आज मुंबई पर आतंकी हमले की बरसी है. जिनकी शहादत हुई उनके दुख पता नहीं हम कितने बांट पाएंगे. दूसरे तक पहुंच पाना ही कितना मुश्िकल हो रहा है. हर कोई अकेले अकेले कंटीली तारों में उलझा हुआ सा है. अंदर बाहर रस्मअदायगी बहुत है. पिछले साल हादसे के बाद कविता जैसा कुछ लिखा था. उसे आज फिर पढ़ने का मन है.
मुंबई मेरी जान आज दूसरा दिन है. मुंबई आतंकवादियों के चंगुल में है। और मन बहुत उखड़ा हुआ है ।
यह शहर नहीं शरीर है मेरा एक हिस्सा छलनी है आपरेशन चल रहा है कब से बेहोशी की दवा नहीं दी गई है मुझे शहर चल रहा है घाव जल रहा है खुली आंख से देख रहा हूं सब कुछ शहर तकलीफ में है झेल रहा है
हट जाओ तमाशबीनो अपने काम में लगो
यह कायर का वार है मैंने इसे जंग नहीं माना है जंग में मेरा यकीन भी नहीं पर तुम्हें यकीन के मानी पता ही नहीं
हिमाचल मित्र का शरद छप गया है. इस अंक में हम आपके लिए लाए हैं लगभग पचास लेखकोंऔरएक सौ सोलह पृष्ठोंमें महत्वपूर्ण और विवधितापूर्ण सामग्री. यदि आप इसे पढ़ना चाहते हैं तो कृपया अपना नाम पता हमें मेल कर दें, प्रतियां बच गईं तो आपको जरूर भेजेंगे.
आर्थिक मंदी परतापोश चक्रवर्तीकी लिखीआमुख कथा - हम तो डूबेंगे सनम तुम्हें भी ले डूबेंगे॥
हिंदी फिल्मों के नामीसाउंड इंजीनियरकुलदीप सूदसेबातचीत॥
रजनीशशर्माबता रहे हैं राजनैतिक हलचल काराजरंग॥
लोक संस्कृतिमें - भिति चित्र :शम्मी शर्मा॥हिमाचली लोकनाटय भगत :रमेश मस्ताना॥ उंची हेक की कलाकार -निम्मो चौधरी :अशोक जेरथ॥ सोलन की धाम :खेमराज शर्मा॥कांगड़ा सुहाग गीतों में नारी विमर्श :चंद्ररेखा ढडवाल॥
आस्वाद और परखमें - श्रीनिवास श्रीकांत की कविताओं परनरेश चंद्रकरऔरजगन्नाथ पंडित॥मोहन साहिल की कविताओं परसुजाता॥हरि मृदुल की कविताओं परसतीश पांडेय॥अकादमी की किताबों परश्रीहर्ष तैलंग॥
महाराष्ट्र की नवनिर्वाचित विधान सभा में शपथ लेने की भाषा के बारे में जो कुछ हुआ, वह भाषा विमर्श पर कुठाराघात ही है। महाराष्ट्र में हिंदी भाषा का विरोध पहले से एक राजनैतिक हथियार बना हुआ है। विधान सभा में हुई हाथापाई का मतलब है, यह हथियार और पैना हुआ है। इससे राजनीति तो पता नहीं कितनी सधेगी, लेकिन लोगों के दिलों पर जख्म ज्यादा गहरे लगेंगे। कहते हैं, दर्द चला जाता है जख्मों के निशान नहीं जाते। ये जख्म चोट, पीड़ा और अपमान को बार बार याद दिलाते रहेंगे।
इस मसले को इस नजर से देखे जाने की जरूरत है कि आज भारतीय भाषाएं कठिन दौर से गुजर रही हैं। चाहे मराठी हो चाहे हिंदी, या गुजराती हो या कन्नड़। परिवर्तन इतनी तेजी से और आक्रामकता से हो रहा है कि भाषाएं गैर जरूरी सामान की तरह पीछे छूटे जा रही हैं। जैसे किसी नौजवान को शहर में नौकरी मिल जाए तो मां उसे अचार, गुड़, कपड़े और मुसीबत के वक्त के लिए पैसे देगी। लेकिन नौजवान तो जीवन को नए सिरे से शुरू करना चाहता है। उसे सफल होना है। और वहां न घर के बने अचार की जगह है, न देसी गुड़ की। बाजार अपना जाल बिछा कर सरे आम बैठा हुआ है। नौजवान को उसमें फंसना ही है। वह भी खुशी-खुशी। वह मनभावन खाएगा, तनभावन पहनेगा। नई जगह, नई नौकरी, नए कारोबार में पुराना कुछ भी काम नहीं आने वाला। इस पुराने में भाषा भी है। अगर नौजवान सफल और ऊंची नौकरी पर है तो जाहिर है वह अंग्रेजी के हाई वे से होकर आया है। भारतीय भाषाओं की पगडंडियां अंग्रेजी के हाई वे के अगल बगल छोड़ने के बाद ओझल हो जाती हैं। जैसे वक्त के साथ मां बाप पुराने पड़ने लगते हैं, फिर थोड़े कम जरूरी होते जाते हैं, हमारी भाषाएं भी उसी तरह गैर जरूरी हो गई हैं।
इसका यह मतलब नहीं है कि जो लोग ऊंची नौकरियों पर नहीं हैं, या महानगरों में नहीं हैं, वे लोग अपनी भाषा को ज्यादा महत्व देते हैं। तरक्की हर कोई करना चाहता है। यह समझ लिया गया है कि तरक्की के लिए अंग्रेजी की जरूरत है। यह एक सामाजिक सच्चाई भी है। भारतीय भाषाएं बोलचाल में तो फलफूल रही हैं, पर ठीक ठाक नौकरी के लिए अंग्रेजी की ही जरूरत है। इससे यह कड़वी सच्चाई सामने आती है कि जब तक मुल्क गरीब रहेगा, गांव बचे रहेंगे, तब तक भारतीय भाषाएं और बोलियां बची रहेंगी। लेकिन तरक्की तो अनिवार्य प्रक्रिया है। भाषा को बचाने के लिए लोगों को सुख सुविधा से वंचित नहीं रखा जा सकता। यह अंतर्विरोध है, जिसकी तरफ बुध्दिजीवियों को ध्यान देना चाहिए। योजनाकार इस मुद्दे पर नहीं सोचते। राजनेता तो बिल्कुल ही नहीं। वे तो बल्कि जड़ों में मट्ठा डालने का काम कर डालते हैं।
इतने जटिल और कठिन समय में अस्मिता के नाम पे प्रदेश और भाषा को चंदन की तरह घिसकर तिलक किया जा रहा है। यह भावना में भिगोया हुआ तिलक नहीं है। यह कूटनीति के अम्ल में बुझा हुआ राजतिलक है। मनसे ने भाषा का राजतिलक लगाकर अपने रणबांकुरों को खुला छोड़ दिया है। यह हिंदी भाषी जनता के विरोध का ही दूसरा पहलू है। पहले गरीब उत्तर भारतीय हमले की जद में था। अब विशेषाधिकार प्राप्त क्षेत्र में हल्ला किया गया। अब हो यह रहा है कि चारों तरफ से तलवारें खिंच रही हैं। शपथ मानले पर मनसे बैकफुट पर आ गई तो उसने स्टेट बैंक में क्लर्कों की भर्ती की परीक्षा में मराठी मानुस का मुद्दा उठा लिया। वे परीक्षा रोकना चाहते थे। शिव सेना उनके विरोध में डट गई कि परीक्षा का होना जरूरी है। साफ है कि प्रदेश और भाषा की राजनीति हो रही है। सचिन तेंदुलकर ने मुंबई को भारत का बताया तो बाल ठाकरे उबल पड़े। उनकी पार्टी युवा वर्ग पर बगावत का आरोप भी लगा चुकी है। कुछ हफ्ते पहले उषा मंगेशकर ने भी एक टीवी प्रोग्राम में मराठी राग पर अच्छी लताड़ लगाई थी। लेकिन सत्तासीन कांग्रस और उसके सहयोगियों में बेहतर प्रबंधन की इच्छा नहीं दिखती है। ऐसे में सनसनी के भूखे मीडिया की मौज है।
मीडिया की तो अजीब हालत है। बिग बॉस में एक जेल बनाई गई है। वहां सजा देने का कोई मुद्दा नहीं मिला तो दो बार अंग्रेजी बोलने वालों को जेल की सजा सुनाई गई। एक आदमी को जिम्मेदारी दी गई कि कोई अंग्रेजी बोलता हुआ पाया जाए तो उसे जेल में डाल दो। भले ही यह खेल है लेकिन इतना हिंदी प्रेम! चैनल को पता है हिंदी से टीआरपी बढ़ेगी। इधर मनसे को पता है हुड़दंग करने से उसकी टीआरपी बढ़ेगी।
इन दोनों विपरीत स्थितियों में भाषा का खाना खराब हो रहा है। एक तो पहले ही हीनताग्रंथि की शिकार, ऊपर से इतनी थुक्का-फजीहत और मार-पीट। भाषा बेचारी को मुंह छिपाने को जगह नहीं मिलेगी। मनसे बोलेगी मराठी बोलो। अबू, लालू, पासवान, अमर सिंह बोलेंगे हिंदी बोलो। मीडिया मध्यस्थ बन रहा है। इस खींचतान में भाषाओं के ताने-बाने फटेंगे। मराठी के पक्ष में मनसे बाहुबल का प्रयोग कर रही है। शिव सेना रणनीतिक बयान देती है। महाराष्ट्र की कांग्रस और एनसीपी मुंह छिपाती है। इस मुद्दे का राजनैतिक लाभ हर कोई लेना चाहता है। हिंदी के पक्ष में लालू, मुलायम, पासवान वगैरह ही रह गए हैं। ये पिछड़ों के नेता हैं। कांग्रसियों में न हिम्मत है न इच्छा। असल में मनमोहनी सरकार में भाषा के लिए कोई जगह नहीं है। एक तो यह टेक्नोक्रेटों ब्यूरोक्रेटों जैसी सरकार है। नेता लोग पिछाड़ी बिठाए गए हैं। दूसरे विकास के जिस एजेंडे पर भारत अब तक चला है, उसमें भाषा को जगह है ही नहीं। नई आर्थिक नीति के बाद इस एजेंडे की रफ्तार बढ़ी ही है। इसलिए वे झगड़े में नहीं पड़ेंगे। भाषा संबंधी कानून भी जंग खाई मशीनों की तरह हैं। सिर्फ दिखाने के लिए, वे काम नहीं करते।
मसला हिंदी मराठी गुजराती बंगला का नहीं है। मसला यह है कि इन भाषाओं को हमने संस्कृति के हिस्से की तरह अपने जीवन में जगह नहीं दी। न हमने अपने बच्चों को किताबे पढ़ना सिखाया, न कलाओं का आस्वाद लेना। अलबत्ता, ऐतिहासिक स्मारकों में अपने नाम खोदने के लिए बच्चों के दिमाग में शरारत और हाथ में चाकू जरूर थमा दिया, जैसे बंदर के हाथ में उस्तरा। इसके अलावा जिस तरह भौगोलिक और सामाजिक दृष्टि से बेतरतीब विकास हुआ है, उसी तरह जीवन की भीतरी जरूरतों में भी बेतरतीबी और लापरवाही रही है। इससे सांस्कृतिक दिवालियापन बढ़ा ही है। भाषा, साहित्य, कला, जीवन मूल्यों के प्रति हमारी संवेदनाएं धीरे धीरे मरती गई हैं। नकलीपन हावी होता रहा है। अब इन मसलों को राजनैतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। यह उसी समाज के लक्षण हैं जिसकी आत्मा धीरे धीरे मर रही हो। जो भीतर से खोखला हो रहा हो। नकलीपन कब तक साथ देगा।
ऐसे में सकारात्मक काम करने की जरूरत हमेशा बनी रहेगी। बल्कि दिनों दिन बढ़ेगी ही। विधान सभा में जिस दिन हंगामा हुआ उसके अगले ही दिन मुझे एक कार्यक्रम में शामिल होने का मौका मिला। साने गुरूजी राष्ट्रीय स्मारक ट्रस्ट एक अनुवाद सुविधा केंद्र चलाता है। इसमें उदय प्रकाश के कहानी संग्रह अरेबा परेबा के मराठी अनुवाद के लिए जय प्रकाश सावंत को पुरस्कृत किया गया। एक तरफ राजनीति में भाषा को हथियार की तरह भांजा जा रहा था और दूसरी तरफ दोनों भाषाएं गले मिल रही थीं और पुरस्कृत हो रही थी। जहां तलवारों की सनसनी थी वहां मीडिया की भीड़ थी। और जहां भाषा मिलन हो रहा था, वहां थोड़े से लोग और मंद आवाज में बोलने वाले मीडिया कर्मी थे। इस तरह की विडंबनाएं सोचने पर मजबूर करती हैं। और बार बार भाषा को गंभीरता से लेने की जरूरत महसूस होती है।
अभी कुछ दिन पहले उदय प्रकाश ने अपने ब्लाग पर खबर दी थी कि उनकी पुस्तक अरेबा परेबा के मराठी अनुवाद को पुरस्कार मिला है. अनुवादक जय प्रकाश सावंत को यह पुरस्कार देने का मौका मुझे मिला. अपने अग्रज साहित्यकार की पुस्तक के मराठी अनुवाद के पुरस्कार समारोह में इस तरह शामिल होना बड़ा शुभ रहा। यह नवंबर की 10 तारीख थी. शायद एक दिन पहले ही महाराष्ट्र विधान सभा में हिंदी में शपथ लेने पर हाथापाई जैसी शर्मनाक घटना हो चुकी थी. उसी शहर में एक भाषा का दूसरी भगिनी भाषा में अनुवाद पुरस्कृत हो रहा था. और मैं इस सकारात्मक प्रतिपक्ष का प्रतिभागी रहा, इसका संतोष और गर्व है.
साने गुरूजी राष्ट्रीय स्मारक ट्रस्ट एक अनुवाद सुविधा केंद्र चलाता है जहां रहकर अनुवाद कार्य किया जा सकता है. मेरे लिए यह जानकारी बड़ी आह्लादकारी थी. क्योंकि भारतीय भाषाओं में परस्पर अनुवाद की बहुत ज्यादा जरूरत है. और इस तरह की सुविधाएं हमारे देश में ज्यादा नहीं हैं। बल्कि अनुवाद को उतना सम्मान का दर्जा भी हासिल नहीं है. हिंदी में इस तरह के अनुवाद का शायद ही कोई केंद्र हो. अगर आपकी जानकारी में हो तो अवश्य बताएं.
जुलाई के कथादेश में बद्री नारायण का लेख साहित्यिक दुनिया का वर्तमान छपा है। यह साहित्य में सत्ता के संस्तरों की छानबीन करता है, भारत जैसे बहुस्तरीय और बहुपरतीय देश में साहित्य की अंतर्धाराओं की नब्ज पकड़ता है। इस लेख से एक विमर्श की शुरुआत होती लगती है। मैंने पिछले वर्ष एक नई पत्रिका के प्रवेशांक पर संपादकों को अपनी प्रतिक्रिया लिखी थी। यह पत्रिका कुल्लू से शुरू हुई है। यह हिमाचल प्रदेश के रोहतांग दर्रे के पार लाहुल स्पिति जिले के केलंग शहर की एक संस्था की पत्रिका है। यूं तो लाहुल स्पिति जिले का मुख्यालय केलंग है पर लोगों का व्यावहारिक मुख्यालय कुल्लू ही है। कुल्लू मनाली भाई भगिनी नगर हैं, पर्यटकों के पसंदीदा ठिकाने। यह पत्रिका इसी कुल्लू से प्रकाशित हुई है। अत्यंत दुर्गम क्षेत्र की यह पहल हिंदी साहित्य के लिए एक घटना होनी चाहिए थी। लेकिन मुख्य-धारा की साहित्यिक गहमा-गहमी अपने में ही इतनी रमी हुई है कि उसे अपने से बाहर कुछ भी नहीं दिखता। तथाकथित परिधि के बाहर की गतिविधियां जाने-अनजाने अन-नोटिस्ड रह जाती हैं। मैंने अपने पत्र में इसी तरह की आशंका-आकांक्षा- आवश्यकता से जुड़े मुद्दों को उठाया था। बद्री नारायण के लेख के बाद लगा, मैं भी प्रकारांतर से इसी तरह की बात सामने रख रहा था। यह पत्र यहां प्रस्तुत है। उम्मीद है इससे बात आगे बढ़ेगी।
मार्च 2008
प्रिय निरंजन और अजेय,
यह पत्र असिक्नी के हवाले से लिख रहा हूंइसलिए दोनों को संबोधित कर रहा हूं।
मेरे बचपन का कुछ समय केलंग और कुल्लू में बीता है इसलिए उन जगहों की ललक हमेशा बनी रहती है। वहां की हर चीज़ का माने भी मेरे लिए अलग है। यह एक अलग रोमानी दुनिया है। असिक्नी उसी दुनिया में से निकल कर मेरे सामने नमूदार होती है। इसलिए इसका स्पर्श ही अलग है। जब मैंने जाना कि पत्रिका का नाम चंद्रभागा नदी का वैदिककालीन नाम है तो यह रिश्ता एक आद्यबिंब में बदल गया जो सहस्रों वर्ष बाद जीवित हो उठा है। या सहस्र वर्ष बाद भी चला आता है और मेरा समकालीन होकर मरे पास आता है। काल को अखंड करता हुआ।
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हमारे एक मित्र जब भी इधर की कविता सुनते, कहते कि हां मेनस्ट्रीम कविता जैसी है। उनकी इच्छा कुछ अलग तरह की कविता सुनने की रहती थी। इस प्रसंग का असिक्नी से इतना ही संबंध है कि कुछ वर्ष पहले तक हिमाचल एक अलग-थलग पड़ा क्षेत्र ही था। कला और साहित्य में या तो दबा-ढंका लोक था या सरकारी पन्नी में लिपटा खेल-तमाशा था या स्थानीयता के बोझ तले दबा लेखक था जो बार-बार दिल्ली तक दौड़ लगाता था। और दिल्ली तो हमेशा से दूर रही है।
पहले साहित्य के गढ़ हुआ करते थे। जैसे इलाहाबाद बहुत बरस रहा। गढ़ बड़े साहित्यकार के कारण भी हुआ करते थे। (ये दरबार नहीं होते थे) प्रसाद हों, निराला हों, दिनकर हों, आचार्य द्विवेदी हों या रेणु हों। फिर गढ़ लगभग ढह गए। सिर्फ दिल्ली बच गई। साहित्य दिल्ली-केंद्रित हो गया। साहित्यकारों ने दिल्ली को दौड़ लगा दीý
इससे एक तरह का टाइपीफिकेशन हुआ। श्रेष्ठताग्रंथी पनपी। जो दिल्ली से दूर थे, उन्हें शहर बाहर ही रखा गया। जो बाहर रह गए उनमें हीनता की गांठ बनी। प्रकाशन और पुरस्कार श्रेष्ठता की जीन काठी हैं। यह साजो-सामानदिल्ली में बनता है। हर कोई दिल्ली में छपना चाहता है। हर कोई दिल्ली में और दिल्ली से पुरस्कृत होना चाहता है। हर कोई दिल्ली से मान्यता चाहता है।
जो दिल्ली सरीखा नहीं हो सकता वह पिछड़ जाता है और क्षेत्रीयता या स्थानीयता के खाते में जा गिरता है।
यह मेनस्ट्रीम साहित्य का बैकड्रॉप हैý
वास्तव में देखा जाए तो यह ड्रॉबैक है।
साहित्य तो इसके बाहर भी है। पर वह परिधि पर रह जाता है। दिल्ली खुद को केंद्र में रखकर परिधियां बनाती है। पिछले साल नया ज्ञानोदय में भगवत रावत की दिल्ली पर छपी लंबी कविता पर परमानंद श्रीवास्तव ने परिधियों की चर्चा की भी है। भूमंडलीकरण और बाजारवाद और परापूंजी के जिस दौर में हम रह रहे हैं, कहते हैं उसकी एक विशेषता है या कहना चाहिए स्वभाव है कि उसमें केंद्र टूटते हैं। सबसे ज्यादा तो बाजार ही केंद्रों को तोड़ेगा। नए केंद्र बनाएगा। मतलब नई परिधियां होंगी। आम आदमी की बहुत मिट्टी पलीद होगी, पर पूंजी का खेल उसे पेर-पेर कर लुगदी में बदल कर नए सिरे से प्लाइवुड की तरह सीधा समतल कर देगा। स्थानीयताओं के लिए यही खतरा है। जो बरमूढ़ा बरमिंघम में पहना जाता है, वही मेरे पुश्तैनी गांव दरवैली में चलेगाý
असिक्नी एक तरफ दिल्ली का दामन पकड़ती है। यह पकड़ पत्रिका को समकालीन बनाती है। दूसरी तरफ असिक्नी लाहुल और कुल्लू और हिमाचल के जन-जीवन को समकालीनता के बरक्स रखती है। आज के परिदृश्य में ये दोनों ही पंख पत्रिका को संतुलित बनाते हैं। या तो दिल्ली को साथ ले के चलिए या दिल्ली के पीछे चलिए, दिल्ली को नज़रअंदाज़ करके नहीं चल सकते। इसे पत्रिका की कमज़ोरी न समझा जाए। यह यथास्थिति है। पत्रिका नए केंद्र बनने की स्थापना को भी पुष्ट करती है। जिस स्तर की सामग्री हमें लखनऊ से या पटना से या भोपाल से छपने वाली पत्रिका में मिलती है, उसी स्तर की सामग्री असिक्नी में मिलती है। यही वजह है कि साहित्यिक नक्शे में हिमाचल और कुल्लू और लाहुल दिल्ली से कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा हो जाता है। इससे स्थानीयता का हीनताबोध काफी हद तक छनता है।
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पत्रिका के लिए कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा होने के लिए एक और दृष्टिकोण मुझे ज़रूरी लगता है। समकालीन विमर्श करना आवश्यक है। उसका विहंगम होना, सांगोपांग होना और भी आवश्यक है। हमारे समय को प्रौद्योगिकी ने काफी हद तक 'सीमलेस' (बे-जोड़) कर दिया है। अजेय से रोहतांग पार फोन पर बात हो जाती है। मेल उन तक पहुंच जाती है। यह कम चमत्कारी बात नहीं है। इन्फ्रास्ट्रक्चर पहले से बेहतर हुआ है। कल्पना कीजिए बीस साल पहले दिल्ली पहुंचने में कितनी देर लगती थी। और अब? विदेशों से आवाजाही में भी आसानी हुई है। समाचार कितनी तेज़ी से हम तक पहुंच जाते हैं। मतलब मनुष्य और विचार के आवागमन की गति बढ़ी है। यह अलग बात है कि मनुष्य के संकट भी उसी अनुपात में बढ़े हैं। या कहें बदले हैं। विचार में नयापन है या नहीं; विचार विचारोत्तेजक है या नहीं; विचार और मनुष्य का आचार मनुष्य-हितैषी है या नहीं; यह विचारणीय प्रश्न है। पूंजीवाद और नवसाम्राज्यवाद और परापूंजी का दबदबा है। हर चीज़ में जल्दबाज़ी है, बदहवासी है, हड़प जाने की लोलुपता है। विकास की कीमत इस रूप में चुकानी पड़ रही है। पर यह शायद पैकेज डील है। और हमारे पास इस डील को नकारने का विकल्प नहीं हैý
यह सब मुंबई में हो रहा है। दिल्ली में, न्यूयॉर्क में, बीज़िंग में, शिमला में, कुल्लू में, दार्जलिंग में, मतलब हर कहीं कमोबेश एक ही तरह से हो रहा है। दबाव तकरीबन एक ही जैसे हैं। नॉम चॉम्स्की अमरीकी विदेश नीति की आलोचना करते हैं, तो उनके विचार छनकर बरास्ता 'पहल' हमें भी मिल जाते हैं। अरुंधती रॉय एक्टिविज्म का रास्ता अख्तियार करती हैं। यह बात वह अमरीका में कहती हैं। बांग्लादेश का ग्रामीण बैंक सबका ध्यान खींचता है। हेराल्ड पिंटर नोबल पुरस्कार लेते समय नोबल समिति के कान खींचता है। अमर्त्य सेन फ्रांसिसी सरकार का आर्थिक सलाहकार बनता है। विचार के हल्के में हो रही हरकत भी हम तक पहुंच रही है। यह क्रिकेट और बॉलीवुड और डब होकर आ रहे हॉलीवुड की तुलना में ज़रूर कम है। पर मैं बात यह कहना चाह रहा हूं कि सारी दुनिया की इस तेज़ हरकत के बीच हम भी हैं। हम परिधि से बाहर नहीं हैं। इस परिवर्तन से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। यही शायद ग्लोबलाइजेशन का मूर्त रूप है। वैश्विक गांव।
लेकिन इस वैश्विक गांव में संस्तर खत्म हो गए हैं या समानता आ गई है? जाहिर है ऐसा नहीं है। बल्कि गलाकाट प्रतियोगिता है और अपनी सीढ़ी से ऊपर फलांगने की होड़ है। सब जानते हैं कि ऊपर की सीढ़ियों पर जगह कम होती जाती है। शिखर पर तो एक ही जगह होती है। समृद्धि के घेरे में कम आ रहे हैं, बाहर ज्यादा लोग छिटक रहे हैं। गरीब देशों के साथ ऐसा ज्यादा हो रहा हैý
इस बाहरी परिदृश्य के साथ साथ मनुष्य की भीतरी उथल-पुथलभी बहुत है। बहुत खदबदाहट है। व्यक्तिगत जीवन शैली और सामूहिक लोकाचार के ढांचे तेज़ी से बदल रहे हैं। संभाले नहीं संभलते। घटना जितनी है, दुर्घटना उससे ज्यादा है। सुकून की तलाश एक व्यवसाय है। चाहे वह मैडिकल साइंस हो या योग विज्ञान होý
ऐसे घमासान में विरोध, प्रतिरोध, परिवर्तन, परिवर्धन के विचार को पकड़ना दुष्कर है। साहित्य तो अकुलाहट भर बनकर रह जाता है। वाम विचार पर चौतरफा दबाव है। परिवर्तन के पहरुए एनजीओ का रूप धर कर आ रहे हैंजो त्याग और नि:स्वार्थता की पुरानी अवधारणा को त्याग चुके हैं। यह फंडेड मामला है। सुविधा सहित सेवा का शगल है। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो हिंदी की साहित्यिक गतिविधि इस धन-प्रवाह से मुक्त है। पर उसके अपने अंतर्विरोध हैंý
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इतना तूमार बांधने का मेरा मकसद क्या है? जाहिर है असिक्नी मेरे ध्यान के केंद्र में है। ऊपर का खंड 1एक सच्चाई है जिसमें असिक्नी को अपना अस्तित्व बनाना है। इन दोनों में संतुलन साधा जाएगा तो पत्रिका समकालीन होगी। यह ध्यान भी रखना पड़ेगा कि खंड 1की तरफ झुकाव हुआ तो साहित्यिक खेमेबाज़ी का खतरा रहेगा। कोई दिल्ली, कोई लखनऊ, कोई शिमला, कोई मंडी का दायरा बनने लगेगा। खंड 2पर अंधाधुंध पिल पड़े तो सब कुछ हाई फंडा होकर बाकी सब को रोंदने लग पड़ेगा। इसलिए संतुलनý
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पर इसका एक कोण और है। यह पत्रिका घोषित रूप से लाहुल स्पिति की एक संस्था द्वारा चलाई जा रही है। यह अपने आप में बड़ा कदम है। यह लाहुल स्पिति की समकालीनता में बड़ी छलांग है। इसके नाते स्थानीयता मुख्यधारा से कदम मिलाएगी। अपनी पहचान को बचाए रखकर।
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यह सब है किसके लिए? हिंदी की पत्रिकाओं में ब्रेनस्टॉर्मिंग (विचार मंथन) खूब होता है (?)। उसका छल भी खूब होता है। प्रगतिशीलों का तो यह शगल भी रहा है। पर मेरी इच्छा, मेरा आग्रह पत्रिका को ज्यादा से ज्यादा पाठकों तक ले जाने का है। अभियान की तरह। यह एक चुनौती है। जितनी मेहनत फंड और सामग्री इकट्ठा करने में की जाती है, उतनी ही पाठक बनाने पर की जानी चाहिए। रोड शो, गोष्ठी, सभा, सम्मेलन, सेमिनार, घर-घर जाकर - जैसे भी हो। दस को समझाएंगे तो एक ग्राहक बनेगा। दस ग्राहक बनेंगे तो एक ग्राहक पढ़ेगा। दस ग्राहक पढ़ेंगे तो एक ग्राहक गुणवंत बनेगा। जैसे पानी ज़मीन में समाता है। सोता किसी दूसरी जगह फूटता हैý
मैंने रचनाओं पर अलग से बात नहीं की है। पत्रिका कैसे पोजीशन्ड होती है, मैं इसी में उलझ गयाý