचे उतर कर बड़े गेट की तरफ भागता है किसी छूटे हुए कैदी की तरह।
भोंसले को दौड़ता हुआ भूरा रंग दिख रहा है और गेट पर पहुंचते ही चीकट बोरा उस भूरे रंग पर झपट पड़ता है।
रस्सी खींचने के साथ भोंसले को अपनी फूली हुई सांस और उठती हुई खांसी महसूस होती है। जीभ दांत के शिकंजे से बाहर निकल गई है। रस्सी को खींचकर वो पलभर रुकता है और दो चार उखड़े हुए खंसखंसाते दम मारता है। विजय भाव उसके पसीने के साथ चमक रहा है और सफलता के प्रमाद में चलता, इस मुश्किल शिकार को लाकर गाड़ी में धकेल देता है। गाड़ी में एक बार फिर शोर उठता है। भोंसले और सालुंके दोनों इस शोर से बेखबर है
गाड़ी में शोर कम नहीं होता। जगह-जगह  भटकने वाले कतूरे अपने बीच साफ चिट्टे सहजीव को पाकर एक कुतूहल के साथ अपनी सहज हरकतों के जरिए परिचय बढ़ाना चाह रहे हैं। उनके सूंघने से वो घबरा रहा है। जगह ऐसी नहीं है कि कहीं छुपा जा सके। उसे बदले में सूंघने की प्रेरणा भी नहीं हो रही। वह तो जैसे अजनबी महसूस कर रहा है। कुतिया उसकी पूंछ को अपने थूथन से उचकात है, भूरा फिरकी की तरह घूमता है। सामने बिगड़ैल भेड़ की तरह काला कुत्ता खड़ा है। भूरा एक और फर्राटा मारता है। जब बस नहीं चलता तो गुर्राहट से शुरू होती जोर की भौंक लगाता है। कुतिया उसका जवाब पंजे से देती है। वो बचाव में नीचे लेट जाता है। काला भेड़ा उसकी टांगें खींचने लगता है। पिल्लों को तो जैसे खिलौना मिल गया, कूदनी लगाते हुए कानों को खींचते हैं, पूंछ को चबाते हैं। उस भूरे खरगोश ने पूरा जोर लगाकर अलग होना चाहा, वह उचका ही था कि काले भेड़े ने कान दांतों से भींच लिया। खरगोश का रोना निकल आया। वो दो एक कदमों का फासला घसीट कर निढाल हो गया। वार सहने के सिवा कोई चारा न था।
वापसी में टेंपो में बैठते हुए भोंसले संतुष्ट था। सबसे बड़ा चैन यह था कि आधा दिन बच गया। अब दोपहर बाद दफ्तर का पुराना गोदाम साफ करेगा। एक-दिन में दो दो डेली मिल जाएंगी। गोदाम साफ करने को आदमी मुश्किल से मिलता है इसलिए हेडक्लर्क किसी दूसरे के नाम पर उससे काम करवा लेता है। एक पूरे दिन की पगार भोंसले को मिल जाती है। इससे भी ज्यादा खुशी की बात यह है कि अब वार्ड आफिसर खुश हो जाएगा। उसके इलाके के इतने सारे बेकार कुत्ते आज उसने पकड़ लिए हैं। दो दिन और आएगा तो सारा इलाका चकाचक साफ हो जाएगा। उसे पक्की उम्मीद है, बल्कि यकीन है कि वार्ड आफिसर खुश हो के पक्की नौकरी पर रखवा देगा। साहब ने खुद कहा था रखने को। जितनी मेहनत की है वो सफल हो जाएगी। सालुंके को उसने गर्व के साथ पूरा किस्सा सुनाया कि उस भूरे मवाली ने कितना छकाया, लेकिन बच के कहां जाता। रास्ते भर उसकी आंखों में विजय की चमक तैरती रही।
गाड़ी कुत्ताघर के सामने आकर रुकी ही थी कि दफ्तर से एक बाबू और चपरासी भोंसले को ढूंढ़ते हुए आ पहुंचे। डांट खाया और खीझा हुआ बाबू बोला
- क्यों भोंसले, मालूम है न प्राइवेट कुत्ता नहीं पकड़ने का साला गिनती के वास्ते कुछ वी  पकड़ के लाएगा।
भोंसले को कुछ समझ नहीं आया - प्राइवेट कुत्ता हमने नई पकड़ा साब। सब बिना पट्टे का छुट्टा कतूरा है।
- पट्टा खोल के फेंकता होएंगा, क्या मालूम। क्यों सालुंके तू बोल।
- मेरे सामने ऐसा नई किया साब
- सामने क्या पीछू वी हम ईमानदारी से काम करता साब। देख लो सब आवारा कुत्ता है।
- वार्ड आफिसर देखेगा अब तेरे कू
- बोले तो?
- और किसी का कुत्ता नई मिला तेरे कू। वार्ड आफिसर का कुत्ता काहे को पकड़ा। बाबू झल्ला उठा।
- ये क्या बोल रहे साब।
- साब के बच्चे। साब के बिल्डिंग के नीचू गेट पर पकड़ा न तू ?
- वो तो
- पैले बोल पकड़ा न....।
-........
- अब बोल उदर काहे को गया ?
- ओ तो एक कुत्ता लेके गया हमकू।
- कुत्ता इ च लेके जाएगा तेरे कू अब। मुंह क्या देखता है निकाल अपने बाप को बाहर। साब उदर आफिस में बोम मारता है।
भोंसले को कुछ समझ नहीं आ रहा था। गेट पर उसने पकड़ा जरूर था, पर वो साब का कैसे हो सकता है।
- जल्दी करो साब वेट कर रहा है। घर से फोन आया है उसको कि कुत्ता नीचू उतरा और आदमी बोरा में डाल के ले गया।
भोंसले के पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई। उसे इसमें कोई बड़ा घपला लगा पर समझ नहीं आया उसका दुश्मन कौन हो सकता है। पर ये बाबू भी गलत क्यों बोलेगा?
वह एक-एक करके कुत्तों को कुत्ताघर में छोड़ने लगा। उसके हाथ-पैर कांप रहे थे।
गाड़ी खाली हुई तो कोने में भूरे रंग का एक कुत्ता निढाल पड़ा हुआ था। भोंसले को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। अरे ये इतना साफ....यहाँ कैसे हो सकता है। सावधानी से वो गाड़ी में चढ़ा। कुत्ता जख्मों से भरा हुआ था। भोंसले ने उसे हाथों में उठा लिया। कुत्ते ने कोई विरोध नहीं किया।
...
वे सब लोग लौटकर दफ्तर आ गए। वार्ड आफिसर इन्तजार कर रहा था। भोंसले बेहद डरा हुआ था। गोद में कुत्ता  था। क्या करे क्या न करे कुछ पता नहीं। उसने धीरे से कुत्ते को मेज पर रख दिया।
वार्ड आफिसर कुत्ते को देखकर फट पड़ा- ये किसने किया?
सब स्तब्ध।
- हू इज दैट बास्टर्ड।
भोंसले कहना चाहता था, साब मैंने तो दूसरा पकड़ा था, पर जबान दांतों के अन्दर ही फंसी रही।
- बोलते क्यों नहीं?
बाबू ने घिघियाते हुए कहा, सर.... भोंसले।
- कौन भोंसले?
- सर कैजुअल लेबर.... आवारा कुत्ते पकड़ने को भेजा था।
- ये आवारा कुत्ता है? कुत्ते पकड़ने भेजा था या मवालीगिरी करने। पकड़ा ही नहीं मार भी दिया। इसे मारने गए थे तुम वार्ड में?
भोंसले ने बहुत जोर लगाया, पर इतना ही कह पाया.... नहीं साब।
- नहीं साब के बच्चे, दो टके के आवारा आदमी, कुत्ते को भगाया उस पे हाथ उठाया, मुझसे जबान लड़ाता है।
- नई....
- बास्टर्ड ! गेट आउट, निकल जा यहां से। मेरी आंखों के सामने नहीं पड़ना आज के बाद।
वार्ड आफिसर की ऊंची आवाज सुनकर भोंसले की सांस फूलने लगी। उसकी जीभ ओठों के बाहर निकल आई। उसने उसे दांतों से भींच लिया और वह आफिसर की ओर झुका। बोलने के लिए पूरा जोर लगा दिया -
साब मैंने नई किया, पता नई कैसे हो गया। मेरे कू निकालो नई साब।

आफिसर ने भोंसले को अपनी ओर आते देख पीछे को धकिया दिया। भोंसले मेज के नीचे लुढ़क गया। वह बड़बड़ाने लगा....मेरे कू मार लो पन निकालो नई....साब बोत गरीब आदमी हूं....साब .... उसकी बड़बड़ाहट पतली और लम्बी होकर खिंचने लगी। भोंसले का सिर घूमने लगा....बेसमेंट के खम्बों के गिर्द वो घबराया हुआ घूम रहा है। वो बहुत अकेला है और चिल्ला रहा है.... उसकी आंखों में अन्धेरा छाने लगा।

वार्ड आफिसर ने कुत्ते को सहलाया और बाबू को कहा। वेटर्नरी डॉक्टर को फोन करो। चपरासी को घुड़का, जाओ टैक्सी लेकर आओ। और उसने कुत्ते को गोद में उठा लिया।