Friday, February 5, 2010

हिमालय में हैंड ग्लाइडिंग, नहीं पहाड़ में हिचकोले खाती जिंदगानी हरदम


हरबीर का खींचा हुआ भागसू नाथ मंदिर परिसर का यह चित्र साभार. चित्र में वल्‍लभ डोभाल कुछ पढ़ रहे हैं.

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भागसूनाग


बहुत दूर दिखता है जल प्रपात

बहुत क्षीणकाय हो गया है जल प्रपात

बहुत ज्यादा लोगों से घिरा है जल प्रपात


फुहार इसकी आकाश में ही सूख-सूख जाती

झरती चांदी में स्नान की आदिम पुकार धरी की धरी रह जाती


भागसू के कुंड ने भी तरणताल का चोला पहन लिया है

मंदिर कसमसा रहा है

चंदा उगाही जोरों पर है

नए भवन में बिराजेंगे देवताओं के पत्थर


ल्लभ डोभाल अब तुम कहां रहते हो

नोयडा या धर्मशाला

जरा गिनो तो

छिले हुए पहाड़ की पसलियां ज्यादा हैं या

लुर-लुर फिरती टैक्सियां और ऑटो

पेड़ ज्यादा कटे या लेंटर पड़े ज्यादा

प्लास्टिक ज्यादा जमा हुआ या और भी कम हुआ पानी


बल्लभ डोभाल तुम कहोगे क्या हिसाब लगाने बैठ गए

फल फूल रहा है कारोबार

रोक कोई सकता नहीं


सुनो जी ल्लभ

मैं तो ढूंढ रहा हूं

अलग-थलग पड़ी हो

मिल जाए चट्टान कोई

बस थकान अपनी मिटा लूं

ज्यादा देर अब यहां रुका नहीं जाएगा॥

˜

इन छहों कविताओं में कुछ जगहों के नाम आए हैं -

हिमालय की पीर पंजाल शृंखला में साढ़े तेरह हजार फुट की उंचाई पर रोहतांग दर्रा लाहुल स्पीति को मनाली से जोड़ता है। ब्यास नदी का उद्गम यहीं से होता है। राल्हा पैदल यात्रा का एक पड़ाव है। सोलंग में स्कीइंग हाती है, वशिष्ठ में गर्म पानी के कुँड हैं, नग्गर में प्रसिद्ध रूसी चित्रकार निकोलिस रोरिक ने अपनी दुनिया बसाई है। मलाणा गांव प्रचीनतम लेकिन अब तक चला आ रहा लोकतंत्र लगभग दस हजार फुट उंचाई पर बसा है। जमलू यहां का देवता है और यहां पहुंचने का एक रास्ता चंद्रखणी दर्रा है। मणिकर्ण कभी उद्दाम रही लेकिन अब बिजली के लिए बांधों में बांधी जा रही पार्वती नदी के तट पर गर्म पानी के चश्मों का तीर्थ है। पतली कूल सैनी अशेष और स्नोवा बार्नो का इलाका है। समशी, भूंतर, औट, बजौरा कुल्लू और मंडी के बीच की जगहें हैं। ऐलोरा के कैलाश मंदिर की तरह शैल को काटकर बनाया गया मंदिर-समूह कांगड़ा घाटी में मसरूर में है। धर्मशाला में मेक्लोडगंज दलाई लामा के कारण लोकप्रिय हो गया है। और भागसूनाग में उत्तरोतर सूखता जाता एक जल प्रपात है। यहां कथाकार वल्लभ डोभाल भी डेरा डाले रहते हैं।


ये कविताएं समावर्तन के जनवरी अंक में भी पढ़ी जा सकती हैं.


7 comments:

  1. ASHESH ANOOP AJEY

    Three Idiots?
    I can't believe. I respect 3 of U. But I'm stunned to see Snowa the mystic blog. And something same in pratyaksha's blog.
    I'm reading Anup's poems. He is so aware n simple toward the nature.
    Can U solve this new release of three idiots? I m so curious, sir's.- Apratyaksha

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  2. Apra... ji, If u can understand hindi toh Chandartaal me to ajkal sirf udantashtari hi utar sakti hai. Tussi uthey kithey? Marne ka dar? no? Ajeya ho! Anupam ho! aur A... Shesh ho! Tussi great ho. Brahma, Vishnu & Mahesh ho!

    3 Idiots? Aap saari duniya ghoom lo, 3 bande non-Idiot mil jayen to aap mujhe Chandre se chandre Taal me dubo dena. Apna khyal rakhna.

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  3. हा , हा , हा ! चुड़ैलो , यहाँ भी आ पहुँचीं तुम ? किस ने पता बता दिया ? यहाँ सब कुछ जम गया है.आज शीत देवता मेरे चूल्हे में है. सूरज तुम कब आओगे? अनूप जी की इतनी लम्बी पेरा सेलिंग एक्स्पीडीशन में मसरूर को देखना एक अलग ही अनुभव रहा. इस ऊँचाई से वो बिम्ब भीतर कुछ खुरच दे रहे हैं.......

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  4. Yeh niyati sirf Bhagsunag ki hi nahin... Jahan jahan prayatan ne shradha ko pachhada hai wahan wahan yehi haal hai. Kavita baherhaal jhakjhorti hai.

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  5. नामवर सिंह "द्वितीय"February 12, 2010 at 12:15 AM

    अनूप, तुम बहुत अच्छा काम कर रहे हो. तुम्हारी पत्रिका भी बहुत अच्छी है. मेरे ख्याल से तुम बोधिसत्व के बाद मुंबई के सबसे अच्छे कवि हो.

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  6. Dear Anup
    sanjeev chandorkar writes:
    I have been borne and brought up in Mumbai. But many years back i had trekked thru Kulu Valley; the Sar-pass and Chandrakhani-pass. The fresh air i have inhaled 20 years back is still providing me "oxygen" in this polluted metro. All your six poems gave me an opportunity to retrieve those old files. Byas, Chattane, parvati nadi, Solang,Malana ---- it was like opening an old photo album.

    With the onslaught of new world order, the pangs of a bhoomi-putra of that soil has reached me.

    Your idea of giving footnotes for all not-so-known terms and names is replicable by others. Thanx

    sanjeev chandorkar

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  7. मित्रो, ब्‍लॉग पर आने, कविताएं देखने, पढ़ने और फिर टिप्‍पणी करने का धीरज दिखाने के लिए धन्‍यवाद.

    अप्रत्‍यक्षा और मैत्रेय को अजेय ने उत्‍तर दे दिया है.

    मेहता जी आपकी बात सही है. हम अपनी जगहों संसाधनों का दोहन करते हैं, उनकी इज्‍जत नहीं करते.

    मिस्‍टर द्वितीय, दूध वाली चाय में नींबू निचोड़ने का क्‍या फायदा.

    प्रिय संजीव, आपने बड़े प्रेम से कविताएं पढ़ीं और मन से लिखा, आभारी हूं. तापोश को भी कविताएं अच्‍छी लगीं, उन्‍होंने मेल में ल‍िखा, हर बार की तरह इस बार भी मेरा दिल भीज गया.

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