Sunday, December 11, 2011

ब्‍लॉग चर्चा




10 दिसंबर को यहां मुंबई के एक उपनगर कल्‍याण में एक कालेज में हिंदी ब्‍लॉगिंग पर एक सेमिनार में भाग लेने का मौका मिला। इसमें कई ब्‍लॉर आए थे। अकादमिक जगत के लागों के बीच यह चर्चा इस दृष्टि से अच्‍छी थी कि अगर हिंदी विभाग ब्‍लागिंग में रुचि लेने लग जाएं तो हिंदी ब्‍लागिंग को और आयाम मिलेंगे. इसमें मुझे भी अपनी बात रखने का मौका मिला. मैंने पावर प्रजेंटेशन बनाया था, उसी जानकारी को यहां दे रहा हूं. स्‍लाइड बनाने का फायदा यह होता है कि बात बिंदुवार चलती है. बहकने का खतरा नहीं रहता. वि‍षय को साहित्यिक ब्‍लागों तक केंद्रित रखा था.  

ब्‍लॉग का चरित्र

  •        रीयल टाइम में घटित होता है
  •        भौगोलिक सीमाओं से परे है
  •        जनतांत्रि‍क है
  •        स्‍वायत्‍त है
  •        क्षैतिज चलता है 
  •       इसलिए कोई छोटा बड़ा नहीं
  •        इसलिए छोटे बड़े की लिहाज नहीं
  •        इसलिए मुंहफट और मुंहजोर
  •        और कभी कभी बदतमीज भी हो जाता है
  •       सार्वजनिक अभिव्‍यक्ति का सहज सुलभ माध्‍यम
  •        चाहे जितने मर्जी ब्‍लॉग बनाओ
  •        अभी महंगा है
  •        मध्‍यवर्ग में पैठ बना रहा है
  •       उम्‍मीद करें यह मुफ्त ही बना रहे
  •        बेथाह मुनाफा कमाने वाली आई टी कंपनियों के जोर के बावजूद
  •        इसे मुफ्त कराने की मुहिम सफल हो
  •        ऐसी कामना करें 
  •       ढूंढने चलो तो हर दिन कोई नया ब्‍लॉग या पत्रि‍का मिल जाती है
  •        सामग्री की बमवारी है
  •        एग्रिगेटरों को देखिए  पल पल नई पोस्‍टें अवतरित होती हैं
  •       साहित्‍य में कुछ स्‍थापित लेखकों के ब्‍लॉग है
  •       कुछ युवा लेखकों के, और कुछ नव लेखकों के
  •       ज्‍यादातर अपनी रचनाएं लगाते हैं
  •        अपनी पसंद की दूसरे लेखकों की रचनाएं लगाते हैं.
  •        कुछ अपने ब्‍लाग पत्रि‍काओं की तरह पेश करते हैं
  •       कुछ ब्‍लॉगर सामूहिक रूप से ब्‍लॉग चलाते हैं
  •       इस तरह हरेक ब्‍लॉगर लेखक भी है संपादक भी
  •  यह एक महत्‍वपूर्ण बिंदु है क्‍योंकि संपादक
    •  कड़ाई बरतने वाला हो    क्‍या पोस्‍ट नहीं करना है
    •  सजग रहने वाला हो     क्‍या पोस्‍ट करना है
    • बहुपठित हो            पिष्‍टपेषण से बचेगा चुनिंदा सामग्री रखेगा
    • सौंदर्यबोध संपन्‍न हो     उसे शब्‍द रंग रेखा और स्‍पेस की समझ हो
       
सीमाएं
 
  •       अथाह भंडार है
  •        एग्रिगेटरों की भूमिका असंदिग्‍ध है
  •        कुछ और छलनियों की जरूरत है
  •        जैसे वि‍षय आधारित
  •        काल आधारित
  •        स्‍थान आधारित
  •        नाम आधारित 
  •       जो हैं वो लेखक हैं और स्‍वनामधन्‍य हैं
  •        क्‍वालिटी कंट्रोल नहीं है
  •        यह सोशल माडिया का चरित्र भी है
  •        संक्ष‍िप्‍त, तुरंत, उच्‍छृंखल, इसलिए
  •        गंभीरता और जिम्‍मेदारी की कमी
  •       और जिम्‍मेदारी के बिना साहित्‍य क्‍या होगा पता नहीं

अपेक्षाएं
 
  •       जितना है बेथाह है पर कम है
  •        और की जरूरत है
  •       अभी भी सर्च करते हैं तो हिंदी    साहित्‍य की सामग्री नहीं मिलती
  •        सतही चलताऊ माल मिलता है
  •        गहराई और विस्‍तार दोनों चाहिए
  •        टिप्‍पणी पाने के मोह से ऊपर उठना होगा
  •        टिप्‍पणी टीआरपी की तरह है
  •        क्‍लासीफाइड सर्च की सुविधा बने
  •        ज्‍यादातर ब्‍लॉगर युवा लेखक और पत्रकार हैं
  •        अब शिक्षक वर्ग आए
  •       शिक्षक वर्ग आएगा तो
  •        छात्र वर्ग आएगा
  •        प्रत्‍येक विभाग को कम से कम एक पीसी मिलना चाहिए
  •        प्रत्‍येक विभाग अपना ब्‍लॉग बनाए
  •        क्‍लासिक साहित्‍य को डाले
  •        कर्तव्‍य की तरह
  •       लिखें और लिखना सीखें
  •        हर लिखे शब्‍द को अपलोड करने का मोह त्‍यागें
  •        अपना श्रेष्‍ठ लेखन ही अपलोड करें
  •        अपनी भड़ास से ब्‍लॉग को न भरें 
इस सेमिनार मे विविध भारती के उद्घोषक यूनुस खान ने संगीत संबंधी ब्‍लागों की जानकारी दी. यूनुस खुद रेडियोनामा और रेडियोवाणी ब्‍लाग चलाते हैं. सेमिनार की बाकी जानकारी यहां पर मिलेगी.  

Saturday, November 12, 2011

काल को सम पर लाना

 



पिछले दिनों मुंबई में जहांगीर कला दीर्घा में संजय कुमार की 
चित्र एवं मूर्ति-शिल्प प्रदर्शनी लगी थी। संजय मूलतः इलाहाबाद के हैं और 
पिछले कई वर्षों से मंबई में रह कर स्वतंत्र रूप से काम कर रहे हैं।  
'टाइम्स ट्रांसमिशन' शीर्षक की इस प्रदर्शनी में समय को एक प्रभावशाली रूपक में ढाला गया है।

द अल्टीमेट रोटेशन
चित्रकला दीर्घाओं में जाना हमेशा ही अच्छा लगता है। इस बार काला घोड़ा स्थित जहांगीर आर्ट गैलरी में बापू की जयंती (2 अत्तूफ्बर 2011) के दिन जाने का मौका मिला। जहांगीर के मुख्य हॉल में तीन प्रदर्शनियां लगी थीं। हम शुरू में ही लगी संजय कुमार की प्रदर्शनी को ही किंचित रस लेकर देख पाए। किंचित इसलिए क्योंकि चित्र और शिल्पकृतियों को देखने भर से काम नहीं चलता। उनके अभिप्रायों तक पहुंचने के लिए, उन कला  रूपों का रसास्वादन करने के लिए काफी समय चाहिए। कई बार कोई कृति एक भेंट में पर्याप्त नहीं खुलती, उसके पास बार बार जाना पड़ता है। यह भी संभावना बनी रहती है कि हर भेंट में कृति का एक नया पाठ बने या पहले पाठ में परिवर्तन परिवर्धन हो। पर हमारी जीवन शैली ऐसी है कि समय की कमी प्रायः बनी रहती है। इस बार भी बस एक ही झलक हम ले पाए। पर इस  झलक का प्रभाव गहरा था। यहां संजय कुमार के तैल चित्र और फाइबर ग्लास में बने मूर्ति-शिल्प थे। लगभग इन सभी कृतियों में घड़ी का प्रयोग हुआ है। चित्रकार ने प्रदर्शनी की विवरण-पुस्तिका में काल को इस तरह देखा है

''समय सिर्फ रोजमर्रा के कामों को तरतीब देने की वस्तु मात्र नहीं है। समय भौतिक और पराभौतिक को जोड़ने वाली चेतना की अद्भुत ऊर्जा है। यह एक से दूसरे रूप में संचरित होने की अवस्था है, जीवन के विकास की एक प्रक्रिया है। यह एक सत्ता के भीतर से उद्भूत होती है। विविधता के बावजूद जीवन के चक्र को चलाए रखने के लिए दिमाग ऊर्जा को बचा लेता है। फिर वहां यही अस्तित्व का रूप ले लेता है।''
संजय ने काल की अपनी इस अवधारणा को चित्रों और मूर्ति-शिल्पों के माध्यम से रूपायित किया है। चित्रों में काले और नीले रंग की छटाओं के बीच मन भावन फीके सफेद रंग की अठखेलियां हैं। असल में हम सभी प्रदर्शनियों में चित्रों को एक बार देखते हैं, उसके बाद स्मृति में उन्हें बार बार देखते हैं। स्मृति में देखने में स्‍वैर-कल्पना (फैंटेसी) की भी पूरी संभावना रहती है। भीतर अलग ही तरह की रम्य-रचना होती रहती है। आधिक्य की तरफ झुकी हुई। 

द इनकारनेशन
यहां मूर्तियां फाइबर ग्लास की हैं पर धातु से बने होने का प्रभाव देती हैं। धूसर मिट्टी सा रंग और ऊपर से चमकीली तैलीय परत। देखने में भारीपन का एहसास होता है। 'द अल्टीमेट रोटेशन' में तीन मानव आकृतियां एक धुरी के गिर्द अधर में लटकी हुई हैं। मानों वे एक वृत्त में तैर रही हैं। उनकी नृत्य-निमग्न हुई सी भंगिमाएं हैं। सिर के ऊपर चपटा काल है, सपाट चंदोबे की तरह, घड़ी के  डायल की शक्ल में, जो इन्हें बांधे हुए है। यूं वे ठोस एंगलायरन की धुरी से भी बंधे हुए हैं जिस पर डायल खड़ा है। यह धुरी एक तरह से सहारा ही है। एक तरह से ये काल से बंधे हुए जीव हैं लेकिन उसके अधीन फैले दिक् में स्वतंत्र और निर्बंध भी हैं। यहां भौतिक बंधन के भीतर अभौतिक किस्म की मुक्ति है। हो सकता है यह वस्तुस्थिति न हो, केवल मानव मन की अवस्थिति हो, जिसकी थाह हम बार बार पाना चाहते हैं या जिस तक पहुंचना चाहते हैं। क्या यही आनंद है? 'द इनकारनेशन' में ईसा मसीह की देह छरहरी है। धड़ में तीन घडि़यां धंसाई गई हैं, गोल पुराने फैशन की, और रुकी हुई। चरणों में एक आवक्ष मूर्ति वंदना के भाव में बैठी हुई है। जिसका झुका हुआ सिर और कंधे ही दिखते हैं। विराटता के समक्ष समर्पण का भाव। ईसा गहन प्रशांति में डूबे हैं। विचार और आवेग से परे। तीन घडि़यों की तरह तीन लोक से परे यानी दिक् और काल के परे उनका अवतरण हो रहा है। काल से परे या कालहीनता के आकाश या अवकाश में ही प्रशांति संभव है? क्या यह प्रस्तुति इसी तरह के संकेत दे रही है? दो अन्य चित्र हैं 'ट्रांसफारमेशन' और 'साल्वेशन' शीर्षक के। इनमें भी घडि़यां हैं और उनमें कहीं मानव आकृतियां निकल रही हैं, कहीं घुस रही हैं और कहीं घुल-मिल रही हैं - मानो मनुष्य दिक् और काल में रूपांतरण की सतत प्रक्रिया से गुजर रहा है। 

टयूनिंग द टाइम
हॉल के एक कोने में एक बड़ा ही दिलचस्प मूर्तिशिल्प रखा था - 'टयूनिंग द टाइम'। क्या हम इसे 'काल का सुर मिलाना' कह सकते हैं! इस बिंब की व्यंजना गहरी है, और मूर्ति अद्भुत। यह एक दर्जी है जो पैर से चलने वाली सिलाई मशीन पर बैठा सिलाई कर रहा है। सिले जा रहे कपड़े की जगह उसके पास घड़ी है जिसका एक सिरा सिलाई मशीन की सुई और दंदे के बीच फंसा है। घड़ी यानी घड़ी का डायल जैसे कपड़े की तरह लचीला और सिलवट पड़ा है। बल्कि चमड़े की तरह मोटा और अकड़ा हुआ है पर धातु की तरह कड़ा नहीं दिख रहा है। जबकि कमाल का प्रभाव यह है कि सारा शिल्प धातु निर्मित ही लगता है।

इसे देखने पर एक अद्भुत रूपक की सृष्टि होती प्रतीत होती है। व्यक्ति वक्त की सिलाई कर रहा है। मानो वक्त इतना पुराना पड़ गया हो कि फट गया हो या उधड़ गया हो और कोई कारीगर उसे सिल रहा हो। पर मूर्तिकार ने इस काम को सिलाई करना न कह कर 'टयूनिंग करना' कहा है। काल को जोड़ने की क्रिया तो दो काल खंडों को जोड़ने की क्रिया होगी। यह टयूनिंग है। साज का सुर मिलाने जैसी। सामंजस्य पैदा करने की क्रिया। काल से सामंजस्य या संगति बिठाना या काल को सम पर लाना कितनी प्रासंगिक उक्ति है! 

दर्जी पूरी तरह अपने में तल्लीन है। एक हाथ सिलाई मशीन के हैंडल पर रुका हुआ है, मानो अभी चक्का चलने लगेगा। दूसरे हाथ ने घड़ी के चिथड़े को थाम रखा है। नीचे पैर भी दिख रहे हैं। सारा शरीर काम करने की लय में डूबा हुआ है। पूरा ध्यान काम पर लगा हुआ है। समय को मिलाने का काम निमग्न हो के ही किया जा सकता है। पीठ, गर्दन, सिर, आंखें झुकी हुई हैं। किसी शिल्पी की विनम्र और कर्मठ देह की तरह। और शिल्पी पूरी तन्मयता से काल की रचना विरचना संरचना में लगा है। यह मानवीय कृत्य की अद्भुत उठान है। 

यह प्रदर्शनी देख कर मन में अजब स्फूर्ति आई। कलाकार से मिल कर भी अच्छा लगा। ऊर्जा और उत्साह से भरपूर संजय कुमार अपने बारे में बताने लगते हैं -

'' बचपन से ही मुझे औपचारिक शिक्षा में कोई रुचि नहीं थी। इसलिए मैं कभी भी इसमें सफल नहीं रहा। मध्यमवर्गीय परिवार में जन्म लेने के कारण सभी मुझसे यह उम्मीद करते कि मैं पढ़ूं और जीविका का कोई अच्छा साधन ढूंढूं। मेरे पिता श्री रामेश्वर प्रसाद को साहित्य में गहरी रुचि थी। वे फिराक गोरखपुरी के शिष्य थे, धर्मवीर भारती और गोपेश्वर आदि के साथ परिमल में सक्रिय थे। कमलेश्वर उनके मित्र थे। उनके कारण मेरी कला को एक दिशा मिल सकी। टैगोर, टॉलस्टॉय, शरत, प्रेमचंद और बंकिंम चंद्र के बारे में उनसे सुनता तो मुझे एक अजीब सी खुशी मिलती। सबसे पहले उन्होंने मुझे वैन गॉग, गौगन, एल-ग्रेको और लियोनार्डो के विषय में बताया। शायद यही वह बिंदु था जब छवियां मेरे मन में अपना काल्पनिक रूप लेने लगी थीं। यह करीब 37-38 साल पहले की बात है। उस समय के रेखाचित्र और जलरंग देख कर शायद उन्हें लगा हो कि मैं इससे बेहतर और कुछ नहीं कर सकता। ढेर सारे चित्रों के साथ 1982 में जे जे स्कूल ऑफ आट्र्स में प्रवेश लेने के लिए पहली बार मुंबई आया लेकिन कुछ न हो सका। फिर दिल्ली और बाद में हार कर आगरा कालेज से एम ए की डिग्री लेकर थोडे़ दिन जीविका की तलाश में भटकता रहा। मेरे भाई चूंकि यहां (मुंबई में) थे इसलिए एक मॉरल सपोर्ट था जिसके सहारे मैं यहां तक कला यात्रा कर सका।
''जीवन से बड़ी कोई किताब नहीं और सबसे ज्यादा उसी को पढ़ने की कोशिश की। मेरा मानना है कि जो भी स्वाभाविक रूप से प्रेरित करे वही शक्तिशाली अभिव्यक्ति होती है, उसमें एक कलाकार की सोच और संकल्पना का समावेश होता है।''
कला वीथि की इस संक्षिप्त यात्रा के अंतिम पड़ाव पर संजय से विदा लेते समय उनसे अगली योजना के बारे में पूछा तो उनका कहना था कि अगला काम 'मेट्रो साउंड' नाम की एक शृंखला हो सकती है, जिसमें जीवन के आसपास की क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं का समावेश होगा।

Saturday, November 5, 2011

Friday, October 21, 2011

सरलता के सहारे हत्या की हिकमत

छायांकन - हरबीर
                                                                            
पिछले दिनों राजभाषा के नीति-निर्देशों को लेकर गृह मंत्रालय का 
एक नया 'परिपत्र' प्रकाश में आया है, उसने भाषा के संबंध में निश्चय ही 
एक नये 'विमर्श' को जन्म दे दिया है। क्योंकि, भाषा केवल 'सम्प्रेषणीयता' का 
माध्यम भर नहीं है, बल्कि वह मनुष्य का सामाजिक-सांस्कृतिक आविष्कार भी है। 
फिर क्या किसी भी राष्ट्र की भाषा की संरचना में मनमाने ढंग से 
छेड़छाड़ की जा सकती है? क्या वह मात्र एक सचिव और समिति के 
सहारे हांकी जा सकती है? निश्चय ही इस प्रश्न पर समाजशास्त्री, शिक्षा-शास्त्री, संस्कृतिकर्मी और राजनीतिक विद्वानों को बहस के लिए आगे आना चाहिए। 
यहां प्रस्तुत है, इस प्रसंग में एक बौद्धिक-जिरह को 
जन्म देने वाली प्रभु जोशी की टिप्पणी-

भारत-सरकार के गृह-मंत्रालय की सेवा-निवृत्त होने जा रही एक सचिव सुश्री वीणा उपाध्याय ने जाते-जाते राजभाषा संबंधी नीति-निर्देशों के बारे में एक ताजा परिपत्र जारी क्या किया कि बस अंग्रेजी अखबारों की तो पौ-बारह हो गयी। उनसे उनकी खुशी संभाले नहीं संभल पा रही है। क्योंकि, वे बखूबी जानते हैं कि बाद ऐसे फरमानों के लागू होते ही हिन्दी, अंग्रेजी के पेट में समा जायेगी।  दूसरी तरफ हिन्दी के वे समाचार-पत्र, जिन्होंने स्वयं को 'अंग्रेजी-अखबारों के भावी पाठकों की नर्सरी' बनाने का संकल्प ले रखा है, उनकी भी बांछें खिल गयीं और उन्होंने धड़ाधड़ परिपत्र का स्वागत करने वाले सम्पादकीय लिख डाले। वे खुद उदारीकरण के बाद से आमतौर पर और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हासिल करने के बाद से खासतौर पर अंग्रेजी की भूख बढ़ाने का ही  काम करते चले आ रहे हैं।

ऐसे में 'अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष' के अघोषित एजेण्डे को लागू करने वाले दलालों के लिए तो इस परिपत्र से 'जश्न-ए-कामयाबी' का ठीक ऐसा ही समां बंध गया होगा, जब अमेरिका का भारत से परमाणु-संधि का सौदा सुलट गया था। दरअस्ल, देखने में बहुत सदाशयी-से जान पड़ने वाले इस संक्षिप्त से परिपत्र के निहितार्थ नितान्त दूसरे हैं, जिसके परिणाम लगे हाथ सरकारी दफ्तरों में दिखने लगेंगे। बहरहाल यह किसी सरकारी कारिन्दे का रोजमर्रा निकलने वाला 'कागद' नहीं, भाषा सम्बन्धी एक बड़े 'गुप्त-एजेण्डे' को पूरा करने का प्रतिज्ञा-पत्र है।

दरअस्ल, चीन की भाषा 'मंदारिन' के बाद दुनिया की 'सबसे बड़ी बोली जाने वाली भाषा-हिन्दी' से डरी हुई, अपना 'अखण्ड उपनिवेश बनाने वाली अंग्रेजी' ने, 'जोशुआ फिशमेन' की बुद्धि का इस्तेमाल करते हुए, 'उदारीकरण' के शुरू किये जाने के बस कुछ ही समय पहले एक 'सिद्धान्तिकी' तैयार की थी, जो ढाई-दशक से 'गुप्त' थी, लेकिन 'इण्टरनेटी-युग' में वह सामने आ गयी। इसका नाम था, 'रि-लिंग्विफिकेशन'

अंग्रेज शुरू से भारतीय भाषाओं को भाषाएं न मान कर उनके लिए 'वर्नाकुलर' शब्द कहा करते थे। वे अपने बारे में कहा करते थे, 'वी आर अ नेशन विथ लैंग्विज, व्हेयरएज दे आर ट्राइब्स विद डॉयलेक्ट्स।' फिर हिन्दी को तो तब खड़ी 'बोली' ही कहा जा रहा था। लेकिन, दुर्भाग्यवश एक गुजराती-भाषी मोहनदास करमचंद गांधी ने इसे अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई में 'प्रतिरोध' की भाषा बना दिया और नतीजतन, गुलाम भारत के भीतर एक 'जन-इच्छा' पैदा हो गयी कि इसे हम 'राष्ट्रभाषा' बनाएं और कह सकें 'वी आर अ नेशन विद लैंग्विज'। लेकिन, 'राष्ट्रभाषा' के बजाय वह केवल 'राजभाषा' बनकर रह गयी। यह भी एक कांटा बन गया।
बहरहाल, चौंसठ वर्षों से सालते रहने वाले कांटे को कहीं अब जाकर निकालने का साहस बटोरा जा सका है। यह एक बहुत ही दिलचस्प बात है कि अभी तक, पिछले पचास बरस से हिन्दी में जो शब्द चिर-परिचित बने चले आ रहे थे, पिछले कुछ वर्षों में उभरे 'उदारीकरण' के चलते अचानक 'कठिन' 'अबोधगम्य' औस टंग-टि्व्स्टर हो गये। परिपत्र में पता नहीं हिन्दी की किस पत्रिका के उदाहरण से समझाया गया है, कि 'भोजन' के बजाय 'लंच', 'क्षेत्र' के बजाय 'एरिया', 'छात्र' के बजाय 'स्टूडेण्ट', 'परिसर' के बजाय 'कैम्पस', 'नियमित' की जगह 'रेगुलर', 'आवेदन' के बजाय 'अप्लाई', 'महाविद्यालय' के बजाय 'कॉलेज', आदि-आदि हैं, जो 'बोधगम्य' है।

हिन्दी के 'सरकारी हितैषियों का मुखौटा' लगाने वाले लोग निश्चय ही पढ़े-लिखे लोग हैं और अच्छी तरह जानते हैं कि भाषाएं कैसे मरती हैं और उन्हें कैसे मारा जाता हैं।  बीसवीं शताब्दी में अफ्रीकी महाद्वीप की तमाम भाषाओं का खात्मा करके उसकी जगह अंग्रेजी को स्थापित करने की रणनीति उन्हें भी बेहतर ढंग से पता होगी। उसको कहते हैं, 'थिअरी ऑव ग्रेजुअल एण्ड स्मूथ-लैंग्विज शिफ्ट'। इसके तहत सबसे पहले 'चरण' में शुरू किया जाता है- 'डिस्लोकेशन ऑव वक्युब्लरि'। अर्थात 'स्थानीय-भाषा' के शब्दों को 'वर्चस्ववादी-भाषा' के शब्दों से विस्थापित करना । बहरहालपरिपत्र में सरलता के बहाने सुझाया गया रास्ता  उसी 'स्मूथडिस्लोकेशन ऑफ वक्युब्लरि ऑफ नेटिव लैंग्विजेज' वाली सिद्धान्तिकी का अनुपालन है। क्योंकि, 'विश्व व्यापार संघ के द्वारा बार-बार भारत सरकार को कहा जाता रहा है कि 'रोल ऑफ गव्हर्मेण्ट आर्गेनाइजेशन्स शुड बी इन्क्रीज्ड इन प्रमोशन ऑव इंग्लिश'। इसी के अप्रकट निर्देश के चलते हमारे 'ज्ञान-आयोग' गहरे चिन्‍तन-मनन का नाटक कर के  कहा कि 'देश के केवल एक प्रतिशत लोग ही अंग्रेजी जानते हैं, अत: शेष को अंग्रेजी सिखाने के लिए पहली कक्षा से अंग्रेजी विषय की तरह  शुरू कर दी जाये।' यह 'एजुकेशन फॉर आल' के नाम पर विश्व-बैंक द्वारा डॉलर में दिये गये ऋण का दबाव है, जो अपने निहितार्थ में 'इंग्लिश फॉर आल' का ही एजेण्डा है। अत: 'सर्वशिक्षा-अभियान' एक चमकीला राजनैतिक झूठ है। यह नया पैंतरा है, और जो 'भाषा की राजनीति' जानते हैं, वह बतायेंगे कि यह वही 'लिंग्विसिज्म' है, जिसके तहत भाषा को वर्चस्वी बनाया जाता है। दूसरा झूठ होता है, स्थानीय भाषा को 'फ्रेश-लिविंस्टिक लाइफ' देने के नाम पर उसे भीतर से बदल देना। पूरी बीसवीं शताब्दी में उन्होंने अफ्रीकी महाद्वीप की तमाम भाषाओं को इसी तरह खत्म किया।

एक और दिलचस्प बात यह कि हम 'राजभाषा के अधिकारियों की भर्त्सना' में बहुत आनन्द लेते हैं, जबकि हकीकतन वह केन्द्रीय सरकारी कार्यालयों का सर्वाधिक लतियाया जाता रहने वाला नौकर होता है। कार्यालय प्रमुख की कुर्सी पर बैठा अधिकारी उसे सिर्फ हिन्दी पखवाड़े के समय पूछता है और जब 'संसदीय राजभाषा समिति' जो दशकों से खानापूर्ति के लिए आती-जाती है, के सामने बलि का बकरा बना दिया जाता है। यह परिपत्र भी उन्हीं के सिर पर ठीकरा फोड़ते हुए बता रहा है कि हिन्दी के शब्द कठिन, दुरूह और असम्प्रेष्य है। जबकि, इतने वर्षों में कभी पारिभषिक-शब्दावलि का मानकीकरण' सरकार ने खुद ही नहीं किया।

कहने की जरूरत नहीं कि यह इस तथाकथित 'भारत-सरकार' (जबकि, इनके अनुसार तो 'गव्हर्मेण्ट ऑफ इण्डिया' ही सरल शब्द है) का इस आधी-शताब्दी का सबसे बड़ा दोगलापन है, जो देश के एक अरब बीस करोड़ लोगों को वह अंग्रेजी सिखाने का संकल्प लेती है, लेकिन 'साठ साल में मुश्किल से हिन्दी के हजार-डेढ़ हजार शब्द' नहीं सिखा पायी। यह सरल-सरल का खेल खेलती हुई किसे मूर्ख बनाने की कोशिश कर रही है ?

यह बहुत नग्न-सचाई है कि देश की मौजूदा सरकार 'उदारीकरण के उन्माद' में अपने 'कल्याणकारी राज्य' की गरदन कभी की मरोड़ चुकी है और 'कार्पोरेटी-संस्कृति' के सोच' को अपना अभीष्ट मानने वाले सत्ता के कर्णधारों को केवल 'घटती बढ़ती दर' के अलावा कुछ नहीं दिखता। 'भाषा' और 'भूगोल' दोनों ही उनकी चिंता के दायरे से बाहर हैं। निश्चय ही इस अभियान में हमारा समूचा मीडिया भी शामिल है, जिसने देश के सामने 'यूथ-कल्चर' का राष्ट्रव्यापी मिथ खड़ा किया और 'अंग्रेजी और पश्चिम के सांस्कृतिक उद्योग' में ही उन्हें अपना भविष्य बताने में जुट गया। यह मीडिया द्वारा अपनाई गई दृष्टि उसी 'रायल-चार्टर' नीति का कार्यान्वयन है, जो कहता है, 'दे शुड नॉट रिजेक्ट अवर लैंग्विज एण्ड कल्चर इन फेवर आफ 'देअर' ट्रेडिशनल वेल्यूज। देअर स्ट्रांग एडहरेन्स टू मदर टंग हैज टू बी रप्चर्ड।'

कहना न होगा कि 'लैंग्विजेज शुड बी किल्ड विथ काइण्डनेस' की धूर्त रणनीति का प्रतिफल है, यह परिपत्र। बेशक इसे बकौल राहुल देव 'हिन्दी के ताबूत में आखिरी कील' समझा जाना चाहिए। बहरहाल, हिन्दी को सरल और बोधगम्य बनाये जाने की सद्-इच्छा का मुखौटा धारण करने वाले इस चालाक नीति-निर्देश की चौतरफा आलोचना की जाना चाहिए और कहा जाना चाहिए कि इसे वे अविलम्ब वापस लें। निश्चय ही आप-हम-सब  इस लांछन के साथ इस संसार से बिदा नहीं होना चाहेगें कि 'प्रतिरोध' की सर्वाधिक चिंतनशील भाषा का एक सांस्कृतिक रूप से अपढ़ सत्ता का कोई कारिन्दा हमारे सामने उसका गला घोंटे और हम चुप बने रहें तो यह घोषित रूप से जघन्य सांस्कृतिक अपराध है और हिन्दी के हत्यारों की फेहरिस्त हमारा भी नाम रहेगा।

यह सरकार का हिन्दी को 'आमजन' की भाषा बनाने का  पवित्र इरादा नहीं है, बल्कि खास लोगों की भाषा के जबड़े में उसकी गरदन फंसा देना की सुचिंतित युक्ति है। यह शल्यक्रिया के बहाने हत्या की हिकमत है। यह बिना लाठी टूटे सांप की तरह समझी जाने वाली भाषा को मारने की तरकीब है, क्योंकि यह अंग्रेजी के वर्चस्ववाद को डंसती है।

क्या कभी कोई कहता है कि अंग्रेजी का फलां शब्द कठिन है ? 'परिचय-पत्र' के बजाय 'आइडियेण्टिटी कार्ड' कठिन शब्द है? ऐसा कहते हुए वह डरता है। इस सोच से तो 'राष्ट्र' शब्द कठिन है और अंतत: तो उनके लिये पूरी हिन्दी ही कठिन हैं । बस अन्त में यही कहना है कि अंग्रेजी की दाढ़ में भारतीय-भाषाओं का खून लग चुका है। उसके मुंह से खून की बू आ रही है और इस 'भाषाखोर' के सामने हमारी भाषाओं के गले में इसी तरह फंदा डाल कर धक्का दिया जा रहा है। यही वह समय है कि हम संभलें और हिंसा की इस कार्रवाई का पुरजोर विरोध करें। 

इसी व‍िष्‍ाय पर यहां भी पढ़ें 

- प्रभु जोशी
303, गुलमोहर निकेतन, वसंत-विहार
(शांति निकेतन के पास)
इन्दौर-10