Tuesday, February 2, 2010

हिमालय में हैंड ग्लाइडिंग, नहीं पहाड़ में हिचकोले खाती जिंदगानी हरदम


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दलाईलामा का मैक्‍लोडगंज


घाटी में पुरातत्ववेता

ईसा से पहले के

बौद्ध स्तूप के अवशेष पाता है


ईसा के बहुत बाद भगाया गया

बौद्धों का राजा

एक चोटी पर शरण पाता है


यहां बहुत सारे बौद्ध हैं शरणार्थी

बाकी सारे अबौद्ध हैं निवासी और अनिवासी


जो यहां आते हैं सिर्फ सैलानी होते हैं

जो यहां रहते हैं वे दुकानें लगाते हैं ॥


3 comments:

  1. जो यहां आते हैं सिर्फ सैलानी होते हैं

    जो यहां रहते हैं वे दुकानें लगाते हैं ॥


    कडवा है मगर सच है!!!

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  2. निचोड के मैक्लोडगंज के जीवन को, वहां के लोगो का सच लिखा है आपने. कुछ शब्दों में सिमट गया ये सच. बढ़िया !

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  3. डॉ अनुराग और नैमित्‍य जी, कविता पढ़ने और टिप्‍पणी करने के लिए आपका आभारी हूं.

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