Sunday, May 31, 2026

पीर घनेरी

 


पीर घनेरी

(लीलाधर मंडलोई की आपबीती - जब से आँख खुली है)


लीलाधर मंडलोई की आत्मकथा जब से आँख खुली हैसे पहले मधु कांकरिया की ढाका डायरीपढ़ी थी। यह डायरी हमारे पड़ोसी मुल्क की हाल की राजनीतिक सामाजिक दुर्दशा का लगभग आँखों देखा हाल है; बेचैनी भरा। पुस्तक पढ़ने के बाद बनी इस बेचैन मन:स्थिति के बाद लीलाधर मंडलोई की आत्मकथा के दो पन्ने पढ़ने पर ही मानो ठंडा पानी सर पर पड़ गया।

पहला प्रसंग उनके अपने शिशु रूप का है। जाहिर है यह स्मृति बहन-भाई और माँ-पिता के जरिए बनी होगी। गुदड़ियों  से बने झूले के ऊपर माँ की साड़ी लटका दी जाती अैर उसमें माँ की कुछ चूड़ियां बांध दी जातीं। हिलने पर चूड़ियों के खनकने से और साड़ी से माँ की उपस्थिति का आभास शिशु को हो जाता। इसी के आगोश में आने पर शिशु लीलाधर की रुलाई बंद होती थी। अन्यथा वह माँ के घर से बाहर जाने पर बहुत रोता था। यह जुगाड़ बहुत मौलिक, मार्मिक और प्यार भरा है। 

लीलाधर मंडलोई के संसार में माँ, पिता, दो भाई और एक बहन हैं। बाद में एक छोटा भाई और एक बहन भी शामिल होते हैं। छोटे भाई को सामान्य जीवन नहीं मिला और ज्यादा भी नहीं मिला। यह कचोट लीलाधर के मन में है। बचपन के दोस्त भी लीलाधर के जीवन में हैं। जीवन कठिन और बीहड़ है, इतना कि आप सोच भी नहीं सकते। दुख और पीड़ा और अभाव भी उन्होंने मस्ती में जिए। जीवन के साथ यह संलग्नता गजब है। पुस्तक में कुल पैंसठ प्रसंग है। प्रसंग दर प्रसंग एक पूरा संसार खुलता चला जाता है। हालांकि ये प्रसंग बचपन से लेकर भोपाल में कॉलेज की पढ़ाई खत्म करने तक ही हैं। कॉलेज के और भोपाल के प्रसंग भी ज्यादा नहीं हैं। अधिकतर खदान के आसपास का बचपन का जीवन ही यहां है। कोयले की खदान में मजदूर परिवार का जीवन। 

ये वर्णन पाठक को रुलाते हैं, ताकत देते हैं, दृष्टि देते हैं, जीवन प्रेम से भर देते हैं। मानव मन की भीतरी परतों को खोलने से लेकर प्रकृति से प्रेम और सहजीवन की गाथाएं गाते चलते हैं। 

कुछ साल पहले कवि शरद कोकास के ब्लॉग पर लीलाधर मंडलोई का एक छायाचित्र देखा था, जिसमें वह किसी घर के बरामदे में उकड़ूं यानी पैरों के भार बैठे हैं; उस मुद्रा में जिसे मल आसन कहते हैं। शहरी लोगों के लिए इस तरह पैरों पर बैठना आसान नहीं। मैं बचपन में इस तरह आसानी से बैठ लेता था। प्राय: बच्चे या जिनके कूल्हे के जोड़ लचीले हों वे, इस तरह बैठ लेते हैं। अभ्यास न रहने की वजह से ये जोड़ कड़े पड़ जाते हैं। मेरे लिए अब इस तरह बैठना संभव नहीं रहा है। वह चित्र देखकर मैं बहुत प्रभावित हुआ था कि मंडलोई जी इस तरह बैठ लेते हैं। क्योंकि तब मैं उन्हें आकाशवाणी के अपने वरिष्ठ अधिकारी के रूप में जानता था, जो बाद में दूरदर्शन के महानिदेशक भी बने। जब मैं उनके संपर्क में आया था, तब भी वे आकाशवाणी में शायद सहायक निदेशक के पद पर पहुंच गए थे। मैं कार्यक्रम निष्पादक था। एक उच्च अधिकारी इस तरह बैठ लेता है मेरे लिए यह खुशी और हैरानी की बात थी। 

उनकी आत्मकथा को पढ़कर उनका इस तरह बैठ पा सकने का रहस्य खुल गया। उनके लिए कुछ भी असहज नहीं है। जिसने इतना कठिन जीवन जिया हो, वह किसी भी परिस्थिति में रह सकता है। उसका शरीर उसके वश में रह सकता है। 

जब से आंख खुली है आत्मकथा को पढ़ते हुए लगा, हिमाचल के एक छोटे से गाँव में बीते मेरे बचपन में भी तो जीवन ऐसा ही था। पैरों में चप्पल है या नहीं फर्क नहीं पड़ता था। जंगल पार कर स्कूल जाना होता था। स्कूल में पेड़ के नीचे टाट-पट्टी पर बैठते थे। बाजार और शहर बहुत दूर था। घर में बिजली नहीं थी। पानी बावड़ी से भरकर लाया जाता था। सारा गांव शौच के लिए जंगल की तरफ जाता था। धीरे-धीरे समझ आया कि यह जीवन स्थितियां भले ही एक जैसी लग रही हों, लेकिन दोनों की जिंदगी में ज़मीन आसमान का अंतर है। इसमें समानता ढूंढ़ना मूर्खता है। जिस बचपन और जिस जीवन को मंडलोई जी याद कर रहे हैं, वह एक मजदूर बस्ती के बच्चे का जीवन है। वह भी कोयला खदान की मजदूर बस्ती का। यहां सब कुछ अस्थाई, अनिश्चित और तदर्थ है। रोज की मज़दूरी करोगे तो घर में चूल्हा जलेगा। घर के बड़ों को ही नहीं बाल बच्चों को भी पैसा कमाने की जुगत करनी होगी। मेरा बचपन तो इसके बिलकुल विपरीत था। हम अपने पक्के घर में थे। भोजन, कपड़े वगैरह की चिंता नहीं करनी पड़ती थी। बहुत समृद्धि नहीं थी पर अभाव भी नहीं था। यहां तो इस बालक के घर में न दीवारें थी न छत। बस किसी तरह वे झुपड़िया में रहते थे।

बेतरह परेशान कर देने वाले इन अभावों और असुविधाओं के बावजूद वे जीवन में सुख ढूंढ़ लेते थे। साथ में उन्हें जी तोड़ मेहनत करने की सीख मिल रही थी। 

गजब बात यह है कि गरीबी और उससे जुड़ी तमाम दिक्कतों के बावजूद उस परिवार में सांस्कृतिक उजास थी। जीवन जीने की सुघड़ता थी। जो जैसा उपलब्ध है, उसमें से सौंदर्य और सुख का बिरवा उगा लेने का हुनर था। इस हुनर में मंडलोई जी की माँ की भूमिका सर्वोपरि है। न कुछ में से भी वे खाने, पहनने, ओढ़ने की चीजें बना लेने में और खुशी की लहर पैदा कर देने में माहिर थीं। 

उनका परिवार एक विस्थापित परिवार था। उस दंपति ने अपने बूते पर गृहस्थी खड़ी की थी। पिछले जीवन यानी माँ के पीहर का सांस्कृतिक अवदान उनकी पूंजी थी। इस पूंजी को कोई छीन नहीं सकता था। बल्कि यह पूंजी उनके परिवार और संतति के लिए संजीवनी थी। वे चाहे थोड़े में गुजारा करने की जुगत हो, धीरे-धीरे गृहस्थी का सामान जोड़ने की दूरदृष्टि हो, लोरियों और लोकगीतों से मिल रही कला का संबल हो, कहावतों से दुनिया को समझने की अंतर्दृष्टि हो, जीवन में धंसी प्रकृति, वनस्पति की उपयोगिता की सीख हो। यह सब इन बच्चों को अपने माता-पिता से छतनार पेड़ की शीतल और जीवनदाई छाया की तरह मिलता रहा। 

मंडलोई को अपने परिवार और मित्रों ने तो सिखाया ही, वहां के परिवेश ने भी उनकी मूल्य चेतना और दृष्टि का निर्माण किया। इसमें जंगल, वनस्पति, पशु, पक्षियों की भी भूमिका है। घर और बाहर के जीवन के अनुभवों से गुजरते हुए उनकी सौंदर्य चेतना भी जागृत हुई। उन्होंने दुख-तकलीफ और मेहनत के बीच रहते हुए सुंदर को पहचानना सीखा। उनके अलग-अलग कथा-प्रसंगों में रंगों, आकारों, ध्वनियों को पहचानने और उसके आस्वाद की कथाएं मिलती हैं। यह सब अधिकतर उन्हें प्रकृति से मिला। घर के पास जंगल था, खेत थे, पहाड़ था, नदी थी, और इस सब में प्रकृति अपनी सुरम्यता और बीहड़ता तथा विस्तीरणता और संपूर्णता में विद्यमान थी। मंडलोई की कलाओं की कक्षाएं इसी खुले प्रकृति-प्रांगण में लगीं। जिस तरह वे स्कूली शिक्षा में अव्वल आए, उसी तरह सौंदर्य संपन्न आस्वादक के रूप में भी वे प्रवीण हुए। ऐसा लगता है कि पीड़ा और प्रेम के इस मणिकांचन रसायन ने उनके साहित्यकार, कवि, कलाकार को गढ़ा है। 

मंडलोई का परिवार प्रवासी मजदूरों की तरह झोपड़ी या झुपड़िया में रहने को मजबूर था। किन परिस्थितियों और विवशताओं के कारण वह अपना वतन और अपनी धरती और अपने लोगों को छोड़कर आया होगा, यह हमें पता नहीं चलता। यही दिखता है कि कोयले की खदान में उन लोगों ने अपना जीवन झोंक दिया। 

इस विस्थापन या उखड़ेपन के बीच मंडलोई के माता-पिता का अतीत का ज्ञान, अनुभव और स्मृति इस परिवार को एक सांस्कृतिक जमीन मुहैया कराती है। हमें सहज ही यह गलतफहमी हो जा सकती है कि अगर कोई परिवार दिहाड़ीदार है, कच्चे अस्थाई घर में रहता है, आसपास कोई नाते-रिश्तेदार या बिरादरी नहीं है, तो वह सांस्कृतिक और सभ्याचार संबंधी मूल्यों की दृष्टि से भी विपन्न होगा। पर इस परिवार के साथ ऐसा बिल्कुल नहीं था। पिता की भाषा और उनके मुहावरों कहावतों से उनकी जड़ों का अंदाज लग जाता है। और माता ने इस बीहड़ और उजाड़ जगह में जिस कौशल, धीरज और दूर दृष्टि से जीवन के बिरवे को रोपा और परिवार की बगिया को हरा-भरा, कठोर-कर्मठ और संजीव-सुंदर बनाया, वह उनकी स्मृति, परवरिश के बिना संभव ही नहीं था। ऐसा लगता है कि माता के परिवार ने अपनी बेटी को जीने के कुछ अनिवार्य सूत्र सहज ही सिखा दिए थे। वे दोनों ही अपने अतीत का न बखान करते हैं न गुणगान करते हैं। निरे वर्तमान के बोझ से दबे हुए प्रतीत होते हैं। पर इस बोझ को ढोने की सामर्थ्य वे अपने अतीत से पाते हैं। 

आत्मकथा के इस खंड में मंडलोई ने अपने माता-पिता के अतीत के बारे में रोशनी नहीं डाली है। पर हमें ऐसे जुझारू दम्पति के बचपन को जानने की इच्छा होती है। एक ही प्रसंग मेरे ध्यान में आता है, जब बारिश होती है और माता भाग कर खेत में जा खड़ी होती हैं, भीगती रहती हैं। और वे अपने बचपन में पहुंच जाती हैं कि किस तरह वे बारिश में मिट्टी की सोंधी खुशबू में रम जाया करती थीं। पता नहीं किस वजह से यह प्यारी जोड़ी अपने घर से बिछुड़ जाती है और विंध्य की पहाड़ियों में पहाड़ खोदू कोयला खदानों के शिकंजे में फंस जाती है। और यह दुश्चक्र ऐसा है कि एक बार कोई व्यक्ति इस खोह में कदम धर दे तो फिर बाहर का रास्ता मिलना आसान नहीं है। 

लीलाधर मंडलोई को पता नहीं कितनी मेहनत करनी पड़ी होगी कि वे उस चंगुल से छूटे। खुद पढ़-लिखकर जीवन की नई इबारत लिखी और अपने परिजनों को भी वहां से उबारा। 

मेरे लिए इस पुस्तक को पढ़ना आसान नहीं था। बार-बार मैं अपने बचपन में चला जाता था और खुद को समझाता था कि भाई तेरे जीवन से इस जीवन का कोई साम्य नहीं है। उन अनुभवों को उसी रूप में देखो और महसूस करो। और मैं ठिठक जाता।

अनेक अवसर ऐसे आए जब किसी प्रसंग विशेष को पढ़कर रुकना पड़ जाता था। सतत पढ़ना संभव नहीं होता। जीवन की सघनता तो उसके पीछे है ही, मंडलोई जी का उन अनुभवों को भाषा में बदलना, उनकी सच्चाई, उनकी कोमलता, सांद्रता, संगीत, रंग, चित्रात्मकता - ये सब ठहरने पर मजबूर कर देते हैं कि जो पढ़ा उसे भीतर जज्ब होने दो, उसमें रमे रहो। यह पुस्तक हमारे भीतर कुछ रासायनिक प्रक्रिया कर देती है। शायद लिखे हुए को अनुभव करना यही होता होगा।

जब से आँख खुली है (आत्मकथा)लीलाधर मंडलोई, राजकमल प्रकाशन, 2025, पृष्ठ 246, मूल्य रु. 225/-

यह समीक्षा समालोचन पर भी है। 


Sunday, May 17, 2026

नहीं रहे अदरक के पंजे


मशहूर नाटक अदरक के पंजे के लेखक निर्देशक अभिनेता बब्बन खां का 17 अप्रैल 2026 को निधन हो गया। उनके इस एक नाटक ने दुनिया में कई तरह के रिकॉर्ड बनाए। यह 1965 से 2001 यानी तीन दशकों तक खेला जाता रहा। 1984 में ही यह एक अभिनेता द्वारा सबसे अधिक समय तक खेले जाने वाले नाटक के रूप में गिनीज़ बुक में आ चुका था। इसके प्रदर्शन मुंबई में भी हुए हैं। मैंने यह नाटक 1988 में देखा था। कुछ दिन पहले मुझे इसके प्रदर्शन पर अपनी टिप्पणी पुराने कागज़ों में मिली थी। यानी यह टिप्पणी 38 साल पहले की है। तब मैं नाटकों को अपनी तरफ से पैनी नजर से देखता था और लिखते वक्त लिहाज नहीं करता था। इस टिप्पणी में भी आप उस तेवर की झलक पाएंगे। अब कई बार लगता है इतना कठोर रवैया भी ठीक नहीं। पर नेमिचंद्र जैन ने मुझे एक बार कहा था कि नख-दंत विहीन समीक्षा नहीं होनी चाहिए। मैंने उनकी यह बात गांठ बांध ली थी। बिना यह जाने कि नाटक और रंगमंच की मेरी समझ कितनी कच्ची थी। बहरहाल! यह टिप्पणी पेशेनजर है। 


अदरक के पंजे

स्वनामधन्य बब्बर खान और उनका ख्यातिप्राप्त नाटक अदरक के पंजेअभी भी अपनी प्रसिद्धि के झंडे गाड़ता जा रहा है। 1987 में ही उसके 7000 प्रदर्शन पूरे होने वाले थे, अब तो अट्ठासी का भी  एक महीना बीत गया और इस नाटक के प्रदर्शन बदस्तूर जारी हैं। यह बब्बन खान का ही साहस है कि वे उसे पिछले तेइस वर्षों से खेलते आ रहे हैं। अपने उत्साह के बलबूते पर ही उन्होंने दुनिया के छोटे बड़े कई देशों में इसे प्रदर्शित किया है और कई नामी गिरामी हस्तियों की सम्मतियां हासिल की हैं। 

काफी लोगों ने इस नाटक को देखा होगा और इसकी कहानी से वाकिफ होंगे, कि रमतू मियां (नायक) फटेहाल सरकारी नौकर हैं। उनके आठ बच्चों ने उन्हें कंगाल, बदहाल बना दिया है। बी पाशा उनकी पत्नी और रमतू मियां शायद गुरवत की वजह से ही चिड़चिड़े मिज़ाज के हैं। पर वे दोनों बड़बोले भी हैं। एक तरह से मुंहज़ोर। किसी को कुछ भी कह देने में उनकी ज़ुबान लिहाज़ नहीं करती। वे अपनी इस ज़ुबानबाज़ी से हास्य पैदा करने की कोशिश करते हैं। इस कोशिश में वे खुद और सारा कारोबार हास्यास्पद हो जाता है। अदरक के पंजेमें नाटक के लायक कहानी नहीं है। कहानी के नाम पर कुछ पात्र (सेठ, दूधवाला, लाला, पड़ोसी, ससुर, साला आदि) मंच पर आते हैं और अपने पैसे वसूलने, खाना खाने आदि के लिए बहस करते हैं। बब्बन खां अपनी ऊल जलूल बतंगड़ी से उन्हें पटकन देते रहते हैं। सरकार के परिवार नियोजन की तर्ज पर ज्यादा बच्चे पैदा करने की गलती के एहसास के साथ नाटक समाप्त होता है।  

इस नाटक में स्टेज क्राफ्ट के नाम पर फटेहाल घर के दृश्यबंध के अलावा सर्कसी जोकरों की तरह के पात्र और अटपटी भंगिमाएं हैं। भंगिमाएं अभिनय बिल्कुल नहीं हैं। मंच के बीचोंबीच एक तख्त पड़ा है। उसके साथ एक कुर्सी है। सामने एक-एक माइक्रोफोन रखा है। रमतू मियां अपवाद स्वरूप दो एक बार उठने के सिवा सारा वक्त तख्त पर जमे रहते हैं। हर आने वाला पात्र तख्त के बगल में रखी या दूसरे कोने की कुर्सी पर बैठता है और उनका वाक्युद्ध शुरू हो जाता है। यह वाक्युद्ध चुटकुले से शुरू होता है और फूहड़ता में खत्म होता है। सारा नाटक चुटकुलों से अटा पड़ा है। शुरू के पंद्रह मिनट कुछ चुटकुले सुन लेने के बाद कोई भी दर्शक बब्बन खां की प्रतिभा का अनुमान लगा लेता है। मसलन आने वाला पात्र अगर किसी तरह गधे का प्रसंग ले आया तो खां साहब तीसरे ही संवाद में उसे गधा साबित कर देंगे। इसी तरह पात्र को कुत्ता, पागल या भिखारी भी सिद्ध किया जाता है। रमतू मियां अपनी बेचारगी का भी खूब मज़ाक उड़ाते हैं। इस सारे ताम-झाम में उनका मकसद दर्शक को हंसाने का रहता है। 

करीब तीस साल पहले इस नाटक का प्रदर्शन शुरू हुआ था। तब से अब तक शायद कुछ चुटकुले और जोड़े गए हों, कहानी संभवत: वैसी ही चल रही है। अगर चुटकुलों को ही कहानी मान लिया जाए तो निश्चित रूप से कहानी में काट-छांट हुई है। यहां भी बब्बन खां वक्त से पिछड़ गए हैं। उनके एक दोस्त मिर्ज़ा साहब अपने बिगड़ैल बेटे के साथ मंच पर आते हैं और रमतू मियां से बेटे को सुधारने की सिफारिश करते हैं। लड़का बातें तो आज की करता है लेकिन उसका रूपाकार सातवें दशक का है। अगर खां साहब लड़के के रूपाकार को समकालीन बनाते तो उन्हें उससे जुड़े हुए चुटकुले भी बदलने पड़ते।  

गतिविधियों के नाम पर नाटक सिफर है। केवल पात्रों के आने जाने और परिधान में पारसी रंगमंच की छाप दिखती है। पारसी रंगमंच में भी हंसोड़ पात्र और स्थितियां होती थीं। बब्बन खां ने हंसोड़ पात्र खड़े करने की कोशिश की है, स्थितियां बनाने की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। यह स्पष्ट है कि बिना स्थितियों के नाटक का स्वरूप ही नहीं बन सकता। उनका सारा ज़ोर उच्चरित शब्द पर है। इस तरह यह नाटक रेडियो नाटक के रूप में ज्यादा न्याय संगत होता। इस सब के बावजूद वर्षों से नाटक को मंच पर प्रस्तुत करते रहने का अर्थ हुआ, दुनिया भर के सारे नाट्यशास्त्रों को खारिज कर देना। 

अतः एक जरूरी सवाल यह पैदा होता है कि हद दर्जे का अनाटक वर्षों से नाटक के नाम पर क्यों और कैसे चल रहा है ?   सीधा सा जवाब बब्बन खां की हठधर्मी के रूप में दिया जा सकता है। लेकिन व्यावसायिकता के इस युग में एक आदमी की हठधर्मिता की क्या बिसात। निश्चित रूप से इसकी सफलता के पीछे कुछ दूसरे कारण भी काम कर रहे हैं। सबसे बड़ी बात दर्शक की रुचि है। सभ्यता संस्कृति के विकास के बावजूद एक दर्शक वर्ग फूहड़ता और निरर्थकता में रस ले लेता है। कला को परखने के संस्कार उसमें नहीं हो सकते हैं पर वह सुघड़ता-फूहड़ता, सार्थकता-निरर्थकता के फर्क को भी नहीं समझता। उसे प्रसंगहीन हास्य (जो हास्यास्पद ज्यादा है) में ठहाके लगने का मसाला  मिल जाता है। उपभोक्ता संस्कृति का करिश्मा भी इस नाटक की सफलता एक कारण है। विज्ञापन की चकाचौंध उपभोक्ता को चुंधियाने में कोई कसर नहीं छोड़ती। जैसे जैसे बब्बन खां ने लगातार प्रदर्शन किए, नाटक की सफलता के ढिंढोरे से दर्शक को बरग़लाना शुरु कर दिया। इस नाटक के प्रदर्शनों में वे अपनी उपलब्धियों को भुनाते हैं। जैसे उनका नाम गिनीस बुक में शामिल हो गया है। इसी तरह कुछ बड़ी हस्तियों को आदमकद चौखटों में बंद करके प्रचार के लिए रखा जाता है।   

इस बहु प्रदर्शित नाटक के बारे में कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि इससे हमारे दर्शक की नाटक को परखने की असमर्थता प्रकट होती है। और उधर बब्बन खां एक चालाक प्रदर्शक की तरह मनोरंजन के नाम पर दर्शक को नासमझी के अंधेरे से बाहर नहीं निकलने दे रहे। हमें बब्बन खां जैसे तमाम सफल प्रदर्शकों और मनोरंजन प्रेमी दर्शकों,  दोनों पर गहराई से सोचना होगा। (सन 1988)