मशहूर नाटक अदरक के पंजे के लेखक निर्देशक अभिनेता बब्बन खां का 17 अप्रैल 2026 को निधन हो गया। उनके इस एक नाटक ने दुनिया में कई तरह के रिकॉर्ड बनाए। यह 1965 से 2001 यानी तीन दशकों तक खेला जाता रहा। 1984 में ही यह एक अभिनेता द्वारा सबसे अधिक समय तक खेले जाने वाले नाटक के रूप में गिनीज़ बुक में आ चुका था। इसके प्रदर्शन मुंबई में भी हुए हैं। मैंने यह नाटक 1988 में देखा था। कुछ दिन पहले मुझे इसके प्रदर्शन पर अपनी टिप्पणी पुराने कागज़ों में मिली थी। यानी यह टिप्पणी 38 साल पहले की है। तब मैं नाटकों को अपनी तरफ से पैनी नजर से देखता था और लिखते वक्त लिहाज नहीं करता था। इस टिप्पणी में भी आप उस तेवर की झलक पाएंगे। अब कई बार लगता है इतना कठोर रवैया भी ठीक नहीं। पर नेमिचंद्र जैन ने मुझे एक बार कहा था कि नख-दंत विहीन समीक्षा नहीं होनी चाहिए। मैंने उनकी यह बात गांठ बांध ली थी। बिना यह जाने कि नाटक और रंगमंच की मेरी समझ कितनी कच्ची थी। बहरहाल! यह टिप्पणी पेशेनजर है।
अदरक के पंजे
स्वनामधन्य बब्बर खान और उनका ख्यातिप्राप्त नाटक ‘अदरक के पंजे’ अभी भी अपनी प्रसिद्धि के झंडे गाड़ता जा रहा है। 1987 में ही उसके 7000 प्रदर्शन पूरे होने वाले थे, अब तो अट्ठासी का भी एक महीना बीत गया और इस नाटक के प्रदर्शन बदस्तूर जारी हैं। यह बब्बन खान का ही साहस है कि वे उसे पिछले तेइस वर्षों से खेलते आ रहे हैं। अपने उत्साह के बलबूते पर ही उन्होंने दुनिया के छोटे बड़े कई देशों में इसे प्रदर्शित किया है और कई नामी गिरामी हस्तियों की सम्मतियां हासिल की हैं।
काफी लोगों ने इस नाटक को देखा होगा और इसकी कहानी से वाकिफ होंगे, कि रमतू मियां (नायक) फटेहाल सरकारी नौकर हैं। उनके आठ बच्चों ने उन्हें कंगाल, बदहाल बना दिया है। बी पाशा उनकी पत्नी और रमतू मियां शायद गुरवत की वजह से ही चिड़चिड़े मिज़ाज के हैं। पर वे दोनों बड़बोले भी हैं। एक तरह से मुंहज़ोर। किसी को कुछ भी कह देने में उनकी ज़ुबान लिहाज़ नहीं करती। वे अपनी इस ज़ुबानबाज़ी से हास्य पैदा करने की कोशिश करते हैं। इस कोशिश में वे खुद और सारा कारोबार हास्यास्पद हो जाता है। ‘अदरक के पंजे’ में नाटक के लायक कहानी नहीं है। कहानी के नाम पर कुछ पात्र (सेठ, दूधवाला, लाला, पड़ोसी, ससुर, साला आदि) मंच पर आते हैं और अपने पैसे वसूलने, खाना खाने आदि के लिए बहस करते हैं। बब्बन खां अपनी ऊल जलूल बतंगड़ी से उन्हें पटकन देते रहते हैं। सरकार के परिवार नियोजन की तर्ज पर ज्यादा बच्चे पैदा करने की गलती के एहसास के साथ नाटक समाप्त होता है।
इस नाटक में स्टेज क्राफ्ट के नाम पर फटेहाल घर के दृश्यबंध के अलावा सर्कसी जोकरों की तरह के पात्र और अटपटी भंगिमाएं हैं। भंगिमाएं अभिनय बिल्कुल नहीं हैं। मंच के बीचोंबीच एक तख्त पड़ा है। उसके साथ एक कुर्सी है। सामने एक-एक माइक्रोफोन रखा है। रमतू मियां अपवाद स्वरूप दो एक बार उठने के सिवा सारा वक्त तख्त पर जमे रहते हैं। हर आने वाला पात्र तख्त के बगल में रखी या दूसरे कोने की कुर्सी पर बैठता है और उनका वाक्युद्ध शुरू हो जाता है। यह वाक्युद्ध चुटकुले से शुरू होता है और फूहड़ता में खत्म होता है। सारा नाटक चुटकुलों से अटा पड़ा है। शुरू के पंद्रह मिनट कुछ चुटकुले सुन लेने के बाद कोई भी दर्शक बब्बन खां की प्रतिभा का अनुमान लगा लेता है। मसलन आने वाला पात्र अगर किसी तरह गधे का प्रसंग ले आया तो खां साहब तीसरे ही संवाद में उसे गधा साबित कर देंगे। इसी तरह पात्र को कुत्ता, पागल या भिखारी भी सिद्ध किया जाता है। रमतू मियां अपनी बेचारगी का भी खूब मज़ाक उड़ाते हैं। इस सारे ताम-झाम में उनका मकसद दर्शक को हंसाने का रहता है।
करीब तीस साल पहले इस नाटक का प्रदर्शन शुरू हुआ था। तब से अब तक शायद कुछ चुटकुले और जोड़े गए हों, कहानी संभवत: वैसी ही चल रही है। अगर चुटकुलों को ही कहानी मान लिया जाए तो निश्चित रूप से कहानी में काट-छांट हुई है। यहां भी बब्बन खां वक्त से पिछड़ गए हैं। उनके एक दोस्त मिर्ज़ा साहब अपने बिगड़ैल बेटे के साथ मंच पर आते हैं और रमतू मियां से बेटे को सुधारने की सिफारिश करते हैं। लड़का बातें तो आज की करता है लेकिन उसका रूपाकार सातवें दशक का है। अगर खां साहब लड़के के रूपाकार को समकालीन बनाते तो उन्हें उससे जुड़े हुए चुटकुले भी बदलने पड़ते।
गतिविधियों के नाम पर नाटक सिफर है। केवल पात्रों के आने जाने और परिधान में पारसी रंगमंच की छाप दिखती है। पारसी रंगमंच में भी हंसोड़ पात्र और स्थितियां होती थीं। बब्बन खां ने हंसोड़ पात्र खड़े करने की कोशिश की है, स्थितियां बनाने की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। यह स्पष्ट है कि बिना स्थितियों के नाटक का स्वरूप ही नहीं बन सकता। उनका सारा ज़ोर उच्चरित शब्द पर है। इस तरह यह नाटक रेडियो नाटक के रूप में ज्यादा न्याय संगत होता। इस सब के बावजूद वर्षों से नाटक को मंच पर प्रस्तुत करते रहने का अर्थ हुआ, दुनिया भर के सारे नाट्यशास्त्रों को खारिज कर देना।
अतः एक जरूरी सवाल यह पैदा होता है कि हद दर्जे का अनाटक वर्षों से नाटक के नाम पर क्यों और कैसे चल रहा है ? सीधा सा जवाब बब्बन खां की हठधर्मी के रूप में दिया जा सकता है। लेकिन व्यावसायिकता के इस युग में एक आदमी की हठधर्मिता की क्या बिसात। निश्चित रूप से इसकी सफलता के पीछे कुछ दूसरे कारण भी काम कर रहे हैं। सबसे बड़ी बात दर्शक की रुचि है। सभ्यता संस्कृति के विकास के बावजूद एक दर्शक वर्ग फूहड़ता और निरर्थकता में रस ले लेता है। कला को परखने के संस्कार उसमें नहीं हो सकते हैं पर वह सुघड़ता-फूहड़ता, सार्थकता-निरर्थकता के फर्क को भी नहीं समझता। उसे प्रसंगहीन हास्य (जो हास्यास्पद ज्यादा है) में ठहाके लगने का मसाला मिल जाता है। उपभोक्ता संस्कृति का करिश्मा भी इस नाटक की सफलता एक कारण है। विज्ञापन की चकाचौंध उपभोक्ता को चुंधियाने में कोई कसर नहीं छोड़ती। जैसे जैसे बब्बन खां ने लगातार प्रदर्शन किए, नाटक की सफलता के ढिंढोरे से दर्शक को बरग़लाना शुरु कर दिया। इस नाटक के प्रदर्शनों में वे अपनी उपलब्धियों को भुनाते हैं। जैसे उनका नाम गिनीस बुक में शामिल हो गया है। इसी तरह कुछ बड़ी हस्तियों को आदमकद चौखटों में बंद करके प्रचार के लिए रखा जाता है।
इस बहु प्रदर्शित नाटक के बारे में कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि इससे हमारे दर्शक की नाटक को परखने की असमर्थता प्रकट होती है। और उधर बब्बन खां एक चालाक प्रदर्शक की तरह मनोरंजन के नाम पर दर्शक को नासमझी के अंधेरे से बाहर नहीं निकलने दे रहे। हमें बब्बन खां जैसे तमाम सफल प्रदर्शकों और मनोरंजन प्रेमी दर्शकों, दोनों पर गहराई से सोचना होगा। (सन 1988)


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फेसबुक पर आई चुनिंदा टिप्पणियां
ReplyDeleteजय प्रकाश
बेबाक विश्लेषण। अब की आलोचनाओं में इतनी ईमानदारी कहां! बब्बन खां को समृति-नमन!
Sunil Sarin
एक अच्छी समीक्षा। कई एंगल से आपने नाटक पर अपनी राय दी है।
Rajinder Rajan
So well written A fine analysis
Shivprakash Singh
आज कल प्रदर्शित कई रिकार्ड तोड़ सफल फिल्में क्या ऐसी समीक्षा का सामना कर पाएंगी।
Vijay Kumar
ReplyDeleteआपने जो कुछ भी अपनी टिप्पणी मैं लिखा है वह बहुत तार्किक है , बहुत प्रासंगिक भी। 38 वर्ष बादभी आपकी यह टिप्पणी हमारे बाजार समय, सफलता,प्रचार और दर्शक रुचि के अंतर विरोधों को बड़ी बेबाकी से खोल रही है। समय तो इन वर्षों में और अधिक फूहड़ होता गया है।
Anup Sethi
Vijay Kumar आपकी बात से मेरी हिम्मत बढ़ी है। आपकी यह बात भी गौरतलब है कि काॅमेडी और भी फ़ूहड़ हुई है।
Kushal Kumar
ReplyDeleteइस नाटक के विज्ञापन तो रोज़ ही अख़बार में आते थे पर नाटक नहीं देख पाया। पर बाद में इसी तर्ज पर हास्य कवि सम्मेलन भी होने लगे। स्टैंड अप कॉमेडी इसी का नया रूप है।
बब्बन खां की स्मृति को नमन।
Anup Sethi
Kushal Kumar जी, हास्य विनोद (व्यंग्य रहित) से भरे नाटकों की परंपरा रही है जो फूहड़ता से लिबड़ती हुई आगे बढ़ी है।
शैलेश सिंह
ReplyDeleteहिन्दी में इस तरह के अनाटक और भी लोगों ने किए हैं. यह अलग बात है कि समीक्षाएं नख- दंत विहीन ही होती रही हैं. क्या इसे हम उपभोक्तावाद तक ही सीमित रखें या इसके और भी कुछ ठोस कारण हैं. क्या इसे गुजरती व मराठी के व्यवसायिक नाटकों के दबाव या प्रभाव के कुफल/ सुफल के रूप में नहीं.
क्या यह हास्य का अवमूल्यन नहीं है? अब हास्य की जगह विद्रूपता को स्थापित करने की सचेत प्रक्रिया व कोशिश नहीं है?
कथाविहीन व संवाद विहीन निरर्थक एकालाप ( बडबड) की दर्शकों द्वारा सहज स्वीकृति किस मानस को रिप्रजेण्ट करता है?
इस तरह की अपसंस्कृति के प्रसार से कौन - सी सत्ताएं मुफीद में होतीं हैं?
आदरणीय, आपने बहुत विजिब सवाल उठाएं हैं. यह अपसंस्कृति के विस्तार व उसके पोषण के साथ - साथ चेतना को विचारशून्यता की तरफ शिफ्ट करने का भी एक प्रयोग हो सकता है?
आपकी इस समीक्षा ने रस ग्राह्यता को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं, उनका उत्तर खोजा जाना चाहिए. इस महत्वपूर्ण समीक्षा को साझा करने के लिए विनम्र आभार.
नाटककर्मी बब्बन खान को विनम्र श्रद्धांजलि.
Anup Sethi
शैलेश सिंह जी, आपका आकलन सही है। व्यावसायिकता का दबाव भी इसके पीछे है। हालांकि कथाविहीनता और निरर्थक एकालाप या संवाद वाले नाटकों की एक अलग परंपरा रही है जो एब्सर्ड थियेटर के रूप में चली पर वह फ़ूहड़ और हंसी मजाक वाली नहीं थी। वह गंभीर आस्तित्विक प्रश्नों और बेचैनियों से टकराने वाले नाटक थे
Anil Sinha
ReplyDeleteनाम कई बार सुना । पर उस जमाने में सिनेमा देखने से कभी फुर्सत ही नहीं मिली कि इसे देख पाता ।
वैसे मेरा सोचना यह है कि कविता, कहानी और नाटक को शास्त्रीय परिभाषाओं से बांधने की कोशिश अनुचित है ।
Anil Sinha जी आपकी बात भी ठीक हो सकती है पर कला का आस्वाद लेने के लिए उसे परखना भी तो पड़ेगा।